शनिवार, 28 जून 2014

आपकी की नजरों ने समझा

आपकी की नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे
हिन्दी फिल्मों के मशहूर संगीतकार मदनमोहन के एक गीत ‘आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’ दिल की ए धड़कन ठहर जा मिल गई मंजिल मुझे’ से संगीत सम्राट नौशाद इस कदर प्रभावित हुए थे कि उन्होंने मदन मोहन से इस धुन के बदले अपने संगीत का पूरा खजाना लुटा देने की इच्छा जाहिर कर दी थी। मदन मोहन कोहली का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद में हुआ। उनके पिता राय बहादुर चुन्नी लाल फिल्म व्यवसाय से जुड़े हुए थे और बाम्बे टाकीज और फिल्मीस्तान जैसे बड़े फिल्म स्टूडियो में साझीदार थे। घर में फिल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फिल्मों में काम करके बड़ा नाम करना चाहते थे, लेकिन अपने पिता के कहने पर उन्होंने सेना मे भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में नौकरी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली हो गया। लेकिन कुछ समय के बाद उनका मन सेना की नौकरी से ऊब गया और वह नौकरी छोड़कर लखनऊ आ गए और आकाशवाणी के लिए काम करने लगे। आकाशवाणी में उनकी मुलाकात संगीत जगत से जुड़े उस्ताद फैयाज खान उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसी जानी मानी हस्तियों से हुई, जिनसे वे काफी प्रभावित हुए और उनका रूझान संगीत की ओर हो गया। अपने सपनों को नया रूप देने के लिए मदन मोहन लखनऊ से मुंबई आ गए।
मुंबई आने के बाद मदन मोहन की मुलाकात एस डी बर्मन. श्याम सुंदर और सी.रामचंद्र जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों से हुई और वह उनके सहायक के तौर पर काम करने लगे। संगीतकार के रुप में 1950 में प्रदíशत फिल्म ‘आंखें’ के जरिए वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने मे सफल हुए। इस फिल्म के बाद लता मंगेशकर मदन मोहन की चहेती पाश्र्वगायिका बन गई और वह अपनी हर फिल्म के लिए लता मंगेशकर से ही गाने की गुजारिश किया करते थे। लता मंगेशकर भी मदनमोहन के संगीत निर्देशन से काफी प्रभावित थीं और उन्हें ‘गजलों का शहजादा’ कहकर संबोधित किया करती थीं। संगीतकार ओ पी नैयर अक्सर कहा करते थे ‘मैं नहीं समझता कि लता मंगेशकर, मदन मोहन के लिए बनी हुई है या मदन मोहन, लता मंगेश्कर के लिए, लेकिन अब तक न तो मदन मोहन जैसा संगीतकार हुआ और न लता जैसी पाश्र्वगायिका।’  मदनमोहन के संगीत निर्देशन में आशा भोसले ने फिल्म मेरा साया के लिए ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में ’ गाना गाया जिसे सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते है। उनसे आशा भोसले को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि ‘वह अपनी हर फिल्म के लिए लता दीदी को हीं क्यो लिया करते है ’ इस पर मदनमोहन कहा करते ‘जब तक लता जिंदा है उनकी फिल्मों के गाने वही गाएंगी।’
मदन मोहन केवल महिला पाश्र्वगायिका के लिए ही संगीत दे सकते है.ं वह भी विशेषकर लता मंगेशकर के लिए. यह चर्चा फिल्म इंडस्ट्री में पचास के दशक में जोरों पर थी, लेकिन 1957 में प्रदíशत फिल्म ‘देख कबीरा रोया ’ में पाश्र्व गायक मन्नाडे के लिए ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे ’ जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर उन्होंने अपने बारे में प्रचलित धारणा पर विराम लगा दिया। वर्ष 1965 मे प्रदíशत फिल्म ‘हकीकत ’ में मोहम्मद रफी की आवाज में मदन मोहन के संगीत से सजा गीत ‘कर चले हम फिदा जानों तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ’ आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बे को बुलंद कर देता है। आंखों को नम कर देने वाला ऐसा संगीत मदन मोहन ही दे सकते थे। वर्ष 1970 मे प्रदíशत फिल्म ‘दस्तक ’ के लिए मदन मोहन सर्वŸोष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए गए। उन्होंने अपने ढाई दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 100 फिल्मों के लिए संगीत दिया। अपनी मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओं के दिल में खास जगह बना लेने वाला यह सुरीला संगीतकर 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया से अलहविदा कह गया। मदन मोहन के निधन के बाद 1975 में ही उनकी ’ मौसम’ और लैला मजनूं जैसी फिल्में प्रदíशत हुई. जिनके संगीत का जादू आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता है। मदन मोहन के पुत्र संजीव कोहली ने अपने पिता की बिना इस्तेमाल की हुई 30 धुनें यश चोपडा को सुनाई, जिनमें आठ का इस्तेमाल उन्होंने अपनी फिल्म ‘वीर जारा’ के लिये किया. ये गीत भी श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए.

शुक्रवार, 27 जून 2014

शुरू हो गई मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा

डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने रेल्वे का किराया बढ़ाकर अच्छे दिन की शुरुआत कर दी है। इसका चारों तरफ से विरोध हो रहा है। चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने पिछली सरकार की नाकामियों पर खुलकर प्रहार करते थे। उन्होंने महंगाई को लेकर कांग्रेस गठबंधन सरकार की खूब आलोचना की। लेकिन अब उसी महंगाई की लगाम थामने में उनके पसीने छूट रहे हैं। महंगाई बढ़ाने वाले कारक भी तेजी से सक्रिय हो गए हैं। एक तरफ ईराक युद्ध, दूसरी तरफ कमजोर मानसून और तीसरी तरफ जमाखोरी, इस सबसे निपटने में सरकार की हालत खराब हो जाएगी, यह तय है। प्रधानमं9ी नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से कड़वे घूंट की बात की थी, उससे यही लगता था कि केवल महंगाई को छोड़कर अन्य कड़वे  घूंट मंजूर है। पर सरकार बनने के कुछ दिन बाद ही डीजल की कीमतों में वृद्धि कर सरकार ने अपनी मंशा जाहिर कर दी। अब रेल किराए में वृद्धि कर एकबारगी आम जनता की कमर ही तोड़ दी। ऐसा भी नहीं है कि किराया बढ़ जाने से यात्री सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हो जाएगी। आज भी लोगों को रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है। ट्रेनों में भीड़ बेकाबू होने लगी है। साधारण दर्जे की हालत बहुत ही खराब है। दुर्घनाएँ और ट्रेनों की लेट-लतीफी तो आम बात है। इन सबको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सरकार ने वादों की जो झड़ी चुनाव पूर्व लगाई थी, उसे पूरा कर पाने में वह पूरी तरह से विफल साबित हुई है।
इस समय प्याज सबसे बड़ी खलनायक साबित हो रही है। सरकार जमाखोरों पर कार्रवाई नहीं कर पा रही है। केवल सख्त कदम उठाने की चेतावनी ही दे रही है। सरकार बदल गई, पर जमाखोर नहीं बदल पाए। इसी प्याज ने कई बार पूरे देश को रुलाया है। इस बार भी वह रुलाने की तैयारी में है। बाजार ने यह आशंका प्रकट की है कि इस बार प्याज के दाम सौ रुपए किलो तक पहुंच जाएंगे। इस आशंका के तहत जमाखोर सक्रिय हो गए। गोदामों में अगले अगले आठ महीनों तक का स्टाक जमा कर लिया गया है। देख जाए तो कांग्रेस के हारने में यही महंगाई की सबसे बड़ा काकरण रही है। अब यही कारण मोदी सरकार के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। भोजन में प्याज का उपयोग हर तरह से होता है। इस गर्मी में सलाद के रूप में प्याज का होना अतिआवश्यक है। देश में जिन स्थानों में प्याज का उत्पादन होता है, वहां इस बार बारिश की देरी ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जो किसान प्याज बोना चाहते हैं, वे इसलिए परेशान है कि इस बार प्याज के बीज की कीमतें चार गुना बढ़ गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि देश में प्याज का उत्पादन कम होता है। बम्फर उत्पादन के कारण कई बार प्याज सड़कों पर फेंक दी गई हैं। सरकार भी बहुत बड़ी जमाखोर है। उसने भी प्याज का बहुत बड़ा स्टॉक जमा कर रखा है। एक समय इसी प्याज का दाम दो से तीन रुपए किलो था, पर अब यह बीस रुपए किलो मिल रही है। सरकार यदि सख्ती दिखाते हुए कोल्ड स्टोरेज पर छापा मारे, तो काफी मात्रा में प्याज का स्टॉक बाजार में आ जाएगा। पर सरकार ऐसा क्यों नहीं कर पा रही है, यह आश्चर्य का विषय है। इसके पहले की सरकारें भी प्याज के दामों में अंकुश रखने में नाकाम साबित हुई हैं।
यदि आलू की बात करें, तो इसका स्टॉक अपेक्षाकृत कम है। फरवरी में हुई बारिश उसके उत्पादन को प्रभावित किया है। व्यापारियों का मानना है कि यदि आलू का निर्यात रोक दिया जाए, तो भी इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। आलू भी प्याज की तरह ही बार-बार इस्तेमाल में लाई जाने वाली सब्जी ही है। मध्यम वर्ग और श्रमजीवी वर्ग के लिए आलू-प्याज बहुत ही आवश्यक वस्तु है। अब धीरे-धीरे ये दोनों ही चीजें थाली से अदृश्य हो रही हैं, इसी के साथ मोदी सरकार की अगिAपरीक्षा शुरू हो गई है।
आजकल अंतरराष्ट्रीय मामलों के कारण आवश्यक जिंसों के दाम बढ़ने लगे हैं। ईराक युद्ध के कारण पेट्रोल केी कीमतें बढ़ेंगी, इससे अन्य कई चीजों के दाम बढ़ना लाजिमी है। किसी भी तरह से महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। अब देखना यह है कि सरकार आखिर क्या करती है, जिससे महंगाई पर काबू पाया जा सके। भारत में बढ़ती महंगाई का संबंध आधुनिक पद्धति के विकास के साथ है। अर्थतंत्र का विकास होता है, तब नागरिकों के हाथ में पहले से अधिक धनराशि होती है। इस धनराशि से वह आवश्यक जिंसों और ऐश्वर्यशाली चीजों की खरीदी करता है। जिस तेजी से लोगों की आवक में तेजी से इजाफा होता है, उस तेजी से उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाती। इसलिए कीमतें बढ़ती हैं। इस प्रक्रिया में मुश्किल यह है कि समाज का जो शक्तिशाली वर्ग होता है, उसके हाथ में अधिक धन आता है। यह वर्ग अपना खर्च बढ़ा देता है। महंगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है। इसलिए कमजोर वर्ग को महंगाई बढ़ने का अधिक असर होता है। मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी करती है। इससे बाजार में निवेश का प्रवाह कम होता है। इस वजह से विकास की दर धीमी हो ेजाती है। फिर जब विकास दर धीमी हो जाती है, तो रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाती है। इन दोनों कारणों से बाजार में अधिक निवेश होता है और महंगाई बढ़ जाती है। यदि विकास दर और महंगाई के बीच संतुलन रखने में ही सरकार की कसौटी मानी जाती है।
उद्योगपति रिजर्व बैंक के सामने यह मांग रखते हैं कि ब्याज दरों में कमी की जाती रहे, तो कम ब्याज से कर्ज लेकर वे अपने धंधे को बढ़ा सकें। इससे उनके उद्योग का विकास होगा। मध्यम वर्ग यह मांग करता है कि ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी की जाती रहे, ताकि उन्हें उनके फिक्स्ड डिपॉजिट पर अधिक ब्याज मिले। जब ब्याज दर बढ़ती है, तब मुद्रास्फीति में कमी आती है और महंगाई भी कम होती है। इससे आम आदमी राहत अनुभव करता है। पर इससे उद्योगपतियों को नुकसान ही होता है।
अब यदि सरकार अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए आम जीवन से जुड़ी तमाम वस्तुओं के भाव को नियंत्रित करना चाहती है, तो उसे वायदा बाजार पर तुरंत प्रतिबंध होगा। यदि आवश्यक वस्तुओं से कोल्ड स्टोरेज भर गए हैं, तो वहां की बिजली काट देनी चाहिए, ताकि माल बाहर आ सके। यदि कठोर होना है, तो जमाखोरों पर होना होगा। कहा गया है कि अगले आठ महीनों तक प्याज की आपूर्ति हो सके, इतनी प्याज कोल्ड स्टोरेज में जमा है, यदि यह प्याज बाहर आ जाती है, तो उसकी खपत होने तक प्याज की नई फसल आ जाएगी और प्याज के दाम नियंत्रित हो जाएंगे, इसके लिए सरकार को सख्त होना होगा। अब सरकार बजट की तैयारी कर रही है। बजट में भी कई चीजों के दाम बढ़ेंगे ही, इसके लिए भी उसे जनता को तैयार करना होगा। डीजल, रेल्वे और माल भाड़े में वृद्धि के बाद यदि बजट से राहत मिलती है, तो यह दुख कम हो सकता है। इसके लिए सरकार के पास अभी थोड़ा सा समय है, इसके रहते यदि वह जनता को कुछ राहत दे सकती है, तो लोगों को यह विश्वास करना आसान होगा कि भाजपा को वोट देकर उनसे गलती नहीं हुई। अब गेंद सरकार के पाले पर है, देखना है कि वह क्या करती है, जिससे जनता को राहत मिले।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 23 जून 2014

