मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

खामोशी में दबी सिंहों की अकाल मौतें!

डॉ. महेश परिमल
पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह दु:खभरी खबर है कि ट्रेन के पहियों के नीचे आकर दो गर्भवती सिंहनी की मौत हो गई। खबर अखबार की सुर्खियां बनकर खामोश हो गई। इससे एक बार फिर यह मुद्दा जीवित हो उठा कि गीर के जंगलों में जो सिंह जीवित हैं, उन्हें जिंदा रखने के लिए आखिर क्या उपाय किए जा रहे हैं? सरकार इस बात पर खुश हो जाती है कि गीर  के जंगलों में सिंहों की संख्या लगातार बढ़ रही है, पर सिंहों की बढ़ती संख्या के साथ क्या गीर  के जंगलों का विस्तार हो पाया? विस्तार नहीं होने के कारण ही इस समय ¨सह जंगल से बाहर आकर अपना साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं और मौत के शिकार हो रहे हैं।
देश में जब पहली बार ट्रेन चलनी शुरू हुई, तो काले इंजन से लोग खौफ खाते थे। वह लोगों को दानव की तरह दिखाई देता था। इंजनरूपी यह काला राक्षस किसी को कुचल न दे, इसका अहसास सभी को होता था। जब इंसान उस काले राक्षस से डरता था, तो फिर जानवरों की क्या बिसात? उस समय गीर  के जंगलों से होकर रेल की पांते तो बिछ गई थी, पर ट्रेन चलनी शुरू नहीं हुई थी। पटरी पर प्रेक्टिस के लिए केवल इंजन ही दौड़ता था। ऐसे ही एक बार इंजन के ड्राईवर ने देखा कि एक सिंहनी पटरी पार कर रही है। उसने सिंहनी को बचाने की लाख कोशिशें की, पर सिंहनी आखिर इंजन के पहियों के नीचे आ ही गई। यह उस समय की पहली घटना थी, जब किसी इंजन से किसी सिंहनी की मौत हुई हो। फिर तो ऐसा हुआ कि इन जानवरों को भी वह इंजन अपने बच्चों का हत्यारा लगता। इंजन के पास आने पर वे उसके साथ दौड़ती, कई बार तो इंजन पर चढ़ने की भी कोशिश करती। कुछ दिनों पहले ही राजुला के पास दो गर्भवती सिंहनी रेल की पांतों के नीचे आकर मौत का शिकार हो गई। इससे एक बार फिर सिंहों की सुरक्षा के लिए सरकार चौकस हो गई। दस दुर्घटना के लिए रेल्वे को किसी भी रूप में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वह तो अपनी ही सीमा पर पटरी से होकर ही गुजर रही थी। सिंहनी ही उसके रास्ते पर आ गई। गीर  के ेजंगलों में सिंहों की संख्या लगातार बढ़ रही है, उसके एवज में जंगल का विस्तार नहीं हो पा रहा है। इसलिए सिंह अब इंसानों की बस्ती में आकर रहने लगे हैं। जंगल उन्हें छोटा पड़ने लगा है। एक तरह से सिंह अपनी लक्ष्मण रेखा पार कर रहे हैं। सिंहों को जंगल से बाहर आने से रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है, इस पर स्वयं सरकार ही खामोश है।
गीर  का जंगल एशियाई सिंहों के लिए एकमात्र सुरक्षित स्थान माना जाता है। केवल गीर  के जंगल ही नहीं, बल्कि पूरा सौराष्ट्र ही सिंहों की भूमि है। आशय यही है कि सिंह केवल गीर  के डेढ़ हजार वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल को छोड़कर अब दूसरे स्थानों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने लगे हैं। गीर  के जंगल का इलाका उनके लिए कम पड़ने लगा है। वास्तव में देखा जाए तो सिंह मैदानी इलाकों में रहने वाले प्राणी है। अपनी खुराक के लिए सिंह भटकते रहते हैं। उन्हें जहां अनुकूल स्थान दिखाई देता है, वे वहीं बसना शुरू कर देते हैं। भले ही वह बस्ती इंसानों की ही क्यों न हो? सौराष्ट्र के करीब 1500 गांव हैं। ये गांव गीर  से बाहर होने के बाद भी यहां सिंहों के दीदार होते ही रहते हैं। सिंह यही आकर अपना शिकार करते हैं। 1990 में यहां सिंहों की संख्या 284 थी, जो अब बढ़कर 425 हो गई है। यह भले ही गर्व की बात हो, पर इस हिसाब से जंगल का विस्तार नहीं हुआ हे, यह शर्मनाक है। सरकार ने सिंहों की बस्ती बढ़ने से जितनी उत्साहित है, उतनी उसके क्षेत्र के विस्तार को लेकर नहीं है। गीर  में जितने सिंहों की संख्या बताई जा रही है, उसमें से करीब 150 सिंह जंगल से बाहर ही रह रहे हैं। सुप्रीमकोर्ट ने गीर  से सिंहों को मध्यप्रदेश भेजने का आदेश दिया है। तब से गुजरात सरकार थोड़ी सी सक्रिय दिखाई दे रही है। अब उसका कहना है कि जो सिंह गीर  की सीमा से बाहर चले गए हैं, उनके लिए वैकल्पिक आवास की व्यवस्था की जाएगी। सरकार की यह घोषणा मात्र एक आश्वासन बनकर रह गई। अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं हो पाया है। सिंह भी सरकारी सुविधाओं के मोहताज नहीं है, उन्होंने भी सरकार के आदेश को अनदेखा कर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए अन्य स्थानों को तलाशना शुरू कर दिया है। पर उनकी यह हरकत उनके लिए तो खतरनाक है ही, पर इंसानों के लिए किम खतरनाक नहीं है।
गीर  नेशनल पार्क(राष्ट्रीय उद्यान) 258 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। गीर  अभयारण्य 1412 वर्ग किलोमीटर का है। 411 सिंहों के लिए इतनी जगह बहुत ही कम है। इतनी जगह में केवल 300 सिंह ही रह सकते हैं। इसीलिए शेष सिंह इंसानी बस्ती की ओर रुख करने लगे हैं। सिंहों और इंसानों के बीच संघर्ष के पीछे भी यही कारण है। डार्विन का विकासवाद कहता है, जो जिस स्थान पर अपनी गुजर कर लेता है, वह उस स्थान को अपना ही समझने लगता है। इस दृष्टि से ¨सहों को जंगल से बाहर का वातावरण अच्छा लगने लगा और वे वहीं बसने लगे। यहां आकर वे अपना साम्राज्य स्थापित करने लगे। गीर  के सिंहों से उनका अब कोई वास्ता ही नहीं है। नया स्थान उनके अनुकूल होने के कारण अब उनकी बस्ती भी बढ़ने लगी है। सिंहों की बस्ती बढ़ने से गुजरात सरकार गर्व महसूस कर रही है  और सुप्रीमकोर्ट से तारीख पर तारीख मांग रही है। सरकार यदि वास्तव में सिंहों को बचाना चाहती है, तो उसे स्थान की समस्या को प्राथमिकता के साथ हल करना होगा। जो सिंह जंगल से बाहर हैं, उन क्षेत्रों को भी जंगल की सीमा में ले आए। जहां केवल ¨सह ही रहे, मानव बस्ती को वहां से हटा दिया जाए। यदि अभी इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया, तो संभव है सिंह इंसानी बस्ती में सीधे घुसकर लोगों का शिकार करना शुरू कर दे। अभी इसलिए आवश्यक हे क्योंकि बढ़ते औद्योगिकरण के कारण यह क्षेत्र कहीं उद्योग की चपेट में न आ जाए। सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मान लेना चाहिए। यदि वह कह रही है कि गिर के ¨सहों को मध्यप्रदेश भेज दिया जाए, तो शेरों को मध्यप्रदेश भेज दिया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश जाकर शेरों की वंशवृद्धि ही होगी। इसके लिए श्रेय गुजरात को ही दिया जाएगा। सिंह या शेर या कह लें, बाघ केवल गुजरात की सम्पत्ति नहीं है। उस पर पूरे देश का अधिकार है। भूतकाल में भी गुजरात से सिंह दूसरे राज्यों में भेजे गए हैं। अन्य क्षेत्रों में सिंह नहीं बस पाए, लेकिन गुजरात के गीर में सिंह बस गए और उनकी बस्ती बढ़ने लगी। अब यदि ये दूसरे राज्यों में जाकर अपने लायक माहौल तैयार करें और बस जाएं, तो इसका बुरा क्या है? एक सच्चे पर्यावरणविद की दृष्टि से देखें तो गीर में सिंहों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़े, इसके पहले उन्हें दूसरे राज्यों में भेज देना चाहिए। यदि हम सचमुच ¨सहों को बचाना चाहते हैं, तो सिंह कहां रहकर बच सकते हैं, इससे बड़ा सवाल यह है कि सिंह बचे रहें। इसके लिए उन्हें दूसरे राज्यों में भेजा जाना आवश्यक है। सभी ¨सह तो गीर से बाहर नहीं जा रहे हैं, केवल पांच-सात सिंह मध्यप्रदेश या किसी और राज्य में भेज दिए जाएं, तो इसमें पर्यावरण का ही लाभ होगा। यदि मध्यप्रदेश से एलर्जी है, तो गुजरात में ही ऐसे स्थानों को विकसित किया जाए, जहां ¨सह रह सकते हों। मूल बात सिंहों के बस्ती के विस्तार की है, यदि वह दूसरे राज्यों में भेजकर हो सकती है, तो भेजा जाना कतई बुरा नहीं है। सिंहों को बचाए रखने का इससे बड़ा दूसरा कोई उपाय नहीं है। गुजरात सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। तभी पर्यावरण की रक्षा हो पाएगी।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

शक की सूई धोनी की तरफ

  डॉ महेश परिमल
आईपीएल के लिए खिलाड़ियों की बोली लगना शुरू हो गई है। खिलाड़ी सरेआम बिक रहे। कुछ की बोलियां लगती हैं, कुछ चुपचाप बिक जाते हैं। इसका पता पहले तो नहीं, पर बाद में चल ही जाता है। जब सच्चई सामने आने लगती है, तब पता चलता है कि कौन कितने पानी में है। यह सच है कि आज जिस तरह से क्रिकेट का राजनीतिकरण हो गया है, उसमें कोई भी दूध का धुला नहीं है। मयप्पन की गिरफ्तारी के बाद अब ऊंगलियां भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तरफ उठ रही है। इस मामले में वे भले ही स्वयं को बेदाग बताएं, पर यह भी सच है कि अपराध को छिपाना भी एक अपराध ही है। उन पर आरोप है कि उन्होंने श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन को केवल एक क्रिकेट प्रेमी बताया था। यही नहीं चेन्नई सुपरकिंग की कप्तानी के दौरान राजस्थान रॉयल से हुई मैच को फिक्स करने की जानकारी भी धोनी को थी। इसके बाद भी उन्होंने इसका खुलासा नही किया।
न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला टेस्ट मैच हारकर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्रसिंह धोनी पर एक बड़ी आफत आ पड़ी है। सुप्रीमकोर्ट द्वारा बनाई गई जस्टिस मुकुल मुद्गल समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन  स्पॉट फिक्सिंग के लिए जवाबदार हैं। रिपोर्ट में शंका की सूई महेंद्र सिंह धोनी की तरफ भी है। यदि यह साबित हो ेजाए कि धोनी मैच फिक्सिंग में शामिल थे, तो उनके क्रिकेट कैरियर पर बहुत बड़ा धब्बा लग सकता है। यही नहीं, उनका क्रिकेट जीवन ही खत्म हो जाने का खतरा भी है। कानून के अनुसार चोरी करना अपराध है, पर चोर का साथ देना भी एक अपराध ही है। जस्टिस मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार गुरुनाथ मयप्पन ने झूठ कहा था कि वे चेन्नई सुपर किंग की टीम के मालिक नहीं हैं। इस झूठ में उनका साथ दिया था श्रीनिवासन और महेंद्र सिंह धोनी ने। इन्होंने मयप्पन का बचाव भी किया था।सन 2011 में एक आर्थिक अखबार को दिए गए साक्षात्कार में मयप्पन ने स्वीकार किया था कि हर मैच के शुरू में टीम में खिलाड़ियों के चयन के मामले पर धोनी से उनकी चर्चा होती थी। मयप्पन को धोनी से चेन्नई सुपरकिंग की टीम की रणनीति के बारे में पूरी जानकारी मिलती थी। इस जानकारी का उपयोग वह बिद्दू दारासिंह के माध्यम से सट्टा खेलने के लिए करता था। इससे खूब कमाई भी करता था। सुप्रीमकोर्ट द्वारा रची गई जस्टिस मुद्गल कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में यह चौंकाने वाली जानकारी दी है कि भारतीय टीम में खेलने वाले 6 खिलाड़ी भी स्पॉट फिक्सिंग में शामिल होने की संभावना है। इसमें से एक खिलाड़ी अभी भी टीम में खेल रहा है। यह खिलाड़ी धोनी है, इसकी पूरी संभावना है। मुद्गल कमिटी ने इन खिलाड़ियों की मिलीभगत की गहराई से जांच करने की सिफारिश भी की है। दिल्ली की क्राइम ब्रांच के एसपी संपथ कुमार ने मुद्गल कमेटी को एक चौकाने वाली जानकारी दी है। इस जानकारी के अनुसार सन् 2013 में जब वे एक नकली पासपोर्ट मामले की जांच कर रहे थे, तब कई सट्टेबाजों के सम्पर्क में आए। इनमें से किट्टी नामक एक सट्टेबाज ने उन्हें बताया था कि महेंद्रसिंह धोनी और सुरेश रैना भी उनसे जुड़े हुए हैं। इस सट्टेबाज ने यह भी दावा किया था कि स्पॉट फिक्सिंग घोटाले की जांच कर रहे दिल्ली के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या दाऊद इब्राहिम के भाई अनीस ने करवाई थी।
स्पॉट फिक्सिंग घोटाले में जब मयप्पन के शामिल होने की जानकारी बाहर आई, तब यह भी पता चला कि मयप्पन की विद्दू के साथ पहचान धोनी के मित्र और बिजनेस पार्टनर अरुण पांडे ने करवाई थी। विद्दू और धोनी के बीच भी संबंध धनिष्ठ थे। इसी कारण धोनी की पत्नी साक्षी वीआईपी स्टेंड में विद्दू के साथ बैठकर चेन्नई सुपरकिंग का मैच देखते हुए तस्वीर अखबारों में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह मामला दबा दिया गया था। मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट आने के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 12 मई सन् 2013 को राजस्थान रॉयल और चेन्नई सुपरकिंग के बीच जयपुर में खेले गए मैच का विशेष रूप से विश्लेषण किया गया। जिसमें धोनी की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। जब यह मैच चल रहा था, उस दौरान मयप्पन ने विद्दू से यह गारंटी दी थी कि चेन्नई टीम करीब 130-140 रन बनाएगी। मयप्पन ने इसके अनुसार राजस्थान की जीत पर दांव लगाया था। 12 वे ओवर के शुरू में चेन्नई सुपर किंग का स्कोर एक विकेट पर 85 रन था। इस समय धोनी और रैना क्रिज पर थे। सामान्य रूप यह माना जाता हे कि आईपीएल में 12 वें ओवर के अंत में जो स्कोर होता है, 20वें ओवर तक रन दोगुने हो ेजाते हैं। इस हिसाब से चेन्नई सुपरकिंग का स्कोर 170 होना था। यह देखकर विद्दू चिंता में पड़ गया। उसे मयप्पन से कहा कि ये क्या हो रहा है? मयप्पन ने उसे आश्वासन दिया  कि चिंता मत करो, चेन्नई सुपरकिंग उतने ही रन बनाएगी, जितने मैंने तुम्हें बताएं हैं। आखिर मयप्पन को यह आत्मविश्वास किसने दिलवाया। यह जांच का विषय है। 12 वे ओवर में धोनी और रैना आसान कैच देकर आऊट हो गए। उनका स्कोर धीमा हो गया। इधर मयप्पन दांव जीत गया। इससे यह शंका जाती है कि मयप्पन ने धोनी और रैना का उपयोग कर 12 मई का मैच फिक्स कर दिया था।
मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट में दिल्ली के ज्योतिनगर पुलिस स्टेशन में 1 नवम्बर 1913 को फाइल किए गए एक एफआईआर का उल्लेख किया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि 12 मई का मैच चेन्नई सुपरकिंग के खिलाड़ियों की मदद से फिक्स किया गया था। क्रिकेट को अच्छी तरह से जानने वाला हर कोई कहता है कि टीम के केप्टन या सीनियर खिलाड़ी की मिलीभगत के बिना मैच फिक्स हो ही नहीं सकता। धोनी ने न्यूजीलैंड रवाना होने के लिए मुद्गल कमेटी को दिए गए बयान में कहा था कि मयप्पन केवल एक क्रिकेट प्रेमी है। उसका चेन्नई टीम के साथ कोई लेना-देना नहीं है। धोनेी का यह बयान झूठा था। ऐसा मुद्गल कमेटी का कहना है। धोनी के इस झूठ के पीछे क्या स्वार्थ है? इसके लिए हमें 7 मार्च तक इंतजार करना होगा। इतना तो तय है कि आईपीएल शुरू से ही विवादों में रहा है। खिलाड़ियों की बोली लगने से लेकर मैच फिक्सिंग तक सारे कामों में घोटाला ही घोटाला है। दु:ख तब होता है, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं, वे ही इस घोटाले में शामिल होते दिखाई देते हैं। ऐसे में लोग क्रिकेट को शक की निगाहों से देखना शुरू कर दें, इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
  डॉ महेश परिमल

