सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

युवाओं को भ्रमित करती छुट्टियाँ


यह दौर है परीक्षाओं का, परीक्षा याने साल भर छात्रों ने जो कुछ पढ़ा, उसका मूल्यांकन. अब यह शोध का विषय है कि मात्र तीन घंटे में छात्र अपनी प्रतिभा किस तरह से प्रदर्शित कर सकता है? परीक्षा के इस महायज्ञ के बाद दो माह की लम्बी छुट्टियों का दौर शुरू हो जाएगा. बच्चों के लिए यह खुशियों का मौसम है, पर इन दो-ढाई महीनों में छात्र खाली रहकर क्या-क्या नहीं करते, इसका अंदाजा मध्यमवर्गीय परिवार बखूबी जानता है.
उच्च वर्ग के बच्चों के लिए यह छुट्टियाँ एक वरदान हैं, क्योंकि इन दिनों के लिए सात समुंदर पार जाने के लिए योजना काफी पहले बन जाती है. निम्नवर्गीय बच्चे अपने माता-पिता के व्यवसाय में हाथ बँटाते दिख जाते हैं. दिक्कत मध्यमवर्गियों की है. वे क्या करें, कहाँ जाएँ? सबसे अधिक भ्रमित होते हैं युवा होते किशोर. पचास साल हो गए हमारी आजादी को. एक युवा प्रधानमंत्री हमने देखा, जिसने देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना अपनी ऑंखों में पाला था. वह सपना यौवन के द्वार तक पहुँचते-पहुँचते उसके साथ ही काल के गाल में समा गया. उसके बाद तो कई युवा नेता आए और गए, पर देश के युवाओं के लिए ऐसा कोई ठोस कार्य नहीं किया, जिसे उपलब्धि माना जाए.
दो-ढाई महीने कम नहीं होते, पर भीषण गर्मी को झेलते युवा किशोर यह समय ऐसे ही गुंजार देते हैं. ऐसी कोई युवा नीति नहीं बनी, जो इन्हें कोई रौशनी दे सके. इसके अभाव में घर पर रहकर ही आकाशीय मार्ग से आने वाली अपसंस्कृति अनजाने में ही उसके भीतर घर कर जाती है. उसी का परिणाम है कि आज अपराधों में ये युवा ही बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. चाहे वह राजस्थान में परचे लूटने का अपराध हो या फिर दिल्ली में डकैती-हत्या का अपराध. इन सबमें इन युवाओं की भागीदारी होने लगी है.

मुझे याद आ रहा है चीन के प्रसिद्ध विचारक माओ त्से तुंग ने अपने कार्यकाल में देश के सभी युवा इंजीनियर, डॉक्टर, वकील एवं छात्रों को एक वर्ष के लिए सुदूर गाँवों में भेजना अनिवार्य कर दिया था, तब इसकी खूब तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. लोगों ने उन्हें क्या-क्या नहीं कहा. पर कुछ वर्षों बाद इसके परिणाम जब सामने आए तो सभी हतप्रभ रह गए. उन शिक्षितों का एक वर्ष गाँव में रहने से यह साबित हुआ कि ग्रामीण भी शिक्षित होने का महत्व समझने लगे. गाँवों-गाँवों में शिक्षा की लहर चल पड़ी. उसी का परिणाम है कि विश्व की सबसे अधिक आबादी वाला देश होकर भी उसने वैचारिक स्तर पर जो क्रांति की है, वह कम आबादी वाले देश जापान से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं है.
विदेशों में ग्रीष्मकालीन अवकाशों का समुचित सदुपयोग करने के लिए ढेर सारी स्वयंसेवी संस्थाएँ आगे आकर एक-से-एक कार्य करती हैं. हमारे देश में ऐसी संस्थाएँ कम नहीं हैं, पर अधिकांश राजनीति-प्रेरित एवं स्वार्थ-प्रेरित हैं. अब इनकी भूमिका ऐसी नहीं रही कि दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी को कुछ अच्छा करने का संकेत दे. यही वजह है कि जल्द से जल्द बेशुमार दौलत इकट्ठा करने की धुन सवार हो गई है. इन युवाओं में हर कोई 'शार्टकट' के रास्ते तेजी से आगे बढ़ना चाहता है. उनकी इस धुन को हमारे राजनेता ही बढ़ाते हैं और अपनी वैभवशीलता के माध्यम से उन्हें ऐसा सुहावना सपना दे देते हैं कि वे एक मायावी दुनिया में रहना शुरू कर देते हैं. कुछ समय बाद इसे भी युवा बखूबी जानने-समझने लग जाते हैं कि ये मायावी दुनिया हमें उस अंधेरी खोह में ले जाएगी, जहाँ से वापसी संभव नहीं है. फिर भी वे इस मोह को छोड़ नहीं पाते हैं और जकड़ते ही चले जाते हैं दुराग्रह के बंधन में.
हमारे देश के इतने सारे कथित रूप से युवा नेता यदि 50 वर्षों में छुट्टियों के सदुपयोग के लिए कोई कारगर नीति विकसित नहीं कर पाए हैं तो इसे उन्हें काहिल कहने में संकोच नहीं होना चाहिए. हमारे देश के युवा तो काहिल कदापि नहीं हैं, पर उन्हें छुट्टी में ऐसी दवाएँ पिला दी गई हैं कि वे चकाचौंध से अधिक प्रभावित होकर अपनी सोच को सीमित कर रहे हैं. हमें चाहिए कि देश को यदि वास्तव में आगे बढ़ाने का सद्विचार हमारे राजनेता रखते हैं तो स्वार्थ एवं खरीद-फरोख्त की राजनीति से ऊपर उठकर कुछ क्षण देश को दें. युवा प्रतिभा का दुरुपयोग न करें. अन्यथा डॉ. हरगोविंद दास खुराना, अमर्त्य सेन, सी.वी. रमण जैसी बहुत-सी प्रतिभाएँ हैं, जिन्हें हमने पहले नहीं बहुत बाद में पहचाना है. पहचान पहले होती तो यह बेहतर होता. दूसरे देश हमारी प्रतिभा को पहचानें और सम्मानित करें तो यह हमारी कमजोरी है. केवल यह दूर हो जाए तो शायद एक हल्की-सी जुंबिश हो इस सोए हुए समाज में.
डॉ. महेश परिमल

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