बुधवार, 12 जून 2013

उपभोक्ता समाज पर विज्ञापन का मायाजाल

 डॉ महेश परिमल
पिछले कुछ वर्षों में मीडिया का विस्तार इतनी तेजी से हुआ है कि संचार की दुनिया ही बदल गई है। मीडिया से जुड़े और भी कई माध्यम हैं जिनमें काफी परिष्कार और निखार आया है। जन सम्पर्क और विज्ञापन का माध्यम समाचार पत्रों के साथ-साथ बेहद प्रभावी व संप्रेषणशील स्रोत के रूप में उभरे हैं। यही नहीं बल्कि एक दूसरे पर परस्पर निर्भर भी हो गए हैं। सरकारों ने तो अनेक वर्षों से अपने-अपने जन सम्पर्क विभाग गठित कर रखे हैं जो उसके कार्य-कलापों को जनता तक पहुंचाते हैं। इसी प्रकार औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने भी जनसंपर्क को आर्थिक उदारवाद के इस दौर में काफी महत्व दिया है। आज का समाज उपभोक्तावादी समाज कहा जाता है अतएव अपने उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा बेचना औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए उच्च प्राथमिकता का विषय हो गया है। जीवन का कोई भी क्षेत्र अब विज्ञापन और जनसंपर्क की पहुंच से अछूता नहीं है। पिछले 50 वर्षों में भारतीय विज्ञापन विधा ने बहुत लंबी दूरी तय की है। उसका शिल्प इतना उन्नत हुआ है कि किसी भी विकसित देश से टक्कर ले सकता है। विज्ञापन और जन सम्पर्क एक प्रकार से जुड़वा विधाएं हैं। इन्होंने एक स्वतंत्र उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली है।
'प्राइम टाइम' जिस समय सबसे ज्यादा दर्शक टीवी देखते हैं, को भी विज्ञापनदाताओं ने खरीद रखा है। इस समय चंद बड़ी कंपनियों का एकाधिकार है और वे सतही मनोरंजन के साथ दर्शकों के आगे अपने उत्पादनों को भी सरका देती है। सवाल है कि क्या मुनाफाखोरी के लिए करोड़ों लोगों के हितों को ताक पर रख देना उचित है? फूहड़ किस्म के विज्ञापन भी बेदस्तूर जारी है जबकि पाठकों की अभिरुचियों का स्तर इस बीच काफी उठा है। ये विकृतियां अभी खत्म हो सकती है जब विज्ञापनों को लेकर स्पष्ट और सख्त नीति बनाई जाए तथा आवश्यक हो तो उसे कानूनी जामा पहनाया जाए। जनसम्पर्क कला एवं विज्ञापन के क्षेत्र में प्रबुद्ध रोजगार की विपुल संभावनाएं हैं। अतएव शासन, विश्वविद्यालयों, समाचार पत्र संगठनों व जनसम्पर्क प्रतिष्ठानों को आपस में विचार विमर्श कर एक ऐसा संयुक्त फोरम बनाना होगा ताकि इसे स्वतंत्र उद्योग स्वरूप देते हुए रोजगार के एक महती स्रोत के रूप में विकसित किया जा सके।

आज हमारे में चुपके-चुपके बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ रहा है। इसे हम अभी तो नहीं समझ पा रहे हैं, पर भविष्य में निश्चित रूप से यह हमारे सामने आएगा। इस बार इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमारी मानसिकता पर हमला करने के लिए मासूमों का सहारा लिया है। हमारे मासूम याने वे बच्चे, जिन पर हम अपना भविष्य दांव पर लगाते हैं और उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे हमारा सहारा बनें। सहारा बनने की बात तो दूर, अब तो बच्चे अपने माता-पिता को बेवकूफ समझने लगे हैं और उनसे बार-बार यह कहते पाए गए हैं कि पापा, छोड़ दो, आप इसे नहीं समझ पाएंगे। इस पर हम भले ही गर्व कर लें कि हमारा बच्चा आज हमसे भी अधिक समझदार हो गया है, पर बात ऐसी नहीं है, उसकी मासूमियत पर जो परोक्ष रूप से हमला हो रहा है, हम उसे नहीं समझ पा रहे हैं। आज घर में नाश्ता क्या बनेगा, इसे तय करते हैं आज के बच्चे। तीन वर्ष का बच्चा यदि मैगी खाने या पेप्सी पीने की जिद पकड़ता है तो हमें समझ लेना चाहिए कि यह अनजाने में उसके मस्तिष्क में विज्ञापनों ने हमला किया है। मतलब नाश्ता क्या बनेगा, यह माता-पिता नहीं, बल्कि कहीं बहुत दूर से बहुराष्ट्रीय कंपनियां तय कर रही हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां बहुत ही धीरे से चुपके-चुपके हमारे निजी जीवन में प्रवेश कर रही है, इस बार उन्होंने निशाना तो हमें ही बनाया है, पर इस बार उन्होंने कांधे के रूप में बच्चों को माध्यम बनाया है। यह उसने कैसे किया, आइए उसकी एक बानगी देखें- इन दिनों टीवी पर नई कार का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें एक बच्चा अपने पिता के साथ कार पर कहीं जा रहा है, थोड़ी देर बाद वह अपने गंतव्य पहुंचकर कार के सामने जाता है और अपने दोनों हाथ फैलाकर कहता है ''माय डैडीड बिग कार'' इस तरह से अपनी नई कार को बेचने के लिए बच्चों की आवश्यकता कंपनी को आखिर क्यों पड़ी? जानते हैं आप? शायद नहीं, शायद जानना भी नहीं चाहते। टीवी और प्रिंट मीडिया पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों में नारी देह के अधिक उपयोग या कह लें कि दुरुपयोग को देखते हुए कतिपय नारीवादी संस्थाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। नारी देह अब पुरुषों को आकर्षित नहीं कर पा रही है, इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बच्चों का सहारा लिया है। अब यह स्थिति और भी भयावह होती जा रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब बच्चों में अपना बाजार देख रही हैं। आजकल टीवी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे हैं, जिसमें उत्पाद तो बड़ों के लिए होते हैं, पर उसमें बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। घर में नया टीवी कौन सा होगा, किस कंपनी का होगा, या फिर वाशिंग मशीन, मिक्सी किस कंपनी की होगी, यह बच्चे की जिद से तय होता है। सवाल यह उठता है कि जब बच्चों की जिद के आधार पर घर में चीजें आने लगें, तो फिर माता-पिता की आवश्यकता ही क्या है? जिस तरह से हॉलीवुड की फिल्में हिट करने में दस से पंद्रह वर्ष के बच्चों की भूमिका अहम् होती है, ठीक उसी तरह आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां बच्चों के माध्यम से अपने उत्पाद बेचने की कोशिश में लगी हुई हैं। क्या आप जानते हैं कि इन मल्टीनेशनल कंपनियों ने इन बच्चों को ही ध्यान में रखते हुए 74 करोड़ अमेरिकन डॉलर का बाजार खड़ा किया है। यह बाजार भी बच्चों के शरीर की तरह तेजी से बढ़ रहा है। इस बारे में मार्केटिंग गुरूओं का कहना है कि किसी भी वस्तु को खरीदनें में आज के माता-पिता अपने पुराने ब्रांडों से अपना लगाव नहीं तोड़ पाते हैं। दूसरी ओर बच्चे, जो अभी अपरिपक्व हैं, उन्हें अपनी ओर मोड़ने में इन कंपनियों को आसानी होती है। नई ब्रांड को बच्चे बहुत तेजी से अपनाते हैं। इसीलिए उन्हें सामने रखकर विज्ञापन बनाए जाने लगे हैं, आश्चर्य की बात यह है कि इसके तात्कालिक परिणाम भी सामने आए हैं। याने यह मासूमों पर एक ऐसा प्रहार है, जिसे हम अपनी आंखों से उन पर होता देख तो रहे हैं, पर कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि आज हम टीवी के गुलाम जो हो गए हैं। आज टीवी हमारा नहीं, बल्कि हम टीवी के हो गए हैं।
हाल ही में एक किताब आई है, ''ब्रांड चाइल्ड''। इसमें यह बताया गया है कि 6 महीने का बच्चा कंपनियों का ''लोगो'' पहचान सकता है, 3 साल का बच्चा ब्रांड को उसके नाम से जान सकता है और 11 वर्ष का बालक किसी निश्चित ब्रांड पर अपने विचार रख सकता है। यही कारण है कि विज्ञापनों के निर्माता ''केच देम यंग'' का सूत्र अपनाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के बच्चे सोमवार से शुक्रवार तक रोज आमतौर पर 3 घंटे और शनिवार और रविवार को औसतन 3-7 घंटे टीवी देखते हैं। अब तो कोई भी कार्यक्रम देख लो, हर 5 मिनट में कॉमर्शियल ब्रेक आता ही है और इस दौरान कम से कम 5 विज्ञापन तो आते ही हैं। इस पर यदि क्रिकेट मैच या फिर कोई लोकप्रिय कार्यक्रम चल रहा हो, तो विज्ञापनों की संख्या बहुत ही अधिक बढ़ जाती है। इस तरह से बच्चा रोज करीब 300 विज्ञापन तो देख ही लेता है, यही विज्ञापन ही तय करते हैं कि उसकी लाइफ स्टाइल कैसी होगी। इस तरह से टीवी से मिलने वाले इस आकाशीय मनोरंजन की हमें बड़ी कीमत चुकानी होगी, इसके लिए हमें अभी से तैयार होना ही पड़ेगा।
समय बदल रहा है, हमें भी बदलना होगा। इसका आशय यह तो कतई नहीं हो जाता कि हम अपने जीवन मूल्यों को ही पीछे छोड़ दें। पहले जब तक बच्चा 18 वर्ष का नहीं हो पाता था, तब तक वह अपने हस्ताक्षर से बैंक से धन नहीं निकाल पाता था। लेकिन अब तो कई ऐसी निजी बैंक सामने आ गई हैं, जिसमें 10 वर्ष के बच्चे के लिए के्रडिट कार्ड की योजना शुृरू की है। इसके अनुसार कोई भी बच्चा एटीएम जाकर अधिक से अधिक एक हजार रुपए निकालकर मनपसंद वस्तु खरीद सकता है। सभ्रांत घरों के बच्चों का पॉकेट खर्च आजकल दस हजार रुपए महीने हो गया है। इतनी रकम तो मध्यम वर्ग का एक परिवार का गुजारा हो जाता है। सभ्रांत परिवार के बच्चे क्या खर्च करेंगे, यह तय करते हैं, वे विज्ञापन, जिसे वे दिन में न जाने कितनी बार देखते हैं। चलो, आपने समझदारी दिखाते हुए घर में चलने वाले बुध्दू बक्से पर नियंत्रण रखा। बच्चों ने टीवी देखना कम कर दिया। पर क्या आपने कभी उसकी स्कूल की गतिविधियों पर नजर डाली? नहीं न...। यहीं गच्चा खा गए आप, क्योंकि आजकल स्कूलों के माध्यम से भी बच्चों की मानसिकता पर प्रहार किया जा रहा है। आजकल तो स्कूलें भी हाईफाई होने लगी हैं। इन स्कूलों में बच्चों को भेजना किसी जोखिम से कम नहीं है।
अब यह प्रश् उठता है कि क्या आजकल स्कूलें बच्चों का ब्रेन वॉश करने वाली संस्थाएं बनकर रह गई हैं? बच्चे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ग्राहक बनकर अनजाने में ही पश्चिमी संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनाने लगे हैं। यह चिंता का विषय है। पहले सादा जीवन उच्च विचार को प्राथमिकता दी जाती थी, पर अब यह हो गया है कि जो जितना अधिक मूल्यवान चीजों को उपयोग में लाता है वही आधुनिक है। वही सुखी और सम्पन्न है। ऐसे में माता-पिता यदि बच्चों से यह कहें कि आधुनिक बनने के चक्कर में वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं, तो बच्चों का यही उत्तर होगा कि आप लोग देहाती ही रहे, आप क्या जानते हैं इसके बारे में। ऐसे में इन तथाकथित आधुनिक बच्चों से यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करेंगे?

बेमानी है किसी क्रांति की उम्मीद करना

डॉ. महेश परिमल
लादेन के मारे जाने के बाद अब लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कुछ ऐसी ही अपेक्षा रख रहे हैं कि उन्हें भी दाऊद इब्राहिम और अजहर मसूद जैसे आतंकवादियों के लिए ओबामा जैसा रास्ता अख्तियार करना चाहिए। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना संभव नहीं दिखता, क्योंकि कोई भी चीज अचानक नहीं होती। उसके पीछे एक लंबी और गहरी सोच होती है। वही सोच मनुष्य, समाज और देश को आगे बढ़ाती है। हमारी लोकता¨त्रक व्यवस्था अचानक कुछ हो जाने पर विश्वास नहीं करती। भले ही हमारे सेनाध्यक्ष यह कहते रहें कि हम भी दाऊद को उसी तरह से पकड़् सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें कभी इजाजत नहीं मिलेगी, यह तय है।
चीन आज कई मामलों में हमसे आगे है। इसके पीछे उसकी सोच है। आगे बढ़ने की प्रवृत्ति है। इसी प्रवृत्ति के अंतर्गत ही उसने आज से डेढ़ हजार साल ऐसी दीवार बनाई, जिससे चंद्रमा से भी देखा जा सकता है। निश्चित रूप से तीन हजार वर्ष पूर्व भी वहाँ ऐसा कुछ हुआ होगा, जिससे उस समय की पीढ़ी ने कुछ सीखा होगा, संकल्प लिया होगा। सब कुछ अचानक नहीं हो जाता। एक व्यक्ति यदि बलवान है, तो उसके पीछे उसकी बरसों की मेहनत और कसरत है। अचानक हासिल होने वाली चीज से कुछ नया होने का सोचा भी नहीं जा सकता। सब कुछ एक ठोस धरातल पर एक विचार की तरह ऊगता है। पुष्पित और पल्लवित होता है। तब कहीं जाकर वह एक विचारवान पेड़ बनता है।
दूसरी ओर हमारे देश ने लोकतांत्रिकता का कम्बल भी ओढ़ रखा है। लोकतंत्र में अपराध तो तेजी से बढ़ सकते हैं, पर उस पर अंकुश धीरे-धीरे ही लगाया जा सकता है। लोकतंत्र कड़े कानून की चाह नहीं रखता। सत्ताधीश इस लोकतंत्र को अपने तरीके से चलाते हैं। जब भी सत्ता बदल होता है, तब संविधान में संशोधन की प्रक्रिया लागू की जाती है। संशोधन होते ही इसलिए हैं कि जनप्रतिनिधियों को अधिक से अधिक कानून के दायरे से बाहर रखा जाए। अभी तक देश में जितने भी भ्रष्टाचार हुए हैं, सबमें जनप्रतिनिधियों का हाथ रहा है, पर आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि को कुछ नहीं हुआ। भारतीय पाठक यह शायद ही कभी पढ़ पाएगा कि भ्रष्टाचार के मामले में अमुक मंत्री की सम्पत्ति राजसात हुई। यह संभव ही नहीं है। एक तरह से सरकार ही इस प्रवृत्ति को संरक्षण दे रही है।
ऐसी बात नहीं है कि हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे रेखांकित किया जा सके। महाराणा प्रताप, शिवाजी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, लोकमान्य तिलक, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस आदि ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने तेवर से देश के नौजवानों के लिए एक इबारत लिखी। उनके वचनों में ओज था, जोश था। आज ऐसी ओजस्वी वाणी सुनने को ही नहीं मिलती। अन्ना हजारे जैसी वाणी यदि सुनने को मिल जाए, तो उसे दबाने के लिए कई शक्तियाँ एक साथ काम करने लगती हैं। ईमानदार हर जगह मारा ही जाता है। फजीहत हमेशा आम आदमी की ही होती है। इसे आम आदमी को ध्यान में रखकर चुनाव के समीकरण तैयार होते हैं। चुनाव के बाद यही आम आदमी सत्ताधीशों से दूर हो जाता है। सत्ताधीशों को आम आदमी की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं होता। हाँ सत्ता प्राप्त करने के लिए इसी आम आदमी की जी-हुजूरी उन्हें पसंद है। क्योंकि यह एक नाटक होता है, उनका वोट पाने के लिए। उसके बाद तो आम आदमी को न पहचानना उनकी विवशता बन जाती है। सत्ता का नशा बहुत ही मादक होता है। इसे छोड़ना मुश्किल है। इसीलिए सत्ताधीश कभी रिटायर नहीं होते। हाँ वे यह अवश्य तय करते हैं कि सरकारी कर्मचारी को कितने वर्ष में रिटायर होना चाहिए। खुद 70-80 के हैं, रिटायर होना नहीं चाहते, पर सरकारी कर्मचारी के लिए कानून बनाएँगे कि वे कितने साल में रिटायर हों। ये तो हमारे देश का हाल है। इन हालात में किसी बड़ी क्रांति की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। सब कुछ अपनी चाल से चलता रहता है।
इस देश में जब तक आम आदमी का प्रतिनिधि वीआईपी है, तब तक देश की दशा और दिशा सुधरने वाली नहीं है। बरसों से छला जा रहा है यह आम आदमी। सरकार इन प्रतिनिधियों पर करोड़ों खर्च करती है, तब कहीं जाकर आम आदमी के लिए हजारों बच पाते हैं। इसी आम आदमी में यह ताकत है कि वह अपने किसी साथी को खास बनाए। साथी तो खास बन जाता है, पर आम हमेशा आम ही रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि खास कभी आम नहीं होना चाहता। खास बने रहने के लिए वह ऐसे तमाम उपक्रम करता है, जिससे उसकी छवि बिगड़ती है। पर उसे इसकी परवाह नहीं रहती। ऐसे लोगों की संतान भी अपने को खास मानती है। उनसे भी किसी नई क्रांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। आज देश में आम आदमी के लिए बनने वाली योजनाएँ उन खास लोगों की सुविधाओं से कहीं छोटी होती हैं। खास लोगों की सुरक्षा में हर वर्ष जितना खर्च होता है, उतना तो आम लोगों की कई योजनाओं को भरपूर धन मिल जाए। इन खास लोगों की हरकतें बताती हैं कि राजनीति में लोग सेवा करने नहीं, बल्कि सरकार से सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए आते हैं। आम और खास के बीच की इस खाई को जब तक नहीं पाटा जाएगा, तब तक देश में यह ताकत नहीं आएगी कि वह अमेरिका जैसी पहल कर सके।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 11 जून 2013

