शनिवार, 13 नवंबर 2010

मोहल्ला टाइप का एक मोहल्ला



अनुज खरे

हमारे एक रूटीन किस्म के पिताजी हैं। एक परंपरागत किस्म की माताजी हैं। एक भाईनुमा भाई है। एक बहन प्रवृति की बहन भी हैं। कुछ सामान है, यानी पूरा घर, घर किस्म का है। हमारा घर एक मोहल्लेटाइप के मोहल्ले में रहता है। मोहल्ले में भाईचारा किस्म की पुरातन व्यवस्थाओं का अस्तित्व भी पाया जाता है। मोहल्ले में कुछ ढोर भी हैं, जिनकी प्रवृति जानवरोंे के समान है। एक घूरा है जिसके दिन नहीं फिरे हैं। एक चक्की है जहां आटा पीसा जाता है। चक्की चलाने वाले एक भाई साब हैं जो आटा पीसने से बचे समय का सद्प्रयोग लव लेटर लिखने में करते हैं। कई बार तौलने वाले कांटे पर एक तरह आटे का कनस्तर दूसरी तरफ लव लेटर रखकर शब्दों के वजन तौलते हैं। हर बार पीपा ही वजनी निकलता है। अपने शब्दों में कम वजन और महंगा गेहूं देखकर वे लव मैरिज करने का साहस लंबे समय से नहीं जुटा पा रहे हैं। चक्की चलाते समय उनमें इतनी बुनियादी समझ तो आ ही गई है कि कच्ची उमर के प्यार की निरंतरता भविष्य में आटे की आबाध आपूर्ति क्षमता पर निर्भर है। इसके अलावा मोहल्ले में एक किराने की दुकान है जहां मिलावट भी होती है। डंडी भी मारी जाती है। बेइज्जती भी होती है। कई मजदूरों के घरों में शाम का खाना इसी दुकान के बलबूते बनता है। लोग मानते हैं कि बनिया कमीना है लेकिन ससुरा उधार तो देता है इसलिए आदर के काबिल तो है। तो इसलिए लोग आदर देते हैं वो उधार देता है बरसों से लेन-देन का ये संबंध इसी तरह चला आ रहा है।
हमारे मोहल्ले में एक फिक्स चबूतरा है जहां मोहल्ले के आवारा बुजुर्ग बैठते हैं। महिलाओं को घूरते हैं। बहुओं की बुराइयां करते हैं। उनके पिछलग्गू बनने पर अपने-अपने लड़कों को गालियां देते हैं। लगातार अपान वायु का विसर्जन करते हैं और फिर एक-दूसरे की तरफ शक की निगाहों से देखते हैं। लेकिन बैठते रोज हैं, जीवन की संध्या में एक-दूसरे के भरोसे यूं ही उनका जीवन चल रहा है। मोहल्ले में ही परंपरागत रूप से एक हैंडपंप है जहां पुश्तैनी आधार पर पानी भरने को लेकर झगड़ा चलता रहता है। हैंडपंप के पास बहुत सारे ईंट के टुकड़े पड़े हैं। जो पुरानी लड़ाइयों के काम आ चुके हैं। बर्तन मांजने और नई लड़ाइयों के काम आते हैं। मोहल्ले में एक हैयर कटिंग की एक दुकान है। जहां मालिश करने, चुगलखोरी करने के अलावा बीच-बीच में बाल भी काटे जाते हैं। दाढ़ी भी बनाई जाती है। मोहल्ले की कई लड़इयों में बुनियादी तौर पर योगदान दे चुकने के बाद भी रामभरोसे नऊआ का हर घर में आदर है। घर-घर बुलउआ देने का काम उसी के हवाले है। हमारे इस मोहल्ले में एक कुत्ता भी रहता है, जिसका एकमात्र उपयोग परंपरागत आधार पर मोहल्ले के बूढ़े अपने वर्तमान लड़के और उसके बीच, उसे ज्यादा वफादार बताने में करते हैं।
प्राचीनकालीन रुमानी कथाओं की तरह मोहल्ले में एक जवान मास्टरनी भी रहती हैं। जिन पर सबकी नजर है। मोहल्ले के लड़कों को अधिकांश समय उन्हें लाइन मारने में कटता है। रिटायर्ड लोगों का अधिकांश समय उनकी बदचलनी के किस्से सुना-सुना कर पास होता है। कुछ संजीदा किस्म के लोग मास्टरनी को इन सारी बातों की जानकारी देकर किसी जरूरत के समय अपने होने के बारे में सूचित करते हैं। अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में अपनी छोटी बहन जैसा मानने का इरादा भी लगातार दोहराते हैं। हालांकि मास्टरनी को किसी की जरूरत पड़ती नहीं। कालांतर में संजीदा किस्म के लोग भी मायूस होकर रिटायर्ड किस्म वाली गतिविधियों में उतर आते हैं।
यूं तो मोहल्ले में फूट भी है, लेकिन जब कभी बाहर के मोहल्ले से आकर कोई लड़का किसी लड़की को लाइन मारता है तो सब एकजुट हो जाते हैं। बुजुर्ग उसके पिता को समझाने में निकल लेते हैं। लड़के उस बाहरी आक्रांता लड़के को पीटने की प्लानिंग बनाने में जुट जाते हैं। उस दौरान सबका भाईचारा और सह्दयता देखते ही बनती है। चाय या समोसे के पैसे के लिए कहना नहीं पड़ता कोई भी चुका देता है। मोहल्ले की लड़की है, गंभीर विमर्श चल रहा है, पैसे की क्या बात। इसी मामले में मोहल्ले की महिलाएं उसके छिप-छिपकर मिलने के किस्सों पर विचार गोष्ठि आयोजित कर लेती हैं। सबसे बड़ा बज्रपात तो मोहल्ले के उन लड़कों पर होता है जिनका अपनी तरफ से पचास परसेंट प्यार लड़की से चल रहा होता है वे बेचारे बैठे-बिठाए एकतरफा देवदास हो जाते हैं। शेविंग करवाना बंद कर देते हैं। रामभरोसे नऊवा की ऐसी ही नियमित ग्राहकी कम होती है, तो उसके संबंध में उनकी दुकान पर इतनी गहनता से विमर्श चलता है कि कुछ ही दिनों में पूरा मोहल्ला जान लेता है कि लड़की तो एक नंबर की आवार है। इसका तो कइयों से चक्कर था। इतने गंभीर आयोजन का नतीजा कुछ यूं निकलता है कि भले ही लड़की लाख मना करे कि वो किसी लड़के को नहीं जानती लेकिन घरवालों उसकी पहरेदारी और आवन-जावन के लिए इंतजाम किए बिना नहीं मानते। हालांकि उनका बस नहीं चलता अन्यथा तो लड़की की माताजी क्लास में भी उसके साथ बैठना शुरू कर दें। लड़की को तो पता तक नहीं चलता कि सारा मोहल्ला उसे बदचलन मानने लगा है। ऐसी बातें सुनकर लड़की से ज्यादा सदमे में तो उनका कथित प्रेमी आ जाता है। खुद को भाग्यशाली भी मानता है कि मैं कहां फंसने वाला था। तो हमारा इतना प्यारा मोहल्ला है कि बिना कुछ किए ही हर किस्म की हरकत को करता है।
इसी मोहल्ले में कई घरों में ताजे पति रहते हैं। शर्माने-लजाने में अपनी पत्नियों से बढ़कर हैं। अड़ोस-पड़ोस को लोगों के आने पर वे इतना शर्माते हैं जैसे वे नवब्याहता हों। इनके विपरीत इलाके में छुट्टा सांड़ किस्म के कुछ पुराने पति भी रहते हैं। जो पत्नियां को घर की मुर्गियां मानते हैं। लेकिन दूसरे की पत्नियों के प्रति उनका आदर गजब का है। अपनी निजी पत्नी को छोड़कर दूसरी सभी पत्नियों को पतिव्रता मानते हैं। उनके सतित्व की दुहाई उनके पति से ज्यादा विश्वास के साथ दे सकते हैं। किसी से कुछ नहीं सीखते लेकिन अपनी पत्नी को नई दिखने वाली हर महिला से आदर्श सीखने के बारे में निरंतर सूचित करते रहते हैं। मोहल्ले में आस-पड़ोस के घरों में लड़ाई और भाईचारे की परंपरागत किस्में भी पाई जाती हैं। परंपरागत यूं कि झगड़े के कारण शाश्वत हैं। घर का कूड़ा दूसरे के घर के आगे डाला तो लड़ाई, अपने बच्चे को बाजू वाले ने मारा तो मार-कुटाई, उनकी लड़की का किसी लड़के से नैन मटक्का चला तो ताने, हमारे लड़के से चला तो अपनी लड़की को संभालो, हमारे लड़के को बिगाड़ रही है किस्म के फिकरे। बाउंड्रीवॉल बनाने को लेकर रार, ऊपर बताए मामलों में से किसी एक आधार पर ठन चुकी पुश्तैनी दुश्मनी निभाने की परंपरा। भाईचारे की परंपरागत किस्मों के अंतर्गत मोहल्ले के दूसरे घरों की बुराई करने का स्नेहिल आयोजन, मेहमानों के आने पर छोटी बहन जैसी है कहकर मिलाने का फैशन, नमक से लेकर शक्कर तक हक से उधार मांगने की आदतें, बिटिया की शादी में पूरे मोहल्ले के लग जाने की फुरसतिया प्रवृतियां। मेहमानों के आने पर दूसरे घरों से खाने के बर्तनों के सैट मांगने जैसा भरपूर भव्य प्रयास। यानी परंपरा को खुद में समेटे एक मोहल्ले जैसा प्रवृति रखने वाला मोहल्ला हमारे यहां अभी भी सांस ले रहा है। फड़फड़ा रहा है। डूब रहा है। उतरा रहा है, लेकिन अपनी हरकतें छोड़ने से बाज नहीं आ रहा है।
हमारे मोहल्ले में त्योहार भी मनाए जाते हैं। इन त्योहारों को सब मिलजुलकर मनाते हैं। कमेटी बनाते हैं। चंदा भी एकट्ठा करते हैं। कमेटी में हर कोई इस बात पर एकमत है कि जो कमेटी में नहीं है उसके घर से सबसे ज्यादा चंदा लिया जाना चाहिए। हर घर से कोई ना कोई कमेटी में होता ही है। चंदा जोरदार होता है। त्योहार जमकर मनाया जाता है। बाद में अगले त्योहार तक कमेटी चंदा खाने को लेकर आपस में लड़ती है। अगले त्योहार पर फिर कमेटी बनती है। चंदा होता है। हर घर से कोई न कोई कमेटी में आता है। झगड़ा भी होता है पर मजाल है कि आपस में जरा सा भी मनमुटाव हो। चंदा करके त्योहार मनाने के बारे में सब एकमत हैं। इस तरह हमने प्राचीन संस्कृति को जिंदा कर रखा है। चंदा संस्कृतियों को जिंदा रखने में बेहद उपयोगी है। शहरों में लोग आपसी ठसक के कारण चंदा मांगते नहीं हैं इस कारण वहां से संस्कृति का लोप हो रहा है। लोग राजनैतिक पार्टियों तक से नहीं सीखते कि वे कैसे चंदे के बल पर अपनी समस्त प्रकार की अंदरूनी संस्कृति को जीवित रखे हैं। जागो मोहल्लो, ग्राम, कस्बों संस्कृति की खातिर जागो। चंदा करो। संस्कृति की रक्षा करो। अन्यथा हमारे जैसे कुछ मोहल्ले अपने एकल प्रयासों से क्या खाकर पूरे देश की संस्कृति को बचा पाएंगे। खैर, बात चल रही कि हमारा मोहल्ला बिलकुल ही अलग किसम की मोहल्ले जैसी चीज है। हर राष्ट्रीय समस्या पर पर्याप्त रूप से स्थानीय तौर पर चिंतित है।
हमारे मोहल्ले में यूं तो एक पार्क भी है। जो मुख्यत: दिन में आवारा लोगों के सोने, रात में जुआ खेलने के काम आता है। बीच-बीच में जब कभी वहां फूल-पत्तियां उग आती हैं तो ढोर भी मुंह मार देते हैं। कभी यहां झूले और फिसलपट्टियां भी लगाई गई होंगी जो अब कभी हम बुलंद इमारत थे-जीवन फानी है, संसार नश्वर है, जो आएगा सो जाएगा, खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे,माया जोड़ने से लाभ नहीं, टाइप की दार्शनिक बातों का इश्तेहार भर बन के रह गई हैं। पार्क का गेट बंधनमुक्त हो चुका है। यानी हर आदमी या जानवर चाहे जब घुस सकता है। पार्क में सही में एक फूल दो माली हैं। दूसरा माली चौकीदार भी है। फूल एक ही है वो भी बेशरम का है। मूलत: उगा तो पार्क के बाहर है लेकिन डाल अंदर को झुकी हुई है। सो पार्क की प्रॉपर्टी होने का भ्रम देती है। दो मालियों में से दिन की पाली वाला माली पार्क के नल से जरूरतमंदों और टैंकरवालों को पानी बेचता है। रातवाली पाली का चौकीदार, चौकीदारी के अलावा चिलम पीता है। चिलम और गांजे की महफिल सजाकर पूरे पार्क के मच्छरों को मोहल्ले के घरों की तरफ ढकेल देता है। पेशे के प्रति इतना ईमानदार है कि कभी रात को सोता नहीं है। पूरी रात सुट्टे लगाता रहता है। सुबह पांच बजे चिमनी बंद करता है तो फिर आठ बजे तक खांसता है। कई घरों में लोग धुआं देखकर मॉनिर्ंग वॉक और खांसना सुनकर ऑफिस के लिए तैयार होना शुरू कर देते हैं। पार्क का अस्तित्व इसलिए है कि मोहल्ला है। मोहल्ला पार्क का उपयोग पता बताने के लिए करता है। भले ही उजाड़ हो लेकिन पार्क मुस्तैदी से पता बताने में अपना अविस्मरणीय योगदान दे रहा है। पार्क और मोहल्ले में युग-युगांतर का संबंध है। जब तक मोहल्ला है, पार्क की कहानियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाई जाएंगी। भले बाद में रसूखदार वहां अतिक्रमण कर लें या बिल्डर इमारतें खड़ी कर दें। लोग भले ही कुछ न करें लेकिन पार्क को अपनी यादों में जिंदा रखने की भरपूर कोशिश तो जरूर ही करेंगे। क्योंकि लोग और क्या कर सकते हैं या क्यों करें।
हमारे मोहल्ले के बीच से एक गंदा नाला भी बहता है। नाले स्वच्छ भी होते हैं इसके बारे में मेरी जानकारी सीमित है। नाले के साथ गंदा शब्द कब से जोड़ा गया, कब से कहा जा रहा है यह रहस्य ही है। लेकिन हमारे मोहल्ले का ये नाला, गंदे नाले के रूप में ही आदर पाता रहा है। आदर इसलिए कि पूरे शहर में ये मोहल्ला गंदे नाले वाले मोहल्ले के रूप में ख्याति प्राप्त है। पूरे शहर के लिए मच्छरों का उत्पादन अकेला ही कर देता है। ये नाला मोहल्ले के रुमानी जीवन का भी हिस्सा रहा है। सैकड़ों कहानियां इसी नाले के किनारे घटित हुई हैं। प्यार की दर्जनों प्लानिंगें इसी नाले के पाट पर बनाई गई हैं। मामला ठीक-ठाक न बैठने पर कई उपहार गुस्से में इसी नाले में फेंके गए हैं। प्रेमिका की कहीं और शादी होने पर उसके घरवालों से बदला लेने के लिए गंगा मइया की कसम की तरह की कई कसमें इसी नाले के आसपास खाई गई हैं। मार के नाले में फेंक देंगे..टाइप के शाश्वत डॉयलाग भी बोले गए हैं। नाले में बहने वाली विभिन्न वस्तुओं की तुलना भी झगड़ने वालों ने एक-दूसरे से की है। नाली के स्थान पर नाले के कीड़े टाइप के अशुद्ध वाक्य भी इसी की कृपा से प्रचलन में आए हैं।
इतना भयंकर मोहल्ला होने के बावजूद आजतक इस मोहल्ले के किसी बुजुर्ग के साथ बद्तमीजी नहीं की, किसी बच्चे ने किसी बड़े के साथ कभी बेअदबी नहीं की है। बूढ़े हो जाने पर घरों में उनकी कद्र की गई है। किसी बुजुर्ग ने कभी खुद को कमजोर नहीं समझा, 80 साल के हो जाने पर भी 55 साल के बेटे को डांटने और तमाचा मारने का साहस यहां के सभी बुजुर्गो में रहा है। किसी लड़के ने भी कभी डांट खाकर मजाल है कि कभी बाप को पलटकर जवाब दिया हो हमेशा गुस्सा अंदर जाकर पत्नी पर ही निकाला है।
इस तरह लड़ते-झगड़ते, पीढ़ियों साथ रहते, पुश्तैनी दुश्मनियां और मुंहबोली रिश्तेदारियां निभाते रहने वाला करेले के हलवे जैसा टेस्टी हमारा मोहल्ला केवल हमारे मोहल्ले में पाया जाता है। आपका मोहल्ला भी ऐसा ही है तो सौभाग्य मानिए।
ऐसी भागम-भाग और आत्मकेंद््िरत होते जमाने के दौर में आज कहीं मिलते हैं इतने प्यारे मोहल्ले.. सच कहिओ, तुम्हें उसी जवान मास्टरनी की कसम..,उस गंदे नाले की कसम.., तुम्हें तुम्हारे मोहल्ले की कसम..।
अनुज खरे

