मंगलवार, 2 अगस्त 2011

क्या मीडिया ने कभी कोई खूबसूरत महिला नहीं देखी



डॉ. महेश परिमल
पाकिस्तान से आई हिना रब्बानी स्वदेश लौटकर भारतीय मीडिया से खफा है। भारतीय मीडिया ने उसे एक खूबसूरत आइटम की तरह पेश किया। जिसके तमाम लटके-झटके सुर्खियाँ बन गए। सचमुच भारतीय मीडिया तो उस पर इस कदर फिदा था मानो उसने कभी कोई खूबसूरत महिला ही नहीं देखी। विशेषकर उन चैनलों पर तो कटाक्ष किया ही जा सकता है, जिससे गंभीर खबरों की उम्मीद की जाती है। हिना आई और गई, भारत में उसकी खूबसूरती की चर्चा है। लेकिन वे किसलिए यहाँ आईं थीं, भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से क्या बातचीत हुई? हुर्रियत के नजरबंद नेता सैयद अली शाह गिलानी दिल्ली आकर हिना से किस आधार पर मिले? इस मीटिंग की व्यवस्था भारतीय अधिकारियों ने क्यों की? इसके बाद पाकिस्तान की विदेश नीतियों पर क्या बदलाव आएगा? इस तरह के सभी प्रश्न आज हवा हो गए। मीडिया रब्बानी की खूबसूरती ही नहीं, उसके पर्स, अँगूठी, कपड़े और लटके-झटके आदि में ही उलझ गया। पूरा मीडिया ही मूल मुद्दे से भटक गया। इस पर मीडिया की एक ही दलील हो सकती है कि जो दिखता है वही बिकता है। लोग तो बहुत कुछ देखना चाहते हैं, पर क्या मीडिया उसे खुले आम उसी तरह से दिखाएगा भला? वास्तव में आज मीडिया जो कुछ दिखा रहा है, तो वह दर्शकों की नहीं, बल्कि अपनी ही भूख को दर्शा रहा है।
मीडिया के साथ-साथ भारत सरकार यह भूल गई कि हिना रब्बानी खार पाकिस्तान सरकार की पसंदगी नहीं है। वह तो पाकिस्तान आर्मी द्वारा दिए गए एजेंडे को लेकर यहाँ आई थीं। अपने रूप और सौंदर्य के बल पर उसने वही किया, जो विश्वामित्र के लिए मेनका ने किया था। हमारे विदेश मंत्री भी उसके सामने घिघियाते हुए नजर आए, मानो वह हमारे बलवान मित्र राष्ट्र की प्रतिनिधि हो। उन्होंने जिस तरह से उनसे हाथ मिलाया, इसे जिस तरह से मीडिया ने दिखाया, उससे तो ऐसा लग रहा था, मानों वे उनका हाथ छोड़ना ही नहीं चाहते। हाथ मिलाने का फुटेज को ऐसे दिखाया गया, जैसे वह एक उत्सव हो। ऐसे दृश्यों को मीडिया दिन-भर में दसियों बार दिखाता है, जिससे देखकर घृणा होने लगती है। दूसरी ओर एक विदेश मंत्री में जो सख्ती और दृढ़ता होनी चहिए, वह हमारे विदेश मंत्री में कहीं भी दिखाई नहीं देती। वे भी यह भूल गए कि सामने जो खूबसूरत बला है, वह हमारे दुश्मन नंबर एक की प्रतिनिधि के रूप में है। जो पिछले 63 साल से हमें परेशान कर रहा है। कश्मीर उसका स्थायी राग है, जिसे वह समय-समय पर बजाता रहता है। दूसरी ओर, कश्मीर को भारत से अलग करने की माँग करने वाले अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मुलाकात में हमारा देश ही सहयोगी बन रहा है। हमारे देश के उम्रदराज नेताओं के आगे एक 34 वर्षीय पाकिस्तानी विदेश मंत्री को सामने पाना मानो एक अनोखी घटना हो गई। अब यह किस-किस को समझाएँ कि हिना की छोटी उम्र को उसकी कमजोरी न माना जाए, उससे प्रभावित होना जानलेवा हो सकता है।
हिना रब्बानी खार के सौंदर्य को अलग रखकर यह सोचा जाए कि क्या उसने पूर्व के विदेश मंत्रियों की तरह प्रभाव छोड़ा? हुर्रियत नेता से मिलने पर भाजपा ने काफी विरोध किया, पर यह विरोध केवल विरोध तक ही सीमित रहा। भारतीय मीडिया ने बहुत कुछ दिखाया। देखने वालों ने यहाँ तक देखा कि पत्रकार वार्ता में हिना पूरे आत्मविश्वास के साथ बिना लाग-लपेट के अपनी बात कहती दिखाई दी। जबकि हमारे विदेश मंत्री के हाथ में एक पर्ची थी। इसका आशय यह निकल सकता है कि हिना को जो कुछ कहना था, वह पूरे आत्मविश्वास के साथ बोल गई, पर हमारे विदेश मंत्री को क्या कहना है, इसे किसी और ने तय किया था। जिसके लिए उन्हें पर्ची देखनी पड़ती थी। इसे क्या कहा जाए? हिना को देखकर लगा ही नहीं कि वह एक कर्ज से लदे गरीब देश का प्रतिनिधित्व कर रही है। ऐसा गरीब देश जो एक तरह से अमेरिका के हाथों गिरवी है। उस देश की प्रतिनिधि को हमारा मीडिया एक फैशनेबल महिला के रूप में पेश कर फैशन परेड आयोजित कर रहा है। क्या अब भारत का कोई प्रतिनिधि पाकिस्तान जाए, वहाँ जाकर वह यह माँग करे कि उसकी मुलाकात दाऊद इब्राहीम से कराओ, तो क्या पाकिस्तान सरकार इसका इंतजाम करेगी?
तीन दिन केवल तीन दिन भारत में रही, पर हम उससे यह नहीं समझ पाए कि पाकिस्तान की कूटनीति क्या है? लोगों ने यहाँ तक कटाक्ष किया है कि जब इतनी सुंदर महिला राजनीति में हो, तो फिर हमें फिल्मी अभिनेत्रियों की आवश्यकता ही नहीं है। केवल कसाब ही नहीं, दाऊद इब्राहिम, होटल ताज पर हमला, मुम्बई बम कांड, गुजरात में सिलसिलेवार बम घमाके, कश्मीर आदि अनेक मुद्दे हैं, जो पाकिस्तान के साथ अभी भी अनसुलझे हैं, इन मामलों पर कोई बात हुई हो, ऐसा लगता नहीं। अब वे स्वदेश लौट चुकी हैं, पर मीडिया के लिए अखलाक सागरी की पंक्तियाँ छोड़ गई हैं:-
एक मुद्दत हुई जब यहाँ से, कोई गुजरा था जुल्फें उड़ाए
हम आज तक उन्हीं खुशबुओं से नहाए हुए हैं..

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सार्थक आलेख...मीडिया की ऐसी हरकतों की जितनी भर्त्सना की जाए कम है...ये राग भी बहुत पुराना हुआ कि पब्लिक यही देखना चाहती है...पब्लिक बोर हो चुकी है यह सब देख-देख कर.

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  2. true - and thank god someone else wrote this -
    sir
    i wrote a post on the same topic yesterday - and my friend rashmi ravija gave me this link |

    please see my post - and comments too - http://ret-ke-mahal-hindi.blogspot.com/2011/08/blog-post_8442.html?showComment=1312378492738#c7486753393365075140

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  3. सच में बहुत विचारणीय और अफसोसजनक है मीडिया ऐसी हरकतें......

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