अतीत का मोह

डॉ. महेश परिमल
इंसान हमेशा अपने अतीत से कहीं न कहीं जुड़े ही रहना चाहता है। अतीय का यह मोह उसे हमेशा बांधे रखता है। कई बार तो यह हमें बोझ भी लगता है, पर कई बार उसके मोह में पड़कर कई यादें ताजा हो जाती हैं। कुछ इसी तरह से मैं भी अतीत के मोह से जुड़ता चला गया। हुआ यूं कि घर में पुताई का काम चल रहा था, बहुत से चीजें बेकार जानकर फेंकी जा रही थी। सचमुच कई बार हमें लगता है कि इस चीज की अब कतई आवश्यकता नहीं, फिर भी न जाने हम इसे क्यों इतने लंबे समय से संभालकर रखे हुए थे। इस समय घर का बेकार कचरा बाहर निकल ही जाता है। ऐसे में प्लास्टिक के लाफिंग बुद्धा को लेकर पत्नी मेर सामने आई, कहने लगी, इसे फेंक दूं। मैंेने कहा, तुम्हें मालूम है, यह हमें किस तरह से प्राप्त हुआ था। पत्नी ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। तब मैंने उसे याद दिलाया कि यह हमारे बच्चे को तीसरी कक्षा में इनाम के रूप में मिला था। जब इसे लेकर वह घर आया, तब शायद तुमने उसके चेहरे की चमक नहीं देखी थी। खुशी से उसका चेहरा चमक रहा था। तुम्हें याद नहीं। पत्नी ने कहा-उससे क्या फर्क पड़ता है, यह चीज पुरानी हो चुकी, उसके बाद घर में कितने ही लाफिंग बुद्धा आ गए हैं। अब इसकी क्या जरुरत? सचमुच उसका महत्व अब घर में नहीं था। जवान हो गए बेटे से पूछा तो उसने भी यही कहा कि मुझे इसकी क्या जरुरत? मुझे नहीं चाहिए, आप उसे फेंक सकते हैं। मैं ठहरा भावना से भरा हुआ। उस लाफिंग बुद्धा को देखते ही मुझे बच्चे के चेहरे की चमक याद आती है।  वैसी चमक फिर कभी नहीं देखी, मैंने बच्चे के चेहरे पर। अब उसे फेंके बिना कोई चारा नहीं।
समझ में नहीं आता कि लोग अपनी उपलब्धियों को इस तरह से क्यों भूलना चाहते हैं। अपने पहले वेतन से आपने जो कुछ भी खरीदा हो, क्या उसे हमेशा के लिए संजोकर नहीं रखना चाहेंगे आप? जिस तरह से पहला प्यार नहीं भुलाया जा सकता, ठीक उसी तरह से कई चीजें हैं, जिसे भुलाना मुश्किल है। जिस साइकिल पर पिता ने माँ को बिठाकर कई बार घुमाया हो, उसी साइकिल को बेटा यदि कबाड़ी को बेच दे, कितना दु:ख होता होगा मां को? इसे आखिर कौन समझेगा? उस साइकिल से कई यादें जुड़ी होती हैं, अपनों की। आज भले ही पिता न हों, पर वह साइकिल हमेशा उनकी याद दिलाती है। पर उसे अपनी आंखों के सामने कबाड़ी ले जाए, तो माँ की हालत क्या होती होगी? इसे न तो कबाड़ी वाला समझ सकता है और न ही उसका बेटा। अपनी खामोश भावनाओं से वह किसे समझाए कि साइकिल बेचना ठीक नहीं है। ठीक है, यदि हर चीज के साथ इसी तरह से भावनाएं जुड़ी रहीं, तो पूरा घर ही भर जाएगा, पुरानी चीजों से। पर ऐसा भी नहीं है। कुछ चीजें तो फेंकने वाली होती ही हैं। जब तक पुरानी चीजें बाहर नहीं जाएंगी, तब तक नई चीजें भी नहीं आ सकतीं। क्योंकि जगह सीमित है और सामान है अधिक। ऐसे में आखिर ऐसा क्या किया जाए, जिससे अतीत की यादें भी जुड़ी रहें, और कबाड़ बाहर भी जाता रहे? अतीत से जुड़ी कई चीजें कई बार उस समय काम आती हैं, जब घर के किसी सदस्य की याददाश्त चली जाए, तो उसे अतीत की याद दिलाने के लिए उसी तरह की चीजें उसके सामने लाई जाली हैं, जिससे वह अपनी यादों को टटोल सके। पर ऐसा आजकल कहां हो पाता है। अब तो लोग अपने अतीत को याद ही नहीं करना चाहते। यदि अतीत सुखद है, तो उससे कुछ लोग निकल ही नहीं पाते हैं, पर यदि दुखद है, तो उसे याद करना भी नहीं चाहते। अतीत के इस भूल-भुलैए में भटककर हम किन कंदराओं से होकर गुजरते हैं, इसे तो वही बताएंगे, जिन्होंने अतीत को अपने भीतर छिपाए रखा है। आखिर लोग एलबम क्यों बनाते हैं। घर के बुजुर्ग की तस्वीर को फ्रेम मे मढ़कर आखिर क्यों रखा जाता है? अतीत वहीं तक अच्छा है, जब तक वह दुखी नहीं करता। दुखी करने वाले अतीत को कोई भी याद नहीं रखना चाहता। पर यदि दुखद अतीत को याद रखा जाए, तो जिंदगी में कितनी भी चुनौतियां सामने आए, इंसान उसका मुकाबला पूरी शिद्दत से कर लेता है। क्योंकि कोई भी नई चुनौती अतीत की चुनौती से बड़ी नहीं होती।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 7 जून 2013

जगमगाती जिंदगी के स्‍याह हाशिए


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 6 जून 2013

गोवा में मापा जाएगा मोदी का राजनैतिक कद

डॉ. महेश परिमल
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची में सबसे ऊपर माने जाते हैं। भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी मोदी का समर्थन कई बार किया है। यही कारण है कि हाल ही में हुए चुनाव में नरेंद्र मोदी को वक्ता के रूप में कई राज्यों में भेजा गया। मोदी की लोकप्रियता से भाजपा के ही कई दिग्गज नेता भीतर ही भीतर आहत हैं। उनका सोचना है कि वे बरसों से राष्ट्रीय राजनीति में हैं, लेकिन अब क्षेत्रीय नेता नरेंद्र मोदी को आगे करके पार्टी उनके साथ अन्याय कर रही है। आहत नेताओं में सबसे ऊपर लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज हैं। ये लोग नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में लाना नहीं चाहते। पर हालात ऐसे बन रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को सामने लाए बिना भाजपा की नैया पार नहीं हो सकती। अब 8 और 9 जून को गोवा के पणजी में होने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी का राजनैतिक कद मापा जाएगा। बैठक कई मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पर इतना तो तय है कि इस बार नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रचार अभियान की कमान सौंपी जा सकती है। एक ओर जहां इस बैठक में नक्सली हिंसा, भ्रष्टाचार घोटालों और महंगाई के मुद्दे पर केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को नए सिरे से घेरने की रणनीति बनाने की तैयारी चल रही है, वहीं वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने श्री मोदी और श्री चौहान की तुलना करके नई बहस छेड़ दी है ।
 इस बैठक में इसी साल होने वाले छह विधानसभा चुनावों के अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी पर भी निर्णायक बहस होगी। जब लोकसभा चुनावों की रणनीति पर चर्चा होगी तो लाजिमी है कि प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार कौन हो यह सवाल जरुर उठेंगे। ऐसे में श्री आडवाणी ने श्री मोदी के साथ तुलना करते हुए श्री चौहान की तारीफों के जो पुल बांधे हैं, उससे इस पर पार्टी में मतभिन्नता खुलकर सामने आ सकती है। श्री आडवाणी ने दोनों मुख्यमंत्रियों की तुलना करते हुए यहां तक कहा है कि गुजरात तो पहले से स्वस्थ था और श्री मोदी ने उत्कृष्ट बना दिया लेकिन श्री चौहान की उपलब्धि इस मायने में सराहनीय है कि उन्होंने मध्यप्रदेश जैसे बीमारु राज्य को विकसित राज्यों की कतार में ला दिया। यही नहीं श्री चौहान द्वारा शुरु की गई जनकल्याण योजनाओं का अब दूसरे राज्य अनुसरण कर रहे हैं। श्री आडवाणी का कद भाजपा में इतना बड़ा है कि उनकी कथनी और करनी को फिलहाल चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। मोदी बनाम शिवराज की नई बहस की शुरुआत श्री आडवाणी के बयान से शुरु हुई है और पार्टी में हर कोई इस पर दो टूक राय देने से हिचकिचा रहा है। श्री चौहान की कार्यशैली लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी बहुत पसंद करती हैं और राज्य में विदिशा लोकसभा सीट से भारी मतों से पिछली बार चुनाव जीतने के बाद से मध्यप्रदेश उनका पसंदीदा राज्य बन गया है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में श्रीमती स्वराज ने श्री मोदी के वहां पर प्रचार करने की जरुरत नहीं बताई थी और इसके बाद दोनों नेताओं के बीच छिड़ा शीत युद्ध अभी तक थमा नहीं है। श्री आडवाणी के ताजा बयान ने श्री मोदी के साथ श्री चौहान को राजनाथ सिंह, श्रीमती सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी रेस में आगे कर दिया है। खुद भाजपा के कई नेताओं का मानना है कि श्री चौहान के नाम पर कोई विवाद नहीं है। एक नेता ने तो यहां तक कह दिया कि श्री चौहान लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकते हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में बहुमत नहीं मिलने की स्थिति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बाकी सहयोगी श्री मोदी के बजाय श्री चौहान के नाम पर आसानी से राजी हो सकते हैं।  मोदी बनाम शिवराज का मुद्दा कहीं गोवा बैठक के बाकी मुद्दों पर ग्रहण न लगा दे । भजपा के लिए यही बेहतर होगा कि इस मुद्दे पर जितनी जल्दी हो सके, विराम लगा दे।
 जमीनी स्तर पर जो हालात है, उसमें गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी को लेकर जनता में अच्छा रिस्पांस है। यह बात न केवल सवेंक्षण कह रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास जमीनी कार्यकर्ताओं की राय भी यही आ रही है। भाजपा में गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी के प्रधानमंत्री  के तौर पर प्रोजेक्शन को लेकर उत्साह है जबकि आडवाणी की लाबी के नेता मुस्लिम पोलराइजेशन का डर बताकर मोदी के आगमन को रोक रहे हैं। मोदी ने दिल्ली आने की पहली सीढ़ी तो संसदीय बोर्ड में आकर पार कर ली है, लेकिन दूसरी सीढ़ी यह है कि लोकसभा चुनाव की कैम्पेन कमेटी की कमान हाथ में आए। लालकृष्ण आडवाणी ने यह सलाह दी कि अभी लोकसभा चुनाव तो दूर है इसलिए चार राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कैम्पेन कमेटी बना दी जाए जिसके लिए उन्होंने पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी का नाम सुझाया लेकिन यह फामरूला नहीं चला। गोवा बैठक से पहले पदाधिकारियों की बैठक होने वाली है, जिसमें एजेंडे पर चर्चा होगी। भाजपा चुनाव के लिए दो कैम्पेन कमेटी बनाने के बजाय एक कमेटी से काम चलाएगी और यही कमेटी लोकसभा और विधानसभा दोनों का कामकाज देखेगी। इस कमेटी की कमान गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी को सौंपने की पूरी तैयारी हो गई है। भाजपा में इस बात का तर्क दिया जा रहा है कि कैम्पेन कमेटी में नरेंद्र  मोदी को ही रखा जाएगा क्योंकि यही कमेटी फिर लोकसभा चुनाव का संचालन भी देखेगी। कैम्पेन कमेटी भाजपा में एक तरीके से पूरे चुनाव का संचालन करती है और चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव प्रबंधन तक को देखती है। गोवा बैठक में मोदी को चुनाव प्रबंधन की कमान मिलने में रुकावट डालने की कोशिश जरूर हो रही है, लेकिन पार्टी का मन बन चुका है कि अब मोदी को आगे बढ़ाना है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 5 जून 2013

