बुधवार, 14 मई 2008

जिनके लिए विवाह अर्थहीन परंपरा है


डॉ. महेश परिमल
महानगरों में आजकल जीवन मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। मान्यताएँ और परम्पराएँ आज केवल दिखावा बनकर रह गई हैं। उन्हें आज समाज से पिछड़ा माना जाने लगा है, जो इन मान्यताओं और परम्पराओं को गलत मानते हैं।आज युवा पीढ़ी कुछ भी समझने को तैयार नहीं है। उसे तो आज मानो खुला आकाष मिल गया है, जहाँ वे अपनी चाहतों के पंखों को पूरी मस्ती के साथ फैलाकर उड़ रहे हैं। अब तो षादी जैसे पवित्र परंपरा भी उन्हें एक बोझ लगने लगी है, इसलिए महानगरों में आज सेक्स माइनस फ्रेंडषिप, लव एंड मेरिज का प्रचलन षुरू हो गया है। इसके तहत आज युवक-युवतियाँ बिना षादी के पति-पत्नी की तरह साथ-साथ रहने और लम्बे समय तक साथ देने वाले पार्टनरों की तलाष करने लगे हैं।
मुम्बई जैसे महानगर में नौकरी करने वाली कैरियर वुमन आजकल आल्फा वुमन के नाम से पहचानी जाती है। ये आल्फा वुमन अब सभी मामलों पर आत्मसंतुश्ट हैं। उनके पास कॉलेज की डिग्री है, खुद की अपनी कार है, अच्छी नौकरी है, बढ़िया बैंक बेलैंस है, अपना फ्लैट है, जब चाहे विदेष दौर पर जा सकती है, अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण निर्णय वह स्वयं लेने में सक्षम है। इतना कुछ होने के बाद भी वह न तो षादी के झंझट में पड़ना चाहती है, न ही किसी से प्यार करना चाहती है, न किसी की बहू बनना चाहती है और न ही बच्चों की माँ बनना चाहती है। अब यह स्वछंद रहना चाहती हैं, इसलिए वह पार्टी में जाकर खूब षराब पीती है, स्मोकिंग करती हैं, वह जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है। इसलिए आजकल महानगरों में इस तरह की आल्फा वुमन की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह महिलाएँ जब इतनी सक्षम हैं, तो निष्चित रूप से किसी न किसी मामले में वह पुरुशों पर निर्भर होती होंगी, विषेश रूप से अपनी षारीरिक आवष्कताओें की पूर्ति के लिए, तो इसके लिए उसने एक अलग ही तरीका अपना रखा है, वह है मात्र कुछ समय के लिए ही अपने षरीर के लिए किसी पुरुश की तलाष। इस तरह से आजकल ऐसी महिलाओं के लिए ऐसे पुरुशों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस तरह के पुरुश पार्टियों, क्लबों, पार्कों, टॉकीजों के आसपास आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। आवष्यकता है पहचानने की। ये आल्फा वुमन किसी से भी भावनात्मक रूप से मिलना नहीं चाहती। इसका वह विषेश रूप से खयाल रखती हैं।
आज मेट्रोपोलिटन षहरों में बिना विवाह के साथ-साथ रहने वाले युगलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दबे रूप में इन्हें सामाजिक स्वीकृति भी मिल रही है। ये अपना आदर्ष जॉन अब्राहम और विपाषा बसु को मानते हैं। अब तो उनसे कोई पूछता भी नहीं कि आप दोनों षादी कब कर रहे हैं। इन दोनों का साथ-साथ रहना अब किसी को आष्चर्य में नहीं डालता। भविश्य में इनके बीच तलाक भी हो जाए, तो किसी को आष्चर्य नहीं होगा। वैसे भी इनके बीच हमेषा किसी तीसरे की कहानी सामने आती ही रहती है। इसलिए आल्फा वुमन इस तरह का कोई मौका समाज को देना नहीं चाहती।

