मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

कस्बाई कवि सम्मेलन वाया फ्लैशबैक


अनुज खरे
पहले क्या कवि होते थे, क्या कविताएं होती थीं, क्या कवि सम्मेलन होते थे, कसम से। वाह...!, वाह...! ,
तय करना मुश्किल होता था कि ऐसा सुनाने वालों के पहले दांत तोड़ें कि ऐसा नामुराद लिखने वालों के हाथ कि आयोजकों को ही लंगड़ा बना दें। हालांकि तीनों में से यादा जालिम सजा के बारे में सोचने के दौरान कविता पूरी हो जाती थी। बदला लेने का इरादा अगले कवि सम्मेलन के लिए टाल देना पड़ता था।
हमें हमारे कस्बे के कवि सम्मेलनों की याद है। मंच तक क्या खूब बनाए जाते थे। चार तखत जोड़ दिए, आगे पीछे छोटे-बड़े तखत, उन पर फर्स्ट क्लास और बॉलकनी में कुछ कवि। पांच गद्दे डाल दिए, सुविधा के हिसाब से जरूरत पड़ने पर चाहे बाल नोचो या गद्दे की रुई। कहीं से जोड़जाड़ के सात-आठ कविवर पकड लिए, बस कवि सम्मेलन रेडी टू स्टार्ट।
जनता में ऐसे कवि सम्मेलन काफी पॉपुलर थे। सालभर की मार-पिटाई, गाली-गलौज का कोटा एक बार में ही पूरा कर लिया जाता था। बाजूवाले से बहस, पीछेवाले से लड़ाई, दोनों ही मौके नहीं मिले तो आयोजकों को ही लपका दिया, इन सारे अवसरों के हाथ नहीं आने की स्थिति में कवि तो हैं ही, वे कहां बच पाएंगे।
लोगों का अपना सिटिंग अरेंजमेंट भी अद्भुत था। घर से बोरी लाए, बिछा ली। साइड में 500 ग्राम मूंगफली रख लीं। खाते गए, कवियों को दाद देते गए। यादा जोश आने पर सीटी मार दी। बीच-बीच में मूंगफली के छिलके बाजूवाले की बोरी के नीचे खिसकाते गए। लघुशंका को गए बाजूवाले ने अपने छिलकों सहित उनका कंसाइनमेंट वापस ट्रांसफर कर दिया। वापस आने पर गर्भवती महिला जैसा बोरी का पेट देखने पर बांछें खिल जाती थीं कि सालभर से जिस मुकाम का इंतजार था, वो आ गया है। बाजूवाले से इतने सात्विक तरीके से रिश्तेदारियां जोड़ी जाने लगती थीं कि वो भी बदले में और यादा निकटम रिश्तेदारियों पर बल देना शुरू करता था। आसपास के लोग भी इन नवीन रिश्तेदारी गठबंधन समारोह के भव्य अवसर पर आशीर्वाद देने प्रस्तुत हो जाते थे। बाद में स्वयंसेवकनुमा कुछ चीजों की मदद से दोनों रिश्तेदारों के आयोजन स्थल से नजदीक ले जाकर एकांत वार्तालाप करने के लिए छोड़ दिया जाता था। जिस पर वे थोड़ी देर में फिर 'हमारी बोरी वापस लौटाओ' की गुहार लगाते वापस आकर जम जाते थे। इन रूटीन क्रियाकलापों के बीच कवि सम्मेलन निर्बाध गति से चलता रहता था।
वीररस का कलूटा कवि और शृंगाररस की सुंदर कवयित्री सबसे यादा दाद पाते थे। हर बरस आने वाली ऐसी ही एक कवयित्री से जनता दर्जनों बार सुनाई जा चुकी कविता सुनाने की फरमाइश करती थी, जिसे वे नजाकत से स्वीकार करती थीं। हालांकि वो बात अलग है कि अगर फरमाइश नहीं भी की जाती तो भी वे वही कविता सुनातीं, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में एक ही बेहतर कविता लिखी थी। कवि सम्मेलन में तो उनकी गाड़ी उनके रूप-रंग की वजह से खिंच रही थी। आयोजकों से लेकर भीड़ तक सभी को ये रहस्य मालूम था। बस उन्हें ही लगता था कि जनता उनके