मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

सृष्टि का यौवन है वसंत

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

आओ, प्‍यार को अभिव्‍यक्ति दें

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

वायु प्रदूषण ने बढ़ाई चिंता

 

 आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिंदी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप

डॉ. महेश परिमल
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसके बिना एक समाज की कल्पना करना ही मुश्किल है। भाषा ही हमारे जीेवन को सँवारती है। भाषा हमें जीने का आधार देती है। हिंदी के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह इतनी सरल और सहज भाषा है कि थोड़े से प्रयास से इसे कोई भी अहिंदीभाषी भी सीख सकता है। आज यह करोड़ों लोगों की भाषा बनी हुई है। इसके पीछे यही है कि यह अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं करती। एक भाषा में यदि दूसरी भाषा के शब्दों का आगमन होता है, तो उससे भाषा समृद्ध होती है। जिन भाषाओं ने प्रगति की है, उन सभी भाषाओं ने दूसरी भाषा के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया है। हम अँगरेजी की बात करें, तो आज उस भाषा में हिंदी के करीब 2500 शब्दों का समावेश किया गया है। इसी तरह हिंदी में भी अन्य भाषाओें के शब्दों को लिया गया है, इसलिए यह भाषा इतनी सहज और सरल बन पाई है।
हम बरसाें से हिंदी भाषा का प्रयोग बातचीत और लेखन में कर रहे हैं। अब तो यह भाषा हममें रच-बस गई है। इस भाषा में जब हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हैं, तो हमें पता ही नहीं चलता कि इसमें न जाने कितने ही शब्द हिंदी के न होकर किसी अन्य भाषा के हैं। हम एक इमारत बनाते हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके लिए प्रयुक्त सारी सामग्री हमें उसी शहर में मिल जाए। कई बार कई चीजें हमें दूसरे शहर से लानी होती है। ठीक इसी तरह एक भाषा तभी सुदृढ़ बनती है, जब उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया जाए। इसलिए हम दावे से यह कह सकते हैं कि हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होने के कारण यह भाषा आज करोड़ों लोगों द्वारा व्यवहृत की जा रही है। हिंदी भाषा के लिए इसे आशीर्वाद ही माना जाएगा कि इसने बहुत ही सहजता के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है।
अब हम चर्चा करें उन शब्दों की, जो हिंदी के नहीं हैं, पर एक निरक्षर ग्रामीण भी उसका अर्थ समझता है। हम ‘कफ़न’ को ही ले लें, इसका अर्थ आज हर कोई समझता है। पर यदि हम इसके बजाए हिंदी का शब्द ‘मृतचैल’ कहेंगे, तो ग्रामीण ही नहीं, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी इसे नहीं समझ पाएगा। ‘पाव’ शब्द पुर्तगाली है, जो िहंदी में आसानी से घुल-मिल गया है। आज इससे पाव रोटी, पाव वड़ा, पाव भाजी जैसे शब्द बने। इसका प्रयोग हर कोई अपनी भाषा में कर रहा है। ‘चर्चा’ शब्द उर्दू का है, जिसे पुलिंग के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, हिंदी ने इस शब्द को स्त्रीलिंग के रूप में शामिल किया। भाषा जितनी अधिक लचीली होगी, उतनी ही समृद्ध भी। पानी के तेज बहाव में वही वनस्पति या पेड़ अधिक समय तक बने रहते हैं, जो झुकना जानते हैं। अकड़ हर किसी के लिए खतरनाक होती है। इसलिए भाषा के संबंध में भी यही कहा जाता है कि लचीली भाषा अधिक समय तक जीवित रहती है। इस मामले में अँगरेज़ी की मिसाल दी जाती है, जिसने दुनियाभर की भाषाओं से शब्द अपनाए हैं। दर्शन, अध्यात्म के मामले में उसने कई भारतीय शब्द लिए हैं। जैसे- गुरु, पंडित, योग, आँचल, जंगल आदि। जो चीजें विदेशी परिवेश से आई हैं, उनके लिए विदेशी शब्द ले लेना एकबारगी ठीक भी है, लेकिन सरल, सहज और प्रचलित हिंदी शब्दों की जगह अँगरेज़ी का इस्तेमाल गलत है। हिंदी ने भी फ़ारसी, अरबी, फ्रेंच, पुर्तगाली, रूसी, न जाने कितनी ही भाषाओं से शब्द लिए हैं। लेकिन यह लेन-देन स्वाभाविक और आवश्यक रहा है। हिंदी फिल्मों के नाम आज अँगरेज़ी शब्दों में लिखे जा रहे हैं-जैसे 'वेकअप सिड', 'जब वी मैट', 'वेलकम टू सज्जनपुर', 'थ्री इडिएट्स', 'गॉड तुसी ग्रेट हो' आदि। ये फिल्में खूब चली हैं और हिंदीभाषी जनता ने उन्हें खूब देखा भी है, तो इसका मतलब क्या लगाया जाए? यही कि जनता ने इसे, अपने आप सहज ही या मजबूरी में स्वीकार कर लिया है।

आज चिकित्सक के स्थान पर वैद्य लिखने के आग्रही हम नहीं हैं, क्योंकि हिन्दी परिवेश में वैद्य शब्द के साथ एक अलग व्यंजना जुड़ गई है मसलन देशी पद्धति से इलाज करनेवाला। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में डॉक्टर शब्द सर्वमान्य हो चुका है। अब इसे हिन्दी कोशों में जगह दी जानी चाहिए। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हर साल प्रचलन के आधार पर अँगरेज़ी में समाते जा रहे अन्य भाषाओं के शब्दों को अँगरेज़ी भाषा में स्वीकार्य शब्दों के तौर पर शामिल करती है। बैंक, सैलरी, फंड, टीवी, जींस, पेंट, टी-शर्ट, जैसे दर्जनों शब्दों को हिन्दी कोशों में स्वीकार्य शब्द के तौर पर स्थान दिया जाना चाहिए, तभी हम शुद्धतावादियों के दुराग्रह से भी बच पाएँगे। देश में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के चलते संस्कृतियों के बीच अंतर्संबंध बढ़ने लगा है। आज मुंबइया शैली की हिन्दी भी सामने आई है। इस शैली के अनेक शब्दों की व्यंजना निराली है। फंटूश, बिंदास, फंडा, फंडू, भिड़ू, बीड़ू जैसे शब्द भी इसी कतार में आते हैं।
मेरा मानना है कि हिंदी की समृद्धि के लिए हमें अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आखिर वे भी इसी मिट्टी की भाषाएँ हैं। इससे आपकी अभिव्यक्ति और अधिक निखरेगी। हम अपनी बात को पूरी शिद्दत के साथ रख पाएँगे। भाषाएँ जनता की सम्पत्ति है, उन्हें सुरक्षित रखना अनिवार्य है। हम अकेले व्यवस्था को नहीं बदल सकते, लेकिन हम अपने घर पर, दुकान पर, अपने समाज में, मित्रमंडली में अपनी भाषा और उसके अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग तो कर ही सकते हैं। हम घर पर अपने बच्चों को मातृभाषा तो सिखा ही सकते हैं। हम स्वयं अपनी भाषा को सुरक्षित तो रख ही सकते हैं। आज हम ढोकला, खाखरा, थेपला आदि गुजराती व्यंजन दक्षिण भारत में भी खा सकते हैं। इडली-डोसा भी देश के कोने-कोने में मिल जाता है। पंजाब के छोले-भटूरे, छोले-कुलचे भी आज हर जगह मिल जाते हैं। जब हम व्यंजन के मामले में इतने दुराग्रही नहीं हैं, तो फिर भाषा के मामले में क्यों होना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

धैर्य की सीमा

डॉ. महेश परिमल
लोग कहते हैं कि धैर्य की सीमा क्या होनी चाहिए? एक जिज्ञासु ने जब मुझसे यह प्रश्न किया, तो मैंने कहा-यदि धैर्य की सीमा जानना चाहते हो, तो पानी को बर्फ बनता देखो। पानी का बर्फ बनना यानी तापमान का लगातार गिरना। तापमान का गिरना यानी ठंड के थपेड़ों को सहना। अपनी आंखों के सामने एक-एक चीज का सिमटना। आँख का संकुचित होना। पानी काे एकटक देखना। निर्निमेष देखती आँखें और पानी का रूप परिवर्तन। ठीक वैसे ही, जैसे तेज हवाओं के आगे बुझते दीपक को जलाए रखने की मशक्कत करना। एक स्थिति ऐसी आती है, जब हमें स्वयं का भान नहीं होता। यही होती है ध्यान की अवस्था। इस दौरान जो कुछ होता है, वही है सच्चा ध्यान। इधर पानी बर्फ बनता है, उधर ध्यान पूरा होता है। एक नई चीज आपके सामने होती है। आपको लगता है कि आज मेरे सामने कुछ नया हुआ। यहां से शुरू होती है खुद को पहचानने की कला। इस कला को हर कोई नहीं समझ सकता। खुद को पहचानना यानी खुदा को पहचानना। इसलिए ईश्वर तक जाने का रास्ता खुद से निकलता है। ईश्वर को खोजने के लिए खुद को खोज लो, ईश्वर आपके सामने होंगे।
अब आप कहेंगे कि ये ईश्वर क्या होता है? जो हमें संबल दे, हमें चुनौतियों से लड़ना सिखाए, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, वह ईश्वर। यह काम यदि कोई इंसान भी करे, तो भी वह हमारे लिए ईश्वर ही है। ईश्वर स्वयं सभी जगह नहीं जा पाते, इसलिए वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं, जो उनकी तरह काम करते हैं। अब इस प्रतिनिधि को कौन पहचान पाता है? वही जिसे ईश्वर की तलाश है। इसलिए यदि हमारे आसपास कोई ऐसा इंसान है, जो ईश्वर की तरह काम करता है, तो उसे अपना आराध्य मान लो। यह किसी भी रूप में हो सकता है। कभी किसी बुजुर्ग के रूप में या फिर बच्चे के रूप में। प्रेयसी में यदि ईश्वर के दर्शन करना चाहते हैं, तो उसके लिए रामकृष्ण परमहंस बनना होगा। रामकृष्ण परमहंस यानी विवेकानंद के गुरु। इनकी सीमा तक पहुँचना हम साधारण इंसान के बस की बात नहीं है। हमें तो केवल पानी को बर्फ बनने की प्रक्रिया देखनी है। यही है धैर्य की सीमा।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