अपनी देह पर फिल्म को ऊगता महसूस करने वाले रितुपर्णो

डॉ. महेश परिमल
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत ही अधिक क्रियाशील होते हैं। अपने काम में महारत हासिल करते हैं। पर कुछ बयानों एवं पहनावे के कारण इतने अधिक चर्चित हो जाते हैं कि उनकी क्रियाशीलता दिखाई नहीं देती। ऐसे लोगों का नाम लेते ही जेहन पर पहले उनके बयान आदि सामने आते हैं, उसके बाद उनकी क्रियाशीलता। कई बार उनकी क्रियाशीलता इतने पीछे हो जाती है कि लोग उन्हें उनकी क्रियाशीलता से पहचानना ही बंद कर देते हैं। कुछ यही हाल तेजस्वी फिल्मकार रितुपर्णो घोष के साथ भी हुआ। उन्होंने कई फिल्मों में अपनी क्रियाशीलता का परिचय दिया। उनकी क्रियाशीलता के कारण उनकी देश-विदेश में पहचान बनी। जिसकी झोली में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार हों, उसे हम भारतीय सिनेमा का वरदान ही मानेंगे। यह सच है कि कलात्मक फिल् ों का सर्जक आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपनी फिल्मों को लेकर वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे और प्रेरित करते रहेंगे। रितुपर्णो उन लोगों में से थे, जो फिल्मों को अपने भीतर महसूस करते थे। फिल्में उनके भीतर उगती थी, जिसे वे पूरी शिद्दत के साथ महसूस करते और परदे पर उतारते थे। सिनेमा से इतने गहरे तक जुड़ा कलाकार आज अपना स्थान खाली छोड़ गया है। जिसे भरना मुश्किल है। एक हद तक उन्होंने सत्यजीत राय की कमी को पूरा करने की कोशिश की, पर अब उनकी कमी को कौन पूरी करेगा, यह प्रश्न स्वाभाविक है।
कर्द लोग हमेशा पुरानी चीजों को ही अच्छा बताते हैं। नई चीजों की ओर वे देखना ही नहीं चाहते। वे तो अभी तक यही मान रहे थे कि सत्यजीत राय के बाद उन जैसा निर्देशक भारत की भूमि पर आया ही नहीं। उनकी नजर रितुपर्णो की तरफ गई ही नहीं। आज जब वे हमारे बीच नहीं है, तब लग रहा है कि सचमुच उन्होंने सत्यजीत राय की जगह संभाल ली थी। पर अब क्या होता है यह कहने से। समय रहते ही उन्हें पहचान लिया होता, तो शायद वे कुछ और फिल्में हमें दे जाते। अपने बीस वर्ष के कैरियर में उन्होंने करीब 20 फिल्में बनाई। श्रेष्ठ निर्देशन के लिए 8 पुरस्कार और श्रेष्ठ दिग्दर्शन के लिए 3 और श्रेष्ठ कथा के लिए एक पुरस्कार उन्हें मिला। बंगला-हिंदी सिनेमा को उन्होंने नया आयाम दिया। दृश्यावलि की रचना से लेकर कैमरे के फ्रेम के किसी कोने में कहीं दूर नल से टपकते पानी की आवाज को वे एक पात्र की तरह अपनी फिल्मों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने बंगला में जो फिल्में बनाई हैं, वे भाषा के कारण हम तक नहीं पहुंच पाई हो, पर इतना तो तय है कि चोखेर बाली और रेनकोट को हम सबने देखा और सराहा। इन दो फिल्मों का एक-एक दृश्य आज भी हमें भावनाओं से भर देते हैं। कई जगह तो ऐसा लगा कि वे फिल्म नहीं बल्कि कविता पढ़ रहे हों। अजय देवगन ने स्वीकारा कि मुझसे इतना बढ़िया अभिनय केवल रितुपर्णो घोष ही करवा सकते थे। रेनकोट देखकर तो मुझे भी ताज्जुब होता है।
रितुपर्णो पुरुष थे या नारी? नाम तो नारी का लगता है। उनका पहनावा भी आम महिलाओं जैसा ही रहता था। सच क्या है? इन सबका जवाब आज की पीढ़ी को देने की कतई आवश्यकता नहीं है। उनके लिए तो यही कहा जा सकता है कि रितुपर्णो ारतीय सिनेमा को मिले किसी वरदान से कम नहीं थे। रितुपर्णो यूं तो अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे। पर भीतर का कवि उन्हें कभी चैन से बैठने नहीं देता। दिल को हिला देने वाली कविताएं पढ़कर यही लगता है कि यदि उन्होंने केवल कविताएं ही लिखी होती, तो वे साहित्य के क्षेत्र में बहुत ही आगे होते। कविता की तरह फिल्मों से उनका गहरा लगाव था। अपने प्रारंभिक दिनों में उन्होंने कॉलेज में पढ़ते हुए एक फिल्म बनाई। जब फिल्म का प्रदर्शन कॉलेज में हुआ, तो वहां असम के कवि और संगीतकार भूपेन हजारिका मु य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। फिल्म खतम हुई, तो उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर से मिलने की इच्छा जताई। इसके बाद उनकेसामने जो व्यक्ति आया, उसे देखकर भूपेन दा हतप्रभ रह गए। वे निर्निमेष उन्हें देखते रहे। आनंद बाजार पत्रिका के सित बर 2008 के अंक में रितुपर्णो ने अपने इस अनुभव के बारे में लिखा है कि हालांकि उस ममय भी मैं उतना ही बोल्ड था, पर तब तक मैंने महिलाओं का पहनावा छोड़ा नहीं था।
भूपेन दा से हुई अपनी इस मुलाकात के बाद रितुपर्णो के भावविश्व को फिल्मों की उड़ान मिली। भूपेन दा के कहने पर उन्होंने महिला निर्देशक कल्पना लाजमी की वर्कशॉप में कुछ समय तक काम किया। एक बार आधी रात को रितुपर्णो ने कल्पना लाजमी को फोन किया और कहा-‘ए फिल्म राहजिंग विदीन’ यानी मेरे भीतर एक फिल्म ऊग रही है। मेरे भीतर एक आंधी चल रही है। ऐसा लग रहा है, जैसे मेरे भीतर एक फिल्म का उदय हो रहा है, जिसे मैं महसूस कर रहा हूं। एक सच्चे कलाकार के साथ ऐसा ही होता है, जब वह अपनी फिल्म के लिए पूरी तरह से डूब जाता है। वह फिल्म की धड़कन को अपने भीतर महसूस करता है। उसके रोम-रोम में फिल्म बस गई थी। कल्पना लाजमी को लग गया था कि यह आदमी अब फिल्म बनाए बिना कुछ नहीं करेगा। फिल्म तो वह बनाएगा ही। पर कैसे? यह प्रश्न विचारणीय था। तब भूपेन दा और कल्पना लाजमी ने कुछ आíथक सहायता की। फिल्म बनी, जिसका नाम था हीरेर आंग्टि यानी हीरे की अंगूठी। अपनी इस पहली ही फिल्म में उन्होंने कैमरा वर्क से लेकर निर्देशन में अपनी मौलिक भाषा का स्पर्श दिया। उनका यह विचार था कि मेरी फिल्म में पात्र कम बोलें, पर बैकग्राउंड स्कोर अवश्य अधिक हों। इसलिए उनकी फिल्मों में बैकग्राउंड की ध्वनि भी कुछ न कुछ कहती दिखाई देती है। आंगिक अभिनय उनकी फिल्मों की विशेषता रही है। जब रितुपर्णो ने कल्पना जी को फोन किया, तो उनके भीतर दो फिल्में उमड़-घुमड़ रही थी। जिस फिल्म पर वे ज्यादा जोर दे रहे थे, उसका विषय बहुत ही गुम्फित था। इसलिए पहली फिल्म करने के बाद दूसरी फिल्म में रितुपर्णो ने अपने कुछ हाथ आजमाए। दूसरी फिल्म उनके मनपसंद विषय पर थी। इस फिल्म का विषय था कला के प्रति गहरे लगावा के कारण पारिवारिक जिंदगी के साथ तालमेल न कर पाने वाली एक अकेली नारी और उसका अकेलापन। बेटी के साथ संघर्ष और कला के प्रति अपार समर्पण। इस तरह के विषय के साथ यदि वे बॉलीवुड में आते, तो उन्हें तुरंत ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता। उनकी मनपसंद विषय पर यह फिल्म थी-19 अप्रैल। एकदम ही मौलिक फिल्म। इसी ने रितुपर्णो को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया। इससे उनकी पहचान भी कायम हुई।
रितुपर्णो की हर फिल्म में विषयों का अद्भुत वैविध्य रहा है। तीसरी फिल्म दहन सड़क पर हुए एक हादसे पर एक महिला के संघर्ष पर केंद्रित है। चौथी फिल्म शादी के दूसरे ही दिन पति को खोने वाली महिला के संघर्ष को लेकर है। पांचवीं फिल्म बेटी की कमाई पर जीते एक संवेदनशील कलाकार पर केंद्रित है। ये सभी फिल्में रितुपर्णो को राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाती रहीं। आज क्षेत्रीय फिल्मों की जो स्थिति है, उससे ऐसा नहीं लगता कि कोई ऐसी फिल्में बनाए और लगातार राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करता रहे। फिल्मों से गहरा जुड़ाव और उनकी सूझबूझ ही उनकी फिल्मों की विशेषता रही है। जो उन्हें अव्वल दर्जे का निर्देशक साबित करती है। उनकी फिल्मों में मानवीय संवेदना विशेषकर नारी पात्र को बहुत ही कलात्मक और सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। फिर बारीवाली की किरण खेर हो या अबोहमन की ममता शंकर हो, चोखेरबाली एवं रेनकोट की ऐश्वर्या राय हो, सभी में नारी पात्र सरल एवं संवेदनशील के अलावा आक्रामक रूप से हमारे सामने आती हैं। कला सौंदर्य से लेकर संवेदनशील कलम से रितुपर्णो ने नारी पात्र को इतने सहज ढंग से प्रस्तुत किया है कि एक एक पात्र का एक-एक आलेख के रूप में वर्णन किया जा सकता है। उनकी फिल्मों में नारी का प्रचुर मानवीय भाव हमेशा छलकता रहा है।
ओ. हेनरी की लोकप्रिय कहानी गिफ्ट ऑफ मेगी पर आधारित हिंदी फिल्म रेनकोट में अजय देवगन और ऐश्वर्या राय से रितुपर्णो ने जो अभिनय कराया है, उससे उनके अभिनय करा ले जाने की क्षमता का पता चलता है। दोनों का अभिनय देखकर लोग वाह-वाह कर उठे। यह सच है कि रेनकोट की कहानी से हर कोई वाकिफ था। अब क्या होगा, यह सभी को पता था। पर घटना किस तरह से घटित होगी, यह उत्कंठा आखिर तक बनी रही। एक-एक दृश्य के बाद यही लगता है कि अगला दृश्य कितना संवेदनशील होगा। सभी दृश्य हृदयस्पर्शी हैं। एक एक फ्रेम कसी हुई। संवेदनाओं से भरपूर। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि घटना की जानकारी सभी को है, पर घटना किस तरह से घटित होगी, यह जिज्ञासा ही दर्शकों को बांधे रखती है।
समलैंगिकता पर अपने विचार के कारण चर्चित रितुपर्णो इतने अधिक राष्ट्रीय पुरस्कारों को प्राप्त करने के बाद लोकप्रियता के जिस मुकाम पर उन्हें होना था, वहां तक नहीं पहुंच पाए। उनकी कदर उतनी नहीं हो पाई, जिसके वे वास्तव में हकदार थे। अभी उनकी उम्र की क्या थी। मात्र 49 वर्ष। यह भी भला कोई उम्र होती है बिदा लेने की। पर क्या करें, वे चले गए अपनी कुछ फिल्मों को छोड़कर। एक कलाकार को जो पहचान अपनी फिल्मों से मिलती है, वैसी ही फिल्मों को हमारे बीच छोड़कर वे चिरंजीवी हो गए। आप जब भी उनकी फिल्मों को देखेंगे, तो ऐसा नहीं लगेगा कि वे हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि उनकी फिल्में हमसे बात करती रहेंगी।  उन्हें समझने के लिए उनकी फिल्में देखना और उसे समझने के अलावा उसमें डूबना होगा, तभी हम समझ पाएंगे कि रितुपर्णो कैसे निर्देशक थे, उनके विचार किस तरह से कलाकारों के भीतर से आते थे। जो अपनी देह पर फिल्म को ऊगता महसूस करे, उससे बड़ा कलाकार और कौन हो सकता है भला?
  डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 3 जून 2013

हमारे पास श्रीलंका जैसी इच्छाशक्ति का संपूर्ण अभाव

डॉ. महेश परिमल
आजकल मीडिया में भारत निर्माण के बड़े-बड़े विज्ञापन आ रहे हैं। इन विज्ञापनों को देखकर यही लगता है कि भारत ने अभी-अभी ही प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ना शुरू किया है। भारत निर्माण के लिए यदि यूपीए सरकार को श्रेय जाता है, तो नक्सल निर्माण का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए? कोई बता सकता है? यह देश की विडम्बना है कि एक तरफ आईपीएल में करोड़ों का सट्टा खेला जा रहा है, तो दूसरी तरफ उन आदिवासियों का जीवन है, जो एकदम नारकीय हो गया है। उन्हें अपनी ही माटी से दूर जाना पड़ रहा है। ठीक कश्मीरी ब्राह्मणों की तरह! देश की इन दो तस्वीरों से ही स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश की नीतियां ही ऐसी नहीं है कि वह आतंकवाद का मुकाबला डटकर कर सके। कब आएगी हममें, श्रीलंका सरकार जैसी इच्छा शक्ति? जिसने लिट्टे को खत्म करने में कोई कसर बाकी न रखी। अब कोई राज्य ऐसा नहीं बचा, जो नक्सलवाद से अछूता हो। नक्सलवाद अब पूरे देश की समस्या बन गया है, पर इस पर काबू पाने में अभी भी देश की नीतियां कमजोर साबित हो रही हैं।
सुकमा में गत 25 मई कों हुई नक्सलवादी घटना से पूरा देश आहत है। इस घटना ने यूपीए सरकार के भारत निर्माण का असली चेहरा सामने ला दिया है। देश में आजादी के साढ़े 6 दशक के बाद देश का एक वर्ग इतना अधिक नाराज है कि उसने अपने हाथ में शस्त्र उठा लिए हैं। नक्सलवाद कोई एकदम से आई समस्या नहीं है, यह समस्या 1960 से शुरू हो गई थी। अभी तक सैकड़ों पुलिसकर्मियों एंव अधिकारियों ने अपनी आहुति दी है। पर सत्ता पर बैठे नेताओं ने इस समस्या को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया। अब जब यह नक्सलवाद से कुछ नेताओं का बलिदान हुआ है, तो उन्हें यह समझ में आ रहा है कि इस समस्या का समाधान होना ही चाहिए। जब भी नक्सलवाद के खिलफ कड़े कदम उठाए गए है, तो उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ा है। देश का एक वर्ग ऐसा भी है, जो नक्सलवाद का समर्थन करता है। यह वर्ग स्वयं को अतिबुद्धिवादी मानता है। नक्सलवाद ने जब भी पुलिसकर्मियों की हत्या की, तब तक राजनीतिक दल केवल बयानबाजी करके रह जाते थे। अब जब वे नेताओं की हत्या करने लगे, तो उन्हें यह समस्या विकट दिखने लगी है।
बस्तर जिले की घटना ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या अब आम आदमी के बाद देश में नेता भी सुरक्षित नहीं है? पिछले एक दशक में जिस तरह से देश में नेताओं की छबि बिगड़ी है, उतनी किसी की नहीं। देश आज यदि बरबादी के कगार पर है, तो लोग इसके लिए देश के नेताओं को ही दोषी मानते हैं। इसके लिए आम आदमी को अपने गिरेबां में झांककर देखना चाहिए, आखिर ऐसे नेताओं को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजा किसने? कुछ लोग केवल इसलिए ही वोट नहीं देते कि जब सांपनाथ और नागनाथ में से एक को चुनना ही है, तो किसी को वोट न दिया जाए, इसी गफलत में ऐसे नेता जीत जाते हैं, जिनके जीतने की थोड़ी भी गुंजाइश नहीं होती। अगर देश का आम आदमी सजग होकर अपने वोट का सही इस्तेमाल करे, तो देश की जो स्थिति आज है, वह कदापि न होती। नक्सलियों द्वारा नेताओं को मारे जाने की घटना के बाद कई तरह के बयान सामने आए, पर किसी कांग्रेसी नेता ने यह नहीं कहा कि नक्सलवाद को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देना चाहिए। नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया कोई दल नहीं चाहता। क्योंकि हर दल का स्वार्थ किसी न किसी तरह से नक्सलवाद से जुड़ा है। यह सच है कि यदि नक्सलियों को नेताओं, व्यापारियों, उद्योगपतियों का समर्थन न मिले, तो इनका विस्तार हो ही नहीं सकता। व्यापारी नक्सलियों को केवल इसलिए आर्थिक सहायता करते हैं कि वे उन्हें पुलिस के प्रकोप से बचाएंगे। उद्योगपति उन्हें इसलिए धन देते हैं कि वे आसानी से अपना उद्योग चला सके। उनके संस्थान में किसी तरह का अवरोध न आने पाए, मजदूरों की हड़ताल आदि से उन्हें मुक्ति मिल जाए। नेता उनका समर्थन केवल और केवल वोट के लिए ही करते हैं।
सामान्य प्रजा यह मानती है कि जो व्यवहार नक्सली आम आदमी के साथ कर रहे हैं, वही व्यवहार उनके साथ भी किया जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सरकार के पास दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। जिस तरह से लिट्टे के खात्मे के लिए श्रीलंका सरकार ने कमर कसकर उससे लोहा लिया और उसे नेस्तनाबूद कर दिया, ठीक वैसा ही केंद्र और राज्य सरकार मिलकर करें, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। पर केंद्र इसे राज्य का मामला बताता हे और राज्य सरकारें कहती हैं कि बिना केंद्रीय सहायता के इस समस्या से मुक्ति नहीं मिल सकती। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बरसों से जारी है। अब जब नक्सलियों ने जिस तरह से नरसंहार किया है और नेताओं को निशाना बनाया है, उससे यह लगता है कि इस बात पर केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कुछ करेंगे। नक्सलवाद पर नकेल कसने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, पर सबमें कहीं न कहीं राजनीति आ जाती है, इसलिए मामला आगे नहीं बढ़ पाता है। कई बार ऐसा होता है कि नक्सलवाद के खात्मे के लिए निकले पुलिस और सेना के जवान आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। इससे आदिवासियों का क्रांधित होना लाजिमी है। वैसे भी किसी देश के लिए नक्सलवादियों से निपटना ऐसा ही है, जैसे गृहयुद्ध हो। भारतीयों द्वारा ही भारतीयों की हत्या। एक तरफ मानवाधिकार वाले बार-बार पुलिस की बर्बरता पर सवाल उठाते रहते हैं, पर जब नक्सली उससे भी अधिक बर्बरता बरतते हैं, तब वे खामोश हो जाते हैं। श्रीलंका में तमिल उग्रवादियों के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी गई, उसमें एक सोची-समझी नीति के तहत लिट्टे का खात्मा किया गया। पहले तो उसके अड्डे को चारों तरफ से घेर लिया गया। फिर क्या था, पहले तो लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण का खात्मा किया, उसके बाद उनके साथियों का। इस काम में श्रीलंका ने किसी की परवाह नहीं की। उसने अपने सामने देश को रखा, वहां के नेताओं ने भी नेशन फस्र्ट थ्योरी का भरपूर समर्थन किया। मानवाधिकार वाले चिल्लाते रहे, पर सरकार ने उनकी नहीं सुनी। उसी समय भारत में तमिलनाड़ु में डीएमके अध्यक्ष करुणानिधि ने तमिलों पर अत्याचार का राग अलापा था, पर लोग समझ गए कि यह वोट बटोरने की राजनीति है, इसलिए उनके बयानों पर ध्यान ही नहीं दिया गया।
सवाल यह उठता है कि जब श्रीलंका सरकार ऐसा कर सकती है, तो भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती? भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि कदम-कदम पर राजनीति आड़े आती है। यदि सरकार नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो आदिवासी वोट उनके हाथ से चले जाएंगे, यही धारणा सरकार को विवश कर देती है कुछ न करने के लिए। इधर सरकार को अपने वोट की पड़ी है, उधर निर्दोष मारे जा रहे हैं। सरकार की स्थिति बड़ी विचित्र है। एक तरफ धन की वर्षा करने वाला आईपीएल का तमाशा है, तो दूसरी तरफ नक्सलवादी नेताओं को उड़ा देने की योजना बना रहे हैं। एक तरफ की दुनिया चकाचौंध भरी, दूसरी तरफ की दुनिया एकदम अंधकारमय। भारत निर्माण का सारा श्रेय यूपीए सरकार ले रही है, पर यह कोई बता सकता है कि नक्सलवाद को जन्म किसने दिया, किसकी शह पर ये फले-फूले, किसने इन्हें चलना और गोली चलाना सिखाया? बिना राजनैतिक संरक्षण के इतना बड़ा संगठन कभी इस देश में खड़ा होकर चल भी सकता है, इसका उत्तर किसके पास है?
  डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 31 मई 2013

