साथियो,
नकली दवाए लगातार हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहीं है, पर हम विवश है। आज तक हमारे देश में किसी भी नकली दवा के निर्माता को बहुत बड़ी सजा नहीं हुई है, इसी से पता चलता है कि सरकार दवा माफिया से किस तरह से खौफ खाती है। इनके लिए सरकार का रवैया हमेशा नरम रहा है। मौत तो गरीबों की होती है। आज तक नकली दवा से किसी अधिकारी या मंत्री की संतान की मौत नहीं हुई। आखिर ऐसा क्यों।
नकली दवाओं के इस्तेमाल से न सिर्फ कई तरह के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, बल्कि यह जानलेवा भी साबित हो सकती हैं, क्योंकि इस तरह की कुछ दवाओं में बीमारी से लड़ने वाले तत्वों की जगह पर खतरनाक पाउडर डले होते हैं तो कुछ दवाएं एक्सपायर्ड होती हैं।
- पुष्पांजलि क्रॉसले हॉस्पिटल के अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं कि सबसे पहले तो इन दवाओं से मरीज को कोई फायदा नहीं होता है, क्योंकि इनमें वे चीजें ही नहीं होतीं, जो बीमारी का इलाज करें। ऐसे में इमर्जन्सी में दवा देने के बावजूद मरीज की मौत हो सकती है।
- दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि सही तत्वों की जगह पर इन दवाओं में दूसरे मेटल या मिट्टी जैसे तत्व मिलाए जाते हैं, जिनका स्किन, पेट, किडनी, लीवर आदि पर गलत रिएक्शन होता है। कई बार एनाफायलेक्सिस (अचानक गंभीर रिएक्शन) से मरीज की मौत भी हो सकती है।
- इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) के प्रवक्ता डॉ. नरेंद्र सैनी कहते हैं कि कई नकली दवाओं में जरूरी तत्व सही मात्रा में नहीं होते हैं, खासतौर से एंटीबायटिक्स में। ऐसे में फायदा तो पूरा होता नहीं है, आगे चलकर शरीर में इनका रेजिस्टेंस भी डिवेलप हो जाता है, जिससे दवा असर नहीं करती।
- नकली दवाओं के सौदागर कई बार एक्पायर्ड दवाएं बेचते हैं, जिनमें से कुछ का असर खत्म हो चुका होता है तो कुछ में टॉक्सिक सब्स्टेंस डिवेलप हो चुका होता है। इसकी वजह से मरीज की मौत भी हो सकती है। इनकी वजह से इलाज के बावजूद मरीज ठीक नहीं होते और डॉक्टर की काबिलियत पर उंगली उठाई जाती है।
- आईएमए का कहना है कि समस्या की मुख्य वजह ड्रग कंट्रोल डिपार्टमंट का ऐक्टिव न होना है। अगर समय-समय पर छापे मार कर दवाओं की जांच की जाती और नकली कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होती तो ऐसा नहीं हो पाता।
बाजारों से जल्द हटेगी मर्ज बनी मलेरिया की दवा
सरकार ने देश भर से मलेरिया की दवाई आरटेमाइसीनिन हटाने का फैसला किया है, जिस पर दुनिया भर में पहली ही पाबंदी
लगाई जा चुकी है। कई ब्रांड के तहत देश में बेची जाने वाली यह दवा अगर सिंगल ड्रग के तौर पर इस्तेमाल होती है, तो यह मलेरिया के जीवाणुओं को प्रतिरोधी बना देती है। यह कदम विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की बाजार से इस दवा की मोनो-थेरेपी वापस लेने की सिफारिश जारी करने के दो साल बाद उठाया गया है, जबकि इसे दूसरी प्रभावशाली मलेरिया विरोधी दवाओं के साथ संयोजन के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है।
देश की शीर्ष दवा नियामक संस्था ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने हाल में सभी प्रदेश दवा नियामकों को जुलाई 2009 तक आरटेमाइसीनिन की सभी ओरल सिंगल ड्रग फॉर्मूलेशन और उसके डेरिवेटिव को हटाने के निर्देश दिए थे।
डीसीजीआई डॉ. सुरिंदर सिंह ने कहा, 'इस दवा को अब नया ड्रग नहीं माना जाता, इसलिए कंपनियां प्रदेश दवा नियामकों से दवा बनाने और बेचने के लिए लाइसेंस हासिल कर लेती हैं। इसलिए हमने सभी प्रदेश दवा नियामकों को निर्देश जारी किए हैं कि इस दवा के लिए नए लाइसेंस जारी न किए जाएं। साथ ही पहले बांटे गए लाइसेंस भी वापस ले लिए जाएं।'
डब्ल्यूएचओ ने जोर दिया था कि आरटेमाइसीनिन को किसी दूसरी मलेरिया रोधी दवा के साथ मिलाकर दिया जाना चाहिए, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता और इसे मोनोथेरेपी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है तो यह दवा जल्द ही मलेरिया के जीवाणुओं में प्रतिरोधी क्षमता पैदा कर देती है। मलेरिया रोधी दवा आरटेमाइसीनिन और उसके डेरिवेटिव आरटेसुनेट तथा आरटेमेथर को पहले देश में इंजेक्टेबल और टेबलेट, दोनों तरह से उत्पादन और बिक्री की इजाजत दी गई थी।
आईपीसीए लैबोरेट्रीज, जायडस कैडिला, पिरामल हेल्थकेयर और इंडस्विफ्ट जैसी फार्मास्युटिकल कंपनियों ने लारिथेर, पालुथेर, मालीथेर और मालथेर जैसे अपने लोकप्रिय ब्रांड के तहत आरटेमाइसीनिन दवा बेचती आई हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर कंपनियों का दावा है कि उन्होंने डब्ल्यूएचओ की सिफारिश के बाद पहले ही एकल इंग्रीडिएंट के तौर पर यह दवा बनानी बंद कर दी गई है। केमिस्ट और फार्मासिस्ट के मुताबिक इनमें से ज्यादातर कंपनियों ने दूसरी मलेरिया रोधी दवा के साथ आरटेमाइसीनिन लॉन्च की थी, जबकि इनमें से कुछ ब्रांड अब भी बाजार में बने हुए हैं।
मेडिकल विशेषज्ञ सी एम गुलाटी ने कहा, 'जब तक आधिकारिक पाबंदी की घोषणा नहीं की जाती और रेगुलेटर मार्केटिंग लाइसेंस जारी करना नहीं रोकते, तब तक कंपनियां दवाएं बेच सकती हैं। एकल इंग्रीडिएंट के तौर पर इस दवा को इस्तेमाल करने से मरीजों को गंभीर नुकसान हो सकता है। भारतीय दवा नियामक को इस दवा पर काफी पहले पाबंदी लगा देनी चाहिए थी।'
मलेरिया सदियों से भारत की समस्या रही है। साठ के दशक में यह बीमारी लगभग पूरी तरह खत्म हो गई थी, लेकिन मेडिकल जानकारों का कहना है कि यह दोबारा सिर उठा रही है। भारत ने 1977 से 1997 के बीच स्वास्थ्य बजट का 25 फीसदी हिस्सा मलेरिया पर खर्च किया था और 1997 से देश ने मलेरिया की रोकथाम के लिए 4 करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना बनाई है।
सोमवार, 17 अगस्त 2009
जानलेवा हो सकती हैं नकली दवाएं
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
कैसी आजादी, काहे की आजादी?

डॉ. महेश परिमल
आंजादी.... आंजादी.... और आंजादी, पिछले साठ वर्षों से यह सुनते आ रहे हैं, पर आज भी हम यदि इस आंजादी को ढूँढ़ने निकल जाएँ, तो वह कुछ हाथों में छटपटाती नजर आएगी। आंजादी कैद हो गई है, कुछ मजबूत हाथों में, वे हाथ जो खून से रँगे हैं, वे हाथ जो कानून को अपने हाथ में लेते हैं, वे हाथ जो पाँच वर्ष में आम लोगों के सामने एक बार जुड़ते हैं,। इन हाथों में छटपटाती आंजादी की सिसकियाँ किसने सुनी?सन् 1857 के पहले भी आंजादी का शंखनाद हुआ था। उसमें था आंजादी पाने का जोश, भारत माँ को जंजीरों की जकड़न से दूर करने का उत्साह। बच्चा-बच्चा एक ंजुनून की गिरफ्त में था। सभी चाहते थे – आंजादी। वह आंजादी केवल विचारों की नहीं, बल्कि इंसान को इंसान से जोड़ने वाली आंजादी की कल्पना थी, जिसमें बिना भेदभाव, वैमनस्यता के एक-दूसरे के दिलों में बेखौफ रहने की कल्पना थी।अनवरत् संघर्षो, लाखों कुर्बानियों एवं असंख्य अनाम लोगों के सहयोग से हमें रक्तरंजित आंजादी मिली, भीतर कहीं फाँस अटक गई, विभाजन की। एक सपना टूट गया- साथ रहने का। वह सपना कालांतर में एक ऐसा नासूर बन गया, जो रिस रहा है। असह्य वेदना को साकार करता शरीर का वही भाग आज आक्रामक हो चला है।हमें आंजादी मिली तो सही, पर हम उसे संभाल नहीं पाए, आंजादी मिलने की खुशी में हम भूल गए कि यह धरोहर है, हमारे पूर्वजों के पराक्रम की, इसे संभालकर रखना हमारा कर्त्तव्य है। इसे सहेज कर रखने से ही प्रजातंत्र जिंदा रह पाएगा। आज प्रजातंत्र जिंदा तो है, पर उसकी हालत मरे से भी गई बीती है। हमें चाहिए था, एक ऐसा प्रजातंत्र जो साँस लेता हुआ हो, जिसकी धमनियों में शहीदों का खून दौड़ता हो, पर हमने अपने हाथों से अपनी आंजादी खो दी। वह भी आंजादी मिलने के तुरंत बाद ही।इस आंजादी को पाने के लिए कई अनाम शहीदों ने भगीरथ प्रयास किए। आज बदलते जीवन मूल्यों के साथ वही आंजादी की गंगा कुछ लोगों की सात पीढ़ियों को तारने का काम कर रही है। पीढ़ियों को उपकृत करने वाली आंजादी की कल्पना तो हमने नहीं की थी। पूरे 60 बरसों से आंजादी का भोंपू हम सुन रहे हैं, पर इन वर्षो में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर और अमीर । हाँ विकास के नाम पर देश इतना आगे बढ़ गया है कि हर हाथ को काम मिलने लगा है। हर गाँव रोशनी से जगमगा रहा है, प्रत्येक गाँव में सड़कें हैं, कोई भी बेरोजगार नहीं है, एक-एक बच्चा शिक्षित हो रहा है, यह सब हो रहा है, सिर्फ ऑंकडाें के रूप में, मोटी-मोटी फाइलों में।सच्चाई के धरातल पर देखें तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे उपलव्धि कहा जाए। रिक्शा चालक सुखरू या समारू के बेटे भी या तो रिक्शा चला रहे हैं या मंजदूरी कर रहे हैं। अलबत्ता उस वक्त एक ट्रक का मालिक आज कई ट्रकों के मालिक बनकर करोड़ों से खेल रहा है। महज एक रोटी का जीवंत प्रश्न सुलझाया नहीं जा सका है, पिछले 62 वर्षों में। रोटी की बात छोड़ भी दें, तो आज हम साफ पानी के भी मोहताज हैं।सामाजिक परिवेश में जीवनमूल्य बदल रहे हैं। भ्रष्टाचार शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। बलात्कारी सम्मानित हो रहे हैं। घूसखोरों की हवेलियाँ बन रही है। बहुओं को जला कर वर्ष भर होली मनाने वाले नारी उत्पीड़न विरोधी समिति या नारी उत्थान संघ के संचालक बने बैठे हैं। कानून को हाथ में लेने वाले अपराधी सफेदपोशों के अनुचर हैं। इन सबके अलावा कलमकार के हाथों को खरीदने की भी प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए सच हमेशा झूठ का नकाब लगाकर सामने आ रहा है।आंजादी अब खेतों-खलिहानों में नहीं बल्कि कांक्रीट के जंगलों में सफेदपोशों के हाथों में या फिर ए। के। 56 या ए. के. 47 वाले हाथों में पहुँच गई है। आंजादी को इस कैद से हमें ही छुड़ाना है। इसके लिए हमेें आंजादी की सही पीड़ा को समझना पड़ेगा। त्रासदी भोगती इस आंजादी को खेतों, खलिहानों, खेल के मैदानों, शालाओं, महाविद्यालयों में पहुँचाने का संकल्प लेना होगा, ताकि सही हाथों में पहँचकर आंजादी ‘हाथों के दिन’ की उक्ति को चरितार्थ कर सके। ताकि हम सगर्व कह सकें, आ गए हाथों के दिन.... .... ।
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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गुरुवार, 13 अगस्त 2009
बंटी का संकल्प

भारती परिमल
स्कूल का नया सत्र शुरू हो रहा था। आज स्कूल का पहला दिन था। सभी बच्चे खुशी-खुशी स्कूल जा रहे हैं। बंटी भी सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो गया और गुनगुनाता हुआ स्कूल बस में जा बैठा। बस में वही जाने-पहचाने चेहरे फिर से दिखाई दिए, जो स्कूल में उसके साथ होते थे। सभी अपने दोस्तों से मिलकर बहुत खुश थे और एक-दूसरे को अपने-अपने छुट्टियों के अनुभव सुना रहे थे।
थोड़ी देर पहले खुश हो कर अपनी सीट पर बैठने वाला बंटी एकाएक दु:खी हो गया। वह उन चेहरों में नीरज का चेहरा तलाशने लगा जो कि वहाँ नहीं था, क्योंकि उसने दूसरी स्कूल में एडमिशन ले लिया था। आज उसे नीरज की कमी खल रही थी। बंटी और नीरज दोनों ही बहुत अच्छे दोस्त थे। यूं तो स्वभाव दोनों के अलग थे- एक एकदम शरारती, तो दूसरा एकदम सीधा-सादा। उसके बाद भी दोनों दोस्त थे, यही एक आश्चर्य था। मगर एक की शरारत दूसरे के लिए भारी पड़ी और उसे स्कूल ही छोडऩा पड़ा। हाँ, बंटी की शरारत के ही कारण नीरज को स्कूल से निकाला गया था। इसीलिए आज बंटी जो घर से निकलते समय खुश था, वह बस में बैठते ही पिछले दो महीने पहले की घटना याद कर बिल्कुल उदास हो गया।
उसे याद आ गई दो महीने पहले की वह शरारत, जिसने उससे उसका प्यारा दोस्त छीन लिया था। परीक्षा का आखिरी दिन था। नौवीं कक्षा का सबसे कठिन पेपर था। वैसे कठिन उन लोगों के लिए, जिन्होंने अच्छी तरह पढ़ाई नहीं की थी। ऐसे छात्रों में बंटी भी शामिल था। इसलिए वह भी नकल करने के नए उपाय सोच रहा था।
जहाँ बंटी नकल करने के उपाय सोच रहा था, वहीं नीरज एकांत में बैठा पेपर शुरू होने से पहले रिवीेजन कर रहा था। बंटी ने जब उसे पढ़ते हुए देखा तो सोचने लगा कि काश मैंने भी साल भर शरारत न करके पढ़ाई पर ध्यान दिया होता तो आज मुझे परीक्षा का डर न होता।
तभी परीक्षा शुरू होने की घंटी बजी और वे सभी लोग जो कॉपी-किताबें खोल कर रिवीजन कर रहे थे, उन सभी ने जल्दी-जल्दी अपनी किताबें बंद की और उन्हें बैग में रख कर अपने लॉकर में रखने को भागे। नीरज ने बैग लॉकर में रख तो दिया, पर उससे एक गलती हो गई-लॉकर बंद करते वक्त लॉकर की चाबी वहीं छूट गई। नीरज इस बात से बेखबर परीक्षा हॉल की तरफ चल पड़ा।
बंटी भी परीक्षा हॉल की तरफ बढ़ रहा था कि उसकी निगाह लॉकर की तरफ गई। उसने देखा कि उन लॉकर्स में से एक लॉकर की चाबी उसी में फँसी हुई है। शायद कोई जल्दबाजी में यह गलती कर गया है। किसी की जल्दबाजी बंटी के लिए सुनहरा अवसर साबित हुई। उसे नहीं मालूम था कि यह नीरज का लॉकर है। उसे तो बस उसके अंदर रखी किताब से मतलब था। उसने जल्दी से लॉकर खोलकर किताब निकाली, शर्ट के अंदर रखी और तेजी से हॉल के अंदर जाकर अपनी सीट पर बैठ गया।
प्रश्न-पत्र हल करते समय उसने अवसर का फायदा उठाते हुए इस किताब की मदद से एक-दो प्रश्न भी हल किए। जब उसे किताब की जरूरत न रही, तो उसने उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया। बस यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी या यँू कहिए कि नीरज की बदकिस्मती। जो किताब बंटी ने खिड़की से बाहर फेंकी थी, वह सीधे प्रिंसीपल मैडम के पैरों के सामने गिरी। वह उसी समय राउंड पर निकली थी। उन्होंने किताब उठाई और अंदर नाम पढ़कर हैरान रह गई। वे तेजी से हॉल में आई और मैडम को किताब थमाते हुए बोलीं कि यह किताब जिस छात्र की है, उसे तुरंत मेरे रूम में भेजिए।
बंटी किताब देखते ही उसे पहचान गया। वह मन ही मन खुश हो रहा था कि चलो मेरा नाम तो नहीं आएगा, क्योंकि यह किताब न तो मेरे पास से मिली है और न ही इस पर मेरा नाम लिखा है। इसलिए मैं तो बच गया। काश कि बंटी को पता होता कि उस किताब में किसका नाम लिखा हुआ है। उसने जल्दबाजी में यह तो देखा ही नहीं था। इस जल्दबाजी का दु:खद परिणाम तब नजर आया जब मैडम ने नीरज को प्रिंसीपल मैडम के रूम में जाने को कहा। बंटी अवाक रह गया, पर वह कुछ नहीं कर सकता था।
प्रिंसीपल मैडम ने नीरज को नकल करने के लिए खूब डाँटा। वह उनके सामने रोया, गिड़गिड़ाया और य$कीन दिलाने की कोशिश की कि मैंने नकल नहीं की है, लेकिन मैडम पर उसकी बातों का कोई असर न हुआ। उन्होंने उसका उस दिन का पेपर निरस्त कर दिया।
नीरज को इस बात का इतना दु:ख हुआ कि उसने वह स्कूल ही छोड़ दिया। बंटी नकल करके पास तो हो गया, पर उसे यह सफलता काफी खल रही थी, क्योंकि उसी की गलत हरकत के कारण नीरज होशियार होने के बाद भी न केवल फेल हो गया, बल्कि उसने तो वह स्कूल ही छोड़ दिया। उसने अपनी इस गलती का प्रायश्चित करने का विचार किया।
बस में बैठे-बैठे वह उन दिनों की याद करने लगा, जब दोनों रोज शाम को साथ-साथ होते, मस्ती करते। उसे याद आ रहा था कि किस तरह उसे नीरज सदैव कहा करता- बंटी तुम अब पढïऩा-लिखना शुरू कर दो, नहीं तो हो सकता है, इस नकल के चक्कर में तुम तो भले ही पास हो जाओ, पर कोई दूसरा तुम्हारी गलती के कारण परेशानी में पड़ जाएगा। अचानक तेज झटके के साथ बस रुकी, बस उसके स्कूल के सामने खड़ी थी। उसने बेग उठाया और स्कूल की ओर चल पड़ा।
स्कूल बस से उतर कर जब उसने स्कूल के मैदान में कदम रखा तो सबसे पहले उसने यह संकल्प लिया कि अब वह कभी ऐसी कोई शरारत नहीं करेगा कि जिसके लिए उसे बाद में पछताना पड़े। वह अब हमेशा अपने दोस्तों की सहायता करेगा और एक अच्छा आज्ञाकारी छात्र बनेगा। यही उसका प्रायश्चित होगा। इसी संकल्प के साथ उसने कक्षा में प्रवेश किया।
भारती परिमल
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बच्चों का कोना
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बुधवार, 12 अगस्त 2009
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में समानता

