गुरुवार, 30 जनवरी 2014

भ्रष्‍टाचार का अड्डा बनते टोल


आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

भ्रष्टाचार का अड्डा बनते टोल प्लाजा
डॉ. महेश परिमल
हाल ही में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में उत्तेजित भीड़ ने टोल प्लाजा पर आग लगा दी। इसका मुख्य कारण था सरकारी एजेंसियों द्वारा गैरकानूनी रूप से की जानी वाली वसूली। सोचो आखिर इस गैरकानूनी काम में कितनों का सहयोग होगा, जो इस तरह से खुले आम वसूली की जा रही हो और पुलिस तो क्या कोई कार्रवाई करने को तैयार न हो। आज देश का किसी भी हाइवे पर चलें जाएं, उस रास्ते पर कमर तोड़ देने वाले टैक्स वाहन मालिकों की हालत ही खराब करके रख देता है। टैक्स की राशि भी तय नहीं होती, काउंटर पर बैठा व्यक्ति जितनी राशि बोल दे, उतना वाहन मालिक को देना ही होता है। आश्चर्य इस बात का है कि जब वाहन मालिक वाहन खरीदते समय ही सारे टैक्स जिसमें रोड टैक्स भी शामिल है, दे देता हे, तो फिर यह अलग से वसूली क्यों? यदि इस दिशा में गहराई से विचार किया जाए, तो स्पष्ट होगा कि अधिकांश टोल प्लाजाओं में गैरकानूनी रूप से वसूली की जा रही है।
आज से 25 वर्ष पहले देश के किसी भी हाइवे या किसी भी रोड पर किसी भी प्रकार का टोल टैक्स वसूल नहीं किा जाता था। इसके बाद भी नए रास्ते और पुल बनते रहते थे। यही नहीं रास्तों की मरम्मत भी हो जाती थी। आम नागरिकों द्वारा सरकार को हर तरह के टैक्स का भुगतान करने से ही सरकार उस धनराशि का उपयोग रेल्वे, रास्ताओं की मरम्मत आदि के लिए करती है। इसी टैक्स से सरकार विकास की पूरी संरचना तैयार करती आई है। इसके बाद भी पहले सरकार इस तरह के टैक्स वसूल नहीं करती थी। जब से टोल टैक्स वाला काम निजी कंपनियों को दिया गया है, तब से इसमें भ्रष्टाचार फैल गया है। अब तो बिना टोल टैक्स के देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाने की सोच भी नहीं सकते। टोल टैक्स वसूली ठेका निजी कंपनियों को मिलने से इसमें धांधली बढ़ गई है। इसमें होता यह है कि टोल टैक्स की पूरी वसूली के बाद भी टैक्स वसूला जाता है। इसमें किसी प्रकार की नैतिकता निजी कंपनियों को आड़े नहीं आती। एक उदाहरण से ही इसे समझा जा सकता है- अहमदाबाद से मेहसाणा के बीच मार्ग की मरम्मत पर 342 करोड़ रुपए खर्च हुए। यहां पर टोल टैक्स की वसूली शुरू हुई। पिछले वर्ष मार्च महीने तक 391 करोड़ रुपए वसूले जा चुके थे, इसके बाद भी अभी तक वसूली जारी है। वडोदरा से हालोल के बीच हाइवे बनाया गया, जिसकी लागत 170 करोड़ रुपए आई। यहां भी पिछले साल मार्च तक 279 करोड़ रुपए वसूले जा चुके थे। वटामण-तारापुर मार्ग बनाने में  100 करोड़ रुपए खर्च आया, इसके एवज में मार्च तक 116 करोड़ रुए वसूले जा चुके हैं। इन तीन रास्तों पर टोल टैक्स लेने का कोई अधिकार सरकार को नहीं है। ऐसे सभी राज्यों में हो रहा है। जब पूरी राशि वसूली जा चुकी है, उसके बाद भी वसूली करना कहां का अधिकार है। सभी राज्यों के बजट में सड़कों की मरम्मत के लिए अलग से राशि का प्रावधान होता है, उसके बाद भी इस नाम से अलग से टैक्स वसूली क्यों? इस तरह से सरकार स्वयं ही भ्रष्टाचार को पनपने में मदद कर रही है।
