बुधवार, 13 मई 2009

अपने होने का असर दिखाता पानी



डा. महेश परिमल
पानी ने अपने होने का असर दिखाना शुरू कर दिया है। अखबारों की सुर्खियाँ बता रही हैं कि पानी के लिए हाहाकार मचना शुरू हो गया है। अभी तो यह शुरुआत है, गली-मोहल्लों से केवल झगड़े के अब बंद हो गए हैंैं। अब तो सिर-फुटौव्वल की नौबत आ गई है। बहुत ही जल्द इसका विकराल रूप हमारे सामने होगा। पानी अभी भी हमारे लिए राशन जितना महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है, लेकिन जब यही पानी पेट्रोल से भी महँगा मिलेगा, तब शायद हमें समझ में आएगा कि सचमुच यह पानी को हमारे चेहरे का पानी उतारने वाला सिद्ध हुआ।
हमारे देखते-देखते ही पानी निजी हाथों में पहुँचने लगा। पानी का निजीकरण पहले यह बात हम सपने में भी नहीं सोच पाते थे, लेकिन आज जब सड़कों के किनारे पानी की खाली बोतलें, पॉलीथीन आदि देखते हैं, तब समझ में आता है कि यह पानी तो सचमुच कितना महँगा हो रहा है। लोग तो अब यह भी कहने से नहीं चूकरहे हैं कि निश्चित ही अगला विश्वयुद्ध पानी के कारण लड़ा जाएगा। विश्व युद्ध की बात छोड़ भी दें, तो यह कहा ही जा सकता है कि पाकिस्तान से यदि युद्ध हुआ तो उसका एक प्रमुख कारण यह पानी ही होगा।
हमारे मध्यप्रदेश में पानी की कमी लगातार महसूस की जा रही है। धरती की छाती में अनेक छेद ऐसे हो गए हैं, जहाँ से पानी खींचखींचकर हमने उसे पूरी तरह से सुखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। अभी भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। यह हालत यदि आँकड़ों से देखा जाए, तो स्थिति और भी भयावह होगी। आबादी के बढ़ते दबाव के साथ-साथ भू-गर्भ जल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है।
बात शुरू करते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हेडपम्पों से। मध्यप्रदेश में स्थापित तीन लाख 36 हजार 999 हेंडपम्पों में से 33 हजार 600 हेडपम्प खराब हैं। ये घोषित आँकड़ें हैं, पर अघोषित आँकड़ों के अनुसार तो सिंचाई और पेयजल के लिए जगह-जगह धरती की छाती पर छेद किए जा रहे हैं। गर्मी में तो यह सिलसिला और भी तेज हो जाता है। यही हाल देश के हर प्रदेश का है। लोग धरती से पानी निकाल तो रहे हैं, पर उसे रिचार्ज करने का कोई उपाय नहीं करना चाहते। हम कितने नाकारा हो गए हैं। धरती माता ने अपना कर्तव्य पूरा किया, पर हम अपना कर्तव्य भूल गए। लानत है हम पर, जो धरती माता के बेटे होने का दंभ भरते हैं। निश्चित रूप से धरती माँ हमें कभी माफ नहीं करेगी। हमने उसके प्यार के साथ छलावा किया है। उसका दोहन तो खूब किया, पर उसे फिर से सँवारने का काम नहीं कर पाए। आज धरती प्यासी है, वह हमें प्यासा बना रही है, पर हम अभी तक उसके संदेश को नहीं समझ पाए हैं। धरती माँ ने हम पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया और हमने उसे हरियाली तक नहीं दी।

हमने आज नहीं यह नहीं सोचा कि केवल बिजली के लिए हमने एक भरा-पूरा शहर हरसूद खो दिया। यानी पानी के भंडारण के लिए एक शहर दे दिया। फिर भी हमारी भूख कम नहीं हुई है, यह लगातार बढ़ रही है। आज शहरों में रोज ही धरती की छाती पर कई छेद हो रहे हैं, हमारी सरकार अब तक खामोश है। पानी उलीचने का काम हमारे प्रदेश में बखूबी होता है, लेकिन इस धरती के भीतर पानी डालने के काम में पूरा प्रदेश सुस्त है। पेड़ लगातार कट रहे हैं, ऐसे में पानी कैसे जमा हो पाएगा, यह हमने नहीं सोचा। प्रदेश में हजारों आरा मशीनें हैं, जो लगातार काम कर रहीं हैं, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पेड़ों की कटाई कितनी तेजी से हो रही है? वर्षा का पानी रोकना ही एकमात्र उपाय है, जिससे भू-गर्भ जल स्तर में बढ़ोत्तरी हो सकती है। लेकिन वर्षाजल रोकने के लिए अभी तक ऐसा कोई महत्वपूर्ण काम नहीं हुख, जिसे उपलव्धि कहा जाए।
आज कोई भी पानी की गंभीरता को नहीं समझ पा रहा है। गलती इनकी नहीं, बल्कि उन लोगों की है, जिन्होंने उन्हें बताया ही नहीं कि पानी मूल्यवान है। जिन स्थानों में पानी नहीं मिलता या फिर पानी का संकट है, उनसे पूछो कि क्या होता है जल संकट? आज चाहे महानगर हो या फिर कस्बा, पानी की बरबादी हर ओर देखी जा रही है। ऐश्वर्यशाली लोग तो पानी का अपव्यय ऐसे करते हैं, मानो ये पानी उन्हें मुत में मिल रहा हो।
यह सच है कि पानी का उत्पादन कतई संभव नहीं है। कोई भी उत्पादन कार्य बिना पानी के संभव नहीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी की आवश्यकता बनी रहती है। पानी को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय वर्षा जल को रोकना। इसे रोकने के लिए पेड़ों का होना अतिआवश्यक है। जब पेड़ ही नहीं होंगे, तब पानी जमीन पर ठहर ही नहीं पाएगा। अधिक से अधिक पेड़ों का होना याने पानी को रोककर रखना है। दूसरी ओर हमारे पूर्वजों ने जो विरासत के रूप में हमें नदी, नाले, तालाब और कुएँ दिए हैं, उन्हीं का रखरखाब यदि थोड़ी समझदारी के साथ हो, तो कोई कारण नहीं है कि पानी न ठहर पाए। पानी हमसे रुठ गया है। अभी तो यह धरती के 25 मीटर नीचे चला गया है, हमारी करतूतें जारी रहीं, तो यह और भी दूर चला जाएगा, इतनी दूर कि हम कितना भी चाहें, वह हमारे करीब नहीं आएगा।
जल ही जीवन है, यह उक्ति अब पुरानी पड़ चुकी है, अब यदि यह कहा जाए कि जल बचाना ही जीवन है, तो यही सार्थक होगा। मुहावरों की भाषा में कहें तो अब हमारे चेहरें का पानी ही उतर गया है। कोई हमारे सामने प्यासा मर जाए, पर हम पानी-पानी नहीं होते। हाँ, मौका पडने पर हम किसी को भी पानी पिलाने से बाज नहीं आते। अब कोई चेहरा पानीदार नहीं रहा। पानी के लिए पानी उतारने का कर्म हर गली-चैराहों पर आज आम है। संवेदनाएँ पानी के मोल बिकने लगी हैं। हमारी चपेट में आने वाला अब पानी नहीं माँगता। हमारी चाहतों पर पानी फिर रहा है। पानी टूट रहा है और हम बेबस हैं।
डा. महेश परिमल

सोमवार, 11 मई 2009

अब ऑंकड़ों पर टिकी,देश की दशा और दिशा

डॉ. महेश परिमल
एक बार किसी से पूछा गया कि यदि आपके सामने शेर आ जाए, तो आप क्या करेंगे? जवाब था, उस समय मेरा कोई काम नहीं है, जो कुछ करेगा, शेर करेगा। यह करारा जवाब आज के मतदाताओं पर बिलकुल सटीक बैठता है। सभी मतदाताओं ने अपनेर् कत्तव्य का निर्वाह करते हुए मतदान कर दिया। अब उनके हाथ में कुछ भी नहीं है, अब जो कुछ भी होगा, वे विजयी प्रत्याशी करेंगे। मतदान यज्ञ पूर्ण हो गया, अब सभी हार-जीत के समीकरण में उलझ गए हैं। अब ऑंकड़े ही इस देश की दिशा और दशा तय करेंगे। कई अपनी थकान उतार रहे हैं, तो कई भक्ति में लग गए हैं। अब उन्हें मतदाताओं की कोई चिंता नहीं है। भविष्य का फैसला लोगों ने इवीएम मशीन में कैद कर दिया है। कई दिग्गजों के भाग्य का फैसला अब 16 मई को ही होगा।
यदि भारतीय मतदाताओं का दुर्भाग्य है कि जब-तक उनके पास मत देने का अधिकार रहता है, तब तक सभी दलों के नेता उसके आगे-पीछे घूमते हैं। जैसे ही वह अपने इस अधिकार को इस्तेमाल करता है, वैसे ही उससे वह अधिकार पूरे 5 वर्ष तक छीन जाता है। अब नेताओें के आगे-पीछे घूमने की बारी उसकी होती है। बहुत ही मूर्ख है भारतीय मतदाता, नेताओं के आश्वासनों पर वह इतना अधिक विश्वास करने लगता है कि अपने पास रखा एकमात्र अधिकार उसे सौंपने में देर नहीं करता। उसके बाद तो उसे कोई नहीं पूछता। ये नेता भी आम आदमी की समस्याओं पर चुनाव के पहले खूब बोलते हैं, पर चुनाव के बाद उन्हें इतना भी वक्त नहीं मिलता कि वे आम आदमी की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक कुछ सोच सकें। सचमुच बहुत अभागे हैं हमारे नेता, इन्हें भी समय नहीं मिलता कि आम आदमी की समस्याओं पर कुछ सोच सकें। क्यों सोचें? चुनाव जीतने के बाद ये आम आदमी कहाँ रह जाते हैं। ये तो वीआईपी हो जाते हैं। सच यही है कि आम आदमी के बारे में आम आदमी ही सोचता है, वीआईपी नहीं। जिसने चुनाव जीता, वह तो अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर सोचेगा। उसके सामने क्या औकात है आम आदमी की?
नेताओं के पास यह भी सोचने का समय नहीं है कि आखिर मतदान का प्रतिशत लगातार क्यों गिर रहा है? मात्र 50 से 55 प्रतिशत मतदान पर ही पूरा गणित टिका है। क्या बाकी के मतदाता जागरुक नहीं हैं? क्या इन्हें अपनेर् कत्तव्यों का अहसास नहीं है? शेष मतदाता यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आज जो भी हमारे सामने हमारा सच्चा प्रतिनिधि होने का दावा करने वाला, हमारे दरवाजे पर वोट की भीख माँगने वाला याचक आया है, वह पूरी तरह से मायावी है। वह छल कर रहा है। उसका सच्चा स्वरूप तो संसद में देखा जा सकता है, जहाँ उसे बोलना होता है, वहाँ वह नहीं बोलता, इसके अलावा जहाँ उसे नहीं बोलना होता है, वहाँ वह इतना अधिक बोलता है कि उसे मार्शल द्वारा धक्के देकर बाहर निकालना पड़ता है। वोट देते समय हमने ऐसे किसी प्रतिनिधि की कल्पना नहीं की थी। फिर यह कौन आ गया, हमारे विचारों को खंडित करने वाला?
इधर कांग्रेस कितना भी गरज ले, लेकिन वह भी भीतर ही भीतर विपक्ष में बैठने के लिए तैयार है। उधर भाजपा भी कितना भी दावा कर ले कि वह अपने बल पर सरकार बना लेगी, उसका भी दावा खोखला साबित होने वाला है। अब तो यह तय है कि बिना किसी तालमेल या खरीद-फरोख्त के सरकार बनाई ही नहीं जा सकती। अन्य दलों के दावे भी खोखले सिद्ध होंगे, यह तय है। इस बार मतदाता ने किसी लहर में आकर अपना वोट नहीं दिया है। अब उसे अपने वोट का महत्व समझ में आने लगा है। कई बार मतदाता भी सोचने लगता है कि उसके पास कोई भी बेहतर विकल्प नहीं है। उसे साँपनाथ-नागनाथ में से किसी एक को चुनना है। दोनों ही स्थितियों में फजीहत मतदाता की ही होनी है, इसलिए न चाहते हुए भी उसे उस व्यक्ति को वोट देना पड़ता है, जो कम बेईमान है। वैसे बेईमानी को उसके पास कोई मापदंड नहीं है। आज उसे जो कम बेईमान लग रहा है, कल वही उसे सबसे बड़ा बेईमान दिखाई देने लगेगा। इसलिए अब वह किसी एक दल पर भरोसा नहीं करता। अब वही मतदाता कुछ-कुछ जातिवाद से भी ऊपर उठने लगा है। अपने अधिकार के प्रति वह कुछ और सजग होने लगा है। फिर भी वह पूरी तरह से सजग नहीं है। उसकी सजगता अभी तो नहीं, पर भविष्य में अपना असर दिखाएगी, यह तय है।
अभी यह माना जा रहा है कि इस बार मतदान करने वाले दस प्रतिशत बढ़े हैं, इसका आशय यही हुआ कि इस बार युवाओं ने अपनी सक्रियता दर्शाई है। मतदान के दिन घर में ही घुसे रहने वाला युवाओं ने इस बार बाहर निकलकर अपनी ताकत का खुलासा किया है। अभी भी युवा इस दिशा में पूरी तरह सचेत नहीं हुआ है, पर यही युवा इसी तरह अपनी सक्रियता दिखाए, तो वह दिन दूर नहीं, जब चुनाव से अपराधियों का पूरी तरह से सफाया ही हो जाए। प्रत्याशियों ने भी इस बार मतदाताओं को जगाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए हैं। टीवी के माध्यम से बार-बार मतदाताओं को विभिन्न दलों ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया है। कहीं-कहीं एसएमएस का भी इस्तेमाल किया गया। यही नहीं इस बार तो विभिन्न शहरों में चल रहे एफएम रेडियो के माध्यम से मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की गई है। हिंदी के विशेषज्ञों से लिखवाए गए कई स्लोगनों ने युवाओं को आकर्षित किया। कई दलों ने डिस्काउंट कूपनों का सहारा लिया। कई स्थानों पर युवाओं ने नेताओं पर अपना गुस्सा भी जाहिर किया।
जिन स्थानों पर नेताओं के खिलाफ युवाओं ने अपनी नाराजगी दिखाई, वह एक संकेत है, नेताओं के लिए, जिसे समझने की आवश्यकता है। यदि नेताओं ने इसे नजरअंदाज किया, तो इसका परिणाम भी भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना होगा। यह पीढ़ी और अधिक आक्रामक भी हो सकती है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मतदान के प्रति लोगों में अब रुझान बढ़ रहा है। अब नेताओं के झूठे और कोरे आश्वासनों से जनता मानने वाली नहीं है, उन्हें चाहिए ठोस प्रत्याशी, जो न केवल उन्हें सुरक्षा दे, बल्कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से ले। केवल अपना घर भरने वाले सांसदों को अच्छा सबक सिखा चुकी है, यह जनता। बस इंतजार करें 16 मई का......
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 9 मई 2009

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार...


निदा फ़ाज़ली
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार...
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौल्वी कोयल गाये गीत
पूजा घर में मूर्ती मेरे के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूका रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप

सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास
चाहे गीता वाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ग़्यान


माँ को समर्पित meri dusari कविता ...........................

