सोमवार, 28 दिसंबर 2009

पुनर्जन्म को मिलने लगी वैज्ञानिक मान्यता


डॉ. महेश परिमल
इंट्रो:-लीजिए साहब, अब यह पता चल गया कि सेलिना जेटली पिछले जन्म में मर्द थी, उसने द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन सेना के साथ भाग लिया था और उसके पेट के बायीं तरफ गोलियाँ लगी थीं। आज भी उसके पेट के बार्यी तरफ कभी-कभी दर्द होता है। यह उसके पिछले जन्म का राज था, जो अब सबके सामने है।
आज देश ही नहीं, बल्कि विश्व के कई वैज्ञानिक बड़ी उलझन में हैं। वहीं बहुत सारी धार्मिक मान्यताओं में से एक मान्यता अब वैज्ञानिक आधार प्राप्त करने लगी है। ये धार्मिक मान्यता है, पुनर्जन्म की। टीवी पर प्रसारित 'राज पिछले जन्म काÓ दिनों-दिन लोकप्रिय हो रहा है। इससे लोग अपने पुनर्जन्म की घटनाओं को जानने की चाहत बढ़ गई है। वैज्ञानिक अब तो इसे पूरी तरह से नकार रहे थे, इसके लिए उनके पास तमाम दावे भी थे। पर अब वे नर्वस नजर आ रहे हैं, क्योंकि अपने ही पुराने आधारों के कारण वे पुनर्जन्म को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है, वही नई वैज्ञानिक शोधों को वे नकार नहीं पा रहे हैं, इसलिए वे इस पर कुछ बोलना भी नहीं चाहते। दूसरी ओर पुनर्जन्म की मान्यता को कई वैज्ञानिक अपना समर्थन दे रहे हैं। इससे उनकी उलझन और बढ़ गई है।
अमेरिका के वर्जीनिया यूनिवर्सिटी वैज्ञानिक इयान स्टिवंस ने पूरी दुनिया में पुनर्जन्म के २२५ मामलों का परीक्षण कर एक किताब लिखी, जिसका नाम है 'रिइंकार्नेशन एंड बायोलॉजीÓ। इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि इस किताब को पढऩे के बाद अमेरिका के कई वैज्ञानिकों ने पुनर्जन्म को स्वीकारना शुरू कर दिया है। उनकी इस किताब को पढ़कर एक लेखिका एलिजाबेथ कुबलर-रोज ने लिखा है कि मुझे अपनी जिंंदगी की ढलान पर यह जानने को मिला कि प्रो. ईयान स्टिवंस ने पुनर्जन्म को एक हकीकत साबित कर दिया है। मुझे बहुत ही खुशी हो रही है कि दूसरे मिलिनियम के अंत में इस सत्य को आखिर वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर दिया गया है।
पुनर्जन्म और पूर्वजन्म विषय पर अमेरिका में इयान स्टीवंस ने जिस तरह से शोध किया है, ठीक उसी प्रकार का शोध भारत में डॉ. सतवंत पसरिया ने भी किया है। बेंगलोर की 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसीजÓ में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत ने ईस्वी सन् १९७३ से लेकर अभी तक भारत में प्रकाश में आई पुनर्जन्म के करीब ५०० घटनाओं का संकलन किया है। इसे एक पुस्तक का आकार दिया गया है, जिसका नाम है 'क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशन: एम्पिरिकल स्टी ऑफ केसेज इन इंडियाÓ। उल्लेखनीय है कि बेंगलोर की ये महिला वैज्ञानिक ने अपने शोध के लिए अमेरिका की वर्जिनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रो. इयान स्टिवेंस के साथ ही काम किया है। इस किताब की प्रस्तावना भी प्रो. स्टिवेंस ने ही लिखी है। वे कहते हैं कि जो इस तरह के किस्सों को पहली बार पढ़ रहे होंगे, उनके लिए इसमें शामिल घटनाओं को सच मानने में बहुत मुश्किल होगी, इसके बाद भी पाठक यह विश्वास रखें कि इस पुस्तक में जो भी घटनाएँ शामिल की गई हैं, वे सभी काफी सावधानीपूर्वक और प्रामाणिकता के साथ लिखी गई हैं।
उत्तर भारत में यह मान्यता है कि जो बालक अपने पिछले जन्म का ज्ञान रखते हैं, उनकी मृत्यु छोटी उम्र में ही हो जाती है।
