बुधवार, 20 अगस्त 2008

राह चलते पुण्य बटोरो

डॉ. महेश परिमल
आजकल महानगरों में एक दृश्य आम हो गया है, एक महिला बैठी हुई है, पास ही घास रखी हुई है. करीब ही एक खूँटे से गाय बँधी हुई है. लोग आते हैं, कुछ पैसे देकर घास खरीदते हैं और गाय को खिला देते हैं. इस तरह से वे शायद पुण्य बटोरते हैं. पुण्य देने का यह गोरखधंधा आजकल हमारे देश में खूब फल-फूल रहा है।
यह सच है कि गाय से हमारी धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं, वेदों में गाय को माता का स्थान दिया गया है, उसका न केवल दूध बल्कि मूत्र और गोबर को भी पवित्र माना गया है, पर शायद हम यह समझने में भूल कर जाते हैं कि जिसने गाय पाली है, तो गाय को चारा देने कार् कत्तव्य भी उसी का है। वह अपनेर् कत्तव्य से विमुख होकर उसके चारे की व्यवस्था के लिए हम पर आश्रित है। क्यो? एक भूखी गाय, उसके सामने चारा है, किंतु वह चारा खा नहीं सकती। कोई पुण्य बटोरने आता है, धन देकर चारा खरीदता है और गाय को दे देता है। गाय चारा खाती है, हम प्रणाम करते है और यह सोचकर आगे बढ़ जाते हैं कि चलो कुछ तो पुण्य बटोर लिया। इस तरह से क्या हम उस गो-पालक द्वारा गाय को भूखा रखने के अत्याचार में अनजाने ही शामिल नहीं हो जाते? यह तो वैसा ही हुआ कि एक व्यक्ति अपने बच्चों को भूखा रखकर आपसे भोजन की गुहार करे, आप उसी से भोजन खरीदें और बच्चों को दें और पुण्य बटोरें। क्या यह पुण्य आपको स्वीकार है? शायद नहीं।
यह दौर आपाधापी और प्रतिस्पर्धा का है। इसमें हम इतने व्यस्त हैं कि कोई पुण्यकार्य करना हमें सुहाता नहीं है। हम इसी आपाधापी में पुण्य बटोरना चाहते हैं, शायद गाय को चारा देकर हम सात्विक कार्य कर रहे हैं और हृदय को पवित्र करने का प्रयास कर रहे हैं। मेरा प्रश्न यह है कि हृदय को इतना मलिन ही क्यों किया कि उसे पवित्र करने की आवश्यकता पड़े। हृदय मलिन होता है हमारे कार्यों से, हमारे विचारों से, हमारे व्यवहार से। यदि हम अपने विचारों को ही पवित्र कर लें, तो हमारे कार्य और व्यवहार को पवित्र होने में देर नहीं लगेगी।
जापान का एक दृष्टांत है। एक व्यक्ति कार से तेजी से कहीं चला जा रहा था। अचानक उसने कार रोकी, किनारे खड़ी की और पास ही एक नल से व्यर्थ बहते पानी को बंद किया। कार स्टार्ट की और आगे बढ़ गया। क्या यह पुण्य कार्य नहीं था? हम जहाँ रहते हैं, वहाँ ऐसे दृश्य निश्चय ही आम होंगे, पर क्या हमने कभी इस तरह से पुण्य बटोरने का साहस किया? ऊर्जा की बचत एक सरकारी नारा है। यह नारा हमें घर में याद रहता है, पर अपने कार्यालय पहुँचते ही हम इस नारे को ताक पर रखकर अनजाने में ही ऊर्जा बेकार होने देते हैं। क्या यहाँ हम सतर्क रहकर ऊर्जा बचाकर देश को सम्पन्न बनाने का पुण्य कार्य नहीं कर सकते?
देखा जाए, तो हमारी नीयत ही साफ नहीं है। अपनी खुशी में हम मित्रों, पड़ोसियों को तो शामिल कर सकते हैं, पर देश को कदापि नहीं। इसी तरह दुख के क्षणों में हम रोने या शोक मनाने के लिए अपनों का काँधा ढूँढेंग़े, पर इसमें भी देश को शामिल नहीं करेंगे। जापान में ऑफिस में काम करते हुए किसी कर्मचारी को यह सूचना मिले कि उसका लड़का हुआ है, तो वह अपनी इस खुशी में देश को शामिल करते हुए चार घंटे अधिक काम करने का निश्चय करता है। यदि उसे यह पता चले कि उसके पिता का देहांत हो गया, तो इसमें भी वह देश को शामिल करते हुए सड़क की सफाई करने का निश्चय करता है। क्या ऐसी धार्मिक एवं राष्ट्रीय भावना हममें है? यह सच है कि हम जापानी नहीं बन सकते। हम पाश्चात्य संस्कृति बेधड़क अपना सकते हैं। उसके दुर्गुणों को हम सहज अंगीकार कर सकते हैं, पर भारत की गौरवशाली परंपरा को निभाते हुए अच्छे संस्कारों को नहीं अपना सकते। यह हमारी विशेषता है कि दुर्गुणों को अपनाने और देखने में हम देर नहीं करते। सद्गुणों को देखना हमारे स्वभाव से दूर होता जा रहा है।