बुधवार, 10 नवंबर 2010

हिंदी भाषा और बंगाले का जादू

स्टीमर चल दिया था। हुगली के पानी को चीरते हुए, छोटे-बड़े जहाजों के पास से गुजरते हुए हम लोग बोटेनिकल गार्डन की ओर जा रहे थे। कमल जोशी, बरुआ शर्मा, त्रिपाठी-पूरा एक दल उस दिन पिकनिक मनाने निकला था। हम लोग ब्वायलर के नजदीक खड़े थे और आँच लगने से पसीना आ रहा था। मैं अलग जाकर रेलिंग के सहारे अकेला खड़ा हो गया। जाने कितनी बातें मन में घूम रही थीं। विशेषतया शरत बाबू के ‘पाथेर दावी’ के पात्र, उस के जहाजी, उस के खानाबदोश क्रांतिकारी उस पार की जूट मिलों के धुएँ में दिखाई पड़ते थे और छिप जाते थे। सहसा मेरी नजर स्टीमर में सामने लगी एक तख्ती पर पड़ी। उस पर नागरी अक्षरों में लिखा था- ‘फांस की लास।’ ‘फांस की लास’ क्या है? इस में ‘की’ तो मैं समझता था, हिंदी की एक विभक्ति है। लेकिन ‘फांस’ कौन सी चीज है? उस की ‘लास’ क्या हो सकती है? शरत, पथेर दावी, सब्यसांची, अपूर्व सभी भूल गए और उस तख्ती पर मेरा ध्यान अटक गया। मैंने हिंदी की सभी उपभाषाओं के शब्दों का स्मरण किया था। आप सच मानिए, मैं कितनी कम हिंन्दी जानता हूं इस का ज्ञान मुझे उसी दिन हुआ। अब मन में बड़ी झिझक कि किसी से पूछूँ तो क्या कहेगा? आखिरकार मैंने किसी तरह हिम्मत बाँधी और श्री शिवनारायण शर्मा से पूछा: ‘यह क्या लिखा है?’
‘‘यह? तुम नहीं समझे? यह है ‘फस्र्ट क्लास!’ स्टीमर का फस्र्ट क्लास।’’
‘फस्र्ट क्लास!’ मैं तो आसमान से गिर पड़ा। मैंने सोच, मैं अभी दौड़कर सुनीति बाबू के बंगले पर जाऊंँ और उनके दरवाजे पर सत्याग्रह कर दूं कि ‘देवता! अपनी भाषा विज्ञान की पुस्तकों में आप ने कहीं उस नियम का उल्लेख नहीं किया, जिसके अनुसार फस्र्ट क्लास का रूपांतर ‘फांस की लास’ हो जाता है।’
लेकिन मेरे कलकत्तेवासी मित्रों ने बताया कि ऐसी हिंदी कलकत्ते वालों के लिए कोई नई बात नहीं। बंगाल ने भारतीय संस्कृति को जो अमूल्य देनें दी हैं, उनमें से एक यह भी है। उन्होंने अपनी भाषा में तो जो किया उस की बात जाने दीजिए, वे अगर चाहें तो ऐसी हिंदी लिख दें कि बड़े-बड़े हिंदी वाले गच्च खा जाएँ और उस का कोई तात्पर्य न निकले। इसी को हमारे पूर्वज बंगाल का जादू कहते हैं। छूमंतर किया कि भाषा बदल गई। आप के सामने कुछ नमूने पेश करता हूं।
मैं उम्मीद करता हूं कि आप जूते पहनते ही होंगे। अपने तो खैर पहनते ही होंगे। भूले-भटके दूसरों के जूतों में भी कभी-कभी पाँव चला जाता होगा। आप जूते के तल्ले, जूते की पॉलिश, जूते की ठोकर, जूते की एड़ी वगैरह से भी परिचित होंगे। लेकिन क्या आप बता सकते हैं ‘जूते का मेरा मात’ कौन चीज होती है? सोचिए। मैं शर्त लगा सकता हूं कि आप हिंदी के बड़े से बड़े शब्द उलट डालिए, बाटा की हर एजेंसी में पूछ आइए, मुहल्ले के बूढ़े से बूढ़े मोची से हाथ जोड़ कर यह भेद माँगिए, पर आप को ‘जूते का मेरा मात’ का पता नहीं चलेगा। लेकिन कलकत्ते जाइए, वहां आपको बंगालियों की जूते की दुकानों पर अक्सर लिखा हुआ मिलेगा- ‘इआहां जूता का मेरा मात हाए।’ इसको यदि आप खड़ी बोली में अनूदित करें तो इस का अर्थ होगा- ‘यहां जूते की मरम्मत होती है।’
अगर आप बहुत संर्कीणमना हैं, आपमें प्रांतीयता की भावना है तो आप बंगालियों की निंदा करने लगेंगे कि ये लोग हिंदी का रूप बिगाड़ते हैं। लेकिन यह आपका अन्याय है। वास्तव में ये लोग उसे अपने सुसंस्कृत ढंग से लिखते हैं और उन्होंने हिंदी भाषा को जैसे नए-नए शब्द रूप और व्याकरण-तत्व दिए हैं, उस के लिए आप का सिर अहसान के बोझ से झुका होना चाहिए, उस के बजाए आप उन की निंदा करेंगे? अगर इसे कृतघ्नता नहीं कहेंगे तो और किसे कहेंगे?
एक हुए हैं ग्रियर्सन। सर जॉर्ज ग्रियर्सन। उन्होंने 20 मोटे-मोटे ग्रंथों में देश भर की भाषाओं का और हिंदी की तमाम उपभाषाओं का उल्लेख किया है, परिचय दिया है, नमूना दिया है, लेकिन हिंदी के इस बंगाली रूप को वे बिल्कुल छोड़ गए। इस को सिवा पक्षपात के और क्या कहा जाए।
बंगाली लोग हिंदी के शब्दों को कैसे सुधार कर सुंदर बना देते हैं, इस का दूसरा नमूना लीजिए। हिंदी में ‘फायदा’ बहुत प्रचलित है। लंबा-चौड़ा, बेडौल, बेतुका। बंगालियों ने उसे सुधार दिया है। कलकत्ते के सुंदर होमियो हॉल की नोटिस में कोई जी प्रसाद के खत का उल्लेख है जो कहते हैं- ‘आप के यहां का दवा व्यवहार कर के मुझे बहुत फैदा हुआ।’
देखिए- जरा से परिवर्तन से शब्द कितना सुंदर हो गया। आप मान लीजिए आप कोई कविता लिख रहे हैं। पंक्ति के अंत में ‘शैदा’ आता है। आप तुक ढूंढते-ढूंढते परेशान हैं। ‘मैदा’ या ‘पैदा’ के अलावा कोई तुक ही नहीं मिलती। अब आप चाहें ठाट से ‘फैदा’ रखकर चार पंक्तियों का पत्र पूरा कर लें। शैदा, मैेदा, पैदा, फैदा, अगर सुंदर होमियो हाल के बंगाली नोटिस लेखक ने फायदा शब्द का यह नया रूप आपके सामने न रखा होता, तो आप कितना सिर पटकते, आप की कविता कभी पूरी न होती और आप कवि बनने से वंचित रह गए होते।
खैर, यह तो एक-आध शब्द या एक-आध वाक्य का नमूना है। लेकिन, यदि एक पूरा गद्यांश इस भाषा में लिखा जाए, तब तो सौंदर्य का जादू भाषा पर छा जाता है। मैं तो उस अभूतपूर्व सौंदर्य से पूर्णतया वंचित रह जाता, अगर उस दिन मेरे प्रिय मित्र श्री नेमिचंद्र जैन ने मेरा ध्यान एक नोटिस की ओर नहीं दिलाया होता। यह नोटिस 13 खारापट्टी स्ट्रीट, कलकत्ता के कविराज श्री अमूल्य धनपाल की एक विशेष दवा की नोटिस थी, जो पता नहीं नेमि जी को कहां से प्राप्त हो गई थी और अमूल्य धनपाल की उस नोटिस को अमूल्य धन की तरह सहेजे रखे हुए थे।
उस नोटिस में सबसे ऊपर अंग्रेजी, बीच में बंगाली और सबसे नीचे हिंदी में विज्ञापन था जिस की अविकल प्रतिलिपि इस प्रकार है:
कलिकत्ता सरकारी मेडिकल कॉलेज से मोलाहाजा हो कर तारिफ हुआ सोने का मेडल मिला और सारकर में रेजेष्टारी हुआ।

बैंगल शटी फुड
लड़का भाले का बीमारी आदमी का सिरिफ एही हाल को श्री पोष्टाई खाना है, बांगला गभर्णमंेट का इनस्पेक्टर जनार अब सिभिल हस्पिटाल समूह हिन्दुस्तान का फुड पड्राक्ट का प्रदर्शनी, बड़े-बड़े डॉक्टर कविराज लोगों ने इस फुड की सिपरास किया है। खाने का तरकिब- इस फुड का एक भाग बौ 16 भाग इया पानी अच्छी तरह मिला कर माटी, इनामेल इया एलमिनियम का बर्तन में 10 मिनिट तक पोकाय के पारा चिनि इया मिश्रि मिला कर तब। 15 मिनिट बाद उतारने होगा। ठांडा होने से खाना।
श्री अमुल्य धनपाल।
आफिस- 13 खारापट्टी स्ट्रीट
कलिकत्ता
जेनारेल मारचेंट अरडार सापलवर एंड केमिसन एजण्ट
अब चाहें हिंदी के आलोचक मानें या न मानें, लेकिन कविराज अमूल्य धनपाल ने हिंदी गद्य के बड़े-बड़े शैलीकारों का घमंड तोड़ दिया है। यह है बंगाले का जादू। आप लाख साफ-सुथरी हिंदी लिखंे, लेकिन यह रवानीं, सह असर आप की भाषा में नहीं आ सकता। पहली बार यह भाषा पढ़ कर मुझ पर क्या असर हुआ, अगर मैं उसी शैली में असफल रूप से कहने का प्रयास करूं तो इस प्रकार होगा।
‘नेमि बाबू की दुकान में नोटिस पढ़ा इया देखना भर से दिमाग ठंडा होनपा। बेहोसी होता होता बचा। भागा तब।’
मैं तो साहब सोच रहा हूं कि अगर अपनी शैली में वही जोर लाना है तो कम से कम बंगल शटी फुड ‘पोकाय’ के खाना तो शुरू ही कर दूं। मैं हिंदी के अन्य गद्य लेखकों से भी इसी का ‘सिप्रास’ करता हूँ।
(ठेले पर हिमालय से साभार)
धर्मवीर भारती

