मंगलवार, 24 नवंबर 2015

महाशक्तियों की अवैध संतान है आतंकवाद

डॉ. महेश परिमल
लम्बे समय से भारत पाकिस्तान द्वारा प्रायाेजित आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज उठाता रहा है। पर अमेरिका एवं अन्य देशों ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। इस समय जब फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद रुस के साथ मिलकर फ्रांस ने सीरिया में जो तबाही मचाई है, उसके बाद यह उम्मीद बंधती है कि अब भारत के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार होगा। वेसे देखा जाए, तो आतंकवाद सत्तालोलुप महाशक्तियों की अवैध संतान का ही एक रूप है। इस समय आतंकवाद को पुन: परिभाषित करने की मांग उठ रही है। ऐसे में आतंकवाद पर विचार करते समय यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि सत्तारूढ़ दल के खिलाफ यदि विद्राेह किया जाए, तो उसे क्रांति कहा जाए या आतंकवाद। अक्सर ऐसा होता है कि शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों के खिलाफ जब आवाज उठाई जाती है, विरोध किया जाता है, तब शासक इसे आतंक या विद्रोह की संज्ञा देते हैं, पर एक लम्बे संघर्ष के बाद विरोधी शक्तियां जीत जाती हैं, तो पहले किए गए उनके विद्रोह को क्रांति कहा जाता है। इसलिए आतंकवाद की परिभाषा मुश्किल है। आज हम भगतसिंह, चंद्रशेखर, सुभाष चंद्र बोस को भले की क्रांतिकारी कहें, पर अंग्रेज उन्हें क्रांतिकारी न मानकर हमेशा आतंकवादी ही मानते रहे। इसलिए जो शासक पक्ष की दृष्टि में आतंक है, वह कथित आतंकियों की  दूष्टि में एक क्रांति है। आज फ्रांस ने रुस के साथ मिलकर आईएसआईएस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीरिया पर हमला कर दिया है। अभी फ्रांस भले ही इस लड़ाई में रुस का साथ ले रहा हो, पर उसने यूरोपियन यूनियन से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया है। अगले सप्ताह होने वाली यूरोपियन यूनियन की बैठक में यह मुद्दा विशेष रूप से उछलेगा। यदि इस बैठक में कोई महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया जाता है, तो निश्चित रूप में आतंकवाद पर अंकुश रखने के लिए एक भूमिका तैयार हो ही जाएगी। ऐसा होने से यूरोप की संयुक्त सेना सीरिया के मोर्चे पर आईएस का सामना करेगी। इस दौरान आईएस ने अपने नए वीडियो में अमेरिका, यूरोप के देशों को शोषक, साम्राज्यवादी और अपना हित साधने वाला बताया है। यह भी तय है कि उपरोक्त सभी देश इस्लाम विरोधी होने के कारण आईएस इनका सामना करता रहेगा। अभी आईएस के निशाने पर वाशिंगटन और रुस हैं, इन पर हमले की चेतावनी भी उसने दी है। पहले भी वह इस तरह की धमकी देता रहा है, पर पेरिस पर हुए हमले के बाद अब इसे गंभीरता से लिया जा रहा है।
फ्रांस पर हमले के बाद जी 20 की बैठक में भी आर्थिक मामलों के बदले आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा। एक बार फिर भारत को अपने पुराने आतंकवाद विरोधी प्रस्ताव काे याद दिलाने का मौका मिला है। इसके पहले भी भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में आतंकवाद के संबंध में वैश्विक स्तर पर उठाने का प्रयास कर चुका है। विडम्बना यह है कि अमेरिका और यूरोप समेत कई देश आतंकवाद का शिकार होने के बाद भी आतंकवाद पर वैश्विक स्तर पर व्याख्या करने की कोशिश तक नहीं हुई। आतंकवाद किसे कहा जाए, यह एक गंभीर प्रश्न है। स्थापित सत्ता के खिलाफ आवाजें उठती ही रहती हैं। सत्ता के खिलाफ हथियार उठाना यदि आतंकवाद है, तो आवाज उठाने वाले इसे गुलामी की जंजीरें तोड़ना बताते हैं। आजादी प्राप्त करने का एक