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

सत्या ने बढ़ाया अमेरिका में भारतीयों का गौरव

डॉ महेश परिमल
सत्या कक्षा 6 से 8 तक मेरा विद्यार्थी था। बहुत ही शिष्ट अैर तेज दिमाग का। दूसरी-तीसरी कतार में ही हमेशा बैठता। पढ़ते वक्त हमेशा लीन। घंटों लायब्रेरी में रहता। उसे केवल तीन विषय ही पसंद थे- गणित गणित और गणित। मैंने उसे कभी शैतानी करते नहीं देखा। क्रिकेट का जबर्दस्त शौक था। बाकी बच्चे बताते थे कि बड़े होकर क्या बनेंगे। पर उसने ऐसा कभी नहीं बताया। हम टीचर्स उसकी लगन को देखकर अंदाजा लगा सकते थे कि वह मन ही मन कुछ बड़ा करने की सोच रहा था। पर इतना बड़ा-इसका अंदाज नहीं था। आज मुझे मेरे शिष्य पर गर्व है। यह शब्द हैं प्रोफेसर जी. जयानंद के, जिन्होंने माइक्रोसाफ्ट के नए सीईओ को बचपन में पढ़ाया था। अब हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि सत्या नदेला हमारे बीच की वह हस्ती हैं, जिन्होंने अमेरिका में भारतीयों का गौरव बढ़ाया है। यही नहीं सत्या को देश के आई टी क्षेत्र ने विश्वफलक पर अपलोड किया है। अपनी नियुक्ति के बाद उन्होंने माइक्रोसाफ्ट को अपना जो पहला मंत्र दिया, वह इस प्रकार है:- लोग परंपराओं का नहीं, अविष्कारों का सम्मान करते हैं। अब सत्या नदेला के सामने चुनौतियों की विंडो खुल गई हैं, पर हम सभी का विश्वास है कि वे इन चुनौतियों का साहसपूर्वक सामना कर सकते हैं, इसलिए उन्हें इतने बड़े पद से नवाजा गया है।
भारत में जब क्रिकेट के चेम्पियन सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न सम्मान दिया जा रहा था, तब विश्व की सर्वोच्च साफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट ने भारतीय मूल के सत्या नदेला को कंपनी के  ‘रत्न’ के रूप में चयन कर उन्हें सीईओ के पद से नवाजा। क्रिकेट में सचिन चेम्पियन हैं, तो सत्या भी क्रिकेट के जबर्दस्त फैन हैं। सत्या की नियुक्ति से भारत के आईटी क्षेत्र का नाम विश्व में ऊंचा हुआ है। हैदराबाद में जन्म लेने वाले और मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियर हुए सत्या नदेला 1992 अमेरिका गए थे। यहां उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। जिन्हें पुस्तकें खरीदने का बहुत शौक है, पर उसे पूरा पढ़ने का समय नहीं है,जो ऑनलाइन कोर्स का फार्म भरते हैं, पर समय के अभाव में कोर्स पूरा नहीं कर पाते, ऐसे सत्या नदेला के पास अब समय की अत्यधिक कमी होगी, यह तय है। अब उनके हाथ में विश्व की सर्वोच्च कंपनी की बागडोर है। वैसे तो वे पिछले 23 वर्षो से ही इस कंपनी से जुड़े हैं, पर कंपनी की कमान अब उनके हाथों में पूरी तरह से अब आई है। पूर्व में भी वे इसी कंपनी के विभिन्न पदों को सुशोभित कर चुके हैं। उनकी क्षमताओं को देखकर ही उन्हें यह पद सौंपा गया है।
सत्या नदेला ने भारत को गौरव प्रदान किया है। 1990 तक माइक्रोसाफ्ट में कोई भी भारतीय मूल का साफ्टवेयर इंजीनियर सीनियर लेबल पर नहीं था, आज आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के साफ्टवेयर क्षेत्र में ट्वीटर पर सत्या नदेला का अभिनंदन किया जा रहा है। नदेला पूरी तरह से योग्य हैं, इसलिए कंपनी के लिए कुछ नया अवश्य करेंगे, ऐसी आशा की जा सकती है। आज कंप्यूटर के क्षेत्र में क्रांति आ गई है। अब पर्सनल कंप्यूटर को लोग भूलने लगे हैं। उसके स्थान पर टेब्लेट और स्मार्टफोन छा गए हैं। इस स्थिति में माइक्रोसाफ्ट को अनेक चुनौतियों का सामना करना है। अमेरिकी आईटी कंपनियों में भारतीयों को देखा जा सकता है। इसके अलावा भारतीय सेप, ओरेकल, गूगल, लींकडीन आदि में भी देखे जा सकते हैं। अमेरिका की सात और केनेडा की चार कंपनियों में मूल भारतीय सीईओ हैं। हैदराबाद में 1967 में जन्मे सत्या नदेला के परिवार में पत्नी और तीन संताने हैं। 22 वर्ष पहले उनकी शादी हुई। माइक्रोसाफ्ट के 39 वर्ष के इतिहास में ऐसा तीसरी बार हुआ है कि सीईओ का चयन स्टाफ में से किया गया हो। पिछले 30 जून तक उनका वेतन 7.67 मिलीयन डॉलर था, सीईओ होने के बाद उनका वेतन भारतीय मुद्रा में 112 करोड़ रुपए होगा।
अमेरिका में भारत के लिए यह कहा जाता है कि भारत के युवा ऊंची डिग्री के साथ इंजीनियर बन सकते हैं, पर मैनेजर बनने की क्षमता उनमें नहीं है। यदि मैनेजर नहीं बन सकते, तो सीईओ बनना तो कदापि संभव नहीं है। पर सत्या ने इस धारणा को झुठलाकर दिखा दिया कि भारतीय चाहें, तो कुछ भी कर सकते हैं। भारतीय की इसी काबिलियत को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार कहा था कि अमेरिकियों काम करो, अन्यथा भारतीय तुम्हें खा जाएंगे। सत्या की नियुक्ति से यह संदेश गया है कि अमेरिका की सर्वोच्च कंपनी भी सीईओ जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए भारतीयों पर विश्वास करती है। अमेरिका में बसने वाले भारतीयों के लिए भी यह गर्व की बात है। आज उसी अमेरिका में अमेरिकी भारतीय आपस में जो ई मेल कर रहे हैं, उसमें यही लिखा जा रहा है कि ‘भारतीय होने का गौरव करो’। एक अंदाज के मुताबिक अमेरिका में 38 प्रतिशत डॉक्टर भारतीय हैं। नासा में 36 प्रतिश्त भारतीय हैं। अमेरिका में बसने वाले भारतीय तीन गुणों को विकसित करने में विश्वास करते हैं, वे गुण हैं भावना, असुरक्षा और उत्तेजना पर काबू करना सीखो। साफ्टवेयर मार्केट में अब भारत का डंका बजने लगा है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि सिलीकॉन वेली में 2005 में विदेशों में जन्म लेने वाले 25 प्रतिशत कंपनियों में बॉस के रूप में नियुक्त थे। 2012 में यह प्रतिशत 33 पार कर चुका था।
विश्व की सर्वोच्च कंपनी का संचालन एक भारतीय करे, इसे माइक्रोसाफ्ट ने कर दिखाया है। यह समाचार पढ़कर भारत में छोटी-छोटी बातों पर मतभेद पैदा करने वाले राजनीतिज्ञों को सुधर जाना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति ने चार साल पहले जो कहा था, वह सच साबित हो रहा है। आज यदि कंप्यूटर की भाषा में कहा जाए, तो माइक्रोसाफ्ट ने सत्या नदेला को सीईओ के रूप अपलोड किया है। उसके साथ ही विश्व फलक पर भारत का आईटी क्षेत्र भी अपलोड हुआ है।
    डॉ महेश परिमल

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

युवाओं को खोखला करता ड्रग्‍स


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

राजनीति के दो अराजक चेहरे

डॉ. महेश परिमल
अराजक कहीं भी किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। जिन्हें अराजक कहा जाता है, उन्हें देश के दुश्मन के रूप में देखा जाता है। पर इस समय देश की राजनीति में दो अराजक चेहरे उभर रहे हैं। पहला चेहरा है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दूसरे हैं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सब कुछ राज ठाकरे। अरविंद केजरीवाल अपने बड़बोलेपन और आम आदमी की छबि को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। आगे बढ़ने के इस रास्ते में जो अवरोध आते हैं, उसका विरोध हर हालत में करते हैं। यह उन्हें न्यायोचित लगता है। कई बार वे संविधान के खिलाफ भी बोलने लगते हैं। दूसरी ओर बाल ठाकरे की छबि से अलग होकर अपना अलग ही चेहरा बनाने वाले राज ठाकरे अपने भाषण में बहुत ही ज्यादा आक्रामक दिखाई देते हैं। झूठे को झूठा कहने में वे कभी संकोच नहीं करते, इस कारण उनका समर्थक वर्ग तेजी से बढ़ रहा है। दोनों ही अराजक चेहरे कानून तोड़ने में संकोच नहीं करते। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार मुक्त देश के नारे के साथ आम आदमी पार्टी तैयार की। देखते ही देखते इस पार्टी ने दिल्ली पर अपना शासन जमा लिया। यही नहीं, इसके बाद सरकारी तंत्र के खिलाफ अपना ही आंदोलन शुरू कर दिया।
राज ठाकरे के पास किसी राज्य में सत्ता नहीं है, पर महाराष्ट्र में उनके पास ऐसे आक्रामक कार्यकर्ता हैं, जो अन्य किसी के पास नहीं है। राज ठाकरे ने जब टोल टैक्स का भुगतान न करने की हुंकार भरी, तब तुरंत ही उनके कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाल लिया। तोड़फोड़ शुरू कर दी। राजनीति में उनकी आक्रामक छवि अन्य दलों के लिए एक चुनौती बन गई। अभी तक कांग्रेस-भाजपा जिन मुद्दों को छूने से भी डरती थी, उन विषयों पर राज ठाकरे खुले आम बोलते थे। उधर आम आदमी पार्टी को शपथ लिए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है कि उनके ही एक साथी विनोद कुमार बिन्नी ने बगावत कर दी। जंतर-मंतर पर उन्होंने अपना धरना कुछ ही घंटों में खत्म भी कर दिया। पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है। उनका मानना है कि ‘आप’ पार्टी बकवास है, जो लोगों को मूर्ख बना रही है। आज पार्टी अपने ही कानून मंत्री सोमनाथ भारती को लेकर कठघरे में आ गई है। मुख्यमंत्री उनका जितना अधिक बचाव कर रहे हैं, वे उतने ही फंसते जा रहे हैं। भारती पर इस्तीफे का दबाव बढ़ता जा रहा है। सोमनाथ भारती के मामले में यह साबित होता है कि एक मंत्री वह भी कानून मंत्री को कानून तोड़ने में किसी तरह का कोई गुरेज नहीं है। वे इस मामले में पुलिस वालों को दोषी बता रहे हैं। शायद उन्हें कानून की सीमा की जानकारी नहीं है।
केजरीवाल और राज ठाकरे दोनों ही आक्रामक हैं। पर ठाकरे केजरीवाल से कहीं अधिक मंजे हुए हैं। अरविंद केजरीवाल राजनीति में नए नवेले हैं, कब क्या कह जाते हैं, इसका उन्हें भान नहीं रहता। उनके कई झूठ सामने आ चुके हैं। अपने वादे पर मुकरते भी लोगों ने उन्हें देखा है। उधर मनसे के कार्यकर्ताओं ने टोल टैक्स नाके पर जिस तरह से तोड़फोड़ की है, उससे राज ठाकरे मुश्किल में पड़ सकते हैं। ठाकरे-केजरीवाल दोनों ही युवा हैं। देश को नई दिशा देने में वे सक्षम हैं। परंतु दोनों ही रॉकेट पालिटिक्स के शिकार हुए हैं। दोनों ही तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं। देश के कानून को तोड़ना उनके लिए एक खेल हो गया है। दोनों ही राजनीति में एक तरह का खेल ही खेल रहे हैं। उद्धव ठाकरे और संजय निरुपम ने जब से सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया है, तब से राज ठाकरे ीाी आक्रामक मूड में दिखने लगे हैं। दिल्ली में बेरीकेट्स तोड़ते हुए केजरीवाल के समर्थक और टोल बूथ तोड़ने वालों में काफी समानता है। ये प्रदर्शनकारी अपने नेता से वरदहस्त पाकर ही इस तरह की आक्रामक हरकतें करते हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के सामने धरना देकर अराजकता पैदा की। ऐसे उग्र आंदोलन के बाद भी उप राज्यपाल उनकी मांगों पर विचार करते हुए आधी मांगें मान ली और धरना खत्म हो गया। आम आदमी पार्टी के बारे में जानेमाने लेखक चेतन भगत ने उन्हें आइटम गर्ल कहकर ‘आप’ की आलोचना की थी। उधर इससे एक कदम आगे बढ़कर शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने अरविंद केजरीवाल की तुलना राखी सावंत से की। अभी गणतंत्र समारोह में जब लोगों ने अरविंद केजरीवाल को वीआईपी सुरक्षा में देखा, तो उसकी भी काफी आलोचना की गई।
राज ठाकरे ने अपनी सीमा तय कर रखी है, वे केवल महराष्ट्र तक ही सीमित हैं। अरविंद केजरीवाल देशभर में फैले हुए हैं। आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती है। अरविंद के खिलाफ विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। आज उनके सामने विनोद कुमार बिन्नी हैं, कल संभव है सोमनाथ भारती की गिरफ्तारी हो, इससे हालात और भी बेकाबू हो जाएंगे। जब से आम आदमी ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाया है, तब से वह अग्निपथ पर ही चल रही है। जिन्होंने ‘आप’ को अपना कीमती वोट दिया है, वह पसोपेश में हैं। अराजकता फैलाने से प्रजा नाराज होती है, इसकी जानकारी इन दोनों नेताओं को नहीं है। प्रजा को आक्रामक नेता अच्छे लगते हें, परंतु उसका अतिरेक किसी को भी पसंद नहीं है। यह उन दोनों को समझ लेना चाहिए कि जब भी कोई नेता कानून अपने हाथ में लेता है, तो उसका राजनीतिक कद छोटा हो जाता है, उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाती है। दोनों की राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रबल है, पर उसे काबू करना नहीं आता। ऐसे में कई बार उन्हें समर्थक मिल जाते हैं,पर कई बार यही समर्थक ही अतिउत्साह में उनके लिए मुश्किलें पैदा कर देते हैं। इतना तो तय है कि ‘आप’ ने एक ओर सादगी की राजनीति का पाठ पढ़ाने की कोशिश की है, वहीं राज ठाकरे यह सीख देते नजर आते हैं कि आक्रामक होकर ही हम अपने अधिकारों को पा सकते हैं। ऐसी बेात नहेीं है कि आक्रामक हुए बिना कुछ भी नहीं मिलेगा, वहीं शाही सादगी दिखाकर भी कोई पहाड़ नहीं तोड़ लेता। लोगों ने पहले अरविंद केजरीवाल की सादगी को सराहा, अब वे उसी सादगी से दूर होते दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर राज ठाकरे यह मानते हैं कि आक्रामक होने से ही सब कुछ पाया जा सकता है। दोनों ही अपनी जगह पर सही हो सकते हैं, पर सही साबित करने के लिए उन्होंने ऐसा कोई उपाय ही नहीं किया। इसलिए जनता उन्हें एक सिरे से ही अमान्य कर देती है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