इस देश में चलती है कैंसर एक्सप्रेस

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

एक थे गाँधीजी

http://www.lokottar.com/Epaper.aspx?dt=1/30/2015%2012:00:00%20AM&Page=3816

एक थे गांधीजी
डॉ. महेश परिमल
गांधी यानी कौन? ऐसा सवाल आज भले ही कहीं नहीं पूछा जाए, पर ‘गांधी’ यानी कौन से गांधी? यह सवाल आजकल प्रासंगिक होता जा रहा है। गांधी यानी करेंसी नोट में जिनकी तस्वीर है, वो? या फिर उनकी समाधि पर फूल-मालाएं चढ़ाने की परंपरा, जिसमें विदेश से आए मेहमान का वहां जाना अनिवार्य है। गांधी यानी महात्मा मंदिर वाले गांधी? गांधी यानी ‘राष्ट्रवादी हिंदू’, इन्हीं पर ये आरोप है कि गांधीजी की हत्या के बाद इनके अनुयायियों द्वारा मिठाई बांटी गई थी। गांधी यानी मजबूरी नहीं, बल्कि दंभ का नाम। गांधी यानी देश-विदेश में उनकी प्रतिमा स्थापित करने की प्रथा। गांधी यानी उनके नाम पर चलने वाले राजनीति की कथित दुकानें और उनकी बेशुमार दौलत। गांधी यानी उनके चरित्र को हनन करने की प्रवृत्ति आज उनकी हत्या के 66 साल बाद भी लोगों को नशे की ‘किक’ देती है। गांधी यानी जिसे अंबेडकर ने अपना कट्‌टर विरोधी माना, वो। या फिर गांधी यानी वो, जिन्होंने दलित के मामले को मुख्य धारा में लाने के लिए तन-मन से प्रयास किया। या फिर उनके नाम से देश में चल रहा स्वच्छता अभियान?
आज गांधी को हर कोई अपनी तरह से परिभाषित करता है। अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है। कुछ माह पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जी को एक बार हाशिए पर लाकर सरदार वल्लभ भाई पटेल को सामने लाने का प्रयास किया था, पर बाद में उन्हें लगा कि इस देश में बिना गांधी को साथ लिए कोई भी बड़ा काम नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्होंने सफाई के नाम पर उनका नाम जोड़ दिया, ताकि उसके सहारे देश को गांधी के सपनों का भारत बनाया जा सके। इस तरह से गांधी जी हम सबके बीच व्यावहारिक हो गए। वे हमारे बीच आकर अपनी बातें कहने लगे। सफाई के नाम पर आज देश में हर कोई उन्हें याद कर रहा है। इस तरह से यह संदेश गया कि गांधी जी को भूलकर इस देश में राजनीति हो ही नहीं सकती। जिस तरह से पाकिस्तान में कश्मीर के बिना राजनीति की ही नहीं जा सकती, ठीक उसी तरह भारत में जो गांधी को भूला, लोग उसे भूलने में देर नही करते हैं। गुजरात में उनके नाम पर भव्य महात्मा मंदिर बनाया गया। इस मंदिर को वे स्वयं देखते, तो शर्मिंदा हो जाते। इस भव्य मंदिर का काम विदेशियों को भारत में पूंजी निवेश के लिए लुभाने का ही है। यानी विदेशियों को लुभाना है, तो भी गांधी जी का सहारा।
आज हर कोई गांधी का उपयोग करने में लगा है। इसमें कोई माहिर है, तो कोई फिसड्‌डी। गांधी जी को सामने रखकर किस तरह से अपनी बात को लोगों तक पहुंचाई जाए, यही मुख्य मुद्दा है। गांधी जी के तमाम अनुयायी अपने-अपने क्षेत्रों में सफल सिद्ध हुए हैं। सभी ने उनका इस्तेमाल कर स्वयं को ही विकसित किया है। इसे वे प्रगति का नाम देते हैं। गांधी जी के सच्चे अनुयायी आज भी सुदूर गांवों में कुछ न कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो उनके नाम को जीवित रखे हुए हैं। कई विदेशी भी इसमें शामिल हैं, जिन्हें यह विश्वास ही नहीं है कि इस देश में कभी कोई ऐसा व्यक्ति भी था, जो हाड़-मांस का एक लोथड़ा ही था। जिसमें गजब की ताकत थी। वह हिंसा का जवाब अहिंसा से देता था। उसके विरोध करने का तरीका एकदम ही अलग था। वह लोगों को शांति का पाठ पढ़ाता था। जिसकी वाणी में वह ताकत थी कि लोग अपना सब कुछ छोड़कर उनके साथ हो लेते थे।
आज की पीढ़ी गांधीजी को रिचर्ड एटनबरो के माध्यम से जानती है। वह ‘गांधी’ फिल्म देखकर उन्हें समझने की कोशिश करती है। उन्हें तो यह सुनकर अजूबा लगता है कि एक विदेशी ने गांधी को किस तरह से समझा और उन्हें फिल्म में उतारा। क्या हमारे देश में कोई भी ऐसा नहीं है, जो गांधी को सच्चे स्वरूप में हमारे सामने लाए? किताबों वाले गांधी जी में काफी विकृति अा गई है। गांधी जी के नाम पर सबसे अधिक पाप तो किताबों के माध्यम से ही हुआ है। गांधी पर लिखी किताब हमारे देश में विवादास्पद न हो, ऐसा संभव ही नहीं। गांधी की सही तस्वीर तो उनकी जीवनी ‘सत्य के प्रयोग’ में ही मिलती है। पर वह भी उनके जीवन को पूरी तरह से नहीं दर्शाती। जीवनी में 1920 तक के जीवन का ही जिक्र है, उसके बाद उनका जीवन सार्वजनिक हो गया। ऐसे में उन्हें पूरी तरह से समझना आज की पीढ़ी के बस की बात नहीं। इस देश में गांधी के नाम पर जितने तमाशे हुए हैं, उतने किसी के नाम पर नहीं हुए। जिसने भी उनके नाम पर तमाशा खड़ा किया, कुछ समय बाद वह और अधिक चर्चित हो गया। गांधी जी स्वयं गरीब रहे, गरीबों के रहनुमा रहे, उनके अनुयायी भी गरीब ही बने रहे, पर जिसने उनके नाम की दुकानें चलाई, वह देखते ही देखते अमीरों की श्रेणी में आ गया।
गांधी जी ने देश को बहुत कुछ दिया। पर गांधी के नाम पर देश ने बहुत कुछ खोया भी। आज देश में ईमानदारी का स्थान भ्रष्टाचार ने ले लिया है। देश में भ्रष्टाचारियों की लंबी फेहरिस्त है। कोई विभाग ऐसा नहीं है, जो भ्रष्ट न हो। न्याय आज रईसजादों की जेब में रहता है। यह तो कई न्यायाधीशों के भ्रष्ट होने से ही पता चल जाता है। आज सत्ता भी कुबेरपतियों के हाथों की कठपुतली बन गई है। सत्ता का मद ऐसा छाया है कि वह सत्तासीन के हाथों से अलग ही नहीं होती।
गांधी जी आज भले ही न हों, पर वे आज भी जीवित हैं, तो केवल सत्य में, सादे जीवन में, दु:ख में, विलाप में, सद्भावना में ही हैं। निराशामय जीवन में एक ज्योति के रूप में हैं। सुदूर गांवों में कहीं कोई वीतरागी यदि सत्कार्य करता है, तो वह गांधी जी के करीब है। कहीं कोई अत्याचार से पीड़ित है और उसमें प्रतिकार की क्षमता नहीं है, तो वह बहुत दूर है गांधी जी से। गांधी हमारे कोमल हृदय में हैं। हमारी सादगी में हैं। हमारी सांसों में रचे-बसे हैं, बस वे कदापि वहां नहीं हैं, जहां उनके होने का दावा किया जा रहा है।
‎ डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 24 जनवरी 2015

अच्छे दिनों की राह देखती पथराई आंखें

डॉ. महेश परिमल
पेट्रोल के नाम पर सरकार किस तरह से आम जनता को लूट रही है, इसका अंदाजा अब जाकर लगा है। एक बार फिर सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया है। अगर सरकार ऐसा नहीं करती, तो पेट्रोल हमें और 6 रुपए सस्ता मिलता। पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। अभी वह अपना राजकोषीय संतुलन बनाने में लगी है। पेट्रोल के उत्पाद शुल्क में हाल ही में दो रुपए प्रति लीटर की वृिद्ध की गई है। दो महीने में यह तीसरी बार वृद्धि की गई है। इस पर सरकार के अपने तर्क हैं। पर आम जनता यह जानना चाहती है कि सरकार महंगाई कम करने का दावा तो करती है, पर आज भी महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सका है। आमतौर पर ठंड में सब्जियों के दाम कम हो जाते हैं, पर इस बार कड़ाके की ठंड पड़ने के बाद भी सब्जियों के दामों में किसी प्रकार की कमी नही आई है। सरकार लगातार ऐसे निर्णय ले रही है, जिससे व्यापारियों को लाभ हो। जिस तेजी से कच्चे तेल की कीमतें गरी हैं, उसके एवज में पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ है। जून के बाद क्रूड आयल की कीमतें आधी रह गई हैं, पर उस तेजी से पेट्रोल की कीमतें कम नहीं हुई है।
सरकार की तरफ से कहा गया है कि ढांचागत परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने को पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया जा रहा है। इस राशि का इस्तेमाल चालू वर्ष और अगले वित्त वर्ष के दौरान 15,000 किलोमीटर सड़क बनाने में किया जाएगा,मगर हकीकत यह है कि इस शुल्क वृद्धि से जनता को पेट्रोल-डीजल की कीमत में राहत नहीं मिल पाई है। अगर नवंबर, 2014 के बाद से देखे तो गैर ब्रांडेड पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क दर 1.20 से बढ़कर 6.95 रुपए और डीजल पर 1.46 से बढ़कर 5.96 रुपए प्रति लीटर हो गई है। यानी पेट्रोल पर शुल्क 5.75 रुपए और डीजल पर 4.50 रुपए प्रति लीटर बढ़ाया जा चुका है। अगर उक्त शुल्क वृद्धि नहीं की जाती तो पेट्रोल और डीजल की कीमत इतनी ही कम हुई होती। दो माह के भीतर पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में तीन बार वृद्धि से साफ है कि राजकोषीय घाटा काबू में रखना सरकार के लिए कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि पहले नौ माह में ही इस घाटे की राशि पूरे वित्त वर्ष के लगभग बराबर पहुंच चुकी है।
नया साल शुरू हो चुका है, अनुभवी कहते हैं कि केवल वर्ष बदलता है, पर हालात वही रहते हैं। हमें हमेशा नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। 2015 में भी आर्थिक तेजी, रोजगार के अवसर और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। न जाने कितनी ऐसी समस्याएं हैं, जिनके समाधान न होने पर लोग अब थक चुके हैं। आवश्यक जिंसों के दाम लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। बिचौलियों की चांदी हो गई है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी के बाद भी सरकार तेल कंपनियों के मुनाफ के बारे में ही सोच रही है। ऐसा जब पिछली सरकार करती थी, तो भाजपा के पास तेल की कीमत कम करने की कई योजनाएँ थी, पर अब जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लगातार कम हो रही हैं, तो भी सरकार कीमतें कम कर लोगों को राहत नहीं देना चाहती।
माेदी सरकार ने वादा किया था कि अच्छे दिन आने वाले हैं। छह महीने बाद भी जब अच्छे दिन नहीं आए, तो यह सोचना पड़ रहा है कि क्या अच्छे दिन आएंगे? अब तो सबकी नजर सरकार के पहले बजट की ओर है। जिससे पता चलेगा कि अच्छे दिन आएंगे या नहीं? यह बजट दस साल बाद नए हाथों से आएगा। वेतनभोगी चाहते हैं कि उन्हें टैक्स में राहत मिले। गरीब अधिक से अधिक सुविधाएं बिना टैक्स के चाहते हैं। अमीरों की चाहत है कि बार-बार उनकी जेब पर कैंची न चलाई जाए। 2015 पर 2014 ने अपेक्षाओं का बहुत सारा बोझ लाद दिया है। मोदी सरकार ने वैश्विक संबंधों पर जितना जोर दिया है, उतना जोर यदि देश की समस्याओं पर नहीं दिया। देश का नेटवर्किंग मजबूत बनाने की जवाबदारी सरकार की है, परंतु मोदी सरकार का नेटवर्क शपथ के बाद ही ढीला दिखाई देने लगा है। लगता है यह पूरा वर्ष आर्थिक नीतियों के सुधार में ही चला जाएगा। कार्पाेरेट क्षेत्र भी इस वर्ष अपने मुनाफे के गणित में लग गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से बिजनेस-फ्रेंडली हैं, पर अभी तक उन्होंने ऐसा कोई ठोस निर्णय नहीं लिया है, जिसे बिजनेस-फ्रेंडली कहा जाए। महंगाई कम करने के लिए इस देश में अभी तक किसी नेता ने जन्म ही नहीं लिया है, ऐसा कहा जा सकता है। जिस तरह से पिछली सरकार महंगाई पर लगाम नहीं कस पाई, ठीक उसी रास्ते पर नई सरकार भी जा रही है। महंगाई बढ़ती ही जा रही है। सरकार उत्पादन से बिक्री तक का ट्रेक ढूंढने में विफल रही है। यह पूरा ट्रेक महंगाई बढ़ाने के काम में आ रहा है। 20 रुपए की वस्तु आज बाजार में 60 रुपए की हो गई है। आखिर क्या वजह है कि ऐसा हो रहा है? सरकार इसका कारण भी नहीं खोज पा रही है।
सरकार नए उद्योगों को लाने के लिए प्रयासरत है। विदेशी पूंजी निवेश के लिए वह लाल जाजम बिछा रही है। नए उद्योगों को जमीन देनी होगी, इसके लिए कानून लाना होगा, यदि किसानों की जमीन ली जाती है, तो उसका उचित मुआवजा भी देना होगा। उद्याेग शुरू होंगे, तो रोजगार मिलेगा। राेजगार करने वालों का शोषण न हो, इसके लिए सख्त कानून बनाने के अलावा ईमानदार अधिकारियों का पूरा नया अमला भी तैयार करना होगा। यह प्रक्रिया काफी लंबी है, फिर भी यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के सामने यह एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा कई ऐसी चुनौतियां भी हैं, जो बैठे-ठाले मिल गई हैं। जैसे धर्मांतरण, घर वापसी जैसे कार्यक्रम अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय आरएसएस के संगठन नहीं कर पाए, वे पेंडिंग काम मोदी सरकार के माध्यम से सहयोगी संगठन करवाना चाहते हैं। भू-अधिग्रहण अध्यादेश लाकर सरकार ने यह बता दिया कि उसकी दिलचस्पी उद्योगों में कितनी अधिक है।
सरकार के सामने अभी सस्ते मकान, संरक्षण, सुरक्षा और उत्पादन, औद्योगिक कारिडोर, ग्रामीण संरचना के लिए जमीन संपादन आदि सुलगती समस्याएं बन गई हैं। निजी प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन संपादन पहले करना होगा, जमीन संपादन के लिए मुआवजा अब दोगुना किया गया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है, परंतु किसान इसकी क्या प्रतिक्रिया देते हैं, यह देखना बाकी है। इस तरह से देखा जाए, तो केवल सरकार के सामने ही नहीं, एक आम आदमी के सामने भी समस्याओं के अंबार हैं। पर इस सबसे अलग होकर इंसान खुशी के पलों को भी आखिर बटोर ही लेता है। साल कोई भी हो, उसके आगमन पर उसे खुशी ही होती है। हमेशा नए की खुशी मनाने वाला यह इंसान आखिर कब भीतर से खुशी मनाएगा?
  डॉ. महेश परिमल

  