शनिवार, 6 नवंबर 2010

दीप पर्व की अशेष शुभकामनाऍं

मोती सा त्त्‍योहार दिवाली

ज्‍योति का त्‍योहार दिवाली

दीप जलें ,जगमग जगमग

रोशन हर घर में खुशहाली

यही कामना सच हों सपने

रहे न कोई पुलाव ख्‍याली

चकाचौंध में, भूल न जाना

कुछ रातें हैं, अब भी काली












गुरुवार, 4 नवंबर 2010

हमारे आसपास बढ़ता चाणक्य नीति का महत्व



डॉ. महेश परिमल
आज देश की राजनीति का स्वरूप लगातार बदल रहा है। नहीं बदल रहा है, तो वह है नेताओं का चरित्र। इतना अवश्य जान लें कि जिस देश के राजनेता राजनीति के मूल सिद्धांतों को अच्छी तरह समझकर उसे अमल में लाएँगे, तो उस देश की प्रजा उतनी ही अधिक सुखी होगी और शासन यशस्वी बनेंगे। यह सच आज भारतीय राजनीति से बहुत दूर है। यहाँ प्रजा तो सुखी नहीं है, अलबत्ता राजनेता अपनी भावी पीढ़ियों के साथ बहुत ही अधिक खुश हैं। इन दिनों पूरे विश्व में अचानक कौटिल्य के अर्थशास्त्र की माँग बढ़ गई है। विदेशों के तथाकथित मैनेजमेंट गुरु भी कंपनियों के सफल संचालन के लिए कौटिल्य के सूत्र वाक्यों को अमल में लाने लगे हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो लोकप्रिय है ही, इसके अलावा राजनीति पर उनकी लिखी किताब भी महत्वपूर्ण है। आज कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तरह चाणक्यनीति भी विख्यात है। सबसे पहले यह भ्रम दूर कर लें कि चाणक्य और कौटिल्य अलग-अलग हैं। वास्तव में चाणक्य और कौटिल्य एक ही व्यक्ति का नाम है।
जब भी कहीं चाणक्य राजनीति की बात आती है, तब हम समझते हैं कि यह किताब कुटिलता से भरपूर होगी। इसमें यह बताया गया होगा कि किस तरह से राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को परास्त करें और सत्ता हासिल करें। चाणक्यनीति के बारे में यह हमारी भूल है कि हम ऐसा समझते हैं। दरअसल चाणक्यनीति के मूल में स्वार्थ नहीं, बल्कि परमार्थ है। यही कारण है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ के पहले ही श्लोक में तीन लोकों के नाथ ईश्वर को प्रणाम कर अपने ग्रंथ का मंगलाचरण करते हैं। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना ही चाणक्य की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि किसी भी शासक को राजनीति में सफल होना है, तो उसे ईश्वर के अस्तित्व और धर्म के मूलभूत सिद्धांतों में श्रद्धा रखनी होगी।
आज हमारे देश में सांप्रदायिक ताकतें लगातार बलशाली होती जा रहीं हैं। इसके रहते कोई भी शासक सफल नहीं हो सकता। इसे ही ध्यान में रखकर अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए चाणक्य ने ग्रंथ लिखा। अपने ग्रंथ के बारे में चाणक्य पूरी तरह से स्पष्ट हैं। चाणक्य कहते हैं ‘मैं यहाँ प्रजा के कल्याण के लिए राजनीति के ऐसे रहस्यों का उद्घाटन करुँगा, जिसे जानने के बाद व्यक्ति सर्वज्ञ बन जाएगा।’ यहाँ पर चाणक्य ने व्यक्ति के लिए जिस सर्वज्ञ शब्द कहा है, उसका आशय यही है कि ऐसा व्यक्ति संसार के सभी व्यवहारों को समझने लगेगा, अर्थात वह पूर्णत: व्यावहारिक हो जाएगा। उसका संबंध आध्यात्मिक जगत के साथ नहीं होगा। आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त करने वाले तो महात्मा होते हैं। चाणक्य दावे के साथ कहते हैं कि जो व्यक्ति मेरे ग्रंथ से राजनीति के इस विज्ञान को समझेगा, वही प्रजा का कल्याण कर पाएगा। चाणक्य ने यहाँ पर ज्ञान नहीं, बल्कि विज्ञान शब्द का प्रयोग किया है। राजनीति के सिद्धांतों का अभ्यास करने की क्रिया को ही ज्ञान कहा जाता है। इसे समाज के एक-एक व्यक्ति के हित में उसका उपयोग करना विज्ञान कहलाता है। ज्ञान की अपेक्षा विज्ञान अधिक सारगर्भित है। चाणक्य यह दावा नहीं करते कि इस ग्रंथ में जो कुछ लिखा गया है, वह मौलिक है। पहले ही श्लोक में वे कहते हैं कि अनेक शास्त्रों में से चुन-चुनकर राजनीति की बातों का संपादित किया है। इस वाक्य में ही चाणक्य की ईमानदारी और पारदर्शिता झलकती है। आज का युग चाणक्य के पाठकों को अँधेरे में रखना नहीं चाहता। वे स्पष्ट रूप से कुबूल करते हैं कि मैंने तो राजनीति के सिद्धांतों का संकलन ही किया है। इस तरह से संकलित कर चाणक्य ने अनेक पूर्व महर्षियो के ज्ञान की धरोहर को जीवंत रखा है और हम तक उसे पहुँचाने का पुण्य कार्य किया है।
किसी भी ग्रंथ को पढ़ने और उसे अमल में लाने के पहले हमें यह जान लेना आवश्यक है कि इस ग्रंथ का अभ्यास करने से हमें क्या लाभ होगा? चाणक्य ने पने ग्रंथ के प्रारंभ में ही इस प्रश्न का उत्तर दे दिया है। चाणक्य कहते हैं कि इस नीतिशास्त्र को सही अर्थो में समझा है, तो वे यह अच्छी तरह से जान जाएँगे कि कौन-सा कार्य अच्छा है और कौन-सा बुरा। इस माध्यम से उन्होंेने उत्तम मनुष्य की व्याख्या भी कर दी है। उत्तम मनुष्य उसे कहते हैं, जो नीतिशास्त्र केमूल सिद्धांतों को स्वयं अमल में लाए, उसके आधार पर प्रजा को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यह भी स्पष्ट हो जाएगा। ईष्ट क्या है और अनिष्ट कय है, इसका भी बोध यह ग्रंथ कराएगा। चाणक्य का नीतिशास्त्र प्रजा को सुखी बनाने का शास्त्र है। कोई भी व्यक्ति, जो सुखी होना चाहता है, उसे जीवन को दु:खी बनाने वाले तत्वों की पहचान पहले कर लेनी चाहिए। चाणक्य का नीतिशास्त्र बहुत ही व्यावहारिक बातें करता है। इसी कारण सुख के साधनों की तलाश करने के बदले दु:ख पैदा करने वाले साधनों को पहचान लेना चाहिए, ताकि सुख प्राप्त करने में ये तत्व बाधक न बनें। आखिर कहाँ हैं ये दु:ख देने वाले तत्व? चाणक्य कहते हैं ‘मूर्ख व्यक्ति को दिया जाने वाला उपदेश, कुलटा स्त्री का भरण-पोषण और दु:खी लोगों का संसर्ग विद्वानों को भीे दु:खी बना देता है। ’ जिसे सुखी होना है, उसे कभी भी मूर्ख व्यक्ति को उपदेश नहीं देना चाहिए। कुलटा स्त्री का भरण-पोषण नहीं करना चाहिए। यहाँ पर दुखियारों की मदद करना निषेध नहीं माना है, पर उसके साथ रहने का निषेध किया गया है। क्योंकि उसका संक्रमण अवश्य होगा।

जैन शास्त्रों में भी लिखा गया है कि मूर्ख व्यक्ति को उपदेश देना ऐसा है, जैसे खुजली वाले कुत्ते के शरीर पर चंदन का लेप मलना। ये बेकार की मेहनत है। इसका कोई परिणाम नहीं निकलेगा। इससे निराशा ही मिलती है। बारिश में भीगने वाले बंदर से पेड़ के पक्षियों ने घोसला बनाने की सलाह दी। इससे क्रोधित होकर बंदर ने पक्षियों के घोसलों को ही नष्ट कर दिया। सइी तरह कुलटा स्त्री साँप की तरह है, जिसे दूध पिलाकर हम यह समझें कि हमने उस पर दया की। जो दया करने वाले के प्रति फादारी नहीं कर सकती, उसका भरण-पोषण करना पति का कर्तव्य नहीं है। आज का कानून भी पति से बेवफाई करने वाली स्त्री से तलाक लेने की सलाह देता है। दु:खी मनुष्यों में से एक प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस कारण ऐसे लोगों के साथ रहने वाला भी निराशावादी हो जाता है। जिन्हें आशावादी बनना हो, उसे आशावादियों के साथ रहना चाहिए। सोहबत का असर इंसानों पर ही सबसे पहले होता है। यह चाणक्य बहुत पहले कह गए हैं।
बाद के श्लोक में चाणक्य मनुष्य के जीवन के लिए सबसे अधिक हानिकारक चार तत्वों की बात करते हैं। चाणक्य कहते हैं ‘दुष्ट पत्नी, शठ मित्र, आज्ञा न मानने वाले नौकर और घर में बसने वाला साँप’ ये चारों मृत्यु के समान हैं। पति और पत्नी संसाररूपी रथ के दो पहिए है, यदि पत्नी दुष्ट हो, तो जीवन के हर कदम पर अवरोध पैदा होते हैं और संसार का यह रथ बराबर चल नहीं पाता। रणभूमि पर शत्रुओं का वीरतापूर्वक मुकाबला करने वाला पराक्रमी योद्धा भी पत्नी के सामने लाचार बन जाता है। दुष्ट पत्नी अपने पति के लिए अभिशाप होती है। वह सज्जन पुरुष का जीवन हराम कर देती है। पत्नी दुष्ट हो, तो घर से सुख-शांति हमेशा के लिए चली जाती है। जिस घर में शांति न हो, उसका समाज में भी कोई मान-सम्मान नहीं होता। पत्नी बेवफा हो, तो अरबों की दौलत भी सुख नहीं दे सकती।
इंसान की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संतान और मित्र है। जिन्हें अच्छे मित्र मिले, वह विश्व का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति है। जिन्हें धूर्त मित्र मिले हैं, वह विश्व का सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली व्यक्ति है। मनुष्य किसी भी व्यक्ति के साथ मित्रता करे, तब उसे उसके दुगरुणों के बारे में जानकारी नहीं होती, उसे यह विश्वास होता है कि मुसीबत के समय सहायता करने वालों में यही सबसे आगे होगा। मित्र तो सहायता करेगा ही। वास्तव में जीवन में जब बाधाएँ आती हैं और तब हमने मित्र से सहायता की अपेक्षा रखी हो, तभी वह धोखा दे जाए, तो कैसा लगता है? समाज में दूसरे लोग हमारे साथ धोखाधड़ी करते हैं, तब हमें आघात नहीं लगता, पर जब मित्र ही हमसे धोखा करने लगे, तो उस आघात को सहना बहुत ही मुश्किल होता है। इसी तरह मालिक का आदेश न मानने वाला नौकर भी खतरनाक होता है। घर में जब मेहमान आएँ हो, उस समय यदि उसे कोई आदेश दिया जाए, तभी नौकर सेठ का अपमान कर दे, तो यह बात सेठ के लिए बहुत ही अधिक आघातजनक होगी।
लोग यह दलील देते हैं कि चाणक्य आज से 2400 वर्ष पूर्व पैदा हुए थे। उसके समय की राजनीति और आज की राजनीति में जमीन-आसमान का अंतर है। तो उसका जवाब यह है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ में राजनीति के शाश्वत सिद्धांतों की चर्चा की है। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी समझाया है। यह सिद्धांत प्राचीन काल में जितने प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। देश में राजशाही हो या लोकशाही, पर राजनीति के सिद्धांत कभी नहीं बदलते। जो राजनेता सिद्धांतों की जानकारी प्राप्त कर लेते है, वे अपने आप को देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकते हैं।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मायके गई पत्नी को लिखा गया भैरंट लेटर



अनुज खरे

प्रिय पत्नी जी,
सादर प्रणाम। सादर प्रणाम इसलिए कि आपकी दिशा में किए गए मेरे सारे काम सादर एवं साष्टांग अवस्था में ही होते हैं। उपरोक्त तथ्य आपको पता ही है, लेकिन मेरे लिए आश्चर्य दूसरों के लिए सत्य कि यह तथ्य सर्वविदित है। आगे समाचार यह कि तुम्हारे बिना घर सूना-सूना सा लग रहा है। कुछ जलनखोर इसे खिजा में बहार आ गई बताते हैं (हालांकि खिजा का मतलब क्या है मुझे नहीं पता, लेकिन गुरु शब्द तो वाकई जोरदार है।) कुछ शुभचिंतक इस मरघट में शांति आ गई बताते हैं। दोनों ही उदाहरणों के माध्यम से मुझे लोगों के चरित्र और शिक्षा-दीक्षा के लेबल का पता चल रहा है। लोग गिरे हुए हैं एक पत्नी वियोगी को इस तरह की समझाइश दे रहे हैं। हालांकि लोगों को कसूर नहीं है देश की शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी के कारण ही लोग इस विशिष्ट परिस्थिति के लिए कोई खास शब्द या उदासीनतामूलक वाक्य नहीं रच पाए हैं। लेकिन हर खामी के लिए देश को जिम्मेदार ठहराना या देश ही जिम्मेदार होता है, किस्म के वाक्य जरूर खूब रच लिए गए हैं। पूरा देश किसी भी तरह की समस्या आने पर बेखटके इन वाक्यों के प्रयोग पर पूरी तरह एकमत है। तो जाहिरा तौर पर लोग इस संदर्भ में गिरे हुए माने जाएंगे।
और प्रिये एक्सक्यूज मी!, यहां शिक्षा-दीक्षा के तरन्नुम में दीक्षा का जिक्र फिजूल में ही आ गया है। मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं है। जैसा कि तुम आज तक नहीं मानती हो। उससे मेरा कोई संबंध नहीं है। उसकी कजरारी आंखों बड़ी-बड़ी जरूर थीं लेकिन मैं उनमें नहीं डूबा। उसकी मुस्कान बड़ी कंटीली जरूर थी लेकिन मैं उनसे घायल नहीं हुआ। उसकी नाक बड़ी सुंदर जरूर थी लेकिन उसके साथ रासरंग रचाकर अपनी नाक नहीं कटवाई है। उसके हाथ कमल के फूल जैसे जरूर थे लेकिन मैं उन्हें थामने के लिए कीचड़ में नहीं उतरा। उसके पैर बड़े खूबसूरत थे लेकिन मैंने कभी ‘इन्हें जमीन पर मत रखिए मैले हो जाएंगे’ टाइप के डायलॉग नहीं बोले। हालांकि मुझे याद है जिस दिन उसकी शादी हुई थी तुम कितनी खुश थीं, उस दिन तुमने हलवा-पूरी के साथ खीर भी बनाई थी। कितना आग्रह करके तुमने सब खिलाया था। कितना स्वादिष्ट था उस दिन का खाना, वाह!। कितनी करारी थीं पूरियां अहा!। कितना धांसू अंदाज था तुम्हारे परोसने का उफ्फ!। कितना दुखी सीन था दीक्षा के विदा के समय का, ओह!।
खैर, मुद्दे पर लौटें। जब से तुम गईं हो रसोई का बुरा हाल है। बर्तन उदास हैं। मसालेदानी चीत्कार कर रही है। जिस मूंग की दाल को तुमने मुझे बिना नागा खिलाया था उसका डिब्बा अब उपेक्षित सा महसूस कर रहा है। जिस काली मिर्च के गुण बता-बताकर उसे हर चीज में डालती थीं उसका वो तीखापन जाता रहा है। मिक्सी अपनी स्थिति को लेकर सांसत में है। जिन बाइयों के चेहरे घर में घुसते समय कुम्हला जाते थे उनमें नई चमक और अतिरिक्त रौनक दिखाई दे रही है। उनका डर जाता रहा है। घी के डिब्बे का स्तर रोज घट रहा है, तो सब्जियां आ रही हैं, जा कहां रही हैं पता नहीं चल रहा है। कल ही जिस मूली को आधा खाकर मैंने रखा था आज पत्तियों के रूप में केवल उसके अवशेष मिले हैं। परसों ही जेब में रखी चिल्लर गायब हो चुकी है। हालांकि खुशी इस बात की है कि रुपए सुरक्षित हैं। जा चिल्लर ही रही है। कोई दुष्ट नोटों को छोड़ चिल्लर पर ही नजर गढ़ाए है। और हां, आचार कहीं तुम्हारे वियोग में अपने ही बचे-खुचे तेल में डूबकर आत्महत्या न कर ले। आ जाओ प्रिये, उनकी फफूंदी दूर करो, उनका वर्तमान संवारो, उन्हें भविष्य का नया जीवन दो।