कब तक जान लेगा तम्‍बाखू





विश्‍व धूम्रपान निषेध दिवस पर आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 15 मई 2013

आंध्र प्रदेश से बही बयार


आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख


आंध्र प्रदेश से बही बयार
डॉ. महेश परिमल
 फिल्म ‘सिंघम’ का वह दृश्य याद होगा, जिसमें सारे पुलिस कर्मचारी यह तय करते हैं कि अब हम जो भी काम करेंगे, अपने अधिकारियों के कहने पर ही करेंगे। पुलिस स्टेशन के सारे फोन बंद कर दिए जाते हैं। ताकि किसी मंत्री या नेता का फोन न आने पाए। कुछ ऐसा ही हाल ही में हुआ है। जब आंध्र के डीजीपी ने साहस पूर्वक पुलिस की बदली में किसी मंत्री या नेता का कहना नहीं माना। पुलिसकर्मियों के मनचाही पोस्टिंग के लिए मंत्री एवं विधायकों की सिफारिशों को डीजीपी ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। डीजीपी की इस कार्रवाई से मंत्रियों एवं नेताओं में खलबली है। एक और मामले में शिक्षकों के तबादले एवं नियुक्ति में भी शिक्षा विभाग के प्रमुख राजेश्वर तिवारी ने भी मंत्रियों, सांसदों एवं विधायकों की सिफारिशों को अमान्य करते हुए अपने विवेक से काम लिया है। इसे आज की लिजलिजी व्यवस्था के खिलाफ एक छोटी सी चिंगारी ही कहा जाएगा, पर सच यही है कि यही चिंगारी भविष्य में दावानल का रूप ले सकती है।
आंध्र प्रदेश में एक अनापेक्षित घटना में राज्य के डीजीपी दिनेश रेड्डी ने राज्य भर में 50 से अधिक उेप्युटी सुप्रीन्टेडेंट का एक साथ तबादला कर दिया गया है। वैसे डीजीपी को यह अधिकार भी है कि वे जिसे चाहें, जहां चाहें तबादला कर सकते हैं। लेकिन ऐसा वहां पहली बार हुआ है कि पुलिस तबादलों के पहले उनके पास आई तमाम मंत्रियों एवं विधायकों की सिफारिशों को अमान्य कर दिया। अभी तक गृहमंत्री सविता रेड्डी, वित्त मंत्री रामनरायण रेड्डी, पर्यटन मंत्री वसंत कुमार और एवं अन्य मंत्रियों और रसूखदार सांसद अपने हिसाब से अपनों को मनचाही जगह पर पोस्टिंग करवा देते थे। पर इस बार ऐसा नहीं हो पाया। जिससे पूरे राज्य में एक तरह से सन्नाटा छा गया है। डीजीपी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि राज्य के तमाम मंत्री, सांसद एवं विधायक भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं। ऐसे में यदि उनके हिसाब से पुलिस अधिकारियों की पोस्टिंग की जाती, तो भ्रष्टाचार को और अधिक बढवा मिलता। इसलिए इस बार उन्होंने स्वयं को प्राप्त अधिकारों का उपयोग करते हुए तमाम रसूखदारों की सिफारिशों को अमान्य करते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल किया।
इस संबंध में एक आईएएस अधिकारी ने बताया कि अब हम बिना कानून के नियमों का अमल कर पाप के भागीदार नहीं बनना चाहते। रसूखदारों के कहने पर हमें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहा है। इस बार हमने वही किया, जो नैतिक दृष्टि से सही है। इसी तरह शिक्षकों के तबादले को लेकर शिक्षा विभाग के प्रमुख राजेश्वर तिवारी ने भी तमाम रसूखदारों की सिफारिशों को ताक पर रखकर अपने विवेक का इस्तेमाल किया। आंध्र में चली बदलाव की यह बयार भ्रष्टाचार के खिलाफ एक छोटी से जंग है। जंग भले ही छोटी हो, पर यदि ऐसा सभी राज्यों में हो, तो निश्चित रूप से एक क्रांति का जन्म हो सकता है। आज देश का कोई भी विभाग राजनीति के दखल से नहीं बच पाया है। हर जगह सिफारिशों का दौर जारी है। लोग अपनी मनचाही जगह पर जाने के लिए अपार धन भी लुटाने को तैयार रहते हैं। ऐसे में जनता के प्रतिनिधि आगे आकर अपने रसूख का इस्तेमाल कर काफी कमा लेते हैं। इनके द्वारा इस तरह के अनैतिक कार्य कराने की पूरी श्रंखला होती है। जिसके तहत से अपना काम करा ले जाते हैं। साधारण से तबादले में भी हमारे जनप्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसे अब तक अनदेखा किया जा रहा था। जबकि इससे हर कोई अच्छी तरह से वाकिफ था। आंध्र में जो कुछ हुआ, उसका असर यदि अन्य राज्यों में भी हो,तो बहुत अच्छी बात होगी। पर यदि आंध्र के डीजीपी का ही तबादला कर दिया जाए, तो इसे उच्च स्तर का भ्रष्टाचार ही कहा जाएगा। वैसे यह तय है कि डीजीपी ने यह ऐतिहासिक कदम बिना मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी से बिना पूछे नहीं उठाया होगा। एक तरह से इस काम के लिए उन्हें मुख्यमंत्री की स्वीकृति थी।
उधर भले ही आंध्र के मंत्री मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे हों। संभवत: उनकी न चलने के कारण अब नाराज मंत्रियों ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री चिरंजीवी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछाला है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी से नाराज आंध्र प्रदेश के मंत्रियों ने वर्ष 2014 के चुनावों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अब केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री के. चिरंजीवी के नाम को उछालना शुरू किया है। चिरंजीवी खुद भी मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए कुछ फैसले से खुश नहीं हैं और बिजली की दरों में बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर वह सार्वजनिक रूप से विरोध कर चुके हैं। यह घटनाRम ऐसे समय पर हो रहा है जब कांग्रेस के आलाकमान को विभिन्न मुद्दों पर कई तरफ से मुख्यमंत्री के खिलाफ शिकायतें मिली हैं।
कुछ भी कहो, पर सच तो यही है कि अब आंध्र में परिवर्तन की हवा बहनी शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री को हटाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में डीजीपी का भी वहीं जमे रहना मुश्किल लगता है। पर यदि उन्होंने यह तय कर लिया है कि अब किसी भी तबदलों में रसूखदारों की सिफारिशें नहीं चलेंगी, तो इसे राज्य के लिए बेहतर शुरुआत कहा जा सकता है। पर जैसा कि हमेशा से होता आया है कि अच्छी शुरुआत किसी को भी भली नहीं लगती। जब रसूखदारों की सिफारिशें अमान्य होने लगेंगी, तब तो उनके होने का अर्थ ही क्या रह जाएगा? उनकी पूछ-परख खत्म हो जाएगी, उनके अस्तित्व पर ही संकट छा जाएगा। देश की लिजलिजी व्यवस्था पर चोट करने के लिए इस तरह के प्रयास आवश्यक हैं। तभी लोकतंत्र बचा रह पाएगा, अन्यथा आज तो गली-गली में लोकतंत्र की धज्जियां ही उड़ रही हैं। केंद्रीय सत्ता इसलिए बार-बार बदनाम हो रही है। ऐसे में आंध्र के डीजीपी दिनेश रेड्डी और शिक्षा विभाग के अध्यक्ष ने जो कदम उठाया है, उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। रोम्या रोलां ने कहा है कि यदि कोई चीज आराम से अपना काम कर रही हो, तो उसे बरबाद करने के लिए उसमें थोड़ा सा राजनीति का समावेश कर दो, वह बरबाद हो जाएगी। आज वही हो रहा है, जिसमें भी राजनीति ने अपना दखल दिया है, वह बरबाद हो गया है। राजनीति के इस कीड़े से देश को बचाया जाना आवश्यक हो गया है।
    डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 10 मई 2013

भारी पड़ी येद्दि की बगावत

डॉ. महेश परिमल
कर्नाटक चुनाव के परिणाम हम सबके सामने हैं। राहुल गांधी मुस्करा रहे हैं, उधर नरेंद्र मोदी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं। येद्दियुरप्पा की बगावत भाजपा को इतनी भारी पड़ेगी, यह तो उसने कभी नहीं सोचा था। वैसे भी येद्दि ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे भाजपा को सत्ता से बाहर कर देंगे। उन्होंने अपना वादा निभाया। पूर्ण बहुमत लेकर कांग्रेस दस वर्ष बाद फिर सत्ता पर काबिज हुई है। एक तरह से उसके लिए एक राहत ही है। कर्नाटक चुनाव परिणाम से एक संदेश यह भी जाता है कि अब प्रमुख पार्टियों को क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को कम करके नहीं आंकना चाहिए। कर्नाटक में जेडी (एस)दूसरे नम्बर पर है। भाजपा तीसरे नम्बर पर रही। अपने बड़बोलेपन के कारण अपनी पहचान बनाती मायावती की बसपा कर्नाटक में खाता ही नहीं खोल पाई। पहले ऐसा माना जाता था कि बसपा कांग्रेस के दलित वोट बैंक को तोड़ने में कामयाब होगी, पर ऐसा नहीं हो पाया। एक संदेश यह भी गया कि बगावती को कभी भी कमजोर नहीं समझना चाहिए। येद्दियुरप्पा की बगावत ने आज कर्नाटक का राजनीतिक समीकरण ही बदल दिया। एक व्यक्ति क्या कर सकता है? यह प्रश्न अभी सभी प्रमुख दलों के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। कर्नाटक में जो येद्दि ने किया, वह गुजरात में केशुभाई पटेल और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह नहीं कर पाए। इन तीनों में यह साम्यता है कि इनका आधार आरएसएस है।
कर्नाटक में कांग्रेस को अपनी जीत से उतनी खुशी नहीं है, जितनी भाजपा की हार से। यहां कांग्रेस ने भाजपा को जो झटका दिया है, उसे भाजपा कभी भूल नहीं सकती। भाजपा के कमजोर प्रदर्शन से राहुल गांधी के चेहरे पर मुस्कराहट है। नरेंद्र मोदी का चेहरे पर तेज उतर गया है। दक्षिण भारत में मिला एकमात्र राज्य को भाजपा संभाल नहीं पाई। यह उसके लिए आत्मचिंतन का विषय है। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के लिए कर्नाटक चुनाव एक एसिड टेस्ट की तरह था। इसमें राहूुल तो पास हो गए, पर नरेंद्र मोदी की हालत पतली हो गई है। अब यह भ्ज्ञी सिद्ध हो गया है कि मतदाता यदि चुनावी सभा में आते हैं, तो इसका यह आशय कतई नहीं है कि वे उसे वोट देने के इरादे से आते हैं। हिमाचल के बाद नरेंद्र मोदी की यह दूसरी परीक्षा थी। नरेंद्र मोदी भीड़ तो इकट्ठी कर सकते हैं, पर वोट डालने के लिए मतदाताओं को विवश नहीं कर सकते। भीड़ कभी वोट में तब्दील नहीं हो सकती। यह कर्नाटक चुनाव ने बता दिया। गुजरात में जो हालत कांग्रेस की हुई है, वह हालत भाजपा की कर्नाटक में हुई है। कर्नाटक में इस बार क्षेत्रीय पार्टियों और बागियों ने अपनी ताकत दिखाई है। गुजरात में कांग्रेस-भाजपा की लड़ाई आमने-सामने थी, जबकि कर्नाटक में जंग चतुष्कोणीय थी। भाजपा ने 70 सीटें खोई है, कांग्रेस को 41 सीटें अधिक मिली हैं। जेडीए ने भी अपनी बढ़त बनाते हुए 12 सीटें अधिक प्राप्त की है। इसी तरह केजेपी को 6 और अन्य दलों को 12 सीटें अधिक मिली है। भाजपा को भ्रष्टाचार पर अपनी नीति को स्पष्ट करना होगा। कहीं न कहीं भाजपा को यह दंभ था कि कर्नाटक में उसकी कभी हार नहीं हो सकती, अब यह दंभ भाजपा को शोभा नहीं देता। कहीं कहीं इस तरह का दंभ कांग्रेस में भी दिखता है।
प्रश्न यह है कि क्या कर्नाटक चुनाव का असर केंद्र की राजनीति को कहां तक प्रभावित करेगा। केंद्रीय राजनीति डांवाडोल है। कर्नाटक की जीत से कांग्रेस लोकसभा में बहुमत प्राप्त कर लेगी, यह सोचना गलत होगा। पर अखिल भारतीय कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के लिए यह एक अग्निपरीक्षा थी। जिसे उन्होंने पूरी सफलता के साथ उत्तीर्ण कर ली। इस परिणाम से यह भी सामने आया है कि राहुल युवाओं में लोकप्रिय हैं। दूसरी ओर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राजनाथ सिंह के लिए यह एक झटका है। 2014 के लोकसभा चुनाव का यह पहला सेमी फाइनल मैच था, जिसमें भाजपा केवल  50 रन भी नहीं बना पाई। वैसे देखा जाए, तो भाजपा ने अहम की लड़ाई में हार का सामना किया है। इस लड़ाई में परदे के पीछे आरएसएस एवं उसकी शाखाओं का वर्चस्व था। भाजपा ने युवाओं को लुभाने की यहां कभी कोशिश ही नहीं की, इसलिए यदा-कदा ऐसे किस्से सामने आते रहे, जिसमें भाजपा ने युवाओं के प्रति क्रूर रवैया अपनाया। मॉरल पुलिस के नाम पर भाजपा संगठनों ने युवाओं पर अपना गुस्सा उतारा था। चुनाव में हार-जीत चलती ही रहती है, पर इस समय तो भाजपा के लिए यह आत्म मंथन का विषय है कि आखिर बगावत को किस तरह से रोका जाए? कांग्रेस जब उत्तर प्रदेश में हारी, तब उसकी स्थिति भी भाजपा जैसी ही थी। कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं। उत्तर प्रदेश में कुल 80 सीटें हैं। कांग्रेस-भाजपा में मूल लड़ाई तो इन्हीं 80 सीटों के लिए ही है। क्योंकि यहीं की सीटों की बदौलत मुलायम-मायावती केंद्र की सरकार पर नकेल डालते रहते हैं। कर्नाटक के चुनाव परिणाम कांग्रेस को थोड़ी राहत तो दे ही सकते हैं, पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार पर जो तीखी टिप्पणी की है, उससे कांग्रेस कर्नाटक की जीत की खुशी भी नहीं मना सकती।
कर्नाटक में भाजपा को मिली हार से सबसे अधिक खुशी नीतिश कुमार एवं शरद यादव को हुई होगी। नीतिश कुमार नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं। इस चुनाव परिणाम के बाद नीतिश मोदी के खिलाफ और अधिक आक्रामक हो सकते हैं। एनडीए की बैठक में भाजपा की इस हार की चर्चा तो होगी ही कि विधानसभा के चुनाव किस तरह से लड़े जाएं। इस हार से भाजपा कुछ सीखे, तो अच्छा है। नहीं तो संभव है 2014 के लोकसभा चुनाव में सौ सीटों तक ही सिमट जाए। कुछ भी कर्नाटक के चुनाव ने यह बता दिया कि पार्टी में ऐसे हालात पैदा ही न हों, जिससे बागी पेदा हों। एक बागी क्या नहीं कर सकता, इसे गंभीरता से लेना होगा। इसके अलावा अंतर्कलह पर किस तरह से काबू पाया जाए, यह भी एक सबक है। भाजपा ने यही गलती की। येद्दियुरप्पा के भ्रष्टाचार को पहले तो अनदेखा किया, बाद में उसे गंभीरता से लेते हुए उन्हें पार्टी से निकाल दिया। पर भ्रष्टाचार पर भाजपा की नीतियां स्पष्ट नहीं हो पाई। भ्रष्टाचार को लेकर इधर वह केंद्र पर प्रहार करती रही और उधर येद्दिुयरप्पा के भ्रष्टाचार को संरक्षण देती रही। रेड्डी बंधुओं की करतूतों पर हमेशा परदा डालने वाली भाजपा आखिर किस मुंह से जनता से वोट मांगती? सभाओं में भीड़ से वोट का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। भाजपा के लिए यह गंभीर चिंतन नहीं बल्कि आत्ममंथन का समय है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 9 मई 2013