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

वायब्रंट गुजरात से कई राज्यों की लार टपकी

डॉ. महेश परिमल
गुजरात की राजधानी में वायब्रंट समिट का सफल आयोजन हुआ। अन्य राज्यों की आंखें ही चौंधिया गई। इन राज्यों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विदेशियों को आमंत्रित कर उनसे राज्य में निवेश के लिए इस तरह से लुभाया जा सकता है। अब तो पश्चिम बंगाल, केरल और ओडिसा भी इस लाइन में देखे जा रहे हैं। वे अब अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे हैं कि किसी भी तरह से हमारे देश के अप्रवासी भारतीय आएं और अपनी पूंजी लगाएं। इसमें गुजरात सबसे आगे निकल गया है, इसमें कोई शक नहीं। पर कई राज्य अभी तक इस बात पर आश्वस्त नहीं हैं कि उन्हें उक्त राज्य में पूरा संरक्षण मिल पाएगा भी नहीं। इन राज्यों को अब कड़ी मेहनत करनी होगी। क्योंकि जब तक पूंजी निवेशकों में आश्वस्ति का भाव नहीं आएगा, तब तक वे एक पैसा भी निवेश नहीं करेंगे।
गुजरात वायब्रंट में करोड़ों रुपए का एमओयू हुआ। सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि इस महाआयोजन की सफलता को देखकर कई राज्यों के मुंह में लार टपकने लगी है। अब इसका वायरस देश भर में फैलने लगा है। गुजरात में आयोजित इस महा आयोजन के पहले पश्चिम बंगाल में इस तरह का आयोजन हुआ था, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोगों को राज्य में निवेश के लिए गुहार लगाई थी। यह आयोजन गुजरात की तरह चमकीला नहीं था। पर इसमें ममता बनर्जी ने आमंत्रित लोगों से हाथ जोड़कर निवेदन किया कि वे पश्चिम बंगाल में पूंजी निवेश करें। कार्पोरेट सर्कल के सामने कहा कि मैं विश्वास दिलाती हंू कि यहां निवेश कर आप सभी को बहुत लाभ होगा। इस दौरान ममता जितनी मुलायम दिखाई दी, उससे यही लग रहा था कि ममता का लोगों के सामने हाथ जोड़ना ही बाकी रह गया था। इस समारोह में वित्त अरुण जेटली भी उपस्थित थे।
देश-विदेश के पूंजी निवेशक यह मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में पंूजी लगाना खतरनाक है। ममता ने जिस तरह से टाटा-नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ खुली गंुडागर्दी दिखाई, उसे सबने देखा और समझा। लोगों ने देखा कि ममता की गुंडागर्दी की वजह से ही टाटा का नैनो प्रोजेेक्ट किस तरह से गुजरात पहुंच गया। गुजरात इसके लिए पहले से ही तैयार था। उसने उद्याेगों के लिए लाल जाजम बिछाकर रखा था। अपने राज्य से एक उद्योग को बाहर करने वाली ममता आज स्वयं उद्याेगों को अपने राज्य में लाने के लिए मशक्कत कर रहीं हैं। उस समय पश्चिम बंगाल उद्योगों की कीमत नहीं जानता था, आज उसे उद्योगों की आवश्यकता है। इसके बाद भी वह केंद्र से किसी प्रकार का तालमेल नहीं करना चाहती। किसी राज्य के विकास के लिए उद्योगों की कितनी आवश्यकता है, इसे गुजरात ने बता दिया। इसे अब सभी राज्य समझने लगे हैं। गुजरात वायब्रंट की तरह इस समय केरल में भी इसी तरह का आयोजन किया जा रहा है। वहां भी इन्वेस्टर समिट चल रहा है। ओडिसा में भी माहांत में इस तरह का आयोजन होने वाला है। उत्तर प्रदेश में भी इसकी तैयारियां चल रही हैं। कुछ दिनों पहले अखबारों में उत्तर प्रदेश सरकार ने जिस तरह से विज्ञापन दिए, उससे लगता है कि वह भी तैयार है, पूंजी निवेशकों को लुभाने के लिए।
आश्चर्य इस बात का है कि इसके पहले किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने यह प्रयास नहीं किया कि उनके राज्य में भी वायब्रंट जैसा आयोेजन कर पूंजी निवेशकों को आमंत्रित किया जाए। पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने पहली बार विदेश में बसे भारतीयों को भारत में पूंजी निवेश के लिए प्रेेरित किया। इसे नाम दिया वायब्र्रंट गुजरात। 2003 में पहली बार जब यह समारोह आयोजित किया गया, तब केवल कुछ एनआरआई ही इसमें शामिल हुए। आज दस साल बाद वायब्रंट उद्योगों एवं कार्पोरेट गृहों के लिए स्वयंबर की तरह हो गया है। गुजरात सरकार ने इस आइडिए को इसलिए अमल में लाया था कि देश-विदेश के उद्योगपतियों से सीधा सम्पर्क कर और उन्हें उद्योग लगाने में होने वाली समस्याओं को समझा जा सके। उनके आइडिए को भी समझने की कोशिश की जाए। उस समय हालात यह थे कि यदि विदेश के उद्योगों को भारत में पूंजी निवेश करना होता था, तो पहले योजना आयोग से सम्पर्क करना पड़ता था। आयोग इस प्रपोजल को फाइल कर देती थी। क्योंकि उसके पास यह अधिकार नहीं था कि वह उक्त उद्योग को किसी राज्य में स्थापित करने की सिफारिश करे। इस तरह से निवेश के पहले ही उसकी भ्रूण हत्या हो जाती थी। गुजरात ने इन कंपनियों को जब आमंत्रित किया था, तब उन्हें जमीन, फाइनांस जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने का वचन दिया था। सभी यह मानकर चल रहे थे कि ये वायब्रंट एक नाटक की तरह है। परंतु जब सबने इसका परिणाम देखा, तो दंग रह गए।
राज्यों में स्थिर सरकार के बिना कोई भी इस दिशा में पूंजी निवेश के लिए विचार तक नहीं करता। जब राज्यों में बेरोजगारी की समस्या मुंह फाड़कर खड़ी हो, तो सभी को उद्योगों और पूंजी निवेशकों की याद आने लगती है। अब सभी राज्य उद्योगों को सुविधाएं देने का वचन देने लगे हैं। सस्ती जमीन, सस्ता लोन, लंबे समय तक चलने वाली करों में राहत, प्रोजेक्ट को तुरंत स्वीकृति आदि की बात भी जोर-शोर से होने लगी है। अब सभी राज्य बिजनेस फ्रेंडली बनने लगे हैं। जब ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में टाटा-नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन की छेड़ दिया था, तब वे स्वयं भी विरोधी पार्टी की नेता थी, आज सत्ता पर काबिज हैं। आज उन्हें यह समझ में आ रहा है कि टाटा-नैनो प्रोजेक्ट का विरोध कर उन्होंने कितना गलत किया है। उसके कारण उसे कितना नुकसान उठाना पड़ा है। आज भारत के बड़े उद्योग गृहों टाटा, रिलायंस, एस्सार, टोरंट आदि गुजरात में अपने विशाल यूनिट खड़े किए हैं, उसके पीछे गुजरात सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के अलावा वह वचन भी है, जो उसने दिए और उसे अमल में लाया। गुजरात सरकार का आइडिया गुजरात का गौरव बन गया है।
कितने राज्यों की नीयत में ही खोट है, क्योंकि पूंजी निवेशक उनकी मंशा समझ चुके हैं। पूंजी निवेशक उत्तर प्रदेश, ओडिसा जाने को तैयार ही नहीं हैं। देश का सबसे बड़ा पूंजी निवेश पॉस्को प्रोेजेक्ट ओडिसा में ही स्थापित होने वाला था। वहां उस प्रोजेक्ट के खिलाफ कई आंदोलन हुए, आखिरकार वह प्रोेजेक्ट कर्नाटक में स्थापित किया गया। ऐसे उद्योग विरोधी राज्यों के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। भाजपा सरकार ने एनडीएफ के लिए लाल जाजम बिछा रही है, तब विदेश के उद्योग गृहों उद्योग लगाने के लिए सुरक्षित राज्यों की तलाश में हैं। केंद्र सरकार ऐसे प्रोजेक्टों का आतुरता से प्रतीक्षा कर रही है। ताकि बेराेजगारों को रोजगार मिल सके। रोजगार मिले, तो राज्यों का विकास होगा ही, यह विकास दिखाई भी देने लगेगा। हम जिसे सर्वांगीण विकास कहते हैं, वह नए पूंजी निवेशकों के आने से ही हो सकता है।
  डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

युवराज जैसी स्थिति धोनी की भी होगी

डॉ. महेश परिमल
यह तो तय है कि जो ऊपर जाता है, उसे नीचे आना ही है। इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा ही। इसका अनुभव हम सबको हो ही चुका है। क्षेत्र चाहे राजनीति का हो या फिर खेल का। फिल्म का हो या फिर कला-संस्कृति का। सभी क्षेत्रों में कई हस्तियां ऊपर आई और अंधेरे में खोे गई। जब तक उनके हाथों में सत्ता होती है या कहा जाए कि अपनी प्रतिभा को साबित करने का अवसर मिलता है, तब तक उसकी तूती बोलती है। धीरे-धीरे लोग उन्हें भूलने लगते हैं। कई लोग इसे अपने जीते-जी देख भी लेते हैं। फिल्म के क्षेत्र में कभी दिलीप कुमार की तूती बोलती थी, फिर लोगों ने राजेश खन्ना को भी आसमान में देखा। अमिताभ बच्चन आज भी नई ऊर्जा के साथ दिखाई देते हैं। खेल के मैदान में कभी अजीत वाडेकर, सुनील गावस्कर, कपिल देव, साैरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी के बाद आज विराट कोहली की तूती बोल रही है। सभी के अच्छे दिन आते ही हैं, पर यह कितने समय तक टिके रहेंगे, कोई नहीं कह सकता।
वर्ल्ड कप के लिए भारतीय क्रिकेटरों की टीम घोषित कर दी गई है। युवराज को अनदेखा कर दिया गया। स्वयं को अनदेखा होने से पहले से ही युवराज ने इसे भांप लिया था। एक बार उन्होंने कहा था कि जब तक बल्ला चलता है, तब तक सब ठीक है, उसके बाद सबकी हालत खराब होनी ही है। इस तरह के हालात के लिए सभी को हमेशा तैयार रहना चाहिए। राजकोट में जब युवराज मैच खेलने आए थे, तब उन्हें शेयरिंग टैक्सी में बिठाया गया था। तब उन्हें लग गया था कि अब उनके बुरे दिन आने वाले हैं। उसके बारे में यह कहा जाता है कि यदि वह पिच पर जम जाए, तो प्रतिद्वंद्वी टीम को हारना होता है। 6 बॉल में 6 छक्के मारने वाले युवराज ने कैंसर से जीतकर धमाकेदार एंट्री ली थी। धीरे-धीरे उनका प्रदर्शन कमजोर होने लगा और वे हाशिए पर जाने लगे। राजकोट में भी केवले खिलाड़ियों ने ही नहीं, बल्कि आम जनता ने भी उन्हें अनदेखा किया था। यहां उसने अपने क्रिकेट के कैरियर के सूरज को अस्त होते देख लिया था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, अपनी उपेक्षा के बाद भी राजकोट में वे 200 रन बनाने से चूक गए थे। उनकी धुआंधार बल्लेबाजी के सभी कायल थे। पर अपने बल्ले पर अटूट विश्वास रखने वाले युवराज ने अपने अच्छे दिनों में ही कह दिया था कि जब तक बल्ला चलेगा, लोग उसके सामने नतमस्तक होंगे, जिस दिन बल्ला नहीं चला, लोग पहचानना भी छोड़ देंगे। आज उनका वही हाल हुआ।
लोग कहते हैं कि जाे हश्र युवराज का हुआ है, वही धोनी के साथ भी होने वाला है। टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने वाले धोनी के साथ विज्ञापनों के कई ब्रांड जुड़े हुए हैं। अब यह कहा जा रहा है कि धोनी की ब्रांड वेल्यू को झटका लगेगा। इन ब्रांड से करोड़ों रुपए कमाने वाली विज्ञापन एजेंसी धोनी के टेस्ट क्रिकेट से अलविदा कहने से इसका नकारात्मक प्रभाव अपने ब्रांड पर नहीं पड़ने देंगे। इससे धोनी की छवि और उसके साथ ब्रांड दोनों की स्थिति में बदलाव आएगा ही। छवि में कभी न कभी गिरावट आती ही है। इसका अनुभव हर क्षेत्र की ऊंचाई पर जाने वाले लोगों को हुआ है। राजनीति में चुनाव हारने वाले नेता हताशा में आ जाते हैं। उनके जीवन के सभी समीकरण उल्टे पड़ने लगते हैं। जिससे मिलने के लिए कभी लाइन लगती थी, उससे बात करना भी लोग अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। सत्ता के भोगी सत्ता के नहीं रहने पर स्वयं को अनाथ समझने लगते हैं। क्योंकि सत्ता का नशा बहुत ही मादक होता है। यह बहुत ही मुश्किल से छूटता है। सत्ता का चले जाना उन्हें जरा भी रास नहीं आता। इसलिए वे येन केन प्रकारेण वापस सत्ता में आना चाहते हैं।
यही हाल बॉलीवुड का है। जिसकी फिल्म हिट होती है, उसका बोलबाला हो जाता है। फिर बाद में उसे कोई पूछता नहीं। नायिकाओं के हाल तो और भी बुरे हैं। मायानगरी में नायिकाएं एक-दो फिल्मों के बाद फिंक जाती हैं। अपने अच्छे दिनों में वे दुकानों, ब्यूटी पार्लर आदि की दुकानों के उद्घाटन के लिए भी जाती हैं, पर बाद में उन्हें भी कोई नहीं पूछता।
हमारे देश के नेता मोटी चमड़ी के होते हैं। वे अपनी हार से सबक लेते हैं। पर आम आदमी का जीवन जीने वाला काेई अचानक ही प्रभावशाली बनकर बदनाम हो जाए, तो वह किसी को अपना मुंह भी बताने लायक नहीं रह जाता। को-ऑपरेटिव बैंकों के चेयरमेन जब बेशुमार दौलत बटोरने के आरोप में जेल जाते हैं, तब उनके साथ के कई निर्दोष डायरेक्टरों को भी जेल जाना पड़ता है। चेयरमेन पर तो खुला आरोप होता है, वे बिंदास होकर जेल में रह भी लेते हैं। पर निर्दोष डायरेक्टरों को जेल की यातना सहनी होती है। जब वे जेल से छूट जाते हैं, तो चेयरमेन की पूछ-परख होती है, पर निर्दोष डायरेक्टरों की हालत बहुत ही खराब हो जाती है। सहारा के सुब्रतो राय हों या फिर विजय माल्या जैसे लोग करोड़ों रुपए का खाकर भी उन पर उसका कोई असर नहीं होता। पुलिस विभाग में भी महकमे के उच्च अधिकारियों की जी-हुजूरी करने वाले भी समय की राह देखते रहते हैं। जब वे ही अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो उनका फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझते। ऐसा उन व्यक्तियों के साथ होता है, जो अपने अधिकारों पर गर्व करते हैं, पर कर्तव्य के नाम पर शून्य होते हैं।
सबसे खराब स्थिति तो नेताओं की ही होती है। जब वे सत्ता में होते हैं, तो पुलिस वाले भी उनकी बहुत इज्जत करते हैं। पर जब वे सत्ता में नहीं होते, तो कोई पुलिस वाला उन्हें देखना भी पसंद नहीं करता। मध्यप्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा एक समय अपने मातहतों से घिरे रहते थे, आज वे जेल में हैं, जब कभी अदालत आते हैं, तो वह तामझाम कहीं नहीं दिखता। न लाल बत्ती, न सलाम ठोंकने वाले पुलिसकर्मी और न ही उनके कथित समर्थक। सभी गुम हो जाते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसा युवराज के साथ हुआ, ठीक वैसा ही पश्चिम बंगाल में सौरव गांगुली के साथ भी हुआ। हमारे यहां क्रिकेट का क्रेज है, इसलिए उसके खिलाड़ियों के नाम सामने आते रहते हैं। बाकी तो अन्य खेल जैसे बॉक्सिंग, कबड्‌डी, हॉकी के खिलाड़ियों को स्वयं आगे आकर सम्मान माँगना पड़ रहा है। युवराज ही नहीं धोनी हो या फिर विराट कोहली, जिनका बल्ला चलता रहेगा, उनकी तूती बोलेगी। जिस दिन बल्ले से कहना नहीं माना, तो समझो, अच्छे दिन विदा होने वाले हैं। अपने अच्छे दिनों में सचिन ने भी लोगों की जहालत झेली है। हममें से किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया चढ़ते सूरज को सलाम करती है।
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