आगे सब ठीक है, लेकिन दूसरों की बुराई को सुनने का तुम्हारा धैर्य और नियमित रूप से उसके लिए समय निकालने की लगन के चलते आस-पड़ोस की तुम्हारी सहेलियां तुम्हारी कमी हरदम महसूस कर रही हैं। उनकी आवाज में अपनी सास की बुराई करने के लिए वांछित स्तर की ऊष्मा और ऊर्जा दोनों ही पैदा नहीं हो पा रही है। उनकी उदासी मुझसे देखी नहीं जाती है। मेरी मजबूरी है अन्यथा मैं उनके पास खड़ा होकर तुम्हारी जगह भरने की कोशिश करता। तुम तो जानती ही हो किसी का भी दुख मुझसे देखा नहीं जाता है। फिर मामला तो पास-पड़ोस का है। (पड़ोसिनें तो प्राचीनकाल से ही खूबसूरत रहती चली आ रही हैं।) तो ऐसे में मैं.. मतलब हम ही उनके काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा। सोचो। विचार करो। मेरे नहीं तो कम से कम अपनी पड़ोस की सहेलियों के दुख को तो समझो। लौटे प्रिये, अविलंब लौटो।
वैसे तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, बाकी सब ठीक है। हां, ड्राइंगरूम की हालत कोमा में आ गए जैसी है। सोफे निराशा के गर्त में डूब चुके हैं। उनकी गद्दियां औंधे मुंह पड़ी हैं। सेंटर टेबल धूल के गर्त के नीचे दबकर पुरातात्विक महत्व की हो चुकी है। गुलदस्तों में जो फूल अंतिम बार खोंसे गए थे वे अब किसी का सामना नहीं कर पा रहे हैं, उनकी गर्दन लज्जा से झुक चुकी है। पूरी दोपहर टीवी खाली-खाली सूनी आंखों से निहारता रहता है। प्राइम टाइम में तो उसकी आंखों से चिंगारियां निकलती हैं। जिन सीरियलों को देखकर निजी तौर पर उनकी टीआरपी बढ़ाने का ठेका लिए हुए थीं उनकी हालत खराब हो चुकी है। बालिका वधू से लेकर बिदाई तक सभी जगह सासें प्रभावशाली हो चुकी हैं। बहुओं की हालत पतली है। सासें बड़े जोशो-खरोश से बहुओं पर अत्याचार कर रही हैं। पहले तुम्हारी उपस्थिति मात्र से उनकी इतनी हिम्मत नहीं पड़ती थी। छोटे पर्दे की बहुओं के लिए तुम्हारा घर बैठे-बैठे इतना संबल और नैतिक समर्थन काफी था। टीवी पर आने वाले पुराने फ्रिज, वाशिंग मशीन के विज्ञापन किसी को भी अपील नहीं कर पा रहे हैं। शायद कंपनी वाले भी जान गए हैं इसलिए नए विज्ञापन दे भी नहीं रहे हैं। पत्नी मायके में हो तो नए विज्ञापन देने से कोई फायदा नहीं कंपनी वाले जानते हैं। कंपनी वाले बड़े चालाक होते हैं,भई लेकिन इन दिनों तुम्हारे जाने से कुछ मुश्किल में चल रहे हैं। और हां इसी बीच कुछ नए सीरियल भी आ चुके हैं उनकी भी बहुएं तुम्हारे भरोसे ही हैं। उधर, एकता कपूर भी तुम्हारे आसरे ही बैठी है। चैनलवाले भी तुम्हारी ही राह ताक रहे हैं। पूरी विज्ञापन इंडस्ट्री भी तुमसे उम्मीद लगाए बैठी है। मुंह न मोड़ो, अपनी जिम्मेदारी समझो। आ जाओ प्रिये, जल्दी आ जाओ। छोटे पर्दे के अपने निजी संसार को बचाने के लिए जल्दी आ जाओ।
और आगे क्या लिखूं। तुम मेरे खाने पीने की चिंता मत करो। जबसे पता चला है मेरे दोस्त रोज शाम को हमारे घर आ जाते हैं। उन्हें मेरे खाने-पीने का पूरा खयाल है। रोज खाने-पीने के बाहर से सामान ले आते हैं। लेकिन एक बात है मैं उन्हें खाली बोतलें अपने घर में नहीं छोड़ने देता। नॉनवेज के लिए तुमने मना किया था इसलिए मैं अपने घर के बर्तन नहीं देता हूं, बेचारों को अपने ही घरों से इसके लिए बर्तन लाने पड़ते हैं। ताश खेलने के लिए बेचारे कह-कह कर थक गए लेकिन जुआ के लिए जब से तुमने अपने सिर की कसम देकर मना किया है मैं नहीं खेलता केवल जरूरत पड़ने पर दोस्तों को उधार ही देता हूं। वे इतने भोले हैं कि इस बात का बुरा नहीं मानते। बेचारे मेरा दुख देखकर देर रात तक रुकते हैं, बहुत जोर देने या घर से पत्नियों के फोन आने पर ही जाते हैं। वे तो रविवार या सरकारी छुट्टी में दिन में भी आ जाते हैं। वे भी मेरे दुख में बहुत दुखी हैं। जो सबसे ज्यादा रुपए हारा है, रोज तुम्हारे आने की तारीख पूछते हैं। कल ही मुझे बता रहा था कि यार, तेरा घर मेरे लिए बड़ा लकी है पिछले बार भी शुरू में मुझे बड़ी जमकर दच्च लगी थी। बाद के चार दिनों में सब बराबर हो गया था। इस बार भी भाभीजी छह दिन और न आएं तो वो पिछली वसूली कर प्रोफिट में आ जाएगा। हालांकि मैं इस बार उससे यह कह पाने की स्थिति मे नहीं हूं कि इस बार तू दच्च ही खाएगा या प्रोफिट में आ पाएगा। बताओ प्रिये, उसे किस दिशा की तरफ इशारा करूं।

ऐसे ही अब तुम्हें क्या सुनाऊं, हमारे बैडरूम की दीवारों पर तुम्हारे खौफ के कारण डरते-डरते डोलने वाली छिपकलियों की हिम्मत और हिमाकत इन दिनों कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। दो दिन पहले ही एक छिपकली आधा मकोड़ा खाकर मेरे लिखने वाली टेबल पर छोड़ गई थी, आज वापस आई थी मकोड़ा टेबल पर न देखकर मुझे आंखें दिखा रही थी। पहले उसकी मजाल थी कि ऐसा करे। मकड़ियां भी पहले हमारे कमरे के कोने-आतरों में शहर से बाहर फेंक दिए गए झुगगीवासियों की तरह छोटे-छोटे घरघूले बनाए थीं आज उन्होंने पूरे कमरे में बड़े-बड़े प्लॉट हथिया लिए हैं। एनआरआई किस्म के लक्जरी बंगलों का निर्माण कर लिया है। आस-पड़ोस के कमरों से रिश्तेदारों को बुलाकर पूरे कमरे में अवैध कॉलोनियां काट डाली हैं। यहां तक की हमारे बिस्तर तक से उन्होंने अपनी कॉलोनियों में जाने के लिए सड़कों का निर्माण कर लिया है। आ जाओ प्रिये, नगरनिगम के अतिक्रमणहारी दस्ते की तरह आकर इन बेरसूखदार छिपकलियों और मकड़ियों को उनकी औकात दिखाओ। अन्यथा ऐसा न हो कि इनके मुंह में बड़े कॉलोनाइजरों वाला स्वाद लग जाए और हम एक अदद कमरे तक से विस्थापित हो जाएं।
अंत में कुल मिलाकर समाचार यह है कि इन दिनों हमारे पूरे गृहप्रदेश पर संकट छाया हुआ है। हर आंतरिक मोर्चा एक समस्या खड़ी कर रहा है। बच्चे मनमानी पर उतर आए हैं। चावल-दाल के डिब्बे अपने सूखे और अकाल की स्थिति पर लगातार बाइयों के माध्यम से ज्ञापन भेज रहे हैं। केंद्रीय मदद का पैसा गलत हाथों में न चला जाए। महालेखा परीक्षक की तरह आ जाओ प्रिये, आकर इस भ्रष्टाचार से निपटने में भिड़ जाओ। न आओ तो कम से कम आने की तारीख तो बताओ ताकी जब तक इस अराजकता का ही आनंद लिया जा सके।

पुनश्च: बुरा मत मानना, लेकिन रोज-रोज मुझे बहाने बनाना अच्छा नहीं लगता है इसलिए इतना तो जरूर लिखना कि दोस्त को क्या बताना है उसे दच्च लगेगी या बंदा प्रोफिट में रहेगा।
सादर,
तुम्हारा
सेवकराम सत्यपति
लौटती डाक से आया जवाब प्रथम पैराग्राफ तक ही अक्षरश: कल सुबह पहुंच रही हूं। स्टेशन आ जाना। पिछली बार की तरह ज्यादा इंतजार न करना पड़े। आने से पहले दूध उबालकर फ्रिज में रख देना नहीं तो बिल्ली मुंह मार देगी। स्टेशन के रास्ते में सब्जी मंडी पड़ती है वहां से रविवार वाली लिस्ट देखकर सब्जी खरीद लेना। जल्दीबाजी में फिर सड़ी सब्जियां मत उठा लाना। जाते समय कपड़े प्रेस को दिए थे तुमने तो उठाए नहीं होंगे आज ही उठा लेना। जाते समय पापड़ छत पर डाले थे.., बगीचे में पानी भी नहीं दिया होगा, पौधे सूख गए होंगे.., तुमसे कोई काम ढंग से नहीं होता, चार दिन भी पीछे से नहीं संभाल सकते..दोस्तों के साथ ऐश चल रही है। गैरजिम्मेदारी कब जाएगी तुम्हारी। इतनी उमर हो गई है, कुछ तो सीखो..वगैरहा-वगैरहा।
बड़ी हंसी आ रही है न आपको। बड़ा मजा आ रहा है न पत्र पढ़ने में..। पढ़िए-पढ़िए। कल आपकी भी शादी होगी न, आपकी बीवी भी मायके जाएगी न। तब देखूंगा आप क्या लिख लेते हो। लिख तो फिर भी लोगो गुरु, लेकिन हमारे जैसी अच्छी सब्जी खरीदने की तमीज कहां से लाओगे।
अनुज खरे

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

पाकिस्तान में पुनरागमन के लिए तैयार हैं मुशर्रफ



डॉ. महेश परिमल
पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ अपनी नई पार्टी के साथ पाकिस्तान लौटना चाहते हैं। इस दौरान उन्होंने काफी अध्ययन किया। विशेषकर मोहम्मद अली जिन्ना के तमाम भाषणों को पढ़ा और समझा। यही नहीं पाकिस्तान की उन तमाम हस्तियों के बारे में गहराई से अध्ययन किया, जिन्होंने पाकिस्तान के लिए उल्लेखनीय काम किए। अपना पूरा ध्यान युवाओं पर देने वाले परवेज मुशर्रफ बहरहाल लंदन में रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा स्कॉटलैंड यार्ड कर रहे हैं। वे बहुत ही कम लोगों से मिलते हैं। लेकिन कंप्यूटर के माध्यम से वे पाकिस्तान ही नहीं, विश्व के कई लोगों से सीधे जुड़े हुए हैं। फेस बुक, ट्विटर आदि माध्यमों से वे लोगों से जीवंत संपर्क बनाए हुए हैं।
एक अक्टूबर को उन्होंने अपनी नई पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग की घोषणा की। मुशर्रफ के करीबी लोगों का कहना है कि इस दौरान वे राजनीति में और भी अधिक परिपक्व हुए हैं। वे अंतमरुखी हो गए हैं। अब तक बेनजीर भुट्टो, नवाज शरीफ, फैज अनवर फैज इस्कंदर मिर्जा और तारीक अजी जैसी अनेक हस्तियों ने पाकिस्तान के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया है। पर मुशर्रफ मियां का किस्सा इन सबसे अलग है। बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ के शासन में सेनाध्यक्ष को देश निकाला दे दिया गया था, लेकिन मियां मुशर्रफ खुद ही पाकिस्तान से भाग गए थे। मुशर्रफके प्रशंसकों का कहना है कि उन्हें निश्चित रूप से पाकिस्तानी अवाम का सहयोग मिलेगा। इसके पीछे उनका तर्क है कि हकीकत में मुशर्रफ पिछले दो वर्षो में जहाँ भी गए, वहाँ के पाकिस्तानी शिक्षकों, विद्यार्थियों और कार्यकत्र्ताओं को साथ में लेने की कोशिश की है।
परवेज मुशर्रफ बहुत ही सयाने हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के साथ पाकिस्तान वापस आने की योजना दो साल पहले ही बना ली थी। सबसे पहले तो उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्को का उपयोग अपने फायदे के लिए करना शुरू कर दिया। अपनी इमेज बनाने के लिए उन्होंने लोगों के सामने मुद्दे रखने के लिए विश्वविद्यालयों में लेक्चर देना शुरू किया। 2009 में अमेरिका प्रवास के दौरान कुल 17 स्थानों पर लेक्चर दिए। उन्होंने अपने इस प्रवास का भरपूर फायदा उठाया। इसके बाद वे स्वीडन, दुबई, एशियाई देश, हांगकांग तथा सिंगापुर भी गए। यहाँ भी वे अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे। उनके ये सारे प्रयास अब काम आ रहे हैं। पाकिस्तान में भी खुल आम यह माँग उठने लगी है कि उन्हें वापस बुलाया जाए। मुशर्रफ यह अच्छी तरह से जानते हैं कि पाकिस्तानी पीपुल्स पार्टी तथा मुस्लिम लीग जैसी बड़ी राजनैतिक पार्टियों उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इसी वर्ष फरवरी महीने से ही मुशर्रफ अपने मित्रों और परिचितों को ई-मेल और फेस बुक के माध्यम से सम्पर्क करना शुरू कर दिया था। फेस बुक में उनके करीब 3 लाख समर्थक हैं। मीडिया के माध्यम से भी उन्होंने अपने विचारों को पाकिस्तानी अवाम तक पहँुचाने की कोशिश की है। फेस बुक में अपने समर्थकों की बढ़ती संख्या को देखकर उन्हें लगता है कि पाकिस्तान में चुनाव लड़ने पर उन्हें यही युवा काम आएँगे। इसलिए वे अपने भाषणों में नई ताजगी ला रहे हैं। उनके विचारों से युवा उन्हें सुनने लगे हें। कुछ दिनों पहले ही उन्होंेने आतंकवाद पर भाषण किया। उनके भाषण से प्रभावित होकर बिलाल नामक युवक ने बताया कि मुझे परवेज मुशर्रफ अच्छे लगते हैं, क्योंकि वे प्रमाणिक हैं, उनकी एकमात्र चिंता युवाओं को एक बेहतर पाकिस्तान देने की है। पिछले दो सालों में उनमें काफी बदलाव आया है। उनके विचार अधिक इस्लामी हो गए हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि एक समय उनके पास भरपूर सत्ता थी, फिर भी वे भ्रष्टाचार से दूर ही रहे।
मुशर्रफ की कुछ विशेषताएँ हैं, जो पाकिस्तानियों को लुभा रहीं हैं। एक तो वे बचपन में वॉलीबाल, बेडमिंटन और क्रिकेट खेल चुके हैं। इसलिए युवा उन्हें खेल प्रेमी मानते हैं। इसीलिए युवा उन्हें अपने करीब पाते हैं। इसके अलावा वे टर्कीश भाष धाराप्रवाह रूप से बोलते हैं और उन्हें अरबी भोजन पसंद है। उनकी इसी पसंद के कारण लंदन में उन्होंने वही स्थान रहने के लिए चुना, जहाँ अरबी लोग रहते हैं। ताकि वे वहाँ पर घर जैसा महसूस कर सकें। उनकी सुरक्षा की जवाबदारी स्कॉटलैंड यार्ड पर है, इसलिए वह उनकी हर गतिविधि पर नजर रखती है। जब भी वे कहीं बाहर जाते हैं, तब हमेशा काली रंग की आलीशान ओडी कार का इस्तेमाल करते हैं। सुबह जल्दी उठ जाते हैं और दिन भर या तो पढ़ते हैं या फिर लिखते रहते हैं। इसके अलावा में आने वाले मेहमानों से भी मिलते हैं।
परवेज मुशर्रफ अपने भाषणों में उर्दू, हिंदुस्तानी और अंग्रेजी के मिश्रण का उपयोग करते हैं। किसी एक भाषा में लगातार वे भाषण नहीं कर सकते। उनकी यही कमजोरी पाकिस्तानी युवाओं को भा रही है। न केवल पाकिस्तानी, बल्कि विदेशों मंे रहने वाले पाकिस्तानियों को भी उनकी यह भाषा लुभा रही है। अब तक उन्होंने अपना निर्वासित जीवन लंदन में रहकर शांतिपूर्ण रूप से गुजारा है। लेकिन बदले हुए हालात में अब उनकी जीवन संकटपूर्ण हो सकता है। इसलिए दूर की सोचते हुए उन्होंने अपना एक और ठिकाना दुबई में बना लिया है। यही नहीं, सऊदी अरब के शाही परिवार ने उन्हें पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि शाही परिवार उनके राजनैतिक जीवन में कभी दखल नहीं देगा। अभी तो मियां मुशर्रफ अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे हुए हैं। पाकिस्तान की निष्फल सरकार को और अधिक डावाडोल करने के लिए वे देश को एक नई संरचना, पानी की समुचित व्यवस्था, कृषि और औद्योगिक विकास, नागरिकों का विकास और पॉवर सेक्टर की समस्याओं को दूर करने के लिए रणनीति बनाने में लगे हुए हैं। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि आखिर उनके दिमाग में क्या चल रहा है?
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