प्रधानमंत्री के ईमानदार होने के खतरे

डा. महेश परिमल
एक ईमानदार प्रधानमंत्री पूरे देश के लिए कितना घातक होता है, इसे आज के हालात को देखकर समझा जा सकता है। अपनी ईमानदार को बरकरार रखने के लिए प्रधानमंत्री क्या-क्या कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। किसी एक के लिए विश्वासपात्र होने के लिए बाकी के साथ आखिर कितनी बार विश्वासघात होगा, इसे कौन समझ सकता है? बार-बार अपनी ईमानदारी का ढोल पीटने से कोई ईमानदार हो नहीं सकता। फिर भी यदि उसे ईमानदार मान ही लिया जाए, तो फिर वह अपनी ईमानदारी को बरकरार रखने के लिए जो हथकंडे अपनाता है, वह कोई ईमानदार कर नहीं सकता। बिलकुल पापड़ की तरह हो गई है आज की केंद्र सरकार। हवा का एक झोंका ही जिसे गिराने में सक्षम हो, ऐसी सरकार को बचाए रखने की अब पूरी कोशिशें हो रही हैं। एक के बाद एक घोटाले उजागर होते रहे हैं, जनता भी त्रस्त आ चुकी है, इन घोटालों से। लेकिन हमारी सरकार भ्रष्ट मंत्रियों को संरक्षण ही देना जानती है। फिर चाहे वे कानून मंत्री हों, या फिर रेल मंत्री। सबको साथ लेकर चलने से आखिर में अकेलेपन के सिवाय कुछ नहीं बचता है।
कर्नाटक में मतदान हुए। कांग्रेस मे यह आशा जागी कि इस बार कर्नाटक फतह कर लिया जाएगा। कुछ एजेंसियों ने कांग्रेस की जीत के आसार भी बताए। पर सरकार इतनी घिरी हुई है कि इसकी खुशी भी नहीं मना पाई। किस किस को जवाब दे। भ्रष्ट नेता और मंत्रियों के बलबूते चलने वाली सरकार का साथ देने वाले भी भ्रष्ट हैं। यदि साथ देने वाले भ्रष्ट नहीं होते, तो वे भी कब का साथ छोड़ चुके होते। सुप्रीमकोर्ट के आगे सरकार का चीरहरण हो रहा है।  कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का मुंह काला हो गया है। उसकी हालत देखने लायक है। फिर भी सरकार को बचा लेने की पूरी ताकत लगा रही है। ऐसे में लगता है कि अब लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजने ही वाली है। सरकार और सीबीआई की मिलीभगत अब किसी से छिपी नहीं है। सीबीआई का उपयोग या कहा जाए दुरुपयोग सरकार को चलाने औरबचाए रखने के लिए ही किया जा रहा है। इधर सरकार के खिलाफ यदि मुलायम सक्रिय होते हैं, तो उधर सीबीआई भी उनके खिलाफ सक्रिय हो जाते हैं। सक्रिय को निष्क्रिय करने की एक राजनीतिक साजिश चल रही है। जिसमें सरकार के सभी सहयोगी दल और विपक्ष के सभी सहयोगी दल शामिल हैं।
रेल मंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे ने रिश्वत ली, यह सिद्ध हो गया  है। वे रंगे हाथ पकड़े गए हैं। पर चूंकि रेल मंत्री इसमें किसी भी तरह से संलिप्त नहीं है, इसलिए वे इस्तीफा नहीं देंगे। उधर कानून मंत्री कोयला खनन की रिपोर्ट में फेरबदल कर गैरकानूनी कार्य कर रहे हैं, फिर भी सरकार को लगता है कि वे कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं। इसके पहले भी जितने घोटाले हुए, उसमें भी संलिप्त मंत्री तब तक बेदाग थे, जब तक उन्हें पूरी तरह से दोषी नहीं बताया गया। अभी भी सरकार अश्विनी कुमार और पवन कुमार वंसल को मंत्री पद से हटाने में कोई गुरेज नहीं है। पर समस्या यह है कि आखिर कितने मंत्रियों को हटाया जाए। विपक्ष तो गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है। अगर उक्त दो मंत्रियों को हटा दिया जाए, तो फिर सरकार की साख का क्या होगा? अभी प्रधानमंत्री पद पर डॉ. मनमोहन सिंह गांधी परिवार की पहली पसंद हैं। उनके लिए उनकी ईमानदारी ही पर्याप्त है। इस ईमानदार छवि ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है, यह शायद आरटीआई के माध्यम से भी नहीं जाना जा सकता।
केंद्र सरकार लगातार आरोपों एवं घोटालों से घिर रही है। उसके लिए सीबीआई किसी कठपुतली से कम नहीं है। आज सीबीआई की असलियत सामने आ गई है। इससे यह संदेश गया है कि इसके पहले भी सीबीआई ने जितनी भी रिपोर्ट दी है, वह भी कई प्रश्न चिह्न खड़े करती है। पहले सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो इन्वेस्टिगेशन कहा जाता था, अब वह सिद्ध भी हो गया है। अपने 9 पन्नों के जवाब में सीबीआई ने जो कुछ कहा है, वह देश की सच्ची तस्वीर पेश करता है। शायद इस समय देश की हंसी नहीं उड़ रही होगी। कोयला खनन में घोटाले का मामला इतना अधिक विवादास्पद नहीं हुआ होता, यदि उसमें से प्रधानमंत्री को पूरी तरह से बेदाग बताने का प्रयास नहीं होता। ऐसा प्रयास हुआ, इसीलिए मामले ने तूल पकड़ा। केवल एक ही बात सरकार के पक्ष में जाती है कि सरकार के खिलाफ लड़ने वाले स्वयं भी एकजुट नहीं है। उनमें भी आपस में तनातनी है। इसी का पूरा फायदा उठा रही है, कांग्रेस की यूपीए  सरकार। अब सरकार की सारी ऊर्जा अपने मंत्रियों को बचाने में ही लग रही ह। ऐसे में उनके प्रतिनिधि आम नागरिकों के प्रति किस तरह से जवाबदेह हो सकते हैं। सरकार आम आदमियो के लिए क्या कर रही है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। विपक्ष तो यह कह सकता है कि वह सरकार को जगाने का काम कर रही है। पर सरकार जब तक जागे, तब तक शायद बहुत देर हो जाए। मुलायम-मायावती आखिर कब तक खामोश रहेंगे। उन्हें तो अवसर की तलाश है। केंद्र सरकार के साथ मुश्किल यह है कि घोटाले में जब उनका कोई मंत्री शामिल होता है, तो उसे बचाने का प्रयास करती है, पर जब वह मंत्री सहयोगी दलों को होता है,तो उसे इस्तीफा देने के लिए विवश किया जाता है।
सरकार पर चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा है। सरकार पहले अश्विनी कुमार का इस्तीफा लेगी। बंसल का मामला अभी और लटकाया जाएगा। उधर संसद अब तो चलने वाली नहीं है। यह सत्र भी सरकार की नाकामी को छिपाने वाला ही साबित हुआ। कई विधेयक केवल इसीलिए अटके पड़े हैं, पर उसकी चिंता न तो सरकार को है और न ही विपक्ष को। विपक्ष संसद चलने ही नहीं देना चाहती और सरकार भी कुछ ऐसा ही चाहती है। क्योंकि संसद में विपक्ष सरकार पर बुरी तरह से हावी हो जाता है। सरकार को जवाब देते नहीं सूझता। सरकार के लिए आगे के दस महीने बदनामी को झेलने में ही लग जाएंगे। तृणमूल और डीएमके के साथ छोड़ने के बाद सरकार मुलायम-मायावती की छींक से भी हिलने लगी है। ऐसे में बड़े-बड़े घोटालों और मंत्रियों की करतूतों ने सरकार को बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। सिख विरोधी दंगों में सज्जन कुमार का बेदाग बच जाना भी लोकसभा के मतदाताओं को नहीं भाया। 84 के दंगों का जवाब सरकार को 2014 में देना ही होगा। सरबजीत की मौत के बाद जिस तरह की राजनीति हुई, उससे तो यही लगता है कि अब सरकार सारा काम वोट को देखते हुए ही कर रही है। सराकर यह भूल रही है कि वह अश्विनी कुमार और पवन बंसल को बचाने का जितना प्रयास करेगी, उतनी ही उसकी बदनामी होगी।
जनता अब यह सबक सिखाना चाहती है कि देश के प्रधानमंत्री को इतना भी अधिक ईमानदार नहीं होना चाहिए कि उसकी ईमानदारी देश के लिए घातक बन जाए। ईमानदार होना बुरा नहीं है, बल्कि ईमानदारी को बचाए रखने के लिए बेईमानी करना बुरा है। आज देश में यही हो रहा है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