पिया-जीया, बदरा-गगरा, रैना-नैना जैसी कालजयी शब्दों की तुकबंदी पर बिछी-बिछी जा रही है। लोग हर लाइन से पहले आगे के शब्द दोहराते थे। इतनी चिल्लपों मचती थी कि ऐसा लगता था कि वे मंच पर बोलने और गाने के बीच की कोई हरकत कर रही हैं। पांच-सात मिनट के बाद जब वे चुप हो जाती थी तो कविता पढी हुई मान ली जाती थी। मूलत: वे थीं तो मास्टरनी लेकिन उन्हें उनकी इस इकलौती कविता ने क्षेत्र में भारी प्रसिध्दी दिलवाई थी। शहर से गांव के स्कूल में पढ़ाने आते समय वे हर दिन, हर एक को इतनी बार ये कविता सुना चुकी थीं अब तो गांव आते समय बस में उन्हें आराम से सीट मिल जाती थी, क्योंकि उन्हें देखकर हर कोई आपनी सीट ऑफर करता था, ताकी सीट भले ही चली जाए, उनकी कविता सुनने से जो आत्महत्या करने की स्थिति बन सकती थी, उससे तो बचा जा सके। तो इस समीकरण के तहत हर कोई उन्हे अपनी सीट देने का तत्पर रहता था। अपनी इतनी प्रलयंकारी कविता से प्राप्त ख्याति के बाद वे 'बदरा-गगरा मैडम' ही कहलाने लगीं थीं। बच्चों तक को ये कविता इतनी शिद्दत से याद हो गई थी कि उनके कई पुरुष प्रशंसकों का मानना था कि इस कविता को स्कूल की प्रार्थना बना देना चाहिए। कुछ ने तो इसके लिए आंदोलन चलाने तक की तैयारी कर ली थी, चंदा तक जोड़ लिया गया था। बाद में आंदोलन तो नहीं चल पाया, तो इसी चंदे से एक कवि सम्मेलन का आयोजन करवाया गया। जिसका नाम ही 'बदरा-गगरा पावस कवि सम्मेलन' रखकर उनकी कालजयी रचना को इतिहास में मील के पत्थर के रूप में कहीं गढ़वाया गया था। तो इस तरह से वे हर कवि सम्मेलन की जान थीं, आयोजकों के लिए भीड़ खींचने का सामान थीं।
उन्हीं की तरह वीररस के कवि धरतीमल 'धमक' काफी प्रसिध्द थे। धरती को हिला देने वाली काया पर तरबूजे की तरह सिर भी रखते थे। उनके सर और घड़ का जिक्र आया है, तो मुंह का उल्लेख भी आवश्यक है। तो वे मुंह भी रखते थे। इसी मुंह में वे जीभ भी रखते थे, जो दांतों के पीछे रहती थी। दांतों और इस तंतु की सहायता से वे पान भी खाते थे। दांत नकली थे। कई ढीले दांतों को वे सुपारी मानकर खा चुके थे। जिस पर उन्होंने पान वाले बताया भी था कि यार, आजकल छालिया पत्थर की तरह आने लगी है, जिसे खाना उन जैसे पत्थर के दांतों वाले के ही बूते की बात है। तो जिस चीज से उनके पान खाने का जिक्र चल रहा है, उसकी सहायता से वे वीररस की कविताएं रौद्र रूप में सुनाते थे, जिसे कई जलनखोर वीभत्स रस की कहते थे।
वे कविता सुनाने से पहले हर बार बताते थे कि इतनी खतरनाक कविता को वे अपनी जान जोखिम में डालकर सुना रहे हैं। जिसके देश के खिलाफ यह कविता है, उसके जासूस उन्हें खत्म भी कर सकते हैं। 