शुक्रवार, 14 मई 2021

बाल रामकथा - अध्याय 1 अवधपुरी में राम



अवधपुरी में राम 
इस कथा का आनंद लीजिए, ऑडियो के माध्यम से...

मंगलवार, 11 मई 2021

कविता - कुरुक्षेत्र

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इस कविता का आनंद लीजिए ऑडियो की मदद से


सोमवार, 10 मई 2021

नैतिकता के टूटते तटबंध

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 10 मई 2021 को प्रकाशित





09 मई  2021 को राजनांदगाँव से प्रकाशित सबेरा संकेत में










अमर उजाला के संपादकीय पेज पर 5 मई को प्रकाशित


 

शनिवार, 1 मई 2021

दादाजी कैसे होते हैं...

गिरिराज शिमला में 28 अप्रैल 2021 को प्रकाशित












 

कविताएँ - निदा फ़ाज़ली

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे

ग़ज़लकार निदा फ़ाज़ली की ऐसी ही कुछ रचनाओं का आनंद लीजिए, ऑडियो की मदद से...






मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

मंजिल पाने के उपाय

 


दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 26 अप्रैल 2021 को प्रकाशित














बुधवार, 21 अप्रैल 2021

आलेख - पहाड़ के आँसू - डाॅ. महेश परिमल

इस बार पहाड़ फिर जी भरकर रोया है। पहाड़ को रोना क्यों पड़ा? यह समझने को कोई तैयार ही नहीँ है। बस लोग पहाड़ द्वारा की गई तबाही के आंकड़ों में ही उलझे हैं। संसद में प्रधानमंत्री के आँसू सभी को दिखे, पर पहाड़ के आँसू किसी की नज़र में नहीं आए। बरसों से रो रहे हैं पहाड़। पर कोई हाथ उसकी आंखों तक नहीं पहुँचा। पहाड़ के सिर पर प्यार भरा हाथ फेरने वाले लोग अब गुम होने लगे हें। आखिर रोने की भी एक सीमा होती है। इस रुलाई के पीछे बहुत बड़ा दु:ख है। इस बार यह दु:ख नाराजगी के रूप में बाहर आया है। पहाड़ों को अब गुस्सा आने लगा है। पहाड़ को  हमने सदैव पूजा है। पहाड़ ने हमें हमेशा कुछ न कुछ अच्छा दिया ही है। अगस्त्य ऋषि के सामने पहाड़ भी झुक जाते थे। इसी ऋषि का एक आश्रम उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में है। हमारे देश में पहाड़ों की विशेष पूजा-अर्चना होती है। पहाड़ को कोई नाराज नहीं करना चाहता। पहाड़ सदैव मुस्कराते रहें, इसके लिए मानव कई तरह के जतन करता रहता है। पहाड़ संस्कृति को बचाने में सहायक होते हैं। हमारे पुराणों में पहाड़ सदैव ही पूजनीय रहे हैं। पहाड़ यदि विशाल होना जानते हैं, तो वे झुकना भी जानते हैं। इस पूरे लेख का आनंद लीजिए, ऑडियो की सहायता से...




रविवार, 18 अप्रैल 2021

कविता - गरमी की छुट्टियाँ - भारती परिमल

वो गरमी की छुट्टियाँ 
पुकारती हैं मुझे
वो बचपन का 
बेफिक्र समय
पुकारता है मुझे।

वो परीक्षा शुरू होते ही
उसके खत्म होने की बेताबी
और आखरी पेपर होते ही
स्कूल से घर न लौटने की बेफिक्री
नींद से टूटता रिश्ता
मस्ती से जुड़ता नाता
रिश्ते-नातों की ये 
भूल-भुलैया सताती है मुझे
वो गरमी की छुट्टियाँ 
पुकारती हैं मुझे...

इस कविता को पूरा सुनने का आनंद लीजिए ऑडियो की मदद से...




शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

कॉमेडी के मसीहा-चार्ली चैप्लिन

 



चार्ली चैप्लिन//  वो जब रोता था, तो दुनिया हँसती थी https://pradeshvarta.com/?p=10148

https://pradeshvarta.com/?p=10148




रविवार, 11 अप्रैल 2021

सकारात्मकता की उजास

 अमर उजाला दिल्ली में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित 



दैनिक दावा राजनांदगाँव में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित




दैनिक नवभारत रायपुर में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित





दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 



दैनिक लोेकस्वर बिलासपुर में 1 अप्रैल 2021 को प्रकाशित


                                            दैनिक दावा राजनांदगांव में 1 अप्रैल 2021 को प्रकाशित



शिमला के दैनिक गिरिराज में प्रकाशित

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

बाल कविता - क्यों कवि - सोहनलाल द्विवेदी

क्यों बच्चों को नहीं सुहाता, 
पढ़ना-लिखना, शाला जाना?
खेल-कूद में मन लगता,
दिन भर घर में धूम मचाना?
क्यों भाती मन को रंगरेली?
सुलझाए यह कौन पहेली?

क्यों पतंग उड़ती है ऊपर?
क्यों न कभी नीचे को आती?
और गेंद फेंको जो ऊपर,
तो वह फौरन नीचे  आती।
चोट लगाते ठेला-ठेली
सुलझाए यह कौन पहेली?

कवि - सोहनलाल द्विवेदी




इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...



कविता - करती हैं लहरें मधुर गान - ठाकुर गोपाल शरण सिंह

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

जगती के मन को खींच खींच
निज छवि के रस से सींच सींच
जल कन्यांएं भोली अजान

सागर के उर पर नाच नाच,करती हैं लहरें मधुर गान।

प्रातः समीर से हो अधीर
छू कर पल पल उल्लसित तीर
कुसुमावली सी पुलकित महान

सागर के उर पर नाच नाच, 

करती हैं लहरें मधुर गान।

संध्या से पा कर रुचिर रंग
करती सी शत सुर चाप भंग
हिलती नव तरु दल के समान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

करतल गत उस नभ की विभूति
पा कर शशि से सुषमानुभूति
तारावलि सी मृदु दीप्तिमान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

तन पर शोभित नीला दुकूल
है छिपे हृदय में भाव फूल
आकर्षित करती हुई ध्यान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

हैं कभी मुदित, हैं कभी खिन्न,
हैं कभी मिली, हैं कभी भिन्न,
हैं एक सूत्र से बंधे प्राण,

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

- ठाकुर गोपाल शरण सिंह

इस कविता का आनंद लीजिए ऑडियो की मदद से...




शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गीत - जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम - कवि - जयकृष्ण राय तुषार

जहाँ वंशी गूँजे हर शाम |
किशोरी जी का जो छवि धाम 
जहाँ पर कृष्ण रूप में राम !
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ भगवान भक्त के दास 
सूर ,वल्लभ ,स्वामी हरिदास ,
जहाँ राजा से रंक का मेल 
सुदामा कृष्ण का सुंदर खेल ,
जहाँ यमुना का क्रीड़ाधाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ बस प्रेम है द्वेष न राग 
जहाँ हर मौसम होली ,फाग ,
जहाँ फूलों में इत्र सुवास 
जहाँ उद्धव जी का परिहास ,
जहाँ संतो का सुख हरिनाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ गीता का अमृत पान 
गोपियों का नर्तन -मधु गान ,
जहाँ मिट जाते दुःख -संताप 
पुण्य का उदय ,अस्त हो पाप ,
है जिसके वश में माया ,काम 
वही है वृंदावन का धाम |

जहाँ गिरि गोवर्धन का मान 
इन्द्र का टूटा था अभिमान ,
जहाँ गायों का पालनहार 
जहाँ भक्तों के मोक्ष का द्वार 
जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम
वही है वृन्दावन का धाम |


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
इस कविता का आनंद लीजिए, ऑडियो की सहायता से...


गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

कविता - मुहावरों के रंग - भारती परिमल

उम्र पचपन में याद आता है बचपन
कैसे थाली के बैंगन थे, बिन पेंदे के लोटे थे
नाच ना जाने आँगन टेढ़ा मानकर
यहाँ-वहाँ भटकते हम भी सिक्के खोटे थे
खरबूजे को देख जैसे खरबूजा रंग बदलता है,
हम भी खरबूजे और गिरगिट से रंग बदलते थे
बाबूजी के आगे तो दाल गल नहीं पाती थी,
पर माँ को नाकों चने चबवाते थे।
मस्ती की पाठशाला में
तिल का ताड़, राई का पहाड़ बनाया करते थे
 इस कविता का आनंद  लीजिए ऑडियो की सहायता से...

