सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

ग्लोबल स्टार बन गए शाहरुख


डॉ. महेश परिमल
इन दिनों पूरे देश ही नहीं, बल्कि विश्व में यदि केवल चर्चा है, तो केवल शाहरुख खान की। आखिर हो भी क्यों न? यही तो एक ऐसा सितारा है, जिसने बर्र के छत्ते पर हाथ डाला है। वह भी पूरी शिद्दत के साथ। उन शक्तियों के खिलाफ उसने आवाज उठाई है, जो अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण ही पहचानी जाती है। जिनका अस्तित्व एक छोटे से द्वीप की तरह ही है। यही नहीं, इन्हें मुगालता है कि हमारे कहने मात्र से ही दुनिया चलती है। अच्छा भी है इनका यह मुगालता बना रहे, क्योंकि जिस दिन यह भ्रम टूटेगा, ये जी भी नहीं पाएँगे। अब इन्हीं के न जीने की परिस्थितियाँ बन रहीं हैं। आम जनता को यह पता चल गया है कि उनके मनोरंजन में यदि स्वार्थी राजनीति को डाला गया, तो यह उन्हें कतई मंजूर नहीं।
आप सोच भी सकते हैं कि बर्लिन में जिन्होंने माय नेम इज खान की टिकट 60 हजार रुपए में खरीदी हो, वह भला ऐसी क्षुद्र राजनीति का हिस्सा बन सकता है? अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए शाहरुख जब बर्लिन में थे, तो कई ऐसे दृश्य सामने आए, जिससे लगता है कि अब उन्हें किंग खान के बजाए ग्लोबल स्टॉर कहा जाए, तो अतिशयोक्ति न होगी। वहाँ शाहरुख के ऐसे दीवाने मिले, जिनके बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। युवतियाँ तो शाहरुख की फिल्मों के गीत गा रहीं थी। विदेशी जबान से हिंदी गीत सुनना कितना अच्छा लगता होगा? यही नहीं, 50 लोगों का एक दल विएना से बर्लिन पहुँचा था, इन लोगों का कहना था कि हम शाहरुख की फिल्म देखने के लिए कहीं भी जा सकते हैं। ऐसी दीवानगी एक अभिनेता शाहरुख के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे सुलझे हुए कलाकार के प्रति है, जो उन छद्म शक्तियों को अच्छी तरह से पहचानता है। उसे यह अच्छी तरह से पता है कि सच्चे देशवासी बनने का नारा लगाने से कोई सच्च राष्ट्रभक्त नहीं हो जाता। इसके लिए सच्च भारतीय बनना पड़ता है। सच्च भारतीय वही हो सकता है, जिसके दिल में सभी के लिए प्यार हो। यही शाहरुख है, जो एक तरफ दिन में पाँच बार नमाज अदा करता है, तो दूसरी तरफ अपने घर पर गणपति की स्थापना करता है। नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना करता है। यह सब कुछ करने में उसे गर्व होता है। वह इसे छद्म राजनीति का हिस्सा नहीं मानता। पाकिस्तानी Rिकेट खिलाड़ियों को वह अपनी टीम में लेना चाहते थे, लेकिन ले नहीं पाए। अपनी इस बात पर वे आज भी कायम हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। जो कह दिया, उसके लिए माफी क्यों माँगें? माफी के लायक उन्होंने कुछ भी ऐसा कहा ही नहीं है।
असल में इन छद्म शक्तियों को अपनी कुर्सी हिलती दिखाई दे रही है। अपना जनाधार खो रहे हैं, वे लोग। अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वे कुछ ऐसा कर रहे हैं, जिससे उन्हें मीडिया हाथो-हाथ ले। मीडिया के पास भी ऐसा कोई मसाला नहीं है, जिससे वे अपनी टीआरपी बढ़ाएँ। बस जो कुछ सामना में छपा, उसे ही इशु बनाकर पेश कर दिया। दो साल बाद मुंबई में पालिका चुनाव हैं, उसमें अपने आधार को बनाए रखने के लिए कुछ मुद्दे चाहिए, जिसे वे अभी से भुनाना चाहते हैं। आज जो प्रांतवाद का नारा दिया जा रहा है, तो फिर वे अपने यहाँ काम करने वाले उत्तर प्रदेश या बिहार के मजदूरों को बाहर क्यों नहीं कर देते। आखिर वे भी तो एक बिल्डर हैं, अपने यहाँ परप्रांतीय मजदूरों को क्यों रखा है? अपने मराठी मानुष को ही रख लेते। इसके बाद यदि बहुत सारे मकान बना भी लिए, तो भी प्रांतवाद आड़े नहीं आता। सभी वर्ग के लिए, जो धनिक हैं, वे