रविवार, 18 दिसंबर 2016

कविता - शहीद की माँ - हरिवंशराय बच्चन

कविता का अंश... इसी घर से एक दिन शहीद का जनाज़ा निकला था, तिरंगे में लिपटा, हज़ारों की भीड़ में। काँधा देने की होड़ में सैकड़ो के कुर्ते फटे थे, पुट्ठे छिले थे। भारत माता की जय, इंकलाब ज़िन्दाबाद, अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद के नारों में शहीद की माँ का रोदन डूब गया था। उसके आँसुओ की लड़ी फूल, खील, बताशों की झडी में छिप गई थी, जनता चिल्लाई थी- तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा। गली किसी गर्व से दिप गई थी। इसी घर से तीस बरस बाद शहीद की माँ का जनाजा निकला है, तिरंगे में लिपटा नहीं, (क्योंकि वह ख़ास-ख़ास लोगों के लिये विहित है) केवल चार काँधों पर राम नाम सत्य है गोपाल नाम सत्य है के पुराने नारों पर; चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी, जीवन के कष्टों से मुक्त हुई, गली किसी राहत से छुई छुई। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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