निजी कंपनियों द्वारा एक बार टोल टैक्स लेना शुरू किया जाता है, तो फिर वह बंद ही नहीं होता। होना तो यह चाहिए कि मरम्मत की राशि वसूले जाने के बाद बंद कर दिया जाना चाहिए या फिर जैसे-जैसे राशि कम होती जाती है, वैसे-वैसे टैक्स की राशि भी कम की जानी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं पाता। सरकारी संरक्षण में टोल टैक्स की राशि लगातार बढ़ती ही रहती है। मुम्बई-पुणो एक्सप्रेस वे शुरू हुआ था, तब कार वालों से 30 रुपए टैक्स लिया जाता था, जो आज बढ़कर 120 रुपए हो गया है। इस हाइ वे को बनाने में 900 करोड़ रुपए खर्च आया था। अभी तक इस हाइ वे पर 2 हजार करोड़ की टैक्स वसूली हो चुकी है। मुम्बई से नासिक जाने के लिए पहले केवल 70 रुपए ही लिया जाता था, आज यह बढ़कर 220 रुपए से ऊपर पहुंच गया है। मुम्बई से अहमदाबाद जाने के लिए करीब 500 रुपए टोल टैक्स वसूला जाता है। दूसरी ओर टोल नाके पर जो टैक्स वसूला जाता है, उसे रजिस्टर में दिखाया कम जाता है। इसलिए टोल की आवक बहुत ही कम हो जाती है। महराष्ट्र की एक समाज सेवी संस्था ने मुम्बई-पुणो हाइवे से गुजरने वाले वाहनों को एक सप्ताह तक गिनना शुरू किया। इसमें उन्होंने पाया कि इस हाइवे पर 13.20 लाख वाहन गुजरे। पर टोल नाके पर जो आवक दर्ज की गई, वह केवल 25 प्रतिशत ही थी। एजेंसियों को टोल टैक्स लेने का ठेका दिया गया है, तब से इसमें दो नम्बर की कमाई बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होगा, तभी यह इतना पनप रहा है।
महाराष्ट्र कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना और भाजपा के नेताओं का शायद टोल टैक्स की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा मिलता होगा, तभी आज तक इस दिशा में कभी कोई सख्ती कार्रवाई नहीं की गई। जब राज ठाकरे ने नवनिर्माण का गठन किया, तब उसे इस कमाई का हिस्सा नहीं मिला, तो आंदोलन की चेतावनी दी। कुछ दिन बाद आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। सभी समझ गए कि आखिर आंदोलन क्यों स्थगित किया गया? कुछ रसूखदार नेताओं ने अपने मत क्षेत्र में टोल टैक्स खत्म करवा दिया। इसमें शरद पवार ने बारामती में और लातुर में स्व. विलासराव देशमुख और नांदेड़ में अशोक चव्हाण शामिल थे। इन्होंने अपने क्षेत्र में लगने वाले टोल टैक्स को खत्म करवा लिया। लेकिन कोल्हापुर में कोई कद्दावर नेता नहीं होने के कारण नागरिकों को टैक्स का भुगतान करना पड़ता था। हाल ही में शिवसेना ने यहां वसूले जाने वाले टोल टैक्स का विरोध करते हुए आंदोलन छेड़ दिया है। देश के अन्य भागों में भी इसी तरह का आंदोलन छेड़ा जाना चाहिए, ताकि खुलेआम होने वाली वसूली पर अंकुश लगाया जा सके। केंद्र सरकार को भी इस दिशा में ध्यान देकर जिन टोल टैक्स नाकों पर वसूली पूरी हो गई है, वहां वसूली बंद कर देने का फरमान जारी करना चाहिए। इस लोकसभा चुनाव के पहले यदि इस दिशा में सख्त कार्रवाई होती है, तो जनता को लुभाने की दिशा में यह एक अच्छा कदम साबित हो सकता है।
  डॉ. महेश परिमल

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