माँ ममता का आँचल है
माँ आँखों का काजल है
माँ श्रद्धा की चुनर है
माँ ममता की मूरत है
माँ करुणा का सागर है
माँ गागर मे सागर है
माँ सुंदर सी मूरत है
माँ भोली सी सूरत है
माँ माथे की बिदियाँ है
माँ आँखों की निदियाँ है
माँ हाथो का कंगन है
माँ मस्तक का चंदन है
माँ भोर की रौशनी है
माँ रात की चांदनी है
माँ गंगा का पानी है
माँ पतित पावनी है
माँ संकट हरनी है
माँ करुणा की जननी है
माँ हर छन हर मन मे है
माँ धरती के कण - कण मे है

चक्रेश जैन
आगरा
9897596109





माँ…
निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों के चहकार में गुँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा,माथा,
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पूराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
*********************


कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी,
अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ।

पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ,
मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये,
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।

अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम,
धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
रज़िया “राज़”

*********************
माँ


माँ होती है प्यारी
खुशियाँ देती सारी
लोरियाँ सुनाती है
गोद में सुलाती है
रूठो तो मनाती है
रोओ तो बहलाती है
माँ को नही सताएँगे
हम दूध-मलाई खाएँगे
माँ जो रूठी यह जग रूठा
माँ ही सच्ची सब जग झूठा

**********************



माँ, मेरी माँ,

मेरी बिनपढी माँ,
तमाम विज्ञापनो
और नारीवादी नारों से दूर
सहज ही चूम लेती है
मेरे बच्चों का मुँह
हिलाती-दुलारती है
भावावेश में बार-बार
तान देती है, आँचल का बादल
सूरज देवता की नज़र न लगे
बच्चों के गालों पर काला टीका लगाती है
भोजपत्र और भालूदाँत वाली ताबीज़ बाँधकर
टोना टोटका से बचाती है
हजार यत्न करती है, बच्चों को हँसाने के लिए
थपकियों की जादू से, सुला देती है बच्चों को
अपनी गँवई बोली में / कुछ भी गुनगुनाकर
बच्चों के रूठने पर समझाती है -
" अन्न का अपमान नही करते बेटा,
नाराज़ होती है अन्नपूर्णा माई। ''
सौ-सौ बलाएँ लेती हैं, सिसक उठती है
मुझे और बच्चों को दूर होते देखकर
भभाकर रो देती है
माँ जो सदा माँ होती है।

डॉ. नंदन


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माँ मै तुमसे बहुत प्यार करता हूँ

कई बार मै सोचता हूँ
की मै तुमसे कहूं -
की माँ मै तुमसे बहुत प्यार करता हूँ
पर मै तुमसे कभी तो नही
कह पाता हूँ ।
और शब्दों से शायद
मै कह भी नही पाऊंगा ,
शब्दों में सामर्थ्य ही नही है
भावों को व्यक्त कर पाने की ।
पर मै जब भी अकेला
भावों में डूबा
तेरे आशीष , ममता
और स्नेह की गर्माहट
को महसूस करता हूँ ,
तब न जाने कब
दो बूँद मोटी
पलकों से टपक जाते है
और वो ही कर पाते है
मेरे भावों को व्यक्त ,
और वो कहते है -
की "माँ " , मै तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ।
देवेश
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माँ के चेहरे पर

दु;खों के जंगल रहते हैं

फिर भी उसके आँचल में

सुख की

घनी छाया
किलकती है।
माँ की पथरायी आँखों में अब
न सागर लहराते हैं न सपने ।
सभ्यता की धूसरित दीवार से टँगी
वह एक जीवित तस्वीर है केवल
जहाँ तुम्हारे शब्दों से अलग
इतिहास के पन्ने फड़फडा़ते हैं
तुम्हें आगाह करते कि
माँ पृथ्वी है घूमती हुई
अँधेरे को उजास में बदलती हुई
जिसकी गुफ़ाओं में एक सूर्य उदीयमान है
रोम-रोम में जीवन की जोत जगाता हुआ,
तुम्हारे शब्दों और भाषाओं की गहरी
काली रात हरता हुआ ।
सुशील कुमार

शुक्रवार, 8 मई 2009

सोने के पिंजरे में छटपटाती व्योमबालाएँ


डॉ. महेश परिमल
व्योमबाला, हवाई परी यानी एयर होस्टेस, भला किस युवती की चाहत नहीं होती होगी कि वह एयर होस्टेस बने और देश-विदेश की सैर करे। आकाशीय मार्ग पर विचरना एक आल्हादकारी सपना है। इस सपने को पूरा करती हैं, अपनी मुस्कानें बिखेरकर देश की व्योमबालाएँ। विमान यात्री अपनी पूरी यात्रा भूल सकता है, पर विमान परिचारिका की मुस्कान उसे जिंदगीभर याद रहती है। यही मुस्कान उनके जीवन का अभिन्न अंग है। उसकी नौकरी का सबसे आवश्यक उपादान, प्यारी सी बिंदास मुस्कान के बिना इस व्योमबाला की नौकरी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। हर पालक चाहता है कि उसकी बिटिया व्योमबाला बनकर देश की सेवा करे। युवतियों का दिल भी व्योमबाल बनने की चाहत पर एक-दो बार तो धड़क ही जाता है। पर यह पालकों और युवतियों के लिए एक चेतावनी है कि यह भी एक जानलेवा नौकरी साबित हो रही है। हाल ही में कुछ एयर होस्टेस ने जिस तरह से आत्महत्या का सहारा लिया है, उससे यही लगता है कि मुस्कान बिखरने वाली इन युवतियों के जीवन की मुस्कान उनसे रुठ गई है।
मुंबई में एक महीने के दौरान दूसरी एयर होस्टेस ने आत्महत्या कर ली। वेलेंटाइन डे पर किंगफिशर एयरलाइंस में नौकरी करने वाली अनुश्री दत्ता की आत्महत्या के पीछे यही कारण बताया जा रहा है कि उस दिन वेलेंटाइन डे था और उसके प्रेमी ने उसे घूमने ले जाने के लिए मना कर दिया। इसी तरह अंधेरी में रहने वाली 20 वर्षीय अनुपमा आचार्य की आत्महत्या का कारण यह है कि उसके प्रेमी ने उसे सिगरेट पीने के लिए मना किया। इससे आवेश में आकर उसने आत्महत्या कर ली। जब इस मामले में पुलिस ने गहराई से छानबीन की, तो पता चला कि अनुपमा को अपनी नौकरी जाने का भय सता रहा था, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली।
एयर होस्टेस की नौकरी बाहर से खूब ग्लैमरेस मानी जाती है। उनका वेतन भी किसी बड़ी कंपनी के एक्जीक्यूटिव के वेतन के बराबर होता है। जब इस नौकरी में इतनी सुख-सुविधाएँ हैं, तो फिर एयर होस्टेस आत्महत्या का सहारा क्यों लेने लगी है। अभ 18 मार्च को ही अनुपमा ने पाँचवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज हमारे सामने जो हजारों व्योमबालाएँ हैं, वे सभी कहीं न कहीं किसी न किसी तनाव से ग्रस्त हैं। वैसे ेदेखा जाए, तो ऐसी कोई भी नौकरी नहीं है, जिसमें तनाव न हो। पर एयर होस्टेस जैसे ग्लैमरस नौकरी के बारे में ऐसा नहीं सोचा जा सकता। हर हँसी के पीछे कहीं न कहीं वेदना छिपी होती है। विमान यात्री व्योमबाला की मुस्कान पर इस तरह से न्योछावर हो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि इस हँसते-मुस्कराते चेहरे के पीछे कई वेदनाएँ छिपी हुई हैं। शुरुआत में यह नौकरी बहुत ही अच्छी लगती है। नए-नए शहर देखना, रोज ही नए-नए लोगों से मुलाकात होना, परिचय का दायरा बढऩा आदि सब कुछ बहुत ही अच्छा लगता है। बस एक दो साल बाद ही इस नौकरी में तनाव आना शुरू हो जाता है। रात्रि जागरण, परिजनों से दूर, भोजन की अनियमितता, अमीर यात्रियों के नखरों के बाद भी मुस्कान बिखेरते रहना, पुरुषों की पैनी निगाहों का सामना करना आदि ये सब तनाव को जन्म देने वाले कारक बन जाते हैं।
एयर होस्टेस की नौकरी ऐसी होती है कि इसमें कई दिनों तक घर से बाहर रहने, परिजनों से दूर रहने की स्थितियाँ आती हैं। इनका काफी वक्त पायलट साथियों के साथ गुजरता है। अनजाने शहरों में उनके रहने की व्यवस्था एक ही होटल में की जाती है, इससे ये इनके प्रेम में पड़ जाती हैं। इसके अलावा एयर होस्टेस की सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि उसका वजन नहीं बढऩे पाए। कहीं उसका फिगर बिगड़ गया, तो नौकरी जाएगी ही, नहीं तो संभव है उसे किसी अन्य काम पर लगा दिया जाए, जहाँ वेतन बहुत ही कम होता है। इसके साथ ही यदि किसी एयर होस्टेस ने शादी कर ली, तो उसे लूप लाइन में डाल दिया जाता है। इसलिए ये या तो शादी नहीं करती, या फिर शादी की बात को छिपाकर रखती हैं। इस दौरान भी वह अकसर बाहर रहती है, जहाँ उनका कई पुरुषों से मिलना होता है, इससे उनके दाम्पत्य जीवन में भी दरार आ जाती है।
एविएशन उद्योग में काम करने वाले लोग कहते हैं कि इस क्षेत्र में विवाहेत्तर संबंध खूब फलते-फूलते हैं। जो महिला अपने पति के साथ सुखी दाम्पत्य जीवन बिताना चाहती है, उसे कभी एयर होस्टेस नहीं बनना चाहिए। यदि कोई अविवाहित एयर होस्टेस अपने सहकर्मी पायलट के प्रेम में पड़ जाती है,पर उसके साथ शादी करना आसान नहीं होता। ये पायलट या तो विवाहित होते हैं, या फिर उनके संबंध अन्य एयर होस्टेस से भी होते हैं। इसके बाद भी यदि उनकी शादी हो जाती है, तो उनके सफल दाम्पत्य जीवन की कोई गारंटी नहीं होती। जिस युवती ने अपना दाम्पत्य जीवन अपने इस कैरियर में होम कर दिया,वही सफल मानी जाती है।
मुंबई के मनोचिकित्सकों के पास इलाज के लिए आने वाले मनोरोगियों में एयर होस्टेस की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे ही एक क्लिनिक में आई एक व्योमबाला ने बताया कि जब से उसने विमान में प्रवेश किया है, तब से वह इतनी दु:खी है कि वह जी-भरकर रोना चाहती थी, पर कहीं आई लाइनर बिगड़ न जाए, इस भय से वह ठीक से रो भी नहीं पाती है। ये नौकरी ऐसी है, जो एयर होस्टेस को जी भरकर रोने भी नहीं देती। कितनी विवशता है, इस नौकरी में। अपनी तमाम भावनाओं को छिपाकर केवल मुस्कान बिखेरने का काम करने वाली ये एयर होस्टेस आखिर क्या करे? इसी तनाव में आकर वह छोटी उम्र में ही व्यसनों का सहारा लेने लगती हैं। मन की व्यथा छिपाने का इससे बड़ा साधन और क्या हो सकता है भला?
एयर होस्टेस की नौकरी में नींद के घंटे तय नहीं होते। इसका पूरा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य बिगड़ा कि बाहर का सौंदर्य भी बिगड़ा। इसे छिपाने के लिए फिर मेकअप का सहारा लेना पड़ता है। डिपे्रशन से बचने के लिए वे अधिक भोजन करना शुरू कर देती हैं, इससे उनका वजन बढऩे लगता है और फिगर बिगडऩे लगता है। इसे सँभालने के लिए डायटिंग करनी पड़ती है। परेशानियाँ इतने पर ही खत्म नहीं होती। नारी के लिए प्रकृति ने 5 दिन ऐसे दिए हैं, जिस दौरान वह आराम कर सकती हैं। जी हाँ मासिक स्राव के दौरान भी इन एयर होस्टस को अवकाश नहीं मिलता। ये नौकरी सोने के पिंजरे की तरह है। इसमें कैद होकर आज व्योमबालाएँ छटपटा रही हैं। अनुपमा की मौत ने इस नौकरी के कई ऐसे पहलुओं को सामने लाया है, जो पालकों एवं युवतियों के लिए एक चुनौती है। यदि कोई युवती एयर होस्टेस की नौकरी को अपना कैरियर बनाना चाहती है, तो उसे इस नौकरी के अन्य पहलुओं के बारे में अच्छी तरह से सोच लेना चाहिए। हाँ यदि आज की युवतियाँ तलवार की तीखी धार पर चलना चाहती हैं, तो आगे बढ़कर वे इस परंपरा को तोडऩे में वे अहम भूमिका निभा सकती हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 7 मई 2009

खो गई खुशबुओं की दुनिया



डॉ. महेश परिमल
आज आपको ले चलते हैं खुशबुओं की अनोखी दुनिया में, जिसे देखा तो नहीं जा सकता, सुना भी नहीं जा सकता, हाँ, केवल महसूस किया जा सकता है। महसूस भी ऐसा कि दिलो-दिमाग दोनों ही ताजगी से लबरेज़ हो जाए। इतिहास में झाँककर देखें, तो खुशबुओं के इस खजाने को हम मुगल कालीन सभ्यता की विरासत के रूप में अपनी ही हथेली पर महसूस करेंगे। यादों में रूई का फाहा जब भी कानों से बाहर आएगा, तो खुशबु ही खुशबू बिखेर देगा। इतिहासकार कहते हैं कि मलिका मुमताज बेगम स्नान के समय अपने हौज में गुलाब की पंखुडिय़ाँ डालती थीं। कभी वह पानी में चंदन का तेल डालकर स्नान करती थीं। गुलाब का इत्र बनाने का खयाल पहली बार उनके दिमाग में आया। आज जहाँ चारों ओर ग्लोबल वार्मिग के कारण वातावरण गर्म हो रहा है, हवा में कार्बन डाईऑक्साइड का अनुपात बढ़ रहा है, तो आज से पाँच सौ वर्ष पहले जब इस तरह की कोई बात ही नहीं थी, तब भला मुगल कालीन बेगमें इन खुशबूदार पानी से स्नान करना क्यों पसंद करती थीं? बात केवल इन बेगमों की ही नहीं है, प्राचीन काल में इजिप्त की महारानियाँ भी सुगंधित पानी में काफी समय बिताती थीं। क्या कारण होगा इसके पीछे? कभी सोचा है आपने? चलिए राजा-महाराजाओं की बात छोड़ दें। वे तो होते ही हैं शान-ए-शौकत के साथ जिंदगी जीने वाले, लेकिन साधारण से साधारण इंसान भी खुशबू को अपने जीवन का अंग बनाना चाहता है। खुशबू उसे अनोखी खुशी देती है।
कल्पना कीजिए - आपकी ऑफिस से छुट्टी है और आप फुरसत से घर में बैठे हुए हैं, ऐसे में कीचन से किसी पकवान या मनपसंद सब्जी की खुशबू आई और आपकी भूख बढ़ गई। मुँह में पानी आ गया और आप खाने के लिए लालायित हो उठे। यह होता है खुशबू का तुरंत असर! शहनाईनवाज स्व. बिस्मिल्ला खान ने अपने जीवन की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा था, कि जब वे शहनाई बजाते थे, तो सामने की पंक्ति पर बैठे हुए कुछ शरारती बच्चे उन्हें परेशान करने के लिए उनके सामने बैठकर इमली या संतरा खाते थे। जिसे देखते ही उनके मुँह में पानी आ जाता था। मँुह का पानी से भरना अर्थात शहनाई बजाने में अवरोध आना। फूँक से बजाए जाने वाले वाद्ययंत्रों में यही परेशानी आती है कि उन्हें बजाते समय मुँह मेें पानी नहीं भरना चाहिए वरना सुर को बेसुरा होते देर नहीं लगती।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तो खुशबू के इस अनोखे संसार को स्वास्थ्य का प्रभावी माध्यम मानता है। हमारे स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर इंसान के शरीर की अपनी एक अलग खुशबू होती है। कितनी बार तो इंसान को उसकी खुशबू से ही पहचाना जाता है। खुशबू में जात-पात का भेद नहीं होता। वह तो हर किसी को अपना बना लेती है। तभी तो आज खुशबू के माध्यम से कितनी ही मानसिक और शारीरिक बीमारियों का इलाज संभव हो पाया है। आज की निरंतर दौड़ती-भागती जिंदगी में व्यक्ति हाइपर टेन्शन का शिकार हो जाता है, जिसके कारण अनेक साइको-सोमेटिक बीमारियाँ उसे अपने जाल में ले लेती हैं । सुगंध चिकित्सा के द्वारा इसका समाधान संभव है। आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सकों के अनुसार 40 प्रतिशत से अधिक बीमारियाँ मानसिक कारणों से होती हंै। गुलाब, मोगरा, चंदन, संतरे का अर्क, जास्मिन और ब्राह्मी की सुगंध में वह अद्भुत शक्ति है, जो मानसिक तनाव को दूर कर मन को शांत करती है। यानी कि बीमारी के इलाज की शुरुआत सुगंध के साथ हो जाती है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि नगरवधुओं के साथ काम करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि ये महिलाएँ अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए हमेशा अपने बालों मेें मोगरे का गजरा या फूल लगाती हैं, क्योंकि उनके पास आने वालों में अधिकतर शराबी या ट्रक ड्राइवर होते हैं, जो लोग पहले से ही तनाव से घिरे होने के कारण काफी उत्तेजित होते हैं और उसमें भी नशा उन्हें और अधिक उत्तेजित कर देता है। ऐसे में मोगरे का गजरा उनके तनाव को कुछ पल में ही शांत कर देता है।
हमारे यहाँ गर्मियों में खस, गुलाब या केवड़े का शरबत पिलाया जाता है, उसके पीछे का भी कारण यही है कि यह हमारे तनाव को शांत करता है। कई लोगों की यह आदत होती है कि वे रात को सोते समय सिर में भृंगराज के तेल से मालिश करना पसंद करते हैं। जिसके कारण मस्तिष्क को शीतलता मिलती है और गाढ़ी नींद आ जाती है। नींद आना अर्थात तनाव का गायब होना, जिससे दूसरे दिन की शुरुआत ताजगी से भरी होती है। अब तो सुगंध चिकित्सा यानी अरोमा थेरेपी के सेंटर जगह-जगह खुल गए हैं और लोग इसका लाभ लेने लगे हैं। यहाँ पहुँचने वालों से वहाँ बैठे खुशबुओं के जानकार बातों ही बातों में उनसे उनकी मनपसंद चीज़ों को जान लेते हैं, फिर बाद में उनकी पसंदीदा खुशबू का प्रिस्किप्शन लिख देते हैं।
भारतीय अत्तरों में वेज के रूप में चंदन का तेल और देशी-विदेशी स्पे्र में अल्कोहल वेज के रूप में इस्तेमाल होता है। कितने तो हरी चाय की सुगंध स्फूर्ति और ताजगी देती है, तो कितनों को एक विशेष ब्रांड की कॉफी उत्तेजित करती है। सुगंध का शास्त्र में यह मानव ही तय करता है कि उसे कौन से सुगंध पसंद है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें सुगंध से एलर्जी होती है। ओशो को परफ्यूम की एलर्जी थी। उनके शिष्य इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि कोई भी उनके पास जाए, तो किसी प्रकार का स्पे्र करके नहीं जाए। यह एक अपवाद है। गाँवों में आज भी मक्खी-मच्छरों को भगाने के लिए कड़वे नीम का धुआँ किया जाता है। शाम को गूगल या लोभान का धूप किया जाता है। यह धूप वातावरण को पवित्र करने के बाद एक प्रकार की शांति देता है। भीनी-भीनी सुगंध सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करती है। ज्ञान तंतुओं को एक प्रकार की शांति देती है।
आजकल जो एयर फ्रेशनर के नाम से स्प्रे बेचे जा रहे हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जिसे बनाने में हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। अच्छा यही होगा कि आप जब भी इस तरह का कोई इत्र या सेंट खरीदो, तो किसी जानकार मित्र से ही खरीदो, ताकि ठग जाने की संभावना कम से कम हो। अनजाने लोगों से परफ्यूम खरीदने का मतलब यही हुआ कि धन खर्च करने के बाद भी परेशान होना। कई बार तो ऐसा होता है कि आपने कोई स्पे्र खरीदा और उसके इस्तेमाल करने के कुछ मिनट बाद ही आपको सरदर्द होने लगा, या फिर बेचैनी महसूस होने लगे, तो तुरंत सावधान हो जाएँ, यह सुगंध आपके लिए बिलकुल नहीं है। प्रकृति ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग खुशबू तय की है। जिस सुगंध से आपको सब कुछ अच्छा लगने लगे, वही आपके लिए लाभकारी है। यही खुशबू आपकी पहचान है। एक दृष्टिहीन भी आपकी खुशबू से आपको पहचान जाता है। आज अराजकता के इस युग में जहाँ बारूदी गंध चारों ओर फैली हुई है, ऐसे में हम कहाँ ढूँढ पाएँगे सुगंध का संसार....
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 2 मई 2009