हथियार है सशस्त्र विरोध। इसलिए आतंकवाद की व्याख्या करते समय इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है कि सशस्त्र विरोध किन हालात में हुआ? एक की नजर में जो आतंकवाद है, दूसरे की नजर में वही गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए की गई क्रांति। इसके बाद भी यह तय है कि आतंकवाद के खिलाफ पूरा विश्व कभी भी एकजुट हो ही नहीं सकता। इसका मुख्य कारण यही है कि जो एक देश के लिए आतंकवाद है, वही दूसरे देश के लिए आजादी की लड़ाई है। यदि यह न भी हो, तो अंतत: वैश्विक राजनीति का एक हिस्सा तो है ही। उदाहरण के रूप में पाकिस्तान भारत के साथ हमेशा दुश्मनी बनाए रखता है, इसके लिए वह आतंक का सहारा भी लेता है, स्पष्ट है कि आतंकवाद के नाम पर वह भारत को हमेशा परेशान करता है और करता रहेगा। सऊदी अरब का एक चेहरा बहुत ही सीधा-सादा है, जिसमें वह आतंकवाद का विरोध करता दिखाई देता है। पर दूसरी ओर वही आतंकवादियों को हरसंभव मदद भी करता है। यही ईरान भी कर रहा है। क्योंकि यह दोनों देशों ने अपने आप को िशया और सुन्नी के धार्मिक रक्षक घोषित कर रखा है। हालात जब ऐसे हों, तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? इससे ही भारत ने संयुक्तराष्ट्र संघ में सीसीआईटी (काम्प्रेहोन्सेव कन्वेशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म) प्रस्ताव लाने का प्रयास किया है। भारत का लक्ष्य पाकिस्तान और उससे जुड़े आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक को-ऑपरेशन के रूप में पहचाने जाते मुस्लिम देशों का संगठन है, जो भारत में कार्यरत आतंकवादियों को शरण दे रहा है। सीसीआईटी का प्रस्ताव पारित होने से आतंकवाद की
व्याख्या स्पष्ट होगी और आतंकी समूहों पर कार्रवाई करने की दिशा में मार्ग प्रशस्त होगा। इसके बाद भी ऐसा नहीं लगता कि अमेरिका भारत के इस प्रस्ताव को पारित होने देगा। आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने में अमेरिका इसलिए खिलाफ है, क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब से आतंकवाद ने अपने पैर पसारने शुरू किए हैं, उसके पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की कुत्सित विचारधारा ही है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूरे विश्व में अपना एकछत्र राज स्थापित करने के लिए अमेरिका और रुस जैसी महाशक्तियों के बीच होड़ जम गई, इसी के साथ दोनों देशों के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया। दोनों देशों में अणु शस्त्रों के भंडार करने शुरू कर दिए। पूरा विश्व पूंजीनिवेशवाद और साम्यवाद की तर्ज पर छावनी में विभक्त हो गया। इस शीतयुद्ध के दौरान रुस समर्थक देशों में क्यूबा, उत्तर कोरिया, वियेतनाम आदि देशों को अमेरिका आतंकखोर देश लगता था। अमेरिका ने इन सभी देशों के खिलाफ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से युद्ध शुरू कर दिया। रुस के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई। इस दौरान अमेरिका ने स्थानीय यहूदीलॉबी को राजी रखने के लिए अरब विरुद्ध इजरायल के जंग में इजरायल की खूब मदद की। परिणामस्वरूप अलग-थलग पड़े अरब राष्ट्रों ने इजरायल को सबक सिखाने के लिए और उसे गोद में बिठाने वाले अमेरिका के खिलाफ आतंकवादी संगठन तैयार किए। ब्लेक सेप्टेम्बर समेत अन्य कई संगठनों ने जिस तरह से आतंक मचाया, उसके पीछे मुख्य रूप से अमेरिका ही जवाबदार था। 