नीरज नैयर
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में एक समानता है, वो ये कि तीनों को ही राष्ट्रीयता से जोड़ा गया है, जैसे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है, हिंदी को राष्ट्रभाषा और हॉकी को राष्ट्रीय खेल का. पर गौर करने वाली बात ये है कि बावजूद इसके तीनों को ही वो सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है जिसके वो हकदार हैं. महात्मा गांधी ने मुल्क को आजादी दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया, उसे दोहराने की शायद जरूरत नहीं. उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में जाना जाता है जिसने शस्त्र उठाए बिना ही दुश्मन को मैदान छोडऩे पर मजबूर कर दिया. उनके अहिंसक प्रयासों को भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में सराहा जाता है. हालांकि ये बात सही है कि उनके विचारों और सिद्धातों से कुछ लोग हमेशा असहमत रहे मगर बापू के समर्थन में खड़े होने वाली हजारों की भीड़ ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी. पर आज उनके लिए मन में श्रद्धा का भाव रखने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता है. सरकार को भी उनकी याद महज दो अक्टूबर को ही आती है. इसी दिन पार्कों, चौराहों पर धूंल फांक रहीं बापू की प्रतिमाओं को नहलाया-धुलाया जाता है, माल्यार्पण किया जाता है और फिर साल भर के लिए ऐसे ही छोड़ दिया जाता है. देश के राजनीतिज्ञ महात्मा गांधी को नाटकबाज कहकर संबोधित करते हैं. क्या यह आचरण किसी महापुरुष को दिए गये सम्मान का परिचायक है. यदि महात्मा गांधी के नाम के आगे राष्ट्रपिता नहीं जुड़ा होता तो ऐसे वक्तव्य और उदासीनता फिर भी एकबारगी ना चाहते हुए भी हजम की जा सकती थी. क्योंकि हमारे देश में महापुरुषों के साथ ऐसा ही सलूक किया जाता है. मगर जहां राष्ट्रीयता की बात आती है वहां वाजिब सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए. ऐसा ही हाल हिंदी का भी है, उसे हमारी राष्ट्रभाषा कहा जाता है. कहा जाता है इसलिए कह सकते हैं क्योंकि राष्ट्रीय दर्जे जैसी कोई बात यहां दिखाई नहीं देती. ऐसे मुल्क में जहां हिंदी भाषियों की तादाद सबसे ज्यादा है, वहां अंग्रेजी को सर्वोच्च स्थान पर बैठाया गया है. आम बोलचाल में भी हिंदी अब पिछड़ती जा रही है. सबसे ताज्ज्ुब की बात को ये है कि जिस सरकार पर हिंदी को मजबूत करने का जिम्मा है वो ही इसे कमजोर बनाने में जुटी है. सरकारी स्तर पर हिंदी को प्रोत्साहित किए जाने वाले कागजी प्रयास भी अब बंद से हो गये हैं. सरकारी कार्यालयों में, हिंदी में हर कार्य संभव, हर संभव कार्य हिंदी में जैसी तख्तियां लगाकर फर्ज की इतिश्री कर ली गई है. आलम ये हो चला है कि देश की संसद में भी हिंदी की पूछपरख नहीं है. बहुसंख्य हिंदी आबादी का प्रतिनिधित्वकरने वाले प्रतिनिधि भी राष्ट्रभाषा के इस्तेमाल को तौहीन समझते हैं. अभी कुछ ही रोज पहले जब सदन में चर्चा के दौरान केंद्रीय पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश को समाजवादी प्रमुख मुलायम सिंह ने यह याद दिलाया कि वो लंदन की नहीं भारत की संसद में बोल रहे हैं तो उन्होंने अंग्रेजी के बजाए हिंदी में बोलना बेहतर समझा मगर जब बात मेनका गांधी पर आई तो उन्होंने दो टूक शब्दों में हिंदी में बोलने से इंकार कर दिया.
अंग्रेजी मौजूदा दौर की जरूरत है इस सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता, पर जहां इसके बिना भी काम चल सकता है वहां तो कम से कम राष्ट्रभाषा के प्रयोग में शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए. कुछ एक राज्यों को छोड़कर बाकी सब जगह के लोग हिंदी समझ-बोल लेते हैं उसके बाद भी संसद में पहुंचने वाले हमारे अधिकतर सांसद अंग्रेजी का मोह नहीं त्याग पाते. इसी वजह से हिंदी भाषी सांसदों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें तो हिंदी की बीमारी है. अगर हिंदी को देश में बीमारी के रूप में देखा जाता है तो फिर इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का क्या मतलब, इससे अच्छा तो यही होता कि हिंदी को भी क्षेत्रीय भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता. तब शायद इसके तिरस्कार पर यूं मन भारी नहीं होता. राष्ट्रीयता की तीसरी कड़ी यानी राष्ट्रीयखेल हॉकी भी कुछ अच्छी स्थिति में नहीं है. इसे भी राष्ट्र से जुडऩे की कीमत चुकानी पड़ रही है. इस खेल और इससे जुड़े खिलाडिय़ों के साथ हमेशा से ही भेदभाव किया जाता है. उन्हें ना तो राष्ट्रखेल से जुड़ा होने जैसा सम्मान मिल पाया है और ना ही उतनी शौहरत जितनी क्रिकेट में शुरूआती स्तर पर ही मिल जाती है. हॉकी का आज कोई माई-बाप नहीं है. ग्वास्कर, ब्रैडमैन, कपिल देव का नाम अब भी बच्चा-बच्चा बखूबी जानता है मगर ध्यानचंद, केडी सिंह बाबू, अशोक कुमार जैसे नाम अनसुने-अंजाने बनकर रह गए हैं. सही मायनों में देखा जाए तो हॉकी आज गली-मोहल्लों तक ही सीमित रह गई है. चाहे कोई लाख दिलासे दे मगर सच यही है कि इस मुल्क में न तो हॉकी का उद्धार हो सकता है और न इससे ताल्लुकात रखने वालों का, पूरी हॉकी बिरादरी के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है कि खिलाडिय़ों को लेने के लिए बस की बजाए मैटाडोर भेजी जाती हैं, पुणे हवाई अड्डे पहुंचने पर अपने ही मुल्क की एयरलाइंस के अधिकारियों की बदसलूकी के चलते उनकी फ्लाइट छूट जाती है, उन्हें सुबह से दोपहर तक इंतजार करना पड़ता है, मीडिया भी इस खबर को तवज्जो नहीं देता और खेल मंत्रालय की तरफ से कुछ नहीं किया जाता. वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब हॉकी टीम को यूं अपमानित होना पड़ा हो, कुछ वक्त पहले ऑस्ट्रेलिया में जिस कदर जिल्लत का सामना खिलाडिय़ो को करना पड़ा था उसके बाद शायद ही कोई हॉकी में अपना भविष्य देखना चाहेगा. टीम के पास खाने का बिल चुकाने तक के पैसे नहीं थे. एक भारतीय मूल के व्यक्ति ने बिल चुकाकर विदेशी सरजमीं पर देश की इज्जत को तार-तार होने से बचाया था. लेकिन बाद में वो खुद बेचारा अपनी 7.2 लाख की भारी-भरकम रकम वापस लेने के लिए दर-दर भटक रहा. इसे हॉकी और उसके प्रेमियों के प्रति उदासीनता ही कहा जाएगा कि आईएचएफ से लेकर खेल मंत्रालय तक ने लंबे समय तक उसकी एक न सुनी.
ओलंपिक में क्वालीफाई न कर पाना भले ही भारतीय हॉकी के इतिहास का सबसे काला दिन रहा हो मगर पुणे एयरपोर्ट पर जो कुछ भी हुआ उसके बाद यह उम्मीद लगाना बेमानी होगा की हॉकी का स्वर्णिम युग कभी लौट के आएगा. हॉकी को रसातल में ले जाने का जिम्मा भले ही हॉकी फेडरेशन का रहा हो, लेकिन जरा गौर करें तो हॉकी में फैली हताशा को समझा जा सकता है. इसकी एक वजह तो क्रिकेट को ब्रांड बनाना है. यह जानकर हैरत होती है कि वर्ष 1983 की विजेता टीम की अगवानी और सम्मान कार्यक्रम कराने के लिए लता मंगेशकर ने बीसीसीआई के लिए पैसे जुटाए थे, क्योंकि क्रिकेट को उस दौर में सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती थी और बीसीसीआई के पास इतने पैसे थे नहीें. लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है, क्रिकेट में पैसा है, शौहरत है, सम्मान है. पर हॉकी में न पैसा, न शौहरत और न ही सम्मान. टीम इंडिया जब कोई टूर्नामेंट जीतकर आती है तो उसके स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए जाते हैं मगर जब हॉकी खिलाड़ी जीतकर आते हैं तो उनके स्वागत के लिए भी कोई आना तक गंवारा नहीं समझता. जब सरकार खुद राष्टï्रीय खेल को दफन करने पर अमादा हो तो फिर किसी और को दोष देने से क्या फायदा. देश में अब तक सरकार खेलों को उचित प्रोत्साहन नहीं दे पाई है, नए खेलमंत्री ने बड़ी-बड़ी बातें तो की हैं मगर उसके परिणाम आना अभी बाकी हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश में हॉकी के लिए पर्याप्त मैदान तक नहीं है. स्कूल और कॉलेज की हॉकी आज भी घास पर खेली जाती है. ऐसे में एस्ट्रो टर्फ की रफ्तार से खिलाड़ी कैसे तालमेल बिठा सकते हैं. कुछ वक्त पहले तक देश भर में लगभग एक दर्जन मैदान में ही एस्ट्रो टर्फ बिछी थीं. यह हॉकी खिलाडिय़ों की बदकिस्तमी है कि राष्टï्रीय खेल से जुड़े होने के बाद भी उन्हें इस तरह की जलालत अमूमन झेलनी पड़ती है. सही मायनों में देखा जाए तो स्टिक के जादूगर ध्यानचंद के सपनों का अब अंत हो चुका है. अगर ध्यानचंद आज होते तो शायद इस दुर्दशा भरे दौर में वो भी अपनी हॉकी को एक ऐसे खूंटे पर टांग देते जहां से उसे चाहकर भी उतारना मुमकिन नहीं होता. ये बात सही है कि देश में क्रिकेट के चाहने वाले आधिक हैं, हॉकी देखना कम ही लोगों को रास आता है पर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है. हॉकी अपने आप ही तो रसातल में नहीं चली गई, जाहिर है राष्ट्रीयखेल को प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी उठाने वालों ने हाथ पर हाथ धरे रहने के सिवा कुछ नहीं किया. यदि हॉकी को यूं मरने के लिए नहीं छोड़ा गया होता तो संभवत: आज यह इतनी दयनीय स्थिति में नहीं होती. राष्ट्रपिता, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीयखेल के साथ हमारे देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर तो यही लगता है कि अगर इनके आगे राष्ट्रीय नहीं लगा होता तो शायद ये ज्यादा सम्मान पा रहे होते.नीरज नैयर
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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सोमवार, 10 अगस्त 2009
उन सवालों के जवाब आज भी मिलना बाकी हैं
नीरज नैयर
ऐसे ही अखबार पढ़ते-पढ़ते एक बहुत पुराना किस्सा याद आ गया. जो दर्दनाक तो था ही, अपने पीछे कुछ ऐसे सवालात भी छोड़ गया था जिनके जवाब मिलना अभी बाकी हैं. बात सर्दियों के दिनों की है, हाड़कंपा देेने वाली ठंड में जब कोहरे की चादर शाम से ही छाने लगती थी तो लोग जल्द ही अपने घरों में कैद हो जाया करते थे, उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे घर से तीन-चार घर छोड़कर एक परिवार रहा करता था, जिसमें तीन बच्चे भी थे, वो बच्चे कभी-कभीर हमारे साथ क्रिकेट खेलने आ जाया करते थे. हमारे देश में क्रिकेट और मधुशाला दो ही ऐसी चीज हैं जो अंजानों को भी दोस्त बना देती हैं. इस संबंध में तो हरिवंश राय बच्चन ने लिखा भी है कि मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला. पर कुछ दिनों से वो बच्चे न तो हमारे साथ खेलने आए और न ही दिखाई दिए, हमने सोचा कि शायद कहीं बाहर गये होंगे. उनके घर वालों से इतनी अच्छी जान पहचान थी नहीं सो जाकर पता करना मुनासिब नहीं समझा. इन दिनों कई बार उनके घर कुछ हट्टे-कट्टे लोगों को आते और उनके पिताजी को गिड़गिड़ाते देखा, एक-आद बार तो उनके आस-पड़ोसी भी बीच-बचाव करते दिखाई दिए. मामला पूरी तरह तो समझ में नहीं आया लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि कुछ गड़बड़ तो जरूर है. कुछ दिन ऐसे ही निकल गये, पढ़ाई को लेकर घरवालों की डांट के चक्कर में क्रिकेट से भी थोड़े दिनों तक नाता तोडऩा पड़ा, उस वक्त हमें लगता था कि ऐसा हमारे साथ ही क्यों होता है, बाद में पता चला कि अमूमन हर बच्चे की यही कहानी है. पढऩे-लिखने में शुरू से ही कुछ खास मन नहीं लगता था, हां इतना अवश्य पढ़ लिया करते थे कि फेल होने की नौबत न आए. फस्र्ट क्लास या टॉप मारने के सपने हमारे घर वालों ने भले ही देखें हो मगर हमने कभी उस ओर गौर भी नहीं किया. क्रिकेट खेलते-खेलते सुबह जल्दी उठने की आदत लग चुकी थी इसलिए घरवालों ने वो समय पढ़ाई के लिए निर्धारित कर दिया. उनका मानना था कि सुबह-सुबह का याद किया दिमाग से नहीं निकलता. कुछ हद तक शायद वो सही भी थे, सुबह-सुबह जितना क्रिकेट खेला वो दिमाग में इस कदर रच-बस गया था कि पढ़ते-पढ़ते भी स्ट्रोक खेलने की प्रैक्टिस कर लिया करते थे. शाम को दोस्तों की चौपाल हुआ करती थी जिसमें सभी अपना-अपना दुखड़ा रोया करते थे, दरअसल सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने का जो मजा है वो किसी और वक्त नहीं मिल सकता, घूप खिलने के बाद रजाईयों में दुबके बैठे लोग पार्क में धूप सेंकने को आ जाया करते थे, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग होते थे और उन्हें समझाना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती है. गेंद अगर पास से निकल भी जाए तो हंगामा खड़ा कर दिया करते हैं. और घर के बाहर यानी सड़क पर अंटियों का जमघट, स्वेटर बुनते-बुनते दूसरों की बुराई करना और हमें धमकाते रहना कि गेंद इधर आई तो खैर नहीं. इन सब के बीच क्रिकेट खेला भी जाता तो कैसे, हमारे ठीक पड़ोस में एक अम्मा जी रहा करती थीं जिनकी आदतों से उनके घर के बच्चे भी आजिज आ चुके थे, शायद इसीलिए बच्चा पार्टी ने उनका नाम छिपकली रखा था. उन्हें हमारा अपने ही घर में खेलना तक गंवारा नहीं था, उनके विरोध को दरकिनार करके अगर हम खेलने की कोशिश भी करते तो उनकी रनिंग कमेंट्री शुरू हो जाया करती थी. हमारी बॉल के दिवार फंलागने का उन्हें बेसर्बी से इंतजार रहता ताकि बॉल रखकर वो हमारा खेल बंद करवा सकें. उन दिनों जैसे-तैसे पैसे मिलाकर बॉल खरीदकर लाया करते थे और अम्माजी थी उन्हें दबाकर हमें आर्थिक रूप से कंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं. इतने सालों बाद आज भी वो बिल्कुल वैसी ही तंदरुस्त रखी हैं, उनकी जुबान की धार अब भी कायम है, हां ये बात अलग है कि अब उन्हें इतना चीखने और बॉल हथियाने का मौका नहीं मिलता क्योंकि बच्चे आजकल टीवी या इंटरनेट से ही चिपके रहते हैं. खैर हमारी चौपाल में यह फैसला हुआ कि सब अपने-अपने घरवालों को पढ़ाई का समय थोड़ा खिसकाने को कहेंगे और अगर बात नहीं बनी तो, अपने गुस्से का थोड़ा-थोड़ा इजहार करेंगे. अब पता नहीं हमारे फैसले की खबर घरवालों तक पहुंच गई या उन्हें हमारे हाल पर तरस आ गया कि उन्होंने हमें सुबह क्रिकेट खेलने की इजाजत दे दी. जिन एक-दो दोस्तों के घरवाले नहीं माने थे उन्हें हमने हाथ-पैर जोड़कर मना ही लिया. जब क्रिकेट की बात शुरू हुई तो हमें उन बच्चों का भी ख्याल आया जो काफी वक्त से दिखाई नहीं दिए थे, हमने तय किया कि रात को ही सब मिलकर उनके घर चलेंगे, जैसा कि पहले से तय था हम पांच लोग करीब 8:30-900 के बीच उनके घर पहुंचे, चूंकि सर्दियों के दिन थे इसकरके आस-पड़ोस में कोई चहल-पहल नहीं थी, सब अपने घर में दुबके बैठे थे, बस उनके टीवी की आवाज खामोशी को चीरते हुए बाहर तक आ रही थी. हम उन बच्चों के घर का गेट खोलकर अंदर दाखिल हुए, हम घंटी बजाते इससे पहले किसी के रोने की आवाज सुन हमने अपने हाथ खींच लिए. समझ नहीं आ रहा था कि घंटी बजाएं या वापस लौट चलें. थोड़ी देर इसी उलझन में रहने के बाद हम सबने कल आकर बात करने का फैसला लिया और अपने-अपने घर चले आए. सुबह जब क्रिकेट खेलने के बाद हम वापस लौटे तो उनके घर पर बहुत भीड़ लगी थी, एक एम्बुलेंस और पुलिस की दो गाडिय़ा भी वहां खड़ी हुई थी. लोग आपस में बातें कर रहे थे, हम भी भीड़ के बीच में जाकर जानने की कोशिश करने लगे कि आखिर हुआ क्या है. थोड़ी ही देर में हमें सबकुछ समझ में आ गया, उन बच्चों की मौत हो चुकी थी और उनकी मां की भी. उनके पिताजी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था क्योंकि सांसे अब तक चल रही थी. ये मामला सामुहिक आत्महत्या का था, सबने जहर मिला खाना खाया था. पुलिस को घर से एक पत्र मिला जिसमें आत्महत्या के कारणों का जिक्र कुछ यूं किया गया था, आर्थिक स्थिति खराब हो जाने और देनदारों के तकाजे से व्यथित होकर हम मौत को गले गला रहे हैं, हमारे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. घर पहले ही गिरवी रखा हुआ है, अब और कुछ रखने के लिए है नहीं, जेब में आखिरी 50 रुपए बचे थे जिससे खाना और जहर खरीद लिया. हम अपने बच्चों को यूं दर-दर की ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ सकते इसलिए उन्हें भी साथ ले जा रहे हैं. उस वक्त हमें लगा कि अगर हम कल थोड़ी हिम्मत दिखा देते तो शायद ये नौबत ही नहीं आती. उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हमने क्रिकेट नहीं खेला, शायद हम सदमे में थे. फिर पता चला कि उन बच्चों के पिताजी जो जिंदा बच गये थे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और हो सकता है कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा. सुनकर बहुत ही अजीब लगा, जो व्यक्ति पहले से ही इतना दुखी हो उसको और दुख देना कहां का कानून है. उन्होंने किस स्थिति में ये कदम उठाया सब जानते हैं, उन्होंने भी जहर खाया था पर वो बच गये. मन में कई तरह के सवाल और गुस्सा लिए हम घर के सामने ही रहने वाले एक अंकल के पास गये, वो पहले पुलिस में ही थे. उन्होंने हमारे गुस्से को शांत करने की बहुत कोशिश की. उन्होंने बताया कि भारतीय कानून में आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है. कानून में ऐसा करने वाले व्यक्ति को गुनाहगार माना जाता है, उसे अधिकतम एक साल तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भी हो सकता है. हम उनके जवाबों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे या कहें कि हम जानते-बूझते भी संतुष्ट होना नहीं चाहते थे क्योंकि हम ये स्वीकार नहीं पा रहे थे कि आखिर मौत की दहलीज पर जाकर लौटने वाले को हमारे देश का कानून सब समझते हुुए भी कैसे सजा सुना सकता है. वो सवाल जो बचपन में उठे थे आज भी वैसे ही सामने खड़े हैं. आत्महत्या जैसा फैसला कोई भी इंसान अपनी खुशी से नहीं उठता, वो इस स्थिति तक तब पहुंचता है जब बाकी सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके होते हैं. वो इतना टूट चुका होता है कि जिंदा रहना उसके लिए मौत से भी बदतर बन जाता है. जीवन से पराजित ऐसे अभागे व्यक्ति को सहानुभूति सलाह मशविरे और उचित उपचार की जरूरत है या जेल की. कम से कम अब तो इस सवाल का जवाब खोजा जाना चाहिए. जो व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करने के कारण पीड़ा और अपमान झेल चुका है उसे कानून के जरिए दंडि़त करना क्या क्रूरता नहीं.
नीरज नैयर
ऐसे ही अखबार पढ़ते-पढ़ते एक बहुत पुराना किस्सा याद आ गया. जो दर्दनाक तो था ही, अपने पीछे कुछ ऐसे सवालात भी छोड़ गया था जिनके जवाब मिलना अभी बाकी हैं. बात सर्दियों के दिनों की है, हाड़कंपा देेने वाली ठंड में जब कोहरे की चादर शाम से ही छाने लगती थी तो लोग जल्द ही अपने घरों में कैद हो जाया करते थे, उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे घर से तीन-चार घर छोड़कर एक परिवार रहा करता था, जिसमें तीन बच्चे भी थे, वो बच्चे कभी-कभीर हमारे साथ क्रिकेट खेलने आ जाया करते थे. हमारे देश में क्रिकेट और मधुशाला दो ही ऐसी चीज हैं जो अंजानों को भी दोस्त बना देती हैं. इस संबंध में तो हरिवंश राय बच्चन ने लिखा भी है कि मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला. पर कुछ दिनों से वो बच्चे न तो हमारे साथ खेलने आए और न ही दिखाई दिए, हमने सोचा कि शायद कहीं बाहर गये होंगे. उनके घर वालों से इतनी अच्छी जान पहचान थी नहीं सो जाकर पता करना मुनासिब नहीं समझा. इन दिनों कई बार उनके घर कुछ हट्टे-कट्टे लोगों को आते और उनके पिताजी को गिड़गिड़ाते देखा, एक-आद बार तो उनके आस-पड़ोसी भी बीच-बचाव करते दिखाई दिए. मामला पूरी तरह तो समझ में नहीं आया लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि कुछ गड़बड़ तो जरूर है. कुछ दिन ऐसे ही निकल गये, पढ़ाई को लेकर घरवालों की डांट के चक्कर में क्रिकेट से भी थोड़े दिनों तक नाता तोडऩा पड़ा, उस वक्त हमें लगता था कि ऐसा हमारे साथ ही क्यों होता है, बाद में पता चला कि अमूमन हर बच्चे की यही कहानी है. पढऩे-लिखने में शुरू से ही कुछ खास मन नहीं लगता था, हां इतना अवश्य पढ़ लिया करते थे कि फेल होने की नौबत न आए. फस्र्ट क्लास या टॉप मारने के सपने हमारे घर वालों ने भले ही देखें हो मगर हमने कभी उस ओर गौर भी नहीं किया. क्रिकेट खेलते-खेलते सुबह जल्दी उठने की आदत लग चुकी थी इसलिए घरवालों ने वो समय पढ़ाई के लिए निर्धारित कर दिया. उनका मानना था कि सुबह-सुबह का याद किया दिमाग से नहीं निकलता. कुछ हद तक शायद वो सही भी थे, सुबह-सुबह जितना क्रिकेट खेला वो दिमाग में इस कदर रच-बस गया था कि पढ़ते-पढ़ते भी स्ट्रोक खेलने की प्रैक्टिस कर लिया करते थे. शाम को दोस्तों की चौपाल हुआ करती थी जिसमें सभी अपना-अपना दुखड़ा रोया करते थे, दरअसल सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने का जो मजा है वो किसी और वक्त नहीं मिल सकता, घूप खिलने के बाद रजाईयों में दुबके बैठे लोग पार्क में धूप सेंकने को आ जाया करते थे, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग होते थे और उन्हें समझाना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती है. गेंद अगर पास से निकल भी जाए तो हंगामा खड़ा कर दिया करते हैं. और घर के बाहर यानी सड़क पर अंटियों का जमघट, स्वेटर बुनते-बुनते दूसरों की बुराई करना और हमें धमकाते रहना कि गेंद इधर आई तो खैर नहीं. इन सब के बीच क्रिकेट खेला भी जाता तो कैसे, हमारे ठीक पड़ोस में एक अम्मा जी रहा करती थीं जिनकी आदतों से उनके घर के बच्चे भी आजिज आ चुके थे, शायद इसीलिए बच्चा पार्टी ने उनका नाम छिपकली रखा था. उन्हें हमारा अपने ही घर में खेलना तक गंवारा नहीं था, उनके विरोध को दरकिनार करके अगर हम खेलने की कोशिश भी करते तो उनकी रनिंग कमेंट्री शुरू हो जाया करती थी. हमारी बॉल के दिवार फंलागने का उन्हें बेसर्बी से इंतजार रहता ताकि बॉल रखकर वो हमारा खेल बंद करवा सकें. उन दिनों जैसे-तैसे पैसे मिलाकर बॉल खरीदकर लाया करते थे और अम्माजी थी उन्हें दबाकर हमें आर्थिक रूप से कंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं. इतने सालों बाद आज भी वो बिल्कुल वैसी ही तंदरुस्त रखी हैं, उनकी जुबान की धार अब भी कायम है, हां ये बात अलग है कि अब उन्हें इतना चीखने और बॉल हथियाने का मौका नहीं मिलता क्योंकि बच्चे आजकल टीवी या इंटरनेट से ही चिपके रहते हैं. खैर हमारी चौपाल में यह फैसला हुआ कि सब अपने-अपने घरवालों को पढ़ाई का समय थोड़ा खिसकाने को कहेंगे और अगर बात नहीं बनी तो, अपने गुस्से का थोड़ा-थोड़ा इजहार करेंगे. अब पता नहीं हमारे फैसले की खबर घरवालों तक पहुंच गई या उन्हें हमारे हाल पर तरस आ गया कि उन्होंने हमें सुबह क्रिकेट खेलने की इजाजत दे दी. जिन एक-दो दोस्तों के घरवाले नहीं माने थे उन्हें हमने हाथ-पैर जोड़कर मना ही लिया. जब क्रिकेट की बात शुरू हुई तो हमें उन बच्चों का भी ख्याल आया जो काफी वक्त से दिखाई नहीं दिए थे, हमने तय किया कि रात को ही सब मिलकर उनके घर चलेंगे, जैसा कि पहले से तय था हम पांच लोग करीब 8:30-900 के बीच उनके घर पहुंचे, चूंकि सर्दियों के दिन थे इसकरके आस-पड़ोस में कोई चहल-पहल नहीं थी, सब अपने घर में दुबके बैठे थे, बस उनके टीवी की आवाज खामोशी को चीरते हुए बाहर तक आ रही थी. हम उन बच्चों के घर का गेट खोलकर अंदर दाखिल हुए, हम घंटी बजाते इससे पहले किसी के रोने की आवाज सुन हमने अपने हाथ खींच लिए. समझ नहीं आ रहा था कि घंटी बजाएं या वापस लौट चलें. थोड़ी देर इसी उलझन में रहने के बाद हम सबने कल आकर बात करने का फैसला लिया और अपने-अपने घर चले आए. सुबह जब क्रिकेट खेलने के बाद हम वापस लौटे तो उनके घर पर बहुत भीड़ लगी थी, एक एम्बुलेंस और पुलिस की दो गाडिय़ा भी वहां खड़ी हुई थी. लोग आपस में बातें कर रहे थे, हम भी भीड़ के बीच में जाकर जानने की कोशिश करने लगे कि आखिर हुआ क्या है. थोड़ी ही देर में हमें सबकुछ समझ में आ गया, उन बच्चों की मौत हो चुकी थी और उनकी मां की भी. उनके पिताजी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था क्योंकि सांसे अब तक चल रही थी. ये मामला सामुहिक आत्महत्या का था, सबने जहर मिला खाना खाया था. पुलिस को घर से एक पत्र मिला जिसमें आत्महत्या के कारणों का जिक्र कुछ यूं किया गया था, आर्थिक स्थिति खराब हो जाने और देनदारों के तकाजे से व्यथित होकर हम मौत को गले गला रहे हैं, हमारे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. घर पहले ही गिरवी रखा हुआ है, अब और कुछ रखने के लिए है नहीं, जेब में आखिरी 50 रुपए बचे थे जिससे खाना और जहर खरीद लिया. हम अपने बच्चों को यूं दर-दर की ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ सकते इसलिए उन्हें भी साथ ले जा रहे हैं. उस वक्त हमें लगा कि अगर हम कल थोड़ी हिम्मत दिखा देते तो शायद ये नौबत ही नहीं आती. उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हमने क्रिकेट नहीं खेला, शायद हम सदमे में थे. फिर पता चला कि उन बच्चों के पिताजी जो जिंदा बच गये थे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और हो सकता है कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा. सुनकर बहुत ही अजीब लगा, जो व्यक्ति पहले से ही इतना दुखी हो उसको और दुख देना कहां का कानून है. उन्होंने किस स्थिति में ये कदम उठाया सब जानते हैं, उन्होंने भी जहर खाया था पर वो बच गये. मन में कई तरह के सवाल और गुस्सा लिए हम घर के सामने ही रहने वाले एक अंकल के पास गये, वो पहले पुलिस में ही थे. उन्होंने हमारे गुस्से को शांत करने की बहुत कोशिश की. उन्होंने बताया कि भारतीय कानून में आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है. कानून में ऐसा करने वाले व्यक्ति को गुनाहगार माना जाता है, उसे अधिकतम एक साल तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भी हो सकता है. हम उनके जवाबों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे या कहें कि हम जानते-बूझते भी संतुष्ट होना नहीं चाहते थे क्योंकि हम ये स्वीकार नहीं पा रहे थे कि आखिर मौत की दहलीज पर जाकर लौटने वाले को हमारे देश का कानून सब समझते हुुए भी कैसे सजा सुना सकता है. वो सवाल जो बचपन में उठे थे आज भी वैसे ही सामने खड़े हैं. आत्महत्या जैसा फैसला कोई भी इंसान अपनी खुशी से नहीं उठता, वो इस स्थिति तक तब पहुंचता है जब बाकी सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके होते हैं. वो इतना टूट चुका होता है कि जिंदा रहना उसके लिए मौत से भी बदतर बन जाता है. जीवन से पराजित ऐसे अभागे व्यक्ति को सहानुभूति सलाह मशविरे और उचित उपचार की जरूरत है या जेल की. कम से कम अब तो इस सवाल का जवाब खोजा जाना चाहिए. जो व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करने के कारण पीड़ा और अपमान झेल चुका है उसे कानून के जरिए दंडि़त करना क्या क्रूरता नहीं.
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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शनिवार, 8 अगस्त 2009
माँ के दूध से क्यों हैं वंचित देश के मासूम