20-22 सालों से लोग उन्हें लगातार यह कहते सुन रहे थे। हालांकि ऐसा कहने का असर यह होता था कि लोग बड़े ही गंभीर अंदाज में उनकी यह कविता सुनाते थे, कि आखिर कौन सा देश है। पूरी सुनने के बाद भी उनकी कविता में ना तो किसी देश का ािक्र मिलता था ना ही किसी आदमी का। कई सीनियर किस्म के लोगों ने उनसे जानने की कोशिश भी की थी कि वे किस देश का ािक्र कर रहे हैं, जिससे उन्हों खतरा है, तो बस वे मुस्कुरा के रह जाते थे। इस मुस्कान का मतलब यह लगाया जाता था कि वे अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि पाक या चीन दुनिया के नक्शे में जहां है क्या वास्तव में वहीं है। तो जब तक वे इन देशों की भौगोलिक स्थिति के बारे में निश्चिंत नहीं हो जाते, वे किसी भी देश का नाम तथ्यात्मकता के मद्देनजर नहीं लेना चाह रहे हैं। जबकि कुछ का तो मानना था कि पड़ोसी देश का नाम लेते समय अपने निजी पड़ोसी के घर की बात करते हैं, जिसका उनसे इसी कविता के रियाज के चलते पुश्तैनी झगड़ा बद चुका है। उन्हें देखकर ही वो कुल्हाड़ी उठाने लगता है। दोनों ही बातों के बीच रहस्य हर बार रहस्य ही रह जाता था क्योंकि ना तो वे बता पाने में सफल हो पाते थे, ना ही लोग जान पाने में।
वे कविता सुनाते समय इतने हाथ-पांव फटकारते थे कि मजबूत से मजबूत तखत भी धराशायी हो जाता था। जिस पर लोगों ने उनका नाम ही 'धमक' रख दिया था। उनके कविता सुनाते समय आगे की लाइन में बैठने में लोग डरते थे कि पता नहीं किस जोशीली तरन्नुम में वे सामनेवालों पर कूद पड़ें। कई बार तो जोश में माइक को स्टैंड सहित ही तलवार की भांति भांजने लगते थे। उनकी यह आदत तभी छूट पाई, जब एक-दो बार टैंटवाले ने माइक खराब करने पर आयोजकों की तरफ से मिली पूरी राशि छीन ली थी या माइक में करंट आने के चलते झटका खाकर आयोजकों पर ही लोट गए थे।
उनकी अलावा हास्यरस के एक कवि बसंतीलाल 'पिनपिने' भी हर बरस कवि सम्मेलन में उपस्थित होते थे। अपनी पिनपिनाती आवाज में हास्यरस की कविताएं सुनाते थे, जिस पर लोगों को केवल साउंड क्वालिटी के आधार पर ही दाद देने का कार्य संपन्न करना होता था। कविता सुनाकर वे खुद ही इतना जोर से हंसते थे कि लोगों को स्वाहा कब कहना है, की जानकारी मिल जाती थी। लोगों को तो केवल उनकी कविता का शीर्षक ही सुनाई देता था, वो भी इसलिए कि आयोजकोें की तरह से मंच की अध्यक्षता कर रहे कवि महोदय यह शीर्षक बोलकर ही उन्हें मंच पर कविता सुनाने की दावत देते थे। पहले वे मूलत: शृंगाररस के कवि थे। और गांव के पनघट पर काफी जाते थे, जिसका उद्देश्य उनकी नजर में नायिका के नख-शिख के वर्णन के लिए कच्ची सामग्री की आपूर्ति था। दूसरों की नजर में इसका मतलब दूसरा था, जिसे यहां लिखा नहीं जा सकता है। इसी आने-जाने के क्रम में वे किसी नायिका के नख-शिख में इतने डूब गए थे कि वे ही बाद में उनके जीवन में बहार बनकर छा गई थीं। पनघट से पानी भरने का काम बाद में पिनपिने जी के जिम्मे आ गया था। वहीं से सिर पर घड़े लादते और महिलाओें से गप्पें लगाते-लगाते उनके स्वरतंत्र में महिलाओं जैसी नजाकत आ गई थी। महिलाओें जैसी गोपनीय बातों को जब वे पुरुष वर्जन में बोलते थे, जो सामग्री बाहर आती थी वो पिनपिनी किस्म की होती थी। सो वे पिनपिने कहलाने लगे थे। शृंगार से हास्य में शिफ्ट होने पीछे मामला कुछ यूं था कि उनकी शृंगाररस की कविताएं जब लोगों की समझ में आती थीं, तो वे उस पर इतना जोर-जोर से हंसते थे कि कई हास्य रस के कवि तक भयरस की शरण में जाने को मजबूर हो जाते