मुम्बई की हेल्थ क्लबों में जब ये आल्फा वुमन मिलती हैं, तो इनमें क्या बातचीत होती है, यह जानना एक चुनौतीभरा काम है, पर इनकी बातें एकदम बिंदास होती हैं। एक महिला दूसरी महिला से कह रही थी-मेरे बॉयफ्रेंड के साथ मेरी सेक्स लाइफ एकदम डल हो गई है, क्योंकि बॉयफ्रेंड मुझसे बार-बार षादी करने के लिए कह रहा है। इस कारण हममें अक्सर विवाद होता रहता है और अब तो मजा भी नहीं आता। इसके जवाब में दूसरी महिला कहती है- मैंने तो अपने एक बीएफ (बॉयफ्रेंड) को छोड़ दिया है, अब दूसरे की तलाष लिया है। इस तरह से ये आल्फा वुमन अपना पार्टनर तलाष लेती हैं और जब जरूरत पड़े, उसे बूला लेती है, फिर उससे कोई वास्ता नहीं रखती। दिल्ली की एक आल्फा वुमन षालिनी तो स्पश्ट तौर पर कहती है- मुझे सागर के साथ रहना अच्छा तो लगता है, पर उसके साथ किसी प्रकार का भावनात्मक संबंध रखना नहीं चाहती।जब हम बहुत करीब होते हैं, तब वह प्रेम, संबंध, जवाबदारी आदि की बातें करता है, जो मुझे बिलकुल नहीं भाती।दूसरी ओर यह भी सच है कि उसके बिना मुझे चैन नहीं आता।लेकिन अब हमने तय कर लिया है कि अब हमारे बीच केवल सेक्स का ही संबंध रहेगा, बाकी सारे संबंधों को तिलांजलि दे दी जाए। इस दौरान हमें कोई दूसरा साथी मिल जाता है, तो हम बड़ी सादगी से अलग हो जाएँगे। आज महानगरों में षालिनी और सागर जैसे युगलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ये मानते हैं कि प्रेम और सेक्स दो अलग-अलग चीज वस्तुएँ हैं, इन दोनों को मिलाने की आवष्यकता ही नहीं है।
इनके बारे एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इन आल्फा वुमन के पास ऐसे व्यक्तियों की सूची होती है, जो इस काम को किसी पेषेवर की तरह नहीं देखते, बल्कि इसे उपभोग और उपभोक्ता की दृश्टि से देखते हैं।ये जब भी किसी को आवष्यकता के अनुसार अपनी संतुश्टि के लिए प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के कॉल को ''बूटी कॉल'' कहा जाता है। इसमें यही षर्त होती है कि जब फोन करें, तो उन्हें वह तुरंत मिल जाए, उस वक्त वह किसी और के साथ इंवाल्व नहीं होना चाहिए। इस प्रकार के संबंध कॉल गर्ल से संबंध से अलग ही प्रकार का है। इसमें धन का किसी तरह से लेना-देना नहीं होता। इसके साथ ही इस संबंध का अंत प्रेम या षादी तो किसी भी रूप में है ही नहीं। इससे खतरा कुछ और कम हो जाता है। किसी तरह के इनवेस्टमेंट भी नहीं करना पड़ता और मेनेटेंस भी बहुत कम आता है। इसीलिए इस तरह के संबंध आजकल तेजी से फल-फूल रहे हैं।
एक समय ऐसा था, जब भारतीय नारी की छवि ही कुछ अलग थी।वह जिससे प्रेम करती, उसी के साथ षादी करती और उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती। आजकल कॉलेज में जाने वाली युवतियाँ यही कहती हैं कि हम कॉलेज तो केवल मौज-मस्ती के लिए ही जाते हैं, वहाँ यदि हम किसी युवक से मिलते हैं, इसका आषय यह तो कदापि नहीं है कि हम उससे प्यार करते हैं और षादी भी करेंगे। षादी तो हम वहीं करेंगे, जहाँ हमारे पालक चाहेंगे, कॉलेज में युवक का साथ तो ''जस्ट फार इन'' जैसा होता है।आज आल्फा वुमन भी कुछ इस तरह का व्यवहार करती है। उसे अच्छी तरह से मालूम है कि बोर्डरूम और बेडरूम में किस चीज की आवष्यकता है और उसे किस तरह से प्राप्त किया जा सकता है। पहले तो कोई महिला अपने मन की मीत के साथ जुड़ जाती थी, तब यदि पुरुश उसे छोड़ दे, तब उसे जोरदार आघात लगता था। आज कई पुरुश इसी तरह के आघात से गुजर रहे हैं। हाल ही में हुए मॉडल मून दास और उड़ीसा के युवक अविनाष पटनायक के किस्से में भी कुछ इसी तरह की बात थी। उन दोनों में गहरे संबंध थे, अविनाष अपनी मित्र मंडली में अपनी गर्ल फ्रेंड के रूप में प्रस्तुत करता। उसके बाद तो वह उसके निजी जीवन में भी दखल डालने लगा।बाद में उसे पता चला कि वह अकेला ही मून का बॉयफ्रेंड नहीं है, उसके संबंध अन्य कई लोगों से हैं, इससे उनके रिष्ते में दरार आ गई।इस संबंध का अंत बहुत ही दुखद हुआ। अविनाष ने आवेष में आकर मून की माँ और उसके मामा को मारकर आत्महत्या कर ली।
अब तो यह कहा जा सकता है कि संबंध कैसे भी हों, उसे कहाँ तक निभाना है, निभाना भी है या नहीं, ये सब निर्भर करता है, उन परिस्थितियों पर, जो आज की जरूरत है।इस तरह के संबंधों को ''लीव इन रिलेषनषिप'' कहा जाने लगा है। अब जीवनमूल्यों में आए बदलाव को देखते हुए इस तरह के संबंधों को नई पहचान और परिभाशा देनी होगी।यह बात अलग है कि इस तरह के संबंध कितने टिकते हैं, समाज इन्हें किस तरह की सम्मति देता है। ये संबंध समाज के लिए कितने हितकारी हैं, यह सब हमारे समाजषास्त्रियों को सोचना है।
डॉ. महेश परिमल