खत्म हो जाने के बाद अब शुरू हुआ खेल



डॉ. महेश परिमल
कॉमनवेल्थ गेम तो खत्म हो गए। वास्तव में खेल तो अब शुरू हुआ है। इस खेल के लिए किए गए निर्माण कार्यो का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। खेल की रंगारग शुरुआत और अंतिम दिन सुरेश कलमाड़ी भाषण के लिए आए, तो जिस तरह से उनकी हूटिंग हुई, उसी से स्पष्ट है कि हमारा देश भ्रष्टाचारियों को किसी भी रूप में सहन नहीं कर सकता। एक भ्रष्टाचारी की सार्वजनिक हूटिंग इस बात का परिचायक है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा कैंसर है, जो देश की रगों को सड़ा रहा है। अभी तो यह शुरुआत है। भ्रष्टाचार के प्रति लोगों का रवैया बदल रहा है। आज के नेताओं को अब सचेत होने की आवश्यकता है। सुरेश कलमाड़ी के बहाने जनता अब बहुत ही जल्द अपने वोट की ताकत दिखा ही देगी।
सुरेश कलमाड़ी भले ही इसका श्रेय ले लें कि कॉमनवेल्थ गेम बहुत ही शानदार तरीके से निपट गए। लेकिन इस खेल के पूर्व निर्माण कार्यो में हुए भ्रष्टाचार से इंकार नहीं कर सकते। उनका गुनाह माफ करने लायक नहीं है। इस दिशा में प्रधानमंत्री ने उच्चस्तरीय जाँच समिति गठित कर दी है। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने रिकॉर्ड खंगालने शुरू कर दिया है। आखिर क्या हुआ 76 हजार करोड़ रुपए का? तीन माह के भीतर इसकी रिपोर्ट आ जाएगी। फिर देखना कहाँ होते हैं सुरेश कलमाड़ी और उनकी भ्रष्टाचारी टीम। चारों ओर से कलमाड़ी की उपेक्षा शुरू हो गई है। खिलाड़ी जब प्रधानमंत्री से भेंट करने गए, तब उनके साथ सुरेश कलमाड़ी की टीम नहीं थी। पीएम कार्यालय ने इसकी पुष्टि भी की कि कलमाड़ी को खिलाड़ियों के साथ नहीं बुलाया गया था। अभी कलमाड़ी को कई ऐसे संकेते मिलेंगे, जिससे उन्हें लगेगा कि उनकी लगातार उपेक्षा की जा रही है। वे भले ही यह कहते रहें कि मैं बलि का बकरा नहीं बनूँगा, पर सच यही है कि वे सबकी निगाह में हैं। इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी निशाने पर हैं। यदि उनका नाम भी कलमाड़ी के साथ शामिल हो जाता है, तो फिर कई और चेहरे बेनकाब होंगे, यह तय है।
वास्तव में हम भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी तक पूरी तरह से सचेत नहीं हुए हैं। भ्रष्टाचार को अब हमने रोजमर्रा के खेल में शामिल कर लिया है। वैसे भी आज तक किसी भी भ्रष्टाचारी को सख्त सजा मिली हो, ऐसे उदाहरण बहुत ही कम देखने में आए हैं। जब देश के गद्दारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही हो, तब भ्रष्टाचारियों को कौन पूछे? सबसे पहले तो यह जानने की कोशिश होगी कि जब यह तय हो गया था कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेल भारत की राजधानी दिल्ली में होने हैं, तो फिर तीन वर्ष तक उस दिशा में एक भी काम आखिर क्यों नहीं हुआ? पूरे काम 2009 तक हो जाने थे, जो खेल शुरू होने के दिन तक चलते रहे। आखिर ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से इतना विलंब हुआ। उसके बाद अधिकांश ठेके अपने ही संबंधियों एव ब्लेक लिस्टेड कंपनियों को दिए गए, इससे ही अंजादा लग जाता है कि भ्रष्टाचार कहाँ से शुरू हुआ?
वास्तव में देखा जाए, तो भ्रष्टाचार ने हमारे देश की जड़ों को खोखला कर दिया है। देश में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को भी कहना पड़ा कि क्यों न इसे अनिवार्य कर दिया जाए। हम देख रहे हैं कि कोई भी सरकारी काम बिना लेन-देन के समय पर होता ही नहीं। आम आदमी सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा-लगाकर त्रस्त हो जाता है। उसके बाद भी उसका काम नहीं हो पाता। वहीं जिसने रिश्वत दी, उसका काम बिना किसी व्यवधान के तुरंत हो जाता है। भ्रष्टाचार अब व्यवस्था में शामिल हो गया है। सरकार खजाने से गरीबों के लिए निकला धन उन तक पहुँच ही नहीं पाता। बिचौलिये पूरी तरह से रकम को डकार जाते हैं। इसे समझने की कोशिश की, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने। वे अच्छी तरह से जानते थे कि सरकार खजाने से निकला एक रुपए जरुरतमंद तक पहुँचते-पहुँचते 15 पैसे बन जाता है। उन्होंने इस अव्यवस्था को रोकने की काफी कोशिशें की, पर कामयाब नहीं हो पाए। तब तक यह भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका था। आज तो हालत यह है कि यह घर के मुहाने तक आ पहुँचा है। चाहकर भी हम इसे अपने से दूर नहीं कर सकते।
सुरेश कलमाड़ी के बहाने अब भ्रष्टाचार के कई चेहरे हमारे सामने आने वाले हैं। इस बार चुनाव आयोग भी इस दिशा में सख्त हुआ है। आयोग की सक्रियता से भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है, पर अपराधी प्रवृत्तियों वाले प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोकने पर कुछ कर पाना संभव नहीं दिखता। अपराधी राजनीति में आकर इसे और भी अधिक प्रदूषित कर रहे हैं। आम आदमी तो आज चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता। देश के ये हालात कहाँ ले जाएँगे, यह एक शोध का विषय हो सकता है। कलमाड़ी ही इस देश के अकेले भ्रष्टाचारी नहीं है, जिसने देश को करोड़ों का चूना लगाया है। बहुत से अधिकारी, कर्मचारी और नेता भी इस भीड़ में शमिल हैं। पहले भी कई भ्रष्टाचारी हुए हैं, पर उन्हें ऐसी सख्त सजा मिली ही नहीं, जिससे दूसरे भ्रष्टाचारी सबक ले सकें। सख्त कानून ही भ्रष्टाचारियों में भय जगा सकता है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

हम कब सुन पाएँगे, न्यायमूर्ति हाजिर हो!



डॉ. महेश परिमल

भ्रष्टाचारियों को न्यायाधीश दंड देते हैं। पर जब न्यायाधीश ही भ्रष्टाचारी हों, तो फिर उन्हें कौन दंडित करेगा? भारतीय परिवेश में आज यह यक्ष प्रश्न चारों तरफ से सुनाई दे रहा है। भारतीय लोकतंत्र के जिस पाये को सबसे अधिक सशक्त होना था, आज वही अपने भ्रष्ट आचरण के कारण प्रजातंत्र को पंगु बना रहा है। कोलकाता के न्यायाधीश सौमित्र सेन और हरियाणा की महिला जज निर्मल यादव ने इस पूरी व्यवस्था पर एक प्रश्न चिह्न् ही लगा दिया है।
भारत के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने रहस्योद्घाटन किया है कि देश की सुप्रीम कोर्ट के दस में से आठ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। उनकी यह बात नक्कारखाने की तूती साबित हुई।
न्याय की बात करें, तो पर्शिया के राजा केम्बिसेस को पता चला कि उनके राज्य में न्यायाधीश ने रिश्वत ली है, तो उन्होंने रिश्वतखोर न्यायाधीशं का कत्ल करवा दिया। यही नहीं उनके शरीर की चमड़ी न्यायाधीश की कुर्सी पर चिपका दी। उसके बाद राजा ने उसी के पुत्र को न्यायाधीश की कुर्सी पर बिठाया और कहा कि इस कुर्सी पर किसकी चमड़ी चिपकी है, इस हमेशा याद रखना। प्राचीन जमाने के राजा न्याय के प्रति इतने अधिक सचेत रहते थे कि पता चलते ही वे न्यायाधीश को कठोर दंड देते थे। आज जब कदम-कदम पर भ्रष्टाचारी नेता हमें दिखाई पड़ रहे हैं, तो उस स्थिति में यह सोचा भी नहीं जा सकता कि न्यायाधीश भी कभी कठघरे में होंगे। आज भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कठोर कानून की आवश्यकता है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट ने इस आजिज आकर यह कह दिया कि क्यों न रिश्वत को कानून का रूप दे दिया जाए।
देश का न्यायतंत्र भ्रष्टाचार से आकंठ डूबा है। एक के बाद एक न्यायाधीशों पर रिश्वत के आरोप लग रहे हैं। अभी जो सबसे अधिक चर्चित मामले हैं, उसमें कोलकाता हाईकोर्ट के सिटिंग जज सोमित्र सेन का मामला है। उन पर आरोप है कि जब वे हाईकोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे थे, तब 1993 में उन्होंने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया और शिपिंग कापरेरेशन ऑफ इडिया के बीच हुए विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार हो गए। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से सौमित्र सेन की नियुक्ति कोर्ट रिसीवर के रूप में की गई। सेन को कहा गया कि ‘सेल’ द्वारा जितने भी माल को रिजेक्ट किया गया है, उसकी सूची तैयार करें। इस माल को बेचकर उस रकम को एक अलग खाते में जमा किया। माल की बिक्री हो जाने के बाद श्री सेन से कहा गया कि इस रकम की 5 प्रतिशत राशि अपने मेहनताने के रूप में रख ले। शेष राशि को एक अलग एकाउंट में जमा कर दिया जाए। 2002 में जब सेल ने अपने माल की बिक्री से मिली रक और उसके ब्याज के बारे में सेन से पूछताछ की , तब वे उसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। तब सेल ने कोर्ट में आवेदन किया। कोर्ट ने सौमित्र सेन को आदेश दिया कि माल के बिक्री की राशि सेल के खाते में जमा कर दे। सौमित्र सेन ने इस आदेश को अनदेखा कर दिया। इस दौरान वे कोलकाता हाईकोर्ट के जज बन गए। बाद में पता चला कि फायरब्रिक्स की बिक्री से कुल 33 लाख 22 हजार रुपए प्राप्त हुए थे। इस राशि को अलग-अलग खाते में जमा किया गया था। हाईकोर्ट के सिंगल जज की बेंच ने फैसला दिया कि सौमित्र सेन का यह व्यवहार फौजदारी मामला बनता है। यह गबन का मामला है। फैसले में कहा गया कि सौमित्र सेन उस राशि को ब्याज समेत कुल 52 लाख 46 हजार 454 रुपए जमा करे। सौमित्र सेन के पास इस राशि को वापस देने के अलावा और कोई चारा न था। इस फैसले के बाद कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से सौमित्र सेन को न्यायालयीन कार्य देने पर रोक लगा दी।
भारतीय न्यायतंत्र का एक और सनसनीखेज मामला भी है। जो इस प्रकार है:- के. प्रकाश राम नामक एक आदमी एक बेग में 15 लाख रुपए की कड़कड़ाती नोट लेकर हरियाणा हाईकोर्ट की जज श्रीमती निर्मलजीत कौर के घर पहुँचा। उसने बिंदास होकर जज के हाथ में 15 लाख रुपए का बेग दे दिया। ये शख्स एडीशनल एडवोकेट जनरल संजीव बंसल का कारकून है। इसकी जानकारी जज साहब को थी। 15 लाख रुपए अपने सामने देखकर जज बौखला गई। उसने तुरंत ही पुलिस को फोन किया। पुलिस ने प्रकाश राम की धकपकड़ की। उससे पूछताछ में पता चला कि वास्तव में यह राशि एक अन्य जज निर्मल यादव को देनी थी, नाम के गफलत में वह राशि दूसरी महिला जज के पास पहुंेच गई। प्रकाश राम ने पुलिस को बताया कि यह राशि एडवोकेट जनरल संजीव बंसल के कहने पर पहुँचाई थी। छोटी उम्र में ही एडवोकेट जनरल के पद सँभालने वाले संजीव बंसल की छबि हाईकोर्ट में हाई प्रोफाइल लायर के रूप में है। वकील के रूप में वे कोई छोटे मामले पर हाथ भी नहीं रखते थे। पंजाब के कांग्रेसी नेताओं के साथ संजीव बंसल के धनिष्ठ संबंध थे। वे कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के दौरान अपना खजाना ही खोल देते थे। एक कांग्रेसी नेता ने तो उन्हें एक स्पोर्ट्स कार भी भेंट की थी। संजीव बंसल के पास अपनी तीन लक्जरी कार है। वे पंजाब के अनेक रसूखदारों का केस लड़ने के लिए विख्यात हैं।
सीबीआई का कहना है कि उक्त 15 लाख रुपए निर्मल यादव के बदले निर्मलजीत कौर के बंगले पहुँच गए। इसी कारण पूरा मामला सामने आ गया। मामला सामने आते ही निर्मल यादव अवकाश पर चली गईं। उन्होंने इस पूरे मामले में स्वयं को निर्दोष बताया। लेकिन सूत्र बताते हैं कि निर्मल यादव के संजीव बंसल से अच्छे संबंध थे। निर्मल यादव ने 24 अगसत को हिमाचल प्रदेश के सोलन में 15 बीघा जमीन खरीदी है, यह जानकारी बाहर आई। यह पता चलते ही पंजाब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति ने निर्मल यादव को मिलने के लिए बुलाया। वहाँ पर निर्मल यादव ने कहा कि क्या कोई हाईकोर्ट जज कानूनी रूप से जमीन नहीं खरीद सकता?
अब संजीव बंसल के बारे में जान लें। अभी उनकी उम्र केवल 43 वर्ष है। एक जूनियर एडवोकेट के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाले संजीव ने 1992 में स्वतंत्र प्रेेक्टिस शुरू की। उसके पास राजनेताओं और उद्योगपतियों के प्रापर्टी के मामले अधिक आते। उसने शायद ही कोई फौजदारी मामला अपने हाथ में लिया हो। केवल दस वर्ष की प्रेक्टिस में उसने दिल्ली के पॉश इलाके में अपना बंगला बना लिया, जिसकी कीमत दस करोड़ रुपए है। इसने पंजाब सरकार के जितने भी मुकदमे लड़े, उसमें से अधिकांश में सरकार की हार ही हुई है। उसके बाद भी उसकी समृद्धि लगातार बढ़ती रही। इन मामलों की भी सीबीआई जाँच चल रही है।
इस तरह से भारत का न्यायतंत्र लगातार खोखला होता जा रहा है। इस प्रश्रय दे रहे हैं हमारे देश के कथित भ्रष्ट राजनेता। सुप्रीम कोर्ट की इस दिशा में बार-बार की जाने वाली टिप्पणी भी असरकारक सिद्ध नहीं हो पा रही है। लोगों का कानून पर सेविश्वास उठता जा रहा है। यदि इस दिशा में शीघ्र ही कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

