बुधवार, 16 सितंबर 2009

जलवायु परिवर्तन और भारत का सच


नीरज नैयर
भारत सरकार ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जुड़े पांच अध्ययनों के नतीजे जारी किए हैं, जिनके मुताबिक देश में वर्ष 2031 तक ग्रीनहाउस गैसों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.77 से लेकर 5 टन के बीच हो जाएगा. लेकिन ज्यादा घबराने की बात इसलिए नहीं है क्योंकि यह आंकड़ा दुनिया के प्रति व्यक्ति औसत से काफी कम है. सरकार ने इन अध्ययनों को सार्वजनिक करने का जो वक्त चुना है वह कूटनीतिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि साल के अंत यानी दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होना है और अगर वहां ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने के लिए भावी लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तो भारत रिपोर्ट का हवाला देकर अपना पक्ष मजबूती के साथ रख सकता है. विकसित देश शुरू से ही इस मानसिकता से ग्रस्त हैं कि भारत,चीन आदि विकाशसील देश विकसित बनने की होड़ में पर्यावरण को अत्याधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं. जबकि सच्चाई ये है कि इस समय भारत विश्व के कार्बन उत्सर्जन के केवल चार प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है, वहीं अमेरिका 20 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है. 2005 में दुनिया का प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 4.22 टन था जबकि भारत का औसत 1.2 टन है. इस लिहाज से देखा जाए तो विकसित देशों को सुख-सुविधाओं की कुर्बानी ज्यादा देनी चाहिए मगर वो विकासशील देशों पर दोषारोपड़ करने में अधिक विश्वास रखते हैं. ग्रीन हाउस गैसों के कारण ही पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है जिससे समुद्र का जलस्तर चढ़ रहा है एवं सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं में वृद्धि हो रही है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तानों का विस्तार होता जा रहा है. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी बनी हुई है. वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि आए दिन समुद्र में पैदा होने वाले चक्रवृति तूफान ग्लोबल वार्मिंग की ही देन है. इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में साफ संकेत दिया था कि जलवायु परिवर्तन के चलते तूफानों की विकरालता में वृद्घि होगी. आंकड़ों पर यदि गौर किया जाए तो पता चलता है कि ऐसा बाकायदा हो भी रहा है, 1970 के बाद उत्तरी अटलांटिक में ट्रोपिकल तूफानों में बढ़ोतरी हुई है तथा समुद्र के जलस्तर और सतह के तापमान में भी वृद्घि हो रही है. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र के तापमान में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 100 फीट पर ही तापमान पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक गर्म हो गया है. ग्रीन हाउस गैसों को सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और वाष्प मौजूद रहते है. ये गैसें खतरनाक स्तर से वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इसका नतीजा ये हो रहा है कि ओजोन परत के छेद का दायरा बढ़ता भी जा रहा है. ओजोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह काम करती है. इस कवच के कमजोर पडऩे का मतलब है, पृथ्वी का सूरज की तरह तप जाना. मौजूदा वक्त में ही हालात ये हो चले हैं कि अमूमन ठंडे रहने वाले इलाके भी गर्मी की मार से त्रस्त हैं. जहां कभी झमाझम बारिश हुआ करती थी, आज वहां सूखे जैसे हालात हैं. दरअसल तेजी से होता औद्योगीकरण, जंगलों का तेजी से कम होना, पेट्रोलियम पदार्थों के धुंए से होने वाला प्रदूषण और फ्रिज, एयरकंडीशनर आदि का बढ़ता चलन ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारण हैं. अब यहां जरा तुलनात्मक अध्ययन
किया जाए तो खुद ब खुद स्पष्ट हो जाएगा कि सीएफसी गैसों को उत्सर्जन करने वाले उपकरणों का उपयोग सर्वाधिक कहां होता है. फ्रिज, एयर कंडीशनर और दूसरी कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल भारत की अपेक्षा अमेरिका आदि देशों में ज्यादा होता है. हमारे देश में आज भी कुल आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आर्थिक संपन्नता के उस स्तर तक नहीं पहुंचा है कि जहां एयरकंडीशनर, फ्रिज जैसी वस्तुएं आम होती हैं. जबकि विकसित देशों में लगभग हर दूसरे घर में इन वस्तुओं का प्रयोग होता है, कह सकते हैं कि इनके बिना उनकी जिंदगी चल ही नहीं सकती. हां ये बात अलग है कि अन्य देशों के मुकाबले हमारे यहां दूसरे माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग में योगदान दिया जा रहा है, मसलन कोयले और लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना भारत में बदस्तूर जारी है. हमारे यहां जंगलों को विकास की भेंट चढ़ाने का काम भी पूरे शबाब पर है, लेकिन फिर भी जलवायु परिवर्तन में हमारी हिस्सेदारी का प्रतिशत उतना नहीं है जितना विकसित देशों का है. वाहनों से होने वाले प्रदूषण की बात की जाए तो हमारी तुलना में बड़े देशों में वाहनों की संख्या कहीं गुना ज्यादा है, एक बारगी ये मान भी लिया जाए कि वहां पर्यावरण मानकों का पालन सख्ती से कि या जाता है, फिर भी प्रदूषण फैलाने की संभावनाएं भारत की अपेक्षा वहां अधिक हैं. अमेरिका का तर्क है कि विकसित बनने की होड़ में भारत, चीन जैसे देश पर्यावरण को अंधाधुंध तरीके से नुकसान पहुंचा रहे हैं. उसकी सोच के अनुसार उसका यह तर्क जायज भी हो सकता है लेकिन उसे यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कोई भी देश विकासशील से विकसित बनने की अपनी महत्वकांक्षाओं की बलि नहीं चढ़ा सकता. इस मुद्दे पर बेफिजूल की बयानबाजी और दोषारोपण की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो मिलबैठकर कोई ऐसा प्रारूप तैयार करने की जिस पर आम सहमति से काम किया जा सके, अगर जबरदस्ती किसी पर बोझ लादने की कोशिश की जाएगी तो वह कभी दिल से उस काम में अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाएगा. जहां तक भारत का सवाल है तो वो अब तक जो दलीलें देता आया है वो बिल्कुल ठीक हैं, लेकिन फिर भी उसे एक जिम्मेदार देश होने के नाते अपने स्तर पर किए जा रहे प्रयासों में और तेजी लाने के प्रयास करने होंगे ताकि वह दूसरे के लिए उदाहरण पेश कर सके और आने वाले खतरे को कम कर सके. उसे उद्योगों और खासकर रासायनिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को फिर से उपयोग में लाने लायक बनाने की कोशिश करनी होगी. पेड़ों की कटाई रोकनी होगी और जंगलों के संरक्षण पर भी बल देना होगा. साथ ही अक्षय ऊर्जा के उपायों पर ध्यान देना होगा यानी अगर कोयले से बनने वाली बिजली के बदले पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए तो हवा को गर्म करने वाली गैसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है.
नीरज नैयर

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