सोमवार, 14 दिसंबर 2009

सजनवा बैरी हो गइल हमार


हिंदी फिल्म जगत में गीतकार शैलेन्द्र की जोड़ी मशहूर संगीतकार शंकर जयकिशन के साथ काफी हिट रही लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब शंकर जयकिशन शैलेन्द्र के साथ किए गए वादे को भूल गए जिससे शैलेन्द्र के दिल पर गहरी चोट पहुंची।
संगीतकार शंकर,जयकिशन ने शैलेंद्र से वायदा किया था कि जब कभी फिल्म में संगीत देने का मौका मिलेगा वह फिल्मकारों के समक्ष गीतकार शैलेन्द्र के नाम का प्रस्ताव रखेगे लेकिन जब कई फिल्मों में शंकर जयकिशन ने अपना यह वादा नही निभाया तो शैलेन्द्र के दिल पर गहरी चोट पहुंची। उन्होंने एक पर्ची पर पंक्तियां लिखकर भेजीं' छोटी सी ए दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कहीं तो मिलोगे, कभी तो मिलोगे फिर पूछेंगे हाल। शैलेन्द्र के रचित इस गीत की पंक्तियों को पढकर शंकर,जयकिशन को अपनी भूल का अहसास हो गया और न सिर्फ उन्होंने इस गीत को संगीतबध्द किया बल्कि कई फिल्मों में शैलेन्द्र को काम करने का अवसर भी दिया। पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर मे 30 अगस्त 1923 को जन्मे शंकर दास केसरीलाल उर्फ शैलेन्द्र अपने भाइयों मे सबसे बडे थे। शैलेन्द्र के बचपन के दिनो मे ही कुछ अच्छा करने की चाह लिए उनका परिवार रावलपिंडी छोड़कर मथुरा चला आया। जहां उनकी माता पार्वती देवी की मौत से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा और उनका ईश्वर पर से विश्वास उठ गया। अपने परिवार की परंपरा को निभाते हुए शैलेन्द्र ने वर्ष 1947 में अपने कैरियर की शुरुआत मुंबई में रेलवे की नौकरी से की। उनका मानना था कि सरकारी नौकरी करने से उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा। इस समय भारत का स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था। रेलवे की नौकरी उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी। आफिस मे अपने काम के समय भी वह अपना ज्यादातर समय कविता लिखने मे हीं बिताया करते थे,जिसके कारण अधिकारी उनसे नाराज रहते थे।
इस बीच शैलेन्द्र देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ गए और अपने कविता के जरिए वह लोगों मे जागृति पैदा करने लगे। उन दिनों शैलेन्द्र की कविता 'जलता है पंजाब 'काफी सुखयों मे आ गई थी। शैलेन्द्र कई समारोहों में यह कविता सुनाया करते थे। एक कवि सम्मेलन के दौरान हिन्दी सिनेमा के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर को शैलेन्द्र के गाने का अंदाज बहुत भाया और उन्हें उसमें भारतीय सिनेमा का एक उभरता हुआ सितारा दजर आया। राजक पूर ने शैलेन्द्र से अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने की इच्छा जाहिर की किंतु शैलेन्द्र को यह बात रास नही आई और उन्होंने उनकी पेशकश ठुकरा दी। लेकिन बाद मे घर की कुछ जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने राजकपूर से दोबारा संपर्क किया और अपनी शर्तो पर हीं राजकपूर के साथ काम करना स्वीकार किया। गीतकार के रुप में उन्होंने अपना पहला गीत वर्ष 1949 में प्रदशत राजकपूर की फिल्म बरसात के लिए 'बरसात में तुमसे मिले हम सजन 'लिखा था। इसे संयोग हीं कहा जाए कि फिल्म बरसात से हीं बतौर संगीतकार शंकर जयकिशन ने अपने कैरियर की शुरुआत की थी।
फिल्म बरसात की कामयबी के बाद गीतकार के रूप मे शैलेन्द्र और संगीतकार के रूप मे शंकर जयकिशन अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। शैलेन्द्र और संगीतकार शंकर जयकिशन की सुपरहिट गीत में कुछ