80 के दशक में रशिया के सहयोग से अफगानिस्तान में काफी खून-खराबा हुआ। अफगानिस्तान में अपने पांव पसारने के लिए अमेरिका और रुस दोनों ने ही अपने-अपने समर्थक देशों को मैदान मं उतारा। उस समय रुस के िखलाफ लड़ने वाले देशों को नार्दन एलायंस तालिबान के रूप में पहचाना जाता था। इसी तालिबान को अमेरिका ने भारी मात्रा में शस्त्र और आर्थिक रूप से सहायता की थी। समय के साथ ही तालिबान ने अलकायदा को जन्म दिया और आज वही अल कायदा अमेरिका के लिए खतरा बन गया है। इसके अलावा आज जो इस्लामिक स्टेट्स आफ ईराक एंड सीरिया पूरे देश का ध्यान खींच रहा है, वह भी अमेिरकी करतूतों का ही परिणाम है। अमेरिका की नीति मुख्य रूप से खनिज तेल की प्राप्ति के आसपास घूमती रहती है। विकास की प्रेरक शक्ति के रूप में खनिज तेल का महत्व अच्छी तरह से समझने वाले अमेरिका ने तेल से भरपूर वाले देशों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। उदाहरण के रूप में सऊदी अरब इस समय खनिज तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है। ये अमेरिका का हितैषी है। इसके बाद भी यह देश इस्लामिक विश्व में सबसे प्रभावशाली माना जाता है। 9/11 के हमले के बाद सऊदी अरब द्वारा मदरसों को धार्मिक कारणों से दी जाने वाली मदद के नाम पर दी जाने वाली राशि आतंकियों तक पहुंचने की जानकारी हाथ लगी। इससे अमेरिका सचेत हो गया, अब उसने सऊदी अरब पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है। उधर सुन्नी देश सऊदी अरब को काबू में रखने के लिए अमेरिका ने अपनी कट्‌टर शत्रुता भुलाकर शिया देश ईरान को हवा देने की नीति अपनाई। ईरान के साथ ही अमेरिका के संबध खनिज तेल के कारण ही बिगड़ते रहे हैं। 80 के दशक में अयातुल्ला खुमैनी ने अमेरिकी कंपनियों के आदेश की परवाह न करते हुए उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। ईरान के शाह रजा पहलवी को अमेरिका की शरण लेनी पड़ी। तब से दोनों देशों के बीच कट्‌टर शत्रुता का सूत्रपात हुआ। अमेरिका की यह नीति है कि जो देश खनिज तेल से भरपूर हैं, वे उसकी दासता स्वीकार करे, या फिर संघर्ष के लिए तैयार रहें। ईराक में सद्दाम हुसैन ने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोल था। लिबिया में कर्नल गद्दाफी भी अमेरिका को अपना कट्‌टर दुश्मन मानता था। सीरिया में बशर अल असद की सरकार ने भी अमेरिकी कंपनियों के उस आदेश का विरोध किया था, जिसमें खनिज तेल की कीमत लिबिया नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियां तय करेंगी। इससे अमेरिका ने वहां आंतरिक विद्रोेह को जगा दिया और कर्नल गद्दाफी को भी मरवा दिया। ईरान में सद्दाम हुसैन का भी खात्मा करवा दिया। सीरिया में बशर अल असद का तख्तापलट हो रहा था, तब वहां आईएस का तूफान आ खड़ा हुआ। वास्तव यह आईएस सद्दाम हुसैन के वही साथी हैं, जिनके पास कोई काम नहीं था और अमेरिका से बदला लेना चाहते हैं। इनके पास सशस्त्र संसाधन हैं, इसलिए अल कायदा ने उसे अपनी तरफ से सहायता की। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल कायदा कमजोर होने लगा था, इसलिए अल बगदादी के नेतृत्व में आईएस ने अपना जाल फैलाया। आज उसी आईएस अमेरिका समेत कई देश परेशान हैं। दरअसल तो इन सभी देशों की सीमाहीन सत्तालोलुपता, विस्तारवाद और अतिशय शोषणखोरी के कारण ही आतंकवाद का जन्म होता रहा है। चोर के घर में मुंह छिपाकर रोने वाली कहावत अमेरिका एवं यूरोपीय देशों पर सही उतरती है।  अब जब उस पर आतंकी हमला हुआ है, तब वह समझ रहा है कि आतंकवाद खराब है। इसके पहले भारत ने कई बार आतंकवाद पर अपना रोना रोया था, तब उस पर कोई असर नहीं हुआ। आज वही आतंकवाद को कोसने में सबसे आगे है।
डॉ. महेश परिमल

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