नेताओं के उड़न खटोले का खर्च गरीब जनता पर



डॉ. महेश परिमल
विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है। कई आत्महत्याएँ हो रही हैं। महँगाई बढ़ रही है। जमाखोरों के पौ-बारह हैं। व्यापारी आम जनता को लूटने में लगे हैं। उधर आम जनता की सारी समस्याओं को एक बार में खत्म करने का नारा लेकर निकले हमारे देश के नेता चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। लोगों के पास पहुँचने के लिए ये नेता लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं। उडऩ खटोले पर आए नेता को देखने-सुनने के लिए आम जनता उमड़ पड़ती है। यह भारतीय जनता है, वह यह भूल जाती है कि नेता के इस उडऩ खटोले का खर्च आज नहीं, तो कल उसकी जेब से ही निकलेगा। मंदी के इस दौर में भी इन नेताओं को आड़े नहीं आती। उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि कल यदि चुनाव जीत गए, तो पूरे खर्च सूद समेत वसूल हो जाएँगे।
इन उडऩ खटोलों पर उडऩे का गणित यदि समझ लिया जाए, तो सचमुच हमें पता चल जाएगा कि ये नेता किस तरह से अपने भाषण के माध्यम से आम जनता को भ्रमित कर रहे हैं। यूँ तो सभी राज्यों का अपना एक उडऩ खटोला है। पर उस राज्य के मुख्यमंत्री आचार संहिता के चलते उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते, पर चुनाव आयुक्त या चुनाव अधिकारी बेखौफ उस उडऩ खटोले का इस्तेमाल कर सकते हैं। नेताओं द्वारा उडऩ खटोलों के इस्तेमाल ने इस वर्ष रिकॉर्ड तोड़ा है। इस बार विमान से अधिक हेलीकाप्टर का इस्तेमाल हुआ है। अब आपको बता दें कि इसका किराया कितना है? इन हेलीकाप्टरों में दो सीटर का एक घंटे का किराया 45 हजार से एक लाख रुपए तक होता है। उसमें भी यदि डबल इंजन वाला है, तो उसका किराया 70 हजार से डेढ़ लाख रुपए होता है। इसमें चार लोग ही बैठ सकते हैं। यदि हेलीकाप्टर दिन भर के लिए लिया गया है, तो एक घंटे का 5 से दस हजार रुपए वेटिंग चार्ज लिया जाता है। यदि कहीं रात रुकना हो गया, तो 30 हजार रुपए अतिरिक्त। यदि प्राइवेट जेट किराया पर लिया जाए, तो उसका एक घंटे का किराया डेढ़ से दो लाख रुपए होता है।
हमारे देश में हेलीकाप्टर किराए पर देने वाली छोटी-बड़ी 55 कंपनियाँ हैं। इन सबके पास कुल 180 हेलीकाप्टर हैं। इसमें से कांगे्रस ने ही कुल 10 विमान और 20 हेलीकाप्टर बुक किए हैं। इसके बाद भाजपा का नम्बर आता है, जिसने 8 विमान और 10 हेलीकाप्टर बुक किए हैं। इसी तरह सपा ने एक विमान और 2 हेलीकाप्टर, जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के लिए पूरा एक हेलीकाप्टर ही बुक किया गया है। हाल ही में इन्होंने अपना हेलीकाप्टर सीधे चुनावी सभा के पास ही उतारा, जिससे काफी विवाद हुआ। वैसे विवादास्पद हरकतें और विवादास्पद बयान इनकी कमजोरी हैं। इसके अलावा प्रजा का उद्धार करने के लिए उडऩ खटोले में घूमने वाले शरद पवार, जयललिता, उद्धव ठाकरे, करुणानिधि,नवीन पटनायक, नीतिश कुमार, रामविलास पासवान, ओमर अब्दुल्ला, अजीत सिंह, ममता बनर्जी, मायावती भी हैं। जो कभी विमान से या फिर हेलीकाप्टर से आम जनता को उनकी तमाम समस्याओं का समाधान के लिए पार्टी को जिताने की अपील करते हैं।
इसके अलावा बड़े उद्योगपतियों और फाइव स्टार होटलों के पास अपने विमान और हेलीकाप्टर हैं। चुनाव के समय ये लोग अपने विमान और हेलीकाप्टर नेेेताओं को इस्तेमाल करने के लिए देते हैं। चुनाव न हों, तो नेता इनके विमान का खुलकर इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में कांगे्रसाध्यक्ष सोनिया गांधी रिलायंस के विमान से मास्को गईं थी, तब इस पर विवाद हुआ था, अंतत: कांग्रेस को इसका किराया देना पड़ा था। इसके अलावा एक बार सोनिया गांधी ने श्रीनगर जाने के लिए वायुसेना के विमान का इस्तेमाल किया था, तब भी विवाद हुआ था। वैसे वायुसेना के विमान का उपयोग प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृहमंत्री, सशस्त्र सेना के प्रमुख आदि ही कर सकते हैं। इसीलिए बाद में यह स्पष्टीकरण दिया गया कि इस विमान में सोनिया जी के साथ देश के गृहमंत्री भी थे।
इस बार चुनाव में जेट विमानों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम हुआ है। फिर भी इतना तो तय है कि चुनावों में यदि केवल विमानों का खर्चा इतना अधिक है, जिससे एक छोटे से राज्य का बजट ही बन सकता है। पार्टियों को तो इसका हिसाब देना ही नहीं है, क्योंकि इस देश में राजनैतिक पार्टियों के पास धन कहाँ से आता है और कहाँ खर्च किया जाता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है, क्या इस लोकतांत्रिक देश में ऐसा संभव है? एक पान वाले को अपने सालाना आय और खर्च का हिसाब देना होता है, तो फिर इन राजनैतिक दलों से इससे क्यों दूर रखा गया है? क्या पार्टियाँ किसी तरह का व्यापार करती हैं, आखिर उनकी आय कैसे होती है? क्या यह जानने का अधिकार जनता के पास नहीं है? क्या एक जनहित याचिका लगातार आम आदमी सरकार से पूछ सकता है? सूचना का अधिकार आखिर किसलिए है? गांधीजी की आरती उतारने वाले ये नेता शायद यह भूल गए कि गांधीजी ने लोगों से मिलने के लिए ट्रेन के तीसरे दर्जे डिब्बे का इस्तेमाल किया। उसके बाद अपने भाषण से जनता को आंदोलित कर दिया। उनकी सादगी को कौन नेता याद करता है। आज ये उडऩ खटोले में बैठकर जनता के सामने आते हैं और उन्हें आश्वासनों के पहाड़ पर खड़ा करके चले जाते हैं, 5 साल के लिए।
इन उडऩ खटोलों पर बैठने के खतरे भी कम नहीं हैं। आए दिनों हेलीकाप्टर खेत पर उतारने, इमर्जेंसी लेंडिंग, हेलीकाप्टर में खराबी आदि के समाचार मिलते ही रहते हैं। माधवराव सिंधिया का देहांत इसी विमान दुर्घटना में हुआ, जब वे एक चुनावी सभा को संबोधित करने के लिए जा रहे थे। दक्षिण भारत की अभिनेत्री सौंदर्या भी जब चुनावी सभा को संबोधित करने के लिए जा रही थीं, तब उसका हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनकी मौत हो गई। फिर भी इन नेताओं की हिम्मत तो देखो, केवल अपनी जीत के लिए अपनी जान खतरे में डालकर लगातार हवाई यात्राएँ कर रहे हैं। क्या वास्तव में इनके दिल में जनता के लिए प्यार है? क्या सचमुच ये देश के लिए समर्पित हैं? क्या वास्तव में ये यह चाहते हैं कि देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाए? क्या कोई निजी स्वार्थ नहीं है इनका? क्या सचमुच ये देश की भलाई के लिए गंभीर हैं? इन सभी सवालों का जवाब देश की जनता एक नई इबारत के रूप में लिख रही है, जिसका पता 16 मई को ही चलेगा। तब तक इन नेताओं से हमें ईश्वर ही बचाए।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 1 मई 2009

जूतों की महायात्रा: शास्त्रयुग से शस्त्रयुग तक

-डा. आर .रामकुमार
रामायणकाल मे शास्त्र पोषित सम्राट् राम की कहानी में एक युगान्तर तब घटित हुआ जब अयोध्या के राजा भरत ने आग्रह किया था कि आपका अधिकार है आप राजा बनें। शास्त्रीय नैतिकता और मर्यादा को कठोर व्यावहारिकता में बदल देनेवाले राम ने नियति से प्राप्त वनवास को वरेण्य मानकर भरत का आग्रह अस्वीकृत कर दिया था। तब भरत ने राम कीह खड़ाऊ मांग ली और सर पर रख्कर लौट आए। राजसिंहासन पर उन खड़ाउओं को स्थापित कर वे पगतिनिधि राज्य की भांति राजकाज देखने लगे और कुटिया में कुशों के आसन पर पतस्वी जीवन बिजाने लगे। ऐसा आदर्श और कहीं दिखाई नहीं देता कि भाग्य से प्राप्त राज्य को गर्हित मानकर उसके पारंपरिक वास्तविक अधिकारी की वस्तु मानते हुए राजा तपस्वी हो जाए। आज तो राज्य और राज्य सिंहासन के लिए मारकाट ,छीना झपटी और षड़यंत्रों की बाढ़ सी आ गई है। हालांकि भारत के महाभारत-काल में इसका सूत्रपात हो गया था। कितना अंतर है - रामकाल की उन खड़ाउओं में और आज जो फेंकी जा रही हैं उनमें।
अध्यात्म के क्षेत्र में भी गुरु की खडाऊ का पूजन भारतीय मनीषा की अपनी मौलिक साधना है। हमारे देश मंे केवल शास्त्रों की ही पूजा नहीं होती, शस्त्रों की भी होती है और शास्त्रों के निर्माणकत्र्ता गुरुओं की चरण पादुका उर्फ खड़ाऊ उर्फ जूतों की भी। संतों की परंपरा में तो जूते गांठनेवाले संत रविदास या रैदास का समादर भी इसी देश में संभव हुआ। इतना ही नहीं राजपूताने की महारानी मीरांबाई अपने राजसी वैभव को छोड़कर उनकी चरणरज लेकर संन्यासिनी हो गई।
दूसरी ओर अपने आराध्य और श्रद्धेय के जूते सर पर धारण करने वाले देश में दूसरों को जूतों की नोंक पर रखने के अहंकार-घोषणा यत्र-तत्र-सर्वत्र सुनाई देती है। आज के घोषणापत्रों में अपने विचारों के अलावा दूसरों को जूता दिखाने की खुली गर्जनाएं गूंज रही हैं। अपने विकास कार्यक्र्रमों के बजाय देसरों के सत्यानाश की ललकारों पर उनको भविष्य दिखाई दे रहा है। श्रद्धा की चरणपादुकाएं ,खड़ाऊ या जूते आक्रोश , प्रतिहिंसा और कलुषित मनोविकारों में रूपायित हो गए। यह हमारी मानसिकता का विकास है या अधोपतन ?
इतिहास के पन्नों में संभवतः 2009 ‘जूता वर्ष’ के रूप में जाना जाए। विश्व की सबसे बड़ी ताकत के रूप में सर्वमान्य अमेरिका के निवृत्तमान राष्ट्रपति जार्ज बुश पर बगदाद के एक पत्रकार ने साम्राज्यवाद के विरोध में अपना जूता चलाया था। जूते या तो समाज और राजनीति में या घर और संसद में चलते रहे हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी राष्ट्राध्यक्ष पर चलनेवाला यह पहला जूता था।सारा विश्व सकते मंे आ गया। इसे आंतरिक अव्यवस्था और युद्धाक्रांत देश की, दमन के विरुद्ध अभिव्यक्ति कहा गया। ताकतवर बंदूकों के शिकंजे में दबे प्रचारतंत्र द्वारा ईजाइ किया गया सूचना और संचार का, मासकम्युनिकेशन का नया तरीका था, अपेक्षाकृत नया असत्र था। अब ‘ जूता ’ समर्थों के खिलाफ अपनी बात कहने का नया वैश्विक-उपकरण बन गया।
ऐसा नहीं है कि यह गुस्सा साम्राज्यवाद , विश्पूंजीवाद और मुद्राबाजार के एकमात्र अधिनायक रा ष्ट्र तक ही सीमित रहा। कुछ दिनों बाद चीन के प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ पर भी उनकी आक्सफोर्ड यात्रा के दौरान फेंका गया।
सन 2009 भारत का चुनावी व र्ष भी है। दिल्ली सहित कुछ महŸवपूर्ण राज्यों की विधानसभा के चुनाव परिणामों ने लोकसभा के चुनावों को हड़बड़ा दिया है। शायद इसी का नतीजा था कि गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् पर चुनावी दौर की शुरुआत पर ही पत्रकार-वात्र्ता के दौरान एक पत्रकार ने जूता फेंका। वैश्विक संघटनाओं का यह भारतीयकरण था। भारत की यही विडम्बना है कि वह सर्वौत्तम का सृजन करता है और भौंडा , और वीभत्स का अनुकरण घटिया का अनुकरध करता है। पी. चिदम्बर पर फेंके गए पहले भारतीय जूते की गूंज दूर तक हुई। बुश पर जूता फेंकनेवाले बगदाददी पत्रकार का हश्र बुरा हुआ, जेल हुई। हमारी भारतीय परम्परा क्षमाशील है। ईसामसीह से हमने यह गुण लिया है। गृहमंत्री ने इसका पालन करते हुए भारतीय पत्रकार को क्षमा कर दिया और पत्रकार ने भी खेद व्यक्त करते हुए कहा: ‘‘ मेरा उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं ,ध्यानाक र्षण था। मैंने हीरो बनने के लिए यह नहीं किया बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किया। जबकि अकालीदल ने तो जूता फेंकनेवाले पत्रकार जरनैल सिंह को भगतसिंह की उपाधि दे दी।
फिर तो जैसे जूते चलने का मानसून ही आ गया। 8 अप्रेल गुहमंत्री पी. चिदम्बरम् पर हमला अभी हमला ताजा ही था कि 11 अप्रेल सांसद नवीन जिंदल पर एक रिटायर्ड शिक्षक ने जूता फेंका , 17 अप्रेल को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रक्षेपित लालकृ ष्ण आडवानी पर पार्टी कार्यकत्र्ता द्वारा खड़ाª फेंकी गई , 27 अप्रेल को भारत के वत्र्तमान प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह पर एक बेरोजगार कम्प्यूटर इंजीनियर ने चप्पल फेंकी ,28 अप्रेल को दोबारा आडवानी पर निर्दलीय उम्मीदवार ने चप्पल फेंकी, और आज 29 अप्रेल को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा पर एक युवक नेचप्पल फेंकी। इसी बीच सिने जगत के प्रसिद्ध अभिनेता जीतेन्द्र पर भी एक युवक ने चप्पल फेंकी। मजे की बात यह है कि इन सबसे बेपरवाह गुजरात के कलील शहर का नगरपालिका अध्यक्ष मुकेश परमार (भाजपा) अपने कार्यदिवस का काम निपटाकर अपनी पुश्तैनी चप्पल की दूकान पर नियमित मरम्मत और चप्पल निर्माण कर रहंे हैं। मुकेश परमार के दृष्टांत से हिन्दी उर्दू के प्रख्यात लोकप्रिय लेखक कृश्नचंदर की कहानी ‘ जूता ’ का बरबस स्मरण हो आता है. यह कहानी करीब 1965-70 के आसपास उनके कहानी संकलन ‘ जामुन का पेड़ ’ में संकलित थी. हंसी-हंसी में कृश्न चंदर मर्म पर चोट करने पर कभी नहीं चूकजे थे. ‘जूता’ कहानी के माध्यम से उन्होंने समाज की बेरोजगारी , डिग्री धारियों के मोहभंग , पैसों के पीछे भागने की समाज के प्रत्येक वर्ग की मूल्य विहीन लोलुपता पर उन्होंने तीखें कटाक्ष किए हैं. कहानी का प्रारंभ जामुन के पंड़ के नीचे बैठे एक मोची के जूते गांठने के दृश्स से होती है. बातों बातों में पता चलता है कि वह मोची पीछे खडत्रे आलीशान बंगले का मालिक था. उसने समाज के लोगों के चेहरों से पर्दा उठाने के लिए सौ जूते खानेवाले को दस हजार का इनाम देने की घो षणा कर दी. तीन दिन तक समाज के हर वर्ग के लोग छुपते छुपाते आए और जूते खाकर चले गए. तीसरे दिन वह कंगाल हो गया और वही सामने मोची की दूकान खोल ली. आज अगर यह ईनाम रखा जाए तो घटनाएं बताता हैं कि दस हजार के बदले जूते खाने के लिए लोग अधिकार के साथ आएंगे. पैसा कमाने में शर्म कैसी ? खासकर उस वक्त जब जूते-चप्पल खाने में देश विदेेश मंें लोकप्रियता हासिल हो.
भारत जितना अद्भुत देश है ,उतनी अद्भुत उसकी विरासतें है। साहित्य भी अद्भुत है। आज भी जूते चप्पलॅे फेंकने की घटनाओं पर पत्रकार अगर अपनी बात कह रहे हैं तो चित्रकार अपने कार्टून बना रहे हैं , व्यंग्यकार इसे अपनी दृ िष्ट से देख रहे हैं तो प्ररूज्ञासनिक अधिकारी बतौर लेखक अपने दिशा निर्देश दे रहे हैं। जहां पी. चिदम्बरम् पर फेंके गए जूते पर पत्रकार गोकुल शर्मा ने उसे ‘लोकतंत्र की निराशाा ‘ कहा तो आडवानी पर फेंके गए खड़ाऊ और के विषय में उन्होंने चेताया कि यह भाजपा को चेतावनी है कि कार्यकत्ताओं को नजर अंदाज न करें। आलोक पुराणिक ने ‘ जूता संहिता ‘ बनाने की व्यंग्यात्मक पहल की जा पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एम एन बुच ने आक्रोश को कानून की हदें पार न करने की तरबीयत की।
एक व्यंग्य चित्रकार हैं मंजुल । उन्होंने पहले भारतीय जूता कांड पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ‘मास कम्युनिकेशन इंस्टीट्यूट’ के छात्रों को जूता फेंकने के हुनर का अभ्यास करते हुए चित्रित किया। वहीं 25 अप्रेल को उनके कार्टून में एक नेता अपने जूतों के , अपनी पत्नी के जूतों के तथा अपने बच्चों के जूतों के नाप और नम्बर बता रहा है। हर जूता प्रकरण के बाद हमारे राजनेता निर्विकार भाव से अपनी बात जारी रखते है। यह अद्भुत समभाव राजनीति की देन है या गीता की ?
यह लेख जब तक लिखा जा रहा है ( 29 अप्रेल ) तब तक लगभग प्रतिदिन जूता किसी बड़े राजनेता पर चल रहा है।येदुरप्पा पर आज की तारीख खत्म हुई है लेकिन यह अंत नहीं है। 2009 के समाप्त होते होते , चुनाव के बाद सरकार बनते तक और सरकार बनने के बाद संसद में अभी और न जाने कितने जूते चलेंगे कौन जानता है ? इन जूतों को कौन रोक सका है जो रोकेगा ?बस केवल विश्लेषण, लेख, टिप्पणियां ,व्यंग्य ,कार्टून और कविताओं का दौर चलेगा।
यह संयोग ही है केवल कि 2003 के अप्रेल माह में विदेशों की अकादमिक यात्रा से लौटे दो भारतीय विद्वानों ने जब ‘जूतों ’ को संबोधित मेरी कविता ‘ क्रियात्मक और सर्जनात्मक’ कहा था तब मुझे कहां पता था कि 2009 के अप्रेल को हमें जूतों के इतने कारनामे सुनने पढ़ने को मिलेंगे और वर्ष 2009 ’ जूतों का अभिनंदन वर्ष ’ कहलाएगा ? 2003 की यह कविता जरा 2009 के अप्रेल में देखी जाए..
जूतों !
पहने जाते हो पैरों परं,/मगर /हाथों में देखे जाते हो
जूतों ! /सच सच बताओ /यह जुगाड़ कैसे भिड़ाते हो ?
संसद की बदल जाती हैं /संवैधानिक प्रक्रिया
चलती नहीं आचार संहिता -/जब तुम चलते हो
स्तब्ध है विराट प्रजातंत्र /और दिव्य भारतीय संस्कृति
निकृष्ट जूतों !
तुम कितने रूप बदलते हो !
आओ, तुम्हें सिर पर धारण करें .........
-डा. आर .रामकुमार

