मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

फोटोग्राफी को नया आयाम देने वाले वी के मूर्ति



दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर विशेष

भारतीय फिल्म जगत में अपनी प्रयोगधमता के लिए विख्यात दिग्गज फोटोग्राफर वी, के,मूर्ति को हाल में वर्ष 2008 के सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिएचुना गया। हालांकि यह सम्मान उन्हें वर्षों पहले मिल जाना चाहिए था लेकिन खुशी की बात है कि देर से ही सही, उन्हें इस पुरस्कार के लायक समझा गया। प्रसन्नता की बात यह भी है कि इससे पहले किसी फिल्मी छायाकार को यह पुरस्कार नहीं मिला था। इस तरह किसी फोटोग्राफर को इस पुरस्कार के लिए चुनकर एक नई शुरुआत भी हुर्ई है। 1923 को कर्नाटक के मैसूर में जन्मे 86 वर्षीय वी के मूर्ति किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पांच दशक लंबे कैरियर में उनके खाते में जाल,1952, बाज,1953, आर पार,1954, मिस्टर ऐंड मिसेज 55,1955, मिलाप,1955, सीआईडी,1956, प्यासा,1957, 12 ओ क्लाक,1958, कागज के फूल,1959,चौदहवीं का चांद,1960, साहब बीबी और गुलाम,1962, जिद्दी,1964, लव इन टोक्यो,1966, सूरज,1966, शिकार,1968, तुमसे अच्छा कौन है,1969, नया जमाना,1971, जुगनू,1973, पाकीजा, वारंट,1975, बारूद,1976, आजाद, 1978, नास्तिक,1983, रजिया सुल्तान,1983 ,जागीर,1984, कलयुग और रामायण,1987, खुलेआम,1992, और दीदार, 1992, द्रोहकाल,1994,जैसी फिल्में दर्ज हैं। इसके अलावा उन्होंने कमाल अमरोही की महल,1949, में प्रोडक्शन सेक्रेटरी और फिल्म,बाजी ,1951, में सहायक कैमरामैन के रूप में किया तथा वह टेलीविजन शृंखला,भारत एक खोज,1988, और तमस,से भी जुडे थे। उन्होंने राजेंद्र सिंह बाबू की एक बहुप्रशंसित फिल्म,हूवु हन्नु, के लिए भी फोटोग्राफी की और उसमें अभिनय भी किया। मूर्ति ने निर्माता, निर्देशक,अभिनेता गुरुदत्त के साथ सर्वाधिक फिल्मों में काम किया । इसके बाद उन्होंने निर्माता,निर्देशक कमाल अमरोही,प्रमोद चक्रवर्ती, श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की फिल्मों के लिए फोटोग्राफी की। उनका गुरुदत्त के साथ जुड़ाव मृत्युपर्यंत रहा। गुरुदत्त की टीम में उनके आने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। मूर्ति बताते हैं कि पहली बार वह उनसे नवकेतन की ,बाजी, फिल्म की शूटिंग के दौरान मिले। इस फिल्म में वह सहायक कैमरामैन के रूप में काम रहे थे। उन्होंने गुरुदत्त को मुश्किल शाट लेने का सुझाव दिया, जिस पर उन्होंने कहा कि उनका कैमरामैन यह शाट नहीं ले पाएगा तब मूर्ति ने उनसे शाट लेने की इजाजत देने को कहा । इस पर गुरुदत्त ने उन्हें दो या तीन टेक में वह शाट ,ओके, करने को कहा लेकिन उन्होंने पहले ही टेक में वह शाट ओके कर दिया। गुरुदत्त मूर्ति से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने ,पैक अप, के बाद उनसे ,बाजी, फिल्म के लिए काम करने को कहा लेकिन इसे मूर्ति की सदाशयता कहा जाएगा कि उन्होंने गुरुदत्त से कहा कि फिल्म के बीच में कैमरामैन को हटाना ठीक नहीं होगा।वह उनकी अगली फिल्म में जरूर काम करेंगे। इसके बाद तो उन्होंने गुरुदत्त की फिल्मों के जरिए फिल्मी फोटोग्राफी की एक नई इबारत लिख दी। मूर्ति की छायांकन कला की पराकाष्ठा गुरुदत्त की फिल्म,कागज के फूल, में देखने को मिलती है। यह भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म थी। गुरुदत्त और मूर्ति को विदेशी फिल्में देखकर सिनेमास्कोप रूप में यह फिल्म बनाने का विचार आया था। मूर्ति बताते हैं कि टवेन्टियथ सेंचुरी फाक्स के मैनेजर प्रभु अपनी एक फिल्म को सिनेमास्कोप शूट करने के लिए भारत आए तो वह वापस जाते समय लेंस यहां अपने कार्यालय में छोड़ गए । उन्होंने गुरुदत्त से कहा कि क्या वह उनके उपकरणों का इस्तेमाल करना चाहेंगे। मूर्ति ने कुछ शाट लिए और रशेज देखने के बाद गुरुदत्त ने कागज के फूल को सिनेमास्कोप रूप में बनाने का फैसला किया।