थे। इस पर हास्यरस के विरोधी एक कवि ने उन्हें अपनी क्षमताएं पहचानने की सलाह देकर नैसर्गिक लेखन की तरफ मोड़ा था। जिसके चलते उन्होंने अपनी प्रतिभा पहचानी थी। आज भी लिखते शृंगाररस की कविताएं ही थे जिन्हें सम्मेलनों में हास्य की कहकर पढ़वाया जाता था। केवल आवाज के दम पर ही कोई कवि कितना पॉपुलर हो सकता है, पिनपिने जी इसका जीवंत उदाहरण थे। उनकी आवाज ही उनकी कविता की सारी खामियां ढक लेती थी जनता उनकी आवाज और कविता सुनाने की शैली पर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाती थी। उनकी आवाज कितनी अद्भुत थी, इसका पता मंच पर बैठे लोगों को भी जभी चलता था जब वे एकाएक कविता पूरी कर तखत पर बैठ जाते थे। सबसे यादा दाद उन्हें महिला श्रोताओें की ओर से मिलती थी, जो पनघट वाली शैली को मंच पर प्रतिष्ठित करवाने के युगांतरकारी काम को लेकर उनकी जबर्दस्त प्रशंसक थीं और पनघट से ही पुरानी जान-पहचान के कारण कवि सम्मेलन में भी चली आती थीं।
इनके बीच समुद्र से लहरों की तरह मदहोश नामक एक कवि प्रकट होकर कविताएं सुनाते थे। उनके बारे में उनके सहित बाकी लोग तय नहीं कर पाए थे कि उन्हें रस के आधार किस श्रेणी में वर्गीकृत किया जाए। श्रेणी के निर्धारण के काम जनता पर ही छोड़ दिया जाता था। हालांकि वो बात अलग है कि उन्हें किसी भी श्रेणी में रखा जाता, वे इतने प्रतिभाशाली पाए जाते थे कि हर रस की विशेषताएं रखते थे। जो विशेषताएं रचना में नहीं आ पाती थीं, वे उनमें निजी तौर पर थीं यानी वीररस की। लड़ने के प्रति वे इतनी अदम्य इच्छा रखते थे कि हर बरस आयोजकों से लड़े बिना वे कविताएं पढा ही नहीं करते थे। अपने पारिश्रमिक का मामला निपट जाने के बाद वे दूसरे कवियों की तरफ से प्रस्तुत हो जाते थे। उनका भी मामला निपट जाए तो टैंटवालों के लिए उनके दिल में दया उमड़ आती थी। आयोजन में हर बरस उनकी शिरकत के पीछे उनके इसी गुण का हाथ बताया जाता था। इतने क्रियाकलापों के बाद वे बेचारी जनता के लिए व्यवस्था को ललकारते थे। यह काम वे इतना इमोशनल होकर करते थे कि दूसरी लाइन के बाद आगे की पंक्तियां भूल जाते थे। जिस पर वे तत्काल याद आई अपनी ही किसी कविता की लाइनें जोड़कर सुना देते थे। कई बार अपनी कविता की लाइनें याद ना आने पर दूसरे कवि की कविता से यह सामग्री उधार लेने में संकोच नहीं करते थे। कई बार तो वे इसी कवि सम्मेलन के किसी पूर्ववर्ती कवि की लाइनें भी रिपीट करने लगते थे, यहां तक की आगे की लाइनें भी उसी से पूछ लेते थे। अपनी समाजवादी और सर्वहारावादी प्रवृति के चलते मानते थे कि इन्टालेक्चुअल प्रॉपर्टी पर सबका बराबरी का अधिकार है। साहित्य में तो आजकल ऐसी उधारी जबर्दस्त ढंग से चल रही है। बल्कि उनके तो विचार थे कि ऐसे लेन-देन को चोरी जैसे नाम से असाहित्यकार लोग ही पुकारते हैं। उनकी ऐसी बहुरंगी कविताएं खूब लोकप्रिय थीं। उनकी एक मिक्स कविता को प्रचंड तौर पर ख्याति प्राप्त थी। जिसकी लाइनें थीं।
'भींच लो मुट्ठियां, सिर उठाओ
भींच लो मुट्ठियां, सिर उठाओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ
विरहा की बेला है,नैनाभर लाओ
परदेस हैं बालम, सखी नैनाभर लाओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ
जालिम वक्त है, झुलसती तमन्ना
कोई तो उम्मीद का गुलशन खिलाओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ
पंछियों का कलरव,चहकता पनघट
खुशियों की गागर,सपनों का जल
विवाह की तिथि, कोई तो नजदीक लाओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ'

इसी कविता को सुनाने के दौरान एक बार तो उन्होंने मंच पर बैठे स्थानीय शायर बदरूद्दीन 'फुरकत' से उनका कागज ही छीन लिया था। यहां से आगे कि लाइनें वहीं से थीं।
'कोई मंजर सता रहा है उसे
'फुरकत' कोई अजनबी बुला रहा है उसे
आते-जाते,आते-जाते
जाते-जाते, आते-आते'

(बीच में दर्शकों में से आवाज भी आई कि कोई उधारी वसूलने वाला है, जो वो बुलाए चला जा रहा है, ये जाने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि उन्होंने इसका बुरा ना मानते हुए दाद की तरह स्वीकार किया।)
इतने में भीड़ चिल्लाने लगी कि इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ, कहीं से कुछ भी उठाओ लेकिन साहब हमारे लिए इंकलाब लाओ। इस बात पर वे फिर यू टर्न मारकर मूल कविता पर लौट आए।
'भींच लो मुट्ठियां, सिर उठाओ
भींच लो मुट्ठियां, सिर उठाओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ'

पांचैक मिनट तक इंकलाब लाने के बाद उन्हें इसके आगे कि लाइनें याद हो आईं। जो आपकी नजर हैं।
'सड़कों पर निकलो,तख्तियां उठाओ
रैली बनाओ,सितमगरों को माटी मिलाओ
पत्थर मारो, झंडे लहराओ
इंकलाब लाओ, इंकलाब लाओ'

जब वे पर्याप्त मात्रा में इंकलाब ला चुके, तो आगे कि दर्शक दीर्घा में बैठे कई सान दूसरे दिन ऑफिस में रूटीन कार्यों के माध्यम से जनता को इंकलाब दिलवाने के महान उद्देश्य के तहत घरों की ओर निकलने लगे। तभी आयोजकों ने उनकी क्रांति को विराम दिलवाया। बड़ी मुश्किल से कुछ वरिष्ठ या बलिष्ठ कवियों की मदद से उन्हें घसीटकर बैठाया गया था।
अब की बार जो कवि किस्म के सान खड़े हुए वे चट्टान सिंह 'नाजुक' थे। शरीर से चट्टान, दिल से नाजुक थे। नाजुक इसलिए कि दिल की दो बायपास सर्जरी करवा चुके थे। इसलिए उन्हें कवि सम्मेलनों में तभी खड़ा किया जाता था जब स्थिति नियंत्रण में होती थी। अन्यथा तो वे स्वयं कविताओं को सदन पटल पर रखकर इतिश्री मान लेते थे। वे नजाकत से इतनी मरी-मरी आवाज में कविताएं सुनाते थे कि जनता तक उसे ढोकर ले जाने का काम मंचस्थ कवियों को ही करना पड़ता था, साथ में वाह!, वाह! की ताल अलग मिलाना पड़ती थी। कविता सुनाते समय वे लगाातार एक हाथ दिल पर रखे रहते थे। उनका मानना था कि वे ऐसा दिल को संभाले रखने के लिए करते हैं। भाईलोगों का मानना था कि वे ऐसा बटुए को संभाले रखने के लिए करते हैं। आयोजकों और मंचस्थ कवियों पर उन्हें जरा भी भरोसा नहीं है। कविता सुनाते समय वे कई प्रकार की और भारी मात्रा में बीमारों वाली कराहने की आवाजें निकालते रहते थे। जो उनके हिसाब से उनकी स्टाइल थी, जनता के लिए मनोरंजन का साधन थी, डॉक्टरों के लिए उनकी तीसरी बायपास