7 टिप्‍पणियां:

  1. किसी भी बात के दो पहलु होते ही हैं । उसी तरह "लिव इन रिलेशनशिप " कोई भी "आल्फा वुमन " अकेली नहीं रह सकती । पुरूष समाज को चाहिये ऐसी "आल्फा वुमन " के साथ ना रहे । "आल्फा वुमन " जो समाज मे अनेतिकता फेला रही हैं आप का समाज बच जायेगा ।

    "लिव इन रिलेशनशिप " कोई आज की चीज नहीं हैं मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव ३०-३५ साल से इस तरह रहे । इमरोज और अमृता प्रीतम को भी आप जानते ही होगे ।

    भारतीये समाज मे एक बहुत बड़ी विशेषता हैं , यहाँ सब कुछ छुप के करने वालो को सही माना जाता हैं । सालो से पुरूष गन्धर्व विवाह करते रहे और पत्निया न चाहते हुए भी इसको स्वीकारती रही । किसी किसी घर मे तो बच्चे को बड़ी माँ और छोटी माँ का संबोधन करना भी सिखाया जाता रहा । पूजा पाठ घर के लिये पत्नी और घुमाने आने जाने के लिये प्रेमिका कब ऐसा नहीं हुआ ?? अगर किसी पत्नी ने कुछ कहा तो कहा गया हम पैसा कमाते हैं तुम को रहना हैं तो रहो जाना हैं तो जाओ , माँ \बाप ने समझाया तेरे लिये तो कमी नहीं करता फिर तुम मत बोलो । बदलते समय ने नारी को आर्थिक रूप से स्वतंत्र किया तो कुछ ""लिव इन रिलेशनशिप " भी बने जिनमे upper hand महिला का रहा क्योकि वहाँ पुरूष का आर्थिक स्तर महिला से कम था ।

    सबसे बड़ी कठीनाई हैं "सोच" जो महिला को एक मोल्ड मे देखती हैं । अगर अविनाष की जगह मून ने किसी की हत्या की होती तो सब कहते "महिला " हो कर ऐसा किया । crime केवल गुनहगार करता हैं और उसको पुरूष या महिला मानना ही ग़लत हैं ।

    मे आप के लेख से सहमत नहीं हूँ क्योकि आप का लेख भी और लोगो की नारी के प्रति असम्वेदन शील हैं

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  2. गई।इस संबंध का अंत बहुत ही दुखद हुआ। अविनाष ने आवेष में आकर मून की माँ और उसके मामा को मारकर आत्महत्या कर ली।
    -iska matlab hum yah samjhen ki aap kahana chahte hain jo hum chahte hain karo wrna kahani khatm.agr koi ladki aisa kre to koi apne pati ya BF ko aur uske pariwar walon ko is karan mare ki usne use chhod diya tab bhi aap kya us ladki ko aise hi sahi thahrayenge? nhi yah dogla nyay hamre liye kyon aap btayenge?