जेपीसी पर सरकार फिर मुश्किल में

आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

पीके घर आज प्यारी दुल्हनिया चली

डॉ.महेश परिमल
बिदाई के समय बेटियों को धार धार रुलाने वाली यह पुरकशिश आवाज की मलिका अब हमारे बीच नहीं है। पर उनकी आवाज का जादू आज भी हमारे सर चढ़कर बोलता है। गीत कोई भी हो, यदि उसे शमशाद जी गा रही हैं, तो तय है यह कंटीली आवाज आपको चुभेगी नहीं। भीतर तक उतर जाएगी। ऐसी आवाज जो रोशनी की तरह बिखरकर पूरे जिस्म में उतर जाती है। लगता है किसी विरही ने अपने प्रियतम के लिए ऐसी तान छेड़ दी है, जो सीधे दिल पर उतर रही है। विरह वेदना से झुलसती नायिका की पीड़ा को यदि किसी ने अपने आवाज दी है, तो वह है केवल शमशाद बेगम। उनकी आवाज का खुरदरापन कभी एक ऐसी टीस पैदा करता है, जिसे समझकर कोई भी तड़प सकता है। इसी तड़प को शमशाद बेगम ने अपनी आवाज में पूरी शिद्दत के साथ पेश किया। न भूलने वाली आवाज, मानों सदियों से गूंज रही थी, अब खामोश हो गई। सचमुच उनका जाना कई आवाजों को खामोश कर जाना है।
कजरा मोहब्बत वाला, अखियों में ऐसा डाला, मेरी नींदों में तुम, मेरे ख्वाबों में तुम, तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर, हम भी देखेंगे और लेके पहला-पहला प्यार जैसे सदाबहार गीतों की फिल्में और संगीतकार भले ही अलग हैं, लेकिन इनमें एक बात समान है कि इन सभी गीतों को शमशाद बेगम ने अपनी खनकदार आवाज बख्शी है।
अपनी पुरकशिश आवाज से हिंदी फिल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेगम के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सच्चाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी काँटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है। उनकी आवाज की यह अदाएँ सुनने वालों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं।
करीब चार दशकों तक हिन्दी फिल्मों में एक से बढ़कर एक लोकप्रिय गीतों को स्वर देने वाली शमशाद बेगम बहुमुखी प्रतिभा की गायिका रहीं। साफ उच्चारण, सुरों पर पकड़ और अनगढ़ हीरे सी चारों तरफ रोशनी की तरह बिखर जाने वाली शमशाद की आवाज जैसे सुनने वाले को बाँध ही लेती थी। उन्होंने फिल्मी गीतों के अलावा भक्ति गीत, गजल आदि भी गाए। गायकों और संगीतकारों पर प्राय: यह आरोप लगाया जाता है कि वे संगीत के चक्कर में शब्दों को पीछे धकेल देते हैं या उच्चारण के मामले में समझौता करते हैं। लेकिन शमशाद बेगम के गानों में यह तोहमत कभी नहीं लगाई जा सकी। उस दौर के बेहद मशहूर संगीतकार ओपी नैयर  ने तो एक बार यहाँ तक कहा था कि शमशाद बेगम की आवाज मंदिर की घंटी की तरह स्पष्ट और मधुर है।
सीआईडी फिल्म में लोकधुनों पर आधारित गीत ‘‘ बूझ मेरा क्या नाम रे ’’ गाने वाली शमशाद ने संगीतकार सी रामचन्द्रन के लिए ‘‘ आना मेरी जान. संडे के संडे ’’ जैसा पश्चिमी धुनों पर आधारित गाना भी गाया, जो उनकी आवाज की विविधता की बानगी पेश करते हैं। इस गाने को हिन्दी फिल्मों में पश्चिमी धुनों पर बने शुरुआती गानों में शुमार किया जाता है। समीक्षकों के अनुसार शमशाद बेगम की आवाज में एक अलग ही वजन था, जो कई मायने में पुरुष गायकों तक पर भारी पड़ता थी। मिसाल के तौर पर रेशमी आवाज के धनी तलत महमूद के साथ गाए गए युगल गीतों पर स्पष्ट तौर पर शमशाद बेगम की आवाज अधिक वजनदार साबित होती है।
अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 में जन्मी शमशाद बेगम उस दौर के सुपर स्टार गायक कुंदनलाल सहगल की जबरदस्त फैन थी। एक साक्षात्कार में शमशाद बेगम ने बताया कि उन्होंने के एल सहगल अभिनीत देवदास फिल्म 14 बार देखी थी। उन्होंने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब से संगीत की तालीम ली। शमशाद बेगम ने अपने गायन उनकी सुरीली आवाज ने उस्ताद बख्शवाले साहब का ध्यान खींचा और उन्होंने शमशाद बेगम को अपनी शागिर्दी में ले लिया। लाहौर में रहने वाले संगीतकार गुलाम हैदर को उनकी विशिष्ट आवाज भा गई और उन्होंने उनकी आवाज का इस्तेमाल %खजांची% (1941) और %खानदान% (1942) जैसी फिल्मों में किया। गुलाम हैदर 1944 में मुंबई आ गए और शमशाद बेगम भी उनके दल में शामिल होकर मायानगरी पहुँच गई। महबूब खान उस समय हुमाँयू (1944) नामक फिल्म बना रहे थे। इसमें संगीतकार के तौर पर गुलाम हैदर को रखा गया। हैदर ने शमशाद बेगम की आवाज का बखूबी इस्तेमाल किया। उस जमाने में अमीरबाई कर्नाटकी शीर्ष पार्श्व गायिका हुआ करती थीं। शमशाद बेगम के रूप में बॉलीवुड में नई आवाज आने के बाद संगीतकारों में शमशाद बेगम की आवाज का इस्तेमाल करने की होड़-सी मच गई। ओपी नैयर, नौशाद, एसडी बर्मन जैसे संगीतकारों ने अपने करियर की शुरूआत में उनकी आवाज का जबर्दस्त इस्तेमाल किया और एक से बढ़कर एक सदाबहार गाने दिए।की शुरुआत रेडियो से की। 1937 में उन्होंने लाहौर रेडियो पर पहला गीत पेश किया। उस दौर में उन्होंने पेशावर, लाहौर और दिल्ली रेडियो स्टेशन पर गाने गाए। शुरुआती दौर में लाहौर में निर्मित फिल्मों खजांची और खानदान में गाने गाए। वह अंतत: 1944 में बंबई आ गईं। मुंबई में शमशाद ने नौशाद अली, राम गांगुली, एसडी बर्मन, सी रामचन्द्रन, खेमचंद प्रकाश और ओपी नैयर  जैसे तमाम संगीतकारों के लिए गाने गाए। इनमें भी नौशाद और नैयर  के साथ उनका तालमेल कुछ खास रहा क्योंकि इन दोनों संगीतकारों ने शमशाद बेगम की आवाज में जितनी भी विशिष्टताएँ छिपी थी उनका भरपूर प्रयोग करते हुए एक से एक लोकप्रिय गीत दिए।
नौशाद के संगीत पर शमशाद बेगम के जो गीत लोकप्रिय हुए उनमें ओ लागी लागी (आन), धड़ककर मेरा दिल (बाबुल), तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे (मुगले आजम) और होली आई रे कन्हाई (मदर इंडिया) शामिल हैं। लोकधुनों और पश्चिमी संगीत का अद्भुत तालमेल करने वाले संगीतकार ओपी नैयर  के संगीत निर्देशन में तो शमशाद बेगम ने मानो अपने सातों सुरों के इंद्रधुनष का जादू बिखेर दिया है। इन गानों में ले के पहला-पहला प्यार (सीआईडी), कभी आर कभी पार (आरपार), कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना (सीआईडी), कजरा मोहब्ब्त वाला (किस्मत), मेरी नींदों में तुम मेरे ख्वाबो में तुम (नया अंदाज) ऐसे गीत हैं जो सुनने वाले को गुनगुनाने के लिए मजबूर कर देते हैं। करीब तीन दशक तक हिन्दी फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखरने के बाद शमशाद बेगम ने धीरे-धीरे पार्श्व गायन के क्षेत्र से अपने को दूर कर लिया। समय का पहिया घूमते घूमते अब रिमिक्सिंग के युग में आ गया है। आज के दौर में भी शमशाद के गीतों का जादू कम नहीं हुआ क्योंकि उनके कई गानों को आधुनिक गायकों एवं संगीतकारों ने रीमिक्स कर परोसा और नई बोतल में पुरानी शराब के सुरूर में नई पीढ़ी थिरकती नजर आई।शमशाद बेगम को सन 2009 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
   डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

जेपीसी पर सरकार फिर मुश्किल में

डॉ. महेश परिमल
जेपीसी रिपोर्ट सरकार के लिए आफत की पुड़िया
जेपीसी और दिल्ली में हुए मासूम के साथ दुष्कर्म के खिलाफ सरकार से मोर्चा लेने के लिए इस बार विपक्ष की तैयारी पूरी है। इस बार वह सरकार को पूरी तरह से नकारा बनाने के लिए कृतसंकल्प है। इसके पहले तमाम सत्रों में विपक्ष ने वाकआउट का ही सहारा लिया। लेकिन इस बार विपक्ष ने तय कर लिया है कि सरकार से हर प्रश्न का उत्तर लेकर ही रहेंगे। इसलिए सरकार इस बार घिर गई है। कई सवालों के जवाब उसके पास नहीं हैं। कई बार जवाब वह गोलमोल देती है। आगामी चुनाव को देखते हुए विपक्ष ने अपनी तैयारी की है। वह सरकार को झुकाने में किसी तरह से कसर बाकी नहीं रखना चाहता। सरकार इस बार भी लाचार ही नजर आएगी।
1.76 लाख करोड़ रुपए के टू जी घोटाले की जांच का पहाड़ खोदकर जेपीसी ने एक ऐसा चूहा बाहर निकाला है, जिससे सभी वाकिफ थे। जेपीसी की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि इस घोटाले में न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का और न ही गृह मंत्री पी.चिदम्बरम की कोई भूमिका नहीं है। रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करने के पहले मीडिया में लीक कर देना किस ओर संकेत करता है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है। जेपीसी एक तरह से सरकारी तंत्र बनकर रह गया है। जेपीसी के गठन के पहले ये भरोसा दिलाया गया था कि एक ईमानदार रिपोर्ट सामने आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समिति ने न तो प्रधानमंत्री को बुलाया और न ही गृहमंत्री को। यही नहीं समिति में अपनी बात रखने के लिए ए. राजा ने कई बार दरख्वास्त की, पर उन्हें भी नहीं बुलाया गया। यह भी भला कैसी समिति, जो आरोपी से ही डर कर भाग रही है। जिस पर आरोप है, उससे पूछताछ नहीं कर पा रही है। एक तरह से यह रिपोर्ट एक सरकारी मखौल बनकर रह गई है। निश्चित रूप से यह मामला अब संसद के ग्रीष्मकालीन सत्र में उठाया जाएगा, तो यह सत्र भी हंगामेदार होगा, इस पर कोई दो मत नहीं। इस बार विपक्ष के पास जेपीसी की रिपोर्ट के अलावा दिल्ली में मासूम के साथ हुए दुष्कर्म में दिल्ली पुलिस की भूमिका को लेकर भी संसद के सत्र को गर्म कर देगा। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि जेपीसी के अध्यक्ष पी.सी. चाको ने एक तरह से सरकारी एजेंटा की भूमिका ही निभाई है। वे शायद यह भूल गए हैं कि उन्होंने रिपोर्ट नहीं दी है, बल्कि आफत की पुड़िया दे दी है। जो सरकार को मुश्किल में ही डालेगी।
इस रिपोर्ट के पहले उन तथ्यों पर नजर डाल लिया जाए, जिसमें मुख्य आरोपी ए राजा बार-बार कह रहे हैं कि इस घोटाले की पूरी जानकारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को थी। इसका सबूत देते हुए उन्होंने वह पत्र भी समिति के सामने रखा, जिसमें उन्होंने इस घोटाले की पूरी जानकारी का जिक्र है। यह पत्र 2 नवम्बर 2007 को लिखा गया था।
उन्होंने जेपीसी को यह भी बताया कि 2001 के भाव से स्पेक्ट्रम की नीलामी 2007 करने का निर्णय तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम की सहमति के बाद ही लिया गया था। राजा के 17 पन्नों के बयान की पूरी तरह से उपेक्षा कर जेपीसी ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को क्लिन चिट देकर विपक्ष को छेड़ दिया है। जेपीसी ने जो रिपोर्ट तैयार की है, वह संसदीस समिति की रिपोर्ट न होकर कांग्रेस का मुखपत्र बनकर सामने आई है। इस रिपोर्ट में केग द्वारा दिए गए 1.75 लाख रुपए के आंकड़े को भी अनदेखा किया गया है। इसके बदले में 2 जी घोटाले की पूरी जिम्मेदारी सरकार पर ढोल देने की कोशिश की जा रही है। जानकारी के मुताबिक सन 1999 में वाजपेयी सरकार के गलत निर्णय के कारण 40 हजार करोड़ का नुकसान हुआ थ। इसके लिए तत्कालीन टेलिकॉम मंत्री स्व.प्रमोद महाजन को जवाबदार ठहराया गया है।
जेपीसी के सामने भूतपूर्व केबिनेट मंत्री के.एम. चंद्रशेखर ने भी अपना पक्ष रखा। इसमें स्पष्ट बताया गया है कि उन्होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चेताया था कि टेलिकॉम लायसेंस के बँटवारे में देश को 30 हजार करोड़ का नुकसान हो सकता है। उनकी इस सलाह को अनदेखा किया गया।
केंद्र सरकार द्वारा कांग्रेस सांसद पी.सी.चाको की मध्यस्थता में जो संसदीय समिति बनाई गई है,उसमें कांग्रेस के 12 एवं अन्य दलों के 18 सदस्यों को मिलाकर कुल 30 सदस्य हैं। इसके पहले तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के प्रतिनिधि सरकार में थे, इससे जेपीसी में उनका बहुमत था। अब जेपीसी में कांग्रेस के केवल 12 सांसद ही रह गए हैं। समाजवादी पार्टी और बसपा के सांसद कांग्रेस को समर्थन दें, तो उनके प्रतिनिधियों की संख्या 14 से ऊपर पहुंच जाती है। बाकी के 16 सांसद अभी सरकार के खिलाफ हैं। इसमें भाजपा, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके का समावेश होता है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सबसे अधिक यदि किसी दल ने सहन किया है, तो वह है डीएमके। इसलिए जेपीसी की रिपोर्ट का सबसे अधिक विरोध यही दल करेगा। इन हालात में 25 अप्रैल को होने वाली जेपीसी की बैठक भी निश्चित रूप से हंगामापूर्ण होगी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यदि विपक्ष जेपीसी की रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर देता है, तो सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। सरकार दबाव में भी आ सकती है।
सीबीआई ने टेलिकॉम घोटोले में ए. राजा के साथ डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि की पुत्री कनिमोजी को भी आरोपी बनाया था। करुणानिधि के अथक प्रयासों के बाद भी 2011 में कनिमोजी को 190 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। अब डीएमके ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है, तो सीबीआई कनिमोजी को फिर से सीखचों के पीछे धकेलने की तैयारी में है। कनिमोजी के खिलाफ एंफोर्समेंट डायरेक्टर ने भी मनी लांडरिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। कनिमोजी पर यह आरोप है कि उनके संचालन में क्लाईग्नर टीवी को स्वान टेलिकॉम द्वारा 209 करोड़ रुपए की रिश्वत विदेशी बैंक के खाते में डालकर दी गई थी। इस मामले में कनिमोजी के खिलाफ जब आरोप पत्र फाइल किया जाएगा, तब उनकी धरपकड़ हो सकती है। कनिमोजी की धरपकड़ होने के बाद एंफोर्समेंट के अन्य डायरेक्टर भी उनकी सम्पत्ति में दखलंदाजी कर सकते हैं।
जेपीसी अब सभी को यह समझाने में लगी है कि 2 जी घोटाले में 1.76 लाख का नुकसान होने के आंकड़े ही झूठे हैं। यदि समिति की मानें, तो देश में इस तरह को कोई घोटाला हुआ ही नहीं है। यदि हुआ भी है, तो इसके लिए देश के प्रधानमंत्री और तात्कालीन वित्त मंत्री किसी भी रूप में दोषी नहीं हैं। वैसे तूणमूल और डीएमके द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण सरकार मुश्किल में है। मुलायम और मायावती कभी भी सरकार गिराने में सक्षम हैं। इन परिस्थितियों में सरकार ने सीबीआई से सुप्रीमकोर्ट में झूठा शपथपत्र दाखिल करवाने का  विवाद सामने लाया है। भाजपा नेता और समिति के सदस्य यशवंत सिन्हा ने पीसी चाको पर नैतिकता ताक पर रखने का आरोप लगाया है। सीपीआई नेता गुरुदास दास गुप्ता की भी तीखी प्रतिRिया आई है। इसके बाद जेपीसी की रिपोर्ट एकपक्षीय होना भी सिद्ध हो गया है। इन सारे तथ्यों से इस बार विपक्ष मजबूत दिखाई दे रहा है और सरकार लाचार। विपक्ष के इस हमले को सरकार किस तरह से झेल पाती है और स्वयं को बचा पाती है, यह देखना है। यह भी हो सकता है कि इस सत्र के अंत तक सरकार का पतन भी हो जाए और लोकसभा चुनाव की तारीखें ही घोषित हो जाएँ। जिस तरह 2-जी पर बनी इस जेपीसी ने काम काज किया है और नतीजे निकाले हैं, उससे संयुक्त संसदीय समितियों के गठन के औचित्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।
   डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