भ्रष्‍टाचार का अड्डा बनते टोल


आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

भ्रष्टाचार का अड्डा बनते टोल प्लाजा
डॉ. महेश परिमल
हाल ही में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में उत्तेजित भीड़ ने टोल प्लाजा पर आग लगा दी। इसका मुख्य कारण था सरकारी एजेंसियों द्वारा गैरकानूनी रूप से की जानी वाली वसूली। सोचो आखिर इस गैरकानूनी काम में कितनों का सहयोग होगा, जो इस तरह से खुले आम वसूली की जा रही हो और पुलिस तो क्या कोई कार्रवाई करने को तैयार न हो। आज देश का किसी भी हाइवे पर चलें जाएं, उस रास्ते पर कमर तोड़ देने वाले टैक्स वाहन मालिकों की हालत ही खराब करके रख देता है। टैक्स की राशि भी तय नहीं होती, काउंटर पर बैठा व्यक्ति जितनी राशि बोल दे, उतना वाहन मालिक को देना ही होता है। आश्चर्य इस बात का है कि जब वाहन मालिक वाहन खरीदते समय ही सारे टैक्स जिसमें रोड टैक्स भी शामिल है, दे देता हे, तो फिर यह अलग से वसूली क्यों? यदि इस दिशा में गहराई से विचार किया जाए, तो स्पष्ट होगा कि अधिकांश टोल प्लाजाओं में गैरकानूनी रूप से वसूली की जा रही है।
आज से 25 वर्ष पहले देश के किसी भी हाइवे या किसी भी रोड पर किसी भी प्रकार का टोल टैक्स वसूल नहीं किा जाता था। इसके बाद भी नए रास्ते और पुल बनते रहते थे। यही नहीं रास्तों की मरम्मत भी हो जाती थी। आम नागरिकों द्वारा सरकार को हर तरह के टैक्स का भुगतान करने से ही सरकार उस धनराशि का उपयोग रेल्वे, रास्ताओं की मरम्मत आदि के लिए करती है। इसी टैक्स से सरकार विकास की पूरी संरचना तैयार करती आई है। इसके बाद भी पहले सरकार इस तरह के टैक्स वसूल नहीं करती थी। जब से टोल टैक्स वाला काम निजी कंपनियों को दिया गया है, तब से इसमें भ्रष्टाचार फैल गया है। अब तो बिना टोल टैक्स के देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाने की सोच भी नहीं सकते। टोल टैक्स वसूली ठेका निजी कंपनियों को मिलने से इसमें धांधली बढ़ गई है। इसमें होता यह है कि टोल टैक्स की पूरी वसूली के बाद भी टैक्स वसूला जाता है। इसमें किसी प्रकार की नैतिकता निजी कंपनियों को आड़े नहीं आती। एक उदाहरण से ही इसे समझा जा सकता है- अहमदाबाद से मेहसाणा के बीच मार्ग की मरम्मत पर 342 करोड़ रुपए खर्च हुए। यहां पर टोल टैक्स की वसूली शुरू हुई। पिछले वर्ष मार्च महीने तक 391 करोड़ रुपए वसूले जा चुके थे, इसके बाद भी अभी तक वसूली जारी है। वडोदरा से हालोल के बीच हाइवे बनाया गया, जिसकी लागत 170 करोड़ रुपए आई। यहां भी पिछले साल मार्च तक 279 करोड़ रुपए वसूले जा चुके थे। वटामण-तारापुर मार्ग बनाने में  100 करोड़ रुपए खर्च आया, इसके एवज में मार्च तक 116 करोड़ रुए वसूले जा चुके हैं। इन तीन रास्तों पर टोल टैक्स लेने का कोई अधिकार सरकार को नहीं है। ऐसे सभी राज्यों में हो रहा है। जब पूरी राशि वसूली जा चुकी है, उसके बाद भी वसूली करना कहां का अधिकार है। सभी राज्यों के बजट में सड़कों की मरम्मत के लिए अलग से राशि का प्रावधान होता है, उसके बाद भी इस नाम से अलग से टैक्स वसूली क्यों? इस तरह से सरकार स्वयं ही भ्रष्टाचार को पनपने में मदद कर रही है।
निजी कंपनियों द्वारा एक बार टोल टैक्स लेना शुरू किया जाता है, तो फिर वह बंद ही नहीं होता। होना तो यह चाहिए कि मरम्मत की राशि वसूले जाने के बाद बंद कर दिया जाना चाहिए या फिर जैसे-जैसे राशि कम होती जाती है, वैसे-वैसे टैक्स की राशि भी कम की जानी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं पाता। सरकारी संरक्षण में टोल टैक्स की राशि लगातार बढ़ती ही रहती है। मुम्बई-पुणो एक्सप्रेस वे शुरू हुआ था, तब कार वालों से 30 रुपए टैक्स लिया जाता था, जो आज बढ़कर 120 रुपए हो गया है। इस हाइ वे को बनाने में 900 करोड़ रुपए खर्च आया था। अभी तक इस हाइ वे पर 2 हजार करोड़ की टैक्स वसूली हो चुकी है। मुम्बई से नासिक जाने के लिए पहले केवल 70 रुपए ही लिया जाता था, आज यह बढ़कर 220 रुपए से ऊपर पहुंच गया है। मुम्बई से अहमदाबाद जाने के लिए करीब 500 रुपए टोल टैक्स वसूला जाता है। दूसरी ओर टोल नाके पर जो टैक्स वसूला जाता है, उसे रजिस्टर में दिखाया कम जाता है। इसलिए टोल की आवक बहुत ही कम हो जाती है। महराष्ट्र की एक समाज सेवी संस्था ने मुम्बई-पुणो हाइवे से गुजरने वाले वाहनों को एक सप्ताह तक गिनना शुरू किया। इसमें उन्होंने पाया कि इस हाइवे पर 13.20 लाख वाहन गुजरे। पर टोल नाके पर जो आवक दर्ज की गई, वह केवल 25 प्रतिशत ही थी। एजेंसियों को टोल टैक्स लेने का ठेका दिया गया है, तब से इसमें दो नम्बर की कमाई बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होगा, तभी यह इतना पनप रहा है।
महाराष्ट्र कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना और भाजपा के नेताओं का शायद टोल टैक्स की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा मिलता होगा, तभी आज तक इस दिशा में कभी कोई सख्ती कार्रवाई नहीं की गई। जब राज ठाकरे ने नवनिर्माण का गठन किया, तब उसे इस कमाई का हिस्सा नहीं मिला, तो आंदोलन की चेतावनी दी। कुछ दिन बाद आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। सभी समझ गए कि आखिर आंदोलन क्यों स्थगित किया गया? कुछ रसूखदार नेताओं ने अपने मत क्षेत्र में टोल टैक्स खत्म करवा दिया। इसमें शरद पवार ने बारामती में और लातुर में स्व. विलासराव देशमुख और नांदेड़ में अशोक चव्हाण शामिल थे। इन्होंने अपने क्षेत्र में लगने वाले टोल टैक्स को खत्म करवा लिया। लेकिन कोल्हापुर में कोई कद्दावर नेता नहीं होने के कारण नागरिकों को टैक्स का भुगतान करना पड़ता था। हाल ही में शिवसेना ने यहां वसूले जाने वाले टोल टैक्स का विरोध करते हुए आंदोलन छेड़ दिया है। देश के अन्य भागों में भी इसी तरह का आंदोलन छेड़ा जाना चाहिए, ताकि खुलेआम होने वाली वसूली पर अंकुश लगाया जा सके। केंद्र सरकार को भी इस दिशा में ध्यान देकर जिन टोल टैक्स नाकों पर वसूली पूरी हो गई है, वहां वसूली बंद कर देने का फरमान जारी करना चाहिए। इस लोकसभा चुनाव के पहले यदि इस दिशा में सख्त कार्रवाई होती है, तो जनता को लुभाने की दिशा में यह एक अच्छा कदम साबित हो सकता है।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

फिर तो बच जाएंगे कई खूंखार


आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख 

फिर तो बच जाएंगे कई खूंखार
        डॉ. महेश परिमल
सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा प्राप्त 15 कैदियों की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो कारण दिए हैं, वह देश की न्याय व्यवस्था पर ऊंगली उठाता है। कोर्ट ने यह कहा है कि फांसी की सजा में अधिक समय नहीं लगाया जाना चाहिए। यह सच है कि फांसी देने में वक्त नहीं लगाया जाना चाहिए, पर आखिर इतना अधिक समय क्यों लगता है? इस पर भी विचार होना चाहिए। फांसी जैसी गंभीर सजा के लिए भी हमारे यहां कोई टाइम लाइन नहीं है। तारीख पर तारीख के बाद भी बरसों तक मामला लटका रहता है। आखिर मामला लटका क्यों रहता है? इस पर सरकार भले ही जवाब न दे पाए, पर सच तो यह है कि इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ राजनीति का है। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले को भी राजनैतिक दृष्टि से देखा जा रहा है।
दयायाचिका रद्द होने के 14 दिनों बाद फांसी दे देनी चाहिए। सजा देने में देर नहीं होनी चाहिए। इस तर्क के साथ देश की बड़ी अदालत ने फांसी की सजा पाए 15 कैदियों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। ये 15 कैदी और उसके परिजन सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से राहत की सांस ले रहे होंगे। इसके सहारे वे कैदी भी बच जाएंगे, जिन्हें फांसी की सजा मुकर्रर हुई है। पर सच्ची बात यही है कि फांसी की सजा में देर नहीं होनी चाहिए। इसके लिए तयशुदा कानून है या नहीं? यदि है, तो उस पर अमल क्यों नहीं हो रहा है? जिन 15 लोगों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला गया है, इसके आधार पर देविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा भी उम्रकैद में तब्दील हो सकती है। खालिस्तान की मांग को लेकर देविंदर ने कार को बम से उड़ा दिया था। इस बम विस्फोट में 11 लोगों की मौत हो गई थी। यदि भुल्लर को फांसी दी जाती है, तो पंजाब में हिंसा फैलेगी, वैसी ही हिंसा जो अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद कश्मीर में हुई थी। यही कारण है कि भुल्लर की फांसी की सजा को मुल्तवी रखा गया था। सुप्रीमकोर्ट के फैसले को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन लोगों में यही धारणा है कि चुनाव आ रहे हैं, इसलिए भुल्लर की फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया है। इस फैसले से आगामी चुनाव में पंजाब में कांग्रेस को निश्चित रूप से फायद होगा। इसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने में तमिलनाड़ु की राजनीति आड़े आ रही थी।
राजीव गांधी के हत्यारे मुरुगन, संथानम और पेरारिवलन को फांसी की तारीख मुकर्रर हो भी गई थी। वह तारीख थी 9 सितम्बर 2011। यह दिन उनकी जिंदगी का आखिरी दिन था, क्योंकि राष्ट्रपति ने इनकी दया याचिका भी रद्द कर दी थी। फोंसी के दस दिन पहले ही तमिलनाड़ु विधनसभा में ऐसा विधेयक लाया गया, जिसमें तीनों की दया याचिका पर पुनर्विचार करने का प्रावधान था। इस विधेयक के कारण तीनों की सजा को आठ सप्ताह के लिए मुल्तवी कर दी गई। इसके बाद यह मामला आज भी लटका हुआ है। राजीव गांधी की हत्या के 23 वर्ष पहले 21 मई 1991 को पेरुम्बदूर में एक चुनावी सभा में की गई थी। उस समय मानव बम बनी धन्नू ने राजीव गांधी को हार पहनाने के बहाने उन तक पहुंची, धमाका हुआ और राजीव गांधी समेत अनेक लोग मारे गए। इस घटना क्रम को अंजाम दिया लिट्टे ने। आज 23 वर्ष बाद भी इस मामले में न्याय प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है। बल्कि जेल में एक लव स्टोरी सामने आ गई। राजीव गांधी की हत्या के आरोपी मुरुगन और नलिनी ने जेल में रहने के दौरान ही शादी कर ली। इसके बाद नलिनी ने एक बच्ची को जन्म दिया। बच्ची के जन्म के बाद नलिनी ने फांसी की सजा माफ कर उसे उम्रकैद में तब्दील कर दी गई। नलिनी की सजा माफ करने के लिए सोनिया गांधी ने खुद सिफारिश की थी। इतना ही नहीं, किसी को पता न चले, इसलिए प्रियंका गांधी ने जेल में नलिनी से मुलाकात की।
राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी की सजा देने के फैसले को सुप्रीमकोर्ट ने भी मंजूर किया। इसके बाद राष्ट्रपति के पास इनकी दया याचिका पहुंची। इस याचिका  राष्ट्रपति भवन में पूरे 11 वर्ष तक दबाए रखा गया। यदि इस पर विचार हो जाता, तो उसके 14 दिन बाद फांसी की सजा दे दी जाती। यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर राष्ट्रपति भवन में दया याचिका को कितने समय तक लम्बित रखा जा सकता है? अभी भी वहां न जाने कितनी दया याचिकाएं पड़ी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार है। राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने में भी राजनीति ही आड़े आ रही है। अब इन्हें भी फांसी की सजा से मुक्ति मिल जाएगी। इसके पीछे यही राजनीति है कि इससे कांग्रेस को तमिलनाड़ु में फायदा होगा। वहां कांग्रेस करुणानिधि की डीएमके के साथ अब तक चुनाव लड़ती आ रही है। श्रीलंका के मामले पर डीएमके ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। अब वहां  मुख्यमंत्री जयललिता की पार्टी एआईडीएमके, करुणानिधि की डीएमके और कांग्रेस के बीच टक्कर होगी। राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी दी जाती है, तो तमिल नाराज हो जाएंगे, इससे कांग्रेस की हार होगी। यही कारण है कि हमारे देश में फांसी की सजा पर भी राजनीति होती है और मामले लटक जाते हैं। आज भी 400 लोग अभी भी सजा का इंतजार कर रहे हैं। 2001 से 2012 तक 1560 लोगों को फांसी दी जा चुकी है। इनमें से 395 उत्तर प्रदेश के हैं, 144 बिहार और 106 लोग तमिलनाड़ु से हैं।
हमारे देश में आखिरी बार 9 फरवरी 2013 को संसद पर हमला करने के आरोप में अफजल गुरु को दी गई थी। इसके पहले 21 नवम्बर 2012 को मुम्बई पर हमला करने वाले एकमात्र जीवित आरोपी अजमल कसाब को फांसी दी गई थी। अगस्त 2004 में कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी की सजा दी गई थी, उस पर एक युवती से बलात्कार के बाद हत्या का आरोप था। पिछले आठ वर्षो में कई अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई है, इन सबका क्या होगा? क्या इन्हें फांसी होगी? यह सवाल आज भी सबके सामने खड़ा है। अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि मानसिक रूप से अस्वस्थ गुनाहगार को फांसी देना उचित नहीं। हकीकत यह है कि फांसी की सजा सुनने के बाद ही व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। यदि उसमें विलम्ब हुआ, तो वह बुरी तरह से अवसाद से घिर जाता है। उसे हमेशा फांसी का फंदा ही दिखाई देता है। जिन 15 लोगों की फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील हुई है, उन्होंने मौत के साये में अपने दिन गुजारे हैं। तारीख तय होने के बाद अंतिम क्षणों में फांसी की सजा के कुछ समय पहले सजा न होने देने के मामले केवल हमारे देश में ही देखने में आते हैं। आखिर एक गुनाहगार को कब तक ऐसे ही बिना निर्णय के जेल की सलाखों के पीछे रखा जाएगा? गुनाहगारों को यदि इसी तरह न्याय प्रक्रिया की लापरवाही या राजनीति के कारण बचाया जाता रहा, तो अपराध कम तो होंगे ही नहीं। इसमें और भी इजाफा होगा। अपराधी से अपराधी की तरह ही निपटना चाहिए, इसमें यदि राजनीति का समावेश हो जाता है, तो इससे देश का कानू ही शर्मिदा होता है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 22 जनवरी 2014