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

जूता: एक मौलिक पीएचडी प्रस्ताव



अनुज खरे
हाल ही में पत्रकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से लेकर भारतीय
गृहमंत्री चिदंबरम तक पर जूते चलाएं हैं। कुछ अन्यों ने भी इसी माध्यम से
हल्के-फुल्के ढंग से दूसरों को कूटा है। जूते के इसी बढ़ते प्रयोग को
लेकर मुझे कई तरह की संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं।
इस निरीह सी वस्तु के बारे में सबकुछ जान लेने की इच्छा मन में खदबदाने
लगी है। पीएचडी तक के लिए यह विषय मुझे अत्यंत ही उर्वर नजर आने लगा है।
एक जूते का चिंतन, चिंतन में जूता परंपरा, उसका निर्धारित मूल कर्म, दीगर
उपयोग, इतिहास में मिलती गौरवशाली परंपरा, आख्ययान, उसमें छुपी
संभावनाएं, अन्य क्षेत्रों से जूते का निकट संबंध, समाज के अंगों के बीच
इसका प्रयोग, जूते का इतिहास में स्थान, वर्तमान की आवश्यकता, भविष्य में
उपयोगिता।
अर्थात् जूते के रूप में मुझे पीएचडी के लिए इतना जबर्दस्त विषय हाथ लगा
गया है कि अकादमिक इतिहास में मौलिक पीएचडी करने वालों में मेरा नाम
स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना तय सा ही दिखाई देता है। चूंकि यहां यह बात
अलग से भी उपयोगी साबित होगी कि पूरे प्रकरण में की गई रिसर्च के दौरान
जूतों से स्थापित तदात्म्य के चलते बाद में परीक्षक या आलोचक अपनी बातों
के कितने भी जूते चलाएंगे वे सब मेरे ऊपर बेअसर ही साबित होंगे। तो इस
तरह 350 पन्नों की चिंतन से भरी जूता पीएचडी मेरी आंखों के सामने चमकने
लगी है। शोध तक का प्रस्ताव मैंने तैयार कर लिया है। आप भी चाहें तो जरा
नजर डाल लें..।
जूता खाना-जूता चलाना, जूतम पैजार, जूते का नोंक पर रखना, जूता देखकर
औकात भांप लेना, दो जूते लगाकर कसबल निकाल देना.. आदि-आदि.. अर्थात जूता
हमेशा से ही भारतीय जनसमाज के अंतर्मन में उपयोग और दीगर प्रयोग की
दृष्टि से मौलिक चिंतन का केंद्र रहा है। प्राचीन काल से ही जूते के
स्वयंसिद्ध प्रयोग के अलावा अन्य क्रियाकलापों में उपयोग का बड़ी शिद्दत
से मनन किया गया है।ऋषि-मुनि काल की ही बात करें तो तब जूतों की
स्थानापन्न खड़ाऊं का प्रचलन था, तब इसका उपयोग न सिर्फ कंटीली राहों से
पैरकमलों की रक्षा के लिए किया जाता था अपितु संक्रमण काल में खोपड़ा
खोलने के लिए भी कर लिया जाता था। चूंकि खड़ाऊं की मारकता-घातकता चमड़े
के जूते के मुकाबले अद्भुत होती थी इसी कारण कई शांतिप्रिय मुनिवर केवल
इसी के आसरे निर्भय होकर यहां से वहां दड़दड़ाते घूमते रहते थे।
हालांकि खड़ाऊं प्रहार से कितने खोपड़े खोले गए, इस बावत कितने प्रकरण
दर्ज हुए, किन धाराओं में निपटारा हुआ, कौन-कौन से श्राप, अनुनय-विनय की
गतिविधियां हुईं, इस विषय में इतिहास मौन ही रहा है। चूंकि हम अपने
इतिहास में छांट-छांटकर प्रेरणादायी वस्तुएं रखने के ही हिमायती रहे हैं
सो ऐसे अप्रिय प्रसंगों को हमने पीट-पीटकर मोहनजोदाड़ो के कब्रिस्तान में
ही दफना रखा है। और नहीं तो क्या? लोग मनीषियों के बारे में क्या
सोचेंगे? इस भावना को सदैव मन में रखा है।
जिसके चलते हमें हमारी ही कई बातों की जानकारी दूसरे देशों के इतिहास से
पता चली है, उन्होंने भी जलन के मारे ही इन्हें रखा होगा ऐसा तो हम जानते
ही हैं इसलिए उन प्रमाणों की भी ज्यादा परवाह नहीं करते। तो हम बात कर
रहे थे जूते के अन्यत्र उपयोगों की।
चूंकि हम शुरू से ही मितव्ययी-अल्पव्ययी, जूगाडू टाइप के लोग रहे हैं, इस
कारण किसी चीज के हाथ आते ही उसके मूल उपयोग के अलावा अन्योन्याश्रित
उपयोगों पर भी तत्काल ही गौर करना शुरू कर देते हैं। जैसे बनियान को ही
लें, पहले खुद ने पहनी फिर छोटे भाई के काम आ गई फिर पोते के पोतड़े बनी
फिर पोंछा बन गया। यानि छिन-छिनकर मरणोपरांत तक उससे उसके मूल कर्म के
अलावा दीगर सेवाएं ले ली जाती हैं। ऐसी जीवट से भरपूर शोषणात्मक भारतीय
पद्धती भी आद्योपांत विवेचन की मांग तो करती ही है ना, ताकि अन्य राष्ट्र
तक प्रेरणा ले सकें।
चूंकि हमारे पास प्रेरणा ही तो प्रचुर मात्रा में है, सदियों से हम
प्रेरणा ही तो बांट रहे हैं तो अब एक और प्रेरणादायी चीज कुलबुला रही है,
प्रेरित करने के लिए, बंट जाने के लिए। फिर प्रेरणा के अलावा प्रयोगों के
कितने अवसर पैदा हुए हैं जूते की विभिन्न वैराइटियों देखकर ही अंदाजा
लगाया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर मारपीट जैसे महत्वपूर्ण कार्यो के समय
जूते नहीं खुले तो तत्काल ही बिना फीते की जूतियों का आविष्कार कर डाला
गया। अत: यहां इस अन्वेषण की मूल दृष्टि की विवेचना भी जरूरी है।
इसी तरह जूते चलाने के कई तरीके श्रुतिक परंपरा से प्राप्त होते हैं। कुछ
वीर जूते को ऐड़ी की तरफ से पकड़कर चाकू की तरह सामने वाले पर फेंकते हैं
ताकि नोंक के बल सीने में घुप सके। तो कुछ सयाने नोंक वाले हिस्से को
पकड़कर फेंकते हैं ताकि ऐड़ीवाले हिस्से से मुंदी चोट पहुंचाई जा सके।
इस तरह जनसामान्य में जूते के उपयोग की अलग राजनीति है, जबकि राजनीति में
जूते के प्रयोग की अलग ही रणनीति है। यहां दूसरे के कंधे पर पैर रखकर
जूते चलाए जाते हैं, जबकि कुछ नौसिखुए खुलेआम आमने-सामने आकर जूते चलाते
हैं, जबकि कुछ ऊर्जावान कार्यकर्ता हाथ से ही पकड़कर दनादन खोपड़ी पर बजा
देते हैं, इस तरह नेता के नेतापने से लेकर कार्यकर्तापने तक के निर्धारण
में जूते की विशिष्ट भूमिका एवं परंपरा के दिग्दर्शन प्राप्त होते हैं।
इसी तरह कुछ हटकर चिंतन की परंपरा के अनुगामी जूते को तकिया बनाकर बेहतर
नींद के प्रति उम्मीद रखते हुए बसों- ट्रेनों में पाए जाते हैं। इन आम
दृश्यों में भी करुणा का भाव छिपा होता है। सिर के नीचे लगा जूता बताता
है कि सामान भले ही चला जाए लेकिन जूता कदापि ना जाने पाए, यानि हम अपने
पददलित को कितना सम्मान देते हैं यहां नंगी आंखों से ही निहारा जा सकता
है, सीखा जा सकता है, परखा जा सकता है। तो इस तरह यहां जूता, जूता न होकर
आदर्श भारतीय चिंतन की परंपरा की जानकारी देने वाली कड़ी बन जाता है।
इसी तरह जहां मंदिरों के बाहर से जूते चोरी कर लोग बिना खर्चा कई
ब्रांड्स पहनने का लुत्फ उठाकर समाजवाद के निर्माण का जरिया बन जाते हैं।
सर्वहारावादी प्रवृतियां इन्हीं गतिविधियों के सहारे तो आज तक अपनी
उपस्थिति दर्ज करवाती आ रही हैं। शादी के अवसर जूता चुराई के माध्यम से
जीजा-साली संवाद जैसी फिल्मी सीन को वास्तविक जीवन में साकार होते देखने
का सुख उठाया जाता है।
वहीं, हर जगह दे देकर त्रस्त लड़कीवाले इस स्थान से थोड़ा बहुत वसूली कर
अपने आप को धन्य पाते हैं। अर्थात् जीवन के हर पक्ष में भी जूते की
उपस्थिति और महत्व अगुणित है। इस कारण भी यह विषय पीएचडी हेतू अत्यधिक
उपयुर्क्त सारगर्भित-वांछनीय माना जा सकता है।
इस तरह ऊपर दिए पूरे विश्लेषण का लब्बोलुआब यह कि पूरी राजनीतिक,
सांस्कृतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक परंपरा को समग्र रूप से खुद में संजोए एक
प्रतीक पूरे अनुशीलन, उद्खोदन, खोजबीन, स्थापन, विवरण की विशाद मांग रखता
है। अत: अपनी पीएचडी के माध्यम से मैं यह दायित्व लेना चाहता हूं कि
परंपरा के इतने (कु)ख्यात प्रतीक के बारे में पूरा विवरण निकालूं ताकि
भविष्य में पीढ़ियों को इस दिशा में पूर्ण-प्रामाणिक और उपयोगी ज्ञान
प्राप्त हो सके।
अत: आशा है कि चयन कमेटी मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर इस पर शोध करने की
अनुमति प्रदान करेगी।. हालांकि जल्दी ही मैं अपना यह प्रस्ताव किसी
विश्वविद्यालय में जमा कराने वाला हूं, डरता हूं कि इसी बीच किसी और
जागरूक ने भी इसी विषय पर पीएचडी करने की ठान ली तो फिर तो निश्चित ही
जूता चल जाएगा..तय मानिए।