पीली धातु से होता मोहभंग

डॉ. महेश परिमल
सोने के दाम लगातार गिर रहे हैं। इसका आशय यही है कि अब पीली धातु का स्वर्णयुग समाप्त हो रहा है। जानकार लोगों से यही कह रहे हैं कि वे अब सोने की कीमतों को देखते हुए न तो सोना खरीदें और न ही बेचने में उतावले हों। अब सवाल यह उठता है कि आखिर किया क्या जाए? सोना यदि आवश्यक है, तो हीे खरीदें। सम्पत्ति के नाम पर सोना खरीदने का अब समय नहीं रहा। जिन्होंने निवेश के लिए सोना खरीदा है, वे क्या करें? उन्हें यही सलाह दी जाती है कि वे उतावले न हों। उत्तर कोरिया के दिन फिर जाएं और संभव है सोने में तेजी आ जाए। सोने की कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव के संबंध में एक ही भविष्यवाणी की जा सकती है कि इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। निवेशकों को अभी हालात देखते हुए ही सोने पर कोई नीति अपनानी चाहिए।
प्रकृति का नियम है कि जो चढ़ता है, वह उतरता भी है। अब तक हम सब यही मानते आए हैं कि सोने पर यह कानून लागू नहीं होता। यह मान्यता अब झूठी साबित हो रही है। पिछले दो दशक में हमारे देश में सोने के भावों में 6 गुना वृद्धि हो चुकी है। सन् 2001 में जो सोना 5 हजार रुपए तोला बिक रहा था, वही सोना 2011 तक 33 हजार रुपए तोला तक पहुंच गया। सटोरिये तो यही सोच रहे थे कि सोना 50 हजार की ऊंचाई का पार कर लेगा। पर उनकी योजनाओं पर तुषारापात हो गया। विशेषज्ञ कहते हैं कि सोने में मंदी का दौर शुरू हो गया है, यह अभी और लंबा चलेगा। हमें अभी तक यही कहा जाता रहा है कि सोने के भावों में हमेशा तेजी आती रहती है। इसलिए पूंजी निवेश के लिए सोने से सुरक्षितऔर कोई धातु नहीं है। किंतु सोने का अंतरराष्ट्रीय इतिहास कुछ और ही बयां करता है। सन् 1971 में जब अमेरिका ने गोल्ड स्टैंडर्ड को तिलांजलि दी, तब उसके एक औंस का भाव 35 डॉलर था। उसके बाद यह भाव लगातार बढ़कर 1989 में 834 डॉलर हो गया। इसके बाद सोने ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन दो दशकों में सोने पर अपना धन लगाने वाले कई लोग दीवालिया घोषित हो गए। जो यह कहते हैं कि सोने के दाम हमेशा बढ़ते ही रहते हैं, वे जरा सोने के 1980 से 2000 तक के अंतरराष्ट्रीय भावों पर एक नजर डाल लें।
सोने के भाव में तेजी सन् 2003 से शुरू हुआ। हाल ही में 33 हजार रुपए प्रति दस ग्राम बिकने वाला सोना आज 27 हजार हो चुका है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बहुत ही जल्द सोना 1300 डॉलर प्रति ग्राम बिकने लगेगा। यानी उसके दाम अभी और गिरेंगे और वह 25 हजार रुपए प्रति दस ग्राम में मिलेगा। सोने के दाम बढ़ने का एक कारण यह था कि दुनिया में जब आर्थिक मंदी के हालात पैदा होते हैं, तब लोगों का सरकारी करेंसी पर विश्वास कम होने लगता है। इन हालात में वे सोना खरीदना शुरू कर देते हैं। वर्तमान में उत्तर कोरिया की दखलंदाजी के कारण अणुयद्ध की स्थिति पैदा हो गई है, जापान अपनी धनराशि की आपूर्ति दोगुनी करना चाहता है, इधर साइप्रस की बैंकों में रखा गया काला धन जब्त करने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। इन कारणों से सोने की कीमत बढ़नी चाहिए, पर ऐसा क्या हुआ, जिससे सोना लुढक रहा है। सन् 2011 में सोने की कीमतों में जो उछाल आया, उसका मुख्य कारण यह था कि तब यूरोजोन के टूटने का भय था। इस कारण निवेशकों से सोना खरीदना शुरू कर दिया। अब यह भय कुछ अंशों तक खत्म हुआ, तो दूसरा पांच वर्ष बाद अमेरिका ने घोषित किया कि वह अर्थतंत्र में धन की आपूर्ति घटा रहा है, इस कारण मुद्रास्फीति दर घटेगी। तीसरा साइप्रस अपनी माली हालत को सुधारने के लिए 40 करोड़ यूरो का सोना बेचने के लिए निकालेगा, ऐसी संभावना है। इटली के पास 94 अरब डॉलर की कीमत का 2,452 टन सोने का जखीरा है। इटली का अर्थतंत्र भी डांवाडोल है। साइप्रस की तरह इटली भी अपना सोना बाजार में लाना चाहे, तो काफी अफरा-तफरी मच सकती है।
पिछले एक दशक में सोने की कीमतों में जो उछाल आया है, उसकी वजह वास्तव में उसके उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि सटोरिए हैं। दुनियाभर के शेयरबाजारों में मंदी के आने से सटोरिए शेयर से राशि निकालकर सोने और खनिज तेलों में लगाया था। सन् 2010 और 2011 के दौरान निवेशकों ने सोने के साथ जुड़ी सिक्योरिटी में 25 अरब डॉलर का निवेश किया। इसके पीछे उनकी धारणा यह थी कि यूरोजोन की मंदी गहरी होगी, तो सोने की कीमतों में भारी इजाफा होगा। सोना उड़ने लगेगा, पर ऐसा हुआ नहीं, इसलिए सटोरिए सोने की चमक से बाहर आने लगे। एसपीडीआर नामक कंपनी ने सोने में किया गया 7.7 अरब डॉलर का निवेश पीछे खींच लिया है, इस कारण सोने के भावों का अध:पतन शुरू हो गया है। हमारे देश में सोने पर आयात कर में लगातार वृद्धि हो रही है, इसके कारण सोने के भावों में कामचलाऊ उछाल देखने को मिला था, इससे तस्करी को बल मिल रहा है। अभी विश्वबाजार में होने वाली मंदी के कारण यह कामचलाऊ बढ़ोत्तरी एक तरह से पचा ली गई है। भारत के अनेक सटोरिओं ने भी अपना सोना बेचने के लिए बाजार में ला दिया है। इस कारण भी भाव घट रहे हैं। सोने में तेजी के कारण ही सन 2013 के पहले दस महीने में 42 अरब डॉलर के सोने का आयात हुआ था। इस कारण आयात-निर्यात के बीच की खाई चौड़ी होती गई, इससे सरकार चिंतित हो गई। अब सोने की कीमतें नीचे आने से आयात में भी कटौती होने की संभावना है।
वेसे यह भी कहा जाता है कि सोने का मिलना और सोने का खोना दोनों ही अच्छा नहीं है। जिसे मिलता है, उसे चिंतित कर देता है, जिसका खोता है, वह जिंदगी से ही निराश हो जाता है। खुशी किसी को नहीं होती। इसलिए सोने को लेकर इतना गंभीर नहीं होना चाहिए। इसे भी एक धातु ही माना जाए। अब तो वैज्ञानिक सोने को खेतों में उगाएंगे, ऐसी भी खबरें हैं। तब तो फसल सोने की नहीं, बल्कि सोना ही एक फसल होगा। अब देखते हैं कि इस फसल को खेतों तक लाने में हमारे वैज्ञानिक कितने सफल हो पाते हैं?
  डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

प्राण नहीं प्राणवान

डॉ. महेश परिमल
परदे पर प्राण के होने का मतलब यही नहीं है कि एक बुरा आदमी भला कितना बुरा हो सकता है। उसकी नीचता कहां तक जा सकती है। वह कितना गिर सकता है। उसकी इंसानियत की मौत कब हुई। उसकी हैवानियत क्या कहती है। उसकी दरिंदगी की हद क्या है? इसके बाद भी जब वे परदे पर आते हैं, तो विश्वास हो जाता है कि अब कुछ बुरा होने ही वाला है। निश्चित ही अब मानवता मर जाएगी। अत्याचार और अन्याय अपनी सीमाएं पार कर देगा। परदे पर एक बुरा आदमी का आना उतना नहीं डराता, बल्कि उस बुरे आदमी की आंखें ही सब कुछ बता देती हैं कि वह अब क्या करने वाला है? उसकी हरकतें ही उसकी भाषा बन जाती हैं। यह सब देखना हो, तो केवल प्राण साहब के अभिनय में देखा जा सकता है। 93 वर्ष की उम्र में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने से वे भले ही रोमांचित हों, पर सरकार को शर्म आनी चाहिए। अब यदि घोषणा कर ही दी है, तो प्राण साहब को यह पुरस्कार उनके घर पर जाकर दिया जाना चाहिए। तभी वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेंगे।
मायानगरी में केवल प्राण साहब ही ऐसे शख्स रहे हैं, जो केवल परदे पर ही खलनायकी करते रहे। आम जिंदगी में वे कभी खलनायक नहीं बन पाए। अन्य खलनायकों की कहानियां आते रहती हैं कि वे रियल लाइफ में भी खलनायकी कर चुके हैं। पर प्राण साहब हमेशा खलनायक नहीं रहे। अपने आप को बदलने में लगे रहे। 60 से 70 के दशक का वह दौर जब प्राण साहब अपने कैरियर के सबसे ऊंचे मुकाम पर थे, तब हालत यह थी कि वे हीरों से अधिक मेहनताना लेते थे। उस दशक में पैदा होने वाले बच्चों में किसी का नाम प्राण नहीं रखा गया। भला हो, मनोज कुमार जी का, जिन्होंने पहले उन्हें शहीद में और फिर उपकार में उन्हें लीक से हटकर भूमिका दी। उपकार में जब उन्हें मलंग बाबा की भूमिका दी गई, इसके लिए मनोज कुमार ने उनके लिए अलग से किरदार लिखा। तब लोगों ने मनोज कुमार से यही कहा कि ऐसा कभी मत करना, फिल्म नहीं चल पाएगी। उसके बाद जब यह बात सामने आई कि इस फिल्म में प्राण एक गाना भी गाएंगे, तो लोगों ने मनोज कुमार को सरफिरा घोषित कर दिया। उन्हें आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा। लेकिन मलंग बाबा की भूमिका ने प्राण के जीवन में एक नया मोड़ ही ला दिया। इसके बाद प्राण वास्तव में वही हो गए, जो आम जिंदगी में थे। सबका भला करने वाले, नर्म दिल, कविताओं का शौक रखने वाले, प्रतिभावानों की सिफारिश करने वाले।
ये कतई गलत नहीं है कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में प्राण जैसा प्राणवान कोई नहीं है। जंजीर में अमिताभ को लेने के लिए प्रकाश मेहरा से सिफारिश प्राण साहब ने ही की थी। वे जब भी विलेन के रूप में परदे पर आए, तो कभी मुंह बिचका कर, कभी आंखें तरेरकर, कभी सिगरेट के छल्ले बनाकर, कभी ठीक है ना ठीक बोलकर अपनी शैतानियत का खुलासा करते। फिल्म में वे चाहे डाकू बने या फिर स्मगलर या फिर लुटेरे, हर तरह की भूमिका में उन्होंने जान डाल दी। जब उन्होंने चरित्र अभिनेता की भूमिका शुरू की, तो लाचार पिता बनने में उन्हें गुरेज नहीं था।  यह कहना गलत न होगा कि प्राण ने फिल्मों को प्राणवान बनाया। अपने साथ-साथ वे अन्य साथी कलाकारों के लिए भी अभिनय का संग्रहालय होते। साथी कलाकार उनसे प्रेरणा लेते। मायानगरी के उम्रदराज प्राण को फाल्के अवार्ड मिलना उनके लिए बड़ा सम्मान है। पर यह फिल्म नगरी का भी सम्मान है। शायद ही कोई होगा, जो इस खबर को सुनकर दु:खी होगा। सभी ने अपनी खुशी जाहिर की है। किसी ने सरकार को दोष भी दिया है, पर इसमें प्राण साहब के लिए सम्मान ही है। फिल्मों में उनकी भूमिका ऐसी होती थी कि लोग उन्हें गाली देते थे। पर आम जिंदगी में वे उतने ही सज्जन हैं। यह तो उनकी भूमिका का ही प्रभाव है कि लोग उनसे नफरत भी करते थे। अभिनय सर चढ़कर बोला, तभी तो नफरत आई। आम जीवन में वे फिल्मी बुराइयों से दूर हैं। उनकी संतानों का नाम फिल्मी दुनिया में सुनने को नहीं मिलता।
प्राण साहब का होना ही इस बात का परिचायक है कि वे अपने अभिनय से फिल्म के हीरो पर भारी पड़ेंगे। ऐसा बार-बार हुआ। खलनायकी के वे बेताज बादशाह रहे। ऐसी बात नहीं है कि उनका नाम पहली बार कमेटी में पुरस्कर के लिए आया और घोषणा हो गई। प्राण साहब का नाम दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए पहले भी एकाधिक मौकों पर आया था। लेकिन किसी न किसी वजह से उनके नाम पर सहमति नहीं बन पाई थी। फिल्म इंडस्ट्री के इस सबसे बडे सम्मान के विजेता के चुनाव के लिए जो समिति बनी, उस समिति के किसी न किसी सदस्य को या तो उनके नाम पर ऐतराज रहा या कभी क्षेत्रवाद हावी हो गया और दक्षिण की किसी हस्ती को यह पुरस्कार नसीब हो गया। 93 वर्ष की उम्र पार कर चुके प्राण साहब इस सम्मान से दूर ही रहे। मनोरंजक यह है कि हर बार की तरह इस बार भी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोग खुद को यह सम्मान दिलवाने के लिए सक्रिय रहे। कुछ ऐसे लोग सदस्य के तौर पर शामिल नहीं हो पाए जो कभी नहीं चाहते थे कि प्राण साहब को यह सम्मान मिले। एक नामी फिल्म निर्देशक और राज्यसभा सांसद तथा एक मशहूर मलयाली फिल्मकार इस बार चुनाव समिति से दूर रहे। वे सालों से इस चुनाव समिति में बतौर दादा साहेब फाल्के विजेता शामिल होते रहे थे। वाजिब तर्क यह दिया गया कि सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों को क्यों हर बार चुनाव समिति का सदस्य बनाया जाए।् सूचना-प्रसारण मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, फाल्के सम्मान के चयन के लिए जो समिति बनती है, उसमें कुल पांच सदस्य होने चाहिए और उनमें से कम से कम एक या दो वे हों जिन्हें पहले यह सम्मान मिल चुका है। संयोग ऐसा रहा कि इस बार की चुनाव समिति में सायरा बानो, आशा भोंसले, रमेश सिप्पी और डी. रामानायडू जैसे लोग शामिल किए गए, जो प्राण साहब के नाम पर सहमत हो पाए। ये लोग पहले से ही चाहते थे कि प्राण साहब इस सम्मान के हकदार काफी पहले से हैं। उनके पक्ष में एक बात और गई कि वे पहले चरित्र अभिनेता हैं, जिन्हें इस सम्मान से नवाजा जा रहा है।
हिन्दी फिल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता प्राण का जिR आते ही आंखों के सामने एक ऐसा चेहरा नजर आ जाता है जिसके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनों आ तूफान नजर आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उसके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं। प्राण की शुरुआती फिल्में हों या बाद की फिल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। इसीलिए अपने किरदार का वे घर पर पहले स्केच बनवाते, फिर उनका मेकअप होता। ताकि रोल में पूरी तरह से डूब जाएं। शेर खान की भूमिका करते हुए जब यारी है ईमान मेरा गीत फिल्माया जा रहा था, तब उनकी पीठ में काफी दर्द था, फिर भी उन्होंने जमकर नृत्य किया, जिसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता। अभिनय के प्रति यही समपॅण आज उन्हें फिल्म पुरस्कार के ऊंचे मकाम पर खड़ा कर दिया है। शायद ही ऐसी कोई फिल्म हो, जिसमें उन्होंने अपना तकियाकलाम ‘बर्खुरदार’ का इस्तेमाल न किया हो। प्राण साहब ने फिल्मों में जितना डराया, उतना हंसाया भी। विक्टोरिया नम्बर 203 देखकर आपको हंसने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा।
प्राण हमेशा प्राणवान रहे, फिल्म इंडस्ट्री को प्राणवान करते रहें, यही कामना।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

संजू बाबा की सजा के बहाने

मासिक खरी न्‍यूज के अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित


बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मालामाल करने वाला तमाशा

आज जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

संजय दत्त को क्यों दी जाए माफी ?