माँ के चरित्र को नया आयाम दिया निरुपा राय ने



हिन्दी सिनेमा में निरुपा रॉय को ऐसी अभिनेत्नी के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने अपने किरदारों से मां के चरित्न को नया आयाम दिया । निरुपा राय मूल नाम कोकिला बेन का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के बलसाड में एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ। गौरवर्णी होने के कारण गाँँव मंे उन्हें ‘धोरी चकली’ कहकर पुकारते थे। उनके पिता रेलवे में काम किया करते थे। निरुपा राय ने चौथी तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उनका विवाह मुंबई में कार्यरत राश¨नग विभाग के कर्मचारी कमल राय से हो गया । शादी के बाद निरुपा राय मुंबई आ गई । उन्हीं दिनो निर्माता -निर्देशक बी एम व्यास अपनी नई फिल्म रनकदेवी के लिए नए चेहरों की तलाश कर रहे थे। उन्होंने अपनी फिल्म में कलाकारों की आवश्यकता के लिए अखबार में विज्ञापन निकाला । निरुपा राय के पति फिल्मों के बेहद शौकीन थे और अभिनेता बनना चाहते थे । कमल राय अपनी पत्नी को लेकर बी एम व्यास से मिलने गए और अभिनेता बनने की पेशकश की, लेकिन बी एम व्यास ने साफ कह दिया कि उनका व्यक्तित्व अभिनेता के लायक नही है। लेकिन यदि वह चाहे तो उनकी पत्नी को फिल्म में अभिनेत्नी के रूप में काम मिल सकता है। फिल्म रनकदेवी में निरुपा राय 150 रुपए माह पर काम करने लगी, लेकिन बाद में उन्हें इस फिल्म से अलग कर दिया गया ।
निरुपा राय ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत 1946 में प्रदíशत गुजराती फिल्म गणसुंदरी से की । वर्ष 1949 में प्रदíशत फिल्म हमारी मंजिल से उन्होंने ¨हदी फिल्म की ओर भी रुख कर लिया। ओ पी दत्ता के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उनके नायक की भूमिका प्रेम अदीब ने निभाई। उसी वर्ष उन्हंे जयराज के साथ फिल्म गरीबी में काम करने का अवसर मिला । इन फिल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेत्नी के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गई। वर्ष 1951 में निरुपा राय की एक और महत्वपूर्ण फिल्म हर हर महादेव प्रदíशत हुई। इस फिल्म में उन्होंने देवी पार्वती की भूमिका निभाई। फिल्म की सफलता के बाद वह दर्शकों के बीच देवी के रूप में प्रसिद्ध हो गई । इसी दौरान उन्होंने फिल्म वीर भीमसेन में द्रौपदी का किरदार निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया । पचास और साठ के दशक में निरुपा राय ने जिन फिल्मों में काम किया उनमें अधिकतर फिल्मों की कहानी धाíमक और भक्तिभावना से परिपूर्ण थी । हालांकि वर्ष 1951 में प्रदíशत फिल्म ¨सदबाद द सेलर में निरुपा राय ने नकारात्मक चरित्न भी निभाया। वर्ष 1953 में प्रदíशत फिल्म दो बीघा जमीन निरुपा राय के सिने कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई । विमल राय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में वह एक किसान की पत्नी की भूमिका में दिखाई दी। फिल्म में बलराज साहनी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। बेहतरीन अभिनय से सजी इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई
वर्ष 1955 में फिल्मिस्तान के बैनर तले बनी फिल्म मुनीम जी निरुपा राय की अहम फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने देवानंद की मां की भूमिका निभाई। फिल्म में अपने सशक्त अभिनय के लिए वह सर्वŸोष्ठ सहायक अभिनेत्नी के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई। लेकिन इसके बाद छह वर्ष तक उन्होंने मां की भूमिका स्वीकार नही की। वर्ष 1961 में प्रदíशत फिल्म छाया में उन्होंने एक बार फिर मां की भूमिका निभाई । इसमें वह आशा पारेख की मां बनी। फिल्म में भी उनके जबरदस्त अभिनय को देखते हुए उन्हें सर्वŸोष्ठ सहायक अभिनेत्नी के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1975 में प्रदíशत फिल्म दीवार निरुपा राय के कैरियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है । यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने अच्छाई और बुराई का प्रतिनिधित्व करने वाले शशि कपूर और अमिताभ बच्चन के मां की भूमिका निभाई। फिल्म में उन्होंने अपने स्वाभाविक अभिनय से मां के चरित्न को जीवंत कर दिया । निरुपा राय के सिने कैरियर पर नजर डालने पर पता चलता है कि सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की मां के रूप में उनकी भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है। उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका निभाई। इसके बाद खून पसीना, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी, सुहाग, इंकलाब, गिरफ्तार, मर्द और गंगा जमुना सरस्वती जैसी फिल्मों में भी वह अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका में दिखाई दी । वर्ष 1999 में प्रदíशत फिल्म लाल बादशाह में वह अंतिम बार अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका में दिखाई दी। निरुपा राय ने अपने पांच दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया। उनकी कैरियर की उल्लेखनीय फिल्मों में कुछ है सती सुकन्या, श्री विष्णु भगवान, इज्जत, भक्त पुराण, नौकरी, औलाद, गरम कोट, भाई-भाई, कंगन, बेजुबान, गुमराह, गृहस्थी, संतान, मुसाफिर, फूलों की सेज, मुझे जीने दो, ¨जदगी, शहनाई, शहीद, राम और श्याम, घर घर की कहानी, पूरब और पश्चिम, गोपी, अभिनेत्नी, कच्चे धागे, रोटी, मां, क्रांति, तेरी कसम, बेताब, मवाली, सोने पे सुहागा, औरत तेरी यही कहानी, प्यार का देवता आदि।

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

हिंदी सिनेमा गत की पहली डांसिग क्वीन थी कुक्कू

भारतीय सिनेमा जगत में अपनी नृत्य शैली और दिलकश अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली न जाने कितनी अभिनेत्रियां हुई, लेकिन चालीस के दशक में एक ऐसी अभिनेत्री भी हुई जिसे डांसिग क्वीन कहा जाता था और आज के सिने प्रेमी शायद उससे अपरिचित होंगे। लेकिन उस समय शोहरत की बुलँदियां छूने वाली उस अभिनेत्नी का नाम कुक्कु था। कुक्कू मूल नाम कुक्के मोरे का जन्म वर्ष 1928 में हुआ था। चालीस के दशक में कुक्कू ने फिल्म .लैला मजनू. के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख दिया। इस फिल्म में उन्हें समूह नृत्य में नृत्य करने का मौका मिला। वर्ष 1945 में प्रदíशत फिल्म .मन की जीत. में उन्हें एक बार फिर से नृत्य करने का मौका मिला। इस फिल्म में उन पर फिल्माया यह गीत .मेरे जोवन का देखा उभार. श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। वर्ष 1946 में कुक्कू को बतौर अभिनेत्नी फिल्म .अरब का सौदागर. और वर्ष 198७ में फिल्म .सोना चांदी. में काम करने का अवसर मिला। लेकिन दुर्भाग्य से दोनोँ ही फिल्में टिकट खिड़की पर असफल साबित हुई, हालांकि कुक्कू पर फिल्माए गीत दर्शकों के बीच काफी पसंद किए गए। वर्ष 1948 में कुक्कू को महबूब खान की फिल्म अनोखी अदा में भी काम करने का अवसर मिला। फिल्म की सफलता के बाद कुक्कू बतौर डांसर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाबी हो गई।
वर्ष 1989 में कुक्कू को निर्माता निर्देशक राजकपूर के बैनर तले बनी फिल्म .बरसात. में काम करने का अवसर मिला। इस फिल्म में मुकेश की आवाज में उन पर फिल्माया यह गीत पतली कमर है तिरछी नजर है उन दिनों श्रोताओं के बीच क्रेज बन गया था और आज भी श्रोताओं के बीच शिद्दत के साथ याद किया जाता है। वर्ष 1951 में कुक्कू को एक बार फिर से राजकपूर की फिल्म .आवारा. में काम करने का अवसर मिला। यूं तो फिल्म आवारा के सभी गीत लोकप्रिय हुए लेकिन कुक्कू पर फिल्माया यह गीत .एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन. आज भी श्रोताओं को झूमने को विवश कर देता है। वर्ष 1958 में किशोर शाहू की बहुचíचत फिल्म .मयूर पंख में गीत.संगीत के विविध प्रसंग इस्तेमाल किए गए थे, लेकिन इस फिल्म में कुक्कू के गीत को शामिल किया गया। इसी तरह फिल्म आन में भी कुक्कू पर एक नृत्य ऐसा फिल्माया गया जिसमें केवल संगीत का इस्तेमाल किया गया था बावजूद इसके कुक्कू ने अपनी नृत्य शैली से दर्शकों को रोमांचित कर दिया। वर्ष 1952 में महबूब खान निíमत इस फिल्म की खास बात यह थी कि यह ¨हदुस्तान में बनी पहली टेक्नीकलर फिल्म थी और इसे काफी खर्च के साथ वृहत पैमाने पर बनाया गया था। दिलीप कुमार प्रेमनाथ और नादिरा की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म से जुड़ा एक रोचक तथ्य यह भी है कि भारत में बनी यह पहली फिल्म थी जो पूरे विश्व में एक साथ प्रदíशत की गई।
पचास के दशक में कुक्कू की लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों जब फिल्म बनने के बाद उसकी पहली झलक वितरक को दिखाई जाती तो वह कहते फिल्म में कुक्कू कहां है बाद में फिल्म में कुक्कू को शामिल किया जाता और उस पर एक या दो गीत अवश्य फिल्माए जाते। कुक्कू को नए डिजाइन की फैशेनबल चप्पल पहनने का शौक था। जब कभी वह फिल्म स्टूडियो में डिजानइनर चप्पलंे या जूते पहनकर आती तो देखने वाले उन्हें देखते रह जाते। माना जाता है कि कुक्कू के पास विभिन्न डिजाइन वाले लगभग 5000 जोड़ी चप्पलें थी। मशहूर नृत्यांगना हेलन को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने के लिए कुक्कू ने अहम भूमिका निभाई। कुक्कू की सिफारिश की वजह से हेलन को शबिस्तान और फिर आवारा .1951. फिल्मों में नर्तकों के समूह में काम करने का करने का मौका मिला। वर्ष 1985 से वर्ष 1965 तक कुक्कू ने फिल्म इंडस्ट्री पर एकछत्न राज किया। उन्होंने आजीवन विवाह नही किया। नितांत अकेले रहने वाली कुक्कू को इस दौरान कैंसर जैसी जटिल बीमारी का शिकार हो गर्द अपने अपने गम को भुलाने के लिए शराब का सेवन करने लगी। फिल्म इंडस्ट्री में लगभग दो दशक तक अपनी नृत्य शैली से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाने वाली कुक्कू 30 सितंबर 1981 को इस दुनिया को अलविदा कह गई। कुक्कू ने अपने दो दशक लंबे सिने करियर में कई फिल्मों में काम किया। उनके करियर की उल्लेखनीय फिल्मों में कुछ है .विद्या,शबनम, पतंगा, पारस, अंदाज, हमारी बेटी, खिलाड़ी, आरजू, बावरेनैन, शबिस्तान, हलचल, मिस्टर एंड मिसेज 55, यहूदी, फागुन, चलती का नाम गाड़ी, गैंबलर, मुझे जीने दो आदि।

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

गांधी का पर्याय खादी की देश में दुर्दशा



डॉ. महेश परिमल

अभी-अभी हमारी आँखों के सामने से गांधी जयंती गुजरी। कई संकल्प याद आए होंगे। कई संकल्पों को पूरा होते देखा भी होगा। नारेबाजी के बीच सत्य और अहिंसा का पाठ भी पढ़ाया गया होगा। मीडिया में तो इसे एक उत्सव के रूप में लिया गया। चारों ओर गांधी के सत्य और अहिंसा की ही चर्चा थी। दूसरीे ओर हमारे ही देश में गांधी का पर्याय बनी खादी इन चर्चाओं से दूर हो गई। खादी जो पहले एक मिशन था, आज कमीशन बनकर रह गई है। गांधी के ही देश में खादी की दुर्दशा के लिए वही लोग दोषी हैं, जो गांधी के वचनों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं। आखिर वह कौन-सी शक्तियाँ हैं, जो खादी को खत्म कर रही हैं?
खादी पर सबसे पहला हमला तो तब हुआ, जब खादी की खरीदी में दिया जाने वाला डिस्काउंट बंद कर दिया गया। पूरे देश में आज भी 7 हजार खादी भंडारों से 10 हजार परिवारों का भरण-पोषण हो रहा है, वह भी इस यांत्रिक युग में। भारत में खादी और ग्रामोद्योग की वार्षिक बिक्री करीब 22 करोड़ रुपए की है। इसके बाद भी आज हमारे देश में सूती कपड़े पहनने का फैशन ही चल पड़ा है। लेकिन युवाओं को खादी की तरफ आकर्षित करने के तमाम सरकारी प्रयास निष्फल साबित हुए हैं। खादी को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड की स्थापना की गई है। इन दिनों चल रहे कामनवेल्थ गेम के लिए बनाए गए खेल गाँव में खादी की एक दुकान लगाई गई है। जहाँ से विदेशी खादी खरीद रहे हैं। पर हमारे देश में खादी का प्रचार पूरी ईमानदारी के साथ नहीं किया गया। इसके लिए सबसे बड़ा दोषी यही खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड रहा है।
सभी जानते हैं कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खादी से बेहतर कोई कपड़ा नहीं है। यही नहीं, खादी से आज भी कई घरों के चूल्हे जल रहे हैं। इससे गाँव के गरीब लोगों को रोजगार मिल रहा है। मिलों में कपड़े बनाने के लिए जिस यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है, उससे ग्लोबल वार्मिग का खतरा उत्पन्न हो रहा है। खादी के लिए इस्तेमाल में लाया जाने वाला कपास भी हमारे ही देश में उत्पन्न होता है। इसके लिए अनाज उत्पादन के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता होती है, उतनी जमीन भी नहीं लगती। इसके बाद भी खादी की मार्केटिंग नहीं होने के कारण खादी की बिक्री लगातार कम होती जा रही है।

