रविवार, 18 दिसंबर 2016

कविता - हिमालय और हम - गोपाल सिंह नेपाली

कविता का अंश... गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है । (1) इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही । पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही ।। अंबर में सिर, पाताल चरण मन इसका गंगा का बचपन तन वरण-वरण मुख निरावरण इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है । ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (2) अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती । फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती ।। इन शिखरों की माया ऐसी जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी अमरों को फिर चिंता कैसी ? इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (3) हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है । हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है ।। इसकी छाया में रंग गहरा है देश हरा, प्रदेश हरा हर मौसम है, संदेश भरा इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (4) जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी । है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी ।। कोई क्‍या हमको ललकारे हम कभी न हिंसा से हारे दु:ख देकर हमको क्‍या मारे गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (5) टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं । तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं । जब-जब जनता को विपदा दी तब-तब निकले लाखों गाँधी तलवारों-सी टूटी आँधी इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है। गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है । इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Labels