डॉ. महेश परिमल
आजादी के पूर्व जब लोकमान्य तिलक ने यह हुंकार भरी कि स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा, तब भारतीयों में एक जज्बा दौड़ गया। लोगों ने इसका भरपूर समर्थन किया। बस तभी से अँगरेजी सरकार की चूलें हिलने लगी। आज यदि एक बच्चा कहता है कि मेरी माँ का दूध पर मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा। तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। पर सच तो यह है कि आज के बेबी फूड बच्चों को माँ के दूध से वंचित रखने का षड्यंत्र रच रहे हैं। स्तनपान सप्ताह को सामने रखकर आज की माताएँ बताएँ कि क्या उन्होंने सचमुच अपने बच्चे को पूरे वर्ष तक अपना दूध पिलाया है?
बेबी फूड बनाने वाली कंपनियाँ अपने उत्पादन पर एक हँसते-मुस्कराते बच्चे की तस्वीर दिखाते हैं। इससे आज की तथाकथित शिक्षित माताएं यह समझती हैं कि इस बेबी फूड के इस्तेमाल से हमारा बच्चा भी इसी तरह हँसता-मुस्कराता हो जाएगा। इसके बाद वे इसका इस्तेमाल शुरू कर देती हैं। यहाँ कए जरुरी बात यह बताना है कि ये बेबी फूड वाले अपने उत्पादन में यह कभी नहीं लिखते कि बच्चे को जिस शीशी से दूध पिलाया जा रहा है, उसे हर बार गर्म पानी से धोना चाहिए। ऐसा न करने से आपके मासूम की मौत हो सकती है। वास्तव में आज यही हो रहा है, बेबी फूड के विज्ञापनों में ऐसा नहीं लिखा है, इसलिए आज हमारे देश में सबसे अधिक बच्चों की मौत इंफेक्शन से हो रही है। आज की माताएँ इसे क्यों नहीं समझ पा रही हैं, यह चिंता का विषय है।
कई महिलाएँ, जो अपने को आधुनिक बताती हैं, उनका मानना है कि बच्चे को दूध पिलाने से उनका फिगर बिगड़ जाएगा। कई माताएँ कामकाजी होती हैं। इन माताओं के लिए अपने बच्चे को दूध पिलाना सचमुच एक गंभीर समस्या है। अभी इसे भारतीय परिवेश में नहीं देखा गया है। किंतु अमेरिका में अब माताओं के लिए उनकी ऑफिस में यह व्यवस्था की जाने लगी है, जहाँ वह इत्मीनान से अपने बच्चे को दूध पिला सकती हैं। एक ओर जहाँ भारतीय माताएँ अपने बच्चे को दूध पिलाने में संकोच करती हैं, वहीं अमेरिकी महिलाएँ इसके लिए संघर्ष कर रहीं हैं। वे कोर्ट में जा रही हैं और आंदोलन कर रही हैं। अभी कुछ महीनों पूर्व ही एक तस्वीर ने पूरे अमेरिका में तहलका मचा दिया। तस्वीर में कई महिलाएँ एक डिपार्टमेंटल स्टोर की सीढिय़ों पर अपने बच्चों को दूध पिला रही हैं। यह तस्वीर पूरे विश्व के अखबारों में प्रकाशित की गई। यह उस आंदोलन का एक छोटा सा हिस्सा था, जिसमें माताओं अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए स्थान की माँग कर रही हैं। अमेरिका अब इसके लिए चिंतित है, लेकिन भारतीय कार्पोरेट जगत ने अभी इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा है।
आखिर भारतीय माताएँ ऐसा क्यों सोचती हैं वे यदि अपने बच्चे को दूध पिलाएँगी, तो उसका शरीर बेडौल हो जाएगा। क्या शरीर का आकर्षक बच्चे के भविष्य में अधिक आवश्यक है? इस दृष्टि से देखा जाए, तो भारत के गरीब बच्चे अधिक खुशकिस्मत हैं। उन्हें माँ के दूध के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। दूसरी ओर ये गरीब इतने अधिक गरीब होते हैं कि ये बेबी फूड नहीं खरीद सकते। इसलिए बच्चा कम से कम एक साल तक तो माँ के दूध से वंचित नहीं रहता। मजदूर के रूप में काम करने वाली माताओं की तस्वीर देखी हैं, जो खेतों, चाय बागानों आदि में काम करती हैं, वे काम के दौरान अपने बच्चे को पीठ पर इस तरह से रखती हैं कि बच्चा जब चाहे माँ का दूध पी सकता है। बच्चे को दूध न पिलाने की प्रवृत्ति शिक्षित महिलाओं में ही अधिक देखी जाती हैं। उन्हें ही अपने शरीर का विशेष ध्यान रहता है।
बेबी फूड वाले तो अपने उत्पाद का विक्रय कर अरबों रुपए कमाते हैं। वे चाहकर भी गरीब महिलाओं को अपना उत्पादन खरीदने के लिए आकर्षित नहीं कर सकते। आँकड़ों की दृष्टि से देखें तो एक माँ एक वर्ष तक यदि अपने बच्चे को दूध पिलाए, तो वह एक वर्ष में 48 हजार रुपए प्रतिवर्ष की बचत कर सकती हैं। अभी यह राशि बेबी फूड वालों के पास जा रही है। सोचो, कितना कमा लेती हैं, ये कंपनियाँ, मात्र एक बच्चे को माँ के दूध से वंचित करके?
आज जहाँ अपने अधिकार के लिए लोग सचेत हो रहे हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा रहा है, वहीं देश के करोड़ों मासूमों की सुनने वाला कोई नहीं है। एक साजिश के तहत मासूमों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है और आधुनिक माताएँ इसे अनिवार्य समझकर अपना रहीं है, ऐसे में आखिर दोष किसका माना जाए? सरकार तो बेबी फूड पर प्रतिबंध लगाने से रही। तो फिर माताएँ ही क्यों जागरुक नहीं होती? आखिर वह कौन -सी स्थिति है, जो एक बच्चे को माँ के दूध से वंचित रख रही है? माँ बच्चे के जीवन की पहली पाठशाला होती है, इस उक्ति को चरितार्थ तभी किया जा सकता हे,जब माँ ही इसे समझे। अभी हमारे देश में ऐसी व्यवस्था कम ही हो पाई है, जहाँ माँ का दूध फ्रिज करके रखा जाता है। ऐसी माताएँ भी नहीं हैं, जो अपने दूध को 'मिल्क बैंकÓ में देती हो। हाँ धाय की परंपरा अवश्य है, जो दूसरों के बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं। पर अब यह परंपरा केवल उन माताओं पर ही लागू होती हैं जो गरीबी से त्रस्त होकर ऐसा कर रही हैं।
आज की माताएँ यह क्यों भूल जाती हैं कि वे अपनी संतान को एक वर्ष तक दूध पिलाकर उसका भविष्य सँवार रही हैं। उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को विकसित कर रही हैं। उसे सबल बना रही हैं, भविष्य में विषमताओं से जूझने के लिए। बेबी फूड वाला बच्चा आखिर कब तक जूझेगा, भविष्य की चुनौतियों से, ये किसी माँ से सोचा? अंत में उन माताओं को प्रणाम,जो आज भी अपने दूध पर संतान का अधिकार समझती हैं, उसे दूध पिलाती हैं। तभी ये माताएँ अपनी संतानों को अपने दूध का मोल बता पाएँगी।
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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गुरुवार, 6 अगस्त 2009
क्या आपको लगता है कि मीडिया का एक खास वर्ग हिंदुत्व का विरोधी है?
पेश हैं रिश्ते ही रिश्ते – (दिल्ली की दीवारों पर लिखा होता है वैसे वाले नहीं, ये हैं असली रिश्ते)
-सुज़ाना अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय (नेहरु डायनेस्टी टीवी- NDTV) की
भांजी हैं।
-प्रणव रॉय “काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन्स” के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के
सदस्य हैं।
-इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं मुकेश अम्बानी।
-प्रणव रॉय की पत्नी हैं राधिका रॉय।
-राधिका रॉय, बृन्दा करात की बहन हैं।
-बृन्दा करात, प्रकाश करात (CPI) की पत्नी हैं।
-प्रकाश करात चेन्नै के “डिबेटिंग क्लब” के सदस्य थे।
-एन राम, पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे।
-इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी “रैडिकल रीव्यू”।
-CPI(M) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं सीमा चिश्ती।
-सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की “रेजिडेण्ट एडीटर” हैं।
-बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं।
-बरखा दत्त की माँ हैं श्रीमती प्रभा दत्त।
-प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं।
-राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे, अब CNN-IBN के हैं (दोनों ही मुस्लिम चैनल हैं)।
-राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं सागरिका घोष।
-सागरिका घोष के पिता हैं दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष।
-सागरिका घोष की आंटी रूमा पॉल हैं।
-रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं।
-सागरिका घोष की दूसरी आंटी अरुंधती घोष हैं।
-अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं।
-CNN-IBN का “ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क” (GBN) से व्यावसायिक समझौता है।
-GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है।
-NDTV भारत का एकमात्र चैनल है को “अधिकृत रूप से” पाकिस्तान में दिखाया जाता है।
-दिलीप डिसूज़ा PIPFD (Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy) के सदस्य हैं।
-दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं जोसेफ़ बेन डिसूज़ा।
-जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं।
-तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं।
-तीस्ता सीतलवाड के पति हैं जावेद आनन्द।
-जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था “मुस्लिम
फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी” चलाते हैं।
-इस संस्था के प्रवक्ता हैं जावेद अख्तर।
-जावेद अख्तर की पत्नी हैं शबाना आज़मी।
-करण थापर ITV के मालिक हैं।-ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है।
-करण थापर के पिता थे जनरल प्राणनाथ थापर (1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था)।
-करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं।
-करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है।
-नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं।
-विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं।
-मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं।
-नबाआं को मदद मिलती है पैट्रिक मेकुल्ली से जो कि “इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क(IRN)” संगठन में हैं।
-अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्या हैं।
-अंगना चटर्जी PROXSA (Progressive South Asian Exchange Network) की भी सदस्या हैं।-PROXSA संस्था, FOIL (Friends of Indian Leftist) से पैसा पाती है।
-अंगना चटर्जी के पति हैं रिचर्ड शेपायरो।
-FOIL के सह-संस्थापक हैं अमेरिकी वामपंथी बिजू मैथ्यू।
-राहुल बोस (अभिनेता) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं।
-खालिद अंसारी “मिड-डे” पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं।
-अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं।
-एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं।
-नरसिम्हन राम (यानी एन राम) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार “द हिन्दू” के मुख्य
सम्पादक हैं।
-एन राम की पहली पत्नी का नाम है सूसन।
-सूसन एक आयरिश हैं जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं।
-विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं, वे भी एक पत्रकार हैं।
-एन राम की हालिया पत्नी मरियम हैं।
-त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और केएम रॉय ने भाग लिया है।
-जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं।
-जबकि केएम रॉय “द हिन्दू” के संवाददाता हैं।
-केएम रॉय “मंगलम” पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं।
-मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एमसी वर्गीज़ ने शुरु किया है।
-केएम रॉय को “ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़टाइम अवार्ड” से सम्मानित किया गया है।
-“ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन” के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं जॉन दयाल।
-जॉन दयाल “ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल”(AICC) के सचिव भी हैं।
-AICC के अध्यक्ष हैं डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा।
-जोसेफ़ डिसूज़ा ने “दलित फ़्रीडम नेटवर्क” की स्थापना की है।
-दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है “ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया” (OM India)।
-OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं कुमार स्वामी।
-कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं।
-OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं मोजेस परमार।
-OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है, जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं।
-OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क (DFN) के साथ काम करती है।
-DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं।
-विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो (अमेरिका) के पूर्व सीनेटर हैं और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं। यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है।
-DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं।
-उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं।
-जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था।
-जोसेफ़ पिट्स “कश्मीर फ़ोरम” के संस्थापक भी हैं।
-उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल (राष्ट्रीय एकता परिषद) के सदस्य भी हैं।
-उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं।
-सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं।
-सुहासिनी हैदर, सलमान हैदर की पुत्रवधू हैं।
-सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं, चीन में राजदूत भी रह चुके हैं।
-रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं रामोजी राव।
-रामोजी राव “ईनाडु” (सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार) के संस्थापक हैं।
-रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं।
-रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं।
-डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं टी वेंकटरमन रेड्डी।
-रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं।
-एमजे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज के सम्पादक हैं।
-एमजे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं।
-एमजे अकबर की पत्नी हैं मल्लिका जोसेफ़।
-मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं।
-वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की।
-सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये।
-सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं शर्मिला।
-शर्मिला की शादी हुई है “अनिल कुमार” से। अनिल कुमार भी एक धर्म-परिवर्तित ईसाई हैं जिन्होंने “अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म” नामक संस्था शुरु की और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट (कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक) हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं।
-जगन रेड्डी “जगति पब्लिकेशन प्रा। लि।” के चेयरमैन हैं।
-भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं।
-करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं।
-चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि “लैंको समूह” को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था।
-लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है।
-एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं।
-एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं।
-पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं।
-सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं कलानिधि मारन-कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक “दिनाकरन” के भी मालिक हैं।
-कलानिधि के भाई हैं दयानिधि मारन।
-दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे।
-कलानिधि मारन के पिता थे मुरासोली मारन।
-मुरासोली मारन के चाचा हैं एम करुणानिधि (तमिलनाडु के मुख्यमंत्री)।
-करुणानिधि ने ‘कैलाग्नार टीवी” का उदघाटन किया।
-कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं एम के अझागिरी।
-एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं।
-करुणानिधि के एक और पुत्र हैं एम के स्टालिन।
-स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया।
-कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं, और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं।
-कनिमोझी, “द हिन्दू” अखबार में सह-सम्पादक भी हैं।
-कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने-माने व्यक्ति हैं।
-स्टार विजय एक तमिल चैनल है।
-विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है।
-स्टार टीवी के मालिक हैं रूपर्ट मर्डोक।
-Act Now for Harmony and Democracy (अनहद) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं शबनम हाशमी।
-शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं।
-“अनहद” के एक और संस्थापक हैं के एम पणिक्कर।
-के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे।
-पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला।
-हर्ष मन्दर भी “अनहद” के संस्थापक हैं।
-हर्ष मन्दर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।
-हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं।
-अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं क्योंकि वे ईसाई हैं और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोरशोर से धर्म-परिवर्तन करवाया गया और बाद में दिलीपसिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई।
-कमला भसीन भी “अनहद” की संस्थापक सदस्य हैं।
-फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा “अनहद” के ट्रस्टी हैं।
-मलयालम दैनिक “मातृभूमि” के मालिक हैं एमपी वीरेन्द्रकुमार-वीरेन्द्रकुमार जद(से) के सांसद हैं (केरल से)
-केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है।
-शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं।
-चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं, जो कोलकाता की आनन्दबाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे।
-चन्द्रन थरूर ने 1959 में द स्टेट्समैन” की अध्यक्षता की।
-शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के ईशान और कनिष्क हैं, ईशान हांगकांग में “टाइम्स” पत्रिका के लिये काम करते हैं।
-कनिष्क लन्दन में “ओपन डेमोक्रेसी” नामक संस्था के लिये काम करते हैं।
-शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी (अमेरिकी पत्रिका) “इंडिया करंट्स” की सम्पादक हैं।
-परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं और वे “रीडर्स डाइजेस्ट” के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं।
-शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्षा हैं।
-शोभना भरतिया केके बिरला की पुत्री और जीड़ी बिरला की पोती हैं
-शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था।
-शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है।-शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं।
-करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं।
-पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है।
-सुज़ाना अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय (नेहरु डायनेस्टी टीवी- NDTV) की
भांजी हैं।
-प्रणव रॉय “काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन्स” के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के
सदस्य हैं।
-इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं मुकेश अम्बानी।
-प्रणव रॉय की पत्नी हैं राधिका रॉय।
-राधिका रॉय, बृन्दा करात की बहन हैं।
-बृन्दा करात, प्रकाश करात (CPI) की पत्नी हैं।
-प्रकाश करात चेन्नै के “डिबेटिंग क्लब” के सदस्य थे।
-एन राम, पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे।
-इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी “रैडिकल रीव्यू”।
-CPI(M) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं सीमा चिश्ती।
-सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की “रेजिडेण्ट एडीटर” हैं।
-बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं।
-बरखा दत्त की माँ हैं श्रीमती प्रभा दत्त।
-प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं।
-राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे, अब CNN-IBN के हैं (दोनों ही मुस्लिम चैनल हैं)।
-राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं सागरिका घोष।
-सागरिका घोष के पिता हैं दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष।
-सागरिका घोष की आंटी रूमा पॉल हैं।
-रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं।
-सागरिका घोष की दूसरी आंटी अरुंधती घोष हैं।
-अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं।
-CNN-IBN का “ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क” (GBN) से व्यावसायिक समझौता है।
-GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है।
-NDTV भारत का एकमात्र चैनल है को “अधिकृत रूप से” पाकिस्तान में दिखाया जाता है।
-दिलीप डिसूज़ा PIPFD (Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy) के सदस्य हैं।
-दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं जोसेफ़ बेन डिसूज़ा।
-जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं।
-तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं।
-तीस्ता सीतलवाड के पति हैं जावेद आनन्द।
-जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था “मुस्लिम
फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी” चलाते हैं।
-इस संस्था के प्रवक्ता हैं जावेद अख्तर।
-जावेद अख्तर की पत्नी हैं शबाना आज़मी।
-करण थापर ITV के मालिक हैं।-ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है।
-करण थापर के पिता थे जनरल प्राणनाथ थापर (1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था)।
-करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं।
-करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है।
-नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं।
-विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं।
-मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं।
-नबाआं को मदद मिलती है पैट्रिक मेकुल्ली से जो कि “इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क(IRN)” संगठन में हैं।
-अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्या हैं।
-अंगना चटर्जी PROXSA (Progressive South Asian Exchange Network) की भी सदस्या हैं।-PROXSA संस्था, FOIL (Friends of Indian Leftist) से पैसा पाती है।
-अंगना चटर्जी के पति हैं रिचर्ड शेपायरो।
-FOIL के सह-संस्थापक हैं अमेरिकी वामपंथी बिजू मैथ्यू।
-राहुल बोस (अभिनेता) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं।
-खालिद अंसारी “मिड-डे” पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं।
-अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं।
-एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं।
-नरसिम्हन राम (यानी एन राम) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार “द हिन्दू” के मुख्य
सम्पादक हैं।
-एन राम की पहली पत्नी का नाम है सूसन।
-सूसन एक आयरिश हैं जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं।
-विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं, वे भी एक पत्रकार हैं।
-एन राम की हालिया पत्नी मरियम हैं।
-त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और केएम रॉय ने भाग लिया है।
-जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं।
-जबकि केएम रॉय “द हिन्दू” के संवाददाता हैं।
-केएम रॉय “मंगलम” पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं।
-मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एमसी वर्गीज़ ने शुरु किया है।
-केएम रॉय को “ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़टाइम अवार्ड” से सम्मानित किया गया है।
-“ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन” के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं जॉन दयाल।
-जॉन दयाल “ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल”(AICC) के सचिव भी हैं।
-AICC के अध्यक्ष हैं डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा।
-जोसेफ़ डिसूज़ा ने “दलित फ़्रीडम नेटवर्क” की स्थापना की है।
-दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है “ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया” (OM India)।
-OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं कुमार स्वामी।
-कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं।
-OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं मोजेस परमार।
-OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है, जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं।
-OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क (DFN) के साथ काम करती है।
-DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं।
-विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो (अमेरिका) के पूर्व सीनेटर हैं और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं। यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है।
-DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं।
-उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं।
-जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था।
-जोसेफ़ पिट्स “कश्मीर फ़ोरम” के संस्थापक भी हैं।
-उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल (राष्ट्रीय एकता परिषद) के सदस्य भी हैं।
-उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं।
-सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं।
-सुहासिनी हैदर, सलमान हैदर की पुत्रवधू हैं।
-सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं, चीन में राजदूत भी रह चुके हैं।
-रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं रामोजी राव।
-रामोजी राव “ईनाडु” (सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार) के संस्थापक हैं।
-रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं।
-रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं।
-डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं टी वेंकटरमन रेड्डी।
-रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं।
-एमजे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज के सम्पादक हैं।
-एमजे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं।
-एमजे अकबर की पत्नी हैं मल्लिका जोसेफ़।
-मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं।
-वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की।
-सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये।
-सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं शर्मिला।
-शर्मिला की शादी हुई है “अनिल कुमार” से। अनिल कुमार भी एक धर्म-परिवर्तित ईसाई हैं जिन्होंने “अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म” नामक संस्था शुरु की और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट (कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक) हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं।
-जगन रेड्डी “जगति पब्लिकेशन प्रा। लि।” के चेयरमैन हैं।
-भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं।
-करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं।
-चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि “लैंको समूह” को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था।
-लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है।
-एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं।
-एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं।
-पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं।
-सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं कलानिधि मारन-कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक “दिनाकरन” के भी मालिक हैं।
-कलानिधि के भाई हैं दयानिधि मारन।
-दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे।
-कलानिधि मारन के पिता थे मुरासोली मारन।
-मुरासोली मारन के चाचा हैं एम करुणानिधि (तमिलनाडु के मुख्यमंत्री)।
-करुणानिधि ने ‘कैलाग्नार टीवी” का उदघाटन किया।
-कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं एम के अझागिरी।
-एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं।
-करुणानिधि के एक और पुत्र हैं एम के स्टालिन।
-स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया।
-कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं, और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं।
-कनिमोझी, “द हिन्दू” अखबार में सह-सम्पादक भी हैं।
-कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने-माने व्यक्ति हैं।
-स्टार विजय एक तमिल चैनल है।
-विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है।
-स्टार टीवी के मालिक हैं रूपर्ट मर्डोक।
-Act Now for Harmony and Democracy (अनहद) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं शबनम हाशमी।
-शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं।
-“अनहद” के एक और संस्थापक हैं के एम पणिक्कर।
-के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे।
-पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला।
-हर्ष मन्दर भी “अनहद” के संस्थापक हैं।
-हर्ष मन्दर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।
-हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं।
-अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं क्योंकि वे ईसाई हैं और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोरशोर से धर्म-परिवर्तन करवाया गया और बाद में दिलीपसिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई।
-कमला भसीन भी “अनहद” की संस्थापक सदस्य हैं।
-फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा “अनहद” के ट्रस्टी हैं।
-मलयालम दैनिक “मातृभूमि” के मालिक हैं एमपी वीरेन्द्रकुमार-वीरेन्द्रकुमार जद(से) के सांसद हैं (केरल से)
-केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है।
-शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं।
-चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं, जो कोलकाता की आनन्दबाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे।
-चन्द्रन थरूर ने 1959 में द स्टेट्समैन” की अध्यक्षता की।
-शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के ईशान और कनिष्क हैं, ईशान हांगकांग में “टाइम्स” पत्रिका के लिये काम करते हैं।
-कनिष्क लन्दन में “ओपन डेमोक्रेसी” नामक संस्था के लिये काम करते हैं।
-शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी (अमेरिकी पत्रिका) “इंडिया करंट्स” की सम्पादक हैं।
-परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं और वे “रीडर्स डाइजेस्ट” के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं।
-शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्षा हैं।
-शोभना भरतिया केके बिरला की पुत्री और जीड़ी बिरला की पोती हैं
-शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था।
-शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है।-शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं।
-करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं।
-पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है।
लेबल:
दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
शर्मसार है देश....
डॉ. महेश परिमल
इन दिनों देश भर में जो कुछ हो रहा है, वह उत्साहभरा कम लेकिन चिंताजनक अवश्य है। पहले तो मानसून ने खूब रुलाया, फिर इतना बरसा कि शहरों की हालत ही खराब हो गई। इसके बाद भी पूर्वाेत्तर भारत और उत्तर भारत में बारिश के बिना अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई है। असम जहाँ हर वर्ष खूब बारिश होती थी, आज वहाँ भी अकाल की स्थिति है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली में बारिश के अभाव में बिजली-पानी की आपूर्ति लगातार प्रभावित हो रही है। वहाँ हर रोज इसी नाम से विरोध प्रदर्शन हो रहा है। राजधानी में ही ऐसे न जाने कितने क्षेत्र हैं, जहाँ आठ-आठ दिनों तक बिजली नहीं मिल रही है। पानी की आपूर्ति भी कहीं भी संतोषजनक नहीं है।
सवाल यह उठता है कि यदि मानसून कुछ लंबा खिंच जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से क्यों प्रभावित होती है? एक तरफ तो हम गर्व से कहते हैं कि हमें आजाद हुए 62 वर्ष हो गए हैं। अखबारों में देश की तरक्की के आँकड़े पेश करते हुए विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। फिर भी आज बिजली-पानी के लिए हम आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। सभी राज्यों की हालत बिजली के नाम पर तो पतली है, लेकिन सबसे अधिक बदतर स्थिति दिल्ली में है। जहाँ मेट्रो हाइसे में 7 मौतें हो चुकीं हैं। आडिटर का कहना है कि मेट्रो रेल पुल के निर्माण में धांधली हुई है, घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल हुआ। आखिर इसके लिए किसे दोषी माना जाए? इन सबसे अलग हटकर है अगले वर्ष होने वाले एशियन खेल की खबर। आज सरकार जिस तरह से हर काम में जल्दबाजी दिखा रही है, उसके पीछे यह प्रदर्शन की भावना है। खेलों में हमारा प्रदर्शन भले ही खराब हो, पर देश को अच्छे से अच्छा बताने के लिए सारी लीपा-पोती की जा रही है।
इन दिनों देश में कानून-व्यवस्था भी नियंत्रित नहीं कही जा सकती। चारों तरफ तोडफ़ोड़ की घटनाएँ हो रही हैं। पुलिस तंत्र निष्फल साबित हो रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि विश्व में सबसे कम वाहन हमारे यहाँ ही हैं, पर सबसे अधिक दुर्घटनाएँ भी हमारे ही यहाँ होती हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष डेढ़ लाख मौतें होती हैं, फिर भी रोज ही नए वाहन का विज्ञापन हमें देखने को मिल रहे हैं। सरकार है कि नए-नए वाहन और नई बाइक के लिए अनुमति देती जा रही है, उसके पास यह सोचने के लिए जरा भी वक्त नहीं है कि आखिर इतने सारे वाहन दौड़ेंगे कहाँ? वैसे भी हममें यातायात नियमों को तोडऩा अच्छी तरह से आता है। नियम तोडऩा हम अपनी शान समझते हैं। दुर्घटना के बाद टक्कर मारने वाले वाहन का अता-पता ही नहीं मिलता। पूरे देश में इस प्रकार की दुर्घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं।
दूसरी ओर अपहरण और अनाचार की घटनाएँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब तो गैंगरेप के मामले एक शहर से दूसरे शहर में होने लगे हैं। कभी सूरत, कभी भोपाल, कभी कोई अन्य शहर। गोवा के बीच मानो बलात्कार के लिए कुूख्यात हो गए हैं। स्कूल-कॉलेजों में पढऩे वाली किशोरी-युवतियाँ अब शिक्षकों की आँखों को भाने लगी हैं। फेल कर देने की धमकी मात्र से किशोरियाँ शिक्षकों के चंगुल में फँस जाती हैं। घर की बच्चियाँ जब घर पर ही सुरक्षित नहीं है, तो ऐसे में किस पर विश्वास किया जाए।
आजकल टीवी-फिल्मों में भी इस तरह के संवाद बिना सेंसर के जारी होने लगे हैं कि लोगों का रुझान गलत बातों की ओर अधिक जाने लगा है। एक फिल्म में नायक नायिका के सामने कहता है कि वह उसके सामने नहीं आ सकता, क्योंकि उसने कपड़े नहीं पहने हैं। इस पर नायिका कहती है कि तुम बिना कपड़ों के ही अच्छे लगते हो। एक अन्य फिल्म में नायिका अपनी सहेली से पूछती है कि तुम लड़कों को पटाने के लिए क्या करती हो? तो सहेली जवाब देती है कि मैं सेक्सी कपड़े पहनती हूँ और लड़कों के साथ सेक्सी बातें करती हूँ। जब फिल्मों में ऐसे संवाद हों, तो फिर प्रश्न यह उठता है कि आखिर सेंसर नाम की कोई चीज इस देश में है कि नहीं? कैसे इस तरह के संवाद जारी हो जाते हैं। कोई बता सकता है भला?
देश भर में इन दिनों महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने घटनाएँ भी अधिक होने लगी हैं। आखिर क्या मिलता है, पुरुषों को इससे? क्या उन्हें पुलिस का कोई भय नहीं होता? क्या पुलिस उनसे मिली हुई होती है? क्या इस तरह की घटनाओं पर किसी प्रकार की कार्रवाई न करने के लिए पुलिस पर दबाव रहता है? इस देश में मानव अधिकार आयोग नामक की कोई संस्था भी है, यह लोग जानते हैं कि नहीं? क्या इस तरह की घटनाओं से मानव अधिकार आयोग अपनी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं कर सकता? क्या उसे किसी की शिकायत की आवश्यकता होती है? यह ऐसा है कि तो संस्था को मानव धिक्कार आयोग कहना अधिक न्यायसंगत है।
अपराधियों को अब पुलिस का कोई खौफ नहीं रहा। कैदी भी बड़े आराम से जेल में ही सारी सुविधाएँ भोगते हुए अपना तंत्र चलाते रहते हैं। जेल प्रशासन उसकी सेवा में एक पाँव पर खड़ा रहता है। घर का खाना-कपड़ा ही नहीं, बल्कि टीवी, मोबाइल जैसी सुविधाएँ उसे जेल में ही मिल रही है। फिर क्या आवश्यकता है उसे बाहर निकलने की? कैदियों की सबसे अधिक मौत भी भारतीय जेलोंमें ही होती है। यह सिक्के का दूसरा पहलू है। चारों ओर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है। लोग मर रहे हैैं, कट रहे हैं, खप रहे हैं, फिर भी देश को विकासशील बताया जा रहा है। महँगाई बढ़ रही है, इससे आम आदमी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, उधर सरकार सस्ते में कार दिलाने के लिए प्रयासरत है। पेट्रोल के ेदाम बढ़ते ही महँगाई बढ़ जाती है। इस पर अंकुश नहीं लगाया जाता। यदि खुदा ना खास्ता पेट्रोल के दाम घट भी जाएँ, तो बढ़े हुए दाम कम नहीं होते। आखिर माजरा क्या है?
देश के अखबारों और टीवी पर आम आदमी की समस्याओं वाली खबर गायब है। समाज में होने वाले अच्छे कार्य प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाते, बुरे काम का प्रचार इतनी तेजी से होता है कि कुछ ही देर में यह खबर कई माध्यमों से देश के कोने-कोने पर पहुँच जाती है। क्या हो गया है हमें? अब मौतों के आँकड़ों से हमे सिहरन तक नहीं होती। बलात्कार की खबरों को हम बड़ी तल्लीनता से पढ़ते हैं। कोई अपराधी हमारे सामने से गुजर जाए, तो हम उसे बड़े सम्मान के साथ देखते हैं। कहाँ गई तनी हुई मुट्ठियाँ, कहाँ गए तने हुए चेहरे? क्यों नहीं हम दहल जाते भीतर से, जब हमारे पड़ोसी पर कोई अत्याचार करता है? हम यह भूल जाते हैं कि जब हमारा पड़ोसी ही सुरक्षित नहीं है, तो हम कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? आज उस पर हमला हुआ हे, तो कल हम पर होगा। तब हमारे साथ कौन होगा? बोलो.....
डॉ. महेश परिमल
इन दिनों देश भर में जो कुछ हो रहा है, वह उत्साहभरा कम लेकिन चिंताजनक अवश्य है। पहले तो मानसून ने खूब रुलाया, फिर इतना बरसा कि शहरों की हालत ही खराब हो गई। इसके बाद भी पूर्वाेत्तर भारत और उत्तर भारत में बारिश के बिना अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई है। असम जहाँ हर वर्ष खूब बारिश होती थी, आज वहाँ भी अकाल की स्थिति है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली में बारिश के अभाव में बिजली-पानी की आपूर्ति लगातार प्रभावित हो रही है। वहाँ हर रोज इसी नाम से विरोध प्रदर्शन हो रहा है। राजधानी में ही ऐसे न जाने कितने क्षेत्र हैं, जहाँ आठ-आठ दिनों तक बिजली नहीं मिल रही है। पानी की आपूर्ति भी कहीं भी संतोषजनक नहीं है।
सवाल यह उठता है कि यदि मानसून कुछ लंबा खिंच जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से क्यों प्रभावित होती है? एक तरफ तो हम गर्व से कहते हैं कि हमें आजाद हुए 62 वर्ष हो गए हैं। अखबारों में देश की तरक्की के आँकड़े पेश करते हुए विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। फिर भी आज बिजली-पानी के लिए हम आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। सभी राज्यों की हालत बिजली के नाम पर तो पतली है, लेकिन सबसे अधिक बदतर स्थिति दिल्ली में है। जहाँ मेट्रो हाइसे में 7 मौतें हो चुकीं हैं। आडिटर का कहना है कि मेट्रो रेल पुल के निर्माण में धांधली हुई है, घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल हुआ। आखिर इसके लिए किसे दोषी माना जाए? इन सबसे अलग हटकर है अगले वर्ष होने वाले एशियन खेल की खबर। आज सरकार जिस तरह से हर काम में जल्दबाजी दिखा रही है, उसके पीछे यह प्रदर्शन की भावना है। खेलों में हमारा प्रदर्शन भले ही खराब हो, पर देश को अच्छे से अच्छा बताने के लिए सारी लीपा-पोती की जा रही है।
इन दिनों देश में कानून-व्यवस्था भी नियंत्रित नहीं कही जा सकती। चारों तरफ तोडफ़ोड़ की घटनाएँ हो रही हैं। पुलिस तंत्र निष्फल साबित हो रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि विश्व में सबसे कम वाहन हमारे यहाँ ही हैं, पर सबसे अधिक दुर्घटनाएँ भी हमारे ही यहाँ होती हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष डेढ़ लाख मौतें होती हैं, फिर भी रोज ही नए वाहन का विज्ञापन हमें देखने को मिल रहे हैं। सरकार है कि नए-नए वाहन और नई बाइक के लिए अनुमति देती जा रही है, उसके पास यह सोचने के लिए जरा भी वक्त नहीं है कि आखिर इतने सारे वाहन दौड़ेंगे कहाँ? वैसे भी हममें यातायात नियमों को तोडऩा अच्छी तरह से आता है। नियम तोडऩा हम अपनी शान समझते हैं। दुर्घटना के बाद टक्कर मारने वाले वाहन का अता-पता ही नहीं मिलता। पूरे देश में इस प्रकार की दुर्घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं।
दूसरी ओर अपहरण और अनाचार की घटनाएँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब तो गैंगरेप के मामले एक शहर से दूसरे शहर में होने लगे हैं। कभी सूरत, कभी भोपाल, कभी कोई अन्य शहर। गोवा के बीच मानो बलात्कार के लिए कुूख्यात हो गए हैं। स्कूल-कॉलेजों में पढऩे वाली किशोरी-युवतियाँ अब शिक्षकों की आँखों को भाने लगी हैं। फेल कर देने की धमकी मात्र से किशोरियाँ शिक्षकों के चंगुल में फँस जाती हैं। घर की बच्चियाँ जब घर पर ही सुरक्षित नहीं है, तो ऐसे में किस पर विश्वास किया जाए।
आजकल टीवी-फिल्मों में भी इस तरह के संवाद बिना सेंसर के जारी होने लगे हैं कि लोगों का रुझान गलत बातों की ओर अधिक जाने लगा है। एक फिल्म में नायक नायिका के सामने कहता है कि वह उसके सामने नहीं आ सकता, क्योंकि उसने कपड़े नहीं पहने हैं। इस पर नायिका कहती है कि तुम बिना कपड़ों के ही अच्छे लगते हो। एक अन्य फिल्म में नायिका अपनी सहेली से पूछती है कि तुम लड़कों को पटाने के लिए क्या करती हो? तो सहेली जवाब देती है कि मैं सेक्सी कपड़े पहनती हूँ और लड़कों के साथ सेक्सी बातें करती हूँ। जब फिल्मों में ऐसे संवाद हों, तो फिर प्रश्न यह उठता है कि आखिर सेंसर नाम की कोई चीज इस देश में है कि नहीं? कैसे इस तरह के संवाद जारी हो जाते हैं। कोई बता सकता है भला?
देश भर में इन दिनों महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने घटनाएँ भी अधिक होने लगी हैं। आखिर क्या मिलता है, पुरुषों को इससे? क्या उन्हें पुलिस का कोई भय नहीं होता? क्या पुलिस उनसे मिली हुई होती है? क्या इस तरह की घटनाओं पर किसी प्रकार की कार्रवाई न करने के लिए पुलिस पर दबाव रहता है? इस देश में मानव अधिकार आयोग नामक की कोई संस्था भी है, यह लोग जानते हैं कि नहीं? क्या इस तरह की घटनाओं से मानव अधिकार आयोग अपनी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं कर सकता? क्या उसे किसी की शिकायत की आवश्यकता होती है? यह ऐसा है कि तो संस्था को मानव धिक्कार आयोग कहना अधिक न्यायसंगत है।
अपराधियों को अब पुलिस का कोई खौफ नहीं रहा। कैदी भी बड़े आराम से जेल में ही सारी सुविधाएँ भोगते हुए अपना तंत्र चलाते रहते हैं। जेल प्रशासन उसकी सेवा में एक पाँव पर खड़ा रहता है। घर का खाना-कपड़ा ही नहीं, बल्कि टीवी, मोबाइल जैसी सुविधाएँ उसे जेल में ही मिल रही है। फिर क्या आवश्यकता है उसे बाहर निकलने की? कैदियों की सबसे अधिक मौत भी भारतीय जेलोंमें ही होती है। यह सिक्के का दूसरा पहलू है। चारों ओर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है। लोग मर रहे हैैं, कट रहे हैं, खप रहे हैं, फिर भी देश को विकासशील बताया जा रहा है। महँगाई बढ़ रही है, इससे आम आदमी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, उधर सरकार सस्ते में कार दिलाने के लिए प्रयासरत है। पेट्रोल के ेदाम बढ़ते ही महँगाई बढ़ जाती है। इस पर अंकुश नहीं लगाया जाता। यदि खुदा ना खास्ता पेट्रोल के दाम घट भी जाएँ, तो बढ़े हुए दाम कम नहीं होते। आखिर माजरा क्या है?
देश के अखबारों और टीवी पर आम आदमी की समस्याओं वाली खबर गायब है। समाज में होने वाले अच्छे कार्य प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाते, बुरे काम का प्रचार इतनी तेजी से होता है कि कुछ ही देर में यह खबर कई माध्यमों से देश के कोने-कोने पर पहुँच जाती है। क्या हो गया है हमें? अब मौतों के आँकड़ों से हमे सिहरन तक नहीं होती। बलात्कार की खबरों को हम बड़ी तल्लीनता से पढ़ते हैं। कोई अपराधी हमारे सामने से गुजर जाए, तो हम उसे बड़े सम्मान के साथ देखते हैं। कहाँ गई तनी हुई मुट्ठियाँ, कहाँ गए तने हुए चेहरे? क्यों नहीं हम दहल जाते भीतर से, जब हमारे पड़ोसी पर कोई अत्याचार करता है? हम यह भूल जाते हैं कि जब हमारा पड़ोसी ही सुरक्षित नहीं है, तो हम कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? आज उस पर हमला हुआ हे, तो कल हम पर होगा। तब हमारे साथ कौन होगा? बोलो.....
डॉ. महेश परिमल
लेबल:
आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
मंगलवार, 4 अगस्त 2009
हाशमी साहब मकान के लिए मुस्लिम कार्ड क्यों खेला