राज्यपाल और राजनीति

डॉ. महेश परिमल
हमारे देश में राजभवन को यदि उपकृत भवन कहा जाए, तो गलत न होगा। बरसों से हम सभी देख रहे हैं कि राज्यपाल एक गरिमामय पद होने के बाद भी केवल राज्य के मुख्यमंत्री से विवाद के बाद ही चर्चा में आता है। इसके पहले उनका नाम केवल उद्घाटन समारोहों में मुख्य अतिथि के रूप में ही सामने आता है। कई बार राजभवन राजनीति का केंद्र बन जाते हैं। विशेषकर उस समय जब केंद्र में विपक्ष की सरकार हो। इसलिए यह परंपरा चली आ रही है कि केंद्र सरकार के पदारूढ़ होते ही राज्यों के राज्यपालों को बदल दिया जाता है। उनके स्थान पर पहुंच जाते हैं, ऐसे बुजुर्ग किंतु निष्ठावान कार्यकर्ता, जिन्हें कोई पद नहीं मिल पाया। इस तरह से सरकार उन्हें उपकृत ही करती है। वैसे देखा जाए, तो कानूनी रूप से सक्षम होने के बाद भी राज्यपाल की देश या राज्य के विकास में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं होती। अब कई राज्यपाल विलासिता की जिंदगी से दूर होकर तीन बेडरूम के फ्लेट में पहुंच जाएंगे।
किसी ने कहा है कि यदि आपकी वकालत नहीं चल रही हो, तो अपने कौम के लीडर बन जाओ। ऐसे ही राजनीति में जब किसी नेता की स्थिति सेवानिवृत्ति की हो, तो उसे राज्यपाल बनने के लिए लाबिंग करनी पड़ती है। राज्य के मुख्यमंत्री के पास कई काम होते हैं, पर राज्यपाल के पास उद्घाटन के अलावा और कोई काम नहीं होता। विधानसभा के पहले दिन उनका अभिभाषण अवश्य होता है, पर उसे कोई भी विधायक या मंत्री गंभीरता से नहीं लेता। जिस किसी को राज्यपाल बनाया जाता है, उसे वह पद एक उपकृत योजना के तहत प्राप्त होता है। अधिकांश राज्यपाल वृद्ध या सीनियर कार्यकर्ता होते हैं। यह पद उन्हें एक अवार्ड की तरह दिया जाता है। इस समय देश में राज्यपालों का विकेट एक के बाद एक गिरते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल. जोशी और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने इस्तीफा दे दिया है, इसके बाद यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपाल समझ गए कि आज नहीं तो कल हमें भी इस्तीफा देना ही होगा। होना तो यह चाहिए था कि जिस दिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, उसी दिन से राज्यपालों को इस्तीफा दे देना था। पर विलासिता जीवन को मोह इतनी जल्दी नहीं छूटता, इसलिए इतने दिन निकल गए। कानून के अनुसार राज्यपालों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। पर केंद्र सरकार बदलते ही राज्यपालों को हटाने और नई नियुक्ति का सिलसिला जारी हो जाता है।
कई राज्यपाल, खासकर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपालों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भेंट की है। इन्होंने अपना पद छोड़ने की मंशा जाहिर की है। इसके सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पूर्व सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों की चिंता यह है कि अब उन्हें वे उन शासकीय सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे, जो अब तक मिल रही थी। नौकर-चाकरों से भरे राजभवन के बाद अब उन्हें तीन बेडरुम वाले घर में रहना होगा। इसे केंद्र सरकार बदलने का साइड इफेक्ट कहा जा सकता है। वास्तव में राज्यपाल का पद केंद्र की नजर रखने के लिए तैयार किया गया था। पिछले 30 वर्षो में गठबंधन की सरकार इस देश में थी, ऐसे में अन्य राज्यों में क्या हो रहा है, इसके लिए राज्यपालों को नियुक्त किया जाता था, ताकि समय रहते केंद्र सरकार राज्य पर कार्रवाई कर सके। कई राज्यपालों ने तो अल्पमत राज्य सरकार को पलटाने की साजिश भी की, कुछ सफल भी रहे। इसलिए कई बार राजभवनों को केंद्र सरकार का राजनीतिक अड्डा कहा जाता है। गुजरात में भाजपा सरकार ने कांग्रेस के खिलाफ ऐसे आरोप लगाए भी हैं। कई बार ऐसे आरोपों में तथ्य भी होते हैं। राज्यपाल पक्के राजनीतिज्ञ होते हैं, बिना राजनीति के वे रह भी नहीं सकते। इसलिए अक्सर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच शीतयुद्ध की खबरें आती ही रहती हैं। राज्य सरकार को परेशान करना राज्यपाल का मुख्य काम होता है। राजभवन में कई फाइलें केवल इसीलिए अटकी पड़ी रहती हैं, क्योंकि उसमें केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ काम करने का अनुरोध होता है।
राज्यपाल का काम ठाठ वाला है। उनकी कोई जवाबदारी न होने के बाद भी वे राज्य सरकार के कामों में अड़ंगा लगाते रहते हैं। पूर्व में भाजपा शासित राज्यों में कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने अनेक फाइलें अटका रखी थीं और कांग्रेस शासित राज्यों को अधिक प्राथमिकता दी जाती। इस समय राज्यपालों को बदलने की जो बात चल रही है, उस पर कांग्रेस कुछ कह नहीं सकती। क्योंकि 2004 में जब यूपीए सरकार सत्ता पर आई, तब उसने पहले की एनडीए सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को हटा दिया था। कुल मिलाकर आज राज्यपालों की नियुक्ति पूरी तरह से राजनीति हावी हो गई है। कोई राज्यपाल स्वैच्छिक रूप से अपना पद छोड़ना नहीं चाहता। राज्यपाल का पद एक सम्मानित पद है, इसे हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। किंतु हमारे संविधान में राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण होते हुए भी अप्रभावी पद माना गया है। राज्य सरकार उन्हें सम्मान तो देती है, पर उनके प्रभाव में नहीं आती। राज्यपाल और राज्य सरकार एक ही पार्टी के हों, तो संबंध सौहार्दपूर्ण होते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाएं लगातार हो रहीं थी, राज्य सरकार की आलोचना हो रही थी, राष्ट्रपति शासन की मांग हो रही थी, फिर भी राज्यपाल जोशी की तरफ किसी ने ऊंगली नहीं उठाई। उनकी तरफ से किसी प्रकार का सुझाव केंद्र सरकार को नहीं दिया गया। यह इसलिए कि जब उत्तर प्रदेश में सपा ने सरकार बनाई, तब वह केंद्र की गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। इसलिए राज्यपाल जोशी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे उल्लेखित किया जाए। उन्होंने मौन रहकर अपनी भूमिका निभाई, अंत में अपनी आत्मा की आवाज सुनकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
राज्यपालों की भूमिका:- भारत में राज्यपालों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है और केंद्र में राष्ट्रपति की तरह राज्यों में कार्यपालिका की शक्ति उसके अंदर निहित होती है। राज्यपाल सांकेतिक तौर पर राज्य का प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक शक्तियां मुख्यमंत्री के पास होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य की सारी कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल के पास होती है और सभी कार्य उन्हीं के नाम से होता है। वास्तव में, राज्यपाल विभिन्न कार्यकारी कार्यों के लिए मात्र अपनी सहमति देता है। भारतीय संविधान के अनुसार, राज्यपाल स्वतंत्र तौर पर कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले सकते हैं। राज्य की कार्यकारी शक्तियां मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के अधीन होती हैं।
राज्यपाल की शक्तियां:-भारत के राष्ट्रपति की तरह, राज्य के राज्यपालों के पास कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियां निहित होती हैं। राज्यपालों के पास विवेकाधीन और आपातकालीन अधिकार हैं। राष्ट्र्रपति और राज्यपालों के पास अधिकारों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि राज्यपाल के पास राजनयिक और सैन्य शक्ति संबंधी कोई अधिकार नहीं है। राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री सहित, मंत्रिपरिषद, एडवोकेट जनरल और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार है। मंत्रिपरिषद और एडवोकेट जनरल राज्यपाल की इच्छा पर अपने पद पर बने रह सकते हैं। हालांकि, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को राज्यपाल के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। राष्ट्र्रपति के पास राज्य लोक सेवा के सदस्यों को हटाने का अधिकार है। राज्यपाल हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्र्रपति को सलाह देते हैं। राज्यपाल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जजों की नियुक्ति करते हैं। अगर राज्यपाल को ऐसा लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व विधान सभा में नहीं है तो वे विधान सभा में उनके एक प्रतिनिधि की नॉमिनेट कर सकते हैं। जिस राज्य में विधान सभा और विधान परिषद है वहां राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वे साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और सामाजिक कार्यों से संबंधित लोगों को विधान परिषद में नॉमिनेट करें।
राज्यपालों की विधायिका शक्तियां:- राज्यपाल को राज्य विधानमंडल का हिस्सा माना जाता है। वह राज्य विधानसभा को संबोधित करने के साथ-साथ विधान सभा को संदेश देता है। केंद्र में राष्ट्र्रपति की तरह राज्य में राज्यपाल के पास विधान सभा की बैठक बुलाने और उसे भंग या स्थगित करने का अधिकार है। हालांकि, ये सारी शक्तियां औपचारिक हैं और किसी भी निर्णय लेने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद के द्वारा सलाह दी जाती है। राज्यपाल विधान सभा का उद्घाटन करते हैं और प्रत्येक वर्ष विधान सभा को संबोधित करते हैं। राज्यपाल अपने संबोधन में सत्ताधारी पार्टी की प्रशासनिक नीतियों को रखते हैं। राज्यपाल विधान सभा में वार्षिक लेखानुदान और मनी बिल (धन विधेयक) के लिए अनुमोदन करते हैं। राज्यपाल स्टेट फाइनेंस कमीशन का गठन करता है। उसके पास आपातकालीन स्थितियों में राज्य की आकस्मिक निधि से पैसे के निष्कासन का अधिकार होता है। राज्य विधान सभा के द्वारा पास सभी कानून राज्यपाल की अनुमति के बाद ही कानून का रूप लेते हैं। धन विधेयक न होने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह विधान सभा के पास दोबारा से बिल भेजें, लेकिन अगर राज्य विधान सभा के द्वारा बिल वापस राज्यपाल के पास फिर से भेज दिया जाता है तो राज्यपाल को उस पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। विधानसभा के स्थगन होने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वे अध्यादेश को पारित करें और तत्काल प्रभाव से कानून लागू हो जाता है। हालांकि, अध्यादेश को विधान सभा के अगले सत्र में पेश किया जाता है और यह अगले छह सप्ताह तक प्रभावशाली रहता है जब तक कि विधानसभा द्वारा पारित न हो जाए।
 न्यायिक शक्तियां:-राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह किसी अपराधी की सजा को माफ या कम कर सकता है। वह कानून द्वारा सजा पाए किसी अपराधी की सजा को निलंबित कर सकता है। साथ ही हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में राष्ट्र्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल से सलाह-मशविरा करते हैं। आपातकालीन शक्तियां: विधान सभा में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति में अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करे।  राज्यपाल विशेष परिस्थितियों में राष्ट्र्रपति को राज्य की स्थिति के बारे में रिपोर्ट करते हैं और राष्ट्र्रपति को राज्य में राष्ट्र्रपति शासन का अनुमोदन करते हैं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल के पास सारी शक्तियां होती हैं और वे राज्य के कार्यों के लिए निर्देश जारी करते हैं।
राज्यपाल का वेतन:- गवर्नर्स एक्ट 1982 (वेतन, भत्ते व विशेषाधिकार) के अनुसार राज्यपाल को प्रति महीने 1 लाख 10 हजार रुपए का वेतन मिलता है। इसके अलावा, राज्यपाल को कई सुविधाएं भी मिलती हैं, जो उनके कार्यकाल पूर्ण होने तक जारी रहती हैं। राज्यपाल को मिलने वाली सुविधाएं मासिक वेतन के अलावा राज्यपाल को कई अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं, जैसे चिकित्सा सुविधा, आवासीय सुविधा, यात्रा सुविधा, फोन और बिजली बिल की प्रतिपूर्ति इत्यादि। राज्यपाल और उनके परिवार को जीवन भर मुफ्त चिकित्सा सुविधा भी मिलती है। देश भर में यात्रा के लिए राज्यपाल को एक नियत यात्रा भत्ता मिलता है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 18 जून 2014