अनुज खरे

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

आत्महत्या समाधान नहीं, जीवन का अन्त है

डॉ. महेश परिमल
जब से वैश्विक मंदी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया है, तब से केवल देश ही नहीं, बल्कि महानगरों, शहरों एवं कस्बों में आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया है। हर रोज अखबारों में हम पढ़ते हैं कि फलां शहर में एक व्यक्ति ने घर के सभी सदस्यों को मारकर स्वयं आत्महत्या कर ली। कहीं कोई अपने कार्यालय में ही आत्महत्या कर रहा है, तो कोई घर पर ही इस कार्य को अंजाम दे रहा है। बेकारी से तंग आकर या कर्जदारों की धमकियों से डरकर भी आत्महत्या करने वालों की संख्या कम नहीं है। कई लोग नौकरी से निकाले जाने पर आत्महत्या कर रहे हैं, तो गुजरात में हीरा बाजार में छाई मंदी से बेरोजगार बने कारीगर आत्महत्या कर रहे हैं। इस मंदी ने अब तक हजारों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। आश्चर्य इस बात का है कि सभ्रांत और शिक्षित लोगों में यह अधिक देखा जा रहा है। कई लोग तो केवल किसी दोस्त ने आथर््िाक सहायता नहीं की, इसलिए आत्महत्या कर रहे हैं, तो कुछ को यह भ्रम सता रहा है कि परिवार की बरबादी के लिए वे ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं, इसलिए उन्हें जीने का कोई हक नहीं। मौत को आसानी से गले लगाने वालों की मनोदशा क्या होती है,आखिर क्यों वरदान में मिले जीवन को अभिशाप मानते हैं? किस तरह से आता है उनमें नैराश्य का भाव। आइए इसका विश्लेषण करें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 1 लाख लोगों में से 98 लोग आत्महत्या करते हैं। चीन में आत्महत्या का प्रतिशत एक लाख में 99 है। यह देखते हुए भारत आत्महत्या के मामले में दूसरे नंबर पर आता है। 1995 में 89 हजार लोगों ने आत्महत्या की थी। यह संख्या 1997 में बढ़कर 96 हजार हो गई। 1998 में 1 लाख 4 हजार से भी अधिक लोगों ने आत्महत्या का सहारा लिया था। हमारे स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष सवा लाख लोग आत्महत्या कर मृत्यु को प्राप्त करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि भारत में खुदकुशी करने वालों में 37.8 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। जबकि 71 प्रतिशत 44 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। हाल ही मेें बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों में इस दु:खद सच्चाई को स्वीकार किया गया है।
खुदकुशी का सहारा लेने वाले कोई अलग से नहीं होते। वे अपनों में से ही होते हैं। आत्महत्या की धमकी देने वाले तो आत्महत्या नहीं करते, पर जो हमेशा दूसरों को जीने की प्रेरणा देते रहते हैं, कभी-कभी वे स्वयं भी अपने उपदेशों को भूलकर आत्महत्या का सहारा ले लेते हैं। इसके पीछे हैं कुछ आर्थिक और कुछ सामाजिक कारण। समाज में हमने ही कुछ ऐसे सिद्धांत बना रखे हैं कि अगर वे कुछ नहीं करेंगे, तो समाज क्या कहेगा, हमारी प्रतिष्ठा का क्या होगा? इस भाव से ग्रस्त लोग बहुत ही जल्दी आत्महत्या का सहारा लेते हैं। एक साहब को एक बड़ी कंपनी छोडऩी पड़ी, तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह आ गई कि अब उन्हें कार के लिए ड्राइवर कंपनी से नहीं मिलेगा, अब तक जो कंपनी के नाम से विदेश यात्राएँ होती थी, वे अब नहीं होंगी। यही खयाल उन्हें डिपे्रशन की ओर ले गया और उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उनके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा मौत से भी अधिक प्रिय थी। प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी प्रतिष्ठा के कारण ही कई लोग समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
सुशिक्षित और सभ्य समाज के सक्षम आदमियों को स्वयं ही जिंदगी के सफर को आधे रास्ते पर छोड़ देने का और अंतिम विदा लेने का अमंगल विचार आखिर क्यों आता है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक कारण बताते हुए दिल्ली के आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के मनोचिकित्सक प्रोफेसर मंजू मेहता कहती हैं कि हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में धनोपार्जन के लिए घर से बाहर निकलते परिवार के कमाऊ पुरुष इतने मशीन हो जाते हैं कि वे कमाने के सिवाय और कुछ नहीं सोचते। इस स्थिति के वे इतने आदी हो चुके होते हैं कि घर की आथर््िाक स्थिति खराब होने पर वे हताशा में घिर जाते हैं, उन्हें लगता है कि इसके लिए केवल वे ही जिम्मेदार हैं। उन्हें जीने का कोई अधिकार नहीं है। यह स्थिति भयावह है, इसके लिए सामाजिक व्यवस्था को दोषी मानना चाहिए।
जो आत्महत्या करने वाले होते हैं, कभी-कभी वे इसका हलका-सा संकेत भी देते हैं। हमें इसका ध्यान रखना होगा। कोई व्यक्ति एकाएक जब सभी मित्रों-संबंधियों से उत्साह से लबरेज होकर मिले, भूतकाल में संतानों या मित्रों के साथ किए गए झगड़े या विवाद को भूलकर सुलह करना चाहे। इससे बढ़कर यदि वह अपनी सबसे पसंदीदा चीज को भेंट के रूप में किसी को देने के लिए तैयार हो जाए, तो यह समझना चाहिए कि वह किसी कार्य को अंजाम देने की पूर्व तैयारी कर रहा है। ऐसा कई बार हो चुका है। जो आत्महत्या का संकल्प कर लेते हैं, वे अक्सर अपनों से मिलकर खूब बतियाते हैं। अंत में अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर आए इस तरह के अचानक बदलाव को हमें ध्यान देना होगा। यदि समय रहते इस दिशा में सचेत हो जाए, तो उसे व्यक्ति को बचाया जा सकता है।
सबसे बड़ी बात है अपनों के बीच अपना रहने की कला। कई लोग हमेशा दुत्कार प्राप्त करते हैं। कुछ लोगों को दुत्कार का पहला अनुभव होता है, वे बहुत ही जल्द निराशा से घिर जाते हैं। कुछ लोग खुशियों में भी दु:ख की झलक पाते हैं, तो कुछ लोग दु:ख में भी खुशियों के पलों को एक तरह से चुरा ही लेते हैं। आत्महत्या का प्रयास करने वाले वास्तव में मरना नहीं चाहते, अपनी हरकतों से वे मदद के लिए आर्तनाद करते हैं। ऐसे लोग भले ही जीवन से आशा छोड़ चुके हों, पर हमें उन्हें विषम परिस्थितियों में या रामभरोसे नहीं छोडऩा है। ऐसे लोगों से इस तरह का व्यवहार किया जाए, जिससे उनके मन में ' आज फिर जीने की तमन्ना हैÓ का विचार आए। हताशा से घिरे युवाओं को खुदकुशी के विचार से ही दूर रखने के लिए परिवारजनों को स्नेहभरे वातावरण, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार और तटस्थ व्यवहार की आवश्यकता होती है। जो खुदकुशी के कश्मकश से लगातार जूझते रहते हों, ऐसे लोगों को सांत्वना और हिम्मत देनी चाहिए, ताकि वे जीवन को समाप्त करने के पहले सौ बार सोचें।
अकसर ऐसा होता है कि जिनके मन में आत्महत्या का विचार आ जाता है, वे अपने दिमाग से काम लेना बंद कर देते हैं। वे एकांत में रहना पसंद करते हैं। लगातार कुछ न कुछ बुरा सोचते रहने से वे स्वभाव से चिड़चिड़े हो जाते हैं। उन्हें न तो अपनों का साथ अच्छा लगता है और न ही वे किसी का साथ चाहते हैं। यह स्थिति बहुत ही खतरनाक होती है। ऐसे लोगों के सामने निराशा की बातें तो करनी ही नहीं चाहिए। उसे अपनों के बीच रखने की कोशिश करें। अगर संतानें उसके करीब हों, तो बुरे विचारों का आना रुक सकता है। उसके सामने उसी के जीवन की उन घटनाओं का जिक्र करें, जिसमें उसने साहस का प्रदर्शन किया था। उन बुरे हालात का जिक्र करें, जिसका सामना उसने डटकर किया। उसके जीवन की उपलब्धियों को गिनाना शुरू कर दें, तो उसे लगेगा कि उसमें साहस तो है, जो आज खो गया है। अंधकार भरे जीवन में ऊर्जा और साहस की किरण बनकर उनके जीवन में प्रवेश करें।
यह अच्छी तरह से जान लें कि जीवन एक बार ही मिलता है। यह बहुत ही कीमती है। जीवन लेना सरल है, किंतु जीवन देना मुश्किल है। मुश्किलें तो आती ही रहती हैं, वह हमें तराशने का काम करती हैं। जीवन में मुश्किलें जितनी अधिक आएँगी, इंसान भीतर से उतना ही मजबूत बनता है। आत्महत्या किसी समस्या का समाधान कतई नहीं है। यह निराशा के क्षणों में लिया जाने वाला एक कायराना फैसला है। ईश्वर और माता-पिता की ओर से दिया गया एक तोहफा है, यह जीवन। इसे इस तरह से तो न गँवाया जाए, जिससे मानवता को भी रोना आ जाए। याद रखे, जीवन एक बार ही मिलता है और मौत बार-बार हमारी परीक्षा लेने आती है। जीवन को उससे जीतना ही है, तभी तो मौत को मात देने की हिम्मत पैदा होती है। अंत में एक बात.. अगर आप ईमानदार हैं, तो खुदकुशी नहीं कर सकते।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

अनावश्यक खर्चों के चक्रव्यूह में फँसता मध्यम वर्ग

डॉ. महेश परिमल
आज हमारे देश में हर समस्या के समाधान के लिए कंसल्टेंट की व्यवस्था है। घरेलू झगड़े, व्यापारिक झगड़े, आदि के लिए आपको कंसल्टेंट मिल जाएँगे। पर क्या आप जानते हैं हमारे देश में कंसल्टेंट की सबसे अधिक आवश्यकता मध्यमवर्गीय परिवारों को है, जिससे वे यह समझ सकें कि पैसों को किस तरह से खर्च किया जाए। यह सच है कि पैसा हाथ में आता है, उससे पहले ही उसके खर्च करने का रास्ता तैयार हो जाता है, लेकिन यदि अनावश्यक रूप से पैसों को खर्च किया जाए, तो इसे स्टेटस मेंटेन ही कहा जा सकता है। स्टेटस मेंटेन की सबसे अधिक आवश्यकता मध्यमवर्गीय परिवारों को ही होती है, क्योंकि वे दोहरी मानसिकता के साथ जीते हैं। एक तो अपने बराबर के स्तर के लोगों से ऊपर उठने की स्पर्धा और दूसरी अपने से निम्न वर्ग को नीचा दिखाने की लालसा। इस मानसिकता के चलते स्टेटस मेंटेन करना आवश्यक हो जाता है और यही आवश्यकता तनाव को जन्म देती है। लिहाजा बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है- तनाव मुक्ति के लिए कंसल्टेंट की मदद लेना।
मंदी की पीड़ा भोग रहे मध्यम वर्ग के लोग जब यह कहते हैं कि आजकल खर्च बहुत अधिक बढ़ गया है और घर चलाना मुश्किल हो रहा है, तो इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि अनाज और सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं, इसलिए उन्हें आर्थिक परेशानी से जूझना पड़ रहा है। ऐसा केवल शहरी लोगों में ही देखा जा रहा है। गाँव वाले आज भी अपनी कमाई का काफी बड़ा हिस्सा अपने भोजन पर खर्च करते हैं। शहरी लोग आजकल अनाज पर होने वाले खर्च को कम करके अन्य सुविधाओं पर अधिक खर्च कर रहे हैं। मसलन घर में आने वाले गेहूँ, चावल, दाल, घी-तेल एवं सब्जी पर खर्च कम कर मोबाइल एवं अन्य इलेक्ट्रानिक सामानों पर खर्च कर रहे हैं।
यह जानकारी हाल ही में साल्मोन एसोसिएटस की तरफ से केएसए टेक्नोपेक कंज्यूमर आउटलुक सर्वे में सामने आई। इस सर्वेंक्षण में देश भर के 20 शहरों करीब 60 हजार उपभोक्ताओं को लिया गया। इसमें यह बात खुलकर सामने आई कि शहरी लोग अपने अनाज और किराना सामान में लगातार कटौती कर रहे हैं और सेलफोन, घर के नौकर जैसे स्टेटस सिंबॉल के पीछे काफी खर्च कर रहे हैं। इस तरह से आज की पीढ़ी अभी से कुपोषण को आमंत्रित करने में लगी है। इस कंपनी के सीनियर कंसल्टेंट अक्षय चतुर्वेदी का कहना है कि पिछले दो वर्षों में मध्यम वर्ग के किराना के बिल में 6 प्रतिशत की कमी आई है, दूसरी ओर मोबाइल फोन, इंटरनेट के खर्च में 200 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। मध्यम वर्ग आज शुद्ध घी के बजाए वनस्पति से काम चलाने लगा है। भोजन में दाल, सब्जी और फलों की मात्रा कम होने लगी है। गाँव के किसान आज भी अपनी आवक का 90 प्रतिशत भोजनादि पर खर्च करते हैं, जबकि शहर मध्यम वर्ग आहार पर मात्र 28 प्रतिशत ही खर्च कर रहे हैं। इस वर्ग का फैशन और लाइफस्टाइल पर अधिक से अधिक खर्च हो रहा है।
अभी दस वर्ष पहले तक शहरी जो भी कमाते थे, उसका एक निश्चित हिस्सा बचा लेते थे। बचत की यह प्रवृत्ति अब कमी आने लगी है। इस सर्वेक्षण के अनुसार सन् 2002-2003 में शहरीजनों ने अपनी आवक का लगभग 3.7 प्रतिशत बचत करते थे। एक साल के भीतर ही इस बचत में 24.3 प्रतिशत की कमी आ गई। इस वर्ष उनके खर्च में थिएटर जाकर फिल्में देखने का खर्च बढ़ गया। इस तरह से मनोरंजन पर कुल आवक का 2.7 प्रतिशत खर्च होने लगा। इसके ठीक एक साल बाद यह खर्च 3.1 प्रतिशत बढ़ गया।
नीतिशास्त्र यह कहता है कि इंसान को अपनी आवक का 50 प्रतिशत भाग घर खर्च पर लगाना चाहिए। 25 प्रतिशत दान-धर्म पर और शेष 25 प्रतिशत राशि बचत करनी चाहिए। हमारे देश के शहरीजन इसे नकारते हुए आवक का 25 प्रतिशत बचाने के बजाए अब मात्र 2.8 प्रतिशत बचा पा रहा है। इसके अलावा कई ऐसे परिवार है, जो आवक से अधिक खर्च कर अपनी नींदें ही उड़ा रहा है। अब काफी चीजें किस्तों में मिलने लगी हैं, इसलिए वह कर्ज लेकर भी इन चीजों को खरीद लेता है। वह यह भूल जाता है इन चीजों पर वह जितना खर्च कर रहा है, उसका मूल ब्याज समेत कई गुना बढ़ जाता है। शहरीजन एक से अधिक के्रडिट कार्ड यह सोचते हैं कि हमने अपना खर्च बचा लिया। यहाँ भी उनकी मूर्खता सामने आती है, के्रडिट कार्ड पर कितना अधिक ब्याज देना होता है, यह तो तभी पता चलता है, जब उनके सामने खर्च का ब्यौरा आता है।
आज अधिकांश हाथों पर मोबाइल देखा जा रहा है। अब यह आवश्यकता से अधिक फैशन बनता जा रहा है। एक घर में यदि 5 सदस्य हैं, तो हर सदस्य का अपना मोबाइल होता है। इस दृष्टि से मोबाइल पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। 5-6 वर्ष पहले मोबाइल पर आवक का एक प्रतिशत ही खर्च होता था, अब यह खर्च 70 प्रतिशत बढ़ गया है। इन सबके पीछे देखा-देखी की भावना ही है, जिसके कारण इंसान लगातार खर्च को प्रोत्साहन देता रहता है। इसके लिए टीवी और अखबारों पर आने वाले विज्ञापन भी कम दोषी नहीं हैं, जो व्यक्ति को उत्पाद को खरीदने के लिए लगातार प्रेरित करते रहते हैं।
स्टेेटस मेंटेन एक मृग-मरीचिका की तरह है। इसके पीछे दौडऩे का कोई अर्थ नहीं है। पड़ोसी के पास बाइक देखकर हम अपनी साइकिल बेचकर जब तक बाइक खरीदते हैं, तब तक पड़ोसी एक कार खरीद लेता है। जब हम कार तक पहुँचते हैं, तब तक पड़ोसी एक और महँगी कार खरीद लेता है। हमारा फ्लैट कितना भी आलीशान और पॉश कालोनी में हो, पर पड़ोसी जब बंगला खरीदेगा, तो उसके सामने हमारा फ्लैट फीका ही लगेगा। हमारे हाथ में सादा मोबाइल होगा, तो उसके हाथ में कैमरे और ब्ल्यू टूथ वाला कैमरा होगा। इस तरह से यदि हम पड़ोसी से अपनी तुलना करेंगे, तो पीछे ही रह जाएँगे, यह तय है।
आज मध्यम वर्ग के सामने सबसे बड़ी समस्या घर के सदस्यों का स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई है। शिक्षा के क्षेत्र में भी आज प्रतिष्ठित शाला या कॉलेज, अँगरेजी माध्यम, ट्यूशन, कंप्यूटर आदि मामलों में गलत मापदंडों के कारण बेकार के खर्च खूब बढ़ रहे हैं। 5 लोगों के परिवार में यदि 3 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, तो उस घर की 33 प्रतिशत आय शिक्षा पर ही खर्च होती है। इतना खर्च करने के बाद भी यह गारंटी नहीं है कि बच्चा बेहतर से बेहतर शिक्षा प्राप्त कर रहा है और उसका भविष्य उज्ज्वल है। यही हाल है स्वास्थ्य का। आज एलोपेथी प्रणाली को देखें, तो यह प्रणाली मरीज का बेसब्री से इंतजार करती पाई जाती है। मरीज डॉक्टर के द्वार पर पहुँचा नहीं कि केमिस्ट, पैथालॉजी, अस्पताल, डॉक्टर आदि की फौज खड़ी हुई होती है। मरीज तो लुट जाने के बाद अच्छा होता है, यह जानने की हिम्मत खुद मरीज को भी नहीं होती। इन सबके बीच दान-धर्म की बात करना ही बेकार है। इसलिए यही कहा जा रहा है कि आज मध्यम वर्ग किस तरह से अपना खर्च कम से कम करके सुखी रह सके, यह बताने के लिए अनेक कंसल्टेंट की आवश्यकता है। क्या आपकी जानकारी में है ऐसा कोई कंसल्टेंट?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