नीरज नैयर
बॉलीवुड स्टार इमरान हाशमी आजकल सुर्खियों में हैं, वैसे तो अपनी सीरियल किसर की छवि के चलते वो हमेशा ही छाए रहते हैं लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है. जनाब आशियाना ढूंढ रहे हैं और जिस घर पर उनका दिल अटक गया है वो उन्हें मिल नहीं रहा. ऐसा तो अक्सर आम लोगों के साथ भी होता रहता पर इमरान का आरोप है कि चूंकि वो मुस्लिम हैं, इसलिए उन्हें वो घर नहीं दिया जा रहा है. हाशमी साहब राज्य के अल्पसंख्यक आयोग में भी शिकायत कर चुके हैं और उन्होंने सोसाइटी के
पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. हालांकि उनका ये आरोप शायद ही किसी के गले उतरे, इतना बड़ा स्टार, जिसे लाखों लोग पहचानते हों, उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहते हों, हाथ मिलाना चाहते हों वो अगर किसी सोसाइटी में रहने की इच्छा जताता है तो ये मुश्किल ही है कोई इस पर आपत्ति करे. और गर कोई आपत्ति करता भी है तो इसके पीछे घर लेने वाले की व्यक्तिगत छवि उसका चालचलन आदि जैसी सामान्य वजह हो सकती हैं. अमूमन अच्छी सोसाइटी में किसी को घर देने से पहले ये सब देखा जाता है. और वैसे भी घर देना न देना सोसाइटी का अपना निजी फैसला है, अगर उन्हें नहीं लगता कि किसी बड़े स्टार का यहां रहना उनके लिए सुविधाजनक होगा तो उन्हें मना करने का पूरा अधिकार है. जिस तरह की भाषा इमरान हाशमी बोल रहे हैं वह अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों के मुंह से अक्सर सुनते रहते हैं लेकिन बॉलीवुड अभिनेता के मुंह ये सब सुनना थोड़ा अजीब लगता है. इमरान की तरह कुछ और स्टार भी हैं जो इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं, सैफ अली खान ने भी कुछ वक्त पहले कहा था कि मुस्लिम होने की वजह से घर नहीं मिलता, इसीलिए किसी दिक्कत से बचने के लिए मैं सीधा एक मुस्लिम बिल्डर के पास चला गया. सैफ ये भी मानते हैं कि मुंबई में सांप्रदायिक अलगाव एक हकीकत है, और यह समस्या सिर्फ बिल्डिंग सोसायटीज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यहां के पूरे समाज में है. यह सभी को पता है कि मुंबई के जुहू और बांद्रा के इलाकों में जमीन और मकान मुसलमानों को नहीं बेचे जाते. मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि कुछ लोगों के लिए धर्म कितना मायने रखता है और धर्म को लेकर लोग कितने कट्टर हैं. सच्चाई यह है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है और यही बात इस्लाम पर लागू होती है. सिने अदाकारा एवं समाज सेविका शबाना आजमी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे, इसके अलावा कई अन्य स्टार भी हैं जो खुद को मुस्लिम होने की वजह से प्रताडि़त महसूस करते हैं. ये बात सही है कि मुंबई के अंधेरी और बांद्रा इलाकों में मुस्लिम कलाकारों को घर खरीदने में हमेशा से दिक्कतें आती रही हैं, कहा जाता है कि सोफी चौधरी को तो मकान खोजने में दो साल लग गए थे, इस दौरान कई बार ऐसा हुआ था कि डील तकरीबन फाइनल हो चुकी थी लेकिन डीलर को जैसे ही पता चला कि सोफी मुस्लिम हैं डील कैंसल हो गई. अरबाज अली खान को बांद्रा के पेरी क्रॉस रोड पर मकान देने से मना कर दिया गया था, इसी तरह से जीनत अमान को जुहू में मकान खरीदने के लिए तकरीबन तीन महीने तक जूझना पड़ा. लेकिन ये भी सही है कि शाहरुख, सलमान जैसे अल्पसंख्य समुदाय से जुड़े कई स्टार बड़े आराम से बिना किसी दिक्कत के साथ मुंबई में रह रहे हैं. बात थोड़ी चुबने वाली जरूर है पर सच है कि मुस्लिम समुदाय खुद को अपने से अलग समझने की मानसिकता से ग्रस्त है. अगर उनके साथ कुछ गलत होता भी है तो उन्हें यही लगता है कि जाति-धर्म के आधार पर उनके साथ ऐसा हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है. जहां तक घर देने या न देने की बात है तो इस परेशानी से सबको एक न एक दिन दो चार होना पड़ता है, मैं यहां अपनी ही आपबीती का जिक्र करना चाहता हूं, भोपाल जब मैं नौकरी के सिलसिले में गया तो एक अदद कमरा ढूंढने में ही दिन में तारे नजर आ गए. अकेले लड़के को घर देने से ज्यादातर ने साफ मना कर दिया. एक-दो जगह बात बनी भी तो मेरा प्रोफेशन आड़े आ गया. पत्रकारिता से ताल्लुक होने के चलते सबकुछ तय होने के बाद भी गोल-मटोल जवाब देकर चलता कर दिया गया. एक महाश्य से जब मैने फोन पर उनके फ्लैट के संबंध में बात की तो उन्होंने किराया वगैराह सब बता दिया पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं पत्रकार हूं तो घर की कटी बिजली, टूट-फूट की दुहाई देकर कुछ महीने बाद के लिए मामला लटका दिया. बहरहाल किसी न किसी तरह बाद में घर मिल ही गया, पर सोचने वाली बात है कि मैं मुसलमान तो नहीं था फिर मेरे साथ भी ऐसा क्यों हुआ. जायज सी बात है ये एक आम समस्या है, सबकुछ मकान मालिक पर निर्भर करता है, यदि उसे लगता है कि फिल्म स्टार, पत्रकार आदि के साथ वो तालमेल बिठा लेगा तो कोई दिक्कत नहीं, यहां मुस्लिम होने या ना होने की बात कहां से आ गई. हाशमी साहब और उनके जैसे कलाकारों से मेरा यही निवेदन है कि हर इक बात को जाति-धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. और भी लोग हैं, जिन्हें परेशानी होती है पर वो तो कभी इस आधार पर रोना नहीं रोया करते.
नीरज नैयर
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शनिवार, 1 अगस्त 2009
शेख साहब
नीरजा सलाखों के पीछे की दुनिया देख रही थी। वो दुनिया जिसमें जिंदगी जी नहीं जाती, केवल काटी जाती है। जहाँ इंसान जीता नहीं केवल जिंदा रहता है। बहुत से कैदी अपने-अपने प्रायश्चित के साथ अपने दर्द को विराम दे रहे थे। नीरजा उन्हीं को देखते हुए आगे बढ़ रही थी। तभी एक कैदी की दर्दनाक चीख सुनाई दी जो एक मैदान से आ रही थी। उसके कदम उस दिशा में आगे बढ़े। पास जा कर देखा, तो कुछ जेलकर्मी एक कैदी को टॉचर्र कर रहे थे। वह सहम उठी। उसने हवलदार से पूछा - ये क्या हो रहा है ?
- मैडम, यह कैदी काम करने से इंकार कर रहा है,
- आखिर क्यों?
- क्योंकि यह अपने आपको बड़ा अपराधी मानता है और छोटे काम करने से इंकार करता है।
- नीरजा वहाँ से आगे बढ़ गई। पीछे से उसे दो-तीन आवाजें सुनाई दी-
- नहीं, यह ऐसे नहीं मानेगा। इसे तो शेख साहब के पास भेजना ही होगा।
- हाँ, शेख साहब ही इसे ठीक कर सकते हैं।
- पीछले चार खतरनाक कैदियों को भी तो शेख साहब ने ही झेला था। यह उन्हीं के बस की बात है।
- हाँ, हाँ, यह काम शेख साहब ही कर सकते हैं।
नीरजा ने उनकी बात ध्यान से सुनी और फिर अपने मकसद के लिए आगे बढ़ गई। वह मनोविज्ञान अंतिम वर्ष की छात्रा थी और मानवीय संवेदनाओं पर शोध कर रही थी। उसी सिलसिले में वह कैदियों के जीवन के बारे में जानने के लिए यहाँ आई हुई थी। जेलर वर्मा से मिलते ही उसने पहला सवाल किया - शेख साहब कौन है ? अभी-अभी कुछ लोग किसी शेख साहब का जिक्र कर रहे थे। मैं उनसे मिलना चाहती हूँ। जेलर वर्मा मुस्करा दिए और हवलदार को आदेश दिया कि मैडम शेख साहब से मिलना चाहती है। इन्हें शेख साहब के पास ले जाओ। हवलदार ने नीरजा को शेख साहब के कमरे के पास ले जाक र छोड़ दिया।
इन दो-चार कदम की दूरी में ही उसने मन ही मन में शेख साहब की एक छवि तैयार कर ली थी। आखिर मनोविज्ञान की छात्रा जो ठहरी। एक रौबदार, ऊँची कद-काठी का खूँखार व्यक्तित्व। लेकिन यह क्या ? जब वह कमरे में पहुँची तो एक साधारण बुजुर्ग से सामना हुआ। वह रौबदार ऊँची कद-काठी का व्यक्तित्व धूमिल हो गया। शेख साहब ने उसे नम्रतापूर्वक कुर्सी पर बैठने को कहा। वह एक पल को अचकचाई, मन में विचार आया कि कहीं मैं $गलत कमरे में तो नहीं आ गई।
वह पूछ बैठी - आप ही हैं - शेख साहब ?
वे हंसते हुए बोले - हाँ, बेटी। मैं ही हूँ शेख साहब।
मैंने तो सुना था कि आप कैदियों को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, लेकिन आपको देख ऐसा नहीं लगता।
- सच कह रही हो बेटी। मुझे देखकर कोई भी इस पर विश्वास नहीं करेगा। मगर मैं ही यहाँ यह नेक काम करता हूँ।
- कैसे करते हैं, आप यह सब ?
- बड़ी सादगी से। मेरी टेबल पर यह पुस्तक देख रही हो।़ यह कविताओं की पुस्तक है। इस कमरे को ही गौर से देखो- क्या तुम्हें यह कमरा देख कर लगता है कि यहाँ किसी कैदी को टॉचर्र किया जाता होगा ? उसने ध्यान से देखा - सचमुच, वहाँ कोइ ऐसा सामान नहीं था। पिस्तौल, लाठी, हथकड़ी कुछ भी नहीं। प्रकृति से जुड़ी हुई दो-चार सुंदर पेंटिग्स, हल्का मधुर संगीत, कुछ किताबें और टेबल पर भी पड़ी हुई यह पुस्तकें। बस इसके सिवा वहाँ और कुछ न था।
शेख साहब हंस कर बोले - यही है इस कमरे की सच्चाई, मेरी सच्चाई। जैसा मैं खुद हूँ, वैसी ही मेरे आसपास की दुनिया है। मैं वैसा ही लोगों को देखना चाहता हँू और इसके लिए पूरी कोशिश करता हूँ। हम मनुष्य हैं, ईश्वर या $खुदा द्वारा बनाई गई एक अनुपम कृति। ईश्वर ने हमारे भीतर संवेदनाएँ कूट-कूट कर भरी है, मगर आज की इस भागदौड़ की $िजदगी में, कुछ कर गुजरने की ख्वाईश में हमारी संवेदनाएँ बहुत पीछे छूट गई, और इंसान, इंसान से हैवान बन बैठा। उसने वह सब किया, जो $गलत था और आज भी वह $गलत किए जा रहा है। यही $गलती उसे सलाखों के पीछे ले आती है। वह यहाँ आना नहीं चाहता मगर उसकी करनी, उसकी नासमझी उसे इस घोर अंधकार में लाकर पटक देेती है। यहाँ लोहे की सलाखें उसे कैदी नाम देती है। मैं कुछ नहीं करता। बस, इन कैदियों के अंदर सोई पड़ी संवेदनाओं को जगाता हूँ। जिसमें यह किताबें मेरा सहयोग करती है। मैं मार्मिक शब्दों के जाल में इन्हें उलझाकर इनके भीतर के इंसान को जगाता हूँ। फिर इन्हें प्रायश्चित का सीधा और सरल मार्ग दिखाता हूँ। इसके लिए शब्द मुझे इन्हीं कविताओं से मिलते हैं। मैं कविताओं के कोड़े मारता हूँ और इनकी संवेदनाओं को सच्चाई के रूप में जगाता हॅंू और प्रतिफल के रूप में फिर एक नई कविता को जन्म देता हूँ। यह नई कविता फिर एक नये कैदी को नया जन्म देती है, उसकी मार्मिक वेदनाओं को एक आकार देती है। जब कैदी यहाँ से बाहर जाता है, तो एक इंसान के रूप में बाहर जाता है। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनता हूँ और कोशिश करता हूँ कि लगातार इस कार्य में सफल होता रहूँ। मेरा खुदा, तुम्हारा ईश्वर यदि मेरा इस काम में सहयोग करते हैं, तो मेरा हौसला और बढ़ जाता है। मेरा मार्मिक शब्दकोष दुगुना हो जाता है।
- लेकिन शेख साहब, आपने यह रास्ता क्यों अपनाया ?
- बेटी, मेरे चेहरे की इन झुर्रियों में आजादी की कहानी छिपी हुई है। मेरी इन आँखों ने आजादी की वो जंग देखी है, जिनकी सच्चाई आज के युवाओं के लिए किस्से-कहानी के अलावा और कुछ नहीं। अँगरेज़ों के अत्याचार... देेशप्रेम की भावना... आज़ादी के लिए मर-मिटने का जज़्बा... और अंत में जब सपना साकार हुआ तो बजाय उसे सहेजने के एक-दूसरे के दुश्मन बन जाना... मार-काट, तबाही के भयानक तांडव को झेलने के बाद फिर उसी तांडव को करने के लिए एक-दूसरे को प्रेरित करना... भाई-भाई के बीच मतभेद की दिवार बनाना... और अंत में अपने भीतर के ही इंसान को मार डालना...मैंने आजादी के बाद हुए साम्प्रादायिक दंगों में अपने भीतर के इंसान को हिचकियों में रोते देखा है... और इसीलिए मैंने तय किया कि नहीं, मैं अपने भीतर के इंसान को इसतरह बेबस और लाचार नहीं होने दूँगा। मैं केवल अपने भीतर के ही नहीं अपने आसपास के लोगों के भीतर भी जो इंसानियत है, उसे जिंदा रखने का प्रयास करूँगा। इस प्रयास में लोगों को करीब से जानना जरूरी था। इसीलिए मैंने मनोविज्ञान विषय को चुना। इस विषय पर पीएच.डी करने के बाद मुझे लगा यह जेल ही ऐसी जगह है, जहाँ मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो सकता है। फिर क्या था, जब मंजिल चुन ली, तो रास्ता आसान हो गया और मैं इंसानियत जगाने के इस रास्ते पर चल पड़ा।
नीरजा अवाक हो कर उनकी बातें सुनती रही। उनके शब्द उसके हृदय में उतरते चले गए। वह नहीं जानती थी कि क्रूर कैदियों के बीच, इस वातावरण में रहने वाला कोई एक इंसान इतना संवेदनशील भी हो सकता है कि मात्र अपने शब्दो को ही आधार बनाकर किसी की अंतरात्मा को जगा सकता है।
आज जहां क्रूरता अपनी चरम सीमा पर है, वीभत्सता का नंगा तांडव हो रहा है, अनाचार और अत्याचार की गूँज कानों को बेध रही है, लोग इस हिंसक वातावरण में जिंदा रहने को विवश है, ऐसे में एक आदमी अपनी लेखनी से शांति की अलख जगा रहा है। लोगों के हृदय में छुपी हुई संवेदनाओं की कली को चटकाने की पूरजोर कोशिश कर रहा है और इसमें कामयाब भी हो रहा है। पूरे विश्वास के साथ इस विरोधी वातावरण में यह प्रयत्न कर रहा है, एक ऐसी कोंपल उगाने की, जो फूलों से आच्छादित होगी। उसकी महक वातावरण को महकाएगी और जीवन सरस, सजीव हो उठेगा। उसका यह प्रयास कभी खत्म न होगा, निरंतर चलता रहेगा। ऐसे जोशीले इन्सान के सामने नतमस्तक हो उठी नीरजा। शेख साहब से मिलकर उसका मकसद पूरा हो चुका था।
भारती परिमल
- मैडम, यह कैदी काम करने से इंकार कर रहा है,
- आखिर क्यों?
- क्योंकि यह अपने आपको बड़ा अपराधी मानता है और छोटे काम करने से इंकार करता है।
- नीरजा वहाँ से आगे बढ़ गई। पीछे से उसे दो-तीन आवाजें सुनाई दी-
- नहीं, यह ऐसे नहीं मानेगा। इसे तो शेख साहब के पास भेजना ही होगा।
- हाँ, शेख साहब ही इसे ठीक कर सकते हैं।
- पीछले चार खतरनाक कैदियों को भी तो शेख साहब ने ही झेला था। यह उन्हीं के बस की बात है।
- हाँ, हाँ, यह काम शेख साहब ही कर सकते हैं।
नीरजा ने उनकी बात ध्यान से सुनी और फिर अपने मकसद के लिए आगे बढ़ गई। वह मनोविज्ञान अंतिम वर्ष की छात्रा थी और मानवीय संवेदनाओं पर शोध कर रही थी। उसी सिलसिले में वह कैदियों के जीवन के बारे में जानने के लिए यहाँ आई हुई थी। जेलर वर्मा से मिलते ही उसने पहला सवाल किया - शेख साहब कौन है ? अभी-अभी कुछ लोग किसी शेख साहब का जिक्र कर रहे थे। मैं उनसे मिलना चाहती हूँ। जेलर वर्मा मुस्करा दिए और हवलदार को आदेश दिया कि मैडम शेख साहब से मिलना चाहती है। इन्हें शेख साहब के पास ले जाओ। हवलदार ने नीरजा को शेख साहब के कमरे के पास ले जाक र छोड़ दिया।
इन दो-चार कदम की दूरी में ही उसने मन ही मन में शेख साहब की एक छवि तैयार कर ली थी। आखिर मनोविज्ञान की छात्रा जो ठहरी। एक रौबदार, ऊँची कद-काठी का खूँखार व्यक्तित्व। लेकिन यह क्या ? जब वह कमरे में पहुँची तो एक साधारण बुजुर्ग से सामना हुआ। वह रौबदार ऊँची कद-काठी का व्यक्तित्व धूमिल हो गया। शेख साहब ने उसे नम्रतापूर्वक कुर्सी पर बैठने को कहा। वह एक पल को अचकचाई, मन में विचार आया कि कहीं मैं $गलत कमरे में तो नहीं आ गई।
वह पूछ बैठी - आप ही हैं - शेख साहब ?
वे हंसते हुए बोले - हाँ, बेटी। मैं ही हूँ शेख साहब।
मैंने तो सुना था कि आप कैदियों को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, लेकिन आपको देख ऐसा नहीं लगता।
- सच कह रही हो बेटी। मुझे देखकर कोई भी इस पर विश्वास नहीं करेगा। मगर मैं ही यहाँ यह नेक काम करता हूँ।
- कैसे करते हैं, आप यह सब ?
- बड़ी सादगी से। मेरी टेबल पर यह पुस्तक देख रही हो।़ यह कविताओं की पुस्तक है। इस कमरे को ही गौर से देखो- क्या तुम्हें यह कमरा देख कर लगता है कि यहाँ किसी कैदी को टॉचर्र किया जाता होगा ? उसने ध्यान से देखा - सचमुच, वहाँ कोइ ऐसा सामान नहीं था। पिस्तौल, लाठी, हथकड़ी कुछ भी नहीं। प्रकृति से जुड़ी हुई दो-चार सुंदर पेंटिग्स, हल्का मधुर संगीत, कुछ किताबें और टेबल पर भी पड़ी हुई यह पुस्तकें। बस इसके सिवा वहाँ और कुछ न था।
शेख साहब हंस कर बोले - यही है इस कमरे की सच्चाई, मेरी सच्चाई। जैसा मैं खुद हूँ, वैसी ही मेरे आसपास की दुनिया है। मैं वैसा ही लोगों को देखना चाहता हँू और इसके लिए पूरी कोशिश करता हूँ। हम मनुष्य हैं, ईश्वर या $खुदा द्वारा बनाई गई एक अनुपम कृति। ईश्वर ने हमारे भीतर संवेदनाएँ कूट-कूट कर भरी है, मगर आज की इस भागदौड़ की $िजदगी में, कुछ कर गुजरने की ख्वाईश में हमारी संवेदनाएँ बहुत पीछे छूट गई, और इंसान, इंसान से हैवान बन बैठा। उसने वह सब किया, जो $गलत था और आज भी वह $गलत किए जा रहा है। यही $गलती उसे सलाखों के पीछे ले आती है। वह यहाँ आना नहीं चाहता मगर उसकी करनी, उसकी नासमझी उसे इस घोर अंधकार में लाकर पटक देेती है। यहाँ लोहे की सलाखें उसे कैदी नाम देती है। मैं कुछ नहीं करता। बस, इन कैदियों के अंदर सोई पड़ी संवेदनाओं को जगाता हूँ। जिसमें यह किताबें मेरा सहयोग करती है। मैं मार्मिक शब्दों के जाल में इन्हें उलझाकर इनके भीतर के इंसान को जगाता हूँ। फिर इन्हें प्रायश्चित का सीधा और सरल मार्ग दिखाता हूँ। इसके लिए शब्द मुझे इन्हीं कविताओं से मिलते हैं। मैं कविताओं के कोड़े मारता हूँ और इनकी संवेदनाओं को सच्चाई के रूप में जगाता हॅंू और प्रतिफल के रूप में फिर एक नई कविता को जन्म देता हूँ। यह नई कविता फिर एक नये कैदी को नया जन्म देती है, उसकी मार्मिक वेदनाओं को एक आकार देती है। जब कैदी यहाँ से बाहर जाता है, तो एक इंसान के रूप में बाहर जाता है। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनता हूँ और कोशिश करता हूँ कि लगातार इस कार्य में सफल होता रहूँ। मेरा खुदा, तुम्हारा ईश्वर यदि मेरा इस काम में सहयोग करते हैं, तो मेरा हौसला और बढ़ जाता है। मेरा मार्मिक शब्दकोष दुगुना हो जाता है।
- लेकिन शेख साहब, आपने यह रास्ता क्यों अपनाया ?
- बेटी, मेरे चेहरे की इन झुर्रियों में आजादी की कहानी छिपी हुई है। मेरी इन आँखों ने आजादी की वो जंग देखी है, जिनकी सच्चाई आज के युवाओं के लिए किस्से-कहानी के अलावा और कुछ नहीं। अँगरेज़ों के अत्याचार... देेशप्रेम की भावना... आज़ादी के लिए मर-मिटने का जज़्बा... और अंत में जब सपना साकार हुआ तो बजाय उसे सहेजने के एक-दूसरे के दुश्मन बन जाना... मार-काट, तबाही के भयानक तांडव को झेलने के बाद फिर उसी तांडव को करने के लिए एक-दूसरे को प्रेरित करना... भाई-भाई के बीच मतभेद की दिवार बनाना... और अंत में अपने भीतर के ही इंसान को मार डालना...मैंने आजादी के बाद हुए साम्प्रादायिक दंगों में अपने भीतर के इंसान को हिचकियों में रोते देखा है... और इसीलिए मैंने तय किया कि नहीं, मैं अपने भीतर के इंसान को इसतरह बेबस और लाचार नहीं होने दूँगा। मैं केवल अपने भीतर के ही नहीं अपने आसपास के लोगों के भीतर भी जो इंसानियत है, उसे जिंदा रखने का प्रयास करूँगा। इस प्रयास में लोगों को करीब से जानना जरूरी था। इसीलिए मैंने मनोविज्ञान विषय को चुना। इस विषय पर पीएच.डी करने के बाद मुझे लगा यह जेल ही ऐसी जगह है, जहाँ मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो सकता है। फिर क्या था, जब मंजिल चुन ली, तो रास्ता आसान हो गया और मैं इंसानियत जगाने के इस रास्ते पर चल पड़ा।
नीरजा अवाक हो कर उनकी बातें सुनती रही। उनके शब्द उसके हृदय में उतरते चले गए। वह नहीं जानती थी कि क्रूर कैदियों के बीच, इस वातावरण में रहने वाला कोई एक इंसान इतना संवेदनशील भी हो सकता है कि मात्र अपने शब्दो को ही आधार बनाकर किसी की अंतरात्मा को जगा सकता है।
आज जहां क्रूरता अपनी चरम सीमा पर है, वीभत्सता का नंगा तांडव हो रहा है, अनाचार और अत्याचार की गूँज कानों को बेध रही है, लोग इस हिंसक वातावरण में जिंदा रहने को विवश है, ऐसे में एक आदमी अपनी लेखनी से शांति की अलख जगा रहा है। लोगों के हृदय में छुपी हुई संवेदनाओं की कली को चटकाने की पूरजोर कोशिश कर रहा है और इसमें कामयाब भी हो रहा है। पूरे विश्वास के साथ इस विरोधी वातावरण में यह प्रयत्न कर रहा है, एक ऐसी कोंपल उगाने की, जो फूलों से आच्छादित होगी। उसकी महक वातावरण को महकाएगी और जीवन सरस, सजीव हो उठेगा। उसका यह प्रयास कभी खत्म न होगा, निरंतर चलता रहेगा। ऐसे जोशीले इन्सान के सामने नतमस्तक हो उठी नीरजा। शेख साहब से मिलकर उसका मकसद पूरा हो चुका था।
भारती परिमल
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कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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गुरुवार, 30 जुलाई 2009
छत्तीसगढ़ की संस्कृति