आतंक की यह पतंग कटनी ही चाहिए





                               दैनिक हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख


आतंक की यह पतंग कटनी ही चाहिए
डॉ. महेश परिमल
पेशावर की आर्मी स्कूल फिर से शुरू हो गई है। यह इस बात का सुबूत है कि आतंक के खिलाफ अब बच्चों में भी जोश है। कहते हैं कि बच्चों मंे खुदा होता है और आतंकियों ने खुदा को ही मार डाला। 16 दिसम्बर को जब यह घटना हुई थी, तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि अब आतंक के खिलाफ पाकिस्तान पूरी ताकत से लड़ेगा। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान ने अभी तक इस दिशा में केवल 10 आतंकियों को फांसी दी है और आर्मी स्कूल की दीवार को कुछ ऊंचा किया है। इस समय पतंग का माहौल है, हर कोई यही पूछ रहा है कि पिछले कुछ समय से पेशावर, पोरबंदर और पेरिस में आतंक का जो रूप दिखाई दिया, तो इस तरह के आतंकवाद की पतंग को आखिर कौन काटेगा? पेरिस में आतंंक के खिलाफ एक साथ दस लाख लोग सड़कों पर उतर आए। ऐसा नजारा हमारे देश में कभी देखने में नहीं आया। न मुम्बई धमाके के समय, न ही संसद पर हमले के समय। हर बार यदि कुछ होने को होता है, तो राजनीति ही आड़े आ जाती है। हम भारतीय कभी किसी घटना को राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आदत कब डालेंगे?
इस समय पूरे विश्व में आतंकवाद की पतंग खुलकर उड़ रही है। अब तो वह कभी भी किसी भी देश में घुसकर मौत का नंगा नाच भी करने लगी है। सभी चाहते हैं कि आतंकवाद का सफाया हो, पर बयानबाजी से आगे बात बढ़ ही नहीं पाती। पाकिस्तान हमेशा अड़ंगा लगाता ही आया है। वास्तव में वह भारत से शांति चाहता ही नहीं है। वह आतंकवाद को पनाह देने में विश्वास रखता है। यदि वह सचमुच आतंकवाद के खिलाफ होता, तो दाऊद को वह कब का भारत को सौंप चुका होता। उसके भीतर वैमनस्य की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। इससे वह कभी अलग हो ही नहीं सकता।
पेशावर, पोरबंदर और पेरिस की ये तीन घटनाएँ मानव संहार से जुड़ी हुई हैं। इन घटनाओं के पीछे यही उद्देश्य है कि कोई अपना ध्यान सबसे हटाकर अपनी ओर करना चाहता है। पोरबंदर में जिस बोट से कुछ आतंकी आ रहे थे, समय रहते भारत को जानकारी मिल गई, इसलिए बोट में सवार सभी लोगों ने बोट पर आग लगा दी और अपने जीवन की आहुति दे दी। पेशावर की घटना तो दिल दहला देने वाली थी। इसमें आतंकियों ने 140 मासूमों को गोलियांे से उड़ा दिया। यह घटना निंदनीय है। शाला की शिक्षिका को सबके सामने जलाकर मार डालना कहां की मर्दानगी है? इस तरह के दृश्य देखकर कई मासूमों की बोलती ही बंद हो गई। इसके पहले मासूमों ने आतंक और आतंकवादियों की बातें सुनी थी, पर जो मंजर उन्होंने अपनी आंखों के सामने देखा, तो उन बच्चोें की बोलती ही बंद हो गई। पेशावर की वह शाला अब फिर से खुल गई है। कई पालकों ने अपने बच्चों को इस बार भी स्कूल नहीं भेजा था, क्योंकि वे डर गए हैं। पेरिस की घटना ने तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो हमला बोला है, उसकी निंदा पूरे विश्व में हो रही है। यह आतंकियों का समृद्ध समाज पर सीधा हमला था। पेरिस में उदारमना लोग रहते हैं। इसलिए अब वहां की सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी नीति में बदलाव किया है। पेशावर, पोरबंदर और पेरिस इन तीनों घटनाओं में नरसंहार की योजना थी।
यह देश का दुर्भाग्य है कि पोरबंदर की घटना के मामले में राजनैतिक दलों ने अपनी रोटियां सेंकनी शुरू कर दिया। जिस तरह से अन्य दलों के बयान आए, उससे आतंकवाद को प्रोत्साहन ही दिया गया। दूसरी तरफ पेरिस की घटना को लेकर लाखों लोग एक स्थान पर आकर विरोध प्रकट करने लगे। हमारे देश में इसके पहले भी कई बार आतंकी हमले हुए, पर एक बार भी इसका विरोध करने के लिए आम जनता लाखों की संख्या में एक स्थान पर जमा नहीं हुई। इससे कहा जा सकता है कि हमारे देश में जागृति का अभाव है। सरकार आतंकवाद को कुचलने के लिए कोई भी कदम उठाती है, तो विरोधी दल यह आरोप लगाता है कि यह अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर हमला है। सरकार चाहे तो आतंकवाद के खिलाफ सीधे न सही,पर छद्म रूप से लड़ाई लड़ सकती है। सरकार के कुछ सख्त कदम ही आतंकवादियों की हालत खराब कर सकते हैं। आतंकवादी जब चाहे तब एयरपोर्ट उड़ाने, विमान उड़ा देने, नेताओं की हत्या करने आदि तरह की धमकियां देते रहते हैं।
इस तरह की आतंकवादी घटनाएं कई बार सुरक्षा की पोल खोलकर रख देती हैं। पेशावर की आर्मी स्कूल में आतंकी बिना किसी रोक-टोक के घुस गए। पोरबंदर की बोट भी भारतीय सीमा में घुस गई थी। पेरिस में तो आतंकियों का लक्ष्य ही था, अखबार वालों की हत्या करना। पेरिस ने इस घटना से सबक लिया। भारत की समुद्री शक्ति भी अब चौकस हो गई है। पर पाकिस्तान ने कोई सबक सीखा, ऐसा लगता नहीं। स्कूल पर हमले के एक महीने बाद भी पाकिस्तान अब तक केवल दस आतंकियों को ही फांसी दे पाया है। वास्तव में देखा जाए, तो पेशावर, पोरबंदर और पेरिस की घटनाओं में आतंकवाद की पतंग हवा में है। हम सभी चाहते हैं कि यह पतंग कट जाए, पर इसके लिए कोई तैयार ही नहीं हो रहा है। शायद आतंकवाद की पतंग को काटने वाली कोई डोर तैयार ही नहीं हुई है। उस डोर पर हम सभी को अपने गुस्से का मांजा लगाना होगा। तभी वह धारदार होगा। यह काम सामूहिक प्रयास से ही होगा। पर सवाल यही है कि करे कौन?
‎ डॉ. महेश परिमल
 

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

पतंग का अनुशासन



बुधवार, 14 जनवरी 2015

जीने का सलीका सिखाती पतंग

#http://epaper.jagran.com/epaper/14-jan-2015-262-National-Page-1.html#
आज जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 10 जनवरी 2015