उनके बनाए हुए लैट खरीद सकते हैं। यहाँ पर उन लैट्स पर मराठी मानुष का ही कब्जा क्यों नहीं होता? चूँकि परप्रांतीय को कम मजदूरी देकर अधिक काम लिया जा सकता है और धनिक वर्ग से अधिक धन लेकर लैट दिए जा सकते हैं, इसलिए प्रांतवाद आड़े नहीं आता। यह कैसा न्याय? अपने खिसकते हुए जनाधार को वे राहुल गांधी की यात्रा के बाद समझ भी गए थे, पर हमारे कृषि मंत्री ने उनके चरणों में लोटकर उन्हें यह अहसास दिलाया कि वे आज भी मुंबई के परमपिता परमेश्वर हैं। बस यही मुगालता उन्हें शाहरुख के बयान पर आपत्ति दर्ज करने का समय दे गया। वे बिफर गए। बात बिगड़ गई। तीर हाथ से छूट गया।
एक आम आदमी बनकर राहुल ने बाल ठाकरे की चुनौती का मुँहतोड़ जवाब दे दिया, अब शाहरुख की फिल्म में अपनी दिलचस्पी दिखाकर जनता ने बाल ठाकरे के मुँह पर हाऊसफुल का तमाचा मारा है। क्या इसका दर्द सह पाएँगे? अब भी समय है, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि क्षुद्र राजनीति से जनता का भला नहीं होने वाला। वे कुछ ऐसा भी करें, जिससे आम जनता को लाभ हो। अपनी सत्ता अलग बनाने के चक्कर में वे किस तरह से अपनों से ही दूर हो जाते हैं, यह उन्हें अब पता चल गया होगा। रही बात शाहरुख की, तो पूरी फिल्मी दुनिया में वे एक ऐसे ताकतवर इंसान के रूप में उभरे हैं, जो अपनी बात पर अड़ना भी जानता है। इस घटना ने शाहरुख की लोकप्रियता को और भी बढ़ाया है। इसे लोग शाहरुख का स्टंट कह सकते हैं, लेकिन ऐसे स्टंट के लिए हिम्मत चाहिए, जो उनमें है। क्या ऐसी हिम्मत मायानगरी के दूसरे कलाकारों में है? क्या हमारे देश के राजनेताओं में है? अपनी इस दृढ़ता से शाहरुख ने बता दिया कि महानायक होना बड़ी बात नहीं है, बल्कि महानायक बने रहना बड़ी बात है? माफी माँगने से कोई छोटा नहीं हो जाता है, यह सच है, लेकिन माफी उनसे माँगी जाए, जिनके दिल बड़े हों। जो माफी का अर्थ समझते हों। हर किसी से माफी मँगवाने का शौक महँगा भी साबित हो सकता है।
देश को आज शाहरुख जैसी दृढ़ता की आवश्यकता है। स्वार्थ की राजनीति से ऊपर उठकर देश की समस्याओं को देखने की आवश्यकता है। वे महानायक को अपनी तरह का बना सकते हैं, पर महानगर को अपनी तरह का नहीं बना सकते। महानायक की विवशता हो सकती है, पर महानगर कई रंगों और कई संस्कृतियों का मिला-जुला रूप होता है। इसे अपना बनाने के लिए अपनों की तरह व्यवहार करना चाहिए। बहुत सारे चापलूसों के बीच घिरे रहने वाले आज भले ही यह सोच लें कि वे एक महानगर के पोषक हैं, तो यह उनकी भूल है। इसी महानगर के लोगों ने बता दिया कि उन्हें राजनीति नहीं, बल्कि मनोरंजन चाहिए। मनोरंजन में बाधक तत्वों को एक जुनून की तरह से उखाड़ फेंका जाएगा। कुछ भी हो, पर इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि फिल्म ‘माय नेम इज खान’ के पहले हुए इस विवाद ने शाहरुख खान को एक ग्लोबल सितारा बना दिया है। महानायक भी इस सितारे के आगे बौना दिखाई देता है।
डॉ. महेश परिमल

5 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय डॉक्टर साहब…
    अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि शाहरुख खान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों को बोली के वक्त क्यों नहीं खरीदा? महानायक तो आजकल मीडिया द्वारा गढ़े जाते हैं…

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  2. sarthak lekhan.......kash aisee himmat aam aadmee dikhae.......

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  3. bhut sahi likha hai aap ne
    likht raho yuhi thank you
    mere blog http://gyansarita.blogspot.com/
    par aap ka swagat hai

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