खत्‍म हुआ हाइप्रोफाइल ड्रामा

डॉ. महेश परिमल
दिल्‍ली में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा किया गया हाइप्रोफाइल ड्रामा खत्‍म हो गया। दो पुलिसकर्मियों को अवकाश पर भेजने के बाद मुख्‍यमंत्री मान गए। वे यह अच्‍छी तरह से समझ गए थे कि उनके इस आंदोलन को जनसमर्थन नहीं मिल रहा है, इसलिए उन्‍हें अपना नाटक तो खत्‍म करना ही था। कुल मिलाकर  इस ड्रामे में अरविंद, अहंकार और आप का हाइप्रोफाइल रूप ही दिखाई दिया। ‘आप’ इस समय एक ऐसे वाहन पर सवार है, जिसमें ब्रेक है ही नहीं। बहाव के विरुद्ध चलने का नारा देने वाले अरविंद केजरीवाल इस समय अपनी सरकार सड़क से ही चला रहे हैं। उनका यह ड्रामा टीवी पर लोग देख ही रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस खामोश बैठी है। वह भी अरविंद केजरीवाल के खिलाफ सड़क पर उतरकर नारेबाजी कर रही है। ऐसे में यह कैसे विश्वास किया जाए कि सब कुछ ठीक चल रहा है। अब अरविंद केजरीवाल ने नया शिगूफा छोड़ा है कि गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को सोने नहीं दूंगा। क्या यह अच्छी स्थिति है? दिल्ली वाले अब यही सोच रहे होंगे कि जिसे सब कुछ समझा, वह किसी काम का नहीं रहा। कांग्रेस की स्थिति ऐसी है कि न तो वह समर्थन वापस ले सकती है और न ही केजरीवाल सरकार का साथ दे सकती है। लेकिन कहा तो यही जा सकता है कि केजरीवाल शासन का काउंटडाउन शुरू हो गया है, क्योंकि संघर्ष को उन्होंने स्वयं ही आमंत्रित किया है। दिल्ली में एक ही सड़क पर केजरीवाल जिंदाबाद और केजरीवाल मुर्दाबाद के नारे एक साथ सुनाई भी पड़ रहे हैं।
कांग्रेस की लाचारी प्रजा के सामने दिखाई दे रही है। ‘आप’ लगातार कांग्रेस के खिलाफ जहर उगल रही है, कांग्रेस कु़छ नहीं कर पा रही है। दूसरी तरफ लगता है कि ‘आप’ कांग्रेस को यह बताना चाहती है कि हमें समर्थन देकर आपने कितनी बड़ी गलती की है, यह हम बताना चाहते हैं। हम ऐसे हालात पैदा करेंगे, जिससे आपको समर्थन देने की भूल समझ में आएगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह मांग कर रहे हैं कि पुलिस तंत्र पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण होना चाहिए। यह एक हद तक सही मांग हो सकती है। पर जिस तरीके से वह इस मांग को मनवाने की कोशिश कर रहे हैं, वह तरीका गलत है। क्या उन तीन पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड करने या उनका तबादला करने की मांग को लेकर सड़क पर उतरने के  पहले उन्होंने दिल्लीवासियों से पूछा था? आज दिल्ली में अराजकता की स्थिति है। ऐसे में मुख्यमंत्री स्वयं कह रहे हैं कि हां मैं अराजक हूं। उन्होंने खुले आम धारा 144 का उल्लंघन किया है। उनके सामने तीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई आवश्यक है या 26 जनवरी की तैयारी। वे आज केंद्र सरकार के खिलाफ खुलकर सड़क पर आ गए हैं। इससे आम आदमी को कितनी परेशानी हो रही है, इसे समझने की कोशिश की है कभी उन्होंने? केजरीवाल के तमाम आक्षेपों के सामने कांग्रेस ने अपना मुंह सील लिया है। केवल एक ही नेता ने यह कहने की हिम्मत जुटाई कि केजरीवाल सरकार का काउंट डाउन शुरू हो गया है।
भारतीय राजनीति में जिस तरह से आम आदमी पार्टी आगे बढ़ रही है, उसे देखकर लगता है कि इसके नेता एक बिना ब्रेक की गाड़ी पर सवार हैं। दिल्ली में आप पार्टी भारतीय राजनीति का समीकरण बदल देगी, ऐसा समझा जाता था। पर यह नई नवेली पार्टी अपने ही चक्रव्यूह में फंस गई है। इस पार्टी के नेताओं का अहंकार और दंभ से भरा चेहरा अब दिल्लीवासियों ने देख लिया है। यह चेहरा कितना कुरूप होगा, यह तो समय ही बताएगा, पर अभी से ही यह चेहरा इतना वीभत्स है कि लोग को अपनी सोच पर ही हैरानी हो रही है। दिल्ली की प्रजा विभाजित हो गई है, एक तरफ वह पुलिस के अत्याचार से पीड़ित है, तो दूसरी तरफ पुलिस तंत्र को नियंत्रण में रखना भी चाहती है। अपने बड़बोलेपन के कारण आज केजरीवाल भले ही आम आदमी के हितों की बात कर रहे हों, पर सच तो यह है कि जिस मीडिया ने उन्हें ऊपर चढ़ाया, वही उसे उतारने में भी कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जिस तरह से अनुपम खेर का ‘आप’ से मोहभंग होने में बीस दिन भी नहीं लगे, उसी तरह दिल्लीवासियों का मोहभंग होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। वे अपना आंदोलन दस दिनों तक चलाए रखने की बात कर रहे हैं, पर इस दौरान 26 जनवरी की तैयारी भी होनी है, तो उस स्थिति में क्या मुख्यमंत्री एक राष्ट्रीय समारोह में बाधक नहीं बनेंगे। अपनी आक्रामकता का तरीका उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन शायद वे आम आदमी की पीड़ा को समझ नहीं पा रहे हैं। आखिर वे अपनी किस नीति के तहत ऐसा कर रहे हैं, यह शायद किसी को नहीं पता। कांग्रेस लाचार है, वह उसकी लाचारगी का पूरा फायदा उठा रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो अरविंद केजरीवाल एक ऐसे शख्स बन जाएंगे, जो आम आदमी की लड़ाई लड़ते-लड़ते इतने खास हो गए कि न वे आम रहे न ही खास।
केजरीवाल से यह पूछा जाना चाहिए कि पूरी दिल्ली को जाम करके, ट्रैफिक को अव्यवस्थित करके वे जनता में क्या संदेश देना चाहते हैं? देश के हर नागरिक को अपनी मांगों को रखने और आवाज उठाने के लिए लोकतंत्र में अधिकार है और अहिंसक धरना-प्रदर्शन उसका एक कारगर तरीका रहा है। क्या उन्हें यह पता नहीं कि इसके पहले उन्होंने जो भी आंदोलन या धरना प्रदर्शन किया, उसके लिए दिल्ली में निर्धारित स्थान पर ही किया। जब ऐसे कामों के लिए बाकायदा स्थान हैं, तो फिर वे ऐसे स्थान पर क्यों धरना दे रहे हैं, जहां से आम आदमी की दिक्कतें कम होने के बजाए बढ़ें। उनको ध्यान रखना चाहिए कि इससे अराजकता फैल सकती है। ऐसा होता है वे यह समझ लें कि जिस जनता ने उन्हें सर आंखों चढ़ाया है, वही उसे अपनी नजरों से गिराने में देर नहीं करेगी।
भारत में लोकतंत्र है और इस तंत्र के अपने कुछ कायदे-कानून हैं। उन्हें समझना होगा कि शासन उस तरह से नहीं चलता जैसे वह और उनके साथी चलाना चाह रहे हैं। माना कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथी तंत्र बदलने के लिए बेचैन हैं, लेकिन यह एक ऐसा काम नहीं जो रातों-रात हो सके। तथ्य यह भी है कि व्यवस्था बदलने का एक मात्र तरीका आंदोलन करना भी नहीं है। मुश्किल यह है कि केजरीवाल जिस तरह कांग्रेस को सबक सिखाने की बातें कर रहे हैं, उन्हें देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में कोई समझ-बूझ कायम हो सकेगी। स्थितियां और बिगड़ें, इसके पहले दोनों पक्षों में कोई सार्थक संवाद समय की मांग है, ताकि समस्याओं का हल निकले।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 20 जनवरी 2014

‘आप’ तो ऐसे न थे



 आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख 


शनिवार, 18 जनवरी 2014

‘आप’ तो ऐसे न थे

डॉ. महेश परिमल
कहा गया है कि जो जितनी तेजी से ऊपर चढ़ता है, वह उससे भी तेजी से फिसलता भी है। ‘आप’  के साथ ऐसा ही हो रहा है। इस पार्टी ने जितनी तेजी से लोकप्रियता पाई, उससे दोगुनी तेजी से अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। लोगों ने काफी उम्मीदें लगा रखी थी, इस नए-नवेले दल से। पर उनकी उम्मीदें टूटने लगी हैं। ‘आप’  में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उससे यही लगता है कि आगामी 6 महीनों में यह पार्टी टूटकर बुरी तरह से बिखर जाएगी। रोज-रोज नए-नए नाटक इस पार्टी में होने लगे हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही का आरोप लगाया जा रहा है, वह भी उन्हीं के एक विधायक द्वारा। यह सोचने की बात है। दूसरी ओर इस पार्टी का एक और मुखौटा उतरने लगा है, जिसमें यह कहा गया था कि आगामी लोकसभा चुनावों में जो प्रत्याशी होंगे, उसके लिए पहले जनता से पूछा जाएगा। जनाधार वाले नेताओं को ही ‘आप’ का टिकट दिया जाएगा। लेकिन कुमार विश्वास अमेठी से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है, संजय सिंह, गोपाल राय जैसे नेता जिस तरह से विशिष्ट संसदीय क्षेत्रों में सक्रिय हो गए हैं, उससे यही लगता है कि यह पार्टी जो कहती है, वैसा कर नहीं पा रही है। लगातार एक के बाद एक झूठ सामने आ रहा है। दल की अंदरूनी लड़ाई अब सड़कों पर आ गई है। इससे ‘आप’ से जुड़ी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कहा है कि पिछले 20 दिनों में उन्होंने जिस तरह से ‘आप’ को देखा, उससे उनका मोहभंग हो गया है। यह शुरुआत है। अभी कई और मोहभंग होने बाकी हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने बंगले के बारे में झूठ बोला। फिर वे अपने ही लोगों को इस बात के लिए राजी नहीं कर पाए कि वे जो कुछ भी बोलें, संभलकर बोलें। एक तरफ उनके वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण कश्मीर पर कुछ भी बोलते रहते हैं। बाद में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि ये उनके निजी विचार हैं। पार्टी से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यदि इस तरह से हर कोई अपना विचार मीडिया के सामने प्रकट करे, तो फिर वह कैसे उनका निजी विचार हो जाएगा? दिल्ली विधानसभा की लक्ष्मीनगर सीट से निर्वाचित विनोद कुमार बिन्नी ने जिस तरह से मुख्यमंत्री पर तानाशाह होने का आरोप लगाया है, इसके लिए जो तर्क दिए गए हैं, वह दमदार है। इस पर बिन्नी पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया है। यदि बिन्नी भाजपा की भाषा बोल रहे हैं, तो फिर यह भी तय करना होगा कि मुख्यमंत्री किसकी भाषा बोल रहे हैं। राजनीतिक अनुभवहीनता और बड़बोलेपन के कारण अरविंद केजरीवाल अपने ही बयानों से लगातार विवादास्पद होते जा रहे हैं। अब उनके निशाने पर दिल्ली पुलिस है। उनकी दृष्टि में हर कोई नकारा है, तो फिर सही कौन है, इसे वे भी नहीं जानते। यही हाल रहा, तो लोकसभा चुनाव का रास्ता ‘आप’ के लिए बारुदी सुरंग से भरा होगा। जब तक यह पार्टी वैचारित दृष्टि से पुख्ता नहीं होगी, तब तक ऐसे हालात सामने आते ही रहेंगे।
इस समय ‘आप’ विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है। देशभर में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। पूरे देश में आम आदमी पार्टी की ही चर्चा है। लोग इसमें शामिल होने के लिए लालायित हैं। गुजरात में मल्लिका साराभाई का इस पार्टी से जुड़ना भी एक घटना है। नर्मदा बचाओ अभियान से अपनी साफ छवि बनाने वाली मेघा पाटकर भी इससे जुड़ने को बेताब है। बिहार में लालू मंत्रिमंडल से भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए गए हंसराज नाइन ने भी इस दल से जुड़ने की घोषणा की है। इस तरह से ये सभी एक उद्देश्य के साथ इस दल से जुड़ रहे हैं। इन लोगों में राजनीति में व्याप्त कुरीतियों को हटाने का जज्बा है। नए राजनीतिक समीकरण गढ़ने का माद्दा है। सभी ने एक नया इतिहास बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, तो केवल ‘आप’ के ही भरोसा। पर अब यह भरोसा टूटता जा रहा है। आम आदमी पार्टी के मुख्यालय में तोड़फोड़ हो, केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री ने भ्रष्टाचार किया है या नहीं, बिन्नी-टीना शर्मा जैसे लोग खुलेआम पार्टी पर आरोप लगाते रहे, प्रशांत भूषण के बयानों को सीधे अरविंद केजरीवाल से जोड़ दिया जाए, केजरीवाल के पूर्वज मुस्लिम होने की अफवाह सामने आने लगे, इन सब बातों से यही लगता है कि केजरीवाल में दम तो है, पर वे जो करना चाहते हैं, कर नहीं पा रहे हैं। उन्हें अपनों का ही सहयोग नहीं मिल पा रहा है। उन पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। इसके बाद भी उनके प्रति लोगों में सहानुभूति नहीं है।
आज यह कहा जा रहा है कि केजरीवाल राजनीति में नए हैं। पर वे पिछले सात साल से राजनीति को देख तो रहे ही हैं, परख रहे हैं। ‘आप’  का गठन करते वक्त उन्होंने यह विश्वास दिलाया था कि उनकी पार्टी का ढांचा लोकतांत्रिक और पारदर्शी होगा। पार्टी सादगी का प्रतिरूप होगी। पर ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। उनके सारे वादे हवा में ही रह गए। अब तो यही कहा जा रहा है कि वे नई राजनीतिक व्यवस्था देने के पहले अपना ही घर देख लें। पहले खुद के घर को व्यवस्थित कर लें, फिर नई राजनैतिक व्यवस्था देने की बात करें। ‘आप’  से लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं, उसे इतनी जल्दी टूटने नहीं देना चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो भविष्य में कोई भी सकारात्मक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन खड़ा नहीं हो पाएगा। जनता के किस विश्वास से ‘आप’  को इतना सबल बनाया कि वह सत्ता पर काबिज हो सके। आज यदि ‘आप’  सत्ता पर काबिज हो गई है, तो अपनी अंदरुनी लड़ाई को ही नहीं थाम पा रही है। इससे अवसरवादी राजनीति को बल मिलता है। इसलिए यदि ‘आप’ से उम्मीदें हैं, तो उसे पूरी करना उसकी जवाबदारी है, अन्यथा लोग तो यही कहेंगे कि ‘आप’ तो ऐसे न थे।
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