लोकोत्तर में लगातार तीन दिनों तक प्रकाशित मेरे आलेख



भोपाल से प्रकाशित दैनिक लोकोत्तर में प्रकाशित मेरे आलेख

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

शब्दों की मोहक दुनिया

डॉ. महेश परिमल
शब्दों का सौंदर्य अद्भुत होता है। जब भी हमारे सामने कुछ शब्द विशेष सामने आते हैं, तो हम उस पर एक तरह से फिदा ही हो जाते हैं। मुँह से अनायास ही निकल जाता है कि वाह क्या शब्द है। शब्द और भाषा का अपना विशिष्ट शास्त्र है। शब्द समय के साथ बनते रते हैं, साथ ही इतिहास के गर्त में गुम भी होते रहते हैं। एक ओर जहां अंगरेजी के एक-एक शब्द पर शोध होते रहते हैं, वही दूसरी ओर अन्य भाषाओं के लिए यह जुनून नजर नहीं आता। हाल ही में आक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द ईयर के रूप में ‘सेल्फी’ शब्द का चयन किया गया है। इस शब्द का आशय है कि  मोबाइल या कैमरे से अपनी ही तस्वीर लेकर उसे फेसबुक या अन्य किसी विशेष मीडिया साइट पर अपलोड करना। हर वर्ष वर्ल्ड ऑफ इयर की स्पर्धा में नए-नए शब्दों का समावेश किया जाता है। जिस शब्द का चयन होता है, उसे शब्दकोश में स्थान मिलता है। यह सब देखकर और जानकर ऐसा लगता है कि इस तरह के कार्य यदि हमारी भाषा में हो, तो कितना अच्छा हो।
शब्द जीवंत हैं, क्योंकि इसे हम बोलते, लिखते और पढ़ते रहते हैं। हर शब्द अपने आप में एक मुहावरा होता है। हर शब्द की अपनी पहचान होती है। हर शब्द अपने आप में इतिहास को संजोया हुआ होता है। शब्द में इतिहास ही नहीं, बल्कि वर्तमान के दर्शन होते हैं। आश्चर्य यह है कि शब्द का भूगोल भी होता है, क्योंकि कुछ शब्द केवल कुछ ही देश अथवा राज्य में ही प्रयुक्त होते हैं। नए शब्दों का जन्म होता रहता है। हमेशा नए-नए शब्द अस्तित्व में आते रहते हैं। यह भी सच है कि शब्दों की मौत भी होती है। काल के शब्द रसातल में चले जाते हैं और लुप्त हो जाते हैं। कितने ही शब्द निजी होते हैं। अक्सर प्रेयसी अपने प्रियतम को एक विशेष नाम से पुकारती है। प्रेमी भी ऐसा ही करते हैं। पति और पत्नी के बीच भी वार्तालाप में कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिसका अर्थ वह नहीं होता, जिसका अर्थ साधारणतया वही होता है। ऐसे शब्द या नाम लीविंग सर्टिफिकेट या पासपोर्ट में नहीं होते। केवल दिल में ही होते हैं। कुछ शब्द इतने निजी होते हैं कि किसी व्यक्ति विशेष की उपस्थिति में ही बोले जाते हैं। महामहिम शब्द राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए ही प्रयुक्त होता है। मी लार्ड योर ऑनर आदि शब्द केवल अदालत में न्यायमूर्ति के लिए प्रयुक्त होते हैं। शब्द घिसते हैं, पिटते हैं और नए शब्दों की रचना के लिए मार्ग दिखाते हैं। देखते ही देखते लाइब्रेरी कब रायबरेली हो गया, हमें पता नहीं चला। रेफ्रिजेरेटर, फ्रिज और टेलीविजन टीवी हो गया, हमें पता ही नहीं चला।
भाषाशास्त्री शब्दों और वाक्यों पर घात लगाकर बैठे होते हैं। वे उस शब्द की व्युत्पत्ति से लेकर उसके विसर्जन तक का हिसाब रखते हैं। कहा जाता हे कि चार कोस पर पानी बदले और चार कोस पर बानी। हिंदी को ही ले लीजिए, वही हिंदी उत्तर प्रदेश में कुछ और तरीके से बोली जाती है, और मध्यप्रदेश में कुछ और तरीके से। पंजाब की हिंदी और बंगला की हिंदी में जमीन आसमान का अंतर है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव आदि में विभिन्न स्वरूपों में मिलती है। इस वर्ष ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईयर 2013 में ‘सेल्फी’ का समावेश किया गया है। यह शब्द पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 17 हजार बार अधिक प्रयुक्त हुआ है। शब्दों पर शोध ऐसे ही नहीं होता। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी उसके लिए रिसर्च प्रोग्राम बनाती है। ‘सेल्फी’  इंटरनेट पर सबसे अधिक प्रयुक्त हाने वाले शब्दों में से है। आक्सफोर्ड डिक्शनरी के संपादक जुडी पियरसल का कहना है कि सामाजिक, राजनैतिक और तकनीक बदलाव से शब्द भी आकार प्राप्त करते हैं। शब्द जुड़ते हैं, बिखरते हैं, नए बनते हैं और पुराने लुप्त हो जाते हैं। यह सब लोगों द्वारा ही होता है। माँ के स्थान पर मम्मी, मॉम या मम्मा शब्द आ गए, आपको पता चला? पिताश्री या पापा का स्थान पर पप्पा ने ले लिया। अब पप्पा का स्थान डेड ले रहा है। हमें पता ही नहीं चलता कि भाषा बदल रही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने एक शब्द दिया है-अफरा-तफरी, यह शब्द इतना अधिक प्रचलित हो गया है कि हर कोई आपाधापी के लिए इसी शब्द का प्रयोग कर रहा है। जिम को आज जिम के रूप में ही कहा जाता है, किसी को व्यायामशाला या कसरत स्थल कहते कभी सुना है आपने? क्रीडांगन अब ग्राउंड बन गया है।
अब फिर आते हैं शब्द ‘सेल्फी’  पर। आज की पीढ़ी शायद ही इस शब्द से अपरिचित हो। सभी ऐसा ही करने लगे हैं। अपनी ही तस्वीर अपने मोबाइल या कैमरे से खींचते हैं, फिर उसे सोशल साइट्स पर अपलोड कर देते हैं। इस कार्य से अब सेलिब्रिटिश भी बच नहीं पाए हैं। 2002 में सबसे पहले ऑस्ट्रेलियन फोरम में ‘सेल्फी’ शब्द का प्रयोग किया गया था। 2004 में क्लिकर्स वेबसाइट पर हैगटैग के लिए ‘सेल्फी’ का प्रयोग किया गया। फिर 2012 तक फिर इसका उपयोग अधिक नहीं हो पाया। 2012 में सोशल मीडिया पर सेल्फ पोर्टेट फोटोग्राफ्स का शार्टकट रूप ‘सेल्फी’ शब्द उपयोग में लाया गया। उसके बाद तो इसका बेपनाह प्रयोग होने लगा। सोशल मीडिया पर क्रिश्चियन धर्मगुरु  पोप के साथ यंगस्टर्स की एक तस्वीर खूब शेयर की गई। इस तस्वीर ने ‘सेल्फी’ शब्द के प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस समय ‘सेल्फी’  के अलावा दो अन्य शब्द स्पर्धा में थे। इसमें से एक शब्द है ‘ट्वर्क’ और दूसरा है‘बिंगवाय’। यह शब्द ट्वर्क माइली सायरस के सेक्सी डांस के एक स्टेप का नाम है। बिंगवाय यानी अधिक समय तक टीवी देखना। इन दोनों शब्दों के साथ लड़ाई में ‘सेल्फी’  जीत गया। इस शब्द का समावेश अभी ऑक्सफोर्ड की ऑनलाइन डिक्शनरी में दिखाई नहीं दे रहा है, शायद कुछ समय बाद दिखाई देने लगे। 
पिछले साल का विजेता शब्द था ओम्नीशैबल्स
वष 2012 में ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईयर के रूप में जिस शब्द का चयन किया गया वह शब्द था ओम्नीशैबल्स। इस शब्द का अर्थ होता है ऐसी स्थिति, जिसमें कुछ भी सच्चई नहीं, शुरू से आखिर तक गड़बड़झाला। ए सिचुएशन विचइज सेम्बोलिक फ्राम एवरी पॉसिबल ऐंगल मिन्स ओम्नीशैबल्स। यह शब्द सबसे पहले 2009 में बीबीसी के पॉलिटिक्स सटायर के कार्यक्रम ‘द थिंक ऑफ इट’ में प्रयुक्त किया गया था। उसके बाद तो यह शब्द बोलचाल की भाषा में ही शामिल हो गया। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विपक्ष के नेता एड मिलिबेड ने संसद की कार्यवाही के दौरान ओम्नीशैबल्स शब्द का इस्तेमाल किया था। इसे संसद के मिनिट्स में भी शामिल कर लिया गया। इसके बाद तो सरकार पर आरोप लगाने और उसकी बुराई करने के लिए यह शब्द खूब लोकप्रिय हुआ। इतना ही नहीं, इस शब्द को जोड़कर नए शब्द भी बनने लगे।  रोम की प्रेसिडेंट के चुनाव अमेरिका के मिट रोम प्रत्याशी थे, इस दौरान वे लंदन गए, तब उन्होंने आम सभाओं में कई तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया, इन सभी को रोम्नीशैवल्स के रूप में आज भी जाना जाता है। 2012 में कई अन्य शब्द भी स्पर्धा में थे। इसमें यूरोगेडॉन, ममीपोर्न, ग्रीन ऑन ब्ल्यू, गेम्समेकर, सेकंड स्क्रिनिंग आदि शामिल हैं। यूरोजोन को यूरोगेडोन कहा जाता है। यह शब्द 50 शेड्स नाम किताब से लिया गया। लंदन ओलिम्पिक वालेंटियर के रूप में काम करने वाले लड़कों-लड़कियों के लिए गेम्स मेकर जैसा शब्द काम में लाया गया। सेकंड स्क्रिनिंग शब्द का मतलब होता है टीवी देखते-देखते मोबाइल या टेबलेट का इस्तेमाल करना।
अंगरेजी के अन्य शब्दों की रोचक बातें
फेसबुक और दूसरे अन्य मीडिया साइट्स से किसी को हटा दिया जाता है, तो उसे हमें कहते हैं कि मैंने आपको अनफ्रेंड कर दिया। यह अनफ्रेंड शब्द भी बहुत पुराना नहीं है। 2009 में ऑक्सफोर्ड वर्ल्ड ऑफ द ईयर के रूप में इस शब्द का चयन किया गया था। उस समय डिक्शनरी में साइंटिस्ट क्रिस्टन लिंडबर्ग ने कहा था कि शब्द की दृष्टि से अनफ्रेंड शब्द धारदार है। हाल में हलो शब्द पर जो शोध सामने आया है, वह भी बहुत ही मजेदार है। हलो ग्राहम बेल की गर्लफेंड का नाम था, जब उन्होंने टेलिफोन का अविष्कार किया, तो सबसे पहले इसी शब्द का इस्तेमाल किया। आज यह शब्द सबसे अधिक बोला जाता है। हलो के बाद सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है ओ के। इस शब्द के बारे में यह कहा जाता है कि अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति एण्ड्रुज जेक्शन आल करेक्ट शब्द को संक्षिप्त रूप में ओके कहते। तभी से इस शब्द का प्रचलन शुरू हुआ। इस शब्द को लेकर अन्य कई कहानियां भी प्रचलित हैं। कहते है कि अमेरिका के रेल्वे स्टेशन में काम करने वाला एक क्लर्क ओबडिया केली सभी पार्सल की जांच के बाद अपने ही नाम का संक्षिप्त रूप ओके लिख देता था। इससे यह शब्द काफी प्रचलित हुआ। कई लोग इस शब्द को रेड इंडियन की देन मानते हैं।
इस तरह से देखा जाए, तो शब्दों की अपनी अलग ही दुनिया है, जहां वे प्रचलित होकर घिसते-पीसते हुए रसातल में समा भी जाते हैं। कुछ शब्द अमर हो जाते हैं। इसके पीछे किसी व्यक्ति विशेष का आग्रह भी हो सकता है। कुछ लोगों के तकिया कलाम भी नए शब्दों को जन्म देते हैं। पर सच तो यह है कि जहां शब्द हमें बेधकर रख देते हैं, वहीं यह राहत पहुंचाने वाले भी होते हैं। हर शब्द अपने आप में एक मुहावरा है। एक शब्द से युद्ध और शांति का सबक मिल सकता है। इसलिए इसका उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाए, तो ही बेहतर।
डॉ. महेश परिमल 

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

‘पी.के.’ का विरोध करने के पहले यह भी सोचें

डॉ. महेश परिमल
रिलीज होने के एक सप्ताह बाद आमिर खान की फिल्म ‘पी.के.’ का विरोध शुरू हो गया है। तब तक इस फिल्म ने कमाई का रिकॉर्ड स्थापित कर लिया है। फिल्म के विरोधी यही कह रहे हैं कि इससे हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। फिल्म में धर्म के नाम पर चलते ढकोसलों पर कटाक्ष किया गया है। विशेषकर हिंदू धर्म को लेकर। वैसे देंखा जाए, तो फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में जो कुछ संवादों के माध्यम से कहा गया है, वही सब कुछ ‘पी.के.’ में दृश्यों के माध्यम से कहा गया है। ओह माय गॉड का विरोध इसलिए अधिक नहीं हुआ,क्योंकि उसमें जो कुछ कहा गया है, वह सब प्रमाण के साथ कहा गया है। ‘पी.के.’ का विरोध तभी शुरू हुआ, जब स्वामी स्वरूपानंद ने यह बयान दिया कि इस फिल्म से हिंदू धर्म की भावनाएं आहत हुई हैं।
जैसे-जैसे फिल्म पी के का विरोध बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे उसकी कमाई भी तेजी से बढ़ती जा रही है। वैसे देखा जाए, तो इसका विरोध वही लोग कर रहे हैं, जिनका फिल्म के विवादास्पद दृश्यों से कोई वास्ता ही नहीं है, वे तो केवल विरोध के नाम पर ही विरोध कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि वाकई में क्या ‘पी.के.’ हिंदू विरोधी है? धर्म का मामला बहुत ही नाजुक और संवेदनशील होता है। धर्म पर आधारित कोई नाटक खेलना हो, या फिर फिल्म बनाना हो, तो धर्म का पालन करने वाले करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। नाटककार या फिल्मकार को इसका ध्यान रखना पड़ता है। राजकुमार हीरानी की फिल्म ‘पी.के.’ को लेकर इन दिनों कुछ वैसा ही माहौल है। हिंदू संगठन इस फिल्म का विरोध करते हुए फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। फेसबुक और ट्वीटर पर ‘बायकाट ‘पी.के.’ नाम से अभियान भी चलाया जा रहा है। फिर भी लाखों लोग इस फिल्म को देख रहे हैं। फिल्म को काफी सराहना भी मिल रही है। फिल्म का विरोध करने वाले से अधिक इसको पसंद करने वाले हैं। जो कुछ नहीं कह रहे हैं। समझ में नहीं आता है कि फिल्म में जो ढकोसले दिखाए गए हैं, उस पर कोई संगठन किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। कुछ लोग आमिर खान को इसलिए दोषी बता रहे हैं, क्योंकि एक कलाकार होने के नाते उन्होंने इस्लाम की हंसी नहीं उड़ाई है।
‘पी.के.’ में केवल हिंदू धर्म की ही हंसी उड़ाई गई है, ऐसा नहीं है, बल्कि मिशनरियों द्वारा धन के लालच में लोगों के धर्म परिवर्तन करने की बात को भी जोर-शोर से उठाया गया है। परंतु जब मुस्लिमों के मस्जिद में जाने की बात होती है, तो आमिर खान को उसके दरवाजे से ही भगा दिया जाता है। इसी तरह जब रेल्वे स्टेशन पर बम धमाका होता है, तो इसका भी खुलासा नहीं किया गया है कि बम धमाके लिए कौन जिम्मेदार है? धमाका करने वाले किस धर्म को मानते हैं, या फिर किस धर्म के लोग इस धमाके में मारे गए। इसके बाद भी इस फिल्म को इतने अधिक लोग क्यों देख रहे हैं कि वह कमाई का रिकॉर्ड स्थापित करने लगे? इसका सीधा-सा यही कारण है कि फिल्म में दुनिया के लगभग सभी धर्मों में चलने वाले ढकोसलों का पर्दाफाश किया गया है। यह हम सब कदम-कदम पर देख-समझ रहे हैं। पर विरोध नहीं कर पा रह हैं। हम इसका भी विरोध नहीं कर पा रहे हैं कि धार्मिक स्थलों में होने वाले शोर क्यों होता है? धार्मिकता के नाम पर बाबाआंें को इतनी अधिक जमीन कैसे मिल जाती है कि वे अपना गोरखधंधा चला लेते हैं। आसाराम, सतपाल बाबा का असली चेहरा हम सबने देख लिया है, उसके बाद भी इन्हें सर-आंखों पर बिठाने वाले आज भी हमारे बीच हैं। आखिर इन बाबाओं को शह कहां से मिलती है? कौन हैं इनके संरक्षक? बिना मजबूत संरक्षण के ये इतने बड़े पैमाने पर गोरखधंधा नहीं कर सकते? यह काम तो जनता का है, जनता ही ऐसे बाबाओं की पोेल खोल सकती है। लेकिन जनता को जगाने वाली फिल्म का विरोध हो रहा है।
सबसे बड़ी बात यह है कि क्या हिंदू धर्म की बुनियाद इतनी अधिक कमजोर है कि एक फिल्म से ही कमजोर होने लगी है। हजारों वर्षों से हिंदू धर्म अनवरत चला आ रहा है। इससे बड़ी-बड़ी ताकतों ने इसे नेस्तनाबूद करने की कोशिश की, पर आज तक इसका बाल भी बांका नहीं हुआ। तो फिर क्या एक फिल्म मात्र से हिंदू धर्म संकट में आ जाएगा? इतना तो कमजोर कतई नहीं है हिंदू धर्म। यदि हमें यह कहीं कमजोर नजर भी आता है, तो उसे मजबूत करने की कोशिश की जानी चाहिए, न कि उन शक्तियों का विरोध किया जाना चाहिए, जो धर्म को कथित रूप से कमजोर बनाने का काम कर रहीं हैं। किसी फिल्म का विरोध करने के बजाए हमें यह सोचना होगा कि फिल्म वाले ने वह विषय आखिर कहां से उठाया है। समाज से ही ना? तो फिर समाज में यह विकृति आई कहां से? हमें समाज की विकृति पर ध्यान देना चाहिए।
शिवलिंग पर चढ़ाया जाना वाला दूध यदि गटर पर जा रहा है, तो हमें इस परंपरा पर सोचना चाहिए। उस दूध को किस तरह से गरीब बच्चों तक पहुंचाया जाए, हमें इस पर विचार करना चाहिए। मजार पर हजारों चादरें चढ़ाई जाती हैं, तो आखिर उन चादरों का इस्तेमाल क्या होता है, क्या उससे ठंड में ठिठुरते बच्चों के लिए रजाइयां नहीं बनाई जा सकती? चर्च में मोमबत्ती जलाने की अपेक्षा किसी गरीब के घर पर जलाई जानी चाहिए, ताकि उनकी झोपड़ी रोशन हो। धर्म में परंपरा के नाम पर ढकोसलों पर हमारे तथाकथित साधू-संतों काे विचार करना चाहिए। यह सच है कि आमिर की फिल्म में यदि कोई संदेश न होता, तो दर्शक टाॅकीज तक जाते ही नहीं। कुछ तो ऐसा है कि सभी धर्मों के लोग फिल्म देखने जा रहे हैं और उसे सराह भी रहे हैं। आमिर तो एक उद्देश्य लेकर सामने आए हैं, पर समाज का कोढ़ बनते तथाकथित बाबाओं के खिलाफ क्यों कोई सामने नहीं आता? किस तरह से इन्होंने लूटा है, भक्तों को। किस तरह से उनकी भावनाओं से खेला गया है? आखिर भक्तों का क्या कुसूर? वे तो अपनी पीड़ाओं से मुक्ति पाने के लिए बाबाओं की शरण में पहुंचे थे। बाबाओं की सल्तनत को हिलाने की ताकत आखिर किसमें है? आखिर जनता को ही यह बीड़ा उठाना होगा। तभी समाज में एक स्वस्थ परंपरा कायम होगी।
‘पी.के.’ का विरोध करने वाली संस्थाओं काे लगता है कि इसमें केवल हिंदू देवी-देवताओं पर हमला किया गया है, तो वे पाकिस्तान के शोएब मंसूर की फिल्म ‘खुदा के लिए’ अवश्य देखनी चाहिए। यह फिल्म 2007 में बनी थी। यह फिल्म ओएमजी और ‘पी.के.’ से कहीं अधिक आक्रामक है। इसमें पूरी तरह से साफगोई है। इसमें कहीं भी कामेडी नहीं है। डायरेक्टर ने अपनी बात पूरी शिद्दत के साथ की है। फिल्म का संदेश यही है कि इस्लाम मुसलमान की दाढ़ी में नहीं है। किसी भी धर्म पर अपनी राय रखने के पहले हमें उस धर्म का अध्ययन भी कर लेना चाहिए। बिना जाने-समझे हमें अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है। फिल्मों का विरोध हमेशा से होता रहा है। पर विरोध सकारात्मक होना चाहिए। हमें यह भी सोचना होगा कि आखिर फिल्म वाले को हमारी झूठी परंपरा एवं आडम्बर पर कटाक्ष करने की हिम्मत कैसे हुई? आशय स्पष्ट है िक दोष हमारी परंपरा में ही है। फिल्मों में वही बताया जा रहा है, जो समाज में हो रहा है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, पर िसनेमा भी साहित्य का एक अंग है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अपनी पिछली फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में आमिर ने शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर जोरदार कटाक्ष किया, उससे आखिर क्या हुआ? शिक्षा की कितनी दुकानें बंद हुई? कितने विद्यार्थियों को आत्महत्या से रोका गया? देश की कितनी प्रतिभाओं को पलायन से रोकने के प्रयास हुए? अगर हम ऐसे सुलगते सवालों का जवाब नहीं ढूंढ पाए, तो हमें कोई हक नहीं है कि किसी की बिंदास अभिव्यक्ति के खिलाफ सड़क पर उतर जाएं।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