डॉ. महेश परिमल
इन दिनों सभी चिंतित हैं कि संजय दत्त को जेल की सजा न हो। सजा न होने के लिए अजीबो-गरीब बहाने बताए जा रहे हैं। कोई कहता है कि उन्होंने जो अपराध किया है, वह जवानी में किया है। अब वे सुधर गए हैं। संजय दत्त स्वयं कहते हैं कि सजा केवल मुझे ही नहीं, मेरे बच्चों को भी होगी। मेरे लिए दुआ करो। कई लोग इसके विरोध में भी हैं। उनका कहना है कि आखिर उन्हें माफी क्यों दी जाए? केवल इसलिए कि वे एक भूतपूर्व कांग्रेसी मंत्री और बेहतरीन अदाकारा के बेटे हैं। यही नहीं वे स्वयं भी एक अच्छे कलाकार हैं। क्या केवल इस बात के लिए उन्हें जेल की सजा न दी जाए? ये कहां का तर्क है? यह सच है कि वे आतंकवादी नहीं है। पर उनकी हरकते किसी आतंकवादी से कम नहीं रहीं। कम से कम जवानी के दिनों में। उनका बचपन गलत सोहबत के बीच नशे की लत में बीता। स्कूली जीवन में ही उन्हें नशे की लत लग गई थी। उनकी पृष्ठभूमि फिल्मी थी, इसलिए अनायास ही वे फिल्मों में आ गए। अन्यथा उनका गलत रास्ते पर जाना तय था। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सोच-समझकर ही उन्हें सजा सुनाई होगी। कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं होनी चाहिए। उनकी सजा माफ हो जाती है, तो एक गलत संदेश पूरे देश में जाएगा। फिर इस पर भी बहस छिड़ सकती है कि क्या केवल अच्छे परिवार से होना ही सजा माफी के लिए पर्याप्त कारण हो सकते हैं। अपराध किया है, तो सजा होगी ही, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए।
कुछ लोग समय के साथ बदल जाते हैं। कुछ को समय ही बदल देता है। पर संजय दत्त उन लोगों में से हैं, जो कभी नहीं बदल सकते। वे कभी भी गंभीर नहीं रहे। हां गंभीर होने का अभिनय उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से अवश्य किया है। एक योजना के तहत उनके अच्छे कार्यो की जानकारी मीडिया को मिलती रही है। उन्होंने किसी की सहायता की, इस आशय की बात कई बार मीडिया के माध्यम से बाहर आई। आज अपनी अच्छी आदतों या फिर दिखावे के लिए किए गए कार्यो को हाइलाइट करने का धंधा ही चल पड़ा है। करों का पहले से भुगतान करना, मेहनताने की राशि चेरिटी में देना, झोपड़पट्टी पर जाकर बच्चों के बीच रहना आदि कई तरह के नखरे सेलिब्रिटियों के देखे जा रहे हैं। सीधी सी बात है कि वे जब ऐसा करने जा रहे हैं, तो मीडिया को बताने की क्या आवश्यकता? ये काम वे चुपचाप भी तो कर सकते थे। आखिर इस तरह के कार्यो से वे बताना क्या चाहते हैं? संजय दत्त के बारे में भी इस तरह की कई बातें मी¨डया के माध्यम से बाहर आई हैं। पर जिस तरह से उन्होंने तीन शादियां की हैं, बेटी के लिए वे अच्छे पिता नहीं हैं, इसे भी तो सभी जानते हैं। इस तरह की बातें भी मीडिया के माध्यम से बाहर आई हैंे। कल यदि सलमान खान को भी सजा होनी हो, तो क्या वे भी अपने अच्छे संस्कारवान परिवार का रोना रोएंगे या फिर अपनी गलती मानकर सजा भुगतेंगे?
संजय दत्त को सजा सुनाकर अदालत ने कोई गुनाह नहीं किया है। सजा सुनाना अदालत का काम है। इसके पहले न जाने कितने निर्दोषों को सजा हुई, तब कहां से ये सब कानून के रखवाले? किसी निर्दोष को सजा न हो, यह सभी चाहते हैं, फिर भी उन्हें सजा हो ही जाती है। पर न जाने कितने गुनाहगार ऐसे हें, जो खुले आम घूम रहे हैं। जिनके लिए कानून मात्र एक खिलौना है। ऐसे कई मंत्रीपुत्र आज भी अपराध करने के बाद भी सलाखों की पीछे नहीं जा पाए हैं, उसकी वजह यही है कि उन पर कानून के रखवालों का वरदहस्त है। हर राज्य में न जाने कितने राजा भैया हैं, जो खुलकर कानून का मजाक उड़ाते हैं। अपना कानून बनाते हैं, न्याय के नाम पर अन्याय करते हैं। फिर भी वे कानून की पहुंच से बहुत दूर हैं। आखिर इन्हें संरक्षण कौन देता है? कानून को लेकर मनमानी हर तरफ है। पर कोई कुछ कर नहीं पाता। बीस साल बाद सजा सुनाने वाली सरकार अभी तक न तो दाऊद को पकड़ पाई, न ही उसके साथियों को। सभी जानते हैं कि वह कहां है, क्या कर रहा है? पर पाकिस्तान को लेकर हमारा देश कभी सख्त हुआ ही नहीं। इसी का फायदा उठाकर वह अपनी करतूतों को अंजाम देता रहा है। जिस तरह से ओबामा ने ओसामा बिन लादेन का खात्मा पाकिस्तान में ही कर दिया, कुछ ऐसे ही उपाय करने के लिए भारत सरकार में इच्छाशक्ति होनी चाहिए। यह इच्छाशक्ति अभी तक हमारे देश के नेताओं में नही आई है।
रही बात संजय दत्त को माफी की। उसे किसी भी रूप में माफी नहीं मिलनी चाहिए। उनकी हरकतें कभी भी समाज के लिए प्रेरणादायी नहीं रहीं। वे कलाकार हैं, तो उन्हें अपनी कलाकारी दिखाने पर खूब धन भी तो मिलता है। कोई मुफ्त में तो नहीं करते, फिल्मों में काम? अपनी कमाई का एक हिस्सा दान भी तो नहंी करते। आखिर क्या सोचकर उन्हें माफी दी जाए? ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्होंने अपराध किया, उनका भी परिवार है, भले ही अपराध किसी विवशतावश किया गया हो, पर वे सजा तो भुगत ही रहे हैं। कई लोग तो जेल में ही अपने अच्छे आचरण के लिए समय से पहले ही छूट जाते हैं। संजय दत्त भी कुछ ऐसा ही करें, जिससे उनकी सजा कम से कम हो जाए। वे संस्कारवान हैं,अच्छे परिवार से हैं, यह सब उन्हें जेल के भीतर बताने की आवश्यकता है, जेल के बाहर नहीं। यह तर्क पूरी तरह से गलत है कि वे अब सुधर गए हैं। अब इसकी कौन गारंटी देगा कि वे अब कभी नहीं बिगड़ेंगे? उन्हें माफी देने की वकालत करने वालों में से एक भी ऐसा नहीं है, जो यह गारंटी ले कि वे अब कभी कानून अपने हाथ में नहीं लेंगे। भला ऐसे व्यक्ेित को कौन गारंटी लेगा, जो कभी बौद्धिक रूप से वयस्क हुआ ही नहीं। यदि माता-पिता ने अच्छे संस्कार दिए हैं, तो उसे अच्छा इंसान बनने से कोई रोक नहीं सकता। अच्छे संस्कार मिलने केदौरान ही उन्होंने नशे को अपना साथी बनाया, इसमें दोष किसका? उनकी हरकतों को देखते हुए उनकी बेटी त्रिशला का लालन-पालन संजय दत्त को न देकर उसकी नाना-नानी ने किया। आज वह विदेश में पढ़ रही है। अपने पिता को वह केवल एक कलाकार के रूप में ही जानती है। बस इतना ही संबंध है उसका अपने पिता से। रही बात उन पर लगाए गए धन से। तो उन निर्माताओं को सोचना चाहिए कि वे उस व्यक्ति पर अपना धन लगा रहे हैं, जिस पर अवैध रूप से हथियार रखने का आरोप है और उस पर मुकदमा चल रहा है। आखिर वे एक गैरजिम्मेदार व्यक्ैित पर इतना धन कैसे लगा सकते हैं? यदि लगाया है, तो वे स्वयं भुगतें। उन्हें माफी मिल जाने से उनकी फिल्में तो पूरी हो जाएंगी, पर इसका लाभ आखिर किसको होगा? आम आदमी को यही संदेश जाएगा कि फिल्मी लाइन में होने से सजा से भी माफी मिल सकती है।
अंत में संजय दत्त के बारे में यही बात कि जब उनकी मां नरगिस को कैंसर था, तब उनकी आयु 18 वर्ष थी, पत्नी ऋचा जब इलाज के दौरान जिंदगी और मौत से जूझ रही थी, तब फिल्मों की जूनियर आर्टिस्ट के साथ गुलर्छे उड़ाने वाले संजू बाबा की उम्र 26 वर्ष थी, ए के 47 रखते समय उनकी उम्र 33 वर्ष थी। समाजवादी पार्टी की टोपी पहनकर चुनाव प्रचार में निकलते समय उनकी उम्र 48 साल थी। इन सारी उम्रों के साथ उन्होंने कब अपनी संजीदगी का परिचय दिया। आज जब उन्हें सजा सुना दी गई है, तब उनके लिए कई तरह की मनोहर कहानियां सामने आ रही हैं। अच्छा होगा कि वे सजा भुगतकर बाहर आएं और एक अच्छे इंसानऔर देशभक्त होने का परिचय दें।
   डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

मालामाल करने वाला आईपीएल का तमाशा


डॉ. महेश परिमल
आईपीएल का तमाशा शुरू हो गया है। अब होगी चौकों-छक्कों की बरसात। लोगों में होगा जोश और रोमांच। पूरे डेढ़ महीने तक जारी रहेगा कमाल, धमाल और मालामाल का सिलसिला। वैसे देखा जाए, तो क्रिकेट अब जेंटलमेन गेम नहीं रहा। आईपीएल भी एक खेल नहीं, बल्कि बिजनेस है। लोगों को क्या अच्छा लग रहा है, यह देखना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि इससे किसको कितना फायदा होगा। फिर चाहे खिलाड़ी हो, आयोजक हो, या फिर कोई खेल हो। सभी को लाभ की दृष्टि से देखा जा रहा है। सिर्फ देखने का नहीं.. इंडियन प्रीमियर लीग के टीवी पर एक विज्ञापन में कोरियाग्राफर फराह खान कहती है कि केवल मैच देखना ही नहीं, नाचने का भी है। छक्का लगे, तो किस स्टाइल में नाचना और चौका लगे तो किस तरह के स्टेप्स लेना, विकेट गिरे, तो किस तरह से उछलना। यह सब आजकल सिखा रही है, फराह खान। इस विज्ञापन में एक और लाइन जोड़ देनी चाहिए कि यह सिर्फ देखने का नहीं और सोचने का भी नहीं। जस्ट हेव फन, ऐश करो।
आईपीएल का जश्न शुरू हो गया है। जश्न के बजाए इसे तमाशा कहना ठीक होगा। वन डे में घायल हुए सभी खिलाड़ी एकदम तरोताजा हो गए हैं। अब किसी को किसी से परेशानी नहीं है। क्योंकि मैच से अपार धन मिलने की संभावना है। आईपीएल के संबंध में एक क्रिकेटर का कहना है कि बीसीसीआई का मैच सरकार नौकरी की तरह है, इसमें कुछ भी चल सकता है। पर आईपीएल प्राइवेट जॉब की तरह है, इसके लिए परिश्रम करना पड़ता है, इसमें कुछ भी नहीं चल सकता। अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन देना होता है। इसमें लक्ष्य होता है, एक-एक बॉल की गिनती होती है। आप कह सकते हैं कि सभी का ‘भाव’ है। अगर आपने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया, तो आपका भाव गिर जाएगा। हां एक बात और गेम के साथ फन होता है, जहां सब केवल फन के लिए ही होता हो, वहां जोरदार हाइप और कंट्रोवर्सी तो होनी ही है। 2008 से शुरू होने वाली आईपीएल की यह छठी कड़ी है। दो महीने में 76 मैच, यानी दे दनादन। इस दौरान वाद विवाद होते रहेंगे। कितने ही विवाद तो बनेंगे और कितने बनाए जाएंगे। कितने ही मीडिया में छा जाएंगे। आईपीएल के पास अभी तो यही एक नियम है कि जो दिखता है, वही बिकता है। आईपीएल के प्रणोता ललित मोदी को अब कोई याद नहीं करता। पर इस खेल को पूरी तरह से धंधे को बदलने का यश या अपयश उन्हीं को जाता है। आपको याद होगा कि वे हेलीकाप्टर से मैदान पर उतरकर उद्घाटन समारोह में आए थे। कम कपड़ों वाली चीयर्स लीडर्स और मैच के बाद आयोजित होने वाली कॉकटेल पार्टिज बॉलीवुड के दबदबे को भी फीका कर देती थी। इसके बाद इसमें कुछ नियंत्रण दिखाई दिया। पर इस खेल में कहीं न कहीं तो ग्लैमर उभरकर आया। यदि यह न होता, तो लोगों को मजा कैसे आता?
आईपीएल के दौरान दो तरह के खेल होते हैं, एक मैदान पर और दूसरा स्टेडियम में। सट्टेबाजों की इमसें गिनती ही नहीं है। बाकी बात तो यह है कि आयोजन के कुल खर्च से अधिक राशि तो सट्टे में ही लग जाती है। भूतकाल में जो भी विवाद हुए हैं, वे क्रिकेट में अतिरेक हो गए हैं। इसे देखकर पहले तो यही लगा था कि कुछ समय बाद आईपीएल का जादू खत्म हो जाएगा। आईपीएल का यह बुखार जल्द ही उतर जाएगा, देख लेना, कहने वाले आज खामोश हैं। उन्हें यह समझ में आ गया है कि यह आईपीएल एक नशा बनकर युवाओं में छा रहा है। इसीलिए फिल्म वाले भी इससे अब नहीं डरते, इस दौरान काफी फिल्में भी रिलीज होंगी। शायद किसी को पता नहीं होगा कि पिछले साल जो आईपीएल खेला गया था, उसमें कितने का फायदा हुआ था। पूरे दस हजार 790 करोड़ रुपए। अब आप ही बताएं कि दुनिया का ऐसा कौन सा धंधा है, जिसमें केवल दो महीने में ही इतने रुपए कमाए जा सकते हैं? हर मैच में 40 हजार दर्शक तो आते ही थे, इसके अलावा टीवी के माध्यम से विज्ञापनों का जो धंधा हुआ, वह अलग। इसी से पैदा हुए ब्रांड प्रमोशन करने वाले ब्रांड एम्बेसेडर।
आईपीएल के मजे को दोगुना बनाने के लिए बॉलीवुड ने भी कमर कस ली है। अभी से ही यह चर्चा शुरू हो गई है कि शाहरुख की टीम जब वानखेड़े स्टेडियम में खेल रही होगी, तब उन्हें अंदर जाने दिया जाएगा या नहीं? आपको शायद याद होगा, शाहरुख ने वानखेड़े स्टेडियम में धमाल मचाया था। इस विवाद के बाद शाहरुख ने कहा था कि अब वर्ष में एक विवाद करना है और दो फिल्में। अभी तक इस वर्ष शाहरुख ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया है, शायद उसने आईपीएल के लिए बचा रखा हो। हमारे यहां फुटबॉल का यूरोप-अफ्रीका देशों जैसा बोलबाला नहीं है। राष्ट्रीय खेल हॉकी में कोई दम नहीं दिखता। जो कुछ यदि है, तो वह है क्रिकेट। फुटबॉल के इंग्लिश प्रीमियर लीग की तर्ज पर इंडियन प्रीमियर लीग की रचना की गई। इससे खेल को भी एक धंधा बना लिया गया। आज आईपीएल की ब्रांड वेल्यू 3.67 बिलियन डॉलर हो गई है। भारत के बाद श्रीलंका और अन्य देशों के मुंह पर भी इस धंधे को देखकर लार टपकने लगी है। इसकी तगड़ी कमाई ने सभी को आकर्षित किया है। यही हाल रहा, तो क्रिकेट का निजीकरण हो जाएगा। क्रिकेटर ही बाजार में खड़े होकर अपनी कीमत लगाएंगे और कहेंगे कि हमें खरीद लो।
वैसे भी अब क्रिकेट जेंटलमेन गेम नहीं रहा। वैसे भी संस्कृति या फिर परंपरा भी कहां बची है, जो क्रिकेट बचता। अब खेलों से स्पोर्ट्समेन स्पीरिट ही खो गई है। अब तो केवल स्पीरिट ही रह गया है। थ्री चीयर्स टू आईपीएल सिंक्स! देख तमाशा क्रिकेट का। अब से डेढ़ महीने तक लोगों पर क्रिकेट का बुखार चढ़ता रहेगा। इससे दूर होना युवाओं के बस की बात नहीं। खूब चौके, खूब छक्के और खूब सारा पैसा। चीयर्स लेडी का आकर्षण, तेज लाइट की चकाचौंध के बीच होगा क्रिकेट का तमाशा।
 डॉ. महेश परिमल

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