
हिन्दी सिनेमा जगत में फिल्मों को हिट कराने में नायकों की जोडियां बनाने का फार्मूला बेहद कामयाब रहा है लेकिन कई बार कलाकारों के बीच अहम के टकराव और अन्य कारणों से उनकी जोडियां बन नहीं पाती और दर्शक अपनी मनपसंद जोडियों को फिल्म में देखने से वंचित रह जाते हैं। बालीवुड का इतिहास देखे तो नायकों की जोडियों को परदे पर उतारने की शुरआत पचास के दशक में हुई, जब निर्माता निर्देशक महबूब खान ने अपनी फिल्म अंदाज दिलीप कुमार और राजकपूर को पहली बार एक साथ पेश किया था। प्रेम त्रिकोण पर आधारित इस फिल्म में नरगिस ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। बेहतरीन गीत,संगीत से सजी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। बाद में कई फिल्म निर्माताओं ने दिलीप कुमार और राजकपूर को अपनी फिल्म के जरिए पेश करना चाहा लेकिन उनका यह प्रयास असफल रहा। इसी तरह पचास के दशक में दिलीप कुमार और देवानंद को निर्माता, निर्देशकों ने अपनी फिल्मों में जोड़ी बनाकर पेश करना चाहा लेकिन यहां भी उन्हें कुछ खास सफलता हासिल नहीं हुई। हांलाकि ये दोनों कलाकार निर्माता निर्देशक एस,एस,वासन की 1955 में प्रदशत फिल्म इंसानियत में नजर आए थे लेकिन इसके बाद उन्होंने कभी एक साथ काम नही किया। इसी तरह राजकपूर और देवानंद को एक साथ रूपहले पर्दे पर लाने का प्रयास कई फिल्म निर्माताओ ने किया लेकिन उन्हें सफलता नही मिली। लोकप्रियता के लिहाज से लगभग बराबरी पर रहने वाले इन कलाकारों के बीच अहम का टकराव उन्हें परदे पर एक साथ लाने में बाधक बना रहा। फिल्म निर्माताओं ने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार और संवाद अदायगी के बेताज बादशाह राजकुमार की जोड़ी बनाने का भी प्रयास किया। आरंभिक दौर में फिल्म पैगाम के जरिए दोनों कलाकार एक साथ नजर आए लेकिन बाद में उनके बीच कुछ मनमुटाव हो गया। बाद में नब्बे के दशक में निर्माता निर्देशक सुभाष घई के बहुत जोर देने पर दिलीप कुमार और राजकुमार एक साथ काम करने के लिए राजी हुए। नतीजा यह हुआ कि दोनों की जोड़ी वाली फिल्म सौदागर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। पचास के दशक में ही राजकपूर, राज कुमार, देवानंद, राजकुमार राजेन्द्र कुमार राजकुमार राजेन्द्र कुमार देवानंद की जोड़ी बनाने के लिए प्रयास किए गए लेकिन अधिकतर मौके पर निर्माता-निर्देशकों को नाकामी ही हासिल हुई। देवानंद और राजकुमार और राजकपूर राजकुमार ने कभी एक साथ काम नहीं किया। साठ के दशक में फिल्म दिलीप कुमार और संजीव कुमार 1968 में प्रदशत फिल्म संघर्ष में एक साथ दिखाई दिए। हालांकि पूरी फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार छाए हुए थे लेकिन संजीव कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे । फिल्म में एक दो मौके पर तो संजीव कुमार अपने अभिनय से दिलीप कुमार पर हावी नजर आते हैं। सत्तर के दशक में भी दिलीप कुमार और संजीव कुमार की जोड़ी को रूपहले पर्दे पर एक साथ उतारने का प्रयास किया गया लेकिन यह प्रयास नाकाम रहा । बाद में सुभाष घई ने अपनी फिल्म विधाता के जरिए दोनों को एक साथ पेश किया। इस फिल्म में उनका टकराव देखने लायक था। जाहिर है कि फिल्म ने सफलता के नए कीतमान स्थापित किए । इसके बाद दिलीप कुमार और संजीव कुमार की जोड़ी फिल्मी पर्दे पर नहीं दिखाई दी। दिलीप कुमार और राजेन्द्र कुमार ने केवल एक फिल्म जोगन में एक साथ काम किया था। साठ के दशक में राजकपूर और जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार को भी रूपहले पर्दे पर पेश करने का प्रयास किया गया लेकिन यह प्रयास भी नाकाम रहा। बाद में राजकपूर ने अपनी ही निमत फिल्म संगम के जरिए राजेन्द्र कुमार के साथ जोड़ी बनाकर दर्शकों का मनोरंजन किया। इसके बाद राज कपूर और राजेन्द्र कुमार राज कपूर निमत फिल्म, मेरा नाम जोकर, में एक साथ नजर आए लेकिन वास्तविक तौर पर यह राज कपूर की केन्द्रीय भूमिका वाली फिल्म थी न कि उनकी जोड़ी वाली फिल्म।


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