की तैयारी थी। किस लाइन के बाद वे आह, ऊह, आउच निकालेंगे इस पर श्रोताओं में 100-200 ग्राम मूंगफलियों की शर्त बद जाया करती थी। संपन्न किस्म के श्रोता 5-10 रुपए तक की ठान लेते थे। जीतने वाला एक-दो रुपए उनकी मेहनत पर उन्हें भी नजर करता था। कविता से यादा कमाई इस गतिविधि पर हो जाया करती थी। इस राज का पता चलने पर उन्होंने फिक्सिंग पर भी हाथ आजमाया था। अपनी वाली पार्टी के इशारे पर हाथ उठाकर आह, ऊह की आवाज निकालते थे। बाद में तो उन्होंने जितनी मेहनत कविता से स्थान पर कराहने में यादा दर्द घोलने में की थी, उतनी मेहनत हिन्दी कविता के इतिहास कोई दूसरा कवि कभी कर ही नहीं पाया, तो इस दिशा में उनका योगदान अतुलनीय था। बाद की तो उनकी कविताएं आह, ऊह, आउच, दिल के तार पर, तन की तान सरीखी हो गईं थीं। जिसमें वे एंजियोग्राफी और बायपास जैसे नवीन प्रयोगवादी शब्दों का मिश्रण भी करते रहते थे। उनका तो यहां तक मानना था कि इसी कविता से प्रभावित होकर ही आयोडेस्क वालों ने अपना विज्ञापन आह, ऊह, आउच आयोडेस्क मलिए, काम पर चलिए बनाया होगा। हालांकि इस तथ्य की कभी पुष्टि नहीं हुई और उन्होंने भी जनता की भलाई की दृष्टि से कभी आयोडेस्क वालों से इसकी रॉयल्टी नहीं मांगी। अपनी इसी कविता की बदौलत वे रात के तरन्नुम में रूमानियता घोलते थे। सोने-सोने की दशा में पहुंच चुके श्रोताओं को चैतन्य कर देते थे कि एक रोगी जाग रहा है, कराह रहा है, तुम आजकल के घरवालों जैसा, कैसे सो सकते हो। बाद में वे एक फिल्म में भी दिखे। जो स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को जागरूक करने के लिए बनवाई थी। उसमें इन्होंने खांसने वाले बुजुर्ग की भूमिका इतनी शिद्दत से निभाई थी कि फिल्म के बाद तीन महीने तक सिर्फ खांसते रहे थे। पूरे आंचल में कोई भी कवि कभी उनकी आह, ऊह, आउच और ठाऊं...,ठाऊं...ठुल्ल...,ठुल्ल...रोगियों को समर्पित कविता और खांसी को समर्पित भूमिका की नकल नहीं कर पाया था। बाद में जब वे स्मृति शेष हुए तो उनकी समाधि के पास से गुजरते समय कई लोगों को ठाऊं..., ठाऊं..., ठुल्ल...,ठुल्ल...की आवाजें आने का भ्रम होता रहा। जिस पर गांववालों ने इसे उनकी अंतिम इच्छा मानते हुए, उनकी समाधि पर स्थायी तौर पर उकेरवा दिया था।
कवि सम्मेलन के अंत में आयोजकोें में से मस्तान भाई भी कविता पढ़ते थे। अन्यथा तो उनकी डयूटी बाहर से आने वाले कवियोें को स्टेशन से लाने, खाने-पिलाने की व्यवस्था देखने, रात को सही सलामत कवि सम्मेलन तक पहुंचाने की होती थी। वे ही कवियों को होटल पहुंचाकर सम्मेलन से पहले की पूरी 'तैयारी' करवाते थे। जब सारे कवि तैयारियां करके 'टुन्न' हो जाते थे तो जनता को उनके रहमोकरम पर छोड़ दिया जाता था। कई कवियों की तैयारियों का 'लेबल' इतना उच्चस्तरीय था कि कस्बे में पाया ही नहीं जाता था। जिस पर ऐसे कवियों को अपने स्तर में जिलास्तर की मिलावट करनी पड़ती थी। जिसका असर दूसरे दिन दोपहर तक बना रहता था। जिस पर ऐसे कवि अपने आसपड़ोस से रात को उन्होंने कौन सी कविता सुनाई, के विषय में पूछताछ करते पाए जाते