चुनाव सामने और मतदाता है कंफ्यूज

डॉ. महेश परिमल
जो राजनीति को अच्छी तरह से समझते हैं, क्या वे बता सकते हैं कि इन दिनों कौन-सा दल किसके साथ गठबंधन कर रहा है? वह कहाँ उसका विरोध कर रहा है और कहाँ समर्थन। मेरा विश्वास है कि यह तस्वीर अभी तक धुंधली ही है। जब इसे राजनीतिज्ञ नहीं समझ पा रहे हैं, तो फिर आम मतदाता की क्या बिसात? वह तो मूर्ख बनने के लिए ही तैयार बैठा है। लुभावने नारे, प्यारे-प्यारे वादों के साथ नेताओं ने अपने भाषणों से उनकी आँखों में एक सपना पलने के लिए छोड़ दिया है। अब मतदाता पालते रहे, उस सपने को, जिसे कभी पूरा नहीं होना है। उसे शायद नहीं मालूम कि मशीन का बटन दबाते ही उसका मत तो पहुँच गया किसी न किसी नेता के पास, पर उसका संबंध टूट गया पूरे 5 साल के लिए सभी नेताओं से।
अब देखो, देखते ही देखते प्रधानमंत्री पद के कितने दावेदार हमारे सामने आ गए हैं। उधर दिल्ली के एक सिख पत्रकार ने गृहमंत्री चिदम्बरम पर जूता क्या फेंका, दो नेताओं की टिकट ही कट गई। एक बॉल से दो आऊट। इससे चुनाव की हवा ही बदल गई है। इस चुनाव की जब रणभेरी बजी थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि वरुण गांधी और जनरल सिंह जैसी घटनाएँ होंगी। अब जब हो गर्ई हैं, तो राजनीति में भी उबाल आ गया है। सारे नेता जोड़-जुगत में लग गए हैं। पर शायद उन्हें नहीं मालूम की 16 मई को यही मतदाता एक नई इबारत लिखने जा रहे हैं, जो देश की तस्वीर बदल देगी। अभी साथ मिलकर चुनाव लडऩे वाले दल चुनाव के बाद भी साथ-साथ होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसके विपरीत एक-दूसरे पर अनर्गल आरोप लगाने वाले चुनाव के बाद एक ही पंगत में भोजन के लिए बैठ जाएँ, तो इसे अनोखा न समझा जाए।
इस समय देश में जो गठबंधन की राजनीति चल रही है, उससे मतदाता तो चकरा गया है। पहले देश में दो ही प्रमुख दल थे, एक कांगे्रस और दूसरी भाजपा। अब तीसरे मोर्चे की बात सामने आ गई है। मतदाता इस तीसरे मोर्चे को हजम करें, इसके पहले ही लालू-मुलायम-पासवान का चौथा मोर्चा सामने आ गया है। संभव है मतदान के पूर्व कोई पाँचवाँ मोर्चा भी आ जाए। अभी जो चौथा मोर्चा है, वह केंद्र में यूपीए सरकार का घटक दल है। चुनाव में यही दल कांगे्रस के खिलाफ हैं। इसके बाद भी अमरसिंह यह कह रहे हैं कि सोनिया गांधी के बिना देश पर गैरसाम्प्रदायिक सरकार बन ही नहीं सकती। रामविलास पासवान कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी तरफ से मनमोहन सिंह ही हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में यूपीए घटक दल कांगे्रस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं, पर पश्चिम बंगाल मेें कांगे्रस यूपीए में नहीं है, ऐसा ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांगे्रस के साथ सीटों का बँटवारा कर रही है। इन हालात में मतदाताओं की क्या हालत होगी, यह पीड़ा वह किससे कहे? वह चकरा गया है, दिग्भ्रमित हो रहा है, क्या करुँ, कहाँ जाऊँ की स्थिति है। है कोई उसकी सुनने वाला?
अभी-अभी मराठा नेेता शरद पवार का बयान आया कि वे भी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। बिगड़ती तबीयत और बढ़ती उमर के कारण प्रधानमंत्री बनने का यह आखिरी अवसर है। इनकी पार्टी ने केवल महाराष्ट्र में ही कांग्रेस के साथ सीटों का बँटवारा किया है। अन्य राज्यों में उनकी पार्टी कांगे्रस के खिलाफ खड़ी है। श्री पवार यह अच्छी तरह से जानते हैं कि चुनाव परिणाम आने के बाद कांगे्रस के साथ रहकर किसी भी हालत में वे कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। इसीलिए उन्होंने चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे में शामिल होकर प्रधानमंत्री बनने के विकल्प खुले रखे हैं। यही कारण है कि आज कांगे्रस में शरद पवार का कोई विश्वास नहीं कर रहा है। कभी वे उड़ीसा में बीजेडी के नवीन पटनायक और वामपंथियों के साथ मंच पर बैठकर अपने स्वभाव का परिचय दे दिया है।
पिछली लोकसभा चुनाव के बाद वामपंथियों के बाहरी समर्थन से यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई थी। अमेरिका के साथ परमाणु-समझौते के मुद्दे पर वामपंथियों ने समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद कांगे्रस ने समाजवादी पार्टी के सहयोग से सरकार बचा ली थी। अभी यही वामपंथी पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव के बाद वे एक बार फिर कांगे्रस के साथ सरकार बना लें, तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वामपंथियों का पहला विकल्प केंद्र में कांगे्रस और भाजपा की भागीदारी के सिवाय तीसरे मोर्चे सरकार बनाने की होगी। यदि यह संभव नहीं हो पाया, तो भाजपा नेताओं में से ही कुछ नेता अलग मोर्चा बनाकर केंद्र के करीब सरक रहे हैं। ऐसी आशंका वामपंथियों को होगा, तो साम्प्रदायिक परिबलों सद़भाव को दूर रखने के नाम पर यूपीए सरकार को समर्थन देकर या उसमें शामिल होने से भी पीछे नहीं रहेंगे। यदि केंद्र में वामपंथियों के सहयोग से सरकार बनी, तो सोचो वामपंथियों की कट्टर शत्रु ममता बनर्जी का क्या होगा?
उत्तर प्रदेश-बिहार में लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी का गणित बहुत ही अधिक अटपटा है। यूपी में मुृख्य लड़ाई मुलायम-मायावती के बीच है। बिहार में मुख्य लड़ाई नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के बीच है। इन दोनों राज्यों में कांगे्रस एक तरह से हाशिए पर ही है। लालू की व्यूहरचना नीतिश कुमार और कांगे्रस को पटखनी देने की है। मुलायम-लालू का गणित ऐसा है कि उनके हाथ में यदि 40-50 सांसद हो जाएँ, तो यूपी में वे तीसरे मोर्चे की मदद के बिना भी सरकार नहीं बना सकते। केंद्र में यदि मुलायम-लालू के समर्थन से यूपीए सरकार बनती है, तो वे उन 40-50 सांसदों के साथ भारी सौदेबाजी कर सकते हैं। यदि तीसरे या चौथे मोर्चे की सरकार बनती है, तो वे प्रधानमंत्री पद के भी दावेदार हो सकते हैं।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाश करात की नजर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। कम्युनिस्ट पार्टी को यदि 70-80 सीटें मिल जाती हैं, और तीसरे मोर्चे की सरकार बनती है, तो सबसे बड़े दल के रूप में प्रकाश करात, शरद पवार, लालू, मुलायम आदि को ठेंगा दिखाते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो सकते हैं। अभी तो वे कांगे्रस द्वारा परमाणु समझौते के मामले पर कांगे्रस द्वारा काटी गई नाक का बदला लेने के लिए सभी राज्यों में जितना हो सके, कांगे्रस को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि तीसरे मोर्चे की सरकार न बने, तो भाजपा और मोर्चे को सत्ता से दूर रखने के लिए कांगे्रस के साथ एक बार फिर हाथ मिलाने की तैयारी कर रहे हैं। इस हालात में पहले की तरह यूपीए सरकार की लगाम अपने हाथ में रखने की तमाम कोशिशें प्रकाश करात करेंगे। लालू-मुलायम-पासवान और पवारकी चौकड़ी मिलकर कांगे्रस को घायल करना चाहती है। पर खत्म करना नहीं चाहती, क्योंकि यदि कांगे्रस खत्म हो गई, तो भाजपा आएगी। भाजपा के भय से ये चौकड़ी आखिर कांगे्रस को ही समर्थन देकर यूपीए सरकार रचने के लिए तैयार हो जाएगी।
इस चुनाव में कांगे्रस के दुश्मन बहुत हैं। पर उसका लाभ उठाने की स्थिति में भाजपा नहीं है। प्रधानमंत्री बनकर अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 दलों को साथ लेकर पूरे 6 साल तक सरकार चलाई। लालकृष्ट आडवाणी के पास इतना धैर्य नहीं है। चुनाव के पहले ही बीजेडी और टीडीपी जैसे दलों ने उनका साथ छोड़ दिया है। बिहार में जेडी यू भाजपा की साथी पार्टी होकर चुनाव लड़ रही है, पर जेडी यू के नेेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार आडवाणी के साथ एक मंच पर बैठने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनके पास मुस्लिम वोट नामक बड़ी बैंक है। उधर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा के मोर्चे से अलग होकर कांगे्रस के सहयोग से चुनाव लड़ रही है। भाजपा तो स्पष्ट बहुमत की आशा ही नहीं रख रही है। इसे भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज पहले ही कह चुकी है। भाजपा के लिए श्रेष्ठ परिस्थिति यह हो सकती है कि उसे कांग्रेस की अपेक्षा कुछ अधिक सीटें मिले और सबसे बड़े दल के रूप में सरकार बनाए। इस सरकार को टिकाए रखने के लिए उसे उड़ीसा की बीजेडी, मायावती और जयललिता जैसी कद्दावर महिलाओं से सौदेबाजी करनी पड़े। इसके बाद फिर उनके नखरे सहने के लिए तैयार रहे।
लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा, इसकी आशंका के साथ ही कई दलों ने उसका साथ छोडऩा शुरू कर सकते हैं और अपने लिए हरियाली भूमि की तलाश कर सकते हैं। ये साथी पंजाब के अकाली, महाराष्ट्र के शिवसैनिकों और बिहार के नीतिश कुमार का समावेश होता है। भाजपा से छिटके कुछ दल मिलकर पाँचवें मोर्चे की तैयारी कर सकते हैं। इसमें असम के गण परिषद, जम्मू-कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस, आंध्र की तेलुगु देशम, ममत बनर्जी की तृणमूल कांगे्रस, उड़ीसा की बीजेडी, जयललिता के अन्नाद्रमुक, पंजाब के अकाली दल और महाराष्ट्र की शिवसेना आदि जुड़ सकते हैं।
संभावित पाँचवें मोर्चे को भाजपा बाहर से समर्थन देकर सत्ता में आ सकती है, ऐसा करने से कांगे्रसियों और वामपंथियों की चाल उलटी पड़ सकती है। पाँचवें मोर्चे की रचना करने का माद्दा केवल शरद पवार में ही है। यही एक ऐसे शख्स हैं, जिसने तमाम प्रादेशिक पार्टियों के साथ हाथ मिलाया है। पहले के चार मोर्चों में वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, तो पाँचवाँ मोर्चा तैयार करने में उन्हें समय नहीं लगेगा। इस तरह से एक नहीं बल्कि एक दर्जन नेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। खैर यह तो मतदाता को नहीं चुनना है। पर अभी दलों के गठबंधन का जो समीकरण है, वह किसी को भी समझ में नहीं आ रहा है। ऐसे में मतदाता क्या करे? यह तो समय ही बताएगा।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

पाँच सामयिक कुंडलियाँ

हाथ उठाने चल पड़े , बिना रीढ़ बेपांव ।
जाग रहें हैं चोर सब , सोया सारा गांव ।
सोया सारा गांव ,सयाने खांस रहे हैं ,
युवक सभी ,मां के पल्लू से झांक रहे हैं ।
दुखिया दास कबीर , बात किस किस की माने ?

देश उठाने चले हैं ये, या हाथ उठाने ?
अपना देश महान है , अपने हृदय विशाल ।
गीदड़ पूजित हो रहे पहन शेर की खाल ।
पहन शेर की खाल , लकड़बग्गे भी हंसते ,
मगर हिरण खरगोश हैं भोले ,प्रायः फंसते ।
जंगल देखे , जंगल में मंगल का सपना ।
हासिलाई में केवल दंगा , अपना अपना ।


सिंह जहां है बादशा‘ , हाथी बस गजराज ।
उस जंगल का रोज ही होता सत्यानाश ।
होता सत्यानाश , नीलगायों सी जनता ,
हाहाकार करे ,पर इससे कब क्या बनता ?
दु£िया दास कबीर , अहिंसा जहां धर्म है ।
साधु साध्वी हिंसक! उनमें शर्म कहां है ?


पूंछ उमेंठी भैंस की ,भैंस हो गई रेल ।
चारा से भी चू पड़ा ,चमत्कार का तेल ।
चमत्कार का तेल, छछूंदर लगा रही है ,
खोटा सिक्का घिसकर सोना बना रही है।
हुए नारीमय पुरुष सब,कटा-कटाकर पूंछ ,
चली नचाती बंदरिया ,इक बंदर बेपूंछ।

पूछ रहा है रेल से , रोलर एक सवाल।
लौह-पांत ने क्यों भरी ,इतनी बड़ी उछाल ?
इतनी बड़ी उछाल, कि अपनी जगह गिर गए।
अभिमन्यु को घेर रहे थे ,स्वयं घिर गए।
सब अपराधी हंस रहे ,रहे अलावा कूद ।
कौन किसे है छल रहा ,देश रहा है पूछ।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

ईमानदार प्रत्याशी यानी नक्कारखाने की तूती

डॉ. महेश परिमल

3 करोड़ खर्चकर संसद पहुँचने वाला ईमानदार रह सकता है?
भारत में चुनाव आते ही विदेशी बैंकों से काफी धन निकाला जाता है। देश में विदेश से धन की आपूर्ति शुरू हो जाती है। भारत के नेता जो लगातार 5 वर्ष तक भ्रष्टाचार के रूप में जो कुछ कमाते हैं, उसका कुछ हिस्सा ही एक बार फिर चुनाव में प्रत्याशी बनकर इनवेस्ट कर देते हैं। यह सभी जानते हैं कि एक प्रत्याशी सरकार द्वारा नीयत राशि से कई गुना अधिक खर्च कर चुनाव जीतता है, लेकिन इस पर अंकुश लगाने में चुनाव आयोग भी स्वयं को लाचार पाता है। आजकल ईमानदार प्रत्याशी का मतलब है कि यह नक्कारखाने में तूतीँ। अब राजनीति ईमानदारों का क्षेत्र नहीं रहा। क्योंकि संसद के चुनाव में कम से कम तीन करोड़ रुपए खर्च करने वाला प्रत्याशी क्या सचमुच ईमानदार रह सकता है? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसे इस बार हमें हल करना हैँ।
चुनाव में धन के बेपनाह खर्च पर लगाम रखने के लिए सन 1951 के लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 में यह कहा गया है कि यदि कोई प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में खड़ा हुआ है, तो वह अधिक से अधिक 25 लाख रुपए और विधानसभा चुनाव लडऩे वाला अधिक से अधिक 5 लाख रुपए खर्च कर सकता है। इस धारा मेें एक यह चालाकी की गई है कि सत्ता की ओर से चुनाव प्रचार के लिए जो कुछ भी खर्च किया जाएगा, उसका समावेश प्रत्याशी के खर्च में नहीं जोड़ा जाएगा। अभी यह हाल है कि सत्ता पक्ष की तरफ से प्रत्याशी के लिए पोस्टरों, बैनरों और पाम्पलेट्स आदि छापी जाती है, तो इसे प्रत्याशी के खर्च में नहीं जोड़ा जाएगा। इसके अलावा पार्टी की तरफ से उसे यदि प्रचार के लिए वाहन की व्यवस्था की जाती है, तो उसका खर्च भी प्रत्याशी के खर्च में नहीं जोड़ा जाएगा। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि कोई प्रत्याशी लोकसभा में जाने के लिए उम्मीदवार बनकर लोगों का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, तो उसे चुनाव में 25 लाख रुपए भी खर्च करने की क्या आवश्यकता है? भारतीय कानून ने ही यह व्यवस्था दी है कि प्रत्याशी चुनाव में 25 लाख रुपए तक खर्च कर सकता है। इसका मतलब यही है कि जिसमें 25 लाख रुपए खर्च करने की कुब्बत हो, वह चुनाव में खड़ा हो। यही कारण है कि आज मध्यम वर्ग को कोई भी व्यक्ति चुनाव में खड़ा होने की सोच भी नहीं सकता।
यहाँ यह बात विचारणीय है कि यदि उम्मीदवार नि्िरश्चत रूप से ईमानदार, लायक और लोकप्रिय है और लोग उसके चरित्र और उसके काम को जानते-समझते हैं, तो फिर उस लायक उम्मीदवार को क्या आवश्यकता है पोस्टरों, बैनरों और पांपलेट्स की? अपना प्रचार करने के लिए उसे किराए के आदमियों की जरूरत क्यों पड़ती है? यदि वह सचमुच लायक है, तो वह नहीं उसका काम बोलेगा। उसे तो एक शब्द बोलने की जरूरत ही नहीं होगी। जिस उम्मीदवार में सांसद बनने की काबिलियत नहीं होती, उसे यह सब सहन करना पड़ता है। उसे पदयात्रा करनी पड़ती है। सभाओं को संबोधित करना पड़ता है। सभा के लिए किराए के आदमियों की व्यवस्था करनी पड़ती है। उन्हें धन भी देना पड़ता है। लोक प्रतिनिधित्व कानून ने ही यह व्यवस्था दी है कि प्रत्याशी 25 लाख रुपए खर्च कर सकता है। इसमें जो इतना धन खर्च कर सकता है, वह लोकप्रिय न भी हो, तो चलेगा। बस वही चुनाव में खड़ा हो जाता है।
आज कोई एक प्रत्याशी ऐसा बता दें, जिसमें अपने चुनाव प्रचार के लिए एक पैसा भी खर्च न किया हो और चुनाव जीत गया हो? भारतीय कानून ने ही यह व्यवस्था दी है कि प्रत्याशी बेपनाह खर्च कर मतों की खरीद-फरोख्त कर सकता है। उसी का दुष्परिणाम है कि चुनाव प्रचार के शोरभरे माहौल में यदि कोई ईमानदार प्रत्याशी खड़ा भी हुआ है, तो उसकी आवाजा नक्कारखाने में तूती की तरह होती है। उसे कोई सुन नहीं पाता। इसी कारण आजकल ईमानदार लोगों ने राजनीति को अलविदा कह दिया है। अब मैदान उनके हाथ में है, जो जीतने के लिए ऐन केन प्रकारेण बल का प्रयोग कर सकता हो। यदि यह कहा जाए कि जनता खुद अपना प्रतिनिधि चुने, तो उसके लिए हमारे कानून में ऐसी व्यवस्था है ही कहाँ?
चुनाव आयोग ने यह तय कर दिया कि लोकसभा प्रत्याशी 25 लाख रुपए खर्च कर सकता है। तो प्रश्न यह उठता है कि यह 25 लाख रुपए उसे कौन देगा? और क्यों देगा? यदि उम्मीदवार यह कहे कि यह खर्च मैं अपनी कमाई से कर रहा हूँ, तो उसे कर्ण का अवतार माना जाना चाहिए। उसे यह अच्छी तरह से पता होता है कि जितना खर्च वह चुनाव में करेगा, उससे कई गुना तो उसे भविष्य में भ्रष्टाचार के माध्यम से मिल जाएगा। इस तरह से वह चुनाव में खर्च कर अपने धन का इनवेस्टमेंट करता है। यदि कोई उम्मीदवार यह दावा करता है कि चुनाव जीतने के लिए उसने कोई खर्च नहीं किया है, जो भी किया है, उसके मित्र या फिर पार्टी की तरफ से किया गया है, तो इस दावे की गहराई में जाएँ, तो कई रहस्य अपने आप ही खुल जाएँगे।
पहले पार्टी की तरफ से मिलने वाले धन की चर्चा की जाए। यदि अपने प्रत्याशी को पार्टी धन देती है, तो फिर पार्टी के पास यह धन कहाँ से आया? पार्टी कोई बिजनेस तो करती नहीं? पार्टी के पास जो धन आता है, वह उद्योगपतियों, कालाबाजारियों, असामाजिक तत्वों, माफियाओं की तरफ से आता है। सूचना के अधिकार के तहत कोई इस खर्च को जानना चाहे, तो उसे समुद्र में जमी बर्फ की वह शिला ही दिखाई देगी, जो बाहर से काफी छोटी दिखाई देती है, पर भीतर से विशालकाय है। इस देश में एक धार्मिक संस्था को भी अपने खर्च का हिसाब सरकार को देना होता है, लेकिन राजनैतिक दलों को अभी तक इससे दूर रखा गया है। यदि राजनैतिक दलों के लिए भी यह नियम बना दिए जाएँ कि उन्हें भी अपना खर्च बताना होगा, तो सभी को पता चल जाएगा कि उन्हें धन कहाँ से प्राप्त होता है। प्रत्याशी को धन देने वाले जो मित्र होते हैं, वे कौन हैं? उन्होंने अपने किस स्वार्थ के कारण उसे धन दिया है, वह धन उन्हें किस तरह से वापस मिलेगा, यह जानने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, अब समय आ गया है कि जनता अपने इस अधिकार का प्रयोग करे। अफसोस इस बात का है कि जनता के इस अधिकार की कोई इज्जत ही नहीं करता।
आखिर जनता कब तक ऐसे प्रत्याशियों का चुनाव करती रहेगी, जो उसे पसंद ही नहीं है। यदि उसे अपना मत देकर विजयी बना दिया, तो फिर उसके पास कौन सा अधिकार बचता है, जिसके आधार पर वह उस प्रत्याशी को वापस बुला सके, जिसने जनता के प्रतिनिधि होने का केवल सपना ही दिखाया। जनता का तो कोइ्र्र काम उसने नहीं किया। बस अपना ही घर भरा। अब तो मतपत्र में एक कॉलम और होना चाहिए, जिसमें यह लिखा हो कि इसमें से कोई नहीं। यदि इस पर अधिक लोगों की सहमति होती है, तो वहाँ पर दूसरे प्रत्याशियों को सामने लाकर चुनाव कराया जाए। इससे ईमानदार और काम करने वाले चेहरे सामने आएँगे। संभवत: लोकतंत्र का चेहरा ही बदल जाए। यही समय है जनता स्वयं को महत्वपूर्ण माने। अब यदि समय गया, तो समझो 5 साल की फुरसत। जनता की तरफ झाँकने वाला भी कोई नहीं होगा।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के एक लाख पृष्ठ होंगे उपलब्ध

हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिशचंद्र की रचनाओं से लेकर अब तक के संपूर्ण श्रेष्ठ हिन्दी साहित्य के एक लाख रिपीट 100000 पृष्ठ इंटरनेट पर डाले जा रहे हैं ताकि देश-विदेश के हिन्दी प्रेमी घर बैठे पुस्तकों को पढ सकें। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मदद से पहली बार यह महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है जिससे हिन्दी का संपूर्ण श्रेष्ठ साहित्य कम्प्यूटर पर क्लिक करते ही उपलब्ध हो जाएगा। यह साहित्य विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिंदी समय डाट काम पर देखा जा सकेगा। विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने रविवार को यहां बताया कि अंग्रेजी में क्लासिक रीडर डॉट काम ऐसा वेबसाइट है जिस पर क्लिक करते ही अंग्रेजी के किसी भी बडे लेखक की रचनाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हो जाती है। हिन्दी में अभी तक कोई ऐसी वेबसाइट नहीं है जिस पर सभी श्रेष्ठ हिन्दी साहित्य को इंटरनेट पर पढा जा सके। श्री राय विश्वविद्यालय की तीन पत्रिकाओं बहुवचन, पुस्तक वार्ता और ंिहंदी के लोकार्पण समारोह में भाग लेने कल यहां आए हुए थे। इन पत्रिकाओं का लोकार्पण विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि कुंवर नारायण ने किया। उन्होंने बताया कि इस योजना पर करीब पांच करोड रुपये खर्च आएंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हमें अभी करीब दो करोड रुपये दिए हैं। योजना के तहत जिन लेखकों की कॉपीराइट खत्म हो गई है। उनकी रचनाएं हम वेबसाइट पर डालेंगे। श्री राय ने बताया कि इसके अलावा आज के जो भी लेखक अपनी कृतियों को वेबसाइट पर देना चाहेंगे, वे भी दे सकेंगे। हम उनकी तथा प्रकाशक की अनुमति से उनकी पुस्तकों को भी वेबसाइट पर डाल देंगे जिससे दुनिया भर में बैठे हिन्दी प्रेमी हिन्दी साहित्य के विशाल भंडार से परिचित हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमने एक संपादकीय मंडल भी बनाया है जो इन रचनाओं का चयन करेगा। उन्होंने बताया कि बाद में इन रचनाओं को विभिन्न विदेशी भाषाओं में भी अनुदित करने की योजना है ताकि अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, इतालवी, रूसी, चीनी भाषा में भी लोग हिन्दी साहित्य से परिचित हो सकें। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय की हिन्दी पत्रिका पुस्तकवार्ता बहुवचन और हिन्दी साहित्य के बारे में अंग्रेजी पत्रिका हिन्दी को भी वेबसाइट पर डाला जा रहा है। इसके अलावा पिछले दिनों विश्वविद्यालय में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढे गए परचों और दिए गए वक्तव्यों को भी वेबसाइट पर डाला जा रहा है। हिन्दी के दिग्गज लेखकों की रचनाओं की संचयिता भी हम प्रकाशित कर रहे हैं।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

राम कुमार रामार्य की पाँच ग़ज़लें

1 . बोतलों में बंद पानी

पर्वतों चट्टान पर ठहरा नहीं ,स्वच्छंद पानी ।
लिख रहा बंजर पड़े मैदान पर ,नव-छंद पानी ॥

सभ्यता के होंठ पर दो बूंद तृप्ती छींटकर ,
बह नहीं सकता नदी सा ,बोतलों में बंद पानी ॥

है चमक आंखों में ,चेहरों में चमक है ,
इसलिए निर्मल कि रचता ,कुछ नहीं छल-छंद पानी ॥

आग की लपटों से लहरें ,होड़ ले लेकर लड़ें ,
जीत के इतिहास में रुतवा ,रखे बुलंद पानी ॥

रोज कितने फूटते हैं ,द्वेष के विष कूट-काले ,
डाल देता दहकते अंगार पर ,आनंद पानी ॥

जब जहां दिल चाहता बस फूट पड़ता है वहां ,
कब कहां करता किसी से ,कोई भी अनुबंध पानी ॥

2. भीड़ की भैंगी नज़र

क्यों भला अब दिल को मैं तड़पाऊँगा ?
याद तेरी आएगी तो गाऊँंगा ॥

भीड़ की भैंगी नज़र लग जाएगी ,
दर्द को एकांत में सहलाऊँंगा ॥

हर शहर में शोर है , बारूद है ,
किस जगह मैं प्यार को ले जाऊँंगा ॥

है बहुत बदला हुआ माहौल , उफ्
क्या पता मैं कैसा चेहरा पाऊँगा !!

एक सच ,सौ मौत मरता है यहाँ ,
मैं भी इक दिन मुफ्त मारा जाऊँंगा ॥

आऊँगा ,मैं आऊँगा ,मैं आऊँगा ,
फिर वही कोरा हृदय मैं लाऊँगा ॥
-


3 . गुल्लक की पूँजी


पागलपन की हद तोड़ी तो होश में आया ।
यादों की डयोढी छोड़ी तो होश में आया ॥

उसके बोल , अदाएं उसकी , हीरे मोती ,
गुल्लक की पूंजी जोड़ी तो होश में आया ॥

बंधी रह गई अस्तबलों में भरी जवानी ,
उम्र हुई बूढ़ी घोड़ी तो होश में आया ॥

पकी हुई सूखी बल्ली दो टूक हो गई ,
इक दुखती उंगली तोड़ी तो होश में आया ॥

मेरे पीछे सूनापन था ,सन्नाटा था ,
आज यूँ ही गर्दन मोड़ी तो होश में आया ॥

आदर्शों के इन्द्रधनुष झूठे होते हैं ,
'ज़ाहिद' उम्र बची थोड़ी तो होश में आया ॥

4 . अक्ल के अंधे

नींद आती नहीं है ,ख्वाब दिखाने आए ॥
अक्ल के अंधे गई रात जगाने आए ॥

जिस्म में जान नहीं है मगर रिवाज़ तो देख ,
चल के वैशाखी मेें ये देश चलाने आए ॥

बीच चौराहे में फिर कोई मसीहा लटका ,
मुर्दे झट जाग उठे ,लाश उठाने आए ॥

जिसको बांहों में ,बंद मुट्ठियों में रखना है ,
ऐसी इक चीज़ को ये अपना बनाने आए॥

कुछ गए साल गए वक्त क़ा खाता लेकर ,
मेरे नामे पै चढ़ा क़र्ज़ बताने आए ॥

सर पै 'जाहिद'के हादिसों की यूं लाठी टूटी ,
जैसे अब सरफिरे की अक्ल ठिकाने आए ॥


5 . है हवा गर्म


अच्छे लगते हुए हर लम्हे बचाए कल के ।
आज तक हम सभी बस इस तरह आए चल के ॥

कुछ को छोड़ा किया ,पकडा किया ,अनदेखा किया ,
यूं परेशानी के पेशानी से साए ढलके ॥

तुमने कुछ अलहदा कुछ मैंने अलहदा पाए ,
दाने जो बालियों से हमने उठाए मल के ॥

दोस्त!क्यों रंज की ,शिकवे गिले की बात करें ,
शदमानी के तो लम्हे ही हैं आए पल के ॥

जिस तरफ से लगे अच्छा कि उधर से देखो ,
चेहरा ख्यालातो तसव्वुर के बजाए ढलके ॥

ज़िन्दगी तो वही 'ज़ाहिद' जहां ख़ुदाख्याली हो ,
है हवा गर्म ,सबा अब के ना आए जल के ॥

डॉ . रामकुमार रामार्य, सिवनी रोड , नैनपुर

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

कब तक छलोगे राम को


नीरज नैयर
कहने वाले ने सच ही कहा है, खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को इस सियासत से ये वो औरते हैं जो ताउम्र पेशा कराती हैं. वर्तमान में राजनीति का स्वरूप इतना विकृत हो चला है कि इससे ताल्लुकात रखने वाले भगवान को भी छलने का मौका नहीं चूकते. खुद को हिंदू हितों की सबसे बड़ी पैरोकार बताने वाली भाजपा सालों से ऐसा करती आ रही है. इस बार भी वेंटिलेटर पर पड़ी भाजपा खुद को पुन:जीवित करने के लिए राम की शरण में है, पार्टी राम मंदिर निर्माण के प्रति खुलकर प्रतिबध्दता जता रही है.
अभी कुछ दिन पहले जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राम नाम के मार्ग पर लौटने की घोषणा की तो किसी को अचं भा नहीं हुआ, होना भी नहीं चाहिए था क्योंकि सब जानते हैं कि दुर्दिनों में ही भगवान की याद आती है और वैसे भी जिस पार्टी के पास न मुद्दे हों न एकजुटता उसका तो राम की शरण में लौटना स्व भाविक है. भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि लोकस भा चुनाव में रामनाम के सहारे हिंदुत्व की लहर पैदा करके ठीक वैसा ही माहौल तैयार किया जा सकता है जैसा 1999 में किया गया था. इसीलिए एक तरफ पार्टी मंदिर निर्माण की बात दोहरा रही है तो दूसरी तरफ वरुण गांधी जैसे उसके सिपहासलार समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगल रहे हैं. वरुण गांधी ने जिस तरह से पीलीभीत में भड़काऊ भाषण दिए और उसके बाद जिस तरह से भाजपा ने उनसे पल्ला झाड़ा यह सब प्रायोजित नजर आ रहा है. राजनीति की दुनिया में पैर जमाने की कोशिश कर रहे वरुण के मुंह से जो कटु शब्द निकले हैं वो उनके कम पार्टी के कट्टरवादी नेताओं के ज्यादा नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधानस भा चुनाव के वक्त भh भाजपा ने ऐसे ही जहरीली सीडी जारी करके मुस्लिमों को निशाना बनाया था.
यह बात सही है कि चुनाव में जात-पात, धर्म-समुदाय के हिसाब से वोट आज भी वि भाजित होते हैं लेकिन फिर भी स्थिति अब 10 साल पुरानी नहीं है. आज लोग समझने लगे हैं कि भगवान के नाम पर, समुदाय के नाम पर आपस में भिड़ाने वाले उनका कितना भला कर सकते हैं. शायद यही कारण हैं कि भगवा झंडा बुलंद करने वाली पार्टियो का वोट प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है. गुजरात में नरेंद्र मोदी जरूर अपवाद साबित हुए हैं परंतु बाकी राज्यों में हालात हालिया हुए विधानस भा चुनावों में सामने आ चुके हैं. राम नाप जपना या भगवान की शरण में लौटना गलत नहीं है, हर पार्टी की अपनी अलग विचारधारा होती है और उसे उस पर कायम रहने का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस तरह का दोहरा रवैया भाजपा अपनाती रही है उसने लोगों को सोच को परिवर्तित किया है. बाबरी विध्वंस के बाद मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा ने जो अभियान चलाया था उसी की बदौलत उसे केंद्र की सत्ता में जगह बनाने का मौका मिला. पार्टी नेता लंबे समय तक मंदिर के प्रति प्रतिबध्दता जताते रहे. मगर सत्ता के मोहपाश ने उन्हें राम से दूर कर दिया. पूरे पांच साल न तो उन्हें राम का ही ख्याल आया और न उनके भक्तों का. 2004 के लोकस भा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के पीछे यह सबसे बड़ा कारक रहा.
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार ने जो शासन चलाया था उसे देखकर कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि वाजपेयी पुन: प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे. संतुलित सरकार चलाने बावजूद राजग को हार का सामना करना पड़ा तो सिर्फ और सिर्फ विचारधारा से अलग चलने की वजह से. 1990 के दशक में भाजपा की पहचान कट्टरवादी हिंदू पार्टी के रूप में थी. कम से कम हिंदुवादी तो यही समझते थे कि केवल भाजपा ही है जो हमारे हितों के लिए खुलकर लड़ सकती है. लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भी पार्टी की हिंदुवादी छवि को और पुख्ता किया. मगर जिस तरह से झोपड़ी में रहने वाले का मिजाज महल में पहुंचकर बदल जाता है ठीक वैसे ही सत्ता में पहुंचने के बाद भाजपा का मिजाज भी बदल गया. और अब फिर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए राम नाम को सीढ़ी बनाने में लगी है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी के बयान से साफ हो जाता है कि मंदिर निर्माण की बातें महज हिंदूवोट खींचने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं. नकवी कह चुके हैं कि भाजपा कोई कंसट्रक्शन कंपनी नहीं जो मंदिर का निर्माण करवाएगी. मतलब भाजपा पुन: राम को छलने की कोशिश में है लेकिन जिस तरह से जनता जागरुक हो गई है वैसे ही भगवान राम भी उतने उदारवादी नहीं रहे कि बार-बार छलावा करने वाली पार्टी का बेड़ा पार लगा दें.
राम नाम का सहारा लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकेने वाली भाजपा अगर अन्य मुद्दों की तरफ ध्यान केंद्रित करती तो शायद उसे जनता का भी साथ मिलता और भगवान राम का भी. क्योंकि यूपीए सरकार के कार्यकाल में जनता ने खुशी से ज्यादा आंसू बहाए हैं. कमरतोड़ महंगाई और पूंजीवादियों की जेब भरने की यूपीए की नीतियों से जनता पूरी तरह त्रस्त हो चुकी है, ऐसे में भाजपा के पास दूसरा विकल्प बनने का सुनहरा मौका था जिसे अब वो काफी हद तक गवां चुकी है
नीरज नैयर

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सियासत की हकीकत से हर कोई नहीं वाकिफ