आपा खो रही हैं ममता बनर्जी

डॉ. महेश परिमल
जनता के अथक परिश्रम की कमाई को डकारने वाले ममता के सभी साथी एक-एक करके कानून के हत्थे चढ़ रहे हैं। अपने साथियों से जुदा होकर ममता अपना आपा खो रही हैं। शारदा चीट फंड से जुड़े ममता के एक और साथी मदन मित्रा की गिरफ्तारी पिछले दिनों हुई। उसके तीन साथी पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं। इस कारण ममता बार-बार गलतियां कर रही हैं। पहली तो भाजपाध्यक्ष अमित शाह की रैली होने में बाधा पहुंचाई। उसके बाद जब अदालत ने अनुमति दे दी, तो वे मन मसोसकर रह गई। इसके बाद वे बार-बार ललकार रही हैं कि प्रधानमंत्री में दम हो, तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाएं। पर भाजपा यह अच्छी तरह से जानती है कि उन्हें गिरफ्तार कर उन्हें हीरो नहीं बनाना है। इसलिए उसके िवश्वसनीय साथियों की धरपकड़ कर उसे कमजोर बनाने में लगी हुई है।
ममता के आसपास कानून का घेरा लगातार कसता जा रहा है। उसकी गिरफ्तारी अभी भले ही न हो, पर उसे कमजोर बनाने में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। देखा जाए, तो शारदा घोटाला और सहारा का घोटाला दोनों एक जैसे ही हैं। जो उत्तर प्रदेश में सुब्रतो रॉय ने किया, वही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथियों ने किया। दोनों घोटालों के षड्यंत्रकारी इन समय जेल में हैं। दाेनों घोटाले राज्य सरकार की सरपरस्ती में ही हुए हैं। दोनों घोटालों में प्रजा की पाई-पाई की कमाई को जमकर लूटा गया। जब भी इन पर कानूनी शिकंजा कसा, तोेे जमकर बवाल भी हुआ। उनके समर्थक सड़कों पर आ गए। पर लोगों की हाय ने अपना काम कर दिखाया। विरोध काम नहीं आया। शारदा घोटाले में जब सरकारी एजेंसियां अपना काम कर रही थीं, तो ममता को उसकी सहायता करनी चाहिए। इसके बजाए वे बार-बार भाजपा सरकार को ललकार रही हैं। उनके इस व्यवहार से लोगों को यह शंका हो रही है कि वे भी कहीं न कहीं इस घोटाले में शामिल हैं। आखिर मामला गरीबों के सपनों के टूटने का है। उनकी जमा-पंूजी को हजम कर लिया गया है। अगर ममता वास्तव में गरीबों की हमदर्द हैं, तो उसे केंद्र सरकार की मदद करनी चाहिए।
इस समय केंद्र सरकार द्वारा जो कुछ किया जा रहा है, उसे ममता बदले की कार्रवाई बता रही है। जबकि उसे केंद्र की सहायता करनी चाहिए, ताकि उसकी साफ छवि बन सके। लेकिन जिस तरह वे मोदी सरकार को ललकार रही है, उससे तो यही लगता है कि वे अपनी खीझ ही निकाल रही हैं।
आखिर में जिस मदन मित्रा की धरपकड़ की गई, उस संबंध में ममता ने 2013 में एक आम सभा में मदन मित्रा को सबके सामने लाते हुए लोगों से यह पूछा था कि क्‍या ये आपको चोर दिखाई देते हैं।  ममता जिन 5 लोगों को स्‍वच्‍छ छवि का बता रही थीं, उनमें से तीन आज सीबीआई की कस्‍टडी में हैं। वे बार-बार यही कह रहीं हैं कि मोदी सरकार उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रही हैं, इस तरह से वे अपने साथियों की गिरफ्तारी का राजनैतिक लाभ उठाना चाहतीहैं। अब तो ऐसा लगता है कि ममता खुद अपने ही बनाए जाल में फंसती जा रही है।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्‍होंने अपने दम पर 34 बरसों से जमे वामपंथियों की सरकार को उखाड़ फेंका। यह एक ऐतिहासिक कार्य था। लेकिन अब लगता है कि ममता अब लोगों के बीच अपनी पकड़ कायम नहीं रख पा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की बढ़ती दादागिरी और नए उद्योगों को प्रदेश में न लाने के लिए उनकी जिद के अब दुष्‍परिणाम सामने आने लगे हैं। वैसे वे तो अब यह मान ही बैठी हैं कि उनकी सरकार को पलटाने के लिए केंद्र सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है। उनके साथियों की धरपकड़ के पीछे यही साजिश है। पिछले महीने ही केंद्र सरकार ने कहा था कि पश्‍चिम बंगाल आतंकवादियों के लिए स्‍वर्ग के समान है। सरकार का यह बयान वर्धमान में हुए विस्‍फोट के संदर्भ में था, पर ममता ने इस गलत ही तरीके से लिया और केंद्र के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करने लगीं।
भाजपाध्‍यक्ष अमित शाह की सभा के लिए पहले तो उन्‍होंने अनुमति न देकर अपने ही पांव पर कुल्‍हाड़ी मारी है। जब हाईकोर्ट ने मंजूरी दी, तब अमित शाह ने ममता को उनके ही गढ़ में ललकारा था। गुजरातीभाषी होने के बाद भी उन्‍होंने टूटी-फूटी बंगला में अमित शाह ने जो कुछ भी बोला, वह बंगालियों को अच्‍छा लगा। वास्‍तव में वहां की प्रजा भी तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागिरी से तंग आ चुकी है। सिंगूर का घाव अभी भी ताजा ही है। अब तक तो वे यही मानती आ रही थीं कि पश्‍चिम बंगाल में उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता, पर अब वे अपनी कमजोरी को समझने लगी है, इसलिए बिफरने लगी हैं। जबान पर लगाम नहीं रख पा रही हैं। अब उसके अभिमान का गुब्‍बारा फूटने लगा हैा पहले वे यही मानकर चल रहीं थी कि उसके सामने केवल वामपंथी और कांग्रेस ही हैं, पर भाजपा बीच मे आ गई, इसलिए वे तीन ओर से घिर गई हैं। उनके ही गढ़ में प्रधानमंत्री की सभा के होने से लोगों में ममता के प्रति आक्रोश दिखाई देने लगा है। मोदी का विरोध करने वालों में ममता सबसे आगे रही हैं। इसलिए मुख्‍यमंत्रियों की बैठक का उन्‍होंने बहिष्‍कार भी किया था।
शारदा चीट फंड घोटाले के संचालकों के पास तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने घाटे में चल रही कितनी ही कंपनियों के शेयर को ऊंची कीमत पर लेने के लिए दबाव बनाया था। ऐसी एक नहीं पर कई कंपनियों के लिए कहा गया। इस तरह से शारदा चीट फंड के संचालक अपनी धनराशि गंवाते रहे। इधर प्रजा से लिए गए धन को लौटाने की चिंता वे नहीं कर पा रहे थे। जब धन लौटाने की बारी आई, तो चीटफंड के संचालकों से अपने हाथ खड़े कर दिए। लोगों ने इस दिशा में अभियान ही चला दिया। तब तृणमूल कांग्रेस जनता के साथ नहीं थी। जब शारदा चीट फंड के संचालकों की धरपकड़ शुरू हुई, तब समझ में आया कि ये सभी ममता बनर्जी के ही साथी हैं। आज ममता लाचार है। अपने ही साथियों की दगाबाजी से वे आहत हैं। क्‍या करें, क्‍या न करें की स्‍थिति में वे अब अपना आपा ही खोने लगी है। सही गलत का निर्णय नहीं ले पा रही हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 5 जनवरी 2015

मुझे भी कुछ कहना है....



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रविवार 4 जनवरी 2015 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

‘छिलपे’ का महत्व


डॉ. महेश परिमल
कुछ दिनों पहले ही पड़ोस के घर में बढ़ई ने कुछ काम किया। तब वहां कचरे के
रूप में ‘छिलपा’ दिखाई दिया। साथियों के लिए यह कुछ नया नाम हो सकता है।
लकड़ी पर जब रंदा चलता है, तो लकड़ी का जो ऊपरी भाग निकलता है, उसे ‘छिलपा’
कहा जाता है। छिलपा मुझे अतीत में झांकने के लिए विवश कर देता है। पिताजी
बढ़ई थे, घर पर भी कभी-कभी कुछ काम कर ही लेते थे। अतएव ‘छिलपा’ निकलता ही
था। यह ‘छिलपा’ हमारे कई काम आता। कई बार तो इसकी डिजाइन इतनी सुंदर होती
कि उससे कुछ आर्ट भी तैयार हो जाता। जिस तरह से शार्पनर से पेंसिल छिलते
हुए जो छिलन निकलती है, बच्चे उस पर फेविकोल लगाकर कुछ आकृति बनाते हैं,
ठीक उसी तरह उन छिलको से हम भाई-बहन भी कुछ न कुछ बना ही लेते थे। यही
नहीं, ‘छिलपा’ अन्य कई काम भी आता। चूल्हे पर लकड़ी जलाने के पहले उसे भी
साथ जलाया जाता। ‘छिलपा’  जल्दी जलता, इससे लकड़ी आग जल्दी पकड़ती।

