गुरुवार, 6 अगस्त 2009

शर्मसार है देश....

डॉ. महेश परिमल
इन दिनों देश भर में जो कुछ हो रहा है, वह उत्साहभरा कम लेकिन चिंताजनक अवश्य है। पहले तो मानसून ने खूब रुलाया, फिर इतना बरसा कि शहरों की हालत ही खराब हो गई। इसके बाद भी पूर्वाेत्तर भारत और उत्तर भारत में बारिश के बिना अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई है। असम जहाँ हर वर्ष खूब बारिश होती थी, आज वहाँ भी अकाल की स्थिति है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली में बारिश के अभाव में बिजली-पानी की आपूर्ति लगातार प्रभावित हो रही है। वहाँ हर रोज इसी नाम से विरोध प्रदर्शन हो रहा है। राजधानी में ही ऐसे न जाने कितने क्षेत्र हैं, जहाँ आठ-आठ दिनों तक बिजली नहीं मिल रही है। पानी की आपूर्ति भी कहीं भी संतोषजनक नहीं है।
सवाल यह उठता है कि यदि मानसून कुछ लंबा खिंच जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से क्यों प्रभावित होती है? एक तरफ तो हम गर्व से कहते हैं कि हमें आजाद हुए 62 वर्ष हो गए हैं। अखबारों में देश की तरक्की के आँकड़े पेश करते हुए विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। फिर भी आज बिजली-पानी के लिए हम आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। सभी राज्यों की हालत बिजली के नाम पर तो पतली है, लेकिन सबसे अधिक बदतर स्थिति दिल्ली में है। जहाँ मेट्रो हाइसे में 7 मौतें हो चुकीं हैं। आडिटर का कहना है कि मेट्रो रेल पुल के निर्माण में धांधली हुई है, घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल हुआ। आखिर इसके लिए किसे दोषी माना जाए? इन सबसे अलग हटकर है अगले वर्ष होने वाले एशियन खेल की खबर। आज सरकार जिस तरह से हर काम में जल्दबाजी दिखा रही है, उसके पीछे यह प्रदर्शन की भावना है। खेलों में हमारा प्रदर्शन भले ही खराब हो, पर देश को अच्छे से अच्छा बताने के लिए सारी लीपा-पोती की जा रही है।
इन दिनों देश में कानून-व्यवस्था भी नियंत्रित नहीं कही जा सकती। चारों तरफ तोडफ़ोड़ की घटनाएँ हो रही हैं। पुलिस तंत्र निष्फल साबित हो रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि विश्व में सबसे कम वाहन हमारे यहाँ ही हैं, पर सबसे अधिक दुर्घटनाएँ भी हमारे ही यहाँ होती हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष डेढ़ लाख मौतें होती हैं, फिर भी रोज ही नए वाहन का विज्ञापन हमें देखने को मिल रहे हैं। सरकार है कि नए-नए वाहन और नई बाइक के लिए अनुमति देती जा रही है, उसके पास यह सोचने के लिए जरा भी वक्त नहीं है कि आखिर इतने सारे वाहन दौड़ेंगे कहाँ? वैसे भी हममें यातायात नियमों को तोडऩा अच्छी तरह से आता है। नियम तोडऩा हम अपनी शान समझते हैं। दुर्घटना के बाद टक्कर मारने वाले वाहन का अता-पता ही नहीं मिलता। पूरे देश में इस प्रकार की दुर्घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं।
दूसरी ओर अपहरण और अनाचार की घटनाएँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब तो गैंगरेप के मामले एक शहर से दूसरे शहर में होने लगे हैं। कभी सूरत, कभी भोपाल, कभी कोई अन्य शहर। गोवा के बीच मानो बलात्कार के लिए कुूख्यात हो गए हैं। स्कूल-कॉलेजों में पढऩे वाली किशोरी-युवतियाँ अब शिक्षकों की आँखों को भाने लगी हैं। फेल कर देने की धमकी मात्र से किशोरियाँ शिक्षकों के चंगुल में फँस जाती हैं। घर की बच्चियाँ जब घर पर ही सुरक्षित नहीं है, तो ऐसे में किस पर विश्वास किया जाए।