शहरी प्रदूषण ही है अस्थमा का कारण

डॉ. महेश परिमल
अभी कुछ दिनों पहले ही हमारे बहुत करीब से अस्थमा दिवस गुजरा। उस दिन बहुत से आयोजन हुए, जिसमें अस्थमा होने के कारण और उससे बचाव पर चर्चा की गई। यह एक परंपरा है, जिसे हम केवल ‘दिवस’ मनाकर निभाते हैं। इस बीमारी के बारे में हम यह भूल जाते हैं कि अस्थमा को यदि किसी ने विकराल रूप में हमारे सामने खड़ा किया है, तो वह है स्वयं मानव। अस्थमा होने का मुख्य कारण प्रदूषण है। आज प्रदूषण को मानव ने कितना प्रदूषित किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। यदि ध्यान दिया जाए, तो अस्थमा का इलाज हमारे आयुर्वेद में है, इससे यह पूरी तरह से मिट सकता है, पर हमें तो विदेशों में पढ़-लिखतर आए डॉक्टरों पर ही भरोसा है। इसीलिए यह रोग देश में तेजी से फैल रहा है। जितना ध्यान हम इस रोग को थामने में लगा रहे हैं, उससे थोड़ा सा भी कम ध्यान यदि प्रदूषण की ओर दिया जाए, तो इस रोग के देश से नेस्तनाबूद होने में जरा भी वक्त नहीं लगेगा। विश्व अस्थमा दिवस पर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को पूरे पेज का एक रंगीन विज्ञापन देकर यह दावा किया कि हम तीस बरस से इस रोग के खिलाफ लड़ रहे हैं। इस मामले में हम अनथक परिश्रम कर इस पर अनुसंधान कर रहे हैं। विश्व के 78 देशों में हम अस्थमा के खिलाफ लड़ने के लिए लोगों को सचेत कर रहे हैं, हम उन्हें सूंघने के साधन उपलब्ध करा रहे हैं। यदि यह कंपनी वास्तव में अस्थमा के मरीजों की सेवा करने का दावा करती है, तो उसे इस विज्ञापन के लिए लाखों रुपए खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती। जो कंपनी एक विज्ञापन के लिए लाखों रुपए खर्च कर सकती है, तो मुनाफे का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है।
हमारे देश में अस्थमा के मरीजों की संख्या करीब 3 करोड़ है। केवल मुम्बई शहर में ही इस बीमारी के दस लाख मरीज हैं। दूसरे दस लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें अस्थमा हो सकता है। मल्टिनेशनल ड्रग कंपनियां कभी भी अस्थमा के कारणों की खोज एवं उस पर शोध के लिए परिश्रम नहीं करते। उनकी योजना यही होती है कि अस्थमा के लिए बनाई गई उनकी दवाएं भारतीय बाजारों में बिकती रहें। स्वास्थ्य के विशेषज्ञ हमें हमेशा चेतावनी देते हैं कि 2020 तक हमारे देश में विश्व में अस्थमा की राजधानी बन जाएगा। वैसे तो यह रोग एजर्ली से होता है। देखा जाए, तो यह कोई रोग ही नहीं है और न ही कोई संक्रमण रोग है। अस्थमा किसी बैक्टिरिया या वाइरस से भी फैलने वाला रोग नहीं है। एलोपेथी के डॉक्टरों के पास तो केवल उन्हीं बीमारियों का इलाज होता है, जो विषाणुओं से फैलते हैं। इसलिए यह सोचना कि अस्थमा हमारे एलोपेथी डॉक्टर के इलाज से दूर हो जाएगा, गलत है। इस कारण वे ऐसा प्रचार करते हैं कि अस्थमा का कोई इलाज ही नहीं है। दूसरी ओर हमारे आयुर्वेद और प्राकृतिक विज्ञान में अस्थमा का असरकारक इलाज है। आखिर अस्थमा क्यों होता है? वास्तव में यह आज की शहरीकरण की देन है। शहर में वायु प्रदूषण, मागों पर पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण उसके धुएं भी बढ़ रहे हैं। इन धुओं में कार्बन डायऑक्साइड के कण शामिल होते हैँ। जो सांस नली में चले जाते हैं, वहां जाकर सूजन पैदा करते हैं। इससे अस्थमा का अटैक आता है। आज शहर के किसी भी रास्ते पर चलना बहुत ही खतरनाक है। भारत के शहरों में बढ़ते प्रदूषण के कारण अस्थमा के रोगियों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है। भवन निर्माण के दौरान सीमेंट और सीसे से बनते रंगों के कारण हवा में सल्फर डायऑक्साइड, लेड ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड के जहरीले कण वायुमंडल में फैल जाते हैं। इन्हीं खतरनाक अणुओं से होते हैं अस्थमा के हमले।
हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं, जिनका श्वसनतंत्र कमजोर होता है। यह विरासत में मिलता है। उनके शरीर के भीतर जरा सा भी प्रदूषणयुक्त हवा जाती है, तो उससे उनकी सांस नली फूल जाती है और फेफड़े संकुचित हो जाते हैं। इस कारण उन्हें श्वांस लेने में तकलीफ होती है। खून को मिलने वाली ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इन परिस्थितियों में कहा जाता है कि अस्थमा के मरीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। इसलिए कहीं भी थोड़ी सी धूल उड़ी नहीं कि ऐसे लोग बुरी तरह से हलाकान हो जाते हैं। डॉक्टर कहते हैं कि एस्पीरिन जैसी एलोपेथी दवा लने से भी अस्थमा हो सकता है। कितने ही लोगों को सिगरेट के धुएं से और हवा में नमी आने से भी अस्थमा हो सकता है। यदि घर में किसी सीलन भरे स्थान पर सोना हो, तो भी अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है। घर के कार्पेट, खिड़कियों के परदे के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले रंग भी अस्थमा का कारण हो सकते हैं। धूल और फूल के परागकणों से भी अस्थमा हो सकता है। आज अस्थमा के जितने भी कारण दिखने को मिलते हैं, उसमें 99 प्रतिशत मानव ने ही और खासकर मशीनों के कारण ही होते हैं। बमुश्किल एक प्रतिशत कारण प्राकृतिक है। इसमें आकाश में गहराते बादलों या फूलों की सुगंध का समावेश होता है। विश्व भर में जिन देशों का विकास आधुनिक पद्धति से हो रहा है, वहां अस्थमा तेजी से फैल रहा है। इससे यह कहा जा सकता है कि विकास का फल सबसे पहले शहरी नागरिक ही चख पाते हैं।
अस्थमा की बीमारी में समाजवाद के दर्शन होते हैं। यह रोग किसी को भी हो सकता है। इसकी नजर में कोई गरीब नहीं, कोई अमीर नहीं। इंसान को यदि अस्थमा से बचना हो, तो सबसे सरल उपाय यही है कि वह शहर के प्रदूषित वातावरण को छोड़कर गाँव जाकर बस जाए। जो ऐसा नहीं कर पा रहे हों, उनके लिए योगासन और प्राकृतिक उपचार ही एकमात्र उपाय है। इससे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। किसी भी सूरत में एलोपेथी की दवाएं नहीं लेनी चाहिए। डॉक्टरों के पास अस्थमा का कोई इलाज ही नहीं है, इसलिए वे कामचलाऊ उपाय के रूप में इन्हेलर्स के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। इस पम्प में आल्बुटेरोल या साल्बुटामोल जैसी दवाएं होती हैं, जो फौवारे की तरह श्वास नली को खोलने का काम करता है। परंतु ये दवाएं फेफड़े और हृदय को कमजोर बनाती हैं। इसलिए इन्हेलस का इस्तेमाल केवल आपात स्थिति में ही करना चाहिए। ऐसी सलाह डॉक्टर  देते हैं। के.ई. अस्पताल के फिजियालॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. मनु कोठारी के पास कोई भी मरीज अस्थमा की शिकायत करने पहुंचता है, तो वे उसे यही सलाह देते हैं कि वह शुद्ध घी और चावल का हलुवा खाए। इसके अलावा गुड़ और तैलीय बीजों से बनने वाली चिकी के इस्तेमाल से चमत्कारिक असर होता है। इस प्रयोग को अस्थमा के हजारों मरीजों ने आजमाया, इससे उन्हें फायदा भी हुआ। ये चीजें शरीर के प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं।
इस तरह से देखा जाए, तो अस्थमा की दवाएं बेचने वाली कंपनियां केवल अपने लाभ के लिए ही यह प्रचार करती हैं कि वह इस दिशा में शोध कर रही है। इसके पहले अमुक दवाओं से अस्थमा पर काबू पाया जा सकता है। दवा कंपनियों के इस झूठे प्रचार में कोई न उलझे, इसके लिए देश में किसी तरह का कोई जागरूकता का काम नहीं किया जा रहा है। पर कुछ लोगों को इस दिशा में आगे आना ही होगा। तभी इन दवा कंपनियों की असलियत सामने आएगी। अपने आसपास का वातावरण शुद्ध रखें, यही है अस्थमा का इलाज।
   डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 7 जून 2014

नहीं भूलती वह भीगी आंखें!

डॉ. महेश परिमल
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा, जिसने संसद पर पांव रखने के पहले उसकी सीढ़ियों पर माथा टेका होगा। इस तस्वीर से यह संदेश जाता है कि संसद जिसमें देश भर के चुने हुए जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं और देश की समस्याओं पर चर्चा कर उसका समाधान ढृंढते हैं, वह संसद एक मंदिर की तरह है। संसद में बैठने वाला सांसद उस मंदिर का पुजारी है। वैसे भी यह परंपरा है कि जब कोई अपनी दुकान पर पहुंचता है, तो वह उसकी दहलीज को प्रणाम कर ही अंदर जाता है। संसद यदि मंदिर है, तो उसकी सीढ़ियों पर माथा टेकना भारतीय परंपरा है, जिसका निर्वाह देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसके बाद संसद को संबोधित करते हुए लोगों ने उन्हें पहली बार इतना भावुक होते हुए देखा। देश के प्रधानमंत्री पर अच्छा लगता है, ऐसे संबोधनों ने उन्होंने अपने मित्रों के लिए किया।  इसके पहले संसद को इतना गरिमामय आज की पीढ़ी ने नहीं देखा होगा। अब तक संसद में न जाने क्या-क्या होता रहा। लोगों ने अपशब्द कहे, कुर्सियां फेंकी, परस्पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया, संसद मानों एक अखाड़ा हो गई हो। पर अब संसद को गरिमा देने का काम शुरू हो गया है। देश को एक संवेदनशील प्रधानमंत्री मिला है। ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने गरीबी देखी है, गरीबी झेली है और गरीबी में अपना गुजारा किया है। जमीन से जुड़ा एक ऐसा नेता, जिस पर पूरे देश को नाज हो सकता है। आज उनके सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं, पर उन्हें विश्वास है कि वह अपने साथियों के साथ उन सारी चुनौतियों का सामना कर लेंगे और जो वादे उन्होंने चुनावी रैलियों में किए हैं, उसे पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे।
न जाने क्यों, देश के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद का ताज पहनने की दिशा में जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे अतिभावुक होते जा रहे हैं। पहले दिल्ली में संबोधन करते हुए करीब-करीब रो ही दिए, तो उसके दूसरे ही दिन गुजरात विधानसभा में उनका गला भर आया था। अब तब अपनी चुनावी रैलियों में वे गरजते थे, पर अब लगातार सौम्य होने लगे हैं। गुजरात के मणिनगर में सभा को भी अपनी गरिमा को देखते हुए प्रधानमंत्री पद के अनुरूप ही संबोधित किया। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद पर जमीन-आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री राज्य का प्रधान होता है और प्रधानमंत्री देश का प्रधान होता है। हाल ही में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए जब नरेंद्र मोदी ने 36 इंच की छाती शब्द का प्रयोग किया था, तब काफी बहस हुई थी। लोगों का कहना है कि क्या क36 इंच की छाती की बात करने वाले इंसान की आंखों में कभी आंसू आ सकते हैं? किसी के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने में आंसू स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं और गला भर आता है। वैसे भी इंसान जब अपने अतीत में झांकता है, तो उस समय की भूली-बिसरी यादें ही उसकी आंखें भिगो देती है। उस क्षण उन्हें याद आया होगा, मां का दुलार, भाई-बहनों की ठिठोली और उसके बाद संघ के प्रचारक के रूप में गांव-गांव पैदल घूमना। यह सब याद कर वे अपने आप को रोक नहीं पाए। आंसुओं ने भी अपनी सीमाएं तोड़ दी और गीली कर गए आंखें। संवेदनशील लोगों को उनकी ये तस्वीरें हमेशा अपनेपन के साथ याद आएंगी। क्योंकि यहां पर वे एक नए रूप में दिखाई दिए। अब तक उन्हें रोबीली आवाज वाले और गुस्से से भरे चेहरे वाले के रूप में जाना जाता था। पर अब अश्रुपूरित आंखों वाले मोदी के रूप में देखना एक अलग ही अनुभव था। यह देखकर किसी ने यह टिप्पणी कर दी कि यह विजय समारोह है या विदाई समारोह। मोदी तो कुछ देर बाद पूर्ववत हो गए, पर सांसद काफी देर तक उस संवेदना भरे वातावरण से नहीं निकल पाए। देश का एक बड़ा नेता जब रोने के करीब हो, तो अच्छे-अच्छे लोग भी अपने आप को रोक नहीं पाते। जिन्होंने भी टीवी पर यह लाइव शो देखा, वह भी अपने आंसू रोक नहीं पाया। इसे कहते हैं संवेदना की लहर।
आंसुओं को दबाया नहीं जा सकता। आंसू हर्ष पर भी आते हैं और शोक पर भी। विश्वभर के नेता भी अपने आंसुओं को रोक पाने में विफल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तो कई बार इन हालात से गुजरे हैं। कई बार उनका गला भर आया है। सख्त माने जाने वाले रुसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की बात करें, तो मार्च 2012 में चुनाव जीतने के बाद खुशी के मारे वे रो पड़े। वे इतना रोए कि आंसू उनके गाल तक आ गए। एक तरफ वे हंसते जाते, तो दूसरी तरफ उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ओबामा भी चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं की प्रशंसा करते हुए रो पड़े थे। अमेरिकी नेताओं में अब यह बात सामान्य हो गई है कि अमुक नेता की आंखें भर आई, या फिर उनका गला भर आया। सन् 2007 में हिलेरी क्लिंटन अपने चुनाव प्रचार के दौरान सवालों के जवाब देते-देते रो पड़ीं थीं। जार्ज डब्ल्यू बुश भी एक सैनिक को मरणोपरांत मेडल देते हुए रो पड़े थे। क्लिंटन या बुश तो कोई एथलेटिक चेम्पियन या बॉडी बिल्डर नहीं थे, पर पुतिन तो जूउो चेम्पियन अपने शरीर का विशेष ध्यान रखने वाले माने जाते हैं, इसके बाद भी वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। जिन्हें हम आयरन लेडी के नाम से जानते हैं, वही मार्गरेट थ्रेचर भी जब 10 डाउनिंग स्ट्रीट से विदा हो रही थीं, तब भी वे रो पड़ीं थीं। 1072 में डेमोकेटिक पार्टी के एडमंड मस्की जीतेंगे, यह तय था, परंतु उसकी पत्नी के खिलाफ किसी अखबार में प्रकाशित किसी खबर को पढ़ते हुए रो पड़े, मतदाताओं पर इसका असर उल्टा हुआ और वे चुनाव हार गए। रिपब्लिकन जॉन बोहनर स्पीकर ऑफ द हाउस थे। अमेरिकी सरकार में इस पद को बहुत बड़ा माना जाता है। बोहनर के साथ यह होता कि वे बात-बात पर रो पड़ते, इसलिए लोग उन्हें ‘वीपर आफ द हाउस’ कहा करते। उनकी छबि रोने वाले नेता की हो गई। आखिरकार उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा।
अपनी चुनावी सभाओं को संबोधित करते समय नरेंद्र मोदी के चेहरे पर कभी संवेदनाएं नहीं झलकीं। तब उनके चेहरे पर कीलर इंस्टींकट का भाव छलकता। पर जैसे-जैसे वे प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंचने लगे, वैसे-वैसे भावुक बनते गए। फिल्मों में मीना कुमारी की छवि रोने वाली अभिनेत्री की रही है। अधिक रोने वाली नायिकाएं तो फिल्मों में चल जाएंगे, पर अधिक रोने वाले अभिनेता अधिक नहीं चल पाते। इसलिए नरेंद्र मोदी को अधिक भावुक होना नहीं चाहिए। क्योंकि जिसे लोगों ने एक दम-खम वाले इंसान के रूप में देखा है, उसे इतने अधिक भावुक रूप में देखना बार-बार अच्छा नहीं लगता। इसलिए उन्हें अपनी इस छवि से दूर रहकर एक सख्त एवं दूरंदेशी व्यक्ति के रूप में छवि बनानी होगी।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 29 मई 2014