महानगरों में हमारे ऑंखों के सामने से कई अच्छे दृश्य भी गुजरते हैं, पर हम उन्हें 'नोटिस' में नहीं लेते। मेरी ऑंखों के सामने से वह यादगार दृश्य गुजरा है। मेरीन लाइंस का समुद्री किनारा। लोग ताजा हवा ले रहे हैं, कोई अपने कुत्ते के साथ दौड़ रहा है, कोई पत्नी या बिटिया के साथ तेज-तेज चल रहा है। कोई ऐसे ही पंजों के बल कूद रहा है। ऐसे में एक व्यक्ति साधारण कपड़े पहने, एक बड़ा सा थैला लिए वहां आता है, थैले से खाना निकालता है, अलग-अलग प्लेटों में सजाता है। डबलरोटी, पके चावल, रोटी, सब्जी सभी प्लेटों में रखता है और एक सीटी मारता है। थोड़ी ही देर में आवारा कुत्तों का जमघट लग जाता है। आवारा कुत्ते वहाँ पहुँच तो जाते हैं, पर भोजन पर टूट नहीं पड़ते। सभी अनुशासित होकर अपनी-अपनी प्लेटों के आगे खड़े हो जाते हैं। कुछ देर की इंतजारी के बाद उस व्यक्ति की तरफ देखते हैं। व्यक्ति इशारा करता है और कुत्ते खाना शुरू कर देते हैं। इस दौरान व्यक्ति की प्यार भरी थपकी हर कुत्ते को पड़ती है। किसी को डाँटता है, किसी को दुलारता है। खाना खत्म होते ही सभी कुत्ते चले जाते हैं। व्यक्ति प्लेट उठाता है और चला जाता है।
दादर के ही शिवाजी पार्क में एक महिला रोज सुबह-शाम आवारा कुत्तों को दूध देती है। उसका प्यार, दुलार, ममत्व कुत्तों पर मानों बरस पड़ता है। उसके चेहरे पर परम संतोष का भाव होता है। इन्हें न लोगों की परवाह होती है, न ही कुत्तों की प्लेट उठाने में घृणा होती है। ये सिर्फ अपना काम करते हैं। प्रचार की भूख से परे ये केवल सेवाभाव के साथ जीए जा रहे हैं।
आप कह सकते हैं कि नैतिकता का पाठ तो हर कोई पढ़ा सकता है, उपदेश कोई भी दे सकता है, पर उसे अमल में लाना टेढ़ी खीर है। ऐसा सोचना स्वाभाविक है, पर हम यह भी तो देखें कि पहले हम क्या थे, पर आज एकाएक हममें परिवर्तन कैसे आ गया। हमारे माता-पिता ने ही संस्कार के रूप में हमें अपने से बड़ों की इात करना सिखाया। फिर हम अब क्यों हिचकने लगे हैं बड़ों का सम्मान करने में? हम प्रतिदिन गलतियाँ करते हैं। इसे हम बखूबी जानते-समझते हैं, पर उसी गलती की तरफ कोई आपसे छोटा इंगित करता है, तो आपका पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है, ऐसा क्यों? उस अदने से व्यक्ति ने आपका ध्यान उसी गलती की ओर दिलाया है, जिस गलती को आप बखूबी जानते हैं, फिर यह झूठा अहंकार क्यों?
भूखे को भोजन देना पुण्य है, पर किसी व्रतधारी या अनशनकारी को भोजन देना पाप है, पर अब हम सब इस पाप-पुण्य की सीमा से बाहर आ गए हैं। सच यही है कि सामने वाले से जब तक हमारा स्वार्थ सधता है, तब तक वह भगवान, बाद में वह हमारे लिए दो कौड़ी का भी नहीं रह जाता है। आज हम इसी सच को पाले हुए हैं। यह सच का एक रूप है। जल्द ही यही सच विभिन्न विद्रूपताओं के साथ हमारे सामने आएगा, हमें इसके लिए तैयार रहना होगा।
डॉ. महेश परिमल

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