उत्तर भारत में यह मान्यता है कि जो बच्चे अपने पिछले जन्म के बारे में जानकारी रखते हैं, उनकी मृत्यु छोटी उम्र में ही हो जाती है। इसलिए जो बच्चे पुनर्जन्म की घटनाओं को याद रखते हैं, उनके लिए पालक उसकी इस स्मृति को भुलाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं। कई बार तो उसे कुम्हार के चाक पर बैठाकर चाक को उल्टा घुमाया जाता है, ताकि उसकी स्मृति का लोप हो जाए। डॉ. सतवंत के अनुसार जिन बच्चों को अपना पूर्वजन्म याद रहता है, वे ३ से ८ वर्ष तक की उम्र के होते हैं। डॉ. सतवंत ने पहली बार १९७३ में वर्जिनिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ऑफ साइकियाट्री इयान स्टिवंस के बारे में जाना, फिर उनके साथ काम किया। इस दौरान उसने जाना कि मानव विज्ञान में इंसान की कई गतिविधियाँ अभी तक समझ से बाहर हैं, ऐसे में पुनर्जन्म की थ्योरी से इसे बखूबी समझा जा सकता है। इस आधार पर उन्होंने अपना शोध शुरू किया। शुरुआत में जब उनके सामने एक के बाए एक किस्से आने लगे, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं होता था। इतने में उनके सामने मथुरा जिले की मंजू शर्मा नाम की एक कन्या का मामला सामने आया। उसे अपने पूर्वजन्म की घटना याद की। इसका प्रमाण भी उनके सामने था, तब वे पुनर्जन्म पर विश्वास करने लगी।
बेंगलोर में डॉ. सतवंत के सहकर्मियों एवं उच्च अधिकारियों ने उनके इस शोध की उपेक्षा की। किंतु डॉ. सतवंत की तर्कबत्र कार्यपद्धति से प्रभावित होकर उनका साथ देना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद उन्हें भी डॉ. सतवंत की सच्चाई पर विश्वास होने लगा। डॉ. सतवंत कहती हैं कि पुनर्जन्म, इंद्रियातीत शक्तियों और मृत्यु जैसे अनुभवों पर विश्वास करें या न करें, अब इसका सवाल ही पैदा नहीं होता। विश्वभर में इस मामले पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं, इनका अस्तित्व अब वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो रहा है। कई बार तो ऐसे मामले सामान्य बुदधि से भी समझे जा सकते हैं। पर जहाँ सामान्य बुद्धि की सीमा समाप्त हो जाती है, तब पुनर्जन्म की बात को स्वीकारना पड़ता है।
अपने अनुभवों से गुजरते हुए डॉ. सतवंत कहती हैं कि कल्पना करो कि कोई बच्चा यदि पानी में जाने से डरता है, तो यह तय है कि पिछले जन्म में उसकी मौत पानी में डूबने से हुई होगी, या फिर उसकी मौत के पीछे पानी ही कोई कारण रहा होगा। कई बच्चों के शरीर पर जन्म से ही कई तरह के निशान होते हैं, इससे यह धारणा सत्य साबित होती है कि पिछले जन्म में उसे किसी तरह की चोट लगी होंगी। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि पूर्वजन्म को याद रखने वाले कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं, पर नागपुर की उत्तरा का किस्सा कुछ और ही है। जब यह ३० वर्ष की थीं, तब वह कहने लगी कि वह बंगाल की शारदा है और चटोपाध्याय परिवार की सदस्य है। मराठीभाषी उत्तरा अब धाराप्रवाह रूप से बंगला बोलने लगी। यही नहीं १९ वीं सदी के रीति-रिवाजों पर बात करने लगी। पूर्वजन्म में ऐसा होता है कि मृत्यु के एक वर्ष बाद फिर से जन्म होता है। पर यहाँ तो बंगाल की शारदा की मृत्यु के ११० वर्ष बाद उसका पुनर्जन्म हो रहा है। इस मामले को विस्तार से डॉ. सतवंत ने अपनी किताब में बताया है।
मुंबई की एक महिला बासंती भायाणी अपने परिवार में हुई पुनर्जन्म की एक घटना ९ सितम्बर २००४ के एक गुजराती अखबार में प्रकाशित हुई है। इस घटना में जूनागढ़ की एक ब्राह्मण कन्या गीता का जन्म भावनगर के एक जैन परिवार में राजुल के रूप में हुआ। राजुल जब अपने पिछले जन्म को याद करने लगी, तो उसे जूनागढ़ ले जाया गया, यहाँ उसने अपना घर, स्वजन ही नहीं, बल्कि अपनी गुडिय़ा तक को पहचान लिया। जब राजुल की शादी हुई, तब उसके पूर्वजन्म के परिजनों ने उसे बहुत सारा दहेज भी दिया। आज राजुल अहमदाबाद में अपने छोटे से परिवार में रहती है।
