बुधवार, 17 मार्च 2010

गहरा संबंध है बच्चे का लोरी से


डॉ. महेश परिमल
गर्भ में रहते हुए अभिमन्यु ने अपने माता-पिता की बातें सुन ली थीं और चक्रव्यूह को भेदने की कला सीख ली थी। यह बात पूरी तरह से सच है। फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का वह सीन तो आपको याद होगा, जब आमिर खान करीना कपूर की गर्भवती बहन के पेट के पास जाकर ‘आल इज वेल’ बोलते हैं, तब शिशु हरकत करता है, इसे गर्भवती शिद्दत से महसूस करती है। बाद में शिशु के जन्म पर जब वह रोता नहीं है, उसकी कोई हरकत नहीं होती, तो एक बार फिर ‘आल इज वेल’ कहने पर उसके पाँव चलने लगते हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि गर्भस्थ शिशु से माता-पिता बातें करें, तो उसे शिशु पूरी तरह से सुनता है। केवल बातें ही नहीं, बल्कि गर्भस्थ भ्रूण संगीत, स्वर, वाद्य और लय को भी महसूस करता है। इसीलिए चिकित्सक कहते हैं कि माता-पिता यदि गर्भस्थ भ्रूण से बातें कर सकते हैं।
इस संबंध में छत्तीसगढ़ राजनांदगाँव के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पुखराज बाफना का कहना है कि जब भ्रूण पर इन सब का इतना अधिक असर होता है, तो निश्चित ही बच्चे पर लोरी का असर तो होता ही है। डॉक्टरों का कहना है कि माँ लोरी के माध्यम से बच्चे पर अच्छे संस्कार के बीज रोप सकती है। लोरी सुनते हुए शिशु को आनंद की अनुभूति होती है। उसके भीतर एक तरह के आनंद रस का प्रवाह होता है। जिससे वह रोमांचित भी होता है। उसके भीतर ग्रहण शक्ति का विकास होता है। गर्भस्थ शिशु से यदि उसके माता-पिता रोज कहें कि हम तुम्हें प्यार करते हैं, इसका असर उस समय शिशु पर अवश्य होगा, यह उसके बड़े होने पर ही पता चलेगा।

डॉक्टरों का यहाँ तक कहना है कि माँ अपने बच्चे को कभी भी अपने से अलग न करे, माँ के साथ रहने से बच्चे को एक अलग ही तरह की प्रशांति का अनुभव होता है। डॉक्टर इसे ञ्जrड्डठ्ठह्न्ह्वद्बद्यद्बह्ल4 कहते हैं। माँ की गर्मी से बच्चे को जो कुछ मिलता है, उसे हम वात्सल्य कह सकते हैं। जिन बच्चों को यह वात्सल्य भरपूर मिलता है, वे अपने जीवन में कुछ अनोखा करते हैं। रही बात लोरी की, तो पुराने जमाने में नींद की गोलियाँ नही होतीं थी, तो माँ थकी-माँदी होने के बाद भी बच्चे को लोरी सुनाती थी। इससे बच्च तो सो ही जाता था, माँ को भी इससे सुकून मिलता था। इसलिए लोरी को माँ से कभी अलग नहीं किया जा सकता। लोरी एक माध्यम है माँ और बच्चे के बीच संवाद का। आजकल की माँएँ बच्चे को भुलावे में रखने के लिए एक चूसनी या निप्पल थमा देती है, जिससे बच्च यह समझता हे कि वह मां का दूध पी रहा है। यह प्रवृत्ति खतरनाक है। उस उम्र में भी बच्चे की समझ विकसित हो चुकी होती है। वह समझ जाता है कि माँ से उसे चूसनी देकर धोखा दिया है। बड़े होने पर वह अपने व्यवहार में इसे बताने की कोशिश करता है, जिसे माँ नहीं समझ पाती।

डॉ. मेहरबान सिंह ने इस दिशा में काफी काम किया है। वे मानते हैं कि जो बच्चे लोरी से वंचित होते हैं, वे माँ के उस वात्सल्य से वंचित होते हैं, जो उसका अधिकार है। आजकल माँएँ इसे नहीं समझना चाहती। आज की पीढ़ी जिस तरह से उच्छृंखल हो रही है, उसके पीछे यह भी एक कारण हो सकता है। बच्च जिसका हकदार है, उसे यदि वह नहीं मिलेगा, तो निश्चित रूप से वह अधिकार न देने वालो के प्रति अपनी बेरुखी दिखाएगा। लोरी बच्चे का अधिकार है, यह उसे मिलनी ही चाहिए। लोरी के साथ थपकी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। थपकी में एक लय होती है, जो लोरी के साथ-साथ चलती है। यह बच्चे को एक गहरा सुकूल देती है। बच्च स्वयं को निरापद समझता है और निश्चिंत होकर सो जाता है। डॉ. सिंह कहते हैं कि कोई भी माँ अपने बच्चे को अपने वात्सल्य से वंचित न करे, मेरी हर माँ से यही प्रार्थना है।
डॉ. महेश परिमल

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साथियो
मैं लोरी पर काम कर रहा हूं, इस दिशा में आप मेरा सहयोग दादादादी, नाना नानीमाँ से सुनी हुई लोरी भेज सकते हैं।लोरी किसी भी भाषा या बोली की हो सकती है। आपका सहयोग मुझे बहुत काम आएगा।
डॉमहेश परिमल

1 टिप्पणी:

  1. dr. saheb, aapka lori par dispech pada. bahut achcha prayas hai lori jaise savendalshil vishay par tarkik tathyaparak avm vicharniya aalekh likhne ke liye....badhai....

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