जिस किसी ने भी अहमदाबाद में साबरमती आश्रम का दौरा किया है, वह गांधी के विचारों एवं खादी से विशेष रूप से प्रभावित हुआ है। गांधी जी कक्ष में रखे चरखे को देखकर सचमुच एक झुरझुरी सी होती है। यही है गांधीजी का अस्त्र, जिससे उन्होंेने अँगरेजों से लोहा लिया। एक स्पंदन होता है, जो आश्रम के बाहर आते ही समाप्त हो जाता है। करीब 150 वर्ष पूर्व जब हमारे देश में कपड़ों की मिलें नहीं थीं, तब यही खादी ही हमारा वस्त्र थी। इसके कारण लाखों लोगों को रोजगार मिल जाता था। जब यूरोप में यांत्रिक युग शुरू हुआ, तब हालात बदल गए। अँगरेजों ने अपने देश के कपड़ों को पहनना भारतीयों के लिए अनिवार्य कर दिया। इससे खादी का प्रचलन कम होने लगा। हमारे देश से ही कपास विदेश भेजा जाता और वहाँ से सूती कपड़े हम पर थोपे जाते। गांधीजी ने इस बात को समझा और खादी को एक आंदोलन का रूप दिया। उन्होंने यह नारा दिया कि यदि भारतीय विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करें, तो अंगरेजों को हमारे देश से भगाना आसान हो जाएगा। लेकिन उस समय भारतीय मिल मालिकों ने भारतीय कपड़ों की कालाबाजारी कर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया। गांधीजी ने इस बात को समझा और 1920 में अपने अभियान के दौरान गुजरात के विजापुर में देशी चरखा ढ़ॅँूढ़ निकाला। इसके बाद तो उन्होंने स्वयं ही खादी पहनना शुरू कर दिया। इस तरह से खादी को लेकर एक अभियान ही शुरू हो गया। इस के बाद 1947 में जवाहर लाल नेहरू के प्रयासों से खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमिशन की स्थापना की गई।
इसकी स्थापना तो खादी के विकास के लिए की गई थी, पर उसी समय एक भूल के कारण खादी एक अभियान न बन पाई। इस कमिशन की यह विशेषता थी कि इसके अध्यक्ष कोई उद्योगपति या कोई राजनेता ही होता। इनका स्वार्थ मिल-मालिकों से बँधा होता, इसलिए वे खादी के बजाए देश में बने सूती कपड़ों का प्रचार करते। वे खादी को मिलों के कपड़ों की अपेक्षा महँगा बेचने की सिफारिश करते। यही परंपरा आज भी कायम है। फलस्वरूप खादी गरीबों से दूर होती गई। गुजरात के मूर्धन्य कवि उमाशंकर जोशी की पुत्री नंदिनी जोशी जब अमेरिका में अर्थशास्त्र की प्राध्यापक बनी, तब उन्होंने खादी के प्रचार के लिए विशेष रूप से अभियान चलाया। उन्होंने यह माँग रखी कि खादी अन्य कपड़ों के एवज में सस्ती होनी चाहिए। विनोबा भावे को अपने अंतिम समय में खादी के प्रति सरकार की नकारात्मक भूमिका की जानकारी हो गई थी। इसके मद्देनजर उन्होंने नारा दिया ‘खादी को कमिशन नहीं, मिशन बनाया जाए।’ स्व. विनोबा भावे के इस नारे के बाद सरकार ने देश के अनेक हिस्सों में खादी भंडारों की स्थापना की।
खादी भंडारों को विशेष रूप से कर्ज देने एवं कई तरह की रियायतें दी जाने लगीं। पर यह अधिक समय तक नहीं चल पाया। आज खादी भंडारों की हालत बहुत ही खराब है। खादी भंडार के संचालकों को आज भी सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए रिश्वत देने पड़ती है। इसलिए गांधी जी के इन अनुयायियों को यह समझ में आ गया कि यह तो गांधीजी के उसूलों के खिलाफ है। इसलिए उन्होंने रिश्वत देकर सहायता प्राप्त करना बंद कर दिया। उनकी इस सदाशता का लाभ अब वे संस्थाएँ उठा रहीं हैं, जो रिश्वत देकर खादी को और भी अधिक महँगा कर रही हैं। खादी के नाम पर उनका उद्देश्य गरीबों की सेवा न होकर सरकार सहायता प्राप्त करना हो गया है। ये संस्थाएँ अब खादी में कई कपड़ों की मिलावट करने लगी हैं। खादी अपना मूल स्वरूप खोती जा रही है।
ऐसा नहीं है कि खादी के नाम पर और कुछ अच्छा नहीं हुआ। खादी ने आधुनिक ड्रेस डिजाइनरों को भी आकर्षित किया है। 1989 में खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमिशन ने पहली बार मुंबई में एक फैशन शो का आयोजन किया। इस शो के लिए विख्यात ड्रेस डिजाइनर देविका भोजवानी ने खादी के 84 कॉस्टच्यूम तैयार किए। 1990 में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त ड्रेस डिजाइनर रितु कुमार ने भारत की खादी पर ‘ट्री ऑफ लाइफ’ नामक विडियो विजुअल शो का आयोजन किया। इसे दुनियाभर में प्रशंसा मिली। 1997 में इस शो का आयोजन लंदन में किया गया। इससे विदेशियों का रुझान खादी के प्रति बढ़ा। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सरकार ही इस दिशा में ध्यान नहीं दे पा रही है। सरकार की नीयत तो साफ है, पर तंत्र में फैले भ्रष्टाचार के कारण खादी एक अभियान के रूप में नहीं चल पाई। सरकार यदि ईमानदारी से इस दिशा में कड़े कदम उठाए, तो कोई दो मत नहीं कि एक बार फिर खादी अपना रँग जमा सकती है। खादी यदि सस्ती हो जाए, तो यह गरीबों का ही नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग का वस्त्र बन सकती है। आवश्यकता है एक ईमानदारान कोशिश की।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

छँटा भ्रम का कुहासा, फैला खुशियों का उजास



डॉ. महेश परिमल
आखिर छँट गया भ्रम का कुहासा। देश के सबसे बड़े, लम्बे और महत्वपूर्ण फैसले केबाद आम आदमी ने राहत की साँस ली है। ऐसा पहली बार हुआ कि शहरों में अघोषित कफ्यरू लागू हो। लोगों को इस बात की आशंका सबसे अधिक थी कि कहीं बात बिगड़ न जाए। आशंकाओं से सहमी आँखों ने ऐतिहासिक फैसला सुनते ही राहत की साँस ली। लोगों ने इसे संतुलित, धर्मनिरपेक्ष एवं चुनौतीपूर्ण निर्णय निरुपित किया है। एकता की इस आबोहवा का अभिवादन किया जाना चाहिए। अभी लंबी कानूनी लड़ाई बाकी है। इस निर्णय से न तो किसी की जीत हुई है और न ही किसी की हार। मुस्लिमों को तो किसी भी तरह से निराश नहीं होना चाहिए। उन्हें भी विवादित भूमि का एक हिस्सा मिला ही है।
अदालत का फैसला आने से पहले विवाद से जुडे सभी पक्ष यह स्पष्ट कर चुके थे कि मामले का हल आपसी बातचीत के जरिए संभव नहीं है इसलिए न्यायपालिका ही मसले का समाधान करे. अब फैसला आ चुका है. असंतुष्टों के लिए कानून के रास्ते खुले हुए हैं और वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. सुन्नी वक्फ बोर्ड और हिंदू महासभा ने इसका ऐलान भी कर दिया है. फैसले से दोनों की असंतुष्टि के अपने अलग-अलग आधार हैं और इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. क्योंकि एतराज का दायरा कानून और संविधान के भीतर है. लेकिन जरूरी यह है कि इस फैसले के साथ ही एक नई शुरुआत हो. मसले को एक कानूनी मसला मानकर ही आगे बढा जाना चाहिए. इसे भावनात्मक या राजनीतिक आवेश में लाने या रँगने की कोशिश कतई नहीं हो. आम लोगों में जितनी चिंता फैसले को लेकर थी, उससे कहीं ज्यादा आशंका इस बात की थी कि फैसले के बाद क्या होगा? क्या देश एक बार फिर अपने सामाजिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न होता देखेगा या फिर इसे निपटा हुआ मानकर विकास और देश निर्माण की राह में बढ चला जाएगा. फैसले से पहले सभी राजनीतिक दल शांति और भाईचारे की बात कर रहे थे. उन्हें इसी सोच को आगे विस्तार देना होगा. वैसे भी इस बदलते भारत में भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति की जमीन खत्म होती जा रही है. बीते दो दशकों में एक पूरी नयी पीढी जवान हुई है. वह नए दौर की व्यवस्था के बीच नये भारत को गढ रही है. शक्ल लेता यह नया भारत अतीत के प्रेतों को ढोना नहीं चाहता. यही सोच वह भरोसा जगा रहा है जहां उम्मीदें ज्यादा हैं और आशंकाएं कम. अतीत के प्रेतों से मुक्ति जरूरी है।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद ही सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के जफरियाज जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट पर जाने की घोषणा की। इससे समझा जा सकता है कि यह कानूनी लड़ाई लंबी चलेगी। पहले तो सुप्रीमकोर्ट की विभागीय बेंच, उसके बाद फुल बेंच और उसके बाद कानूनी बेंच पर यह मुकदमा लड़ा जा सकता है। यही नहीं, इसके बाद तो संसद के पास निर्णय रद्द करने का भी अधिकार है। कल तक यही गिलानी इस विवाद के समाधान की कोशिशों को हवा में उड़ा देते थे, आज वही इस मामले को आपसी विचार-विमर्श से सुलझाने की बात कह रहे हैं। यदि वे सचमुच ही इस विवादास्पद मामले को आपसी विचार-विमर्श से सुलझाना चाहते हैं, तो इसका समाधान जल्द आ सकता है। इस पूरे मामले पर लखनऊ खंडपीठ की प्रशंसा करनी ही होगी। इसके अलावा देश की जनता का काम भी सराहनीय रहा। विशेषकर मीडिया, जो छोटी-सी बात को बतंगड़ बना देता है, इस मामले में सकारात्मक रहा। एक बोल्ड निर्णय को देशवासियों ने आसानी से पचा लिया। इसमें न तो किसी की हार हुई है और न ही किसी की जीत। सभी को समान रूप से प्रभावित करने वाला निर्णय रहा। अभी भी समझौते के पूरे रास्ते खुले हुए हैं। अभी हालात अनुकूल हैं, इसी परिस्थिति को सँभाले रखने की आवश्यकता है। इसके लिए राजनैतिक दल अपने स्वार्थ की रोटियाँ न सेंक पाएँ, यही कोशिश होनी चाहिए। इसी ईमानदार प्रयास से हो सकता है, एक नया युग। जिसमें सभी सौहार्दपूर्ण वातावरण में साँस ले सकें।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 25 सितंबर 2010

महिलाएँ भी श्राद्ध कर सकती हैं



पितृ पक्ष के दौरान पितरों की सदगति के लिए कुछ खास परिस्थितियों में महिलाओं को भी विधिपूर्वक श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है। गरूड़ पुराण में बताया गया है कि पति, पिता या कुल में कोई पुरुष सदस्य नहीं होने या उसके होने पर भी यदि वह श्राद्धकर्म कर पाने की स्थिति में नहीं हो तो महिला श्राद्ध कर सकती है। इस पुराण में यह भी कहा गया है कि यदि घर में कोई वृद्ध महिला है तो युवा महिला से पहले श्राद्ध कर्म करने का अधिकार उसका होगा। शाों के अनुसार पितरों के परिवार में ज्येष्ठ या कनिष्ठ पुत्न अथवा पुत्न ही न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य तिलांजलि और ¨पडदान करने के पात्न होते हैं। भारतीय संस्कृति में आश्विन कृष्ण पक्ष पितरों को समíपत है। यह कहा गया है कि श्राद्ध से प्रसन्न पितरों के आशीर्वाद से सभी प्रकार के सांसारिक भोग और सुखों की प्राप्ति होती है। आत्मा और पितरों के मुक्ति मार्ग को श्राद्ध कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि जो श्रद्धापूर्वक किया जाए, वही श्राद्ध है । पितृगण भोजन नहीं बल्कि श्रद्धा के भूखे होते हैं। वे इतने दयालु होते हैं कि यदि श्राद्ध करने के लिए पास में कुछ न भी हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आंसू बहा देने भर से ही तृप्त हो जाते हैं।
विधान है कि सोलह दिन के पिृतपक्ष में व्यक्ति को पूर्ण ब्रrाचर्य, शुद्ध आचरण और पवित्न विचार रखना चाहिए। गरूण पुराण के अनुसार पितृपक्ष के दौरान अमावस्या के दिन पितृगण वायु के रूप में %ार के दरवाजे पर दस्तक देते हैं। वे अपने स्वजनों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं और उससे तृप्त होना चाहते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद यदि वे निराश लौटते हैं तो श्राप देकर जाते हैं। श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किए जाने से पितर वर्ष भर तृप्त रहते हैं और उनकी प्रसन्नता से वंशजों को दीर्घायु, संतति, धन, विद्या, सुख एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो श्राद्ध नहीं कर पाते, उनके कारण पितरों को कष्ट उठाने पड़ते हैं। गीता में लिखा है कि यज्ञ करने से देवता के संतुष्ट होने पर व्यक्ति उन्नति करता है, लेकिन श्राद्ध नहीं करने से पितर कुपित हो जाते हैं और श्राप देते हैं। ब्रहम पुराण और गरूण के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितर की तिथि आने पर जब उन्हें अपना भोजन नहीं मिलता तो वे क्रुद्ध होकर श्राप देते हैं जिससे परिवार में मति, रीति, प्रीति, बुद्धि और लक्ष्मी का विनाश होता है।
मार्कण्डेय और वायुपुराण में कहा गया है कि किसी भी परिस्थिति में पूर्वजों के श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए। व्यक्ति सामथ्र्य के अनुसार ही श्राद्ध कर्म करे लेकिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितरों के श्राद्ध के लिए व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं होने की स्थिति मे श्राद्ध कर्म कैसे किया जाए, इस पर विष्णु पुराण का हवाला देते हुए वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के आचार्य डॉ. आत्माराम गौतम ने बताया कि श्राद्ध करने वाला अपने दोनों हाथों को उठाकर पितरों से प्रार्थना करे ., हे पितृगण .मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो उपयुक्त धन है .न ही धान्य आदि। मेरे पास आपके लिए केवल श्रद्धा और भक्ति है। मैं इन्हीें से आपको तृप्त करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि सभी प्रकार के श्राद्ध पितृपक्ष के दौरान किए जाने चाहिए। लेकिन अमावस्या का श्राद्ध ऐसे भूले बिसरे लोगों के लिए ग्राह्य, होता है जो अपने जीवन में भूल या परिस्थितिवश अपने पितरों को श्रद्धासुमन अíपत नहीं कर पाते।
उपनिषदों में कहा गया है कि देवता और पितरों के कार्य में कभी आलस्य नहीं करना चाहिए। पितर जिस योनि में होते हैं, श्राद्ध का अन्न उसी योनि के अनुसार भोजन बनकर उन्हें प्राप्त होता है। श्राद्ध जैसे पवित्न कर्म में गौ का दूध, दही, और %ाृत सवरेत्तम माना गया है। धर्मशा में पितरों को तृप्त करने के लिए जौ, धान, गेहूं.मूंग, सवां, सरसों का तेल, कंगनी, कचनार आदि का उपयोग बताया गया है। इसमें आम, बहेड़ा, बेल, अनार, पुराना आंवला, खीर, नारियल, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, नीलकैथ, परवल, चिरौंजी.बेर, जंगली बेर, इंद्र जौ के सेवन आदि का भी विधान है।तिल को देव अन्न कहा गया है। काला तिल ही वह पदार्थ है, जिससे पितर तृप्त होते हैं, इसलिए काले तिलों से ही श्राद्ध कर्म करना चाहिए। डॉ. गौतम ने बताया कि भारतीय वैदिक वांगमय के अनुसार जीवन लेने के पश्चात प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव रिण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ रिण। पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म करके परिजन अपने तीनों रिणों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार मृत्यु के उपरांत कर्ण को चित्नगुप्त ने मोक्ष देने से केवल इसलिए इन्कार कर दिया था कि उनके ऊपर पितृ ऋण बाकी था। कर्ण ने चित्नगुप्त से कहा- मैने अपनी सारी संपदा सदैव दान-पुण्य में ही समíपत की है, फिर मेरे ऊपर यह कैसा ऋण बाकी है।., चित्नगुप्त ने बताया कि उन्होंने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन उन पर अभी पितृ ऋण बाकी है, जब तक वह इस ऋण से मुक्त नहीं होंग,े उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। धर्मराज ने कर्ण को यह व्यवस्था दी की वह १६ दिन के लिए पुन: पृथ्वी पर जाकर और ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध तर्पण तथा ¨पडदान विधि एवं श्रद्धापूर्वक करें तभी उन्हें मोक्ष मिलेगा।
¨हदू धर्मग्रंथों में वैसे तो श्राद्ध के अनेक भेदों का वर्णन है, लेकिन मत्स्य पुराण में नित्य, नैमित्तिक और काम्य इन तीन भेदों का वर्णन है।यमस्मृति में दो.वृद्धि श्राद्ध और पार्वण श्राद्ध का भी विधान है। विश्वमित्न स्मृति में इन पांच के अलावा सात अन्य.सपिण्डन, गोष्ठी, शुद्ध्यर्थ, कर्माग, दैविक, यात्नार्थ तथा पुष्टच्यर्थ भेद बताए गए हैं। धर्मशाों में यह उल्लेख मिलता है कि धर्म का आचरण करने वाले ब्राrाण को श्रद्धापूर्वक भोजन करवाने से देवता और पितर तृप्त होते हैं।पितृपक्ष में देश के सभी प्रमुख तीर्थस्थानों पर पितरों के लिए ¨पडदान एवं श्राद्ध करना उत्तम माना गया है। परन्तु इस अवसर पर बिहार के प्रमुख तीर्थस्थल गया में देश से ही नहीं, अपितु विदेशों से भी लोग अपने पितरों का श्राद्ध-तर्पण एवं ¨पडदान करने के लिए पहुंचत़े हैं।वाल्मीकि रामायण, आनन्द रामायण, महाभारत, स्मृति और उपनिषद में गया की महिमा का गुणगान किया गया है। उल्लेखनीय है कि गया में किया गया श्राद्ध जीवन में एक ही बार किया जाता है। मान्यता है कि गया में माता-पिता दोनों की मृत्यु के बाद ही जाकर श्राद्ध करना चाहिए। गया में श्राद्ध, ¨पडदान और तर्पण का अनुष्ठान आदि युग से हो रहा है ।विवरण मिलता है कि विष्णु भगवान ने कोटि.कोटि देववृंद की उपस्थिति में ‘गया’ नामक वैष्णव असुर के शरीर पर यज्ञ क्रम में उसे अचल करने के उपरांत वहां श्राद्ध ¨पडदान का आशीर्वाद दिया, जो इस कलियुग में भी जारी है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने भी अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए गया में ¨पडदान किया था। पूरे देश में पूर्व में गया (बिहार) और उत्तर में पिहोवा (हरियाणा) में श्राद्ध का बड़ा महात्म्य है। पिहोवा में पितरों की सद्गति और शांति के लिए ¨पडदान करने का ठीक वैसे ही विधान है, जैसे गया में है। वामन पुराण के अनुसार पिहोवा के समान कोई तीर्थ नहीं है, क्योंकि इसका नाम लेने से ही पाप नष्ट हो जाते हैं। इस स्थान पर शिव का वास है। वामन पुराण के अनुसार अति पुरातन काल में भगवान शिव ने पिहोवा में स्नान किया था। भगवान इंद्र ने भी अपने पितरों का ¨पडदान इसी तीर्थ में किया था। यह वह समय था, जब पिहोवा का महत्व गंगाद्वार हरिद्वार से भी अधिक था।इस तीर्थ का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा। उनके पिता का नाम वेन था, जो कुष्ठ की बीमारी से पीड़ित थे। उन्होंने २१ दिन तक वहां के जल से स्नान किया और उन्हें कुष्ठ से मुक्ति प्राप्त हो गई। जिस स्थान पर वेन का कष्ट दूर हुआ, वहीं सरस्वती के तट पर पृथु ने पिता की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार और ¨पडदान किया। महाभारत के अनुसार वहां स्नान और ¨पडदान करने से श्रद्धालु व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ का फल तो मिलता ही है, उसे मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