‘छिलपा’ हम भाई-बहनों के जीवन से जुड़ा हुआ है। अनजाने में वह हमें यह
प्रेरणा देता है कि लकड़ी पर रंदा जितना अधिक चलेगा, उससे न केवल लकड़ी
चिकनी होगी, बल्कि ‘छिलपा’ भी उतना ही साफ-सुथरा निकलेगा। यानी जीवन में
जितना अधिक संघर्ष होगा, जीवन उतना ही चमकदार बनेगा। यह तय है। अब जीवन
के चमकदार बनने से क्या होगा? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि
चमकदार जीवन आखिर किसके लिए प्रेरणास्पद होगा? इसे समझने के लिए हमें
लकड़ी की तासीर समझनी होगी। लकड़ी के फर्नीचर कितने सुंदर दिखाई देते हैं?
बरसों-बरस तक वैसे ही बने रहते हैं। उनमें ज़रा भी परिवर्तन दिखाई नहीं
देता। कभी गंदे दिखाई दें, तो गीले कपड़े से पोंछ देने पर वह फिर चमकदार
बन जाता है। इसके पीछे लकड़ी पर रंदे का चलना ही पर्याप्त नहीं होता, उस
पर पॉलिश की जाती है। जिससे उसकी चमक बढ़ जाती है।
‘छिलपा’ इसे हम लकड़ी की चमड़ी कह सकते हैं। चमड़ी निकलती जाती है, लकड़ी
निखरती जाती है। जिस तरह से साँप की केंचुल निकलती है। ठीक उसी तरह मानव
अपनी बुरी आदतों को छोड़ता जाए, तो उसे इंसान बनने में देर नहीं लगेगी।
वास्तव में इंसान यदि सुधरना चाहे, तो उसकी प्रत्येक गलती ही उसे सुधार
सकती है। ‘छिलपा’ तो एक प्रतीक है। सफाई का, गरीबों के ईंधन का। उनका
चूल्हा इसी से जलता है। आजकल लकड़ियां मिलती कहां हैं? वैसे तो ‘छिलपा’ भी
नहीं मिलता। पहले बढ़ई लोगों से ‘छिलपा’ ले जाने के लिए कहते थे, आज उसे
ही बेचते हैं। पहले जो उनके लिए कचरा था, आज आय का साधन है। गरीबी में जो
चीजें गरीब को अनायास मिल जाती थीं, आज उसी के लिए उसे मशक्कत करनी पड़ती
है। उसके लिए दाम देने होते हैं। गरीब को हर चीज के लिए दाम देने होते
हैं, पर जब बात गरीब को दाम देने की होती है, तो हर कोई यही चाहता है कि
उसे कम से कम दाम देना पड़े। कैसा अर्थशास्त्र है यह? गरीब पर ऊंगली उठने
में देर नहीं लगती। मानों उसे ईमानदारी से जीना आता ही नहीं। पर अमीर यह
भूल जाते हैं कि गरीब के बिना उनका जीवन संभव ही नहीं। ‘छिलपा’ गरीबी का
प्रतीक भले ही हो, पर उसमें स्वाभिमान की झलक दिखाई देती है। गरीब का
चूल्हा ही नहीं जलाता ‘छिलपा’, बल्कि गरीब के पेट की आग बुझाने में भी
सहायक होता है। हम सब ‘छिलपे’ में अपने स्वर्गीय पिता के परिश्रम के रूप
में देखते हैं। पिता से यही सीख मिली है, जो आज तक काम आ रही है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

जमीन पर विमान


                                  दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

मासूमों के शोषण की इबारत लिखते कारखाने

डॉ. महेश परिमल
अभी पिछले माह ही हमारे बीच से बाल दिवस गुजर गया। इस दिन हम सबने बच्चों को याद किया, अपना जन्म दिन बच्चों को समर्पित करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी याद किया। साथ ही यह संकल्प लिया कि अब बच्चों को पूरा संरक्षण दिया जाएगा। लेकिन आज भी किसी की साइकिल, स्कूटर या फिर बाइक िबगड़ जाए, तो उसे एक बच्चा ही सुधार पाता है। आज देश के छोटे होटल हों, कारखाने हों, फैक्टरियां हों, सभी स्थानों पर बच्चे काम करते दिख जाएंगे। इससे अनजान होकर हम अपने काम में लगे रहते हैं। कोई काम नहीं आता बाल दिवस पर लिया गया संकल्प। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारी दिवाली की खुशियां इन्हीं बच्चों के माध्यम से ही बिखरती हैं। पटाखा बनाने वाले कारखानों में आज भी बच्चे पटाखा बनाते समय काल-कवलित होते हैं। हमारे लिए यह केवल एक खबर मात्र होती है। पर हम खुशियां मनाने के लिए पटाखे चलाना नहीं छोड़ते। पटाखे से पर्यावरण का नुकसान होता है, पर सच तो यह है कि इसमें हजारों मासूमों का परिश्रम लगा हुआ है। पटाखे मासूमों के शोषण की इबारत लिखते हैं। क्यों न हम खुशियां मनाने के लिए पटाखों का इस्तेमाल करना ही बंद कर दें?
भारत विश्व की दूसरी सबसे तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है और सूचना तकनीकी के क्षेत्र में भी उसे अग्रणी माना जाता है। इसके बावजूद भारत में बाल मजदूरी जैसा अभिशाप समाप्त होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। यह भारत की आत्मा में लगा हुआ एक ऐसा खंजर है जो निकाले नहीं निकल पा रहा। अनेक अध्ययनों का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में सबसे अधिक बाल मजदूर भारत में ही हैं और इनकी उम्र 4-5 वर्ष से लेकर 14 वर्ष के बीच है। विश्व भर में जितने बाल मजदूर हैं, उनका 30 प्रतिशत भारत में ही है। और यह स्थिति तब है, जब भारत में बाल श्रम को गैर कानूनी घोषित किया जा चुका है, और बाल श्रमिकों से काम लेने वालों के लिए अच्छी-खासी सजा का प्रावधान भी है।
दरअसल बाल मजदूरी कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे कानून बना कर खत्म किया जा सके, ठीक वैसे ही जैसे छुआछूत। देश को आजादी मिलने के बाद बने संविधान में छुआछूत को गैर कानूनी करार दे दिया गया, लेकिन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और लोगों के नजरिए में बदलाव आए बिना उसका समाप्त होना संभव नहीं था। यही कारण है कि आज भी वह अनेक जगहों पर प्रचलित है। इसी तरह जब तक बाल मजदूरी के पीछे के सामाजिक-आर्थिक कारणों को समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक इस अभिशाप से छुटकारा मिलना मुमकिन नहीं है। मजदूर के घर बच्चा पैदा होने पर हिन्दी के प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक कविता लिखी जिसकी बहुत मशहूर पंक्ति है "एक हथौड़े वाला और हुआ" यानी, उन्हें भी यही उम्मीद है कि मजदूर का बेटा भी बड़ा होकर बाप की तरह हथौड़ा ही संभालेगा। शायद उन्हें भी यह अंदाज न होगा कि वह कितना बड़ा होगा, जब उसके हाथ में हथौड़ा पकड़ा दिया जाएगा। गरीबी सबसे बड़ा कारण है जो मां-बाप अपने छोटे-छोटे बच्चों को काम पर लगा देते हैं। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था का पूरी तरह चौपट हो जाना दूसरा बड़ा कारण है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की इतनी कम सुविधाएं हैं कि गरीब बच्चे उनमें दाखिला लेने के कुछ ही समय बाद वहां जाना बंद कर देते हैं। उनके सामने काम करके परिवार की आमदनी में कुछ योगदान करने के सिवा कोई और चारा ही नहीं बचता।
पहले बाल मजदूरी गांव में अधिक थी, लेकिन अब वह शहरों में भी पसर गई है। हर जगह बच्चों को काम करते देखा जा सकता है। बाल मजदूरों की अवैध तस्करी भी फलफूल रही है। बाल मजदूरी को समाप्त करने के प्रयास में लगे स्वयंसेवी संगठन कानूनों को कड़ा बनाने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन कानून कड़ा करने से भी समस्या का हल होने वाला नहीं। दहेज हत्या संबंधी कानून कितना कड़ा है, यह किसी से छिपा नहीं। फिर भी दहेज के लिए बहू की हत्या की घटनाएं आए दिन देखने में आती हैं। बाल मजदूरी तभी समाप्त हो सकती है, जब उन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बदला जाए, जिनके कारण वह पैदा होती और पनपती है।
जब तक गरीब बच्चों की निःशुल्क शिक्षा एवं स्वास्थ्य के बारे में सरकार गंभीरता से नहीं सोचती और उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं कराती, तब तक बाल मजदूरी से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। गरीब अपने परिवार का पेट बहुत मुश्किल से भर पाता है। अगर वह अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकता, तो वह उन्हें काम पर ही लगाएगा। अक्सर उस पर कर्ज का बोझ भी होता है जिसे उतारने के लिए उसे यूं भी अतिरिक्त आमदनी की जरूरत होती है। ऐसे में उसके लिए अपने छोटे-छोटे बच्चों को काम पर लगाना विवशता है। जब तक उसकी यह विवशता बनी रहेगी, बाल मजदूरी भी जाने वाली नहीं।
इस दिश में अगर हम एक छोटी-सी शुरुआत करें कि हम न तो अपने घर में किसी बाल मजदूर को काम पर रखेंगे, न ही बाल मजदूरों के हाथों से अपने वाहन ठीक कराएंगे। इसके अलावा जिन होटलों आदि में बच्चे काम कर रहे हों, वहां न जाएं। एक छोटी-सी कोशिश यह भी हो सकती है कि जहां बच्चे काम कर रहे हों, वहां जाकर हम किसी एक बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने का संकल्प लें। यह एक छोटी-सी शुरुआत होगी, पर निश्चित रूप से यह मन को संतोष दिलाएगा और दिल को सुकून। एक कदम तो उठाइए, कुछ समय बाद आपके पास सुकून की ढेर सारी दौलत होगी। जिस दौलत को पाने के लिए इंसान जिंदगी भर कोशिश करता है, वह आपके कदमों में होगी।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