समय के साथ हुआ चुनाव प्रचार भी हाइटेक

डॉ. महेश परिमल
पहले चुनाव आते ही शहर की गलियों में लिखा हुआ मिल जाता था कि आपके क्षेत्र से अमुक व्यक्ति अमुक पार्टी से प्रत्याशी हैं, आप उन्हें वोट दें। उसी के बाजू में उससे भी बड़े अक्षरों में प्रतिद्वंद्वी पार्टी के प्रत्याशी के बारे में लिखा हुआ था। यह प्रचार य़द्ध गलियों से शुरू होकर आम सभाओं के आयोजन से होते हुए कानफाड़ शोर पर खत्म होता था। मतदान के एक दिन पहले लोग राहत की सांस लेते थे। लेकिन इस बार पूरी फजां ही बदली हुई थी। न तो गलियां रंगी गई,  न आम सभा और न ही कानफाड़ शोर से लोगों को जूझना पड़ा। समय अपनी गति पर चलता रहा। इस बीच चुनाव में नए-नए हथकंडे अपनाए जाने लगे। लोगों को घर-बैठे ही जानकारी मिल जाती थी कि किस क्षेत्र से किस दल का प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहा है। अब तो लोग प्रत्याशी का पूरा जीवन वृत्त घर बैठे निकाल लेते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि अब चुनाव भी हाइटेक होने लगे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है कि अब समय बदल रहा है। इसलिए चुनाव प्रचार के तरीके भी बदल रहे हैं। वैसे भी लोग परंपरागत दलों से बोर हो गए थे। इन सारे दलों की एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। फिर भी जमे हुए हैं, इसलिए जनता ने बदलाव को ध्यान में रखकर इस बार दिल्ली में एक महान परिवर्तन किया है। उसे अब नहीं चाहिए ऐशो आराम में पलने वाले नेता। उसे तो चाहिए अपने ही बीच को कोई आदमी, जो हमारी समस्याओं को समझे और उसे दूर करे। बस जनता यही तो चाहती है, जो अब तक अंगद के पांव की तरह जमे दल नहीं कर पा रहे हैं, उसे नए-नए आए लोग दूर करने में लगे हैं। फिर भी लोग उन्हें काम करने नहीं दे रहे हैं। अब यही कहा जा सकता है कि नए परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है।
राजनीति में बदलाव के दावे के साथ दिल्ली जैसी प्रतिष्ठित राज्य की सत्ता पर ‘आप’ काबिज हो गई। यह पार्टी आखिर कब तक राजनीति में बदलाव कर पाएगी, यह तो समय बताएगा। परन्तु अभी तो यह स्वीकारना ही होगा कि यह पार्टी शिक्षित और गेरअनुभवी लोगों की पार्टी है। इसके कार्यकर्ता पार्टी के प्रति इतने अधिक समर्पित हैं कि इन्होंने दिल्ली में अन्य दलों के पेशेवर राजनीतिज्ञों पर भी भारी पड़े। सोशल मीडिया, मोबाइल एप्लीकेशन, चेट साइट्स  का इस चुनाव में व्यापक इस्तेमाल किया गया। इसका उपयोग असरकारक सिद्ध हुआ। इसके बाद अब लोकसभा चुनाव में ‘आप’ अपने इसी अनुभव का भरपूर उपयोग करेगी। इसके उपयोग से कम से कम समय में प्रजा को अपनी सही स्थिति बता दी जाती है। यही नहीं, इसके द्वारा प्रजा के विचारों को भी जानने का मौका मिल जाता है। ‘आप’ को सत्ता में पहुंचाने में सबसे बड़ी मददगार उनकी सादगी ही रही है। पर इसी सादगी का भूत धीरे-धीरे उतर रहा है। ऐसा माना जा रहा है। आए दिनों ‘आप’ में जो कुछ भी हो रहा है, उससे यही साबित होता है कि इसे भी अन्य पार्टियों का रंग चढ़ जाएगा। फिर भी इस पर अन्य दलों की अपेक्षा अधिक विश्वास किया जा सकता है। आज अरविंद केजरीवाल के पास अपना एक साधारण चेहरा है। इके अलावा स्ट्रेटेजी मेकिंग थिंक टैंक भी है। इसी थिंक टैंक द्वारा बताए गए रास्ते पर चलकर ‘आप’ अपना तंत्र स्थापित कर रही है।
अरविंद केजरीवाल मूल रूप से नए-नए आइडिया वाले व्यक्ति हैं। उनके पास कई आइडिए हैं। जनलोकपाल आंदोलन से ही केजरीवाल अपने मुद्दों को जनता के सामने ले जाने में कम्युनिकेशन के माहिर खिलाड़ी साबित हुए हैं। केजरीवाल को इस तरह के मुद्दे बताने वाले उनके अभिन्न सहयोगी योगेंद्र यादव हैं। जो इन मुद्दों का पूरी तरह से अध्ययन कर उनका डाटा तैयार करते हैं। नब्बे के दशक में भारत में पहली बार चुनाव शास्त्र के लिए सेफोलॉजी शब्द का इस्तेमाल हुआ। इस शब्द के प्रणोता हैं योगेंद्र यादव। जानकारी और उसके विश्लेषण में माहिर यादव के डेटा लोगों पर सीधी असर करते हैं। इन मुद्दाओं पर विविध राजनैतिक दल क्या सोचते हैं, इस पर उनके क्या विचार हैं, इसकी पूरी जानकारी जुटाते हैं, इस पर क्या-क्या कानूनी पेचीदगियां आ सकती हैं, उसके बारे में प्रशांत भूषण अपनी तैयारी करते हैं। इसके बाद सब मिलकर सामूहिक रूप से रणनीति तय करते हैं। इसके बाद एक तयशुदा लोकमत को जगाने के लिए आम आदमी पार्टी का प्रचार तंत्र काम पर लग जाता है। आधुनिक संसाधनों के माध्यम से प्रचार तंत्र का काम संभालते हैं अंकित लाल। आईटी इंजीनियर अंकित 27 साल के हैं। पिछले चार वर्षो से केजरीवाल के साथ काम करते हुए अब वे राजनीति में इतने पारंगत हो चुके हैं कि राजनीति के किसी भी दिग्गज के साथ राष्ट्रीय समस्या पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रचारतंत्र की सफलता के बाद आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार की जवाबदारी अंकित लाल को ही सौंपी गई है। दिल्ली स्थित आम आदमी पार्टी की आफिस में एक छोटा सा कमरा है, जो अंकित का कंट्रोल रूम है। इस कथित कंट्रोल रूम में चारों तरफ तारों का संजाल बिखरा पड़ा है। एक बेंच पर 15 लेपटॉप, 6-7 टेबलेट और इतने ही मोबाइल का जमावड़ा है। हर कोना केबल के वायरों से सराबोर है। यूएसबी पोर्ट जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। 22 से 25 वर्ष के युवा इन यंत्रों में दिन-रात काम करते रहते हैं। या कहें सारी स्थितियों से अपडेट होते रहते हैं। यदि आम आदमी पार्टी को पूरे देश में पहचान मिली है,तो इसी कंट्रोल रूम में काम करने वाले युवाओं की बदौलत। केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने  पर इसी माध्यम से पार्टी का हाइटेक प्रचार किया जा रहा है। आज आम आदमी सुदूर गांवों तक अपनी पहुंच बनाने का श्रेय इन्हीं युवाओं को दिया जा सकता है। आज यही युवा अब बड़े कैनवास के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारी में है, ताकि गांव-गांव के मतदाताओं को अपनी सादगी से रिझाया जा सके।
लोकसभा चुनाव सुदूर गांव तक लड़े जाते हैं, यह सच है, पर इंटरनेट का व्यापक इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस समय करीब 7 करोड़ भारतीय इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें हर माह पौने दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है। इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले भारतीयों में से 77 प्रतिशत मेट्रो, मेगा सिटी और बी क्लास टाउन हैं। 14 प्रतिशत लोग सी क्लास विलिजेस और 9 प्रतिशत उपयोगकर्ता सुदूर गांवा के लोग हैं। इंटरनेट का उपयोग करने वालों में से से 25 प्रतिशत फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के साथ और 21 प्रतिशत वाट्सअप, बीबीएम जैसी चेट एप्लीकेशन्स के साथ जुड़े हैं। चेट एप्लीकेशन्स इतनी तेजी से पसर रहा है कि आगामी कुछ ही महीनों में यह फेसबुक दूसरे नम्बर पर आ जाएगा। चुनाव प्रचार का सीधा सा अर्थ यही है कि लोगों से संवाद। आम आदमी पार्टी इस मामले में अन्य दलों की अपेक्षा अधिक आक्रामक है। भाजपा ने भी इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए एक साथ कई शहरों में आम सभाओं को संबोधित करने की दिशा में काम हुआ है। कांग्रेस इस दिशा में बिलकुल ही फिसड्डी है। इसलिए उसका परिणाम भुगत रही है। वह आज तक जमीन से जुड़ नहीं पाई है। लोकसभा की कुल 542 सीटें हैं। इनमें से महानगर, शहर और अर्ध शहरी क्षेत्रों में 250-260 ही सीटें हैं। मुम्बई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता इन चार महानगरों की सीटें केवल 23 हैं। इसके अलावा अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलोर, चंडीगढ़, पुणो, भुवनेश्वर, पटना, जयपुर जैसे शहरों की सीटों की संख्या 41 है। सूरत, राजकोट, नासिक, नागपुर, इंदौर, अमृतसर जैसे शहरों के बाहरी क्षेत्रों की सीटों की संख्या 58 है। यदि पूरे शहरी क्षेत्रों को इसमें समा लिया जाए, तो सीटों की संख्या 100 का आंकड़ा पार करती है।
शहरी मतदाता का रुझान विकास की तरफ ही होता है। शहरी मतदाता जाति-पांति के कारकों से दूर रहते हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया की व्यापकता के कारण अब मतदान के प्रति लोगों का रुझान बढ़ता दिखाई दे रहा है। अभी तक का सिनेरियो यह था कि शहरी मध्यम वर्ग, शिक्षित युवाओं और महिलाओं का अधिकांश भाग का झुकाव भाजपा की ओर था। पर आम आदमी पार्टी के उदय उसकी कार्यशैली से लोगों का रुझान इस पार्टी की ओर बढ़ा है। अभी एक सर्वेक्षण में भी कहा गया है कि इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी। ‘आप’ सभी दलों पर हावी रहेगी। वह अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाएगी। अब तक यह माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश, ओडिशा,बिहार जैसे राज्य ही प्रधानमंत्री तय करते हैं। अब यह स्थिति भी बदल रही है। दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण राज्य पर काबिज होकर ‘आप’ ने यह बता दिया है कि लोग अब उसे नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। इसलिए वह भी कमर कसकर लोकसभा चुनाव में अपने तेवर दिखाएगी।
कांग्रेस 17 जनवरी की बैठक में  राहुल गांधी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर सकती है। भाजपा ने पहले ही अपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घोषित कर ही दिया है। देश का प्रधानमंत्री कौन होगा, इस पर कांग्रेस में ही थोड़ा सा विवाद है। कई लोग पहले से नाम घोषित नहीं करने के पक्ष में हैं। कई लोग चाहते हैं कि यदि प्रधानमंत्री घोषित कर दिया जाए, तो वोैट मांगने में दिक्कत नहीं आती। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान और मध्यप्रदेश में मोबाइल, इंटरनेट, एप्लीकेशंस जैसे हाइटेक संसाधनों का भरपूर उपयोग किया था। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह ने थ्री डी के माध्यम से जनसभाओं को संबोधित किया था। इन दोनों राज्यों में मतदाता गुजरात की अपेक्षा कम शिक्षित होने के बाद भी भाजपा का प्रचार यहां शहरी मतदाताओं पर असरकारक साबित हुआ। इस देखते हुए भाजपा लोकसभा चुनाव में भी शहरी युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रचार की इन तरकीबों का इस्तेमाल करेगी, यह तय है। अभी तक चुनावी वादे और नारे शहरों की गलियों में लिखे जाते थे। चौक में सभाएं होती थीं। लाल, पीले, गुलाबी कागजों पर नेताओं के भाषण छपे होते थे, जिन्हें बच्चे वितरित करते। पोस्टरों पर हाथ जोड़े नेता अपनी मुस्कराहट के साथ दिखते थे। दिन भर विभिन्न वाहनों पर लाउडस्पीकर से अपने-अपने प्रत्याशियों का प्रचार किया जाता था। लेकिन अब समय बदल गया है। वक्त का तकाजा है कि इसमें भी बदलाव लाया जाए। इसलिए चुनाव प्रचार का तरीका भी हाइटेक होने लगा है। ऐसा समझा जा सकता है कि राजनैतिक दलों की नीयत भी बदल जाएगी। वे भी अब आम आदमी की समस्याओं को समझेंगे और उसके निराकरण की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं कर पाए, तो कई दिग्गत एक बार में ही चुनावी मैदान से उखड़ जाएंगे, यह तय है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 15 जनवरी 2014

शुरुआत ऐसी है, तो अंत कैसा होगा


आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
वर्ष की शुरुआत ऐसी है, तो अंत कैसा होगा
डॉ. महेश परिमल
कुछ दिनों पहले खबर थी कि सन् 2014 का कैलेण्डर 1947 की तरह है। 1947 तो संघर्ष का वर्ष था, पर 2014 सत्ता प्राप्त करने का वर्ष माना जा रहा है। टीवी पर हमारे प्रधानमंत्री ने महंगाई पर अंकुश रखने में अपनी विफलता दर्शाई। उसी दिन ही महंगाई को बेकाबू करने वाले कारक यानी पेट्रोल-डीजल की कीमत में बढ़ोत्तरी की गई। आश्चर्य इस बात का है कि इस पर दिल्ली में काबिज आम आदमी की पार्टी के किसी भी नेता ने एक शब्द भी नहीं कहा। क्या महंगाई आम आदमी का मुद्दा नहीं है? इस वर्ष का पहला सप्ताह महंगाई की भेंट चढ़ गया। वर्ष की शुरुआत ही ऐसी है, तो समझ लो अंत कैसा होगा?
इस वर्ष के पहले सप्ताह में जिस तरह से उपयोगी चीजों के दाम बढ़ाने वाले कारकों पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस आदि की मूल्य वृद्धि हुई है, उसी से लगता है कि यह वर्ष महंगाई बढ़ाने वाला सिद्ध होगा। दूसरी ओर आम आदमी ने जिस तरह से कांग्रेस का साथ स्वीकारा है, तो प्रधानमंत्री ने पत्र वार्ता में जो कुछ कहा, उससे दोनों ही दलों में विवाद के संकेत मिले हैं। एक बात और यह भी देखने में आई कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से सरकारी बंगला वापस करने में जल्दबाजी दिखाई, उससे प्रेिरत होकर कांग्रेस-भाजपा ने भी अपने प्रयास शुरू कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ में इसे चरितार्थ करते हुए अब वीआईपी को बंदूक की सलामी न दिए जाने का निर्णय लिया गया है। सादगी की यह तो शुरुआत है। अभी बहुत सी महंगी सादगी के दर्शन होने वाले हैं। यह वर्ष लोकसभा चुनाव का है। सभी दल 272 सीट प्राप्त करना चाहते हैं। कांग्रेस-भाजपा यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बिना क्षेत्रीय दलों की सहायता से सरकार बनना मुश्किल है, इसलिए क्षेत्रीय दलों को रिझाने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। वैसे आम आदमी पार्टी ने भी कहा है कि वह भी लोकसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े करेगी। इससे भाजपा-कांग्रेस में खलबली मची है। भाजपा अब इस चिंता में है कि नरेंद्र मोदी का प्रभाव कम कैसे पड़ गया। अरविंद केजरीवाल ने किस तरह से मीडिया में अपनी पैठ बना ली। उधर कांग्रेस को इस बात की चिंता है कि दिल्ली सरकार को दिया गया समर्थन 6 माह तक वापस नहीं लिया जा सकता और इधर इन 6 महीनों में ही चुनाव हो जाएंगे और परिणाम भी निकल आएंगे।
पिछले दो दशकों से भारत की राजनीति मिली-जुली सरकार आधारित हो गई है। इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-भाजपा को अच्छी तरह से मालूम है कि उनके अपने दम पर 272 सीटें नहीं आ सकती। क्षेत्रीय दलों को मिलाकर रखना ही पहली प्राथमिकता है। आम आदमी पार्टी भी एक सशक्त क्षेत्रीय पार्टी होने का माद्दा रखती है। देश का उद्योग जगत के लिए 2014 कई चुनौतियां लेकर आया है। उद्योग क्षेत्र के उत्पादन के आंकड़े कमजोर हैं। यदि उत्पादन बढ़ता है, तो बेरोजगारी कम हो सकती है। प्रधानमंत्री ने पत्र वार्ता में यह स्वीकार किया है कि हम बेरोजगारी की समस्या को हल करने में नाकामयाब रहे। यदि सरकार की नीतियां स्पष्ट न हो, तो आर्थिक क्षेत्र भी कमजोर साबित होता है। सरकारी नीतियों की कमजोरी के कारण ही करोड़ों के प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं। हाल ही में चार लाख करोड़ के प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली है। इसमें सबसे बड़ी एफडीआई वाली 53 हजार करोड़ की पॉस्को परियोजना का भी समावेश होता है। यह वर्ष हमें नई सरकार देगा। पर जो भी सरकार आएगी, उसके सामने अनेक चुनौतियां होंगी। उसे प्रजा को दिए गए वादों को पूरा करना होगा। प्रजा की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। इस वर्ष को प्रजा की जागृति का वर्ष कहा जाए, तो गलत न होगा। क्योंकि पिछले वर्ष आम आदमी पार्टी की सफलता इसी जागृति की ओर संकेत करती है। आजादी का साल यानी 1947 की तमाम तारीखें संघर्षो से भरी पड़ी हैं। यह वर्ष सत्ता प्राप्त करने का वर्ष है। वैसे भी इस समय रसोई गैस-पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े, तो आम आदमी पार्टी ने इस पर कुछ नहीं कहा, यह भी सोचने वाली बात है। क्या इन चीजों से आम आदमी का कोई सरोकार नहीं? आखिर क्यों खामोश है, यह आम आदमी पार्टी?
मध्यम वर्ग ने यह स्वीकार कर लिया है कि राजनैतिक पार्टियों को जो कुछ करना है, करे, पर आवश्यक जिंसों के भाव नहीं बढ़ने चाहिए। यह सभी को मालूम है कि आवश्यक जिंसों सब्जी, दूध आदि की आपूर्ति वाहनों से होती है। यदि वाहनों के ईंधन की मूल्य वृद्धि होगी, तो निश्चित रूप से आवश्यक जिंसों पर असर डालेगी। सरकार आइल कंपनियों पर इतनी अधिक मेहरबान है कि उसका बोझ आप उपभोक्ताओं पर डालने में जरा भी संकोच नहीं कर रही है। तेल कंपनियों को करोड़ों-अरबों की सबसिडी देने वाली सरकार आम उपभोक्ताओं की परेशानी को शायद समझना ही नहीं चाहती। सरकार चुनाव के पहले महंगाई को बढ़ने देगी, ऐसा लगता है, क्योंकि चुनाव के पहले दाम बढ़ाने से उसका असर वोट बैंक पर पड़ेगा, इस समय यदि मूल्य वृद्धि कर दी जाती है, तो तब तक जनता शायद इसे भूल जाए। अभी तो सारे दलों की रूपरेखा आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर बन रही है। सारे दल ईमानदार प्रत्याशी की खोज में हैं। इस देश में वोट लेने के पहले सभी अपने को ईमानदार बताते हैं, पर वोट लेने के बाद यही ईमानदारी न जाने कहां फुर्र हो जाती है। इधर महंगाई बढ़ रही है, मध्यम वर्ग का बजट बिगाड़ रही है। एक तरह से उस पर ही सारी सबसिडियों का बोझ डाल रही है। आश्चर्य इस बात का है कि जिस मुद्दे पर हमारे प्रधानमंत्री ने अपनी सबसे बड़ी विफलता बताई, उसी मुद्दे पर सरकार अपना खेल कर गई। महंगाई पर अंकुश न रखने की स्वीकारोक्ति प्रधानमंत्री ने सुबह 11 बजे पत्र वार्ता में की, शाम को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए। उनकी स्वीकारोक्ति भी किसी दहाड़ से कम साबित नहीं हुई।
यह वर्ष हम सभी के लिए चुनौती भरा है। लोकसभा चुनाव में सही प्रत्याशी को चुनना सबसे बड़ी चुनौती है। अब तक जिसे भी चुना, वह महंगाई बढ़ाने में सहायक ही सिद्ध हुआ। विधानसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस को मात मिली हो, पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस किस तरह से अपना पक्ष रखती है, यह भी देखना है। भाजपा भले ही उत्साहित हो, पर सच तो यह है कि आम आदमी पार्टी की सफलता ने सभी को चौंका दिया है। सभी यह सोचने के लिए विवश हो गए हैं कि क्या आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव में एक सशक्त दल के रूप में उभरेगी?
     डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 13 जनवरी 2014