125 वर्ष पुराना है अयोध्या विवाद



डॉ. महेश परिमल

24 सितम्बर को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-अपनी तैयारियों में लग गई हैं। उस दिन की भयावहता को लेकर हर कोई आहत है। सभी के सामने 6 दिसम्बर 1992 का दृश्य आ जाता है। हर कोई सहम जाता है। आज भी कई आँखें ऐसी हैं, जिनके सामने यह मंजर किसी भयावह हादसे की तरह गुजर गया है। सूनी आँखें आज भी पूछती हैं कि आखिर उस मासूम ने क्या गुनाह किया था, जो विवादास्पद मंदिर या मस्जिद के सामने फूलों के हार बेचा करती थी। उसके लिए जाति महत्वपूर्ण नहीं थी, वह तो हर किसी को भक्त ही मानती थी। फिर चाहे वह ईश्वर का भक्त हो, या फिर खुदा का बंदा। उसे तो फूलों की माला बेचने से मतलब था। पर वह मासूम भी चल बसी, इस जातिवाद के चक्कर में।
सच तो यह है कि यह विवाद अभी का है ही नहीं। इस विवाद के इतिहास में झाँके, तो स्पष्ट होगा कि जब भी इस विवाद ने अँगड़ाई ली है, कुछ न कुछ हुआ ही है। बात 125 वर्ष पुरानी है। सन् 1885 से लेकर 1949 तक तो इस विवाद को किसी ने भी सुलझाने की कोशिश ही नहीं की। इसे यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश ही होती रही। सबसे पहले सन् 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के सब जज की अदालत में आवेदन किया कि बाबरी मस्जिद के सामने वाली जमीन जिसे राम चबूतरा कहा जाता है, पर उनका मालिकाना हक है। इसलिए वहाँ पर राम मंदिर के निर्माण की उन्हें अनुमति दी जाए। उनका मानना था कि यह राम चबूतरा ही भगवान राम की जन्म स्थली है। ऐसा हमारे पूर्वज मानते हैं। फैजाबाद के हिंदू सब जज पंडित हरिकिशन ने उक्त आवेदन को अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि मस्जिद के इतने करीब राम मंदिर बनाने से इस क्षेत्र की शांति भंग हो सकती है। इस फैसले के सामने महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के ही डिस्ट्रिक्ट जज कर्नल जे.ई.ए. चेम्बियार की अदालत में अपील की। इस ब्रिटिश जज ने उस क्षेत्र का निरीक्षण किया और जो फैसला दिया, वह हिंदुओं के खिलाफ था। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि हिंदू जिस स्थान को पवित्र मानते हैं, वहाँ पर मस्जिद का बनाया जाना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। चूँकि यह घटना 365 वर्ष पहले हो चुकी है, इसलिए इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता। इस मामले को यथास्थिति में रखे जाने में ही सबकी भलाई है। यह फैसला 1886 में आया था।
1886 से लेकर 1949 तक यह विवाद एक तरह से खामोश ही रहा। कथित मस्जिद में सरकारी ताला लगा दिया गया था। सन् 1949 में 22 दिसम्बर की रात किसी ने बाबरी मस्जिद का ताला तोड़कर उसके बीचों-बीच भगवान श्री राम की मूर्ति की स्थापना कर दी। यह बात पूरे देश में बिजली की तरह फैला दी गई कि अयोध्या में श्री राम भगवान प्रकट हुए हैं। यह खबर सुनकर पूरे देश से लोग राम लला के दर्शन करने और उनकी पूजा करने के लिए फैजाबाद आने लगे। जनसमूह की बढ़ती संख्या को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को आदेश दिया कि वे बाबरी मस्जिद से राम लला की मूर्ति को हटवा दें। मुख्यमंत्री ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। यही नहीं फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के.के.के. नायर ने भी मूर्ति हटाने के आदेश मानने के बदले अपनी नौकरी ही छोड़ दी। इसके बाद तो उन्होंने हिंदू महासभा की टिकट से लोकसभा का चुनाव भी जीत लिया। इस दौरान श्री राम लला की मूर्ति तो वहीं रही, लोग बाहर से ही उनके दर्शन करने लगे।
एक सप्ताह बाद जब वातावरण शांत हुआ, तब 28 दिसम्बर को अयोध्या के अतिरिक्त सिटी मजिस्ट्रेट एन.एन. चड्ढा ने इस संपत्ति को सील करने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ स्थानीय निवासी गोपाल सिंह विशारद ने मस्जिद में हिंदुओं को श्री राम लला की पूजा कर सकें, इस आशय का आदेश लेने के लिए सिविल जज की अदालत में 16 जनवरी 1950 को केस फाइल किया। तब इस मामले में आदेश दिया गया कि आम जनता दूर से ही राम लला के दर्शन कर सकती है, पर पुजारी को भीतर जाने दिया जाएगा। इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद की मालिकी का मामला अनिर्णित ही रहा। 1949 में ही अयोध्या के निर्मोही अखाड़े ने उक्त जमीन का मालिकाना हक बताते हुए टाइटल सूट फैजबाद की अदालत में पेश किया। इसके खिलाफ 1961 में अयोध्या निवासी मोहम्मद हाशिम ने मुस्लिमों को वापस करने के लिए आवेदन फैजाबाद की अदालत में किया। इन सभी आवेदनों पर 1983 तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
1983 में विश्व हिंदू परिषद ने रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए अपना आंदोलन तेज कर दिया। इससे पूरे देश में भय का वातावरण तैयार हो गया। इसी बीच अयोध्या के वकील यू.सी. पांडे ने फैजाबाद की जिला अदालत में आवेदन किया कि रामजन्मभूमि पर जो सरकारी ताला लगा है, उसे खोल दिया जाए। इस पर 1986 की पहली फरवरी को श्री पांडे की अर्जी को ध्यान में रखते हुए ताला खोल देने का आदेश दिया गया। इस आदेश को तुरंत अमल में लाया गया। इससे देश भर के हिंदुओं में खुशी की लहर दौड़ गई। उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद के हाईकोर्ट में अपील की। इस पर कोई फैसला तो नहीं हुआ, पर हाईकोर्ट ने इससे संबंधित सारे मामलों को लखनऊ की बेंच में चलाने का आदेश दिया। 6 दिसम्बर 1992 को देश भर से आए कार सेवकों ने कथित बाबरी मस्जिद के ढाँचे को गिरा दिया। इसके बाद भी उक्त जमीन का विवाद नहीं सुलझा।
अब 60 वर्ष बाद इस विवादास्पद मामले का फैसला आने को है। इसे देखते हुए तमाम हिंदूवादी संगठन इस फैसले का राजनीतिक लाभ उठाने और अपने आंदोलन को तेज बनाने की तैयारियों में लग गए हैं। उधर मुस्लिम संगठन भी खामोश नहीं रहने वाले, उन्होंने ने भी अपनी तैयारियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। सरकार को इस बात की चिंता है कि इन हालात से कैसे निपटा जाए? यह तो तय है कि 24 सितम्बर का फैसला देश में उथल-पुथल करवा देगा और एक बार फिर तबाही के मंजर सामने आएँगे।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 13 सितंबर 2010

क्या कहती है प्रधानमंत्री की सख्ती?


डॉ. महेश परिमल
अक्सर यह कहा जाता है कि जो खामोश तबियत के होते हैं, उनके गुस्से से बचना। इसे सच कर दिखाया है हमारे प्रधानमंत्री ने। इस बार तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं छोड़ा। इससे लगता है कि अब हमारे प्रधानमंत्री के तेवर बदल रहे हैं। लोगों का मानना है कि यदि हमारे प्रधानमंत्री अपने तेवर इसी तरह हमेशा तीखे रखें, तो वे एक अच्छे राजनेता बन सकते हैं।अब तक हमारे प्रधानमंत्री की छवि एक डरपोक किस्म के व्यक्ति की रही है। ऐसे लोगों को ढीला, मितभाषी और शांत प्रकृति का भी कह सकते हैं। ऐसे लोग जब कुछ कड़ा बोलते हैं, तब लगता है कि वे अपने स्वभाव के विपरीत कुछ कर रहे हैं। पर ऐसा नहीं है, ऐसे लोग ही कभी-कभी आक्रामक रवैया अपनाते हैं, जिसे देखकर लोग स्तब्ध रह जाते हैं।
सोमवार को प्रधानमत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ८क् मिनट तक जिस तरह से तीखे कटाक्ष किए हैं, उसे उनके व्यवहार से एकदम अलग माना जा सकता है। अपने तीखे तेवर से ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कह दिया कि वह अपनी हद पर रहे। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जिस सख्ती से कहा था कि अनाज यदि सँभाल नहीं पा रहे हैं, तो उसे गरीबों में मुफ्त मंे बाँट दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती किसी को रास नहीं आई। डॉ. सिंह ने कह दिया कि नीति विषयक जैसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ऐसी टिप्पणी न करे, जिसे मीडिया गलत तरीके से प्रचारित करे।
प्रधानमंत्री ने अपने बारे में साफ शब्दों में कह दिया कि मैं अभी रिटायर नहीं होना चाहता। इस तरह से उन्होंने उन लोगों के मुँह सिल दिए, जो यदा-कदा उनके रिटायरमेंट की बात कहते नहीं थकते थे। चलते-चलते उन्होंने केबिनेट में परिवर्तन के संकेत भी उन्होंने दे दिए। यह भी कह दिया कि केबिनेट में युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। अपनों से संवादहीनता की बात को भी उन्होंने पूरी तरह से नकार दिया। जो राजनीति की थोड़ी भी समझ रखते हैं, वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जवाहर लाल नेहरु और सरदार पटेल के बीच पत्रयुद्ध चलता था। यही नहीं, इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच भी कई विवाद थे। इसके अलावा इंदिरा गांधी और युवा तुर्क चंद्रशेखर के बीच खींचतान से सभी अवगत हैं। इस तरह के उदाहरण देकर प्रधानमंत्री ने यह संकेत दे ही दिया कि राजनीति में तो यह सब होता ही रहता है। इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यही बात यदि कोई दूसरा प्रधानमंत्री कहता, तो आश्चर्य नहीं होता, पर यही शब्द जब हम डॉ. मनमोहन सिंह के मुँह से सुनते हैं, तो आश्चर्य होता ही है। क्यांेकि मनमोहन सिंह की छवि मितभाषी, शांत और विनम्र नेता की है। अब यदि वे ऐसी सख्ती बता रहे हैं, तो उसके पीछे आखिर क्या है? यह परिवर्तन भला आया कहाँ से?
अक्सर डॉ. मनमोहन सिंह के ढीलेपन की चर्चा चलती रहती है। उनके इस व्यवहार पर काफी टीका-टिप्पणी भी होती रही है। देश का शासन डॉ. मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि सोनिया गांधी चला रहीं हैं। राहुल गांधी ही अगले प्रधानमंत्री होंगे। ऐसा भी लगातार कहा जा रहा है। केबिनेट से भी इस तरह की आवाजें उठती रहती हैं। इन सब बातों का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री ने यह समय चुना। अपनी नम्रता को दूर रखते हुए उन्होंने सख्ती से जवाब दे दिया। इतनी सख्ती दिखाकर अब वे पुन: मौनव्रत धारण कर लेंगे, ऐसा माना जा रहा है। उनका यह मौनव्रत तब तक चलेगा, जब तक बोलना उनके लिए अनिवार्य नहीं होगा। डॉ. सिंह इसके पहले भी ऐसा कर चुके हैं। लेकिन उसकी तीव्रता ऐसी न थी, जो सोमवार को देखने को मिली। इसके पहले 16 जून को ही प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से दो टूक कहा कि वे अपने देश से भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकवाद को रोकने के लिए कार्रवाई करें। अभी 26 जुलाई को ही गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह की गिरफ्तारी के पीछे राजनीतिक साजिश होने के भाजपा के आरोपों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कांग्रेस जांच ब्यूरो नहीं है। उन्होंने भाजपा के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि केंद्र ने जांच की प्रRिया को किसी भी तरह से प्रभावित करने की कोशिश नहीं की है।
वैश्विक परमाणु सुरक्षा में भाग लेने वाशिंगटन पहुंचे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के तेवर देखने लायक थे। अमरीकी राष्ट््ररपति बराक ओबामा से मुलाकात में मनमोहन सिंह ने उन्हें भारत की अपेक्षाओं का ऐसा पाठ पढ़ाया कि ओबामा को उनके सामने झुकना पड़ा। इसके तत्काल बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने पाक को खरी-खरी सुना दी। कूटनीति यह कहती है कि कभी-कभी शालीनता के साथ नाराजगी जताना चाहिए और मनमोहन सिंह ने यही किया।
उन्होंने भारत की चिंताओं और सरोकारों को जिस दृढ़ता से पेश किया, उस कारण ओबामा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी को साफ-साफ कहा कि वह मुम्बई हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करे। उन्होंने गिलानी से यह भी कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने को लेकर गंभीर है और उनकी भी यही इच्छा है कि पाक सरकार 26/11 के आरोपियों पर कार्रवाई कर रिश्ते को आगे बढाने की पहल करे।
प्रधानमंत्री जी की यह सख्ती देखकर लोग तो यह मानने लगे हैं कि ऐसी सख्ती हमेशा बरकरार रहे। एक कुशल राजनेता को ऐसी सख्ती ही शोभा देती है। यह भी कहा गया है कि इंसान अपना स्वभाव बदल सकता है, पर आदत नहीं।
डॉ महेश परिमल

शनिवार, 11 सितंबर 2010

गणेश जी का सफर, तब से अब तक







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