विनोद वर्मा
पांच हजार वर्षों के इतिहास में छत्तीसगढ़ का निर्माण अलग-अलग जातियों, जनों और संस्कृतियों से हुआ. कालखंडों के हिसाब से देखें तो ३५०० ईसा पूर्व ऑस्ट्रिक समूह के लोग छत्तीसगढ़ पहुंचे. यह समूह ऑस्ट्रेलिया से आया. ये लोग पूर्वी भारत से होकर यहां पहुंचे. इसके बाद यानी २५०० ई.पूर्व द्रविड़ समूह के लोग आए. ये लोग सिन्धु क्षेत्र से यहां आए थे. इतिहासकार १५०० ईसा पूर्व को आर्यों के आगमन का समय मानते हैं. इन सबने मिलकर छत्तीसगढ़ का समाज तैयार किया.
ऑस्ट्रिक व द्रविड़ समूह के जो लोग बस्तर व सरगुजा के जंगलों में रह गए वे जनजाति के रूप में वर्ग विहीन समाज में रह गए. जो मैदानी हिस्सों में पहुंच गए, वे वर्ग विभाजित समाज में आ गए. इस सभ्यता में अपनी विसंगतियां थीं, अपने विरोधाभास थे. धार्मिक या जातीय कट्टरवाद छत्तीसगढ़ की संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा. वह आमतौर पर बाहरी तत्वों को आत्मसात करने की सहज प्रवृत्ति में रहा है.
इस खुलेपन का असर संस्कृति पर साफ़ दिखाई देता है. छत्तीसगढ़ में जैसी सांस्कृतिक विविधता है वैसी कम ही जगह दिखाई देती है. एक ओर जनजातीय सांस्कृतिक विरासत है तो दूसरी ओर जनजातियों से इतर जातियों के बीच पनपी संस्कृति है. एक ओर घोटुल है तो दूसरी ओर पंडवानी है, नाचा है, रहस है और पंथी नृत्य है. कबीर से लेकर गुरुघासीदास तक की एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा भी यहीं हैं.
छत्तीसगढ़ का समाज आमतौर पर एक नाचता गाता समाज है जो अपनी ज़िम्मेदारियों को भी इसी नाच-गाने के बीच सामूहिक रुप से उठाता रहा है. गीत इस समाज के लिए जीवन का हिस्सा है और नाच किसी अनुष्ठान की तरह पवित्र कार्य.
आमतौर पर छत्तीसगढ़ में ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ कम हैं जिनमें स्त्री और पुरुषों की भागीदारी बराबरी की न हो. संकोची प्रवृत्ति के होने के बावजूद आदिवासी भी हर गतिविधि में महिलाओं की भागीदारी को बराबर बनाए रखते हैं. मैदानी इलाक़ों में स्वाभाविक रुप से थोड़ा बदलाव आया है लेकिन स्त्रियाँ अभी नेपथ्य में नहीं गई हैं. राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी प्रदेशों की तुलना में छत्तीसगढ़ में महिलाओं को लेकर ज़्यादा खुलापन है और उन्हें बराबरी के स्वाभाविक अधिकार कमोबेश मिले हुए हैं. वह घूंघट में रहने और अपनी बात न कह पाने जैसी मजबूरियों में नहीं होती.