अब मोदी की रोज होगी परीक्षा

डॉ. महेश परिमल
मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के साथ ही काम करना शुरू कर दिया है। अब यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके सामने किस तरह की चुनौतियां हैं। वे उसका मुकाबला किस तरह से करेंगे। पर सच तो यह है कि अनेक चुनौतियों के साथ-साथ पूरा रास्ता अग्निपथ की तरह है। जहां कदम-कदम पर अंगारे दहक रहे हैं, पूरा रास्ता फिसलन भरा है। लोग ताकते बैठे हैं कि कब कौन-सा कदम गलत उठे, तो वे टोक सकें। आक्षेप लगा सकें। आरोपों के कठघरे में खड़ा कर सकें। अब तक जनसभाओं में प्रधानमंत्री बहुत बोले, पर अब उन्हें कम बोलकर काम अधिक कर दिखाना होगा। तभी उनका व्यक्तित्व निखरकर सामने आ पाएगा। वैसे लोगों ने उन पर पूरा भरोसा किया है, पर सभी जानते हैं कि भरोसा जीतने में काफी वक्त लगता है, पर खोने में कुछ पल। इसलिएा प्रधानमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल के साथियों के शपथ ग्रहण समारोह में देश-विदेश के अनेक लोगों ने अपनी उपस्थिति देकर स्वयं को गौरवान्वित समझा। मोदी मंत्रिमंडल ने अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक मोदी एक राज्य को चलाते थे, अब उनके सामने पूरा देश है। देश ही नहीं विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश को चलाने की जिम्मेदारी है। लोगों ने उनसे काफी अपेक्षाएं पाल रखी हैं, इसलिए उनके एक-एक कदम की समीक्षा होगी।
आज मोदी के सामने सबसे बड़ी समस्या आर्थिक क्षेत्र की है। दूसरी है विदेशी मामलों की। तीसरी है सुरक्षा और चौथी उत्तर-पूर्व के राज्यों की समस्या। पांचवें क्रम में है आंतरिक सुरक्षा और छठी है कुछ नया कर दिखाने की। रोटी-कपड़ा-मकान और बिजली आदि आर्थिक क्षेत्र की समस्याओं में समाहित की जा सकती है। सबसे पहले बात आर्थिक क्षेत्र की, तो मोदी ने गुजरात और मध्यप्रदेश में सफल रूप से बनाई गई ज्योतिग्राम योजना को देश भर में लागू करनी होगी। दाल और तिलहन के समर्थन मूल्यों पर विचार करना होगा। चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने कई बार गेहूं की आयात-निर्यात नीति आदि पर अपने विचार व्यक्त किए। अब वे सत्ता पर काबिज हैं, तो अपने आइडियों को अमल में लाना चाहिए। फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भी एक सुलगता प्रश्न है। सरकारी सस्ते अनाज की दुकानों की बदहाली पर भी उन्हें विचार करना होगा। विदेशी मामलों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। पिछले दस वर्षो से यूपीए शासन के दौरान विदेश नीति में काफी खोट थी। चीन के साथ व्यवसाय, आंतरिक-बाहरी सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ डांवाडोल संबंध, पाकिस्तान की बार-बार बदनामी, पाक प्रेरित आतंकवाद आदि के संबंध में नए सिरे से विदेश नीति तैयार करनी होगी। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों को आमंत्रित कर भारत ने चीन को यह संकेत दे दिया है कि भारत एक परिवर्तन के मोड़ पर है। अमेरिका के साथ भी कड़ा व्यवहार दर्शाना होगा। अमेरिका में अवैधानिक रूप से रहने वाले गुजरातियों को स्थायी करने का काम हाथ में लेना होगा। दस वर्ष पहले एनडीए शासन में केपिटल गुड्स का आयात दस अरब डॉलर का था, जो यूपीए सरकार के दस वर्ष के शासन में 587 अरब डॉलर पर पहुंच गया। फ्रेंडली इंडस्ट्रियल पॉलिसी तैयार करनी होगी। कोल इंडिया जैसी अनेक निजी क्षेत्र की कंपनियों को और अधिक व्यावसायिक बनाना होगा। 2014 का फोब्र्स की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय विद्यार्थी जब विदेश पढ़ने जाते हैं, तब उन पर 27 हजार करोड़ का खर्च होता है, इस खर्च की जीडीपी पर मामूली असर होता है। उद्योगों के लिए अटकी हुई फाइलों की भी समीक्षा करनी होगी।
सुरक्षा के क्षेत्र में कहा जाता है कि भारतीय सेना महत्वपूर्ण हथियारों की कमी से जूझ रही है। 155 एम अल्ट्रा लाइट वेट फिल्ड होवीत्जर और लाइट यूटीलिटी हेलिकाप्टर आदि के बिना अधिक समय तक नहीं रहा जा सकता। भारत में ही ये शस्त्र बनाए जाए, इसकी तैयारी करनी होगी। शस्त्रों की आयात नीति को विदेशी नीति के साथ जोड़ना होगा। ऐसा हमारे विशेषज्ञ मानते हें। ये सारे बातें तो रुटीन की है। पर मोदी को कुछ ऐसा नया कर दिखाना होगा, जिसमें लोगों की दिलचस्पी हो। यह भी सच है कि मोदी के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि जिसे घुमाते ही परिवर्तन दिखाई देने लगे। लोगों की यह अपेक्षा है कि यूपीए सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने चुनौतियों के अभी कई गड्ढे और कई पर्वत हैें। अभी कई जम्प आने हैं। उन्हें देश की राजनीति के बदले विदेशी मामलों की राजनीति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। कितने ही समीक्षक यह मानते हैं कि सीएम से पीएम की दिशा में टर्न लेना बहुत ही मुश्किल है। मोदी ने गुजरात में जिस तरह से स्व केंद्र शासन चलाया, वैसा शासन चलाना केंद्र शासन में संभव ही नहीं है। सबको साथ लेकर चलने की बात कहना आसान है, पर उसे अमल में लाना बहुत ही मुश्किल है। अब मोदी को यह पता चल जाना चाहिए कि ह्यूमन हेप्पीनेस अर्थात सभी के जीवन में खुशहाली हमेशा कायम रहे, वैसे प्रयास किए जाने चाहिए। यह तब संभव है, जब लोगों को सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का सीधा असर उनकी निजी जिंदगी पर पड़े।
जो भी हो, पर सच यही है कि भाजपा को इस बार अपेक्षाओं के वोट मिले हैं। लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को नहीं देखा, उन्होंने केवल नरेंद्र मोदी को ही देखा। उन्हीं को वोट दिया। तीस वर्ष बाद देश गठबंधन की राजनीति से मुक्त हुआ है। इसका श्रेय मतदाता को दिया जाना चाहिए। वह भी आजिज आ चुका था, गठबंधन की राजनीति से। क्षेत्रीय दल अब तक देश के विकास में रोड़ा ही अटकाते रहे हैं। कई बार तो सीधी ब्लेकमेलिंग ही दिखाई दी है। ममता और जया तो इसी में महारत हासिल कर चुकी हैं। इसलिए लोगों ने इस बार भाजपा को गठबंधन की राजनीति से दूर रखा है, ताकि देश का संपूर्ण विकास हो। बिना किसी मजबूरी के सरकार अपने ठोस निर्णय ले सके। इन पूरी अपेक्षाओं के केंद्र में केवल नरेंद्र मोदी ही हैं।
  डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 26 मई 2014

आज से नमो युग का प्रारंभ

डॉ. महेश परिमल
आज नरेंद्र मोदी देश के 15 वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी एक के बाद एक ऐसा काम कर रहे हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ। संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा रखकर उसे प्रणाम करने का काम अभी तक किसी ने नहीं किया। उनकी यह तस्वीर मीडिया में छा गई। लोगों को लगा कि उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को वोट देकर कुछ भी गलत नहीं किया। 26 मई को मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे, उसके बाद गठन होगा मंत्रिमंडल का। इसमें कौन-कौन होगा, यह एक यक्ष प्रश्न है। पर कयास लगाए जा रहे हैं कि अभी तो मंत्रिमंडल छोटा ही होगा, बाद भी उसका विस्तार किया जाएगा। उनके मंत्रिमंडल से ही देश के अगले 5 वर्षो का भविष्य तय होगा। देश की दिशा और दशा तय होगी। इसलिए मोदी यह काम पूरी सावधानी से ही करेंगे, यह तय है। दस वर्ष पहले अटल मंत्रिमंडल में जो मंत्री थे, उनमें से कई तो राजनीति से दूर जा चुके हैं, या फिर प्रधानमंत्री की नजर से उतर चुके हैं। इसलिए यह तय माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में कई नए चेहरे शामिल होंगे।
अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में लालकृष्ण आडवाणी नम्बर टू थे। उन्हें गृह मंत्रालय के साथ-साथ देश का उपप्रधानमंत्री का पद भी दिया गया था। इस समय आडवाणी की उम्र 86 वर्ष है। अपनी वरिष्ठता को देखते हुए वे अपने से जूनियर नरेंद्र मोदी के केबिनेट में शामिल होंगे, इसकी कोई संभावना दिखाई नहीं देती। उन्हें लोकसभा स्पीकर का सम्मानीय पद दिया जा सकता है। इससे उनकी गरिमा बनी रहेगी। भविष्य में उन्हें राष्ट्रपति भी बनाया जा सकता है। भाजपा में नरेंद्र मोदी से अधिक वरिष्ठ मुरली मनोहर जोशी भी हैं, जो वाजपेयी मंत्रिमंडल में मानव संसाधन विकास मंत्री थे। उनकी अगवानी में भाजपा ने अपना चुनावी घोषणा पत्र तैयार किया था। कानपुर सीट पर उन्होंने भारी मतो से विजयश्री प्राप्त की है। मोदी के केबिनेट में शामिल होने के नाम पर वे अभी भी असमंजस में हैं। यदि वे केबिनेट में शामिल होने के लिए राजी हो जाते हैं, तो उन्हें फिर से मानव संसाधन विकास मंत्रालय दिया जा सकता है। यदि वे अपने से जूनियर नरेंद्र मोदी के केबिनेट में शामिल नहीं होना चाहते हों, तो उनके लिए दूसरा रास्ता योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद का कार्यभार दिया जाना ही शेष रहता है।
भाजपा की एक और वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज्य ने अपनी नाराजगी पहले ही जाहिर कर दी है कि उन्हें यदि उचित और सम्मानीय पद नहीं मिला, तो सरकार में शामिल नहीं होंगी। वाजपेयी मंत्रिमंडल में वे पहले तो स्वास्थ्य मंत्रालय और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में काम किया। इसके साथ ही वे दिल्ली की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता के रूप में भी काम करने का उन्हें खासा अनुभव है। पहले तो वे स्वयं ही प्रधानमंत्री पद की दावेदार थीं। पर बाद में उन्हें मना लिया गया। उन्हें विदेश मंत्री या सूचना प्रसारण मंत्री का पद देकर मनाया जा सकता है। किसी भी मंत्रिमंडल में वित्त विभाग किसको दिया जाता है, उस पर सबकी नजर होती है। वाजपेयी केबिनेट में वित्त विभाग यशवंत सिन्हा को दिया गया था। उसके बाद जसवंत सिंह को उनके स्थान पर लाया गया था। यशवंत सिन्हा अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जसवंत सिंह ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है। इसलिए वित्त मंत्री के रूप में अभी सबसे प्रबल दावेदार अरुण जेटली हैं, भले ही वे चुनाव हार चुके हैं, पर मोदी के वे अतिनिकट माने जाते हैं। अरुण जेटली वाजपेयी मंत्रिमंडल में वाणिज्य मंत्री थे, यह अनुभव भी उन्हें काम आएगा। संभवत: नरेंद्र मोदी वित्त मंत्री पद अपने गुजराती भाई दीपक पारेख जैसे अर्थशास्त्री को सौंप सकते हैं।
प्रधानमंत्री के बाद केबिनेट में दूसरे नम्बर का महत्वपूर्ण पद गृहमंत्री का होता है। नरेंद्र मोदी के लिए यह सबसे मुश्किलभरा निर्णय हो सकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने यह विभाग अपने ही पास रखा था। बाद में अपने विश्वस्त अमित शाह को  उप गृहमंत्री का पद दकर पुलिस विभाग उन्हें दिया था। अमित शाह नकली एनकाउंटर के मामले में आरोपी घोषित होने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में कमाल ही कर दिया। उनके गृह मंत्री बनने की पूरी संभावना थी, पर उन पर तीन हत्याओं का आरोप है, इसलिए आरोपों के चलते उन्हें किसी तरह का पद नहीं दिया जा सकता। इसलिए वे भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह को गृह मंत्री बना सकते हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद संभाला है, इसके अलावा वाजपेयी मंत्रिमंडल के केबिनेट में कृषि और फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय में काम करने का अनुभव है। नरेंद्र मोदी केबिनेट में पहले तो एक दर्जन मंत्रियों को शामिल करेंगे, उसके बाद अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे, ऐसा माना जा रहा है। गृह, विदेश, रक्षा और वित्त इन चारों महत्वपूर्ण मंत्रालय के आवंटन के बाद जो मंत्रालय बाकी रह जाते हैं, उसके लिए नीतिन गडकरी, रविशंकर प्रसाद, अनंत कुमार, राजीव प्रसाद रुडी, वैंकैया नायडू, सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्र, गोपीनाथ मुंडे, आदि नेताओं को शामिल किया जा सकता है। अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति ईरानी को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। मोदी मंत्रिमंडल की पहली सूची घोषित होने के बाद ही देश के आगामी 5 वर्षो की दिशा तय हो जाएगी। देखना यह है कि मोदी कितने सधे कदमों से इस काम को पूरा करते हैं। उनके सामने भले ही विपक्ष नाम की कोई चीज न हो, पर चुनौतियों के रूप में कई समस्याएं हैं। लोगों की यही धारणा है कि जिस तरह से उन्होंने चुनावी रैलियों में स्वयं को स्थापित किया है, ठीक उसी तरह वे देश को भी आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 मई 2014

