मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

घोटालों की भेंट चढ़ा संसद का शीतकालीन सत्र



डॉ. महेश परिमल
यह हमें अभी तक शायद पता नहीं है कि संसद की एक दिन की कार्यवाही में आम जनता का कितना खर्च होता है। हमें पता भी हो, तो शायद हम इसे गंभीरता से नहीं लेते। आखिर इस देश में इतने बड़े-बड़े कांड हो रहे हैं, उसमें जनता की मेहनत की कमाई कुछ स्वार्थी तत्वों की जेब में जा रही है। उसके अनुपात में संसद में होने वाला खर्च तो मामूली है। पर यही मामूली खर्च की राशि बताई जाए, तो 146 करोड़ रुपए होती है। यानी संसद की कार्यवाही ठप्प होने के दौरान आम जनता की जेब से 146 करोड़ रुपए ऐसे ही निकल गए। आम जनता के हाथ क्या आया? कुछ नहीं। इस राशि को यदि घोटाले की राशि में जोड़ दिया जाए, तो? कई विधेयक पारित होने से रह गए, केवल दोनों दलों की जिद के कारण। उस जिद ने कितना बड़ा नुकसान आम आदमी का किया है, इसे समझने की जरुरत किसी को नहीं है।
संसद की कार्यवाही ठप्प पड़ गई। पूरा शीतकालीन सत्र जिद की भेंट चढ़ गया। मानो इस देश में स्पेक्ट्रम घोटाल के सामने चर्चा का कोई विषय ही नहीं है। हमारे रणबाँकुरे सांसदों की एक ही रट है कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच केवल जेपीसी से ही कराई जाए। यहाँ जाँच महत्वपूर्ण न होकर जेपीसी महत्वपूर्ण हो गई है। सांसद यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जेपीसी की माँग सरकार कभी नहीं मानेगी। इसलिए जिसे वह नहीं मान रही है, उसी के लिए जिद की जाए। ताकि मामला इसी तरह से आगे बढ़ता रहे। हमारे सांसद यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जनता की मेहनत की कमाई को किस तरह से अपव्यय होने से रोका जाए। जेपीसी से सच्चई सामने आ ही जाएगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। उधर रतन टाटा के बयान से भाजपा को मानो साँप सूँघ गया। भाजपाई खेमा सकते में आ गया है। ऐसे में उन्हें संसद की कार्यवाही ठप्प होने पर ही फायदा है। ताकि अपनी कमजोरी को छिपाने का अवसर मिल जाए।
क्या संसद में चर्चा के लिए अन्य कोई मुद्दा ही नहीं है? कई ऐसे मुद्दे हैं,जिन पर विचार किया जाना है। पर जब संसद की कार्यवाही ही ठप्प हो, तो फिर मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। हाशिए पर गए हुए मुद्दों की फिर चर्चा ही क्योंे की जाए? महँगाई लगातार बढ़ रही है, इस पर किस तरह से लगाम कसी जाए, यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन सांसद अपनी जिद में आकर महँगाई को बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं। वैसे भी उनहें महँगाई की चिंता नहीं है। उन्हें इतना कुछ मिल रहा है कि महँगाई उनके सामने नतमस्तक है। संसद की कार्यवाही ठप्प रहे, इस पर कांग्रेस का भी फायदा है। इसलिए वह भी नहीं चाहती कि संसद में आकर भाजपा उसकी और फजीहत करे। इसलिए दोनों मुख्य दल मिलकर जनता की मेहनत की कमाई को गवाँ रहे हैं। जब दोनों ही दल की सोच ऐसी हो, तो फिर आम-आदमी की पीड़ा किसी कोने में सिसकती ही रह जाती है।
राजनीति की लीला अपरम्पार है। इसे कोई नहीं समझ पाता। आम जनता के प्रतिनिधि ही आम जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं। पाँच वर्ष में एक बार भिखारी बनकर वोट माँग लेते हैं, फिर तो वे राजा हो जाते हैं। हमारी संसद में इतने सुलझे लोग राजनीतिज्ञ हैं। फिर भी कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा है, जिससे हमारे सांसद की सोच को बदला जा सके। आखिर जनता के प्रति उनकी भी जवाबदेही है? राजनीति की गहरी सोच के पीछे आम आदमी की पीड़ा सामने होनी चाहिए। जो अब दिखाई नही देती।
संसद में इतने लम्बे गतिरोध के लिए आखिर दोषी किसे माना जाए? इसके लिए विपक्ष जितना दोषी है, तो फिर सत्तारुढ़ दल भी कम दोषी नहीं है। यह तो साफ दिख रहा है कि सत्तारुढ़ दल ने स्पेक्ट्रम घोटाले को छिपाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके लिए विपक्ष की कमजोरी भी सामने आई। इससे विपक्ष भी इंकार नहीं कर सकता। संसद की गरिमा उसके चलते रहने में ही है और सांसद की गरिमा उसे चलाए रखने में है। पर जब सांसद ही उसे चलाए नहीं रखना चाहते, तो फिर कैसे चल पाएगी संसद? गरिमा तार-तार हो चुकी है। कब, कौन देख पाएगा इस हारी हुई संसद को? शायद कोई नहीं!
डॉ. महेश परिमल

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