बुधवार, 1 दिसंबर 2010

सरकार को समर्थन देने की कीमत 1,76,000 करोड़ रुपए



ए जी, ओ जी, टू जी यानी करुणानिधि और ए. राजा

डॉ. महेश परिमल

अपने आप को भ्रष्टाचार से दूर रखने का दंभ भरने वाली कांग्रेस जितना इस दलदल से निकलने की कोशिश कर रही है, वह उतनी ही अधिक घँसती जा रही है। कॉमनवेल्थ गेम में 80,000 करोड़, आदर्श सोसायटी घोटाले में 800 करोड़ और इन आँकड़ों को पार करता हुआ 1,76,000 करोड़ का 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, इन सारे रुपयों से देश के दो करोड़ गरीबों के लिए पक्के मकान बनाए जा सकते थे।

कांग्रेस भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए जितने भी हाथ-पैर मार रही है, वह उतना ही अधिक उसमें उलझती जा रही है। आदर्श हाऊसिंग सोसायटी के मामले में तो उसने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह राज्य का मामला है। कॉमनवेल्थ गेम की तैयारी के दौरान हुए निर्माण कार्यो में हुई लापरवाही और उससे जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में सुरेश कलमाड़ी का विकेट झटककर उसने यह बताने की कोशिश अवश्य की कि वह भ्रष्टाचार को लेकर सचेत है और उसे कदापि बर्दाश्त नहीं करेगी। इस क्रम में आखिर संचार मंत्री ए. राजा की विदाई हो ही गई। किंतु उनके इस्तीफे मात्र से सरकार यह न समझे कि उसका कर्तव्य पूरा हो गया, तो यह गलत है। पूरे देश में स्पेक्ट्रम घोटाले की गूँज सुनाई दे रही है। लगातार तीन वर्ष तक यह घोटाला चलता रहा, प्रधानमंत्री की विवशता का पूरा फायदा करुणानिधि ने उठाया। डॉ. मनमोहन की अपनी सदाशयता के कारण कुछ नहीं कर पाए। उन्हें भी डर था कि इस मामले को अधिक छेड़ा गया, तो सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी। वैसे भी सरकार पर कम दबाव नहीं थे। जयललिता ने भी अपने होने का अहसास केंद्र सरकार को करा ही दिया। जयललिता की गुगली ने ही केंद्र सरकार को सक्रिय किया। कांग्रेस ने अपनी बॉल करुणानिधि के पाले में डालकर यह समझ रही है कि उसने अपने कर्तव्य पूरा किया। करुणानिधि को मनाने के लिए कांग्रेस को खासी मशक्कत करनी पड़ी। सत्ता को बचाए रखने के लिए आखिर क्या-क्या करना पड़ता है, यह इस मामले में साफ देखा जा सकता है। ए. राजा ने जो कुछ किया, उससे कांग्रेस किसी भी रूप में अलग नहीं हो सकती। राजा ने जिस तरह से बेखौफ होकर पूरा घोटाला किया, उसके लिए कांग्रेस को आज नहीं तो कल जवाब देना ही होगा।
सवाल यह उठता है कि पिछले साल जब संसद में पूरे सुबूत के साथ ए. राजा के खिलाफ आरोप लगाए गए थे, तब भी सरकार सचेत नहीं हुई। आखिर इसका क्या कारण है? फिर अब सरकार कह रही है कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच का सवाल ही नहीं उठता। आखिर सराकर कर क्या रही है? एक के बाद एक घोटाले होते रहे, सरकार का धन रसूखदारों की जेब में जाता रहे, समर्थन के नाम पर जो चाहें कर लें, ऐसा केवल भारतीय राजनीति में ही हो सकता है। इस पूरे मामले में सरकार की नीयत साफ दिखाई नहीं दे रही है। अगर वह सचमुच भ्रष्टाचार को दूर करना चाहती है, तो उसे स्वयं से पहल करनी होगी। पूरे स्पेक्ट्रम आवंटन को ही रद्द कर दिया जाना चाहिए। फिर से निविदा बुलाई जानी चाहिए। इससे सरकार की छवि साफ ही होगी।