खान-पान में ऐसी विविधता है कि आश्चर्य होता है. हालांकि ये स्वाभाविक दिखता है क्योंकि एक बड़ा हिस्सा अभी भी जंगल के इलाक़ों में रहता है. आमतौर पर चावल और चावल से बने व्यंजनों से ही जीवन चलता है.आत्मसात करने वाला समाज
लोक कलाओं व लोक परंपराओं के बीच छत्तीसगढ़ की अपनी एक अलग सांस्कृतिक छवि है. इस छवि में वह जनजातियों के बीच शहर से आने वाले प्रजातियों को आत्मसात करता रहा है. आक्रांताओंठ ने इसे बार-बार दबाया, कुचला, उसकी छवि को बदलने की कोशिश की, परन्तु छत्तीसगढ़ ने अपना विरोध अत्याचार के विरोध तक सीमित रखा. आदिवासियों के भूमकाल को छोड़ दें तो कभी इस धरती से किसी को हटाने का प्रयास नहीं किया. चाहे वे दक्षिण से आए लोग हों या उत्तर से, जो आया उसे छत्तीसगढ़ने आत्मसात कर लिया.बहुत सी जातियां तो यहां की होकर रह गईं और कुछ ने आग्रह पूर्वक अपनी पुरानी पहचान बनाई रखी. यही कारण है कि छत्तीसगढ़की परंपराओं व खान-पान का संबंध देश के कई हिस्सों से जुड़ता है.
इन सबके बीच यह ज़रुर हुआ कि छत्तीसगढ़ के लोगों में निजता का भाव कभी पैदा न हो पाया और इसके चलते वे अपनी धरती से जुड़े होने का गौरव कभी नहीं हासिल कर सके. इससे वे अपने आपको शोषण का शिकार पाते रहे और उनमें हीनता की भावना आ गई. छत्तीसगढ़राज्य का आंदोलन जितनी बार उभरा चाहे वो 1967 हो या 1999 हर बार यह “छत्तीसगढ़िया” और “गैर-छत्तीसगढ़िया” के सवाल पर अटका. आज जब छत्तीसगढ़राज्य बन चुका है यह सवाल फिर समाज के सामने मुंह बाए खड़ा है. इसके पीछे राजनीतिक समीकरण भी हैं पर यदि राजनीतिक समाज ने सामाजिक समाज के समीकरणों को बदला तो यह कोई अच्छा परिवर्तन तो नहीं ही होगा.
विनोद वर्मा
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
बुधवार, 29 जुलाई 2009
यह दुर्भाग्यपूर्ण है?

प्रिय साथी,
हमारे मतबल पत्रकार के अस्तित्व को कभी आंच नहीं आ सकती क्योंकि मुफलिसी
का रास्ता हमने चुन लिया है किन्तु हमारे हक पर डाका डालने का उपक्रम लगातार किया जाता रहा है। खबर छपी है
कि लवगुरु मटुकनाथ पत्रकारिता करेंगे। यह खबर मुझे ठीक नहीं लगी। जो पुराने साथी हैं उन्हें यह जरूर पता होगा कि बैंकों और टीचिंग प्रोफेशन से जुड़े लोग किस तरह पूर्णकालिक पत्रकारों के हक पर डाका डालते रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर मेरी टिप्पणी आपके अवलोकनार्थ प्रेषित है। संभव हैं कि आप मेरी राय से सहमत हों या न भी हो। दोनों ही सूरत में मेरे आलेख पर
अपनी टिप्पणी जरूर भेजें।
मनोज कुमार
सम्पादक
समागम मीडिया साथियों की मासिक पत्रिका
भोपाल
मो. 09300469918
अभी अभी अखबार में खबर पढ़ रहा था कि लवगुरु के नाम से ख्यातिलब्ध प्रोफेसर मटुकनाथ को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है। यह रोजनामचा की खबर थी और इसके आगे की खबर चौंकाने वाली थी कि मटुकनाथ अब पत्रकारिता करेंगे। मैं समझता हूं कि पत्रकारिता में मुझ जैसे रोज घिसने वाले पत्रकारों को यह खबर पढ़कर पीड़ा हो रही होगी कि पत्रकारिता को मटुकनाथ और उन जैसे लोगों ने सराय बना लिया है जो कहीं के नहीं हुए तो पत्रकारिता का रास्ता पकड़ लिया। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात मानता हूं कि पत्रकारिता के लिये न तो शिक्षा का बंधन है और न अनुभव की कोई समयसीमा। जब चाहा
पत्रकारिता का रास्ता पकड़ लिया और जब चाहा छोड़ दिया। इस मुद्दे के बरक्स मेरे दिमाग में कुछ सवाल कौंधे कि आखिर पत्रकारिता क्या है? क्या वह पेशा है अथवा मिशन? पत्रकारिता रोजगार है अथवा पेशन? पत्रकार कौन हो सकता है?
किसी भी क्षेत्र से नाकामयाब हो गये लोग या कहीं से हटाये गये लोग या फिर वो जिसने तय कर लिया है कि उसे फिकरापरस्ती मंजूर है? ये सवाल अचानक नहीं उठे हैं बल्कि पत्रकारिता की सीमा को लेकर, उसके आचरण को लेकर और उसकी मर्यादा को लेकर समय समय पर सवाल उठाया जाता रहा है और जब जरूरत होती है पत्रकारिता की छांह में अथवा उसकी आड़ में खुद को महफूज़ कर लिया जाता है।
मटुकनाथ के पत्रकारिता में प्रवेश को लेकर हमारे एक दोस्त सहमत हैं। उन्हें लगता है कि इस पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए। वे पत्रकारिता की शिक्षा के रास्ते अखबारों से होते हुए प्रोफेसरी कर रहे हैं। शायद इसलिये वे मटुकनाथ के पत्रकारिता में आने में कोई दिक्कत नहीं देखते हैं बल्कि वे उन्हें सेलिब्रेटी की नजर से देखते हैं लेकिन पत्रकारिता को
सेलिब्रेटी की जरूरत नहीं है बल्कि एक संजीदा पत्रकार की जरूरत है जो दिल की सुनता है जो परायों के दर्द को अपना समझता है। इस दर्द को अपनाने में उसे सिर्फ और सिर्फ तकलीफ मिलती है और इस तकलीफ में भी वह खुश रहता है। मटुकनाथ क्या ऐसा दर्द झेल पाएंगे? क्या उन्हें मुफलिसी मंजूर होगी? इस सवाल का जवाब तो खुद मटुकनाथ दे सकते हैं।
एक मौजू सवाल यह भी है कि मंदी के बहाने को लेकर रोज-रोज अखबारों और टेलीविजन में छंटनी हो रही है। तनख्वाह में कटौती हो रही है। ऐसे में मटुकनाथ जैसे लोगों के आने से कुछ और साथियों के हक पर डाका नहीं डलेगा?
आप सबको यह तो पता होगा ही कि अखबारों में अंशकालिक उपसम्पादक और मैग्जीन सेक्सन में ऐसे अनेक लोग काम करते हैं जो पहले से किसी बैंक अथवा टीचिंग प्रोफेशन में हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें पत्र प्रबंधन कम वेतन देकर रख
लेता है और वे उसे मंजूर कर लेते हैं और इससे एक प्रोफेशन जर्नलिस्ट बेरोजगार हो जाता है। यह सिलसिला अभी बंद नहीं हुआ है। बहुत सारे काबिल साथियों को अपने परिवार चलाने के लिये मारामारी करनी होती है और ये अंशकालिक लोग अपनी स्थायी नौकरी की मोटी तनख्वाह के बाद भी एक पत्रकार को बेकार रहने पर मजबूर करते हैं और ऐसे में मटुकनाथ जैसे लोगों के आने के बाद स्थिति बिगड़ेगी ही।
एक और बात। मटुकनाथ के सवाल पर तर्क यह भी दिया जाता है कि व्यवसायी से लेकर अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी पत्रकारिता में आ रहे हैं। मैं उन लोगों को बताना चाहूंगा कि वे लोग पत्रकारिता में नहीं आ रहे हैं बल्कि वे इस मीडियम में आ रहे हैं और वे मालिक हैं न कि पत्रकार। किसी अखबार पत्रिका का प्रकाशन करना अथवा टेलीविजन चैनल शुरू करने का अर्थ पत्रकारिता करना नहीं है बल्कि उस मीडियम का स्वामी बनना है।
मनोज कुमार
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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सोमवार, 27 जुलाई 2009
न सावन, न सावन के झूले