तुरूप का पत्‍ता हे प्रियंका गांधी



आज जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख


कांग्रेस के लिए तुरूप का पत्ता है प्रियंका!
डॉ. महेश परिमल
भाजपा को अब संभल जाना चाहिए। चार राज्यों की जीत ने उसे भले ही थोड़ा बेपरवाह बना दिया हो। पर सच यह है कि अब उसके सामने न केवल ‘आप’, बल्कि प्रियंका गांधी भी है।  ‘आप’ को कम न आंकने की समझाइश संघ ने भी भाजपा को दी है। सर्वेक्षण बताते हैं कि मोदी का जादू अब उतर रहा है। क्योंकि अरविंद केजरीवाल अपने वादे और अपनी सादगी को लेकर काफी चर्चित हैं। लोग उनसे ईमानदाराना राजनीति की अपेक्षा कर रहे हैं। सच भी है अब परंपरागत पार्टियों से लोगों का मोहभंग होने लगा है। घिसे-पिटे नेताओं के बेतुके बयान सुन-सुनकर भी लोग अब बुरी तरह से बोर होने लगे हैं। ऐसे में कांग्रेस यदि प्रियंका को सामने लाती है, तो वह भाजपा के लिए भारी मुसीबत खड़ी कर सकती हैं। प्रियंका राहुल से अधिक लोकप्रिय है।  उत्तरा प्रदेश विधानसभा चुनाव में लोगों ने उन्हें प्रचार करते देखा था। लोगों को उसमें इंदिरा गांधी की छवि दिखाई देती है। उनकी मुस्कराहट, बाडी लैग्वेज, हेयर स्टाइल सभी कुछ इंदिरा जी जैसा है। यही छवि भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है। राहुल के बाद अब कांग्रेस के पास प्रियंका के रूप में यही तुरूप का पत्ता बचा है। इसे भुनाने का सही समय भी आ गया है।
प्रियंका ने जैसे ही राहुल गांधी के लिए कांग्रेस नेताओं की बैठक में भाग लिया, वैसे ही मीडिया मानो जाग गया। चारो तरफ से प्रियंका की ही चर्चा होने लगी। प्रियंका की सक्रियता को लोग नरेंद्र मोदी के प्रभाव को रोकने से जोड़ने लगे हैं। कोंग्रेस की मुख्य चिंता उत्तर प्रदेश है। वहां वह 20 से अधिक प्राप्त करना चाहती है। ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके। दूसरी ओर कांग्रेस को एक ऐसे चेहरे की आवश्यकता है, जो नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सके। अभी तक कांग्रेस के पास ऐसा कोई जादुई चेहरा नहीं है, जो ऐसा कर सके। इसलिए सबकी नजरें प्रियंका पर जाकर टिक गई हैं। वैसे गांधी परिवार में यदि राहुल और प्रियंका की तुलना की जाए, तो प्रियंका को राहुल से अधिक अंक मिलते हैं। प्रियंका प्रतिभावान है, इसमें कोई शक नहीं। पर आज जो कांग्रेस की हालत है, उसे ठीक करने के लिए गांधी परिवार से हटकर कुछ ऐसा करना ही पड़ेगा, जिससे पूरी कांग्रेस बेदाग छवि के साथ लोगों के सामने आए। इसके लिए प्रियंका को काफी परिश्रम करना पड़ेगा। कांग्रेस में अभी भी ऐसे लोग हैं, जो सत्ता प्राप्त करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। आज केवल राहुल ही नहीं, बल्कि स्वयं सोनिया और अब प्रियंका भी ऐसे चापलूसों से घिरे हुए हैं, जो परले दर्जे के स्वार्थी हैं। इन पार्टी की मजबूती से ज्यादा स्वयं की मजबूती की चिंता है। इसलिए येन केन प्रकारेण इस तरह के बयान आते रहते हैं कि गांधी परिवार के अलावा कोई भी कांग्रेस को जीवित नहीं रख सकता। देश का उद्धार गांधी परिवार से ही होना है। इस तरह की धारणा कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है।
चार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली पराजय से पार्टी पूरी तरह से सजग हो गई है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाकर उसे पूरे देश में ही चर्चित कर दिया है। वे देश के कोने-कोने में जाकर गरज रहे हैं। उनकी लोकप्रियता का अंदाज इसी से लग जाता है कि राहुल गांधी की सभा में जितने लोग लाए जाते हैं, उससे कई गुना लोग नरेंद्र मोदेी की आम सभा में दिखाई देते हैं। कांग्रेस अब राहुल गांधी को आगे करने में घबरा रही है। वह चिदम्बरम, ए.के. एंटोनी, नंदन निलकेणी जैसों के नाम को आगे बढ़ा रही है। वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कह दिया है कि वे अब किसी भी तरह से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होना चाहते। इससे उपरोक्त नामों को बल मिला है। इसमें अब प्रियंका का नाम जुड़ जाने से देश की राजनीति में एक उबाल सा आ गया है। भले ही प्रियंका में लोग इंदिरा गांधी की छवि देख रहे हो, पर इंदिरा गांधी जैसा दिखना और इंदिरा गांधी जैसा होना दोनों ही अलग बात है। यह बात अलग है कि जो प्रियंका को जानते हैं, उनका मानना है कि वे इंदिरा जी जैसी ही सख्त और दृढ़ हैं। वे अपने लुक के लिए विशेष रूप से सजग हैं। भारतीयों को तो वे स्ट्रांग और इम्प्रेसिव दिखाई देती हैं। उनके सामने राहुल नेचरल हैं। राहुल अपने दिखावे को लेकर प्रियंका जितना सजग नहीं हैं। राहुल शायद अपने काम से अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। गुनाहगार राजनेताओं को बचाने और आदर्श घोटाले में मंत्रियों को बचाने के मामले को लेकर उन्होंने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया ही है। दिल्ली में आप को बिना किसी शर्त के समर्थन देने में राहुल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसा माना जा रहा है।
आज जमाना मार्केटिंग का है। कांग्रेस ने राहुल की छबि को सुधारने के लिए जापान की एक कंपनी को 500 करोड़ का ठेका दिया है। कांग्रेस के कई हितकारी कामों को मीडिया में उतना स्थान नहीं मिला, जितना घोटालों को। इसलिए कांग्रेस ने जो हितकारी काम किए हैं, उसे सिलसिलेवार बताना जनता तक पहुंचाना आवश्यक है। अनाज योजना और सबसिडी की राशि डायरेक्ट उपभोक्ता के बैंक खाते में जमा करने की योजना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह योजना प्रचार-प्रसार के अभाव में चर्चित नहीं हो पाई। अब राहुल, प्रियंका और जापानी कंपनी पर ही यह दारोमदार है कि वह मैदान में आकर कांग्रेस की इन उपलब्धियों को जनता के सामने लाए। 17 जनवरी को दिल्ली में अ.भा. कांग्रेस कमेटी की बैठक है, इस पर सभी की नजरें हैं। इसी बैठक में प्रधानमंत्री पद के लिए नाम की घोषणा की संभावना है। वैसे कुछ नेता मानते हैं कि चुनाव के पहले प्रधानमंत्री का नाम घोषित करना उचित नहीं है। प्रियंका को राजनीति का उतना अनुभव नहीं है, जितना राहुल को है। राहुल पार्टी में सक्रिय हैं, पर प्रियंका नहीं है। यदि बैठक में प्रियंका का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आता है, तो यह भाजपा के लिए बहुत ही मुश्किल होगा। अब देखना यह है कि कांग्रेस प्रियंका नाम का यह तुरूप का पत्ता कब चलती है।
  डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 8 जनवरी 2014

कांग्रेस के लिए महंगा साबित होगा पुनर्विचार

आदर्श घोटाला रिपोर्ट:
डॉ. महेश परिमल
आदर्श घोटाला एक ऐसा घोटाला है, जिसमें परत-दर-परत नई-नई परतें खुलती जा रही हैं। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब इसकी रिपोर्ट को पुनर्विचार के लिए पुन: महराष्ट्र सरकार के पास भेजी, उससे तो यही लगता था कि अब निश्चित रूप से इस पर पुनर्विचार होगा। लेकिन जो रिपोर्ट आई है, उससे नहीं लगता कि रिपोर्ट पर नए सिरे से विचार हुआ है। शायद राहुल गांधी इसी तरह की रिपोर्ट चाहते थे। जो उन्हें मिल गई। सच बात तो यह है कि रिपोर्ट में मंत्रियों को पूरी तरह से साफ-शफ्फाक बताया गया है। सारे मंत्रियों को एक सिरे से बचा लिया गया है। दोषी वही हैं, जो मंत्री नहीं हैं। इसे आंशिक रिपोर्ट कहा जाए, तो गलत न होगा। इस रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये ऐसे सवाल हैं, जो न केवल महाराष्ट्र सरकार बल्कि कांग्रेस को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। महाराष्ट्र सरकार ने जो रिपोर्ट भेजी थी, उस पर सबसे पहली और बड़ी आपत्ति राहुल गांधी को ही थी, इसीलिए उन्होंने रिपोर्ट को वापस भेज दी थी। अब उन्हें ही यह बताना होगा कि क्या वे ऐसी ही रिपोर्ट की आशा कर रहे थे। क्या उनके सामने ऐसी ही रिपोर्ट की छवि थी, जिसमें सभी नेताओं एवं मंत्रियों को बचा लिया जाए, बाकी सभी को दोषी माना जाए।
मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान से यह उम्मीद तो कतई न थी। देश में ऐसी कई रिपोर्ट हैं, जिस पर पुनर्विचार करना है, वे अभी भी धूल खा रही हैं। इस रिपोर्ट पर इतनी जल्दी विचार हो भी गया और मंत्रियों को बचा भी लिया गया। इसी तत्परता से अन्य रिपोटरें पर भी पुनर्विचार हो जाता, तो कितना अच्छा होता। इस रिपोर्ट से यह तो स्पष्ट हो गया है किहमेशा की तरह ही इस बार भी नौकरशाह ही दोषी पाए गए हैं। एक तरफ कांग्रेस भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए तरह-तरह के जतन कर रही है, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार का पोषण करने वाली आधी-अधूरी रिपोर्ट को स्वीकार कर रही है। शायद इसी मकसद से राहुल गांधी ने रिपोर्ट को खारिज कर दी थी, क्योंकि उसमें नेताओं-मंत्रियों को भी दोषी बताया गया था। अभी जो रिपोर्ट आई है, उसमें मंत्रियों को पूरी तरह से संरक्षण मिल रहा है। एक अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि इस घोटाले में जिसने भी थोड़ी सी भी सहायता की, उसे फ्लैट मिला है। फिर वह चाहे सेना का अधिकारी हो, या फिर किसी मंत्री-नेता का संबंधी। इस रिपोर्ट के पुनर्विचार के नाम पर ऐसे फैसले को जायज बताने की कोशिश की गई है, जिसमें नेता और मंत्री पूरी तरह से संलिप्त हो। यह कैसी रिपोर्ट है, जिसमें नौकरशाहों पर कार्रवाई हो, और मंत्री-नेता साफ बच जाएं। इस रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार में गले तक डूबे नेताओं-मंत्रियों पर किसी भी तरह की कार्रवाई करना कितना मुश्किल है। जब आदर्श घोटाला चर्चा में था, तब सोनिया गांधी ने ही कहा था कि इस मसले को सुलझा लिया जाएगा। शायद उनका संकेत इसी तरफ था कि इसे इस तरह से सुलझा लिया जाएगा। किसी समस्या को सुलझाने का यह कौन सा तरीका है, जिसमें सभी दोषी हों, पर कुछ को बचा लिया जाए और कुछ को दोषी ठहरा दिया जाए।
देश में अब तक हुए तमाम घोटालों में यही सामने आया है कि जो भी राजनैतिक घोटाला होता है, उसमें नेता और मंत्री तो किसी भी तरह से दोषी नहीं पाए जाते, हमेशा नौकरशाह ही निशाने पर होता है। भ्रष्टाचार को शह देकर कांग्रेस कभी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठा सकती। क्या सोनिया गांधी अब भी यह शिकायत करेंगी कि मीडिया को विपक्षी दलों के भ्रष्टाचार पर भी नजर डालनी चाहिए। ऐसी शिकायत तो वही कर सकता है जो भ्रष्टाचार के मामले में पूरी तरह से पाक-शफ्फाक होकर फैसले करता हो। इस दौरान वह इसकी भी परवाह नहीं करता, जो इसमें कौन अपना है और कौन पराया। यहां तो यह नजर आ रहा है कि दूसरे के भ्रष्टाचार में सभी नेता ही दोषी, और अपने भ्रष्टाचार में नेताओं को छोड़कर सभी दोषी। यह भी कोई बात हुई। वैसे भी कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा है कि वह भ्रष्टाचार की पोषक है। भ्रष्टाचार के मामलों में आधी-अधूरी और एक पक्षीय कार्रवाई करके कांग्रेस आखिर क्या हासिल करना चाहती है? इससे उसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। नेताओं द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के प्रति राजनीतिक दलों का रवैया अभी भी दिखावटी है। पृथ्वीराज चौहान ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आदर्श घोटाले में जो भी गलत हुआ, उसे नौकरशाहों ने किया। जो सही हुआ, वह नेताओं-मंत्रियों ने किया। यह हास्यास्पद है। जस्टिस पाटिल की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि आदर्श घोटाले में नेताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। उसे कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। एक तरह से जस्टिस पाटिल की रिपोर्ट को ही खारिज कर दिया गया है। इसे लोकतंत्र तो कतई नहीं कहा जा सकता।
महाराष्ट्र सरकार के पुनर्विचार के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान का मामला वहीं के वहीं है। सीबीआई उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहती है, पर राज्यपाल इसकी अनुमति नहीं दे रहे हैं। हमेशा यही कहा जाता है कि राज्यपाल के फैसले में सरकार और पार्टी की कोई भूमिका नहीं होती। पर देखा यही जा रहा है कि राज्यपाल वही फैसले लेते हैं, जो पार्टी चाहती है। इस मामले में भी यही बात सामने आई है। पुनर्विचार रिपोर्ट के माध्यम से कांग्रेस  स्वयं को निरापद नहीं रख पाई है। यह रिपोर्ट उसके लिए महंगी साबित होगी। उस स्थिति में जब आज पूरा देश भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। इसमें कांग्रेस को सबसे आगे माना जा रहा है।
    डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

‘आप’ खत्म कर पाएगी वीआईपी संस्कृति?