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  3. परिमल जी,
    जिन्दगी को चश्मा उतारकर देखिये, जिन्दगी कोई ऐसा पैकेज नहीं है जिसमें आप सब कुछ अपनी पसन्द का पैक करके, सुन्दर से रिबन से लपेट कर आत्ममुग्ध हो सकें ।

    ये सब सामाजिक बदलाव के साईड इफ़ेक्ट्स हैं, जितनी जल्दी इनको हतप्रभ होकर देखना छोड कर समझना शुरू कर दें, उतनी जल्दी ही ये नजर में चुभना बन्द हो जायेंगे और एक नयी परिकल्पना जन्म लेगी ।

    किन "बूटी काल्स" के बारें में बात कर रहे हैं आप? कितने लोगों को आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं जो बूटी काल कर रहे हैं? या फ़िर आप भी अखबारों की तरह खबर बनाने का प्रयास कर रहे हैं?

    आजकल के युवाओं पर तो डबल दवाब है । आप शादी की बात कर रहे हैं तो उसकी भी सच्चाई सुनें । आजकल न तो सम्बन्धियों में इतनी आत्मीयता रही कि सबसे पता रहे कि फ़लाने का बेटा बेटी शादी लायक हो गया है, और हो भी गया हो तो हमारी बला से । हम क्यों अपना सरदर्द ले, अपने आप खोजेगा । फ़िर यही हमारे साथ होता है । माँ बाप तो आजकल खुश हैं अगर लडका/लडकी खुद ही अच्छा जीवन साथी चुन लें।

    समाज ये भी चाहता है कि लडकी पढे, कमाये, नौकरी करे लेकिन इसके बाद भी रहे हमारी मनमर्जी से ।

    महिलाओं के सिगरेट पीने पर बडा बवाल मचता है । खैर इस पर फ़िर कभी लिखेंगे ।

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  4. रचना जी ने बिना लाग लपेट के अपनी बात कह दी है । बस फ़र्क इतना है जिन बातों को पहले दबा दिया जाता था वो अब आप खुल कर देख रहे हैं ।

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  5. बडे दुख और शर्म की बात है कि आपने हर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला को टाइपकास्ट कर दिया है.अपनी सोच को विस्तार दीजिये और बदलते वक्त को स्वीकार कीजिये.कम से कम आज की पीढी में इतना दम तो है कि वो जो करती है खुलेआम करती है,पुराने लोगों की तरह नहीं जो छुप छुप कर दो गृहस्थियां चलाते रहे और परिवार वलों के मानसिक कष्ट का कारण बनते रहे.और एक बात और, यहां आपने सिर्फ़ लडकी को ही लिव इन रिलेशनशिप के लिये दोषी ठहराया, लडके को नहीं? क्या वो अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग रहा?

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  6. http://rewa.wordpress.com/2008/05/19/try-to-digest-it/#comment-1850

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  7. hello uncle,
    how r u...its me here MAMTA( u can say one of ur type alfa gal).

    apki article ko padh ke pata nahi chala actuall whom u blaming...a female who dare to stay happy when she is alone or urself tht u can just see them getting happy....

    apki research mujhe ajib lagi....koi khush hi to aap kyo gussa hi...kisi ko khush dekh ke apko khushi nahi hoti...

    ha mujhe acha lagta hi akele rahana...maza ata hi akele ghumne me pic dekhne me....n yes the best part i feel safe when i m alone....to isme bura kya hi....

    Agar m kuch galat nahi kar rahi to kisi ki life pe kya effect par raha hi.....

    jaha tak dusri chizo ki bat rahi to tali ek hath se nahi bajti....

    aap aise bat kar rahe hi jaise ladke kabhi koi galti nahi karte....
    aur ha aaj ki generation ke ladke apse ache hote hi atleast they respect female......

    anyway take care in rest of ur life n try to saty happy in rest off ur life....

    wish u the best thought

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