डॉ महेश परिमलअपनी पूरी मस्ती और शोख अदाओं के साथ सावन कब हमारे सिरहाने आकर चुपचाप खड़े हो गया, हमें पता ही नहीं चला। हमारी आँखों का सावन तो कब का सूख चुका। हाँ बिटिया कॉलेज जाने की तैयारी करते हुए कुछ गुनगुनाती है, तब लगता है, उसका सावन आ रहा है। कई आँखें हैं, जिनमें हरियाला सावन देखता हूँ, पर उससे भी अधिक सैकड़ों आँखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है। उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन?
सावन कई रूपों में हमारे सामने आता है। किसान के सामने लहलहाती फसल के रूप में, व्यापारी के सामने भरे हुए अनाज के गोदामों के रूप में, अधिकारी के सामने नोटों से भरे बैग के रूप में और नेता के सामने चुनाव के पहले मतदाता के रूप में और चुनाव के बाद स्वार्थ में लिपटे धन के रूप में। सबसे अलग सावन होता है युवाओं का। प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता। इनके सावन की मस्ती का म$जा तो न पूछो, तो ही अच्छा!
इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गाँव में चले जाएँ, जहांँ पेड़ों पर झूला डाले किशोरियाँ, नवयुवतियाँ या फिर महिलाएँ अनायास ही दिख जाएँगी। सावन के ये झूले मस्ती और अठखेलियों का प्रतीक होते हैं। यही झूला हम सबको मिला है माँ की बाँहों के रूप में। कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी या फिर दीदी की बाँहों का झूला। भला कौन भूल पाया है?
बचपन का सावन याद है आपको? मुझे याद है, मेरे सामने जातियों में बँटी देश की सामाजिक व्यवस्था के सावन का चित्र है। पूरे गाँव में आम, नीम, इमली के पेड़ों पर कई जगह झूले बाँधे जाते थे, हम सब उस पर झूलते थे। ऐसा नहीं था कि केवल किशोरियाँ या स्त्रियाँ ही झूलती हों। किशोर, अधेड़, बच्चे सभी झूलते थे। विशेष बात यह थी कि सभी जाति के लोग झूलते थे। जिस झूले पर ब्राह्मण का छोरा झूलता, उसी पर पहले या बाद में हरिजन की छोरी या छोरा भी झूलता था। एक बात अवश्य थी, सब साथ-साथ नहीं झूलते थे। जातिगत दूरी बनी ही रहती थी। यह दूरी झूले, रस्सी, पेड़ और स्थान को लेकर नहीं थी, व्यक्ति को लेकर थी। कुछ लोग हमें अपने समय पर झूलने का आनंद नहीं लेने देते थे। हम साथियों के साथ उन्हें झूलता देखते रहते। दिन में तो हमें झूुलने का अवसर कम ही मिलता। पर रात को, उस वक्त तो मैदान साफ मिलता। हम कुछ लोग रात में ही झूलते। खूब झूलते।

मुझे याद है, कुछ हरिजन छोरे भी मेरे दोस्त थे। दिन में तो झूले जातियों में बँट जाते थे, पर रात में यह दायरा हम तोड़ देते थे। उस वक्त सारे भेदभाव अंधेरे में डूब जाते। हम दो-दो या तीन-तीन दोस्त साथ-साथ झूलते। झूलने का म$जा तब तक नहीं आता, जब तक कोई लोकगीत न हो। हम बच्चे थे, लोकगीत तो याद नहीं थे, सो पाठ्यपुस्तक की कोई कविता, कोई फिल्मी गीत या फिर कबीर, रसखान, सूर-तुलसी के पद, मीरा के दोहे या फिर झाँसी की रानी के गीत ही गाने लगते। बड़ा अच्छा लगता। रात गहराती, बिजली चमकती, बादल गरजते, तो हम चुपचाप माँ के पास आकर दुबक जाते। ऐसा होता था हमारा सावन।
आज सावन बदल गया है। आने के पहले खूब तपिश देता है, अपने आगमन का विज्ञापन करता है। छतरी, बरसाती, रेनकोट, तालपत्री के रूप में। पर जब कभी यह रात में आ धमकता है, तो सारे विज्ञापन धराशायी हो जाते हैं। न तालपत्री काम आती है, न पन्नियाँ, और न ही रेनकोट। गृहस्थी की पूरी झाँकी तैरती रहती है, ढहने की तैयारी करती झोपड़ी में। सावन अमीरों के यहाँ भी आता है, पर रात में ही कुछ म$जदूर लग जाते हैं, बंगले का पानी उलीचने में। नाली खोद दी जाती है, पानी झोपड़पट्टी की तरफ जाने लगता है। रात में बिजली धोखा न दे जाए, इसलिए नया इन्वर्टर खरीदा जाता है। बच्चों के झूलने के लिए एक सीट वाला आधुनिक झूला हॉल में लगा दिया जाता है, पर इसमें वह म$जा कहाँ? जो उस झोपड़पट्टी के सामने एक पेड़ पर साइकिल के खराब टायरों से बने झूले में है। बच्चे उस पर झूलते हैं, मस्तियाते-बतियाते हैं और फिर गिरने पर रो-रोकर घर चले जाते हैं।
सावन... कभी पनीली आँखों का सावन, सूखी आँखों का रेगिस्तानी सावन, खाली बैठे शहरी म$जदूर का सावन, लोकगीतों के साथ खेतों में बुवाई करती महिलाओं का सावन, बीज के लिए क$र्ज देते व्यापारी का सावन, बाइक पर सरपट भागते युवाओं का सावन, घर में कैद होकर खेलते बच्चों का सावन... कितने रूप हैं सावन तुम्हारे... ? तुम्हारे रंग की भी कोई सीमा नहीं। सावनी रंग जिस चेहरे पर है, समझो उसके पौ-बारह। यूँ ही हर किसी के चेहरे पर नहीं खिलता सावनी रंग।
रंगों की रंगत में सावनी झूलों की डोर अब भीगने लगी है। टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन। हम तुम्हें सर-आँखों पर बिठा सकते हैं, पर तबाही का मंजर लेकर मेरे देश के किसी शहर में मत आना सावन। नहीं तो न बाँहोंं के झूले होंगे, न मस्ती, न अठखेलियाँ। खुशियों को लेकर आओ, तो स्वागत है तुम्हारा मेरे देश के हरियाले-मस्त सावन......
डॉ महेश परिमल
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ललित निबंध
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शनिवार, 25 जुलाई 2009
जांच पर हंगामा कितना उचित

नीरज नैयर
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को सुरक्षा जांच से क्या गुजरना पड़ा पूरे मुल्क में बवाल हो गया, धड़ाधड़ प्रतिक्रियाएं आनें लगी, अमेरिकी एयरलाइंस को दोषी करार दिया जाने लगा. संसद में तो तो कुछ माननीय सांसदों ने एयरलाइंस का लाइंसेंस रद्द करने और तलाशी लेने वाले अमेरिकी को देश से निकालने तक की मांग कर डाली. जबकि जिसकी तलाशी ली गई यानी कलाम साहब की वो पूरी तरह खामोश हैं, उन्होंने न तो जांच के वक्त वीवीआई होने का कोई रुबाव झाड़ा और न ही अब कुछ बोल रहे हैं. वो शायद इस बात से सहमत हैं कि सुरक्षा से समझैता नहीं किया जाना चाहिए. कांटिनेंटल एयरलाइंस को अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिमार्टमेंट के ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन यानी टीएस की तरफ से स्पष्ट निर्देश दिए गये हैं कि विमान में सवार होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जांच की जाए. उन्होंने अति विशिष्ट, विशिष्ट लोगों के लिए के लिए अलग से कोई दिशा निर्देश नहीं बनाए हैं. ऐसे में जांच करने वाले अधिकारी महज अपनी नौकरी कर रहे थे, उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि कलाम साहब किस श्रेणी में आते हैं. रुतबे-रुबाब के आगे नियम-कायदे ताक पर रखने की परंपरा सिर्फ हमारे देश में है, दुबई जैसी खाड़ी मुल्क में भी अति विशिष्ट, विशिष्ट माननीयों को हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है, बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि उन्हें आम लोगों की तरह लाइन में नहीं लगना होता. उनके लिए अलग से व्यवस्था की जाती है. यह बात सही है कि पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते अब्दुल कलाम को जांच से छूट मिली है और उनकी जांच नागरिक उड्डयन ब्यूरों के सर्कुलर का सरासर उल्लघंन है. लेकिन कांटिनेंटल एयरलाइंस जिस मुल्क से ताल्लुक रखती है उसके भी अपने कुछ नियम हैं, कहने वाले बिल्कुल ये कह सकते हैं कि भारत में आने के बाद वह यहां के नियम-कानून मानने के लिए बाध्य है. पर जनाब गौर करने वाली बात ये भी है कि एयरलाइंस सुरक्षा के अपने मानकों के ऊपर किसी भी देश के नियमों को हावी नहीं होने देती. इतना सब हो जाने के बाद भी कांटिनेंटल की तरफ से महज खेद जताया गया है, उसने ये कतई नहीं कहा कि फिर ऐसा नहीं होगा, मतलब सुरक्षा उसके लिए सर्वोपरि है. 11 सितंबर 2001 के बाद अमेरिका ने सुरक्षा संबंधि बहुत से कदम उठाए हैं और इसतरह की जांच उसी का एक हिस्सा मात्र हैं, लिहाजा इस पर बेफिजूल का हो-हल्ला करना तर्कहीन ही लगता है. हमारे देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, लोकसभा अध्यक्ष समेत 32 श्रेणियों में आने वाले अतिविशिष्ट लोगों को एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच में छूट मिली हुई है. छूट के दायरे में लोकसभा के स्पीकर, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, लोकसभा व राज्यसभा में विपक्ष के नेता, भारत रत्न से सम्मानित हस्तियां, सुप्रीम कोर्ट के जज, मुख्य निर्वाचन आयुक्चत और धर्मगुरु दलाई लामा भी आते हैं. कुछ वक्त पहले तीनों सेनाओं के प्रमुखों को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया था, यानी उन्हें भी सुरक्षा जांच के लिए नहीं रोका जा सकता, सरकार ने ये फैसला उस वक्त लिया था जब प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वॉड्रा को थलसेना अध्यक्ष के ऊपर रखने पर हंगामा मचा था. रॉबर्ट किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी अति विशिष्टजनों को मिलने वाली छूट का लाभ इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि वो कांग्रेसाध्यक्ष के दामाद हैं. वीवीआईपी, वीआईपी तो दूर की बात हैं, हमारे देश में तो थोड़ी सी ऊंचाई पाने वाला हर व्यक्ति अपने आप को राजा समझने लगता है, मसलन प्रेस का तमगा लगने के बाद पत्रकार पुलिस वालों को कुछ नहीं समझते. सामान्य चेकिंग के दौरान अपने आप को रोका जाना उनकी शान में गुस्ताखी करने जैसा होता है. वो अपने आप को आमजन से ऊपर समझते हैं और चाहते हैं कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए. जो लोग वैश्रो देवी अक्सर जाते रहते हैं उन्होंने गौर किया होगा कि वहां आने वाले आर्मी के जवान सुरक्षा जांच चौकियों पर तैनात पुलिसकर्मियों से अमूमन उलझे रहते हैं, उन्हें यह गंवारा नहीं होता कि कोई पुलिसवाला उनकी तलाशी ले. पुलिसवाले खुद नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने से पीछे नहीं रहते, उन्हें लगता है कि उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है. महज कुछ लोग नहीं बल्कि पूरे मुल्क की मानसिकता ही ऐसी हो गई है कि हम हमेशा अपने आप को निर्धारित नियमों से ऊपर रखना चाहते हैं. अब्दुल कलाम ने जांच में सहयोग करके और बेवजह मामले को तूल न देकर एक उदाहरण पेश किया है, उन्होंने इस संबंध में कोई शिकायत तक नहीं की. वह विदेश यात्रा के दौरान सुरक्षा घेरों का हमेशा पालन करते हैं, दरअसल इस मामले को इतना ऊछालने वाले इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं अगर उनके साथ ऐसा कुछ हो गया तो सारा रुबाब धरा का धरा रह जाएगा, इसलिए वो चाहते हैं कि अमेरिकी एयरलाइंस को सुरक्षा से समझौता न करने का सबक सिखाए जाए. एयरलाइंस के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए गये है और उसे ये सिखाने की पूरी कोशिश की जाएगी कि भारत में वीवीआईपी देश, उसकी सुरक्षा और हर लिहाज से सबसे ऊपर होते हैं, इसलिए अगर उसे भारत में काम करना है तो अपनी प्राथमिकताओं की सूची में सुरक्षा को दूसरा स्थान देना होगा क्योंकि पहले स्थान पर सिर्फ और सिर्फ वीवीआईपी ही आ सकते हैं.
नीरज नैयर
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
लिखो पाती प्यार भरी

डॉ. महेश परिमल
प्रे्रेम पत्र! वही प्रेम पत्र जो शकुंतला ने कदम्ब के पत्तों पर नाखून से लिखकर दुष्यंत को दिया। वाटिका मेें कंगन में पड़ रही परछाई में सीता ने पढ़ा और एकांत में बाँसुरी की मीठी तान में राधा ने सुना। वही प्रेम पत्र या प्रेम संदेश, जो कैस ने रेगिस्तान की गर्म रेत पर ऊँगलियों की पोरों से लैला को लिखा। पानी की डूबती-उतराती लहरों के साथ सोहनी ने महिवाल को दिया। खेत की हरी-हरी लहलहाती फसलों को पार करते राँझा ने हीर तक पहुँचाया।
यह थी भावनाओं और संवेदनाओं की एक अनोखी दुनिया, जहाँ प्रेम और अपनापे की गुनगुनी धूप पत्तों से छनकर धरा तक पहुँचती थी। हृदय से हृदय के तार जुड़े होते थे। तब पत्र में अक्षरों के बीच लिखने वाले की छवि उभरती थी। पत्र पढ़ते हुए कभी आँखें भर आती थी, तो कभी मन खुशी से झूम उठता था। बिन पंखों के मन मयूर कल्पनाओं की ऊँची उड़ानें भर लिया करता था। अपने प्रेमी या प्रेमिका के हाथों लिखा वह पहला खत तो आप भी नहीं भूले होंगे। कितने ही बार उसके नाम को ऊँगलियों के पोरों से सहलाया होगा। अपने होठों से चूमा होगा। पढ़ा तो इतनी बार होगा कि लिखावट आँखों में नहीं, दिल में बस गई होगी। पत्र सिर्फ प्रेमी या प्रेमिका का ही नहीं होता, पत्र माता-पिता, भाई-बहन, स्नेहीजन, मित्रों सभी को एक डोर में बाँधे रखते हैं। माता-पिता के पत्रों में जहाँ संतान के लिए लाड़-दुलार और आशीर्वाद होता है, तो वहीं स्नेेहीजनों के पत्र कुछ संदेश देते हैं, अपनापन लिए हुए होते हैं। माँ की प्यार भरी पाती पढ़ते हुए भला हम अपने बचपन से दूर कैसे रह सकते हैं? पाती पढ़ते हुए, शब्दों की पगडंडियों पर पैर रखते हुए मन का हिरण कभी कुलाँचे भरता है, तो कभी आँखें अनायास ही बचपन की यादों में खो जाती हंै।

सच-सच बताएँगे आप, कितने दिन हो गए आपने अपने प्रियजनों को एक चिट्ठी तक नहीं लिखी? काफी दिन हो गए ना। अब तो याद भी नहीं कि आखिरी बार कब चि_ïी लिखी थी? अब तो सारी बातें फोन या मोबाइल पर हो ही जाती हैं। रही सही कसर एसएमएस और ई-मेल से पूरी हो जाती है। हाल-चाल मालूम चल जाता है। क्या जरूरत है चि_ïी लिखने की? सच कहा आपने, आप कतई गलत नहीं हैं। फोन पर कितना भी बतिया लें, पर जो प्यार स्नेेह भरे पत्रों में उमड़ता है, वह भला फोन की मीठी वाणी में कहाँ? इसे महसूस किया कभी आपने? हम कितने भी 'एडवांसÓ क्यों न हो जाएँ, पत्रों की पवित्रता को नकार नहीं सकते। पत्र हृदय का दर्पण होते हैं। उसकी लिखावट हमें एक आत्मिक संतोष देती है, उससे हम भलीभाँति परिचित होते हैं। लिखावट सामने आते ही डूब जाते हैं, अतीत की सुखद स्मृतियों में। आज भी हमारे पास ऐसे कई पत्र होंगे, जो अनमोल धन की तरह सुरक्षित होंगे ही। उसका एक-एक अक्षर हमें याद होगा। फिर भी हम उसे बार-बार पढऩा चाहेंगे, आखिर क्यों? याद करो, जब हमें अपनी प्रेयसी या प्रेमी का पहला प्यार भरा, खुशबू में सराबोर पत्र मिला था, तब मन में कितनी उमंगें थीं। आज भले ही वह पत्र ढूँढ़े न मिल रहा हो, पर उसकी खुशबू से आप अब भी महक जाते होंगे। पत्र पाते ही उसे चूमा तो होगा ही। सहलाया भी होगा। रात में तकिये के नीचे रखकर सुखद नींद भी ली होगी। खैर छोड़ो, कभी जीवन के क्षेत्र में विफलता भी प्राप्त की होगी, तब माँ-पिताजी, भैया या भाभी, दीदी या छोटी बहना या किसी प्यारे से दोस्त का सांत्वना भरा पत्र तो मिला ही होगा आपको? सच बताएँगे, सम्बल देने वाले उस पत्र को पढ़ते हुए क्या आपकी आँखें नहीं डबडबाई होंगी? कोई गरीब माँ अपने अमीर बेटे को पत्र लिखती होगी या लिखवाती होगी, तो पत्र पाते ही बेटा स्वयं को व्यस्त बताते हुए पत्नी के सामने खीझते हुए कुछ रुपए मनीऑर्डर करने के लिए कह देता होगा, पर रात को चुपचाप अकेले में माँ की अनगढ़ लिखावट को गीली आँखों से चूमते हुए उस बेटे को देखा है भला? उस समय पत्र की संवेदना सीधे माँ-बेटे के बीच होती है। उस वक्त माँ से दुलार पाता है बेटा। तब बेटे को लगता होगा कितना गरीब हूँ मैं, चाँदी के इन चंद सिक्कों के बीच और कितनी अमीर है, मेरी माँ, इन अनगढ़ अक्षरों के साथ। क्या आज ई-मेल, एसएमएस या चेटिंग के माध्यम से संवेदनाओं के तार इस तरह से जुड़ सकते हैं भला?