डॉ. महेश परिमल
भारतीय प्रजातंत्र की जब भी बात होती है, हमारे देश के नेता इसे देश की आधारशिला निरुपित करते हैं। यहाँ बहुमत का बोलबाला है। बहुमत के नाम पर ऐसा बहुत कुछ हो जाता है, जो प्रजातंत्र की सीमा में नहीं आता। हमारे देश में अभी 15 वीं लोकसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। इस चुनाव में जो भी प्रत्याशी विजयी होता है, तो उसका विजय जुलूस निकलता है। अपने भाषण में वह मतदाताओं का आभार मानता है कि उन्होंनें उसे बहुमत से विजयी बनाया। इसके साथ ही पराजित प्रत्याशी का कहना होता है कि लोगों ने अपने मत के माध्यम से जो आदेश दिया है, वह सर माथे पर। क्या हकीकत यही है? क्या विजयी प्रत्याशी या दल हमेशा ऐसा दावा करने की स्थिति में होता है कि अधिकांश मतदाताओं ने उन्हें पसंद किया है।
अब तक हमारे देश में हुए 14 लोकसभा चुनाव में कभी भी 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं से मतदान नहीं किया है। सत्ता प्राप्त करने वाले किसी भी दल ने कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं किया है। दूसरे शब्दों में अब तक जितने भी दल सत्ता पर काबिज हुए हैं, उन्होंने 30 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। इसके बाद भी वे बहुमत का दावा कर सिंहासन पर आरूढ हुए हैं। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद जो सहानुभूति लहर चली और कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की, तब उसे 55 प्रतिशत नागरिकों ने मतदान किया था। कांग्रेस को कुल मतदान का केवल 37 प्रतिशत मत ही मिले थे। इस तरह से कुल मतदाताओं का केवल 20 प्रतिशत लोगों का समर्थन प्राप्त कर नरसिंह राव 5 वर्ष तक आराम से शासन करते रहे। जिन 80 प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को वोट नहीं डाला था, उन्हें भी पूरे 5 वर्ष तक कांग्रेस का शासन सहन करना पड़ा था।
1977 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल समाप्त कर नए चुनाव की घोषणा की थी, तब जनता पार्टी सत्ता पर काबिज हुई थी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। इस जनता पार्टी के पास उस समय कुल मतदान का 41.03 प्रतिशत ही मत थे। भारतीय मतदाताओं ने सबसे अधिक समर्थन जिस दल को दिया है, वह 1984 में बनी राजीव गांधी कांग्रेस सरकार ही थी। उस समय कांग्रेस को 49.1 प्रतिशत मत मिले थे, शेष 50.9 ने कांग्रेस के खिलाफ ही वोट दिया था।
भारतीय संविधान में सरकार बनाने की जो पद्धति है, वह ब्रिटिश संविधान से प्रभावित है। यह पद्धति आज बिलकुल भी प्रासंगिक नहीं है। हर 5 वर्ष बाद हमारे देश में लोकसभा चुनाव होते हैं, इसमें जिस पार्टी को जितने अधिक प्रतिशत मत मिले, आवश्यक नहीं है कि सरकार उसी पार्टी की बने। 1998 के चुनाव में कुछ ऐसा ही हुआ था। इस चुनाव में भाजपा को कुल मतदान का 25.6 प्रतिशत मत ही मिले। दूसरी ओर कांग्रेस को इससे .2 प्रतिशत यानी 25.8 प्रतिशत मत मिले, इसके बाद भी सरकार भाजपा की बनी। अधिक मत मिलने का आशय यह कतई नहीं है कि अधिक सीटें मिले। भाजपा को इस चुनाव में कुल 182 सीटें मिली थीं, उधर अधिक मत प्राप्त करने वाली कांग्रेस को कुल 141 सीटें मिली थी। इस तरह से कम मत प्राप्त करने वाले दल अन्य दलों का सहारा लेकर सत्ता पर काबिज हो सकते हैं।
यह आवश्यक नहीं है कि लोकसभा चुनाव में राजनैतिक दलों को जो सीटें प्राप्त होती हैं वह उन्हें प्राप्त हुए मतों के बराबर हो। 1984 के चुनाव में कांग्रेस को 49 प्रतिशत मत के साथ लोकसभा की 70 से भी अधिक सीटें मिली थी। इसके विपरीत 1977 में जनता पार्टी को 41.3 प्रतिशत मत मिले, पर सीटों की संख्या 60 थी। 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 28.3 मत मिले थे, इसके खिलाफ भाजपा को 23.75 प्रतिशत ही मत मिले, इसे यदि सीटों की दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस को 114 और भाजपा को 182 सीटें मिली थी। इस तरह से देखा जाए, तो जितने मतदाता भारत में है, उसके मात्र 12 प्रतिशत मतदाताओं के समर्थन के साथ भाजपा ने 33 प्रतिशत सीटें प्राप्त की थी और भाजपा ने पूरे 5 साल तक शासन चलाया। 2004 के चुनाव में देखा जाए, तो कांग्रेस को मिले मतों के प्रतिशत में कमी आई थी, फिर भी कांग्रेस सत्ता पर काबिज हो गई।
भारतीय लोकतंत्र में जनता के फैसले का अनादर किया जाता है, इसके बाद भी हमारे इसे बदलने के लिए हमारे राजनेता आतुर दिखाई नहीं देते। इस प्रणाली में मतदाताओं को मूर्ख बनाकर सत्ता पर कब्जा करना उनकी आदत में शामिल हो गया है। जहाँ भारतीय लोकतंत्र वर्षों से एक ही ढर्रे पर चल रहा है, वहीं विश्व के अनेक देशों में कुछ अलग ही तरह की चुनाव प्रक्रिया अस्तित्व में है। पश्चिम यूरोप के देशों में जो दल जितने प्रतिशत मत प्राप्त करता है, उतने प्रतिशत सीटें उसे संसद में प्राप्त होती है। इस प्रणाली को पी आर (प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम) कहा जाता है। जर्मनी में संसद की 50 प्रतिशत सीटें भारत की तरह बहुमत के आधार पर भरी जाती हैं। शर्त इतनी ही होती है कि ये 50 प्रतिशत सीटें किसके हिस्से जाएगी, इसके लिए सभी प्रत्याशियों की सूची राजनैतिक दल चुनावी मैदान में उतरने के पहले ही घोषित करनी पड़ती है। पश्चिम यूरोप, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, बेल्जियम, इटली, स्विटजरलैंड, में तो 'अनुमानित प्रतिनिधित्व' की पद्धति से जितने प्रतिशत मत प्राप्त किए हैं, उतने प्रतिशत सीटें राजनैतिक दलों को प्रदान की जाती है। भारत में 1999 के चुनाव में यह प्रणाली अपनाई जाती, तो कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें लोकसभा में प्राप्त हुई होती। फ्रांस में संसद सदस्यों के चुनाव के लिए दो बार मतदान कराया जाता है। पहले चरण में जिन प्रत्याशियों को सबसे कम मत मिले हों, उनको हटाकर मुख्य प्रतिस्पर्धियों के बीच दूसरी बार मतदान कराया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में जितने उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं, उन्हें रेंक दे दिया जाता है। इस रेंक के आधार पर सबसे योग्य प्रत्याशी का चुनाव किया जाता है।
भारतीय प्रजातंत्र में ऐसी विचित्र परिस्थिति है कि मतदाता के सामने उनका सांसद भी होता है, जिसके मत से प्रधानमंत्री का चुनाव होता है। इसमें कई बार ऐसा होता है कि सांसद आपराधिक प्रवृत्ति का है, फिर भी वह जिस पार्टी के लिए खड़ा होता है, वह भी प्रधानमंत्री चुनने के लिए महत्वपूर्ण साबित होता है। इस परिस्थिति में अपना वोट किसे दिया जाए, मतदाता को यह उलझन होती है। केंद्र सरकार में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चुनाव आम मतदाता नहीं करता। जिसने कभी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी वह प्रधानमंत्री बन सकता है। अब राय की बात करें, तो राय में मुख्यमंत्री ही सब कुछ होता है। इसका चुनाव भी मतदाता नहीं करते। जिसने कभी विधानसभा चुनाव न लड़ा हो, वह भी मुख्यमंत्री बन सकता है। फिर 6 महीनों के अंदर उसे विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में खड़े होकर विजयश्री हासिल करनी होती है।
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे मतदान के माध्यम से होता है। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति कभी सेनेट के मोहताज नहीं होते। भारत में जिस तरह सांसदों की खरीद-फरोख्त कर प्रधानमंत्री की कुर्सी को खतरे में डाला जाता है, या फिर प्रधानमंत्री को कुर्सी छोड़ने के लिए विवश किया जाता है, ऐसा अमेरिका में कभी नहीं होता। क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को सेनेटर नहीं, बल्कि आम मतदाता चुनता है।
भारतीय परिदृश्य में देखें तो अब समय आ गया है कि देश के प्रबुद्ध मतदाताओं और धर्मगुरुओं को जागरुक बनकर इस प्रणाली को बदलने के लिए अभियान चलाना चाहिए। देशसेवा के नाम पर मलाई मारते, विदेशी शक्तियों के दलाल बने ऐसे सांसदों की पकड़ से देश को मुक्त कराया जाए, तभी हमारा देश सच्चे अर्थों में 'स्वतंत्र' राष्ट्र कहलाएगा।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 28 मार्च 2009

अतिथि भिक्षुक भव:


डॉ. महेश परिमल
शीर्षक निश्चित रूप से आपको चौंका सकता है। पर सच यही है कि आज अतिथि हमारे लिए चाहे कुछ और हो, पर देवता तो है ही नहीं। उसकी स्थिति किसी भिखारी से कम नहीं होती। आप कहेंगे, ये भी कोई बात हुई। अतिथि भला हमारे लिए भिखारी कैसे हो सकता है? हमारे देश की यह परंपरा है कि अतिथि को देवता की तरह पूजना चाहिए। इसे एक जुमला ही कहा जाएगा, क्योंकि आज अतिथि किसी परेशानी से कम नहीं है। पर यहाँ तो बात ही दूसरी है। शादी का मौसम आ गया है। लोगों का अतिथियों से सामना होने लगा है। कई लोग अतिथियों से परेशान भी हो जाते होंगे। पर कई लोग ऐसे भी हैं, जिनके हृदय में अतिथियों के लिए सम्मान होने के बाद भी आधुनिक परंपराओं से इतने जकड़े हुए हैं कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। इसके लिए आपको वह घटना अवश्य बतानी पड़ेगी, जिसमें एक पत्र पाते ही एक मित्र के पैरों तले जमीन खिसक गई। हुआ यूँ कि बेटी की शादी की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर के साथ चल रही थी। बेटी का पिता भी खुशी-खुशी सारे काम-काज देख रहा था। अचानक उसके हाथ में एक व्यक्ति एक कोरियर पत्र दे गया। पत्र देखकर वह बहुत ही खुश हुआ। ये तो मेरे बचपन के दोस्त का पत्र है। देखें, क्या लिख रहा है? आएगा तो अवश्य, पर शादी से पहले पत्र की आवश्यकता क्यों पड़ी? इन जिज्ञासाओं के साथ उसने पत्र खोला। पढ़ा और निढाल होकर पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। लोग चिंतित हो गए। भाग-दौड़ थम गई। लोग दौड़े-दौड़े आए, आखिर क्या हो गया? बेटी भी दौड़ती चली आई। उसने पिता को देखा। उनका चेहरा एकदम ही निस्तेज हो गया था। अवश्य ही कोई बुरी खबर आई है। पिता को पानी पिलाकर सांत्वना देने की कोशिश की गई। जिज्ञासावश बेटी ने पिता के हाथ में रखा पत्र पढ़ लिया, जो इस प्रकार था-
''तुम्हारी बेटी, नहीं, मेरी बेटी की शादी है, आऊँगा अवश्य आऊँगा। ऐसा कभी हो भी सकता है, भला मैं अपने परिवार के साथ न आऊँ। पर मेरे भाई, अगर तुमने शादी में बुफे सिस्टम रखा है, तो हमें माफ करना, क्योंकि भिखारी की तरह कतार में खड़े होकर भोजन करना हम इंसानों को शोभा नहीं देता। इस तरह से तुम हमारा सम्मान नहीं, अपमान ही करोगे। तुम मुझे सबके सामने दो थप्पड़ मार दोगे, तो इसे मैं तुम्हारा प्यार समझूँगा, पर लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना मुझे ही नहीं, मेरे परिवार वालों को भी गवारा नहीं है, इसलिए क्षमा करना भाई, हम नहीं आ सकते।''
एक-एक करके सभी ने पत्र पढ़ा। सभी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थी। बात गलत तो नहीं थी, पर उस पर अमल कैसे किया जाए? अब तो सब-कुछ हो चुका है। बुफे तो होना ही है। आखिर ऐसा क्या है, इस सिस्टम में, जिस पर आज हम चर्चा करेंगे। ारा याद कर लो, किसी भी पार्टी का वह दृश्य। दूल्हा-दुल्हन एक बड़े से हॉल में सजे-धजे सबको अपनी मुस्कान बिखेर रहे हैं। लोग आ रहे हैं, फिर वहाँ पहुँचने लगे हैं, जहाँ भोजन की व्यवस्था है। छोटी-सी जगह, क्षमता से अधिक लोग। लखपति ही नहीं, करोड़पति भी एक प्लेट लिए कतार में खड़ा है। कई जगह तो मारा-मारी की स्थिति है। लोग टूट पड़े हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं। वे भी खड़े-खड़े भोजन कर रहे हैं। कुर्सियों की संख्या अपेक्षाकृत कम। कुल मिलाकर अफरा-तफरी का दृश्य। जिसमें कोई संतुष्ट नहीं है। सभी इसे व्यवस्था को दोष दे रहे हैं और भोजन कर रहे हैं। क्या इसे गिद्ध भोज की संज्ञा नहीं दी जा सकती? जो बलशाली है, वह भरपेट भोजन कर पाएगा। आपने शायद इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा कि पहली बार जब हम भोजन लेते हैं, तब सीधे हाथ से लेते हैं, पर दूसरी बार सारी सामग्री बाएँ हाथ से लेते हैं। क्या यह हमारी सभ्यता है?
मेरी बात कुछ-कुछ समझ में आ रही होगी। आपको बता दूँ कि बुफे डीनर के जन्म के पीछे मूलरूप से मानव की लोभवृत्ति है। यजमान चाहता है कि यहाँ आकर लोग कम खाएँ और बातें अधिक करें। मेहमान कम खाएँ, क्या यह भारतीय परंपरा है? संस्कार यजमान चाहता है कि मेरे यहाँ जो भी मेहमान आए, वह भोजन से पूरी तरह से तृप्त होकर जाए। इसके पीछै यही भावना है कि पहले हमारी यहाँ अतिथि को भोजन के लिए काफी मनुहार की जाती थी। लोग आग्रह कर-करके भोजन कराते थे। इसके पीछे उनकी भावना गलत नहीं थी। जिन्हें याद होगा, वे ये भी याद कर लें, कि भोजन के दौरान किस तरह से घर के बड़े-बुजुर्ग आकर मनुहार करते थे और पूछते थे कि भोजन कैसा बना है? कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई है? कितना अच्छा लगता था। अब इस बुफे डिनर में कहीं दिखती है मनुहार? किसने भोजन ग्रहण किया, किसने नहीं, इसकी जानकारी तो यजमान को कतई नहीं होती। वे तो केवल आवभगत में ही लगे रहते हैं। केटरिंग वाले को ठेका दे दिया है, वही देखेगा?
क्या घर में किसी मेहमान के आने पर हम उसे कहते हैं कि किचन में सब-कुछ रखा है, टेबल पर प्लेट पड़ी है, आपको जो अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लें। कोई भी स्वाभिमानी अतिथि इस तरह के व्यवहार को अपना अपमान ही समझेगा। इस तरह से बुफे डिनर में तो अतिथि का इससे भी अधिक अपमान होता है, इस पर कभी ध्यान दिया किसी ने? अपने बचपन के मित्र को भोजन के लिए लाइन पर खड़ा होते देखना किसे अच्छा लगता है? इस पर भला किसी ने सोचा? बुफे डिनर लेना हमारी संस्कृति में तो किसी तरह फीट नहीं बैठता। इससे चिकित्सा शास्त्र और धर्म के कितने नियम भंग होते हैं, इस पर किसी ने विचार किया? आर्य संस्कृति के अनुसार खड़े-खड़े तो भोजन कतई नहीं किया जाना चाहिए, खड़े-खड़े तो पशु ही भोजन करते हैं। चिकित्सा शास्त्र का मानना है कि आहार ग्रहण करने का श्रेष्ठ आसन पालथी मारकर बैठना ही सुखासन है। टेबल-कुर्सी पर बैठकर भोजन करने से वह ठीक से पचता नहीं है। इन हालात में जिन्हें हमने अपने यहाँ भोजन के लिए बुलाया है,उन्हें खड़े-खड़े भोजन कराकर हम उसकी अवहेलना ही तो कर रहे हैं। इस तरह की अवहेलना अब एक परंपरा का रूप ले चुकी है। इसका विरोध करने का सामर्थ्य किसी में नहीं है।
आयुर्वेद कहता है कि भोजन के बाद पानी पीना ही नहीं चाहिए। उसे विष माना गया है। बुफे डिनर या लंच में भोजन के अंत में ही पानी मिलता है, तो क्या हम अतिथि को विष नहीं दे रहे हैं? जैन धर्म के अनुसार थाली धोकर वह पानी पी लेना चाहिए, ताकि जीव हिंसा के पाप से बचा जा सके। बुफे में जब थाली ही नहीं, तो फिर कैसा पाप? इस सिस्टम में यजमान की यह इच्छा ही नहीं होती कि मेहमान अधिक से अधिक भोजन ग्रहण करें। उसकी तो यही इच्छा होती है कि मेहमान कम से कम खाए। जब इस सिस्टम की जड़ों में ही कंजूसी है, तो फिर काहे का मेहमानवाजी। बंद करो ये ढकोसले! वैसे इस परंपरा को खत्म होने में काफी समय लगेगा। क्योंकि इस में लिप्त होकर जो यहाँ आकर एक बार भिखारी बन गया, वह चाहता है कि जिसने उसे भिखारी बनाया, आखिर वह भी तो कभी भिखारी बने। इसलिए वह भी अपने यहाँ बूफे डिनर की व्यवस्था करता है और शान से देखता है अपने यहाँ आए लोगों को, जिन्हें उसने भिखारी बनाया। बदले की परंपरा के कारण यह सब चल रहा है। आवश्यकता है ठोस कदमों की, जो इंसान के भीतर से उठें।
मुझे यह समझ में नहीं आता कि स्कूल के डोनेशन के खिलाफ एक होने वाले पालक इस बुफे डिनर के नाम पर एक क्यों नहीं हो पाते? इसके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते। क्यों नहीं, शादी से पहले यजमान को पत्र लिखते कि हमारा यदि सम्मान करने की दिल से इच्छा हो, तो बुफे लंच या डिनर मत रखना। अन्यथा हम नहीं आएँगे। कोई एक तो शुरुआत करे, फिर देखो, एक गलत परंपरा किस तरह से दम तोड़ती है? संभव है फिर हम नीचे पालथी मारकर बैठे हो, हमारे सामने एक चौकी पर बड़ी थाल पर विभिन्न भोय सामग्री रखी हो और मनुहार के साथ घर के बड़े-बुजुर्ग हमें प्यार से भोजन करा रहे हों, हम तृप्त होकर वहाँ से उठ रहे हों। क्या इस तरह का दृश्य हमारी आज की पीढ़ी देख पाएगी भला?
डॉ. महेश परिमल

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