है'बरसात मे हम से मिले तुम सजन,बरसात 1949, आवारा हॅू या गदश मे हॅू आसमान का तारा हूॅ, दम भर जो उधर मुंह फेरे आवारा 1951, ऐ मेरे दिल कहीं और चल, गम की दुनिया से दिल भर गया, दाग 1952 प्यार हुआ इकरार हुआ है, मेरा जूता है जापानी,रमैया वस्ता वइया, श्री 420 1955,ये मेरा दीवानापन है, यहूदी 1958, सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी,किसी की मुस्कुराहटो पर हो निसा, अनाड़ी 1959,चाहे कोई मुझे जंगली कहे, जंगली 1961, बोल राधा बोल संगम होगा कि नही, संगम 1964,दीवाना मुझको लोग कहें, दीवाना 1967, मै गाऊ तुम सो जाओ,ब्रह्मचारी 1968 और जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां मेरा नाम जोकर 1970 आदि शैलेन्द्र अपने कैरियर के दौरान प्रोग्रेसिव रायटर्स एशोसिएशन के सक्रिय सदस्य के रूप मे जुडे रहे साथ हीं वह इंडियन पीपुल्स थिएटर 'इप्टा' के भी संस्थापक सदस्यों में से एक थे। शैलेन्द्र को उनके रचित गीतों के लिए तीन बार फिल्म फे यर अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें पहला फिल्म फेयर अवार्ड वर्ष 1958 में प्रदशत'यहूदी ' फिल्म के 'ए मेरा दीवानापन है'गाने के लिए दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1959 में प्रदशत फिल्म अनाड़ी के गीत 'सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी ' और वर्ष 1968 में प्रदशत फिल्म बह्चारी के गीत 'मै गाऊ तुम सो जाओ' के लिए भी वह सर्वश्रोष्ठ गीतकार के रूप मे फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे गए। ाजकपूर के अलावा शैलेन्द्र की जोड़ी निर्माता'निर्देशक विमल राय के साथ भी खूब जमी। विमलराय की कई फिल्मों में सदाबहार गीत लिखकर शैलेन्द्र ने उनकी फिल्मों को सफल बनाया है। इन फिल्मों में दो बीघा जमीन 1953, नौकरी 1955, परिवार 1956, मधुमति, यहूदी 1958, परख, उसने कहा था 1960, और बंदिनी 1963 प्रमुख है। अपने गीतो की रचना की प्रेरणा उन्हें मुंबई के जुहू बीच पर सुबह की सैर के दौरान मिलती थी। चाहे जीवन की कोई साधारण सी बात क्यों न हो वह अपने गीतों के जरिए जीवन की सभी पहलुओं को उजागर करते थे।
शैलेन्द्र ने संगीतकार सलिल चौधरी के साथ भी खूब काम किया। शैलेन्द्र'सलिल की जोड़ी वाली फिल्मो के गीतों में 'अजब तेरी दुनिया हो मोरे रामा, दो बीघा जमीन 1953, जागो मोहन प्यारे, जागते रहो 1956 आजा रे मै तो कब से खड़ी उस पार, टूटे हुए ख्वाबों ने, मधुमति 1958 अहा रिमझिम के प्यारे प्यारे गीत लिए आई रात सुहानी, उसने कहा था 1960, गोरी बाबुल का घर है अब बिदेशवा,चार दीवारी 1961,चांद रात तुम हो साथ, हॉफ टिकट 1962, ऐ मतवाले दिल जरा झूम ले, पिंजरे के पंछी 1966 जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के गीत शामिल है। गीतकार के अलावा शैलेन्द्र ने नया घर 1953, बूट पालिश 1954,श्री 420 1955, और तीसरी कसम 1966 में अभिनय किया था। इसके अलावे उन्होनें फिल्म परख 1960 के डॉयलाग भी लिखे थे। बतौर निर्माता उन्होंने वर्ष 1966 में फिल्म तीसरी कसम का निर्माण किया लेकिन बॉक्स आफिस पर इसकी 'असफलता के बाद उन्हे गहरा सदमा पहुंचा जिसके बाद उनके मित्रों ने उन्हें किसी प्रकार का सहयोग करने से इंकार कर दिया। अपने मित्रों की बेरूखी और फिल्म तीसरी कसम की असफलता के बाद उन्हें कई बार दिल का दौरा पड़ा।
13 दिसंबर 1966 को अस्पताल जाने के क्रम में उन्होंने राजकपूर को आर के काटेज मे मिलने के लिए बुलाया जहां उन्होंने राजकपूर से उनकी फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत 'जीना यहां मरना यहां 'क ो पूरा करने का वादा किया। लेकिन वह वादा अधूरा रहा और अगले ही दिन 14 दिसंबर 1966 को उनकी मृत्यु हो गई। इसे महज एक संयोग हीं कहा जाएगा कि उसी दिन राजकपूर का जन्मदिन भी था।
प्रेम कुमार

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