डॉ. महेश परिमल
विधानसभा चुनाव परिणाम के पहले जो मोदी लहर थी, वह परिणाम के बाद अरविंद लहर में बदल गई। जब से ‘आप’ ने अपना प्रदर्शन दिखाया है, तब से अरविंद ‘टॉक आफ द नेशन’ हैं। अब तो हालत यह है कि ‘आप’ की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बातों पर मीडिया ही नहीं, बल्कि लोगों की भी नजर है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से सरकार बनाने की मंजूरी मिलने के बाद से ‘आप’ सरकार के मंत्रिमंडल के शपथविधि को रामलीला मैदान में अंतिम रूप दिया जा रहा है। शपथ विधि समारोह बड़ा किंतु सादा होगा, ऐसा कहा जा रहा है। सरकारी बंगला और कार लेने के लिए ना कहने वाले अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ दिल्लीका वीआईपी कल्चर खत्म कर देंगे, ऐसा समझा जा रहा है। वैसे भी दिल्ली का अधिकांश पुलिस बल वीआईपी सुरक्षा में ही लगा रहता है। इससे कम से कम उन्हें तो राहत ही मिलेगी। अब वे अपना ध्यान दूसरी आवश्यक मोर्चो पर देने की कोशिश करेंगे, ऐसा समझा जा सकता है।
हमें सत्तालोलुप नेता नहीं चाहिए, हमें क्रांतिकारियों की आवश्यकता है। ऐसा कहने वाले अरविंद केजरीवाल अपने मंत्रिमंडल के गठन के तुरंत ही बाद अपने विधायक विनोद कुमार बिन्नी की बगावत को झेला। काफी मान-मनौव्वल के बाद वे अब यह कहने लगे हैं कि अब तो गेटकीपर भी बना दोगे, तो भी कुछ नहीं कहूंगा। वैसे बिन्नी की बगावत वाजिब थी। वे दो बार निर्दलीय प्रत्याशी की हैसियत से चुनाव जीत चुके हैं। राजकीय ठाट-बाट को उन्होंने काफी करीब से देखा है। मंत्रिमंडल के गठन के समय वे निश्ंिचत थे कि ये सभी तो नए-नवेले हैं, मैं तो अनुभवी हूं, इसलिए मेरी नियुक्ति तो तय है। पर जब उन्हें मंत्रिमंडल में नहीं लिया गया, तो उन्होंने बगावत कर दी। लेकिन अब सब ठीक है। अब तो वे कह रहे हैं कि सारा किया-कराया मीडिया का है। इस समय तो बिन्नी खामोश हैं, पर उनके भीतर का अनुभवी विधायक कभी न कभी तो मुंह खोलेगा ही। यह तय है। वैसे कांग्रेस अपना समर्थन कब वापस ले ले, यह भी पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। इसके बाद भी ‘आप’ को लोग अभी भी सशंकित निगाहों से देख रहे हैं। क्योंकि सभी जानते हैं कि ‘आप’ ने जो चुनावी वादे किए हैं, वहीं उसके लिए खरी चुनौती हैं।
शनिवार 28 दिसम्बर को दिल्ली में एक नए प्रकार की सरकार आने वाली है। यह सरकार कई मामलों में अनोखी ही होगी। सबसे पहले तो यही है कि भावी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेड प्लस सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया है, यही नहीं, उन्होंने सरकारी बंगला भी नहीं लेने की घोषणा की है। इस पर वे कहते हैं कि मैं तो सीधा-सादा आदमी हूं। अब तक मुझे किस तरह की सुरक्षा मिली थी? मै सुरक्षा बलों से घिरा नहीं रहना चाहता। यह अच्छी बात है, क्योंकि दिल्ली की अधिकांश पुलिस वीआईपी सुरक्षा में ही लगी रहती है। देश के दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री अपने सुरक्षा कमांडो से धिरे रहते हैं। उनके करीब जाने से ही लोग थरथराने लगते हैं। लोग यह मानने लगे हैं कि दिल्ली के ये नए मुख्यमंत्री सादगी की कुछ नई इबारत लिखेंगे। इससे अब लोग कभी भी मुख्यमंत्री को मेट्रो में सफर करते देख सकते हैं। अब तक ऐसा केवल विदेशों में ही होता रहता है, अब हमारे देश में भी होगा। जब विधायक आपके दरवाजे आकर कहेगा कि मैं यहां का विधायक हूं, आपको हमारे प्रशासन से किसी प्रकार की तकलीफ हो, तो मुझे बताएं। केजरीवाल ने न केवल कहा, बल्कि अपनी सादगी का परिचय देते हुए राष्ट्रपति से मिलने अपनी साधारण मारुति 800 से राष्ट्रपति भवन पहुंचे। उनके स्थान पर दूसरा कोई होता, तो ढोल-नगाड़ों के साथ राष्ट्रपति भवन जाता और रास्ता जाम कर देता। देखना यही है कि ये सादगी कब तक कायम रह सकती है। इस बार रामलीला मैदान अपनी सादगी के लिए जाना जाएगा। शपथ ग्रहण समारोह चकाचौंध करने वाला नहीं होगा। आम आदमी पार्टी ने किसी को भी आमंत्रण पत्र नहीं भेजा है। जिन्हें आना है, वे आ सकते हैं, जिन्हें नहीं आना है, उनके लिए कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं है। शपथ विधि के लिए कोई खास या अच्छा मुहूर्त की भी परवाह नहीं की गई। इसके पहले तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मलमास शुरू होने के पहले ही शपथ ग्रहण कर चुके हैं। मतलब यही है कि जो कुछ हो रहा है, अच्छा हो रहा है। कुछ अलग ही हो रहा है। दुनिया का यह नियम भी है कि यदि कुछ नया और अलग हो रहा हो, तो उस पर पहले तो शंका ही की जाती है। अभी तो सब यही कह रहे हैं कि ये सब कुछ अधिक समय तक नहीं चल पाएगा। पर कई लोगों का यह भी कहना है कि जो कुछ चल रहा है, उसे चलने तो दो। अभी तो चल रहा है ना? आप यदि चाहेंगे कि सब अच्छा हो, तो अच्छा ही रहेगा। यह तो लोगों की इच्छा पर भी निर्भर करता है।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को यह भी सोचना और देखना होगा कि सरकार केवल मंत्रिमंडल या नेताओं से ही नहेीं चलती। इसे चलाते हैं सरकारी बाबू और अधिकारी। यदि इन लोगों के काम का रवैया नहीं बदला गया, तो समझो सब कुछ बेकार है। भ्रष्टाचार का मूल तो यही प्रशासन है। किस फाइल को आगे बढ़ाना है किसे दबाना है, इसे प्रशासन तंत्र से जुड़े लोग इसे अच्छी तरह से समझते हैं।  दिल्ली के बाबू तो और भी अधिक शातिर हैं। इन्हें नियंत्रण में लाना बहुत ही आवश्यक है। केजरीवाल मंत्रिमंडल को इन बाबुओं और अधिकारियों को ठीक करने में ही पसीना छूट सकता है। वैसे अरविंद केजरीवाल ऐसे एकमात्र मुख्यमंत्री नहीं होंगे, जिसे उनकी सादगी से पहचाना जाएगा। अभी भी देश में दो-तीन मुख्यमंत्री ऐसे हैं, जो सादगी की मिसाल हैं। इनमें सबसे पहला नाम है त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का। इनके पास कुछ सम्पत्ति ढाई लाख रुपए की है। जब इन्होंने चुनाव के पहले अपना नामांकन पत्र भरा, तो उसमें उन्होंने जानकारी दी कि उनके हाथ में नकद राशि है 1080 रुपए और बैंक एकाउंट में है कुल 9720 रुपए। सभी को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनका घर चलाने के लिए उन्हें पार्टी की ओर से हर महीने 5 हजार रुपए मिलते हैं। अपनी सादगी के बारे माणिक कहते हैं कि मुझे इससे अधिक की आवश्यकता ही नहीं है। मैं देश का सबसे गरीब मुख्यमंत्री हूं। यह मेरे लिए गर्व की बात है।
सादगी में इसके बाद नाम लिया जाता है पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का। साधारण साड़ी और साधारण स्लीपर, वे पहले भी पहनती थीं, अब भी पहनती हैं। उन्हें भी दिखावा करना पसंद नहीं है। वे जो हैं, वही हैं। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर भी अपनी सादगी के लिए पहचाने जाते हैं। वे भी किसी तरह के दिखावे से दूर रहते हैं। दिखावा उन्हें पसंद ही नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी अपनी सादगी के लिए पहचाने जाते थे। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री बाबुभाई जशभाई पटेल की सादगी की चर्चा आज भी गुजरात के बुजुर्ग करते हैं। इस परंपरा को अरविंद केजरीवाल आगे ही बढ़ा रहे हैं, ऐसा कहा जा सकता है। सावधानी यही रखनी होगी कि कहीं सादगी के रास्ते से अभियान न आ जाए। यह सबसे अधिक खतरनाक स्थिति होगी। सरकार बनने के बाद यदि सब कुछ ठीक रहा, तो उनकी सादगी निश्चित रूप से एक नई इबारत लिखेगी, ऐसा कहा जा सकता है। यदि देश से वीआईपी कल्चर ही खत्म हो जाए, तो देश के सत्ता लोलुप नेताओं की सुरक्षा पर होने वाले अरबों रुपए बच सकते हैं, जो देश के विकास में काम आ सकते हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

दिग्गजों ने भी चखा है हार का स्वाद

डॉ. महेश परिमल
जहां सफलता है, वहां विफलता भी है। कोई भी हमेशा सफल नहीं हो सकता और न ही कोई हमेशा विफल रह सकता है। सफलता-विफलता यह जीवन के दो पहलू हैं। हर किसी को इसका सामना करना पड़ता है। राजनीति में तो यह बहुत ही आवश्यक है। क्योंकि जो जीतते हैं, वे जीतकर यह भूल जाते हैं कि उन्हें यह जीत किसकी बदौलत मिली है। इसलिए जनता ही उन्हें सबक सिखाकर आसमां से जमीन पर पटक देती है। आज चारों ओर अरविंद केजरीवाल की चर्चा है। कांग्रेस को दिल्ली की हार का उतना अफसोस नहीं है, जितना शीला दीक्षित की हार का। पिछले 15 वर्षो से मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करने वाली शीला दीक्षित 25 हजार 856 मतों से अरविंद केजरीवाल के हाथों हार गई। यह शीला दीक्षित के लिए निश्चित रूप से आघातजनक है। भारतीय राजनीति में ऐसे किंग किलर या फिर क्वीन किलर की अनेक घटनाएं हैं। जिनके सितारे खूब तेजी में हों, उन्हें एक सामान्य कार्यकर्ता ने हराया है। भारतीय राजनीति में हार का स्वाद चखने वालों में इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान, प्रमोद महाजन,  सुंदरलाल बहुगुणा, हेमवती नंदन बहुगुणा, एन.टी. रामाराव, बुद्धदेव भट्टाचार्य, आचार्य जे.बी.कृपलानी, मृणाल गोरे प्रमुख हैं। हस्तियों को हराने वाले को किंग किलर कहा जाता है।
भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी को ‘मर्द’ की उपमा दी जाती है। लोहे जैसे मजबूत इरादों वाली इंदिरा गांधी की कार्यशैली का अनुकरण कई राजनेताओं ने किया है। 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता दल के नेता राजनारायण खड़े हुए। वे एक बहुत ही सामान्य प्रत्याशी थे। अपने पहनावे के कारण में हमेशा चर्चित रहे। उनकी कोई इमेज भी नहीं थे। किंतु इन्होंने एक इतिहास रचा। उन्होंने इंदिरा गांधी को 55 हजार 202 मतां से हराया। दूसरे ही दिन में अखबारों की सुखिर्यां बन गई। सभी अखबार उनकी प्रशंसा में खड़े हो गए। उन्हें क्विन किलर की उपाधि दी गई। इंदिरा गांधी को हराने किसी सपने से कम नहीं था। उनके सामने कोई खड़े रहने के लिए भी कोई तैयार नहीं था।  जनता दल में भी राजनारायण का मान-सम्मान बढ़ गया। इसी तरह भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी एक बार हार का स्वाद चखा है। उनकी प्रतिभा भी ऐसी थी कि उनके सामने कोई भी हार जाए। 1984 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर सीट से उनके खिलाफ माधवराव सिंधिया प्रत्याशी थे। अपनी मां विजयाराजे सिंधिया से नाराजगी के चलते माधवराव सिंधिया ने यह कदम उठाया था। वे कांग्रेस की तरफ से उम्मीदवार थे। माधवराव राज परिवार से थे, युवा थे। सभी को आश्चर्य उस समय हुआ, जब उन्होंने वाजपेयी को एक लाख 75 हजार 594 मतों से हरा दिया। आंध्र में तेलुगु देशम के संस्थापक और लोकप्रिय अभिनेता एनटी रामाराव को 1989 में कलवाकुर्पी सीट से कांग्रेस के चित्तरंजन दास ने तीन हजार 568 मतों से हरा दिया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही दो कार्यकाल से देश के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर रहे हों, उन्होंने एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वे राज्यसभा के माध्यम से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं। ¨क तु एक बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था, तब भाजपा के प्रत्याशी से हार गए थे। दक्षिण दिल्ली की सीट पर उनके खिलाफ विजय कुमार मल्होत्रा खड़े थे। उनसे डॉ.मनमोहन सिंह 29 हजार 999 मतों से हार गए थे। हार-जीत सिक्के के दो पहलू हैं। जीतने वाले को हारना और हारने वाले को जीतना ही होता है। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता हथिया ली थी। तृणमूल ने वामपंथी सरकार को ही पलट कर रख दिया। उस समय बुद्धदेव भट्टाचार्य को तृणमूल के मनीष गुप्ता ने 16 हजार 684 मतों से हरा दिया। जिस तरह से अभी राजस्थान मं भाजपा ने गहलोत सरकार को उखाड़ फेंका है, ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल में भी ममता की आंधी के सामने वामपंथी सरकार उखड़ गई। 2009 के लोकसभा चुनाव में बिहार की लोकजन शक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान को हाजीपुर सीट से जनता दल यू के प्रत्याशी रामसुंदर दास ने 37 हजार 954 मतों से हराया था। कई बार दिग्गजों के सामने सेलिब्रिटी को मैदान में उतारा जाता है। इलाहाबाद के लोकप्रिय नेता और घर-घर में पहचाने जाने वाले नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराने के लिए कांग्रेस ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को खड़ा कर दिया। चुनाव के दौरान बहुगुणा ने घोषणा की थी कि यदि वे हार जाते हैं, तो राजनीति छोड़ देंगे, अंतत: वे हार गए। हारने के बाद उन्होंने अमिताभ को बधाई का जो तार भेजा, अमिताभ उसे अपनी उपलब्धि मानते रहे। मुम्बई में पानी वाली बाई के नाम से पहचान कायम करने वाली मृणाल गोरे को कांग्रेस के एक युवा नेता ने हराया था।
जिस तरह से आज शीला दीक्षित की सरकार की हालत है, ठीक वैसी ही हालत 14 वष्र पहले मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की हुई थी। उमा भारती ने दिग्विजय सरकार का उलटकर रख दिया था। राजनीति में किसी को भी साधारण या सामान्य नहीं माना जा सकता । चुनावी जंग में अपने प्रतिस्पर्धी को अच्छी तरह से पहचान लेना चाहिए। प्रतिस्पर्धी की कमजोरी को ही हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। शीला दीक्षित आम आदमी से दूर हो गई थी। सत्ता का मद उन पर छा गया था। अपनी हार के बारे में वे सोच भी नहीं सकती थी। सच को स्वीकारने की हिम्मत उनमें नहीं थी। जनता ने उन्हें सबक सिखाया। अब उसे इस आघात से बाहर आकर अपने राजनैतिक जीवन के भूतकाल पर नजर डालनी चाहिए। ताकि अपनी कमजोरियों को जान सके। राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, पर जब कोई सामान्य व्यक्ति लोकप्रिय नेता को हरा देता है, तो वह खबर बनती है।
    डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