एक समय ऐसा था जब अपने को तार्किक बताने वाले बुद्धिजीवी पुनर्जन्म की घटना को बकवास कहकर हँसी उड़ाते थे, पर अब समय बदल रहा है, अधिकांश तार्किक यह मानने लगे हैं कि जिस बुद्धि समझ नहीं सकती, वैसा ही इस दुनिया में कुछ हो रहा है। भारत के प्रखर बुद्धिवादी जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर का अनुभव कहता है कि उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद वह रोज उनके सपने में आकर उनसे बात करतीं थीं। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब 'डेथ ऑफ्टरÓ में भी किया है। इस किताब को कोणार्क पब्लिकेशंस ने प्रकाशित किया है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार पुनर्जन्म का संबंध टेलीपेथी या मानवशास्त्र से हो सकता है। विद्यार्थी टेस्ट बुक के रूप में 'इंट्रोडक्शन टु साइकोलॉजीÓ का अध्ययन करते हैं, उसके लेखक रिचर्ड अटिकिंसन कहते हैं- पेरासाइकोलॉजी विषय में जो शोध हो रहे हैं, इस बारे में हमें बहुत सी शंकाएँ हैं। पर हाल ही में टेलिपेथी के संबंध में जो शोध हुए हैं, वे हमें विवश करते हैं कि हम उसे स्वीकार लें। पुनर्जन्म और टेलिपेथी पर किताब लिखने वाले डॉ. डीन रेडिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं- इस प्रकार की घटनाओं के जितने सुबूत पेश किए गए हैं, उतने सुबूत यदि किसी अन्य विषय पर पेश किए होते, तो वैज्ञानिक कब का इसे स्वीकार चुके होते। यही विज्ञान और धर्म के बीच संघर्ष का जन्म होता है।
वैज्ञानिक आज तक पुनर्जन्म, आत्मा, स्वर्ग-नर्क आदि के अस्तित्व को नकारते रहे हैं, लेकिन हाल ही में जो शोध सामने आए हैं, उसे वे अस्वीकार नहीं कर सकते। यह एक सच्चाई है। अब एक प्रश्न यह सामने आता है कि इंसान की मौत के बाद वह कौन सी चीज है, जो दूसरे के शरीर में पिछले जन्म की यादों के साथ प्रवेश करती है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए वैज्ञानिकों को भी देह से भिन्न ऐसे आत्मपदार्थ के अस्तित्व को स्वीकारना पड़ता है। अब यह शोध का विषय है कि इस आत्मा का गुण-धर्म क्या है?
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्‍छी जानकारी दी है आपने .. वास्‍तव में प्रकृति के जिन रहस्‍यों को हम नहीं समझते .. उसे अंधविश्‍वास मान लेते हैं .. पर इन घटनाओं से ये भी स्‍पष्‍ट होता है कि आत्‍मा पर भी शरीर और माहौल का असर बना रहता है .. तभी तो कई जगहों पर दूसरे शरीर में प्रवेश के बाद भी पूर्वजन्‍म की घटनाएं याद रहती है .. नीतिश कुमार के दरबार में 4 वर्ष की एक बालिका को धर्मग्रंथों के सभी श्‍लोकों को पढते हुए देखकर भी मुझे इस बात का विश्‍वास हो गया था .. 4 वर्ष की उम्र तक कोई भी गुरू उसे उस ढंग की शिक्षा नहीं दे सकता !!

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  2. बहुत ही बढिया जानकारीपरक आलेख.....इस विषय में हम भी आपसे पूर्णत: सहमत हैं.... अब समय आ गया है कि विज्ञान को आत्मा,पुनर्जन्म,लोक-परलोक इत्यादि शाश्वत सत्यों को खुले रूप में स्वीकार करने को बाध्य होना पडेगा।
    लेकिन भारत में बैठे काले अंग्रेज इन्हे तभी स्वीकारेंगें जब कि इनकी सत्यता पर पश्चिम की मोहर लग चुकी होगी...

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  3. सार्थक आलेख!!


    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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