 




बुधवार, 31 मार्च 2021

रेडियो रूपक - स्मृतियों का सपनीला संसार

पद्मश्री से विभूषित भूरी बाई के चित्रकर्म पर केंद्रित रूपक 
स्मृतियों का सपनीला संसार, जिसके लेखक हैं - डॉ महेश परिमल। इसे आकाशवाणी से मंगलवार, 30 मार्च 2021 को रात 9:30 बजे प्रसारित किया गया। इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता - राकेश  ढौंडियाल  हैं। इस रूपक में पद्मश्री डॉ. कपिल तिवारी, बसंत निर्गुणे और शंपा शाह ने भूरी बाई के चित्रों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। आप भी इस रेडियो रूपक का आनंद इस ऑडियो की सहायता से लीजिए...




कविता - अंतर तो अंतर होता है - भारती परिमल



अंतर तो अंतर होता है
छोटा या बड़ा कहाँ होता है?
शाम ढलते ही घर आ जाना,
देर रात तक बाहर रहना गलत होता है।
लेकिन उसे बेवक्त आने-जाने से,
कोई कहाँ टोकता है?
अंतर तो अंतर होता है...
घर पर मेहमान आए हैं,
किताबें बंद कर यहाँ आना,
दो कप चाय बना लेना।
साथ में कुछ नाश्ता भी देना होता है
पर उनके जाने के बाद,
खाली कप-प्लेट उठाने को भी
कोई कहाँ टोकता है?
अंतर तो अंतर होता है...
बर्थडे पार्टी में नई ड्रेस और
दोस्तोंका घर आना ही काफी होता है
पर उसे बर्थडे पर 
बाहर मौज-मस्ती करने से
कोई कहाँ टोकता है?
अंतर तो अंतर होता है...
ऑडियो द्वारा इस कविता का आनंद लीजिए...

मंगलवार, 30 मार्च 2021

Anamika Kahani

अनामिका परिवार में ईश्वर के अनुपम वरदान की तरह आई थी। चंद्र की सोलह कलाओं की तरह उसका रूप निखरता ही जा रहा था। कोई उसे इन्द्रलोक की अप्सरा कहता तो कोई परीलोक की सबसे सुंदर परी। उसकी सुंदरता की तारीफ करते हुए लोगों के होंठ थकते नहीं थे। यही कारण था कि धीरे-धीरे अभिमान, घमंड, दर्प, अहंकार ये सारे शब्द शब्दकोश से निकलकर अनामिका के आसपास का एक आवरण बन गए। इनसे लिपटी अनामिका अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी। यदि सहेलियाँ उसके आसपास होती, तो उसे लगता कि ये लोग उसकी सुंदरता के कारण ही उससे दूर नहीं जाना चाहती इसलिए उसे घेरे हुए हैं। परिवार में किसी के विवाह या अन्य अवसर पर सगे-संबंधियों का आना होता, तो वहाँ भी अनामिका पर सभी की निगाहें टिकी रहती। इस विशेष महत्व ने अनामिका को और भी अधिक नकचढ़ी बना दिया था। स्कूल के फेयरवेल में जब उसे मिस ब्यूटी का खिताब मिला, तो वह खुश तो बहुत हुई पर लोगों से यही कहती रही कि ये तो होना ही था। भला मुझसे खूबसूरत कोई है यहाँ? इस तरह अनामिका दर्प का छलकता जाम हाथों में लिए जीवन सफर में आगे बढ़ रही थी... भारती परिमल की इस कहानी का आनंद लीजिए, ऑडियो की मदद से...


शुक्रवार, 26 मार्च 2021

संवादहीनता के खतरे
























 

शुक्रवार, 19 मार्च 2021


14 मार्च 2021 को नवभारत में प्रकाशित




12 मार्च 2021 को जनसत्ता में प्रकाशित




                                                        10 मार्च 2021 को दैनिक जागरण में प्रकाशित






 31 जनवरी  20121 को नवभारत में प्रकाशित

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

रोने लगे हैं पहाड़...


 नवभारत रायपुर में 28 फरवरी को प्रकाशित

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

सीढ़ियों का समीकरण



25 फरवरी दैनिक जागरण दिल्ली








 

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