नीतीश कुमार का नया दॉंव


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 20 मई 2014

नेताओं की सम्पत्ति में 30-40 गुना बढ़ोत्तरी

डॉ. महेश परिमल
लोकसभा चुनाव के लिए मतदान का कार्य सम्पन्न हो गया। इस दौरान मतदाताओं से देश की राजनीति में काफी कुछ बदलाव देखा। इस समय आरोप-प्रत्यारोप का जैसा दौर चला, वैसा दौर पहले देखने में नहीं आया था। अत्याधुनिक तरीके से प्रचार भी पहली बार देखा गया। सबसे बड़ी बात यह रही कि इस चुनाव में जो भी प्रत्याशी खड़ा हुआ, उसकी औसत सम्पत्ति 6 करोड़ है। एक तरफ प्रजा की सम्पत्ति में भले ही कोई इजाफा न हुआ हो, पर प्रत्याशियों की सम्पत्ति में जोरदार इजाफा हुआ है। यही नहीं, प्रत्याशियों की चल-अचल सम्पत्ति भी बेशुमार बढ़ी है। आखिर ये प्रत्याशी ऐसा क्या करते हैं, जिससे इनकी सम्पत्ति बढ़ती ही रहती है?  इस चुनाव में प्रत्याशियों ने अपनी सम्पत्ति का जो ब्यौरा है, उससे यह स्पष्ट होता है कि कोई भी प्रत्याशी आम आदमी या कम सम्पत्ति वाला नहीं है। कई करोड़ों से खेल रहे हैं, तो कुछ लाखों से खेल रहे हैं। कई प्रत्याशियों की सम्पत्ति पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार 40 से 50 गुना बढ़ गई है।
2014 के चुनावी जंग में उतरने वाले प्रत्याशियों की औसत सम्पत्ति 5.83 करोड़ है। कांग्रेस के प्रत्याशियों की औसत सम्पत्ति 54 करोड़ रुपए है, तो भाजपा के प्रत्याशियों की औसत सम्पत्ति 8 करोड़ रुपए है। इसी तरह आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की 3 करोड़, बसपा के 4 और सपा के प्रत्याशियों की औसत सम्पत्ति 3 करोड़ रुपए है। प्रत्याशियों की औसत सम्पत्ति 54 करोड़ के साथ कांग्रेस इसलिए आगे है, क्योंकि उसमें नंदन नीलकेणी और उनकी पत्नी की 7710 करोड़ की सम्पत्ति का भी समावेश होती है। राजनीतिज्ञों की सम्पत्ति दोगुनी या चौगुनी होती है, यह तो समझा जा सकता है, पर जब यह सम्पत्ति बढ़कर 30 से 40 गुना होती है, तो प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर इतनी सम्पत्ति उनके पास आती कहां से है? क्या केवल जनता की सेवा करने से ही सम्पत्ति प्राप्त होती है, या फिर और कोई कारण है? इस चुनाव में खड़े होने वाले कई प्रत्याशियों ने उम्मीदवारी फार्म में यह लिखा है कि उनके पास पेनकार्ड नहीं है। 28 प्रतिशत प्रत्याशियों ने यही कहा है कि उनके पास पेनकार्ड नहीं है। अधिकांश नेता अपनी सम्पत्ति को लेकर खूब सजग हैं। वे यह तो बताते हैं कि उनके पास इतनी सम्पत्ति है, लेकिन यह बताने को कतई तैयार नहीं है कि आखिर उनके पास यह सम्पत्ति आई कहां से? आखिर ये राजनीति में इतने अधिक व्यस्त होने के बाद ऐसा क्या कर लेते हैं कि इनकी सम्पत्ति बढ़ती ही रहती है?
जो लोग नौकरी-व्यवसाय नहीं करते, दिन भर राजनीति में ही उलझे रते हैं, उनके पास करोड़ों की सम्पत्ति कहां से आती है, उनकी सम्पत्ति में दिन-राज बढ़ोत्तरी कैसे होती रहती है? इन प्रश्नों का सही उत्तर इस देश में शायद ही किसी को मिल पाए। सूचना का अधिकार कानून तो है, पर वह यहां पर लाचार नजर आता है? प्रत्याशी अपने फार्म में अपनी सम्पत्ति का विवरण देते हैं, उसमें चल-अचल सम्पत्ति दोनों का ब्यौरा देते हैं। इसमें वे अपनी नकद राशि, बैंक डिपाजिट, बांड, म्युच्युअल फंड, पोस्ट ऑफिस सेविंग, लोन, सोन-चांदी आदि की जानकारी देते हैं। कांग्रेस प्रत्याशी नंदन नीलकेणी और उनकी पत्नी की सम्पत्ति 7710 करोड़ है, इसमें उनके इम्फोसिस शेयर का भी समावेश किया गया है। प्रत्याशियों को अपने जीवन साथी की सम्पत्ति को भी बताना होता है। प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे किया है, उनकी चल सम्पत्ति 51.6 लाख रुपए, राहुल गांधी की 8 करोड़ रुपए और अरविंद केजरीवाल की चल सम्पत्ति 1.6 लाख रुपए और अचल सम्पत्ति 92 लाख रुपए है। दूसरी ओर उनकी पत्नी की सम्पत्ति 1.17 करोड़ रुपए है।
सामान्य रूप से यह चर्चा चल रही है कि प्रत्याशी अपने फार्म में जो सम्पत्ति दर्शाते हैं, वह सच्ची नहीं होती। महत्वपूर्ण यह है कि 5 वर्ष में सम्पत्ति 30 से 40 गुना कैसे बढ़ गई? फार्म में यह कॉलम भी होना चाहिए। आय का स्रोत यानी आय कहां से प्राप्त की? इसका भी उल्लेख फार्म में होना चाहिए। 5 वर्ष में सम्पत्ति 30 गुना बढ़ गई, तो यह किसी भी व्यापार में संभव नही है। परंतु हमारे देश के नेताओं से इसे सिद्ध कर दिखाया है। इससे यही स्पष्ट होता है कि राजनीति का धंधा सबसे लाभप्रद और सुरक्षित धंधा है। आश्चर्य इस बात का है कि देश के 80 प्रतिशत लोगों की सम्पत्ति वहीं के वहीं है। कई बार तो यह सम्पत्ति घटी भी है। उसके हाथ में आई राशि, जो वेतन के रूप में प्राप्त होती है, वह तो कुछ ही दिनों में खत्म हो जाती है। इन 80 प्रतिशत लोगों के पास बचत का कोई प्रावधान नहीं है। वे न तो बांड खरीद सकते हैं, न ही म्युच्युअल में धन लगा सकते हैं। भीषण महंगाई के बीच यह वर्ग अपनी सम्पत्ति तो बढ़ा नहीं सकता, पर उसे बचाए रखने में अपनी पूरी कोशिश लगा देता है। किसी की सम्पत्ति 30 से 40 गुना बढ़े, यह तो आम आदमी के लिए या कहें देश की 80 प्रतिशत जनता के लिए एक सपने की तरह ही है। 30 गुना सम्पत्ति तभी बढ़ सकती है, जब किसी बड़े भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जाए। या फिर अचानक ही विरासत में सम्पत्ति मिल जाए। इस तरह की सम्पत्ति सभी के भाग्य में नहीं होती। इसलिए मध्यम वर्ग की सम्पत्ति तो वहीं के वहीं रहती है। यह वर्ग लाख कोशिश कर ले, पर सम्पत्ति है कि बढ़ती ही नहीं, फिर जब यही वर्ग हमारे देश के नताओं को देखता है, तो आश्चर्य में पड़ जाता है कि आखिर राजनीति में ऐसा क्या है, जो सम्पत्ति को बेशुमार बढ़ाने में मदद करता है?
शपथ लेते हुए हर नेता यही कहता है कि वह ईमानदारी पूर्वक अपना कर्तव्य निभाएगा। पर यह शपथ आखिर कहां काफूर हो जाती है, इसे कोई देखने वाला नहीं है। सम्पत्ति में बढ़ोत्तरी अप्रत्याशित हो, तो आश्चर्य होता ही है। पर यह सम्पत्ति बढ़ती कैसे है, यह बताने को कोई तैयार नहीं। आरटीआई कानून भी यहां बेबस दिखाई देता है। क्या देश में ऐसा कभी कोई कानून आएगा, जिससे यह पता चल सके कि अमुक नेता की सम्पत्ति 30 से 40 गुना कैसे बढ़ोत्तरी हो गई? या फिर ऐसा कोई साफ्टवेयर इजाद होगा, जो यह बताने में सक्षम होगा? तब तक हम नेताओं की सम्पत्ति को बढ़ता देख केवल आहें ही भर सकते हैं?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 15 मई 2014

रहस्‍यमय प्रधानमंत्री की विदाई!

डॉ. महेश परिमल
नई सरकार के शपथ लेने का समय गया है। यह तो तय है कि सरकार किसी की भी बने, चाहे भाजपा की या फिर कांग्रेस की। दोनों ही स्थितियों में डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नहीं बनना है।  उन्हें हम स्वतंत्र भारत के सबसे अधिक रहस्यमय प्रधानमंत्री की संज्ञा दे सकते हैं। यह भी सच है कि विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त है। उनके सम्मान में कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी एक समारोह करने वाली हैं।  यह सम्मान उन्हें पूरे दस साल तक खामोश रहने के लिए किया जाएगा।  इस दौरान उन्होंने अपमान के जो घूंट पीये, इसके बाद भी उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया।  आखिर उन्होंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया, यह रहस्य हमेशा बरकरार रहेगा। देश उन्‍हें भले ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री कहे, पर देखा जाए तो वे अभूतपूर्व प्रधानमंत्री थे।‍
डॉ. मनमोहन सिंह के करीबी कहते हैं कि अपने दस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने करीब चार बार इस्तीफा देना चाहा। पर किसी न किसी कारण से वे ऐसा नहीं कर पाए। पिछले ही वर्ष सितम्बर में उनकी केबिनेट द्वारा मंजूर किए गए विधेयक को राहुल गांधी ने सरेआम फाड़ दिया था, उस समय केवल डॉ. मनमोहन सिंह ही नहीं, बल्कि उनके पूरे मंत्रिमंडल का अपमान हुआ था। इस समय उन्होंने इस्तीफा देने का मन बना लिया था। पर किसी विवशता के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। 120 करोड़ की आबादी वाले इस देश का प्रधानमंत्री इतना विवश हो सकता है कि वह अपना निर्णय ही न ले पाए, वह क्या इतना लाचार भी हो सकता है, यह रहस्य अभी तक समझ में नहीं आया है। मनमोहन सिंह कोई राजनीतिज्ञ नहीं हैं, पर ब्यूरोकेट अवश्य थे। इसके बाद भी यूपीए -1 के शासनकाल में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते में उन्होंने अपनी अप्रतिम प्रतिभा का परिचय दिया था। उनकी छबि बेदाग रही। उनका या उनके करीबी रिश्तेदारों का नाम कभी किसी घोटाले में सामने नहीं आया। इस तरह का आक्षेप उनके दुश्मनों ने भी कभी नहीं किया। इसके बाद भी ठीक उनके नाक के नीचे इतने बड़े-बड़े घोटाले हो गए। इससे सरकार की भारी फजीहत भी हुई, इसके बाद भी उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, यह बात उनके सभी साथियों को साल रही है।
उनकी छबि एक कुशल अर्थशास्त्री के रूप में है। सन् 1991 में भारत के आर्थिक सुधारों का जब दौर शुरू हुआ, उनके प्रणोता डॉ. मनमोहन सिंह ही थे। यूपीए -1 के कार्यकाल में तेजी से आर्थिक विकास के लिए डॉ. मनमोहन सिंह की नीतियों को ही जवाबदार माना जाएगा। इसके बाद भी यूपीए-2 में जब आर्थिक घोटाले हुए, उसे मनमोहन ¨सह ने किस तरह से चला लिया?र्थशास्त्र के रूप में उनका अनुभव उस समय क्यों काम में नहीं आया? अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने अपनी आर्थिक नीतियों को अमल में लाने की पूरी कोशिश की, इस कोशिश में कामयाब भी हुए। उनकी इस कोशिश से मध्यम वर्ग खुश भी था। इस वर्ग में डॉ. मनमोहन सिंह की लोकप्रियता भी बढ़ी। कुछ अंश तक इसी लोकप्रियता के कारण यूपीए सरकार 2009 में भी बन गई। परंतु इस सफलता का पूरा श्रेय सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी ले गए। इतना ही नहीं, यूपीए-2 के दौरान मनमोहन सिंह की कई नीतियों को पलट दिया गया। इस समय मनमोहन सिंह अपनी लोकप्रियता को देखते हुए यदि चुनाव लड़ने की आवश्यकता थी। इसके बदले में वे कोयला आवंटन के मामले में फंस गए। इस दौरान में पूरी तरह से मौन ही रहे। उन्होंने ऐसा क्यों किया? डॉ. मनमोहन सिंह के भूतपूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु ने अपने हाल प्रकाशित किताब में यह रहस्योद्घाटन किया है कि प्रधानमंत्री को मीडिया में जरा भी प्रसिद्धि मिलती, तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी बेचैन हो जाते। वे हमेशा प्रसिद्धि से दूर रहने की कोशिश करते। मनमोहन सिंह की राजनीतिक ताकत बढ़ जाए, इसका खयाल सोनिया गांधी से अधिक वे स्वयं रखते। उनके कार्यो से सोनिया गांधी में किसी तरह की असुरक्षा की भावना पैदा हो, ऐसा वे नहीं चाहते थे। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी उन्होंने कभी अपनी राजनैतिक छवि बनाने की कोशिश भी नहीं की। इसलिए वे टिक गए।
डॉ. मनमोहन सिंह दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे, किंतु अपने इस कार्यकाल में उन्होंने बहुत कम साथियों को अपने विश्वास में लिया। प्रणब मुखर्जी से उनके आत्मीय संबंध कभी नहीं रहे। यूपीए-2 के दौरान पी. चिदम्बरम उनके विश्वासपात्र थे, किंतु संयुक्त संसदीय समिति के सामने जब पी. चिदम्बरम ने यह कहा कि ए. राजा ने प्रधानमंत्री के सामने ही 2 जी स्पेक्ट्रम के भाव तय किए थे, तब चिदम्बरम ने भी उनका विश्वास खो दिया था। भारतीय संविधान में नागरिकों को बोलने की आजादी दी है। पर हमारे प्रधानमंत्री से यह आजादी छीन ली गई थी। इसके कारण वे कई बार उपहास के पात्र बने। यहां तक कि अपने मोबाइल को साइलेंट मोड के बदले मनमोहन मोड पर रखने लगे थे। हमारे प्रधानमंत्री भले ही दस वर्ष तक खामोश रहे। पर 17 मई के बाद वे बोलेंगे और खूब बोलेंगे, ऐसा देश के नागरिक मान रहे हैं। वे अपना मौनव्रत तोड़ेंगे, ऐसा विश्वास भी लोगों को है। देश के इतने महत्वपूर्ण पद से निवृत होने के बाद वे अपने संस्मरण लिखेंगे, तो उनकी किताब बेस्टसेलर होगी, इसमें कोई शक नहीं। सवाल यह है कि देश हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को किस तरह से याद रखेगा? एक सुलझे हुए प्रधानमंत्री के रूप में या फिर एक खामोश प्रधानमत्री के रूप में? इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को किस तरह से अनदेखा कर उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित किया जा सकता है, ऐसा केवल हमारे ही देश में हो सकता है। प्रधानमंत्री की अच्छाइयां दफ्न कर दी गई है, उसे बाहर आना ही चाहिए। ताकि लोगों को पता चल सके कि एक प्रधानमंत्री कितना बेबस और लाचार भी हो सकता है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 13 मई 2014