इसी फिल्म के एक गीत,वक्त ने किया क्या हसीं सितम, में मूत ने रोशनदान से लकीर में रूप में कमरे के भीतर आ रहे प्रकाश को दिखाया था, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मिसाल बन चुका है। मूत बताते हैं कि उन्होंने इस मुश्किल द्यश्य को किस तरह शूट किया था। उन्हें यह आइडिया एक लाइट ब्वाय को शीशे से प्रकाश को परावतत करते देखकर आया था। वह बताते हैं, हमने दो बडे शीशे मंगाये और एक को नटराज स्टूडियो के बाहर और दूसरे को सूरज की रोशनी में रख दिया। इससे प्रकाश परावतत होकर दूसरे शीशे पर पड़ने लगा। इसके बाद स्टूडियो की बालकनी का दरवाजा खोल दिया गया,जिससे ह्नरकाश रोशनदान से लकीर के रूप में भीतर आने लगा और कुछ धुआं छोड़ दिया गया।गुरुदत्त अपनी फिल्मों में चेहरे की सूक्ष्म भावों को कैद करने के लिए क्लोज अप शाट लेने के वास्ते 75 एम एम के लेंस का इस्तेमाल करते थे। मूत ने अपने कैमरे से इनका कुशल इस्तेमाल किया। मूत अपने कैमरे के कमाल से गुरुदत्त की नायिकाओं को खूबसूरत दिखाने में कोर्ई कसर नहीं छोड़ते थे, इसलिए वह उनके बीच काफी लोकप्रिय थे। गुरुदत्त कभी, कभी उनसे मजाक में कहा करते थे, मैं डायरेक्टर हूं, लेकिन अभिनेतियां मुझसे बात नहीं करतीं। गुरुदत्त से अभिनय कराने में भी मूत की महत्वपूर्ण भूमिका रही। गुरुदत्त अभिनेता के रूप में कैमरे के सामने आने में हिचकते थे लेकिन मूत के आग्रह पर वह अभिनय करने लगे। वह बताते हैं कि उनके और गुरुदत्त के बीच एकाध मौको को छोड़कर व्यावसायिक रिश्ते काफी मधुर थे। मूत फिल्म के द्यश्यों को लेकर कभी हस्तक्षेप नहीं करते थे और गुरुदत्त उनके काम में कभी दखलंदाजी नहीं करते थे लेकिन यदि वह कोर्ई सुझाव देते थे तो मूत उसे स्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। वह बताते हैं कि एक बार गुरुदत्त उनसे नाराज हो गए थे क्योंकि वह शाट के लिए काफी समय ले रहे थे। इस पर उन्होंने कहा कि जब वह खर्च उठाने लायक हो जाएंगे तो उनके लिए एक फिल्म बनाएंगे, जिसमें वह अपने शाट की तैयारी के लिए उन्हें पूरा समय देंगे। गुरुदत्त ने अपने वादे को कागज के फूल के जरिए
पूरा किया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मूत फिल्मों में काम करने से पहले वायलिन वादक थे और उन्होंने आजादी के आंदोलन में भाग लिया था। इस दौरान वह कुछ दिन जेल में भी रहे थे। मूत ने ज्यादातर श्वेत,श्याम फिल्मों में अपनी फोटोग्राफी का जादू दिखाया लेकिन यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने रंगीन फिल्मों में काम करने के लिए लंदन में प्रशिक्षण हासिल करने के दौरान द गन्स आफ नवारोन के दल के साथ भी काम किया। कन्नड़ भाषा में उनके जीवन पर लेखिका उमा राव ने पुस्तक लिखी है,जिसका जनवरी,2006 में बेंगलूर में विमोचन किया गया। मूत को सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 2005 में आइफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा कागज के फूल और साहब बीबी और गुलाम के लिए फिल्मफेयर तथा कन्नड़ फिल्म हूवु हन्नु के लिए कर्नाटक सरकार का सर्वश्रोष्ठ सिनेमैटोग्राफी पुरस्कार मिल चुका है। मूत 2001 में अस्सी वर्ष की उम्र में मुम्बई से वापस बेंगलूर चले गए, जहां वह फिल्मों की चमकती,दमकती दुनिया से दूर शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
अजय कुमार विश्वकर्मा

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