शनिवार, 3 जुलाई 2010

जुलाई, पढ़ाई, महँगाई और रुलाई

<strong>विनोदशंकर शुक्ल
इस समय तो मुझे पढ़ाई की महँगाई पर रुलाई आ रही है। एडमिशन, डोनेशन,यूनीफार्म, बेल्ट, टाई,बिल्ला, कापी, किताब, वाहन वगैरह की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि सुनकर चक्कर आ रहा है। अब यह सोचकर सिर पीट रहा हूँ कि मैंने औलाद पैदा करने की नादानी क्यों की?
कल एक मित्र मिल गए। इतनी जल्दी में थे, जैसे पाँच बजते ही देश का बाबूवर्ग दफ्तर छोड़ने की जल्दी में होता है। मैंने पूछा-क्या बात है धीरज भाई, बीस साल में पहली बार तुम्हें अधीर देख रहा हूँ? तुम तो ऐसे भागे जा रहे हो, जैसे बच्चे कटी पतंग के पीछे भागते हैं। धीरज भाई ने स्कूटर बंद नहीं किया, बोले-अब अपनी फजीहत कैसे बताऊँ, यार। इस समय मेरी हालत उस अंडे जैसी है, जिसे गर्म तवे पर चढ़ाकर आमलेट की शक्ल दी जा रही है। मैंने चाबी निकालकर स्कूटर बंद किया और कहा-प्यारे भाई, पेट्रोल को तो फिजूल मत जलाओ।

जानते नहीं, इसके दाम ने इस बार कितनी ऊँची छलाँग लगाई है। धीरज भाई स्कूटर से उतरते हुए बोले-जानता हूँ, भाया। मुसीबतें एक के बाद एक मुझ पर ऐसी मेहरबान हो रही हैं, जैसे आजकल किसानों पर पहले कर्ज की मजबूरी मेहरबान होती है। फिर चुका न पाने पर आत्महत्या की मजबूरी मेहरबान हो जाती है। मैंने खीजकर कहा-यार, अब मुसीबतों का खुलासा भी करोगे या उनके छाती ठोकते रहोगे? धीरज भाई बोले-जून-जुलाई का महीना बहुत भारी पड़ रहा है, दोस्त । स्कूलों का नया सेशन क्या शुरू हुआ है, अपन-जैसे मध्यवर्गीयों की जीते जी अर्थी निकल रही है। दस दिन से पब्लिक स्कूलों की खाक छान रहा हूँ। हर जगह भारी फीस और हाहाकारी डोनेशन का सामना करना पड़ रहा है। पेट्रोल के दाम बढ़ने से तो दिमाग के सारे पुर्जे ही हिल गए हैं। मैंने कहा-तुम्हारे पुर्जे ही हिले हैं, मेरे तो दिल का सारा खून सूख गया है। पेट्रोल- डीजल के भाव बढ़ने से महँगाई और बेतहाशा बढ़ेगी। आम आदमी के बजट पर तो सरकार ने जैसे एटम बम ही गिरा दिया है। धीरज भाई बोले- इस समय तो मुझे पढ़ाई की महँगाई पर रुलाई आ रही है। एडमिशन, डोनेशन,यूनीफार्म, बेल्ट, टाई,बिल्ला, कापी, किताब, वाहन वगैरह की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि सुनकर चक्कर आ रहा है। अब यह सोचकर सिर पीट रहा हूँ कि मैंने औलाद पैदा करने की नादानी क्यों की?