मासूम की मौत से जुड़ी है इबोला के जन्म की कहानी

डॉ. महेश परिमल
इबोला एक बार फिर सर उठा रहा है। यह एक ऐसा रोग है, जो अभी तक लाइलाज है। दूसरा यह सघन बस्तियों में तेजी से फैलता है। अब तो यह हवाई मार्ग से होते हुए एक देश से दूसरे देश तक पहंंुचने भी लगा है। इसलिए यह उन देशों में भी तेजी से फैलेगा, इसमें कोई शक नहीं।
गिनी के मेलिआंडु गांव में रहने वाला एमिल केवल दो वर्ष का था, तब उसने एक छोटे-से चमगादड़ का मांस खा लिया। शाम तक उसकी तबियत बिगड़ने लगी। उसके बुखार के साथ सरदर्द होने लगा। यही नहीं उसे डायरिया भी हो गया। दो दिन के भीतर ही उसकी मौत हो गई। यह मौत दिसम्बर 2013 में हुई, इसके कुछ ही दिनों बाद उसकी तीन बहनें भी मौत का शिकार हो गई। आखिर में उसकी गर्भवती मां भी चल बसी। यह इबोेला से हाेने वाली मौतों की शुरुआत थी। इस रोग ने अब तक 5 हजार लोगोें को अपनी चपेट में ले लिया है। इस रोग ने हजारों मासूमों को अनाथ बना दिया है। हजारों लोग अभी भी मौत से जूझ रहे हैं। इस रोग की पहचान सर्वप्रथम सन् 1976 में इबोला नदी के पास स्थित एक गाँव में की गई थी।
जहां से इबोला की शुरुआत हुई, वह गांव गिनी के एकदम जंगली क्षेत्र है। इस क्षेत्र के आसपास पामोलीव की खेती होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में चमगादड़ों द्वारा इस रोग के वाइरस सबसे पहले मासूम एमिले तक पहुंचे। इस वाइरस ने इसके बाद तो हिलमिलकर रहने वाली बस्तियों पर हमला बोला। लोग लगातार मरने लगे। पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वैसे भी दस देश में स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी नहीं हैं कि लोगों के बीमार पड़ते ही उनका इलाज हो जाए। इबोला से होने वाली मौतों को पहले तो किसी ने नोटिस नहीं लिया। इसका इलाज भी किया गया, तो कोई अन्य रोग समझकर। मौतों के मामले उन क्षेत्रों में अधिक होते, जो गांव एकदम सुदूर क्षेत्रों में होते। इस देश की सीमा पर दो अन्य देश सीरिया लियोन और लाइबेरिया की सीमाएं हैं। धीरे से इबोला ने इन देशों में भी प्रवेश कर लिया। एक छोटे से गांव के एक मासूम को हुए इस रोग ने देखते ही देखते तीन देशों को अपनी चपेट में ले लिया। हजारों की जान लील ली। इसका सीधा असर अस्पताल के कर्मचारियों पर पड़ा। पहले तो इस रोग को कालरा या बुखार वाला रोग समझकर इलाज किया जाता रहा। उन्हें इस आभास तक न था कि यह काेई नया रोग है। इसे समझने तक पहली 15 मौतों में से चार तो केवल स्वास्थ्यकर्मी ही थे।
इबोला के फैलने के पीछे ग्रामीण इलाकों की परंपराएं अधिक दोषी हैं, क्योंकि सुदूर क्षेेत्रों में गांव के लोग कई तरह की परंपराओं का पालन करती हैं, जिसमें किसी की मौत के बाद शव को नहलाना, उसे चूमना आदि शामिल है। शव की अंतिम यात्रा में भी पूरा गांव शामिल होता, इससे इबोला का वाइरस तेजी से फैलता।
हवाई जहाजों ने पूरी दुनिया को बड़ी तेजी से जोड़ दिया है। लेकिन बेहतर हुई फ्लाइट कनेक्टिविटी के साथ बीमारियां भी ग्लोबल हो रही हैं। अब बीमारियां कुछ ही घंटों में हजारों किलोमीटर पहुंच जाती हैं। चमगादड़ या फ्रूट बैट में इबोला का वायरस होता है। कुछ पश्चिमी अफ्रीकी देशों में ये छोटा चमगादड़ खाया जाता है। पहले यह वायरस जानवर से इंसान में आता है और फिर इंसान से इंसान में फैलता है और वह भी तेजी से। फिलहाल इसके रुकने का कोई उपाय दिखाई नहीं देता। बीमारियां कैसे फैलती हैं, बर्लिन की हुमबोल्ट यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट डिर्क ब्रोकमन इसका जवाब नक्शे की मदद से खोज रहे हैं। ब्रोकमन के मुताबिक पहले बीमारियां आस पास के इलाकों में भी फैलती थी लेकिन अब हालात पूरी तरह अलग हैं, "आज लोग हवाई जहाजों के बड़े नेटवर्क की मदद से लंबी यात्रा करते हैं। जिस तरह बीमारियां आजकल फैल रही हैं, वैसा पहले नहीं हुआ।"मतलब साफ है कि लोगों के साथ रोगाणु भी सफर कर रहे हैं। हर साल दुनिया भर में साढ़े तीन अरब लोग हवाई अड्डों के जरिए यात्रा करते हैं। कोई भी जगह, भौगोलिक रूप से भले ही हजारों किलोमीटर दूर क्यों न हो, एयरलाइंस के कनेक्शन उसे बहुत तेजी और कारगर ढंग से करीब ला चुके हैं।
फैलाव का पूर्वानुमान
ब्रोकमन कहते हैं, "इसी के आधार पर हमने एक ऐसा मॉडल बनाया है जो बता सकता है कि कैसे एयर ट्रैफिक के चलते संक्रमण वाली बीमारियां दुनिया में फैल रही हैं। इससे पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है। जैसे, अगर आपको पता है कि बीमारी कहां पैदा हुई तो आप अनुमान लगा सकते हैं कि वह किसी नए इलाके में कब पहुंचेगी।"2009 में स्वाइन फ्लू की शुरुआत मेक्सिको में हुई। पूरी दुनिया में फ्लाइट कनेक्शन होने की वजह से साल भर के भीतर स्वाइन फ्लू करीब करीब पूरी दुनिया में फैल गया। ब्रोकमन ने अब इबोला के प्रसार का अनुमान लगाने के लिए एक मॉडल तैयार किया है। यह बताता है कि पश्चिम अफ्रीका से इबोला के बाहर फैलने की संभावना कितनी है। मॉडल के काम करने के तरीके को समझाते हुए जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं, "माना कि इबोला से संक्रमित 100 लोग विमान में सवार होते हैं, तो उनमें से एक जर्मनी आता है। यानी जोखिम को एक फीसदी है। फ्रांस में खतरे की संभावना यहां से दस गुना ज्यादा है।" इसकी वजह यह है कि गिनी से उड़ान भरने वाले ज्यादातर विमान पेरिस आते हैं, इसीलिए फ्रांस में जर्मनी से ज्यादा रिस्क है।
फिलहाल दूसरे देश भी शाेधकर्ताओं की मदद ले रहे हैं, वे जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें भी इबोला के लिए तैयार रहना चाहिए। ब्रोकमन कहते हैं, "मेरे पास कई लोगों के सवाल आ रहे हैं कि दक्षिण अफ्रीका में इबोला फैलने का खतरा कितना है, क्योंकि इबोला से वहां पर्यटन उद्योग ढह सकता है। लेकिन फिर पता चला कि दक्षिण अफ्रीका में फ्रांस की तुलना में इबोला का खतरा कम है। पहले तो हम बस अपनी सोच और अनुभव के आधार पर अनुमान लगा सकते थे, लेकिन अब हमारे पास इसके लिए आंकड़े हैं।" ब्रोकमन अपने मॉडल से यह भी पता लगा सकते हैं कि अगर प्रभावित इलाके से फ्लाइट संपर्क काट दिया जाए तो किस ढंग से बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।
एक तरफ बचाव है तो दूसरी तरफ इबोला की काट ढूंढने की कोशिशें जारी हैं। अफ्रीका से हर रोज इबोला के नए मामले सामने आ रहे हैं। दुनिया भर के लोग सोच रहे हैं कि आखिर इस मर्ज़ की दवा क्यों नहीं बनाई गई। वैज्ञानिक और रिसर्चर जर्मनी के साथ मिल कर एक नई तकनीक पर काम कर रहे हैं। एक ग्रीनहाउस में तंबाकू के हज़ारों पौधे उगाए रहे हैं। जीवविज्ञानी यूरी क्लेबा और उनके साथी तेजी से इन पौधों को उगाना चाहते हैं। उनका मानना है कि ये पौधे इबोला वायरस से लड़ने का राज़ खोल सकते हैं। यह एक जटिल तरीका है, जिसमें इन्हें एक विदेशी डीएनए से संक्रमित कराया जाता है। इससे वे दोबारा इस तरह प्रोग्राम हो जाते हैं कि वे सिर्फ एक प्रोटीन पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते। हम उसी प्रोटीन से दवा बनाना चाहते हैं।
मूल रूप से यूक्रेन के वैज्ञानिक क्लेबा पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के साथ मिल कर काम करते हैं। वे अफ्रीका के खबरों पर बारीकी से नजर रखते हैं। उनके प्रयोग पर अमेरिका की दो दवा कंपनियों ने अभी से संपर्क साध लिया है। वे इबोला की दवा तैयार कर रहे हैं। लेकिन इसके लिए काफी पैसों की जरूरत होगी। इस पौधे से तैयार प्रोटीन को पहले रिसर्च के लिए तैयार किया जाएगा। इसकी दवा को अब तक सिर्फ कुछ बीमार लोगों पर ही टेस्ट किया गया है। यूरी क्लेबा की टीम में तीस वैज्ञानिक हैं, कई सीधे पढ़ाई पूरी करके उनके साथ जुड़ गए हैं। 2004 से वे एक जटिल प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं, जो सिर्फ एक ही बीमारी से नहीं लड़ेगी। यह दवा उद्योग में कई चीजों और दूसरे उत्पादों के लिए उपयोग हो सकती है। इबोला उनमें से सिर्फ एक है। इसलिए यह टूल तैयार करना बहुत जरूरी है।
चुंबकीय इलाज से खून की सफाई 15।09।2014
वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण विकसित किया है जिसकी मदद से इबोला या कोई अन्य खतरनाक वारयस हो, बैक्टीरिया हो या दूसरे हानिकारक तत्व, इन्हें चुंबक के जरिए खून से निकाला जा सकेगा।
इबोला से खेल को खतरा
हिन्द महासागर के छोटे से देश सेशेल्स ने सियेरा लियोन की फुटबॉल टीम को देश में आने से मना कर दिया। सियेरा लियोन बुरी तरह इबोला से प्रभावित है। इसके बाद खेल पर इस बीमारी का असर दिखने लगा है। इबोला वायरस एक बार शरीर पर हमला कर दे, तो बचने की उम्मीद बहुत कम होती है। अफ्रीका में इलाज के दौरान संक्रमित हुए एक डॉक्टर की जर्मनी के अस्पताल में मौत हो गई।
इबोला से होने वाली मौतें:-
कुल       सीएरा लिओन   गिनी   नाइजीरिया
5689      1398               1260          8
डॉ. महेश परिमल

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नवभारत भोपाल के संपादकीय पेज पर 13 दिसम्बर 2014 को प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

सरकार नई पर आइडिए पुराने

डॉ. महेश परिमल
नई सरकार के शुरुआती हाव-भाव देखकर यही लग रहा था कि यह सरकार तेजी से काम करेगी, नई-नई योजनाएं लाएगी, सबको खुश करने का प्रयास करेगी। पर लगता है कि अब केंद्र की भाजपा सरकार के पास ऐसा कुछ भी नहीं बचा, जिसमें कुछ नयापन हो। अभी दस नवम्बर को सरकार ने जो उड्‌डयन नीित जाहिर की, उसमे कुछ भी नया नहीं है। सभी कुछ पुरानी कांग्रेस सरकार की नीतियां ही काम करती दिखाई दे रही है। यही हाल किसान विकास पत्र का भी है। पहले तो सरकार ने नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन की दुहाई दे रही थी। पर जब अपनी पर बन आई, तो पुरानी नीतियों को ही अपनाना शुरू कर दिया। सरकार ने भ्रष्टाचार हटाना चाहती है, इनोवेटिव आइडिया लाना चाहती है, परंतु पुरानी नीतियां ही यदि जारी रखेगी, तो फिर यूपीए सरकार ही क्या बुरी थी?
कालेधन पर सरकार फिसड्‌डी साबित हो ही रही है। जिन खातों का खुलासा किया गया था, उसके बाद उसमें से अधिकांश खातों में अब जीरो बेलेंस है। सरकार पुरानी बोतल में नई शराब बेचने की फिराक में है। KYC के बाद KYP आया।  KYC यानी ‘नो योर कस्टमर रिक्वायरमेंट’, और KYP यानी ‘किसान विकास पत्र’। केवायसी का सरकार काेई खास लाभ नहीं उठा पाई। दूसरी तरफ बैंकों द्वारा केवायसी के बहाने ग्राहकों को परेशान ही कर रहीं हैं। केवायसी के माध्यम से बैंक में धन जमा कराने वालों की सही जानकारी मिल जाने का अंदाजा था। अब सरकार का ध्यान केवीपी पर है। रिजर्व बैंक ने केवायसी के लिए जो नियम तैयार किए हैं, वे केवीपी पर भी लागू होंगे। सरकार का गणित यह है कि 2015-16 तक किसान विकास पत्र द्वारा 35 हजार करोड़ जमा किया जा सकता है। परंतु ये केवीपी के संबंध में जो सूचना घोषित की गई है, उससे यह स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति किसान विकास पत्र खरीदता है, वह केश या चेक से भी निवेश कर सकता है। यदि वह चेक से निवेश करता है, तो उसकी पहचान हो सकती है, पर यदि वह नगद राशि देकर निवेश करता है, तो उसकी पहचान मुश्किल हो जाएगी। कोई भी व्यक्ति सुरक्षित निवेश चाहता है, तो वह सरकार की राशि दोगुना करने वाली योजना को अधिक पसंद करता है। किसान विकास पत्र से राशि 8 साल में दोगुनी हो जाती है। दूसरी ओर सरकार की कुछ ऐसी ही योजनाएं उपलब्ध हैं। इसलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली जिसे इनोवेटीव स्कीम बता रहे हैं, उसमें ऐसा कुछ भी इनावेटीव नहीं है।
हाल के डाटा अनुसार लोगों ने सोने में अधिक निवेश किया है। सरकार इसके विकल्प के रूप में किसान विकास पत्र की योजना सामने लाई है। अक्टूबर 2014 में सोने का आयात 4 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। पिछले वर्ष इस महीने में वह मात्र एक अरब डॉलर था। सोने के भाव टूटते होने के बाद भी इसका आयात बढ़ा है। अक्टूबर 13 में जिस सोने का आयात 24 टन था, वह इस अक्टूबर में 120 टन तक पहुंच गया। इस दिशा में सरकार ने अभी सोने के आयात में अस्थायी रूप से घटाने के लिए टैक्स लगाया है। परंतु इसके कारण सोने की तस्करी बढ़ गई है। सरकार निवेशकों से इसके नए विकल्प मांग रही है, पर लोग इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। लगता है सरकार के पास इस दिशा में कोई नया आइडिया नहीं है। जैसे निवेशकों के लिए नए आइडिए नहीं हैं, वैसे ही उड्‌डयन नीति के लिए हुआ है। यूपीए सरकार के दौरान उड्‌डयन नीति की हालत बहुत ही खराब थी। इस कारण एयर इंडिया ठप्प हो गई। उधर विदेशी एयरलाइंस सारा मुनाफा खींच ले जाती। नई एनडीए सरकार चाहती तो नए नियमों को लाकर नई उड्‌डयन नीति बनाकर उड्‌डयन क्षेत्र को रन वे पर ला सकती थी। पर ऐसा नहीं हो पाया, अब नई सरकार ने भी उसे बिना बदले पिछली नीतियों को ही लागू कर दिया है, तो उससे देश की एयरलाइंस को घाटा होगा और विदेशी एयरलाइंस मुनाफे में रहेंगी।
िकसान विकास पत्र 1988 में पहली बार सबके सामने आए थे। लोकप्रिय योजना होने के बाद भी नवम्बर 2011 में वापस ले ली गई थी। इसकी सिफारिश श्यामलाल गोपीनाथ कमेटी ने की थी। 2009-2010 में उस योजना के तहत 21 लाख, 631 हजार, 16 करोड़ रुपए इकट्‌ठा किए गए थे। बाद में पता चला कि यह योजना कालेधन को छिपाने का अड्‌डा बन गई है, तो इस बंद कर दिया गया। यह बात तीन साल पुरानी है। तब 2010-11 था, अब 2014-15 है। इन वर्षों के दौरान केवायसी ने सख्त कानून बनाया है। दूसरी तरफ मध्यमवर्ग निवेश के लिए विश्वसनीय और सुरक्षित योजनाओं की खोज में हैं, सरकार ब्याज नहीं बढ़ा रही है। इसलिए निवेशकों को अधिक ब्याज देने वाली योजनाओं के रूप में निवेशक शेयर बाजार और सोने की खरीदी की ओर प्रेरित हो रहे हैं। इसमें धन का भविष्य अनिश्चित होता है। दूसरी ओर किसान विकास पत्र से राशि दोगुनी हो ही जाती है। सरकार ने किसान विकास पत्र बाहर लाकर कोई तोप नहीं मारी है। किसान विकास पत्र से काला धन बाहर आएगा, यह सोच भी शेखचिल्ली की सोच है। कालाधन जमा करने वाले सोने और शेयर बाजार अधिक पसंद करते हैं। किसान विकास पत्र में तो फिक्स डिपाजिट से भी कम ब्याज मिल रहा है, अरुण जेटली जिसे इनोवेटीव आइडिया कह रहे हैं, वह वास्तव में महाबोगस योजना है।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि सरकार शोर ही अधिक कर रही है, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। उसके पास नई सोच नहीं है, जिसका प्रचार वह करती रही है। पुरानी सोच के सहारे देश तो पहले ही चल रहा था। लोगों ने भाजपा सरकार से जो उम्मीद जताई थी, उसे पूरा करने में वह विफल साबित हुई है। लोगों को एक बार तो भरमाया जा सकता है, पर बार-बार नहीं।
‎                डॉ. महेश परिमल

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