आजकल टीवी-फिल्मों में भी इस तरह के संवाद बिना सेंसर के जारी होने लगे हैं कि लोगों का रुझान गलत बातों की ओर अधिक जाने लगा है। एक फिल्म में नायक नायिका के सामने कहता है कि वह उसके सामने नहीं आ सकता, क्योंकि उसने कपड़े नहीं पहने हैं। इस पर नायिका कहती है कि तुम बिना कपड़ों के ही अच्छे लगते हो। एक अन्य फिल्म में नायिका अपनी सहेली से पूछती है कि तुम लड़कों को पटाने के लिए क्या करती हो? तो सहेली जवाब देती है कि मैं सेक्सी कपड़े पहनती हूँ और लड़कों के साथ सेक्सी बातें करती हूँ। जब फिल्मों में ऐसे संवाद हों, तो फिर प्रश्न यह उठता है कि आखिर सेंसर नाम की कोई चीज इस देश में है कि नहीं? कैसे इस तरह के संवाद जारी हो जाते हैं। कोई बता सकता है भला?
देश भर में इन दिनों महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने घटनाएँ भी अधिक होने लगी हैं। आखिर क्या मिलता है, पुरुषों को इससे? क्या उन्हें पुलिस का कोई भय नहीं होता? क्या पुलिस उनसे मिली हुई होती है? क्या इस तरह की घटनाओं पर किसी प्रकार की कार्रवाई न करने के लिए पुलिस पर दबाव रहता है? इस देश में मानव अधिकार आयोग नामक की कोई संस्था भी है, यह लोग जानते हैं कि नहीं? क्या इस तरह की घटनाओं से मानव अधिकार आयोग अपनी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं कर सकता? क्या उसे किसी की शिकायत की आवश्यकता होती है? यह ऐसा है कि तो संस्था को मानव धिक्कार आयोग कहना अधिक न्यायसंगत है।
अपराधियों को अब पुलिस का कोई खौफ नहीं रहा। कैदी भी बड़े आराम से जेल में ही सारी सुविधाएँ भोगते हुए अपना तंत्र चलाते रहते हैं। जेल प्रशासन उसकी सेवा में एक पाँव पर खड़ा रहता है। घर का खाना-कपड़ा ही नहीं, बल्कि टीवी, मोबाइल जैसी सुविधाएँ उसे जेल में ही मिल रही है। फिर क्या आवश्यकता है उसे बाहर निकलने की? कैदियों की सबसे अधिक मौत भी भारतीय जेलोंमें ही होती है। यह सिक्के का दूसरा पहलू है। चारों ओर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है। लोग मर रहे हैैं, कट रहे हैं, खप रहे हैं, फिर भी देश को विकासशील बताया जा रहा है। महँगाई बढ़ रही है, इससे आम आदमी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, उधर सरकार सस्ते में कार दिलाने के लिए प्रयासरत है। पेट्रोल के ेदाम बढ़ते ही महँगाई बढ़ जाती है। इस पर अंकुश नहीं लगाया जाता। यदि खुदा ना खास्ता पेट्रोल के दाम घट भी जाएँ, तो बढ़े हुए दाम कम नहीं होते। आखिर माजरा क्या है?
देश के अखबारों और टीवी पर आम आदमी की समस्याओं वाली खबर गायब है। समाज में होने वाले अच्छे कार्य प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाते, बुरे काम का प्रचार इतनी तेजी से होता है कि कुछ ही देर में यह खबर कई माध्यमों से देश के कोने-कोने पर पहुँच जाती है। क्या हो गया है हमें? अब मौतों के आँकड़ों से हमे सिहरन तक नहीं होती। बलात्कार की खबरों को हम बड़ी तल्लीनता से पढ़ते हैं। कोई अपराधी हमारे सामने से गुजर जाए, तो हम उसे बड़े सम्मान के साथ देखते हैं। कहाँ गई तनी हुई मुट्ठियाँ, कहाँ गए तने हुए चेहरे? क्यों नहीं हम दहल जाते भीतर से, जब हमारे पड़ोसी पर कोई अत्याचार करता है? हम यह भूल जाते हैं कि जब हमारा पड़ोसी ही सुरक्षित नहीं है, तो हम कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? आज उस पर हमला हुआ हे, तो कल हम पर होगा। तब हमारे साथ कौन होगा? बोलो.....
डॉ. महेश परिमल

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