मुझे धीरज भाई से सहानुभूति हुई। मैंने कहा-भइए, पब्लिक स्कूल तो इस समय मुनाफे के भारी उद्योग हैं। उनमें और पेप्सी-कोला उद्योग में कोई फर्क नहीं है। ऊपरी चमक-दमक ज्यादा है और पढ़ाई-लिखाई माशाअल्लाह। बड़ों घरों के बिगड़े लड़कों के क्रीड़ा-स्थल हैं वे। फर्राटे से स्कूटर दौड़ाना, महँगे मोबाइल से चटर-पटर करना उनके खास शौक हैं। स्कूल के अलावा अलग से ट्यूशन के भी वे रोगी होते हैं। अपने जैसे मध्यवर्गीय के सारी कमाई तो इन पब्लिक स्कूलों के पेट में ही समा जाएगी। फिर अपना खाएँगे और पहनेंगे क्या? धीरज भाई ने सहमति में सिर हिलाए और बोले- बात तो बिलकुल सच है, पर मजबूरी है। बेटे के भविष्य का सवाल है। कर्ज लेना पड़े, पेट काटना पड़े, पर पढ़ाना तो पब्लिक स्कूल में ही पड़ेगा। वह भी अंग्रेजी माध्यम के । मेरे पड़ोसी की तनख्वाह मुझसे भी कम है पर वे बच्चे को एक बड़े कान्वेंट में पढ़ा रहे हैं। मोहल्ले में नाक का भी तो सवाल है। मैंने कहा-बिरादर, पब्लिक स्कूल क्या अनारकली हैं, जो तुम सलीम की तरह इतनी दीवानगी दिखा रहे हो? खोजने पर दो-चार अच्छे और सस्ते सरकारी स्कूल भी मिल सकते हैं।

सरकारी स्कूल का नाम सुनते ही धीरज जी ऐसे फट पड़े, जैसे रिश्वत का हिस्सा न मिलने पर थानेदार, हवलदार पर फट पड़ता है। बौखलाकर बोले-सरकारी स्कूल का तो तुम नाम ही मत लो। सरकारी और निगम के स्कूलों की शक्ल भी देखी है कुछ तुमने? उनकी पुरानी और वयोवृद्घ इमारतों की बात तो छोड़ो, नए भवनों की नींव भी इतनी कच्ची होती है कि हल्की सी आँधी से मुँह के बल गिर पड़े।

लैब ऐसे मुफलिस की खाली जेब, लायब्रेरी इतनी निकृष्ट, जैसे पी के फेंकी गई सिगरेट, मतगणना, पशुगणना, चुनाव, पोलियो जैसे गैर शिक्षकीय कामों में जुते हुए, शाम को स्कूल मवेशियों के पनाहगाह, रात शराबियों के ऐशगाह, बंधु, तुम्हें ऐसे सरकारी स्कूल भी मिल जाएँगे, जहाँ चपरासी ही शिक्षक भी है, बाबू भी और हेडमास्टर भी और सरकारी शालाओं का दोपहर का भोजन? भगवान उससे चौपायों को भी बचाए! उसमें मरे हुए मेंढक, साँप, छिपकली, चूहे ऐसे परोसे जाते हैं, जैसे भोजन के साथ चटनी, अचार, दही, पापड़ वगैरह! सरकारी स्कूल में पढ़ाने से तो अच्छा है, बच्चे को अनपढ़ ही रखकर देश सेवा यानी नेतागिरी के धंधे में डाल दिया जाए।

धीरज भाई एक साँस में इतना सब कह गए। उनके मुँह से सरकारी स्कूलों का इतना भयानक चरित्र-चित्रण सुनकर मुझसे कुछ कहते नहीं बना। उन्होंने स्कूटर स्टार्ट की और बोले-आज ठानकर निकला हूँ कि किसी न किसी पब्लिक स्कूल में बच्चे को दाखिल करा कर ही घर लाटूँगा। भले ही मकान बनाने के लिए निकाले गए प्रॉविडेंट फण्ड की आहुति चढ़ानी पड़े।

विनोदशंकर शुक्ल(लेखक व्यंग्यकार हैं।)

3 टिप्‍पणियां:

  1. इस क्षेत्र में इतनी लूट मची है कि लगता ही नहीं विद्या का आलय है ।

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  2. इस क्षेत्र में इतनी लूट मची है कि लगता ही नहीं विद्या का आलय है ।

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