‘नीच’ शब्द ने बदली राजनीति

 डॉ. महेश परिमल
क्रिकेट मैच के दौरान बल्लेबाज बॉलर की कमजोर बाल की प्रतीक्षा करता रहता है, जैसे ही बॉल आई, वह सिक्सर मार देता है। ठीक उसी तरह राजनीति में भी जैसे ही प्रियंका गांधी ने नरेंद्र मोदी के लिए ‘नीच’ शब्द का इस्तेमाल किया, नरेंद्र मोदी ने उसे सिक्सर मारकर उसका राजनीतिक लाभ ले लिया। इसी एक शब्द के कारण पूरी राजनीति में उथल-पुथल मच गई। अमेठी में लोगों ने पहली बार देखा कि राहुल गांधी पोलिंग बूथ पर मतदान देखने पहुंचे। इसके पहले उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। अब तक वे अपनी जीत के आंकड़े ही देखते थे, पर इस बार हालात बदले हुए हैं। बहन प्रियंका उनका प्रचार करते-करते यह भूल गई कि वे राजनीति में नई हैं और नरेंद्र मोदी एक पेशेवर राजनीतिज्ञ हैं। उनका एक शब्द अमेठी के लिए ही नहीं, पूरी कांग्रेस के लिए कितना भारी हो जाएगा, यह तो वक्त ही बताएगा। ऐसा नहीं है कि इस तरह की गलती पहली बार हुई है। सोनिया गांधी ने भी नरेंद्र मोदी को चुनावी सभा में ‘मौत का सौदागर’ कहा था, मात्र एक शब्द ने पूरी राजनीति को ही बदल दिया। नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर लाभ उठाया और वे चुनाव जीत गए।
7 मई को 64 सीटों के लिए मतदान हुआ। यह मतदान इसलिए अधिक चर्चित हुआ, क्योंकि प्रियंका गांधी ने यह कहा दिया कि मोदी ‘नीच’ राजनीति का इस्तेमाल करते हैं। अपने भाई राहुल को जिताने के लिए वह भरसक प्रयास कर रही हैं। पूरा अमेठी ही मथकर रख दिया है, उन्होंने। इस बीच उनके कई बयान आए, जिसका पूरी शिद्दत के साथ नरेंद्र मोदी ने जवाब दिया। इस बीच कई तरह की तस्वीरें भी सामने आई, जिसमें प्रियंका कहीं ईंटों के ढेर पर बैठी हैं, कहीं आम लोगों से भेंट कर रही हैं। इन सबके दौरान वे यह भूल जाती हैं कि वे एक अकुशल राजनीतिज्ञ हैं, उनकी एक-एक बात पर विपक्ष घात लगाए बैठा है। उनका मुकाबला एक पेशेवर राजनीतिज्ञ से है। जो एक शब्द पर राजनीति की दिशा बदलने में माहिर है। इसलिए प्रियंका ने जैसे ही नरेंद्र मोदी के लिए ‘नीच’ शब्द का इस्तेमाल किया, वैसे ही नरेंद्र मोदी ने इस शब्द को पिछड़ी जाति से जोड़कर पूरा वातावरण अपने पक्ष में कर लिया। अब कांग्रेस इस शब्द के कई अर्थ बताने में अपनी शक्ति लगा रही है। इसी एक शब्द ने अमेठी वालों को हैरान कर दिया कि मतदान के दिन राहुल गांधी पोलिंब बूथ में जाकर मतदान करते लोगों को देख रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। इसके पहले तो वे मतदान के दिन कभी अमेठी में ही नहीं रहे। प्रियंका के इस शब्द को पहले नरेंद्र मोदी ने लपका, रही सही कसर स्मृति ईरानी ने पूरी कर दी। उन्होंने इस शब्द का खुलासा करते हुए कहा कि नीच कर्म यानी सैनिकों की विधवा के लिए तैयार किए गए आदर्श फ्लैट, नीच कर्म यानी सैनिकों के कटे हुए सर मिलने के बाद भी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं,  इसे कहते हैं नीच कर्म। चुनावी रैली में प्रियंका ने यह भी कहा कि अमेठी में भले ही सड़क बने या न बने, पर परिवार के संबंध बनें रहें, यह महत्वपूर्ण है। अब यह बात अमेठीवासियों के गले नहीं उतर रही है कि जन सुविधाएं न मिलने से कितनी परेशानी होती है, यह गांधी परिवार नहीं जानता। संबंध बने रहे, तो इसका लाभ आखिर किसको मिलेगा? क्या इसे गांधी परिवार को समझाना होगा। आवश्यक चीजों से वंचित होकर एक गरीब परिवार को आखिर संबंधों को बनाए रखने में आखिर मिलेगा क्या? प्रियंका की इस बात से कोई भी मतदाता सहमत नहीं है। इसके पहले अमेठी के ये हालात थे कि वहां राहुल गांधी खड़े हो गए, तो अन्य कोई दल वहां से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करता था। इस बार भले ही सपा ने राहुल गांधी के खिलाफ अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए हैं, पर आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास पिछले दो महीनों से अमेठी में डेरा डाले हुए हैं। अरविंद केजरीवाल ने भी वहां बड़ा रोड-शो किया। देर से ही सही पर भाजपा की स्मृति ईरानी भी मैदान में उतरकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की है।
चुनाव को सही अर्थो में देखा जाए, तो यह केवल शब्दों की मारामारी की जंग है। जब से अमेठी में चुनाव की बागडोर प्रियंका गांधी ने संभाली है, तब से कांग्रेस का कोई भी नेता वहां नहीं पहुंचा है। प्रियंका ने कई नुक्कड़ सभाओं को संबोधित किया। अपने पिता को शहीद बताते हुए उनके बलिदान के नाम पर जनता से वोट मांगा। कई तरह के विवादास्पद बयान दिए। पर नरेंद्र मोदी ने केवल एक आमसभा का आयोजन कर गांधी परिवार के मंसूबों पर पानी फेर दिया। कांग्रेस की छावनी में उथल-पुथल मचा दी। नरेंद्र मोदी चाहते थे कि गांधी परिवार से कोई एक ऐसा विवादास्पद बयान आए, जिसे वे लपक लें और माहौल अपने पक्ष में कर लें। यह हुआ भी, जब प्रियंका गांधी ने हंसी-हंसी में नरेंद्र मोदी के लिए ‘नीच’ शब्द का प्रयोग किया। मोदी जो चाहते थे, वह हो गया, उन्होंने इस ‘नीच’ शब्द को जाति के साथ जोड़कर पूरा माहौल अपने पक्ष में कर लिया। अब नीच कर्म और नीच जाति को लेकर कांग्रेस में हायतौबा मची है। वह इसका खुलासा करते-करते थक गई, पर मतदाताओं को संतुष्ट नहीं कर पाई। अगली जंग वाराणसी में होगी। वहां 12 मई को मतदान है, इसके पहले बहुत से जहर बुझे तीर छोड़े जाएंगे, कौन सा तीर किस काम आएगा, यह तो वक्त ही बताएगा। पर इतना तो तय है कि प्रियंका, सोनिया, राहुल की जोरदार आम सभाएं होंगी, तो उधर सुषमा स्वराज, लाल कृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह भी चुनावी सभाओं में गरजेंगे। ‘नीच’ शब्द देकर प्रियंका ने नरेंद्र मोदी को राजनीति का एक ऐसा अस्त्र दे दिया है, जिससे मोदी जब चाहे, तब चला सकते हैं। उतावलेपन में प्रियंका के मुंह से यह शब्द निकल गया, ठीक उसी तरह जब सोनिया ने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया। इस एक शब्द के कारण मोदी ने पूरा माहौल अपने पक्ष में कर लिया। कभी-कभी एक शब्द भी किसी दल या नेता के लिए कितना भारी हो सकता है, यह आज की स्थिति से पता चल जाता है। ‘मौत का सौदागर’ शब्द को लेकर जब नरेंद्र मोदी से एक साक्षात्कार में पूछा गया, तो उन्होंने इसे हंसी में टालते हुए कह दिया था कि सोनिया गांधी को हिंदी नहीं आती, उन्हें कहना था ‘मत का सौदागर’, तो उनके मुंह से निकल गया ‘मौत का सौदागर’। इस तरह से एक शब्द ने राजनीति की दिशा बदली, शायद अब दशा भी बदल दे।
शब्दों के इस मायाजाल में कई नेता उलझ चुके हैं। दिग्विजय सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, तोगड़िया, शरद पवार, मुलायम यादव आदि जब बोलते हैं, तो उन्हें यह भान ही नहीं होता है कि वे क्या बोल रहे हैं। इसलिए कभी कोई शब्द इन पर भी भारी हो सकता है, यह इन्हें नहीं भूलना चाहिए। शब्दों की भी ताकत होती है। लाचार और विवश जनता में कई शब्द प्राण फूंक सकते हैं, तो दूसरी तरफ एक सक्रिय कार्यकर्ता को पूरी तरह से निष्क्रिय भी बना सकते हैं। इसलिए समय रहते नेता शब्दों की महत्ता को समझ जाएं, अन्यथा उन्हें भी एक शब्द भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 10 मई 2014

आम आदमी की पहुंच से दूर अल्‍फांसो

डॉ. महेश परिमल
यूरोपीय संघ ने भारत के आमों पर एकतरफा प्रतिबंध लगा दिया है। इससे देश के आम उत्पादकों में काफी निराशा है। देश को करोड़ों का नुकसान हुआ है। पिछले वर्ष हमने 265 करोड़ रुपए के आम विदेश भेजे थे। जो आधे यूरोप में शौक से खाए गए। भारतीय किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा हो गया, सरकार चुनाव में व्यस्त है, इसलिए इस दिशा में कुछ होना संभव नहीं दिखता। आचार संहिता का भी मामला है। सरकार के पास समय नहीं है, वाणिज्य विभाग कुछ करने की स्थिति में नहीं है, फिर भी उसने अपना विरोध दर्ज कर ही दिया है। अब जो कुछ करना है, वह आने वाली सरकार को करना है। आम उत्पादक हताश हैं। इस बार उनकी आशाओं पर तुषारापात हो गया है।
सरकार मान्यता प्राप्त 25 पेकेजिंग हाउस के माध्यम से आमों का निर्यात करती है। यूरोपीय संघ को यह आपत्ति है कि भारत के आमों की पेकेजिंग हाउस की समय-समय पर जांच नहीं हो पाती। कई बार सड़े हुए आम भी भेज दिए जाते हैं। भारत ने यूरोपियन संघ को यह विश्वास दिलाया था कि वह आमों का निर्यात पंजीकृत पेकेजिंग हाउस के माध्यम से ही किया जाएगा। इस संबंध में दोनों पक्षों के बीच विचार-विमर्श चल ही रहा था कि अचानक ही यूरोपियन संघ ने एकतरफा निर्णय ले किया। एक बार फिर भारत की निष्क्रियता सामने आ गई। भारतीय आमों की विदेशों में जोरदार मांग है। पिछले तीन वर्षो के आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2010-11 में 165 करोड़ रुपए की कीमत के 58, 863 टन, 2011-12 में 210 करोड़ रुपए के 63,441 टन और 2012-13 में 264 करोड़ के 55, 413 टन आमों का निर्यात किया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि विदेशों में भारतीय आमों की कितनी मांग है। यह मांग लगातार बढ़ भी रही है।
ब्रिटेन में पाकिस्तानी आमों की अपेक्षा भारतीय आम की मांग अधिक है। अमेरिका में भी गुजरात के वलसाड़ और जूनागढ़ के आम की डिमांड है। भारत से विदेशों में केवल आम ही नहीं, बल्कि विभिन्न तरह के अचारों का भी निर्यात होता है। गुजरात में आम से बनने वाले विविध अचारों की मांग विदेशों में होने के कारण काफी पहले से ही इसकी तैयारी कर ली जाती है। इस समय यूयूरोपीय संघ ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाया है, किंतु भारतीय अचारों पर नहीं। इसलिए आम के व्यापारी अब अचारों पर विशेष ध्यान देने लगे हैं। वैसे देखा जाए, तो देश में खाद्य विभाग की सुस्ती के कारण रसायनों से पकाए जाने वाले आमों और गर्मी में मिलने वाले आम के रस की बिक्री पर किसी तरह का नियंत्रण न होने के कारण सड़े आमों के रस बाजार में खुले आम बिकते हैं। खाद्य विभाग की सक्रियता से कुछ व्यापारियों पर कार्रवाई होती है, पर वह इतनी हल्की होती है कि कोई उससे सबक लेने को तैयार नहीं होता। न तो अधिक जुर्माना लिया जाता है और न ही किसी प्रकार के दंड की व्यवस्था है। इसलिए मिलावटी रस का व्यापार बेखौफ चल रहा है। इसी तरह की लापरवाही के चलते विदेश भेजे जाने वाले आमों में भी आ गई होगी, जहां सड़े आम भेज दिए गए होंगे, जिसकी जानकारी निर्यातकों को नहीं होगी। इसलिए भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रतिबंध के पीछे निर्यातकों की लापरवाही ही है। विभाग सतर्क होता, तो यह नौबत नहीं आती।  भारत से विदेश भेजे जाने वाली आम तो भारतीय बाजारों में दिखाई ही नहीं देते। कई फार्म हाउस ऐसे हैं, जहां विदेश भेजे जाने वाले आमों का उत्पादन होता है। इसके लिए वे साल भर कड़ा परिश्रम करते हैं। देश में अभी जो आम बिक रहे हैं, वे किसी भी तरह से विदेश भेजे जाने लायक नहीं हैं।
देश में आम का सीजन शुरू हो गया है। इस स्थिति में यूरोपियन संघ ने भारतीय आमों पर एकतरफा प्रतिबंध लगाकर सभी को चौंका दिया है। अब सभी देश यह कह रहे हैं कि भारत से आने वाले आमों की विशेष रूप से जांच होगी, तभी कुछ संभव हो पाएगा। इस संबंध में भारत और यूरोपियन संघ के बीच काफी समय से चर्चा चल ही रही थी। परंतु संघ अचानक ही इस प्रकार के प्रतिबंध का निर्णय ले लेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। यूरोपीय देशों में रहने वाले एनआरआई भारत के केसर और हाफूस को पसंद करते हैं। भारत भी यूरोपियन संघ के एक्सपोर्ट क्वालिटी का माल के नियम-कायदों को समझना होगा। आम के सीजन के समय ही इस पर प्रतिबंध लगाने से व्यापारियों को काफी नुकसान ही होगा। इस प्रतिबंध का असर यह होगा कि अब भारतीय भी विदेशों में भेजे जाने वाले आमों को देख और चख सकेंगे। वे आम जो अब तक खास थे, कुछ हद तक आम हो जाएंगे। भले ही इसकी कीमत आम आदमी के बूते के बाहर की हो, पर इतना तो तय है कि अब एक्सपोर्ट क्वालिटी के आमों को भारतीय बाजारों में देखा जा सकता है।
    डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 7 मई 2014