थे। तो जब वे अपनी मर्सियानुमा कविता पढ़ते थे, तो स्टेज पर बैठे कवियों की उसे सुनने की मजबूरी इसलिए होती थी कि क्योंकि वे ही कवियों को स्टेशन या बस स्टैंड छोड़ते समय फुल एंड फाइनल पेमेंट करते थे। सिवाइयों के पैकेट देते थे। चाय पिलाते थे। कविगण उनके इस परिश्रम के सम्मान करके उन्हें लगातार दाद देते थे, जिस पर वे गाड़ी को घुमा-घुमाकर लाइनें रिपीट करते थे। कई बार तो इतने इमोशनल हो जाते थे कि खुद रोने लगते थे। कवियों के दहशत में आंसू निकलते थे। जनता खून के आंसू रोती थी। बाकी आयोजक अपने आंसुओं को खुशी वाला बताते थे। हालांकि जनता की मजबूरी कुछ यूं थी कि लोगों के बीच उनके कुटीर उद्योग कारखाने के बुजुर्ग-जवान-महिलाएं-बच्चे बैठे रहते थे, जो लगातार लोगों की घेराबंदी किए रहते थे। ऐसे कर्मठ कर्मचारियों के लिए दो-दो बीड़ी के बंडल, 500-500 ग्राम मूंगफली का कोटा फिक्स था। चाय की तो वे मंच से लेकर अपने कर्मचारियों तक कोई कमी नहीं आने देते थे। घर की सारी भैंसों का दूध उस दिन इसी दिशा में मोड़ दिया जाता था। आवभगत की मात्रा की तुलना में हर बरस मर्सिया में लाइनें बढ़ा दी जाती थीं। कई बार उनकी कविता किस्म की इसी चीज को सुन-सुनकर लोग बेहोश तक हो जाया करते थे जिस पर उनके कर्मचारी ऐसे कमजोर दिलवालों को घटनास्थल से दूर ले जाकर ऐसे आयोजन से पर्याप्त 'डिस्टेंट मेंटेन' करने की सलाह देते थे, जबकि मस्तान भाई को उनकी कविता की मार्मिकता और मारकता के संबंध में जोशो-खरोश से बताया जाता था। अपने इन कर्मचारियों के समर्पण की एवज में वे दूसरे दिन कारखाने की छुट्टी रखा करते थे। उनके इतने व्यक्तिगत प्रयासों का नतीजा था कि कवि सम्मेलन उनके कस्बे के सालाना कलेंडर का स्थायी भाव था।
इसी कवि सम्मेलन का ही प्रताप था कि उस पूरी रात कस्बेवाले परिवार की तरह साथ बैठते थे। रिश्ते ताजा करते रहते थे। रातभर लड़ते रहते थे। एक-दूसरे की इतनी छककर बुराइयां कर लेते थे कि मन के मैल धुल जाते थे। दिल की कालिख बह निकलती थी। दुश्मन भी सगा सा दिखने लगता था। उसकी हंसी भी निश्छल लगने लगती थी। कई बार ऐसी ही किसी रात में लड़ाई-झगड़ा करवाने वाले 'आत्मीयजनों' की पहचान हो जाती थी। आज भी हमारे उस कस्बे में जो थोड़ा-बहुत भाईचारा है, उसके पीछे इन्हीं कवि सम्मेलनों का बड़ा हाथ है। हालांकि मस्तान भाई इसके पीछे अपना हाथ-पांव और हिसाब का रजिस्टर बताते थे, प्रूफ के तौर पर चाय, मूंगफली, दूध की मात्रा तक की जानकारी देने लगते थे। कोई अगर उनकी बात से सहमत नहीं होता था, तो वे जिन भैंसों के दूध से चाय बनी है, उन तक से गवाही दिलाने को तैयार हो जाते थे। खैर, आजकल तो यदा-कदा होने वाले कवि सम्मेलनों में बुजुर्ग कवियों का जिक्र तक नहीं किया जाता। हां, पुराने लोग जरूर अपनी अतीत को याद करने की विवशता के चलते वर्तमान कवियों की क्षमता से पुराने कवियों की तुलना करते हैं। आंसू पोछते हैं कि कैसे उन महान आत्माओं ने पूरे एक दौर में इलाके को अपनी जिंदादिली से रोशन रखा।
अनुज खरे

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