पत्र आत्मा की आवाज होते हैं, पत्र जीवन बदल देते हैं, पत्रों में केवल विचार ही नहीं होते, उसमें कोमल भावनाएँ भी होती हैं, जो संवेदनाओं के माध्यम से हमारे भीतर तक पहुँचती है। पत्र का एक-एक शब्द हमारे लिए मोती हो जाता है, जब वह किसी बेहद अपने का होता है। पत्र खोलते ही प्रेषक की जानी-पहचानी तस्वीर भी सामने आ जाती है। क्या एक जाने-अनजाने पत्र ने हमें तस्वीरों का चितेरा नहीं बना दिया? कई बार पत्र चुनौती देते से लगते हैं। उसका एक-एक शब्द हमें मुँह चिढ़ाता-सा लगता है। आवेश में हम उसे फाड़कर निकल भी पड़ते हैं, चुनौती को पूरा करने के लिए। शाम हताश हो कर लौटते हैं, देर रात चुपचाप पत्र के एक-एक टुकड़े को जोडऩे का प्रयास करते हैं, शब्दों की इबारत समझने की कोशिश करते हैं, पत्र में प्यार ढूँढ़ते हैं।
ऐसा केवल पत्रों में ही संभव है। पत्र में प्यार छुपा होता है, ममता की घनी छाँव होती है, माँ का दुलार होता है, पिता का आशीष, भैया का स्नेेह, दीदी का प्यार और छोटे भाई-बहनों की चंचलता भी छिपी होती है। रही बात प्रेयसी या प्रेमी के पत्रों की, तो उसमें छलकता है, प्यार-प्यार और केवल प्यार। क्या आप भी आना चाहेंगे पत्रों की इस प्यार भरी दुनिया में? तो आइए .. स्वागत है। तो उठाइए कलम और लिखें एक पाती प्यार भरी....
डॉ. महेश परिमल
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ललित निबंध
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बुधवार, 22 जुलाई 2009
दो महापुरुषों का चिर-स्मरण
23 जुलाई यानी दो महापुरुषों को याद करने का दिन। दोनों ही अपनी अदम्य वीरता के कारण अलग से ही पहचाने जाते हैं। एक तरफ 'स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगाÓ की हुंकार करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक हैं, तो दूसरी तरफ बचपन से अपने आपको आजाद कहने वाले चंद्रशेखर आजाद हैं। दोनों की वीरता के अनेक किस्से हैं। एक जेल में रहकर 'गीता रहस्यÓ लिखते हैं, तो दूसरे अपने शरीर पर पडऩे वाली आततायी की हर बेंत पर 'भारत माता की जयÓ बोलने वाले आजाद हैं। इन दोनों का पूरा जीवन ही देश सेवा में बीता। साहस का अदम्य परिचय देने वाले इन दोनों महापुरुषों को शत-शत नमन......
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक ने देश सेवा तथा समाज सुधार का बीड़ा बचपन में ही उठा लिया था। उनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को हुआ था। पहले उनका नाम बलवंत राव था। वे अपने देश से बहुत प्यार करते थे। उनके बचपन की एक ऐसी ही घटना है, जिससे उनके देशप्रेम का तो पता चलता ही है, साथ ही यह भी पता चलता है कि छोटी-सी अवस्था में ही तिलक में कितनी सूझ-बूझ थी।
बाल गंगाधर तिलक भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे। इन्होंने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन्हें आदर से "लोकमान्य" (पूरे संसार में सम्मानित) कहा जाता था। इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।
उस समय भारत अंगरेजों का गुलाम था, लेकिन देश में कुछ व्यक्ति ऐसे भी थे, जो उनकी गुलामी सहने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने छोटे-छोटे दल बनाए हुए थे, जो अंगरेजों को भारत से बाहर निकालने की योजनाएं बनाते थे और उन्हें अंजाम देते थे। ऐसा ही एक दल बलवंत राव फड़के ने भी बनाया हुआ था। वह अपने साथियों को अस्त्र-शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देते थे, ताकि समय आने पर अंगरेजों का डटकर मुकाबला किया जा सके। गंगाधर भी उनके दल में शामिल हो गए और टे्रनिंग लेने लगे। जब वह अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में सिध्दहस्त हो गए, तो फड़के ने उन्हें बुलाया और कहा कि अब तुम्हारा प्रशिक्षण पूरा हुआ। तुम शपथ लो कि देश सेवा के लिए अपना जीवन भी बलिदान कर दोगे। इस पर गंगाधर बोले, 'मैं आवश्यकता पड़ने पर अपने देश के लिए जान भी दे सकता हूं, लेकिन व्यर्थ में ही बिना सोचे-समझे जान गंवाने का मेरा इरादा नहीं है। अगर आप यह सोचते हैं कि केवल प्रशिक्षण से ही अंगरेजों का मुकाबला हो सकता है, तो यह सही नहीं है। अब तलवारों का जमाना गया। अब बाकायदा योजनाएं बनाकर लड़ाई के नए तरीके अपनाने होंगे।' यह कहकर गंगाधर तेज कदमों से वहां से चले आए। फिर उन्होंने योजनाबध्द तरीके से देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी।
तिलक ने भारतीय समाज में कई सुधार लाने के प्रयत्न किए। वे बाल-विवाह के विरुद्ध थे। उन्होंने हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। महाराष्ट्र में उन्होंने सार्वजनिक गणेश पूजा की परम्परा प्रारम्भ की ताकि लोगों तक स्वराज का सन्देश पहुँचाने के लिए एक मंच उपलब्ध हो। भारतीय संस्कृति, परम्परा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत हुई। उनके निधन पर लगभग 2 लाख लोगों ने उनके दाह-संस्कार में हिस्सा लिया।
एक अगस्त, 1920 को उनका निधन हो गया।
चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई सन्1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भावरा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। भावरा के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए वाराणासी गए।
वाराणासी में वे महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। 1921 में मात्र तेरह साल की उम्र में उन्हें संस्कृत कॉलेज के बाहर धरना देते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने उन्हें ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, उन्होंने जवाब दिया- आजाद। मजिस्ट्रेट ने पिता का नाम पूछा, उन्होंने जवाब दिया-स्वाधीनता। मजिस्ट्रेट ने तीसरी बार घर का पता पूछा, उन्होंने जवाब दिया- जेल।
उनके जवाब सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें पन्द्रह कोड़े लगाने की सजा दी। हर बार जब उनकी पीठ पर कोड़ा लगाया जाता वे महात्मा गाँधी की जय बोलते। थोड़ी ही देर में उनकी पूरी पीठ लहू-लूहान हो गई।
उस दिन से उनके नाम के साथ 'आजाद' जुड़ गया। वे चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर आजाद बन गए। असहयोग आंदोलन समाप्त होने के बाद चंद्रशेखर आजाद की विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए।
वे हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए। उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी कांड, सांडर्स-हत्या को अंजाम दिया। आजाद और उनके साथियों की छोटी-सी टोली ने अँग्रेज सरकार की नाक में दम कर रखा था। पुलिस ने आजाद पर पाँच हजार रुपए का इनाम घोषित किया था ,पाँच हजार रुपए उन दिनों एक बड़ी रकम मानी जाती थी।
चंद्रशेखर आजाद वेष बदलने में माहिर थे। वे वेष बदल कर अपने काम को अंजाम देते रहे। आखिरकार 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। आजाद पुलिस की कैद में नहीं आना चाहते थे। इसलिए वे अपनी कनपटी पर स्वयं गोली चलाकर हमेशा के लिए आजाद हो गए।
आजाद इतने लोकप्रिय थे कि जिस पेड़ के नीचे वे शहीद हुए थे, वहाँ पर लोगों श्रद्धापूर्वक फूल चढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। चंद्रशेखर आजाद के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा देखकर सरकार ने वह पेड़ कटवा दिया, जिसके नीचे चंद्रशेखर आजाद ने मौत को गले लगाया था।
चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक ने देश सेवा तथा समाज सुधार का बीड़ा बचपन में ही उठा लिया था। उनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को हुआ था। पहले उनका नाम बलवंत राव था। वे अपने देश से बहुत प्यार करते थे। उनके बचपन की एक ऐसी ही घटना है, जिससे उनके देशप्रेम का तो पता चलता ही है, साथ ही यह भी पता चलता है कि छोटी-सी अवस्था में ही तिलक में कितनी सूझ-बूझ थी।
बाल गंगाधर तिलक भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे। इन्होंने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन्हें आदर से "लोकमान्य" (पूरे संसार में सम्मानित) कहा जाता था। इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।
उस समय भारत अंगरेजों का गुलाम था, लेकिन देश में कुछ व्यक्ति ऐसे भी थे, जो उनकी गुलामी सहने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने छोटे-छोटे दल बनाए हुए थे, जो अंगरेजों को भारत से बाहर निकालने की योजनाएं बनाते थे और उन्हें अंजाम देते थे। ऐसा ही एक दल बलवंत राव फड़के ने भी बनाया हुआ था। वह अपने साथियों को अस्त्र-शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देते थे, ताकि समय आने पर अंगरेजों का डटकर मुकाबला किया जा सके। गंगाधर भी उनके दल में शामिल हो गए और टे्रनिंग लेने लगे। जब वह अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में सिध्दहस्त हो गए, तो फड़के ने उन्हें बुलाया और कहा कि अब तुम्हारा प्रशिक्षण पूरा हुआ। तुम शपथ लो कि देश सेवा के लिए अपना जीवन भी बलिदान कर दोगे। इस पर गंगाधर बोले, 'मैं आवश्यकता पड़ने पर अपने देश के लिए जान भी दे सकता हूं, लेकिन व्यर्थ में ही बिना सोचे-समझे जान गंवाने का मेरा इरादा नहीं है। अगर आप यह सोचते हैं कि केवल प्रशिक्षण से ही अंगरेजों का मुकाबला हो सकता है, तो यह सही नहीं है। अब तलवारों का जमाना गया। अब बाकायदा योजनाएं बनाकर लड़ाई के नए तरीके अपनाने होंगे।' यह कहकर गंगाधर तेज कदमों से वहां से चले आए। फिर उन्होंने योजनाबध्द तरीके से देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी।
तिलक ने भारतीय समाज में कई सुधार लाने के प्रयत्न किए। वे बाल-विवाह के विरुद्ध थे। उन्होंने हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। महाराष्ट्र में उन्होंने सार्वजनिक गणेश पूजा की परम्परा प्रारम्भ की ताकि लोगों तक स्वराज का सन्देश पहुँचाने के लिए एक मंच उपलब्ध हो। भारतीय संस्कृति, परम्परा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत हुई। उनके निधन पर लगभग 2 लाख लोगों ने उनके दाह-संस्कार में हिस्सा लिया।
एक अगस्त, 1920 को उनका निधन हो गया।
चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई सन्1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भावरा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। भावरा के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए वाराणासी गए।
वाराणासी में वे महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। 1921 में मात्र तेरह साल की उम्र में उन्हें संस्कृत कॉलेज के बाहर धरना देते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने उन्हें ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, उन्होंने जवाब दिया- आजाद। मजिस्ट्रेट ने पिता का नाम पूछा, उन्होंने जवाब दिया-स्वाधीनता। मजिस्ट्रेट ने तीसरी बार घर का पता पूछा, उन्होंने जवाब दिया- जेल।
उनके जवाब सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें पन्द्रह कोड़े लगाने की सजा दी। हर बार जब उनकी पीठ पर कोड़ा लगाया जाता वे महात्मा गाँधी की जय बोलते। थोड़ी ही देर में उनकी पूरी पीठ लहू-लूहान हो गई।
उस दिन से उनके नाम के साथ 'आजाद' जुड़ गया। वे चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर आजाद बन गए। असहयोग आंदोलन समाप्त होने के बाद चंद्रशेखर आजाद की विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए।
वे हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए। उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी कांड, सांडर्स-हत्या को अंजाम दिया। आजाद और उनके साथियों की छोटी-सी टोली ने अँग्रेज सरकार की नाक में दम कर रखा था। पुलिस ने आजाद पर पाँच हजार रुपए का इनाम घोषित किया था ,पाँच हजार रुपए उन दिनों एक बड़ी रकम मानी जाती थी।
चंद्रशेखर आजाद वेष बदलने में माहिर थे। वे वेष बदल कर अपने काम को अंजाम देते रहे। आखिरकार 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। आजाद पुलिस की कैद में नहीं आना चाहते थे। इसलिए वे अपनी कनपटी पर स्वयं गोली चलाकर हमेशा के लिए आजाद हो गए।
आजाद इतने लोकप्रिय थे कि जिस पेड़ के नीचे वे शहीद हुए थे, वहाँ पर लोगों श्रद्धापूर्वक फूल चढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। चंद्रशेखर आजाद के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा देखकर सरकार ने वह पेड़ कटवा दिया, जिसके नीचे चंद्रशेखर आजाद ने मौत को गले लगाया था।
चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
मंगलवार, 21 जुलाई 2009
जहर उगलती मशीनें हमारे आसपास

डॉ. महेश परिमल
बचपन में 'विज्ञान: वरदान या अभिशापÓ पर निबंध लिखने को कहा जाता था। जिसमें हमें विज्ञान से मिलने वाली सुविधाओं के बाद उससे होने वाली हानियों के बारे में बताना होता था। निबंध की शैली ही हमें अधिक अंक मिलते थे। बाकी तथ्य तो वही रहते थे। उस समय विज्ञान की हानियों पर भी विचार किया जाता था। आज जब इसी विज्ञान को नए सिरे से समझने की कोशिश की, तब पता चलता है कि आज विज्ञान निश्चित रूप से हमारे ही लाभकारी है, पर इसके विनाशक रूप पर चर्चा तक नहीं होती। हर कोई इसे सहजता से स्वीकार कर रहा है। पर इसके विनाशक रूप को अनदेखा कर रहा है। अब कितने लोगों को यह पता है कि फोटो कॉपी मशीन, ए.सी.,फेक्स मशीन, लेजर प्रिंटर ये सब स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। इसे समझते हुए ऑफिस का कोई कर्मचारी अपने बॉस से यह कहे कि सर ऑफिस से इस जेराक्स मशीन से मेरी आँखों में जलन होती है, सर दर्द करता है, आप इस मशीन को यहाँ से हटा दें, तो क्या बॉस उस कर्मचारी की बात मानेंगे? निश्चित रूप से इस तरह की शिकायत करने वाले कर्मचारी की छुट्टी हो जाएगी। पर यह सच है कि यदि एक कर्मचारी को इस तरह की शिकायत है, तो निश्चित रूप से उस ऑफिस का वातावरण ऐसा है, जिसमें हवा बाहर जाने की व्यवस्था नहीं होगी।
हाल ही में अँगरेजी पत्रिका 'सेमिनारÓ द्वारा विज्ञान के तमाम शोधों के विपरीत असर पर एक परिसंवाद आयोजित किया गया। इस परिसंवाद में यह विचार किया गया कि विज्ञान के नए-नए शोध विश्व में किस तरह से समस्याएँ पैदा कर रहे हैं। विज्ञान की न जाने कितने अविष्कार ऐसे हैं, जो पहली नजर में हमें अत्यंत लाभकारी दिखाई देते हैं। उससे होने वाली हानियाँ तो उसके इस्तेमाल के बाद ही पता चलती हैं। आज मोबाइल से होने वाली हानियों के बारे में लोग सतर्क हुए हैं। अब वे इससे होने वाली नुकसान से बचने की कोशिश भी करने लगे हैं। अब मोबाइल कंपनियाँ ऐसे फोन बाजार में ला रही हैं, जिससे शरीर पर कम से कम नुकसान होता है। पर क्या एक-एक व्यक्ति को यह बताने जाना होगा कि उनके आसपास जो वातावरण है,उससे भी उसके शरीर को नुकसान पहुंच रहा है। अब शायद ही कोई ऐसा ऑफिस होगा, जहाँ फेक्स मशीन और लेजर प्रिंटर का इस्तेमाल न होता हो। अब तो यह सामान्य बात हो गई है। पर इससे होने वाले नुकसान की बात सामान्य नहीं है। यह मशीनें हमारे शरीर को किस तरह से नुकसान पहुँचाती हैं, आइए जानें:-
पहले हम प्लेन पेपर फोटोकॉपियर की बात करें। इस मशीन में ओरिजनल दस्तावेज के ऊपर लाइट फेंकी जाती है, इस प्रतिबिम्ब फोटोरिसेप्टर पर पड़ता है, जो विद्युत चार्जयुक्त ड्रम के बेल्ट के स्वरूप में होता है। इस ड्रम का निचला भाग प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। उस पर जब कोई प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब उसके ऊपर विद्युत के चार्ज के पेटर्न में बदलाव होता है, जिससे आकृति उत्पन्न होती है। यह आकृति इलेक्ट्रॉनिक चार्ज टोनर को आकर्षित करती है। जो उष्णता और दबाव के साथ कागज पर उसकी छाप छोड़ती है।
फोटो कॉपियर, एक्स रे मशीन, वेल्डिंग मशीन जब काम करती हैं, तब ओजोन नामक जहरीली गैस पैदा करती हैं। ऑक्सीजन वायु में ऑक्सीजन के दो परमाणु होते हैं, जबकि ओजोन में तीन परमाणु होते हैं। ओजोन बहुत ही अस्थायी वायु है और ऑफिस के वातावरण में उसकी हाफ लाइफ 6 मिनट ही होती है। अर्थात 6 मिनट में ही ओजोन के आधे अणुओं का विघटन हो जाता है। ओजोन वायु की सुगंध बहुत ही मीठी होती है। यह वायु ऑफिस या घर के वातावरण में हर दस लाख अणुओं के एक से अधिक होती है। इससे स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न होता है। फोटोकॉपियर में ही अल्ट्रावायलेट बल्व होता है, उसके कारण ड्रम के चार्जिंग और डिस्चार्जिंग की प्रक्रिया के कारण ओजोन गैस पैदा होती है। आकृति ड्रम में से टोनर में जाती है, तब ओजोन पैदा होती है।
यदि बरामदे में फोटोकॉपियर मशीन है और वहाँ हवा के आने-जाने की समुचित व्यवस्था नहीं है, तो वहाँ पर ओजोन गैस की मात्रा बढ़ जाती है। हवा में ओजोन की मात्रा 25 पीपीएम (दस लाख अणुओं में ओजोन का अणु) जितना बढ़ जाए, तो उससे आँखों में जलन होने लगती है, यही नहीं गले, साँस की नली और फेफड़ों को भी नुकसान पहुँच सकता है। दूसरे अन्य नुकसानों में सरदर्द, साँस लेने में तकलीफ, बेचैनी भी हो सकती है। कुछ समय के लिए हृदयगति पर भी असर होता है। ओजोन गैस की मात्रा 10 पीपीएम के ऊपर पहँुच जाए, तो भी स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है।

हमारे देश में कई स्थानों पर जेराक्स मशीन ऐसे स्थानों पर रखी गई हैं, जहाँ जगह छोटी है, सामान फैला हुआ है, हवा के आने-जाने की समुचित व्यवस्था नहीं है, ऐसे स्थानों पर ओजोन की मात्रा अधिक हो जाती है, जो वहाँ पर उपस्थित लोगों के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। मशीन के पास खड़े रहने वाले व्यक्ति को यह ओजोन गैस बुरी तरह से प्रभावित करती है। ऐसे लोग अल्पायु होते हैं। इन्हें त्वचा कैंसर का भी खतरा बढ़ जाता है। ड्रायकॉपियर में पॉवरयुक्त टोनर का इस्तेमाल किया जाता है। यह पावडर अनेक प्रकार के कार्बन में से बनाया जाता है। इस पावडर में 10 प्रतिशत कार्बन ब्लेक होता हैऔर उसे पोलिस्टर रेजिन के साथ मिलाया जाता है। फोटो कॉपियर यदि पूरी तरह से सुरक्षित न हो, तो उसका पावडर बाहर आकर हवा में फैल जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। टोनर के बारीक कण साँस नली में जाकर अटक जाते है, जिससे खाँसी शुरू हो जाती है और जलन होने लगती है, छीकें आने लगती हैं। कुछ टोनरों में नाइट्रोपाइरिंस और ट्राइनाइट्रोफ्लोरीन जैसे जहरीले रसायन होते हैं। ऐसे रसायनों के सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति को कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। इन दिनों जिस तरह के टोनर इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं, उसमें पॉलिमर प्रकार का प्लास्टिक रेजिन का इस्तेमाल होता है। इन रसायनों के कारण चमड़ी पर फफोले पड़ जाते हैं और आँखों में जलन होने लगती है।
फोटो कापियर में लाइट के लिए फ्लोरोसेंट बल्व या क्वाट्र्ज लेम्प का इस्तेमाल किया जाता है, यदि इस प्रकाश को सीधा देखा जाए, तो आँखों में जलन होने लगती है, सर दर्द भी हो सकता है। इस मशीन से गर्मी भी निकलती है। यदि इस गर्मी को बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था न हो, तो उस क्षेत्र का तापमान बढ़ सकता है। कई बार पेपर फँस जाने पर जब मशीन को खोला जाता है, तो उसकी गर्मी से खोलने वाला जल भी जाता है। यही हाल फेक्स मशीन, लेजर प्रिंटर का है, इसमें भी टोनर, बल्व का उपयोग होने से ओजोन गैस, कार्बन के रजकण, अल्ट्रावाइलेट लाइट, गर्मी आदि की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। आखिर इन समस्याओं को लेकर हम कितने जाग्रत हैं। यह सोचने की बात है। कितने लोग हैं, जो इन तमाम मशीनों के उपयोग के बाद उससे होने वाले नुकसान से वाकिफ हैं। कितने लोग ऐसे हैं, जो इन मशीनों पर कुशलता के साथ काम कर सकते हैं? किसी भी मशीन के पास खड़े होकर इसका अंदाजा आराम से लगाया जा सकता है।
इस तरह से देखा जाए, तो हमारे आसपास न जाने कितनी ही चीजें ऐसी हैं, जिनसे हमारे स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है, पर उस खतरे से अभी तो हम वाकिफ नहीं हैं, पर यदि हम इस दिशा में सचेत नहीं हुए, तो निश्चित रूप से ये विज्ञान के ये तमाम अविष्कार हमें और अधिक नुकसान पहुँचाएँगे, इसमें कोई शक नहीं।
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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