चुनाव आयोग की लाचारी



3 मई को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

जहर उगलते नेता: खामोश चुनाव आयोग
डॉ. महेश परिमल
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश भारत में लोकसभा चुनाव का सातवां चरण समाप्त हो चुका है। इस दौरान हम सबने देखा कि इस बार नेताओं ने अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए काफी जहर उगला है। किसी भी दल को कमतर नहीं आंका जा सकता। आज तक कभी किसी सभा में यह देखने में नहीं आया कि किसी नेता के अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ जहर उगला, तो उसका प्रतिकार किया गया। न तो किसी पर पत्थरबाजी हुई, न ही प्रदर्शन किया गया। नेता भी श्रोताओं का मूड भांपते हुए पहले से ही आरोपों की बौछार करना शुरू कर देते हैं। इस बीच थोड़ा सा जहर उगला, तो लोगों ने तालियों से उसका स्वागत किया। बस यहीं से नेताओं को शह मिल जाती है और वे शुरू हो जाते हैं, पूरी शिद्दत के साथ, जहर उगलते रहते हैं और उन्हें तालियां मिलती रहती हैं। चुनाव आयोग के पास इसकी शिकायत पहुंचती है, उनकी ओर से कार्रवाई का आश्वासन मिलता है। आयोग के पास अधिकार तो कई हैं, पर उसका उपयोग सही समय पर सही व्यक्ति क ेसाथ नहीं हो पाता, इसलिए इस पर अभी तक न तो रोक लगी, न ही किसी नेता पर कार्रवाई हुई। आयोग को हम बिना नाखूनों का शेर कह सकते हैं। यदि आयोग को पूरी तरह से छूट मिले, तो देश के आधे नेता जहर उगलने के आरोप में सीखचों के पीछे चले जाएं। पर हमारे देश में यह संभव नहीं दिखता। चुनाव आयोग को कभी भी शक्तिशाली बनने का अवसर ही नहीं दिया गया।
हमारे देश में जब भी कोई नेता किसी जनसभा को संबोधित करता है, तो ऐसा लगता है, जैसे कोई फिल्मी संवाद बोल रहा है। आपको याद होगा कि धर्मेद्र जब परदे पर आते हैं और दुश्मन को ललकारते हुए कहते हैं कि कमीने, मैं तेरा खून पी जाऊंगा, तो दर्शक ताली बजाते हैं। आज ऐसा ही कुछ राजनीति में भी हो रहा है। आजकल राजनीति में भी बाजारवाद हावी हो गया है। यदि कोई नेता किसी जनसभा को संबोधित करता है और चुनाव आचार संहिता का पालन करते हुए भाषण करता है, तो उसका भाषण इस अधिक शुष्क होता है कि लोग बोर होने लगते हैं। ऐसे नेता का भाषण सुनने आखिर कौन जाएगा? इसलिए नेता भी अपने भाषण में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो लोगों को पसंद आए। जिसे सुनकर लोग तालियां बजाएं। इसके लिए भाषण में तीखे आरोप होने चाहिए, जो जहर बुझे तीर का काम करे। ऐसे आरोप लगाते समय नेता स्वयं को किसी ही मेन से कम नहीं समझते। खुद को पाक-शफ्फाक बताने वाले ये नेता अपने भाषणों को लच्छेदार बनाने के लिए ऐसी भाषा बोलते हैं, जिसमें भले ही अपशब्द न हों, पर वह किसी अपशब्द से कमतर नहीं होते। सामने वाले को चुनौती देते समय पर बुरी तरह से बिफर भी जाते हैं। इस दौरान नेताओं की भाव-भंगिमा इतनी अधिक आक्रामक होती है कि वे इस समय किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं। यदि इस स्थिति को चुनाव आयोग देख ले, तो निश्चित ही उस नेता पर कार्रवाई हो। वेसे भी देखा जाए, तो आचार संहिता का सही रूप से पालन न करने वाले ऐसे नेता बहुत मिल जाएंगे, यदि इन पर कार्रवाई शुरू कर दी जाए, तो देश के आधे नेता सीखचों के भीतर चले जाएं। पर चुनाव आयोग की लाचारी के कारण इन पर ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है, जिससे लोगों को सबक मिले।
चुनाव आयोग की भी विवशताएं हैं। आखिर कितनों के खिलाफ कार्रवाई करे? कितने दलों को चुनाव लड़ने से रोके? सभी खुद को शेर से कम नहीं समझते। दूसरी ओर शेर को सवा शेर भी मिल रहे हैं। इस बार चुनाव कुछ लम्बा हो चला है, इसलिए ये नेता अपना धीरज भी खो रहे हैं। कुछ नेताओं को भी आराम करने का समय मिल रहा है। आराम के क्षणों में वे पुन: स्फूर्ति प्राप्त कर जहर उगलने का काम शुरू देते हैं। इस दौरान दूसरा पक्ष भी ऊर्जा बटोरकर मैदान में आ जाता है। राजनीतिक दलों के बी-ग्रेड के नेता अपने समर्थकों को खुश करने के लिए बेलगाम भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इस दौरान वे यह भी भूल जाते हैं कि ऐसा कर के वे पार्टी का ही नुकसान कर रहे हैं। आखिर इन्हें शह कौन देता है? यह प्रश्न विचारणीय है। देखा जाए तो इन्हें दल के बड़े नेताओं की ही शह मिली होती है। बड़े नेता भी यही चाहते हैं कि इनके मुंह से जहर बुझे तीर ही निकलें। सभी दलों के नेता जब चाहे कुछ भी बोल देते हैं। बाद में पार्टी को डेमेज कंट्रोल करना पड़ता है। दोष केवल बी ग्रेड के नेताओं को देना ठीक नहीं। मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी, शरद पवार ऐसे नेता हैं, ये जब बोलते हैं, तो इन्हें अपना ही होश नहीं रहता। जब से मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार के मामले में कहा है कि युवाओं से गलती हो जाती है, इसके लिए उन्हें फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। इस बयान के लिए उन्हें देशभर की महिलाओं के कोप का भाजन बनना पड़ा। मुलायम जैसे कद्दावर नेता की जीभ फिसल सकती है, तो फिर दूसरे नेताओं का क्या कहना। अब तो ये नेता मंच से ही मतदाताओं को धमका रहे हैं। मुलायम सिंह ने शिक्षकों को स्थायी न करने और अजीत पवार वोट न देने वाले मतदाताओं को पानी न देने की धमकी दी है। चुनाव आयोग ने इस दिशा में सबूत जुगाड़ रही है, पर अजित पवार पर कोई कार्रवाई होगी, इसकी संभावना काफी कम है।
पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की साख है। यहां के चुनाव की सर्वत्र प्रशंसा की जाती है। पर अब नेताओं द्वारा भाषणों में जहर उगलने के कारण देश की छवि को धक्का पहुंचा है। अब तो ये नेता चुनाव आयोग पर भी ऊंगली उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। आजम खां का बयान था कि आखिर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास ही है। इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए ममता बनर्जी यह कहती हैं कि चुनाव आयोग तो कांग्रेस का एजेंट है। चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार अधिकारियों के स्थानांतरण पर पहले वे सहमत नहीं थी। दोनों में टकराव की नौबत आ गई थी, बाद में मामला सुलझ गया। ममता बनर्जी ने इसी दौरान चुनाव आयोग को कांग्रेस का एजेंट करार दिया था। इस तरह से देखा जाए, तो इस समय कोई भी दल ऐसा नहीं है, जो अपनी शालीनता के कारण अलग पहचान कायम करता हो। हर दल में एक न एक नेता आक्रामक है। किसी भी दल को बेदाग नहीं कहा जा सकता। आखिर ऐसा क्यों होता है कि नेताओं की जबान पर अंकुश रखने के लिए किसी एक नेता पर कड़ी कार्रवाई की जाए, जिससे दूसरे उससे सबक लें। वह निर्णय एक नजीर बन जाए। ताकि अगली बार नेता जहर उगलने से बचें। इसके लिए चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र इकाई घोषित कर देना चाहिए। उस अपने अधिकार का भरपूर उपयोग की छूट मिले। ताकि देश में चुनाव को लेकर मचने वाली गहमा-गहमी से बचा जाए, और शांतिपूर्ण मतदान हो। इससे पूरे विश्व में देश की छवि सुधरेगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 2 मई 2014

बेमानी है मजदूरों की बात करना

डॉ. महेश परिमल
पूरे विश्व में आज जिस तरह से बाजारवाद हावी है, उससे यही लगता है कि इस दुनिया में मजदूरों का कुछ काम ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि आज देश मजदूरों से पूरी तरह से खत्म हो गया है। पर सच है कि मजदूर आज एक श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि वह एक दूसरे ही रूप में हमारे सामने है। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जिसको मई दिवस के नाम से जाना जाता है, इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय शुरू हुई थी, जब मजदूर मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और बाद में पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों की मौत हो गई, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। इसके बाद 1889 में पेरिस में अंतरराष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में जब फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसको अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, उसी वक्त से दुनिया के 80 देशों में मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा।
भारत में 1923 से इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में समाजवाद की आवाज कम ही सुनाई देती है। ऐसे हालात में मई दिवस की हालत क्या होगी, यह सवाल प्रासंगिक हो गया है। हम ऐतिहासिक दृष्टि से ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के नारे को देखें तो उस वक्त भी दुनिया के लोग दो खेमों में बंटे हुए थे। अमीर और गरीब देशों के बीच फर्क था। सारे देशों में कुशल और अकुशल श्रमिक एक साथ ट्रेड यूनियन में भागीदार नहीं थे। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सारे श्रमिक संगठन और इसके नेता अपने देश के झंडे के नीचे आ गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब सोवियत संघ संकट में था तब वहां यह नारा दिया गया कि मजदूर और समाजवाद अपनी-अपनी पैतृक भूमि को बचाएं। इसके बाद हम देखते हैं कि पश्चिमी देशों में कल्याणकारी राज्य आया और मई दिवस का पुनर्जागरण हुआ।
अब दुनिया बदल चुकी है। सोवियत संघ के टूटने के साथ ही पूंजीवाद का विकल्प दुनिया में खो गया। औद्योगिक उत्पादन का तरीका बदल गया। औद्योगिक उत्पादन तंत्र का विस्तार पूरी दुनिया में हो गया। एक साथ काम करना और एक जगह करना महज एक सपना रह गया। आजकल किताबें लिखी जा रही है काम का खात्मा। दुनिया में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया है कि जो काम पहले 100 मजदूर मिलकर करते थे। वह काम अब एक रोबोट कर लेता है। उदाहरण के लिए टाटा की नैनो फैक्टरी में 4 करोड़ रु. के निवेश पर एक नौकरी निकलती है। यह काम भी मजदूर के लिए नहीं बल्कि तकनीकी रूप से उच्च शिक्षित लोगों के लिए है। सिंगूर या नंदीग्राम में प्रदर्शन क्यों होता है? क्योंकि स्थानीय लोगों यह पता है कि हमारे लिए या हमारे बच्चों के लिए कुछ नहीं है। तकनीक ने लोगों की आवश्यकता को कम कर दिया। इससे साधारण लोगों की जमीन खिसक गई है। लोग बेरोजगार हैं, जिनके पास रोजगार है उसको यह डर सता रहा है कि कल यह कहीं छीन न जाए। आईएमएफ और विश्व बैंक की नीतियों का हजारों नौजवान सड़क पर विरोध करते हैं लेकिन इस बुनियादी सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।
मजदूर हाशिए पर हैं। अब उनकी कोई बात नहीं करता। मजदूर कभी वोट बैंक नहीं माना गया, तो बदलते दौर में मजदूरों की जरूरत भी बदल गई। मजदूर किसे कहते हैं और मेहनतकश, यह भी अब लोगों को जानने की जरूरत नहीं रह गई है। इस बार जब मई दिवस मनाया जा रहा है, तब हिन्दुस्तान तख्तो-ताज का फैसला करने के लिए आमचुनाव के मुहाने पर खड़ा है। कभी इसी हिन्दुस्तान में मजदूरों के लिए, मेहनतकश लोगों के लिए राजनीतिक दल सडक़ पर उतर आते थे। आज किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में मेहनतकश के लिए कोई जगह नहीं है। उनके पास मुद्दे हैं तो धर्म और महंगाई की, वे चुनाव में वायदे करते हैं बेहतर जिंदगी की लेकिन बेहतर कौन बनाएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। हालांकि देश की आजादी के साथ ही मेहनतकश लोगों की उन्नति का जिम्मा कम्युनिस्टों के कंधे पर रहा है। आज जिस संख्या में राजनीतिक दल मैदान में हैं, तब वैसा नहीं था। कांग्रेस पर पूंजीवादी को प्रश्रय देने का कथित रूप से ठप्पा लगा था तो जनसंघ की पहचान अपने हिन्दूवादी सेाच को लेकर थी। तब माकपा हो या भाकपा या इनकी सोच से मेल खाते दल ही बार बार और लगातार मेहनतकश केपक्ष में खड़े होते दिखाई दिए हैं।
इस चुनाव में केवल औपचारिक रूप से माकपा हो या भाकपा का हस्तक्षेप है क्योंकि इस बार के चुनाव में मुद्दे नहीं, मौका भुनाने की होड़ है। जिस तरह प्रचार पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, वह कम से कम माकपा या भाकपा के बूते की बात तो है ही नहीं। जिस तरह से प्रचार का तरीका अपनाया गया है, वह भी माकपा या भाकपा के बूते में नहीं है। कभी इस देश में पूंजीवाद के खिलाफ सर्वहारा वर्ग के बीच संघर्ष था लेकिन अब पूंजीवाद के खिलाफ पूंजीवाद के बीच संघर्ष है। तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसी, की भी बात नहीं हो रही है, बल्कि बात हो रही है कि तेरे पास सौ करोड़ तो मेरे पास 99 करोड़ क्यों? जब पूंजीवाद के खिलाफ पूंजीवाद मैदान में होगा तो सर्वहारा वर्ग का क्या काम? उसके लिए तो महात्मा गांधी के नाम पर रोजगार की गारंटी दी जा रही है। साल में सौ दिन काम करेगा और इस सौ दिन की कमाई से पूरे 365 दिन अपने परिवार को पेट भरेगा। यह सर्वहारा वर्ग की नियति है, लेकिन पूंजीपति हर मिनट में लाखों कमाएगा और उसके कमाने के लिए 365 दिन भी कम पड़ जाएंगे।
आज की पीढ़ी को यह पता भी नहीं होगा कि आखिर मजदूर दिवस होता क्या है। वह तो आयातीत डे मनाने में विश्वास रखती है। जिसमें ऐसे अनेक डे हैं, जो कल की पीढ़ी को नागवार अवश्य गुजरेंगे। सर्वहारा शब्द भी अब शब्दकोश से दूर होता जा रहा है। रुस क्रांति को कोई याद ही नहीं करना चाहता। दिन भर कड़ी मेहनत कर शाम को डेढ़-दो सौ रुपए लेकर घर आने वाला इंसान अपने परिवार को क्या खिलाए, यह सोच अब खत्म होने लगी है। गरीब और गरीब, लेकिन अमीर और अमीर होता जा रहा है। एक लम्बी खाई बन गई है, मजदूरों और मालिकों के बीच। इस पर सेतू बनाने का काम अब बंद हो गया है। अब न तो मजदूर संगठनों की बात सुनी जाती है, न ही मजदूरों की हड़ताल होती है। कारखाने चल रहे हैें, उनकी चिमनियों से धुआं निकल रहा है, पर कोई नहीं कहता कि दुनिया के मजदूरों एक हो, इंकलाब जिंदाबाद।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

गिर के शेरों पर संकट


लोकमत के 27 अप्रैल 2014 के अंक में प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बयानों से बाहर आती कटुता