आखिर ए. राजा को करुणानिधि इतना अधिक प्रेम क्यों करते हैं? 1,76,000 करोड़ का घोटाला कोई छोटी-सी बात नहीं है। टेलीकॉम घोटाले में ए. राजा की मिलीभगत के मामले में जब ‘केग’ की रिपोर्ट आई,उसके पहले सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में ढिलाई बरतने के कारण सीबीआई को लताड़ा था। उधर कांग्रेस ने आदर्श सोसायटी के मामले में बिना किसी जाँच रिपोर्ट की प्रतीक्षा किए बिना उससे इस्तीफा ले लिया, पर इस मामले में कांग्रेस ने इतना विलम्ब क्यों किया? यह एक शोध का विषय हो सकता है। ए. राजा के बारे में यह कहा जाता है कि वे तमिलनाड़ में डीएमके के दलित चेहरे हैं। अगले साल तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने हैं। उसमें राजा के कारण काफी वोट मिल सकते हैं। ऐसे में उनसे इस्तीफा ले लेने से करुणानिधि को एक झटका ही लगा है। उधर जयललिता और करुणानिधि की दुश्मनी जगजाहिर है। दोनों ही परस्पर नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। इस बार जयललिता ने स्पष्ट कह दिया कि यदि करुणानिधि केंद्र से अपना समर्थन वापस ले लेते हैं, तो वे अपना समर्थन देने को तैयार है। ज्ञातव्य है कि दोनों के पास ही 18-18 सांसद हैं।
ए. राजा ने जिस तरह से एक मंत्री के नाते अरबों रुपए का घोटाला किया, उससे स्पष्ट है कि यह राशि उन्होंने अकेले नहीं डकारी। इसे सभी स्वीकारते हैं। तमिलनाडु में तो करुणानिधि के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता, तो फिर यह राजा अकेले इतनी बड़ी राशि हजम कर ही नहीं सकते। पहली बार जब यूपीए ने दिल्ली में सरकार बनाई, तब दूरसंचार विभाग दयानिधि मारन को दिया गया था। बाद में दयानिधि की करुणानिधि में नहीं बनी, इसलिए यह पद ए. राजा को दिया गया। इसके बाद ए. राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी धांधली करते हुए एक चालाकी यह की कि इससे संबंधित कुछ फाइलंे प्रधानमंत्री के पास भेज दीं। यही फाइलें ही कांग्रेस की चिंता का कारण हंै।
जब यह टेलीफोन कांड हुआ, तब केंद्र में यूपीए 1 की सरकार थी। इसमें ए. राजा दूरसंचार मंत्री थे। इसके बाद पिछले वर्ष ही चुनाव हुए और यूपीए 2 की सरकार बनी। इस समय यह चर्चा थी कि ए. राजा को दूरसंचार मंत्री का पद नहीं दिया जाएगा। किंतु करुणानिधि ने जिद की कि राजा को ही दूरसंचार मंत्रालय दिया जाए। प्रधानमंत्री ने सरकार को बनाए रखने के लिए आखिर करुणानिधि की जिद पूरी कर दी। इस पूरे घोटाले पर अंतिम कील ठोकने का काम किया, केग की रिपोर्ट ने। रिपोर्ट में कुल सात मामलों में ए. राजा को दोषी ठहराया गया। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि सन् 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में जो भाव तय किए गए, वे सन् 2001 में प्रवर्तमान भावों के आधार पर किए गए। इस कारण सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह राशि दिल्ली और तमिलनाडु के रसूखदारों में बँट गई। केग के अनुसार 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में वित्त मंत्रालय और कानून मंत्रालय द्वारा ए. राजा को जो सलाह दी, उसकी पूरी तरह से अवहेलना की गई। यही नहीं दूसरसंचार विभाग ने इस संबंध में जो अपने नियम-कायदे बनाए थे, उसे भी भंग किया गया। 2 जी स्पेक्ट्रम के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख दूरसंचार विभाग द्वारा तय की गई थी। इस तारीख में कुछ विशेष लोगों को लाभ दिलाने के लिए फेरफार किया गया। इस संबंध में जो आवेदन पहले प्राप्त हुआ है, उसे पहले आवंटन करने के नियम को भी भंग किया गया है। इस कारण बाद में जिन्होंने आवेदन किए, उन्हें काफी फायदा हुआ। इस आवंटन में पारदर्शिता का पूरी तरह से अभाव था। साथ ही इसके लिए केबिनेट की मंजूरी लेना भी आवश्यक नहीं समझा गया।
एक नजर ए. राजा के व्यक्तित्व की एक झलक
48 वर्ष के ए. राजा कुछ समय पहले तक तमिलनाडु के एक गाँव में वकालत करते थे। दलित होना उनके लिए फायदेमंद रहा। धीरे-धीरे वे आगे बढ़ते रहे। पहले राज्य की राजनीति में सक्रिय हुए। फिर केंद्र की राजनीति में आए। इस दौरान उनकी छवि भ्रष्ट राजनीतिज्ञ की हो गई। कुछ समय पहले ही उन्होंने चेन्नई में हाईकोर्ट जज को फोन करके यह आदेश दिया कि एक मामले में उनके परिचित के पक्ष में फैसला दिया जाए।
डॉ. महेश परिमल

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