शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

सरकार को न तेल दिखा, न तेल की धार



डॉ. महेश परिमल
विजय दिवस पर सरकार ने देश के नागरिकों को दिया महँगाई का तोहफा। किस तरह से मनाएँ हम विजय दिवस। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में भारी इजाफा कर ऐसा झटका दिया है, जिससे उबरने में काफी वक्त लगेगा। सरकार को कब समझ आएगी कि एकमात्र पेट्रोल के दाम बढ़ाने से पूरी अर्थव्यवस्था किस तरह से प्रभावित होती है। आवश्यक जिंसों के दामों में बढ़ोत्तरी होगी, किराए भी बढ़ेेंग, अनाज और सब्जियों की कीमतों पर कोई लगाम नहीं रहेगी। कहाँ तो गूहमंत्री यह कह रहे थे कि दिसम्बर तक महँगाई कम हो जाएगी, वहीं इन हालात में महँगाई कम होने से तो रही।
पेट्रोल के दाम बढ़ाकर सरकार ने एक बार फिर प्रजा को महँगाई की आग में झोंक दिया है। सरकार न तो तेल देख रही है और न ही तेल की धार। घोटालों में फँसी सकरार को हम ‘निर्दयी सरकार’ की उपमा दें, तो गलत नहीं होगा। इसे सरकार की निर्दयता ही कहा जाएगा कि छह महीनों में दो बार पेट्रोल की कीमतों में इजाफा किया गया है। सरकार ने जब से इसे नियंत्रण मुक्त बनाया है, तब से इसके भाव में लगातार बढ़ोत्तरी ही हो रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होती है, तो तुरंत ही हमारे यहाँ पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लग जाती है। आखिर सरकार कर क्या रही है? यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं है। सरकार ने यह भी नहीं सोचा कि इससे महँगाई बढ़ेगी ही, साथ ही लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा। जिस तेजी से पेट्रोल-डीजल के दाम बढें़ हैं, उस तेजी से लोगों की आय नहीं बढ़ पाई है। एक तरह से सरकार ने तेल कंपनियों को लूटने की खुली छूट दे दी है। जब भी पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें बढ़ीं है, राज्य सरकारों का मुनाफा भी बढ़ा है। फिर भी इसके दामों पर नियंत्रण नहीं किया गया है।
सरकार हमेशा इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से देखती है। जब कच्चे तेल की कीमत 28 डॉलर प्रति बैरेल हो गई थी, तब तो पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गई थी। अब जब दाम बढ़ रहे हैं, तो सरकार भी विवश हो जाती है। आखिर ऐसा क्या है इस समीकरण में, जिसमें दाम बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प होता है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अच्छे अर्थशास्त्री हैं, पर क्या वे भी यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इस तरह से महँगाई बढ़ेगी, तो फिर नागरिकों के पास क्या विकल्प रहेगा? सोचना उनके बस की बात नहीं है। तभी तो सरकार घोटाले में फँसी रह गई और उधर उनकी विदेश यात्रा भी हो गई। संसद का पूरा सत्र घोटाले की भेंट चढ़ गया। पर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही। विपक्ष पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर एक बार फिर भारत बंद का आह्वान करेगा, उसके बाद खामोश हो ेजाएगा। आखिर क्या होगा भारत बंद से? मजदूरों की एक दिन की रोजी-रोटी छिनी जाएगी, बस, इसके अलावा उनकी दृष्टि में कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।
एक जुलाई को 55 रुपए 30 पैसे के दाम में मिलने वाला पेट्रोल आज 60 रुपए लीटर मिलने लगा है। 6 महीने पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत 77 डॉलर थी, आज 90 डॉलर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तो कीमतें बढ़ती ही रहेंगी, तो क्या हम उसके हाथों में विवश रहें? क्या कोई ऐसा उपाय नहीं ढूँढा जा सकता, जिससे आम नागरिकों को राहत मिले। अक्टूबर में मुद्रास्फीति 8.58 प्रतिशत थी, जो नवम्बर में घटकर 7.48 प्रतिशत हो गई। इस हालत में सरकार तेल की कीमतों में वृद्धि कर एक तरह से आम नागरिकों को महँगाई की आग में झोंक दिया है। सरकार की यह व्यापारिक दृष्टि प्रजा को भिखारी ही बनाएगी।
एक उपाय है, यदि इस पर अमल किया जाए, तो पेट्रोल की कीमत दो रुपए कम हो सकती है। इसके लिए राज्य सरकारों को थोड़ा उदार बनना होगा। वैसे इस मूल्य वृद्धि से राज्य सरकारों के खजाने में काफी इजाफा होने वाला है। देश में डीजल-पेट्रोल पर संभवत: सबसे ज्यादा टैक्स लेने वाली मप्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि हम इस पर टैक्स क्यों घटाएँ? इसीलिए पेट्रोल-डीजल का कारोबार हमेशा से ही हर राज्य सरकार के खजाने के लिए मुफीद रहा है। मप्र सरकार ने इस पर 28.75 फीसदी प्रति लीटर टैक्स लगा रखा है। यानी मप्र सरकार को यहां बिकने वाले पेट्रोल से प्रति लीटर लगभग 17 रुपए मिलते हैं। लाखों लीटर रोज बिकने वाले पेट्रोल से आ रही इस ‘लक्ष्मी’ का मोह मप्र के भी सिर चढ़कर बोलता है। नई मूल्य वृद्धि से करोड़ों की अतिरिक्त आय हो सकती है। उत्पाद शुल्क का एक हिस्सा और राज्य सरकार द्वारा लगाए जा रहे सभी कर ‘एड वेलोरम’ लगाए जाते हैं यानी ये कर मात्रा पर नहीं बल्कि कीमत पर लगाए जाते हैं। अगर कीमत बढ़ेगी तो कर की दर भी बढ़ेगी। विशेषज्ञ बताते हैं कि मात्रा के आधार पर कर लगाने से दाम में करीब 2 रूपए तक की गिरावट हो सकती है।
डॉ. महेश परिमल

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