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

कांग्रेस के लिए किरकिरी बनी किताबें



आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख


लाचार प्रधानमंत्री पर दो किताबें
डॉ. महेश परिमल
पीएम के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द ऐक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ़ मनमोहन सिंह’  से उपजे सवालों का जवाब कांग्रेस अभी खोज ही नहीं पाई है कि पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख की किताब ‘क्रूसेडर्स ऑर कॉन्सपिरेटर्स-कोलगेट ऐंड अदर ट्रूथ ’ सामने आ गई है। इस किताब में यूपीए 2 के दौरान प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। इन दोनों किताबों के बाद कांग्रेस का आरोप है कि इसके पीछे नरेंद्र मोदी हैं। पारख ने अपनी किताब में लिखा है कि 17 अगस्त 2005 को मैं प्रधानमंत्री से मिलने गया। मंि उन्हें बताना चाहता था कि किस तरह से सांसद अधिकारियों का अपमान कर रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी वेदना सामने रखते हुए कहा कि मैं भी इसी समस्या से जूझ रहा हूं। लेकिन ये राष्ट्रहित में सही नहीं होगा कि ऐसे हर मुद्दे पर मैं त्यागपत्र देने की बात करूं। किताब के मुताबिक पार्लियामेंट स्टैंडिंग कमेटी की एक मीटिंग में बीजेपी सांसद धमेर्ंद्र प्रधान ने पारख का अपमान किया जिसके बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था। इसी के बाद वो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने गए थे। यही नहीं पारख ने मनमोहन सिंह और उनके मंत्रियों के बीच के संबंधों के बारे में भी किताब में खुलासा किया है। पारख ने लिखा है कि मैं नहीं जानता कि अपने ही मंत्रियों की तरफ से लगातार अपमान मिलने या फिर फैसलों के बदले जाने के बाद अगर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देते तो देश को उनसे बेहतर प्रधानमंत्री मिल पाता या नहीं। यह सभी जानते हैं कि यूपीए में सत्ता का एकमात्र केंद्र सोनिया गांधी ही थीं। संजय बारू यह मानते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह ने एक तरह से सोनिया गांधी के आगे घुटने टेक दिए थे।
राजनीति के हमेशा दो केंद्र होते हैं। एक केंद्र  परदे के सामने होता है, जो प्रचार माध्यमों से हमें देश की उपलब्धियों की जानकारी देता रहता है। दूसरा केंद्र परदे के पीछे होता है, जिसमें होने वाली घटनाओं की जानकारी हमें कभी नहीं मिल पाती। किस घटना के पीछे आखिर क्या रहस्य था, यह तभी पता चलता है, जब इस पूरी टीम के किसी सदस्य की आत्मा जाग जाती है, अथवा विरोधी उसे अपने वश में कर लेते हैं। इसके बाद उसके द्वारा दी गई जानकारी हमेशा चौंकाने वाली होती है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव एम.ओ. मथाई ने अपने संस्मरणों में जो कुछ लिखा, उसमें कई चौंकाने वाली जानकारी मिली। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारु ने अत्यंत विवादास्पद किताब लिखी है। इसमें प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के बीच सत्ता के समीकरणों और अंदर की बातें सामने लाने की कोशिश की गई है। अस किताब से यह साफ पता चलता है कि यूपीए में एक ही पॉवर सेंटर था और वह थी सोनिया गांधी। जिस तरह से कुरुक्षेत्र के युद्ध में नेत्रहीन घृतराष्ट्र ने संजय की दृष्टि से युद्ध का आंखो देखा हाल सुना था, ठीक उसी तरह संयज बारू ने प्रधानमंत्री कार्यालय में चल रही सत्ता का अंतद्र्वंद्व की छोटी से छोटी जानकारी दी है। बारु के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जो भी नीति विषयक निर्णय लिए जाते थे, वे सभी सोनिया गांधी से पूछकर ही लिए जाते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय में मुख्य सचिव के रूप में अपनी भूमिका निभाने वाले पुलक चटर्जी सोनिया गांधी के वफादार थे। वे सोनिया गांधी के साथ रोज मीटिंग करते और सरकार के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों पर सोनिया गांधी से चर्चा करते। उसके बाद उनसे आदेश लेते। सोनिया के आदेश ही प्रधानमंत्री कार्यालय से उनके आदेश के रूप में बाहर आते। इस मामले में कहा तो यहां तक जा रहा है कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह के पास जो अत्यंत गोपनीय दस्तावेज और फाइलें आतीं थीं, उसे भी पुलक चटर्जी सोनिया गांधी को दिखाकर उनके सुझाव लेते थे। इस तरह से प्रधानमंत्री ने अपनी शपथ को भंग किया है, जो उन्होंने पद संभालने के पहले ली थी। संजय बारु की किताब बाहर आने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने उसे निराधार बताया है और कहा है कि यह एक कल्पना मात्र है। बारु का कहना है कि पिछले दस वर्षो से चल रहे इस सिस्टम के तहत कोई भी आदेश प्रधानमंत्री का नहीं है, बल्कि वह उनकी आड़ में सोनिया गांधी का ही है।
बारु अपनी किताब में लिखते हैं कि सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 209 सीटें प्राप्त की। इस कारण डॉ. मनमोहन सिंह को यह लगा कि अब उनकी ताकत बढ़ गई है, पर सोनिया गांधी ने उन्हें उनकी औकात दिखा दी। सन् 2009 में जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ, तब प्रधानमंत्री ए. राजा को शामिल नहीं करना चाहते थे। पर श्रीमती गांधी के दबाव में उन्हें ए. राजा को मंत्रिमंडल में लेना पड़ा। इसके अलावा डॉ. सिंह पी. चिदम्बरम के स्थान पर अपने आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे, पर श्रीमती गांधी के आदेश से प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्री बनाया गया। इसके बाद मनमोहन सिंह पर अंकुश रखने के लिए प्रणब मुखर्जी को देश का राष्ट्रपति बना दिया गया। अपने निर्णयों की फजीहत देखकर प्रधानमंत्री को अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ा। यूपीए शासन में एक ऐसा सिस्टम बन गया था कि सरकार की जो भी उपलब्धि हो, उसका श्रेय श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी के जाए, और जितनी भी विफलताएं हो, वे सब प्रधानमंत्री के खाते में जाएं।
15 अगस्त सन् 2007 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्पायमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा)की घोषणा की, इससे राहुल गांधी को लगा कि इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री को चला जाएगा, तो उसने तुरंत ही प्रधानमंत्री से मुलाकात की। उसने प्रधानमंत्री को स्रूचित किया कि मनरेगा का विस्तार देश के 500 जिलों में किया जाना चाहिए। यह जानकारी भी वे लाल किले से कर चुके थे। इससे राहुल गांधी के सलाहकारों द्वारा एक परिपत्र जारी किया गया, जिसमें मनरेगा का पूरा श्रेय राहुल गांधी को देने की जानकारी थी। यह परिपत्र लेकर सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल संजय बारु के पास पहुंचे और कहने लगे कि आप ये परिपत्र प्रधानमंत्री कार्यालय के नाम से जारी करो। संजय बारु ने ऐसा करने से इंकार कर दिया, इसलिए दूसरे ही दिन यह परिपत्र कांग्रेस पार्टी द्वारा जारी कर दिया गया। यह परिपत्र एक आवश्यक खबर के रूप में अखबारों में प्रकाशित भी हो गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार के मामले में अपने हाथ साफ रखते थे। पर अपने साथियों के भ्रष्टाचार को अनदेखा करते। संजय बारु अपनी किताब में लिखते हैं कि मनमोहन सिंह को अखबारों में यदि सोनिया से अधिक प्रचार मिलता, तो वे बैचेन हो जाते, पर सोनिया की लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ेता, तो उन्हें राहत मिलती। मनमोहन सिंह बार-बार अपमान का घूंट पीकर प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपके रहे, इससे देश रसातल में चला गया। प्रधानमंत्री के पहले कार्यकाल में ही हालत इतनी खराब थी, तो उन्हें उसी समय अपने पद से इस्तीफा दे देना था, इससे 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला न होता और न ही दूसरे घोटाले। इससे कांग्रेस की फजीहत न होती और देश रसातल में जाने से बच जाता। पर कुर्सी का मोह के कारण उन्हें अपनी आंखों से बहुत कुछ गलत होते देखना पड़ा। इसे हम उनकी लाचारगी ही कह सकते हैं। पर देश को इतना लाचार और बेबस प्रधानमंत्री की आवश्यकता नहीं है।
आज जब संजय बारु और पीसी पारेख ने अपनी किताब के माध्यम से प्रधानमंत्री की लाचारगी और बेबसी को सामने लाया गया है, कांग्रेसी यह कह रहे हैं कि किताबें में जो कुछ लिखा गया है, वह झूठ है। तब फिर सच क्या है, यह भी उन्हें बताना चाहिए। वैसे देखा जाए, तो यह किताबें न भी आतीं, तो भी यह पता चल ही जाता कि केंद्र सरकार की सत्ता की चाबी सोनिया गांधी के पास थी। क्योंकि जो कुछ हो रहा था, वह प्रधानमंत्री का मौन ही बता रहा था। सरकार की विफलताओं का सारा श्रेय प्रधानमंत्री को मिला और उपलब्धियों का पूरा श्रेय राहुल और सोनिया गांधी के खाते में गया। यह पूरा काम एक व्यवस्था के तहत हुआ। देश का बच्च बच्च जानता है कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका एक रबर स्टंप की तरह ही थी। इसलिए पिछले एक महीने से प्रधानमंत्री का कोई बयान भी सामने नहीं आया। क्या ऐसा हो सकता है कि देश में भावी सरकार के लिए मतदान हो रहे हों और देश का प्रधानमंत्री एकदम खामोश रहे?
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

वादे करने में शूरवीर, अमल में शून्य

डॉ. महेश परिमल
देश में 16 वीं लोकसभा चुनाव के लिए तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। दिल्ली की 7 सीटों का भी इसमें समावेश होता है। किंतु  चारों तरफ केवल चुनावी घोषणा पत्रों की ही चर्चा है। सभी दल अपने घोषणा पत्रों में ढेर सारे वादे करते हैं, पर उस पर अमल में लाने की फुरसत किसी को भी नहीं होती। वचन देने में हमारे नेता सबसे आगे हैं, किंतु उसे पूरा करने में सबसे पीछे। वचन देने में कोई दल किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। पर अमल की जब भी बात आती है, तो सारे दल एक-दूसरे का मुंह ही ताकते रहते हैं। सभी दलों ने अपने घोषणा पत्र में आर्थिक तंत्र, विदेश नीति, स्वास्थ्य, महिला उद्धार, शिक्षा गवर्नेंस जैसे मुद्दों को शामिल किया है। चर्चा यह भी है कि क्या सारे दल अपने घोषणा पत्र के अनुसार व्यवहार करेंगे? क्या यह लोगों को भरमाने का एक उपक्रम मात्र है? इस समय मतदाताओं की इन दलों से अपेक्षा बढ़ीं हैं, इसलिए राजनीतिक दलों के वचनों की संख्या भी बढ़ गई है। किंतु इतने सारे वचनों को पूरा करने में क्या ये दल सक्षम हैं? इन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। आजकल घोषणा पत्र महज एक औपचारिकता रह गई है। पहली बार ऐसा हुआ है कि मतदान शुरू होने के दिन किसी दल ने अपना घोषणा पत्र जारी किया हो। घोषणा पत्र में किए गए वादों से जनता त्रस्त हो चुकी है। अब सभी समझने लगे हैं कि चुनावी घोषणा पत्र भी केवल चुनावी वादों की तरह ही हैं। विभिन्न दल मतदान के पहले ये वादे करते हैं कि वे पूरे देश में आमूल-चूल परिवर्तन ला देंगे। इस तरह के वादे कर वे हथेली पर चांद उगाने की कोशिश करते हैं। अब जनता इस तरह के वादों से परेशान हो गई है। उनका मानना है कि वादों की सूची बड़ी न होकर छोटी करो, पर उन्हें पूरा करने में जी-जान लगा दो।
घोषणा पत्र जारी करना आसान है, पर उस पर अमल लाने के बजाए नागरिकों के सामने अपनी डींगें बताई जाती हैं। आíथक तंत्र की बात की जाए, तो पिछले दशकों में सबसे कम आíथक विकास दर 4.5 प्रतिशत है। मेन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में सराहनीय प्रयासों की कमी देखी गई है। बजट घाटा निराशाजनक है। कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में कह रही है कि 2015-16 में हम बजट घाटा कम करेंगे। उत्पादन क्षेत्र को मजबूत कर विभिन्न राहतें देंगे। अटकी हुई परियोजनाओं को शुरू करेंगे। इस पर भाजपा कहती है कि सीनियर सिटीजन को कर राहत दी जाएगी। उन्हें अधिक ब्याजदर दी जाएगी। इसी तरह अन्य दल भी आथिर्क तंत्र को मजबूत बनाने का दावा कर रहे हैं। विदेश नीति की बात की जाए, तो परमाणु ऊर्जा समझौता और देवयानी खोब्रागड़े के मामले में अमेरिका से संबंध थोड़े बिगड़े थे। पाकिस्तान के साथ भी संबंध अच्छे नहीं है। एफडीआई के मामले में भी विदेश नीति के खिलाफ सवाल खड़े हुए थे। कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में कहती है कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के प्रयास किए जाएंगे। इसी तरह श्रीलंका के तमिलों के पुनर्वास के लिए प्रयास करेंगे। भाजपा ने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की दिशा में मजबूत कदम उठाने पर बल दिया है। वामपंथी दलों ने भी कहा है कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने का पूरा प्रयास किया जाएगा। कई राजनीतिक दलों ने विदेशी नीति को छेड़ा नहीं है। अधिकांश ने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने की बात की है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। विश्व में पोषणयुक्त आहार से पीड़ित एक तिहाई लोग भारत में हैं। स्वास्थ्य को लेकर जीडीपी की 12 प्रतिशत राशि खर्च होती है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि अब जीडीपी की तीन प्रतिशत राशि स्वास्थ्य पर खर्च होंगे। 2020 तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में 60 लाख रोजगार के नए आयाम खोले जाएंगे। भाजपा के अनुसार वह नेशनल हेल्थ इंश्योरेंसमिशन लाएगी। इससे नई स्वास्थ्य नीतियां आएंगी। वामपंथी दल सीपीआई(एम)स्वास्थ्य पर 5 प्रतिशत खर्च करना चाहती है। स्वस्थ प्रशासन देने में मनमोहन सरकार पूरी तरह से निष्फल साबित हुई है। 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन, कोल ब्लॉक और कॉमनवेल्थ गेम आदि में बड़े घपले सामने आए हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में लिखा है कि तय समयसीमा में सरकारी कार्यालयों में काम हो, इसके लिए ग्रीवान्सिस बिल-2011 लाया जाएगा। भाजपा ने लिखा है कि लोकपाल का असरकारक रूप से उपयोग किया जाएगा। नेशनल ई गवर्नस प्लान भी तैयार किया जाएगा। सीपीआई(एम) कहती है कि वह लोकपाल एक्ट और व्हीसल ब्लोअर एक्ट की समीक्षा करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा शिक्षा का है। हाल में सरकार जीडीपी की 3 प्रतिशत राशि शिक्षा पर खर्च कर रही है। पढ़ाई बीच में छोड़ने वालों का प्रतिशत बहुत ही अधिक है। कांग्रेस इस मुद्दे पर कहती है कि पढ़ाई बीच में छोड़ने वालों की संख्या कम करने की कोशिश करेगी। भाजपा कहती है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत पढ़ाई का भारमुक्त बनाया जाएगा। इसके अलावा युवाओं को ऐसी शिक्षा दी जाएगी, जिससे पढ़ाई के साथ-साथ उनकी आवक भी हो। सीपीआई (एम) कहती हैकि वह जीडीपी की 5 प्रतिशत राशि शिक्षा पर व्यय करेगी। डीएमके भी शिक्षा पर 7 प्रतिशत राशि खर्च करना चाहती है। इस तरह से तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तरफ से वादे किए हैं। पर इन्हें बाद में अपने ये वादे याद ही रहते। इसका पूरा दोष वे सहयोगी दलों पर डाल देते हैं। अब प्रजा समझ गई है कि हमारे नेता वादे करने में शूरवीर हैं, पर उसे अमल में लाने के नाम पर बिलकुल शून्य। वादे पूरे करना उन्हें आता ही नहीं है। इसलिए अब इनके वादों पर न जाकर उनके काम को देखा जाए। यदि कोई दल अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े दलों से जा मिलता है, तो ऐसे क्षेत्रीय दलों के प्रत्याशियों को पहली नजर में ही नकार दिया जाना चाहिए। अजित सिंह जैसे लोग सत्तारूढ़ दल के ही साथ रहे हैं। इनकी अपनी कोई पहचान नहीं है। इसलिए ऐसे दलों पर कभी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। वास्तव में क्षेत्रीय दल ही मुख्य दल को गलत रास्ते पर ले जाने के लिए तैयार रहते हैं। कई बार मुख्य दलों की परेशानी सामने आई हैं। इसे हमारे प्रधानमंत्री ने टीवी पर सबके सामने स्वीकार भी किया है। इसलिए जनता को सचेत होकर ऐसे दलों को वोट देना चाहिए, जो अपने वादे पूरा करना जानते हों।
डॉ. महेश परिमल

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