सोमवार, 1 जून 2009

कुनबापरस्त करोड़पति सांसदों की संसद


डॉ. महेश परिमल
हमें गर्व होना चाहिए कि अब हमारी संसद करोड़पतियों की संसद हो गई है। वैसे भी सांसद बनने के बाद आम आदमी का यह प्रतिनिधि करोड़पति तो ही ही जाता है। पर अब तो घोषित रूप से ऐसे सांसद हमारी संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनकी कुल सम्पत्ति करोड़ों में है। ये सभी करोड़पति मिलकर देश के नागरिकों के भविष्य का फैसला करेंगे। इससे आसानी से समझा जा सकता है, भविष्य में हमारी संसद से किस तरह के विधेयक पारित होंगे। इसके अलावा इस बार संसद में कुनबापरस्ती खासतौर पर देखी जा रही है। इस तरह से परिवारवाद का सैलाब इसके पहले कभी देखा नहीं गया।
भारतीय लोकतंत्र एक महान परिवर्तन से गुजर रहा है। यही स्थिति रही,तो दो-तीन दशकों में इस देश में मात्र तीन-चार सौ परिवारों का ही आधिपत्य हो जाएगा। हाल ही में हुए चुनाव में चुने गए प्रत्याशियों में 130 ऐसे हैं, जिन्हें राजनीति का ककहरा विरासत में पढऩे को मिला है। सूची तो बहुत ही लंबी है, पर कुछ का तो जिक्र किया ही जा सकता है। राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट, उनके ससुर फारुख अब्दुल्ला, सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त, स्व. माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया, तमिलनाड़ु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के पुत्र एम.के. अजागिरी, पुत्री कानीमोजही, भतीजे दयानिधि मारन, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के पुत्र नीलेश राणे, पं. बंगाल के कांगे्रसी नेता स्व. गनीखान चौधरी के भतीजे मासूम नूर, लक्षद्वीप के स्वर्गीय सांसद पी.एम.सईद के पुत्र हमिदुल्ला सैयद, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मेनका गांधी, वरुण गांधी, शरद पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया सुले, मुलायम सिंह एवं उनके पुत्र, मुरली देवड़ा के साथ उनके पुत्र आदि। परिवार के एक सदस्य का दामन थामकर चलने वालों की पूरी फौज ही तैयार हो रही है। इसके बाद तो यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि यह लोकशाही है। इसे तो सामंतशाही कहना ही उचित होगा।
इस 15वीं लोकसभा में 300 करोड़पति सांसदों में कई ऐसे हैं, जिनकी सम्पत्ति 100 करोड़ से भी ऊपर है। उदाहरण के लिए आंध्रप्रदेश के नागेश्वरराव (टीडीपी) के पास 173 करोड़ की सम्पत्ति है। हरियाणा के कांगे्रसी सांसद नवीन जिंदल के पास 127 करोड़, आंध्र के कांगे्रसी सांसद राजगोपाल के पास 122 करोड़, शरद पवार की राकांपा के सांसद पदमसिंह पाटिल के पास 104 करोड़, प्रफुल्ल पटेल के पास 89 करोड़ की संपत्ति है। आश्चर्य इस बात का है कि जिन सांसदों ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी जीत दर्ज की थी, उन्हीं सांसदों की सम्पत्ति में बेशुमार इजाफा हुआ है। इस बार सबसे अधिक करोड़पति सांसद कांगे्रस के ही हैं, इनकी संख्या 137 है। भाजपा सांसदों की संख्या 58, समाजवादी पार्टी के 14, बसपा के 13 सांसद करोड़पति हैं। इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस व्यक्ति को वरुण गांधी ने हराया, वे ही वी.एम. सिंह, यदि ये चुनाव नहीं हारे होते, तो सांसदों में सबसे अधिक करोड़पति होते। इनकी कुल संपत्ति 632.15 करोड़ रुपए की है।
इस तरह से कुल 300 करोड़पति सांसद एक विकासशील देश के आम आदमी के भविष्य का फैसला करने के लिए एक इबारत लिखने जा रहे हैं। वैसे भी यह सच है कि इस लोकतंत्र में एक आम आदमी कभी चुनाव नहीं लड़ सकता। परचे भरे जाने से लेकर प्रचार-प्रसार, चाय-नाश्ते, मतदाताओं को रिझाने के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। आजकल के चुनाव तो बस दौलत बहाने का एक खेल ही है। जितनी तेजी से बहाओ, उतनी ही तेजी से बटोरो। क्या ये करोड़पति सांसद देश की गरीबी को दूर कर पाएँगे? जिन्हें इतिहास की थोड़ी सी भी समझ है, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि एक बार डॉ. राम मनोहर लोहिया ने सत्ता से प्राप्त संपत्ति का विरोध किया था। पर अब इसे सभी ने स्वीकार कर लिया है कि सत्ता द्वारा धन की प्राप्ति स्वाभाविक है। जिस देश का चुनाव आयोग ही बेबस हो, उस देश के बारे में आखिर क्या कहा जाए?
पहले संसद में हिस्ट्रीशीटर पहुँचते थे, अब धनिक वर्ग पहुँचने लगा है। पहले भी आम आदमी से बिलकुल अनजान थे, आज भी इनकी नजरों में आम आदमी हाशिए पर है। जिस देश में किसी पार्टी का टिकट लेने में ही धांधली होती हो, खुले आम टिकट बेची जा रही हो, उससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि चुनाव में किस तरह से काले धन का फन फैला हुआ है। कम से कम धन से चुनाव जीतना इस देश में एक सपना ही हो गया है। जो किसी गरीब को तो नहीं आ सकता। संसद पहुँचकर देश की सेवा करना अब किसी का लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य होता तो मलाईदार मंत्रालय की बात ही नहीं आती। जिस तरह से रेल्वे मंत्रालय ममता बनर्जी ने लिया, उसी से यह अंदाज लग जाना चाहिए कि आखिर ये मलाईदार मंत्रालय से उनका क्या लाभ है? यदि जनता की सेवा ही करनी है, तो वह किसी भी मंत्रालय में रहकर की जा सकती है।
सांसद बनने से कानून द्वारा भी इन्हें कई तरह की रियायत मिल जाती है। कई बार इन्हीं रियायतों का ये सांसद गलत उपयोग भी कर लेते हैं। करोड़पति सांसदों द्वारा निश्चित रूप से उनके व्यापार की प्रगति करने वाले विधेयकों को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके व्यापार बढ़ेंगे और आम आदमी और अधिक लाचार होता जाएगा। अगर इस दिशा में शुरू से ही अंकुश न रखा गया, तो संभव है देश में आँकड़ों की खेती शुरू हो जाए। महँगाई अभी भी बेकाबू है,उस पर कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा है कि वह अमीरों, व्यवसायियों की सरकार है। उसके राज में गरीब और अधिक गरीब होता है, तो इस बार जब मतदाताओं ने उन पर विश्वास किया है, तो विश्वास पर खरा उतरने की उसकी जिम्मेदारी बनती है। अप्रत्याशित रूप से मिली सत्ता करोड़पतियों के हाथों की कठपुतली न बन जाए, यही विश्वास किया जा सकता है।
डॉ. महेश परिमल

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