जीत गई अदिती की संवेदनाएं

डॉ. महेश परिमल
यह एक अनोखी जिद थी कि डेढ़ साल के मासूम की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार उसके पिता ही करेंगे। अदिती की यह जिद सात समुंदर पार सीखचों के पीछे कैद मासूम के पिता सुनील जेम्स को रिहा कर सकती है, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। पर मां की ममता और पिता का प्यार ही था, जिस पर हावी थी संवेदनाएं। सुनील टोगो की जेल से रिहा हो गए, भारत आए और अपने मासूम को अंतिम बार देखा, और उसे चिर विदाई दी। इसे अदिती की संवेदनाओं की जीत कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। पूरी घटना पूरी तरह से भावनात्मक है। आफ्रिकी देश टोगो में सुनील जेम्स की गिरफ्तारी हुई। पति की रिहाई के लिए अदिती ने प्रधानमंत्री से भेंट की। पर कुछ नहीं हो पाया। ऐसे में बेटा विवान बीमार पड़ गया। कुछ दिन बाद दो दिसम्बर को उसकी असामयिक मौत हो गई। पत्नी अदिती ने जिद पकड़ ली, जब तक विवान के पिता नहीं आ जाते, मैं बच्चे का अंतिम संस्कार नहीं करुंगी। 17 दिनों तक विवान के शव को अस्पताल में रखा गया। आखिर में अदिती की संवेदनाओं ने वह कर दिखाया, जो असंभव था। भारत के प्रयासों से सुनील को टोंगो की जेल से मुक्ति मिली।
इंडियन मर्चेट नेवी के आइल टैंकर एमटी ओशन सेंचुरियन के कैप्टन सुनील जेम्स ने अप्रेल में नाइजीरिया जाने के लिए फ्लाइट पकड़ी, तब उसे कल्पना भी नहीं थी कि उनकी यह ट्रीप खतरनाक साबित होगी। नाइजीरिया पहुंचकर उन्हें शिश्प का कंट्रोल लेना था और शिप को आगे ले जाना था। नाइजीरिया से रवाना होते ही सुनील का शिप अभी कुछ ही दूर पहुंचा था कि कुछ ऐसा हो गया, जिसे फिल्मी ड्रामा कहा जा सकता है। वह तारीख थी 18 जुलाई 2013। एक स्पीड बोट ओशन सेंचुरियन शिप की तरफ आती दिखाई दी। स्पीड बोट में जो थे, वे कमांडो की पोशाक में थे। सभी के हाथ में ए के 47 मशीनगन थी। बोट पर मरिन फोर्स का झंडा था। सभी कमांडो आइल टैंकर ओशन सेंचुरियन में घुस आए। कैप्टन सुनील जेम्स और अन्य स्टाफ को लगा कि यह शायद रुटीन चेकअप होगा। पर बोट से आए लोगों ने सभी को निशाने पर ले लिया और आदेश दिया कि जो कुछ भी हो, वह उन्हें दे दिया जाए। तब पता चला कि ये मरीन कमांडो नहीं, बल्कि समुद्री डाकू हैं। ओशन सेंचुरियन का आइल टैंकर खाली था, इसलिए आइल लूटने की कोई बात ही नहीं थी। पर जब भी कोई शिप दूरस्थ क्षेत्रों की यात्रा पर होता है, तो नकद राशि तो होती ही है। अन्य कई सामान भी होते ही है। इसके बाद उन्होंने नकद राशि और जो उन्हें अच्छा लगा, लूटकर कुछ ही देर में वहां से चले गए। अब सुनील को समझ में आ गया कि वे सभी नाइजीरियन गेंग के सदस्य थे। समुद्री लूटपाट के लिए सोमालिया जितना ही नाइजीरिया भी कुख्यात है।
समुद्री परिवहन का यह नियम है कि जब समुद्र में कोई घटना या दुर्घटना होती है, तो जो सबसे करीब का देश है,वहां रिपोर्ट लिखाई जाती है। उस समय शिप टोगो देश से 45 नोटिकल मील दूर था। कैप्टन सुनील ने शिप टोगो की तरफ घुमा दिया। शिप जब टोगो पहुंचा, तो वहां उन्होंने इस लूटपाट की रिपोर्ट लिखवाई। यहां एक दूसरी घटना ने जन्म लिया। टोगो प्रशासन ने उन्हें समुद्री डाकुओं की मदद करने के आरोप में दो अन्य साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया। सभी को जेल भेज दिया गया। जेल में उन्हें अपराधियों के साथ रखा गया। बहुत मुश्किल से उन्हें फोन करने दिया गया। सुनील ने मलाड में स्थित अपने घर पर पत्नी अदिती को फोन पर बताया कि वे अपने दो साथियों समेत टोगो की जेल में बंद हैं। हमें गलत तरीके से जेल में बंद कर दिया गया है। तब से अदिती ने पति की रिहाई के प्रयास शुरू कर दिए। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से भी मुलाकात की। पर टोगो सरकार से किसी तरह की बातचीत नहीं हो पाई। इस बीच 11 माह का विवान बीमार पड़ गया। उसे सप्टेसीमिया हो गया था। इलाज में कोई कमी नहीं रखी गई। आखिर 2 दिसम्बर को उसकी मौत हो गई। तब हारकर अदिती ने यह जिद पकड़ी कि जब तक विवान के पिता नहीं आते, तब तक विवान का अंतिम संस्कार नहीं होगा। कई लोगों ने इसे भावनात्मक ब्लेकमेल कहा, पर इस बार अदिती ने तय कर लिया था कि विवान का अंतिम संस्कार उसके पिता ही करेंगे। एक तरह से यह एक मां का अल्टीमेटम था, देश की सरकार के लिए। तब सरकार जागी। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने टोगो के विदेश मंत्री से बात की। सरकार ने भी टोगो के राष्ट्रपति ग्नेसिंग्बे से अनुरोध किा कि मानवता  के नाते सुनील को रिहा कर दें। ताकि वे अपने बेटे का अंतिम संस्कार कर सकें। आखिर टोगो सरकार झुकी। 19 दिसम्बर को सुनील को टोगो की जेल से रिहा कर दिया।
सुनीलजेम्स की घटना से ऐसा कहा जा सकता है कि उसे केवल इसलिए कैद किया गया, ताकि शिप कंपनी से और अधिक राशि हड़पी जा सके। असली बात क्या है, यह तो किसी को भी नहीं मालूम। पर बात जब बेटे की मौत और अंतिम संस्कार की आती है, तो सुनील को माफ किया जा सकता है। आरोप तो अदिती पर भी लगे हैं कि उसने सरकार के साथ इमोशनली ब्लेकमेल किया है। पर इसे भी तो समझना चाहिए कि एक लाचार नारी इसके सिवाय और कर भी क्या सकती थी? मासूम बेटे की मौत और पति सात समुंदर पार एक देश की जेल में बंद है, तो वह लाचार क्या करे? जेम्स ने अपने बेटे का चेहरा अंतिम बार देख लिया, इसके पहली जब अंतिम बार उसे देखा था, तो वह हंसता-खेलता बच्च था। आज उनका बेटा विवान इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए रुखसत कर गया है। इसके लिए अदिती की संवेदनाओं के अलावा उनकी मेहनत भी है, जिन्होंने अदिती की सहायता की। साथ ही टोगो के मंत्रियों-अधिकारियों को भी नहीं भूलना चाहिए, भले ही वे अनपढ़ हों, गरीब हों, जंगली हो,  पर उन्होंने सुनील को रिहा कर यह बता दिया कि उनका भी दिल है, जो धड़कता है।
वैसे कुछ आफ्रिकी देशों के बारे में यह कहा जाता है कि वहां कानून-व्यवस्था जैसी कोई चीज ही नहीं है। सरकार भी कई बार विवश हो जाती है। टोगो देश की प्रशंसा तो नहीं की जा सकती। घाना के करीब स्थित इस देश में गरीबी, बेकारी, और भुखमरी से त्रस्त है। लोग अशिक्षित हैं। 56785 वर्ग किलोमीटर में फैले इस देश की जनसंख्या हमारे देश के एक महानगर से भी कम है। गरीबी और भुखमरी के कारण यहां के निवासियों की औसत आयु भी कम है। पुरुषों की औसत 56 और महिलाओं की 59 वर्ष।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

कमजोर विदेश नीति का परिणाम

डॉ. महेश परिमल
हमारे देश में पहली बार अमेरिका विरोधी सुर देखने में आया है। अमेरिका में भारतीय राजनयिक के साथ जो कुछ हुआ, उससे हमारे देश के कर्णधारों की आंख जरा देर से खुली। सबसे पहले तो यह देखा जाना आवश्यक है कि क्या वास्तव में जैसा मीडिया में आ रहा है, देवयानी के साथ वैसा ही हुआ है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्य देशों के राजनयिकों को भारत पांच सितारा सुविधाएं देता है, वहीं विदेशों में भारतीय राजनयिकों की स्थिति क्या है, इस पर कभी किसी ने सोचा है। अगर देवयानी ने अपने वीजा में गलत जानकारी दी है, तो उस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए। भारत तब क्यों नहीं जागा, जब हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को अमेरिका में अपमानित होना पड़ा था? इसके पहले जार्ज फर्नाण्डीस भी अपमानित हो चुके हैं। अमेरिका ने इस तरह की हरकतें पहले भी कई बार की है। हर बार वह माफी मांगकर बच निकलता है। इस बार भी माफी मांगने का नाटक किया गया है। इस बार अमेरिका के प्रति भारत का रवैया उचित है। पर अमेरिका इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि भारत में उसकी इस हरकत को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा।
अमेरिका को अच्छी तरह से मालूम है कि जब देश के प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित उम्मीदवार नरेंद्र गांधी को अमेरिका का वीजा नहीं दिया गया, तो कई दलों ने इसकी प्रशंसा की थी। इसका आशय यही हुआ कि भारत में अमेरिका के खिलाफ लामबंदी हो सकती है, इसे अमेरिका ने अभी तक नहीं समझा है। वह हमारी इसी कटुता का लाभ उठाता रहा है। इसी के चलते अभी तीन दिन पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल से मिलने से इंकार कर दिया। इस तरह से उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय मामले पर अपना विरोध दर्ज की। इसका कहीं कोई रिस्पांस मिला हो, ऐसा नहीं दिखता। पर अमेरिका की बार-बार की जाने वाली मनमानी पर अंकुश लगाना आवश्यक था। भारत ने जो भी कदम उठाया, वह सराहनीय है। विश्व की महासत्ता बनकर अमेरिका शिष्टाचार को भी भूलता जा रहा है। उसकी दादागिरी पर रोक लगाना जरूरी था। अब समय आ गया है कि व्यूहात्मक रूप से उसका सामना किया जाए। अपना विरोध दर्ज कर भारत ने इतना तो दर्शा ही दिया है कि भारतीय राजनयिकों को पूरा सम्मान मिलना चाहिए। जब तक भारत ने अपना विरोध दर्ज नहीं किया था, तब तक अमेरिका अपनी मनमानी करता रहा। जब भारत में नियुक्त राजनयिकों को पांच सितारा सुविधाएं देना बंद कर दिया गया, तब अमेरिका को लगा कि कुछ गलत हो गया है। अमेरिका में देवयानी को हथकड़ी पहनाकर जेल पहुंचाया गया और वहां अपराधियों के बीच रखा गया। उसके बाद ही उसे जमानत मिली। ऐसे व्यवहार का साहस अमेरिका को कहां से मिला, इसका उत्तर यही है कि यह हमारी कमजोर विदेश नीति के कारण ही है। हमने अमेरिका को सदैव अपना ‘आका’ माना और उसकी जी-हुजूरी की। इसलिए अमेरिका ऐसा करने में सफल रहा।
हमारा देश भले ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो, पर यहां कई मतभेद हैं। भारत में प्रजातांत्रिक तरीके से चुनाव जीतने वाले किसी नेता को अमेरिकी वीजा न मिले, तो कई लोग खुश भी होते हैं, यही नही तालियां भी बजाते हैं।  तालियों की इसी आवाजों से अमेरिका समझ जाता है कि यह देश मूर्खो से भरा पड़ा है। कई बार तो अमेरिका आगे बढ़कर भारत की विदेशी नीतियों से छेड़छाड़ करता आया है, पर हमें इसका कोई भी असर नहीं होता। दूसरी तरफ भारत की विदेश नीति हमेशा ढुल-मुल रही है। कभी इसमें सख्ती नहीं देखी गई। देवयानी की गिरफ्तारी के एक सप्ताह पहले ही अमेरिका ने एक भारतीय दम्पति पर यह आरोप लगाया कि वे भारत से काम करने के लिए जिन्हें लाते हैं, उनसे दस से बारह घंटे काम लिया जाता है। यही नहीं उन्हें वेतन भी कम दिया जाता है। न्यूयार्क के केनटुकी स्थति फास्टफूड का रेस्तरा चलाने वाले इस दम्पति अमृत पटेल और दक्षा पटेल की धरपकड़ की गई थी। डेढ़ साल पहले ही भारतीय दूतावास  के एक अधिकारी जो मेरीलैंड में रहते थे। तब उनके पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने उन पर छेड़छाड़ क आरोप लगाया। तब वहां भारतीय राजदूर केरूप में निरुपमा राय थी। श्रीमती राव ने उन्हें घर भी जाने नहीं दिया, क्योंकि उन्हें मालूम था कि घर पहुंचते ही उनकी धरपकड़ हो जाएगी, इसलिए उन्हें सीधे एयरपोर्ट भेजकर उन्हें भारत भेज दिया, बाद में उनका सामान भेजा गया। इस मामले को दबा दिया गया था। बाद में इस अधिकारी को अन्य देशों में पोस्टिंग हुई, जहां उन्होंने बेहतर काम किया। कुछ समय बाद पता चला कि वह अधिकारी निर्दोष थे। उन पर आरोप लगाने वाली महिला ने अपने स्वार्थ के कारण उन पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। वह महिला इसके पहले भी इस तरह के आरोप कई लोगों पर लगा चुकी थी।
अमेरिका में अभी 15 दिन पहले ही उपवास आंदोलन शुरू हुआ था। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा उन अनशनकारियों से मिलने पहुंचे थे। अमेरिका में रहने वाले भारतीय अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं। पिछले एक वर्ष से इमीग्रेशन कानून संशोधन बिल की चर्चा चल रही है। इस कारण अमेरिका में असंवैधानिक रूप से रह रहे डेढ़ करोड़ लोग वहां सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। असंवैधानिक रूप से रहने वाले ये सभी वहां कानूनी रूप से रह सकते थे, इसकी पूरी संभावना थी। अमेरिका के सभी राज्यों में इस तरह का आंदोलन चलाकर सरकार पर दबाव बढ़ाया गया। पहले चरण में बिल पारित होने की तैयारी में था, तभी ओबामा के सलाहकारों ने मामला बिगाड़ दिया। गैरकानूनी रूप से रहने वालों को कानूनी हक देने का वादा ओबामा ने चुनाव के दौरान किया था। इसके बाद भी वे अपने वादे से मुकर गए। इस समय जो देवयानी खोब्रागड़े के साथ हुआ है, वैसा यदि भारत में किसी अमेरिकी राजनयिक के साथ होता, तो क्या उसे हथकड़ी पहनाकर जेल भेजा जाता? पाकिस्तान ने ऐसा करके अपनी ताकत बताई थी, बाद में उसने अमेरिका से माफी भी मांग ली। उदारवाद के चलते भातर की कमजोर विदेश नीति के चलते अमेरिका बार-बार ऐसा कर रहा है। देवयानी के साथ जो कुछ हुआ, वैसा ही यहां भी हो, तो अमेरिका कुछ संभलेगा। अभी भारत ने जो कदम उठाए हैं, वह विरोध के स्वर को ठंडा करने के लिए उठाया है। बाद में हालात फिर वही ढाक के तीन पात की तरह हो जाएंगे।
डॉ. महेश परिमल

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