शनिवार, 30 जून 2012

देश को एक मजबूत राष्‍ट्रीय दल की आवश्‍यकता

इस बार राष्ट्रपति चुनाव के बहाने भारतीय राजनीति पर जो प्रहार किया गया है, वह साफ दिखाई दे रहा है। जिस तरह से सत्ता लोलुप ताकतें राजनीति पर हावी होने की कोशिशें कर रहीं हैं, उससे स्पष्ट है कि शीघ्र ही होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए ये दल स्वयं को तैयार करने में लगे हैं। इस बार भी क्षेत्रीय दल अपना काम कर दिखाएंगे। मुलायम सिंह ने जिस तरह से यू टर्न लिया, उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि मौके की ताक पर बैठे ये नेता न जाने कब अपना ईमान बदल दें। इन पर अधिक समय तक गहरा विश्वास करना मुश्किल होगा।
ममता बनर्जी ने जिस बेरुखी से यूपीए सरकार पर जो आपत्तियां उठाई हैं, उससे उनके रुख का पता चल जाता है। उधर प्रमुख विरोधी गठबंधन एनडीए की हालत तो उससे भी अधिक खराब है। अब शिवसेना को ही ले लो, यह दल भाजपा के साथ है, किंतु इसने पहले ही कह दिया कि वे डॉ कलाम को अपना समर्थन नहीं देंगे। जनता दल यूनाइटेड ने भी पहले ही कह दिया कि उनकी पहली पसंद प्रणब मुखर्जी हैं। इससे स्पष्ट है कि यह आज ऐसा कोई भी दल ऐसा नहीं है, जो अंतर्कलह से ग्रस्त न हो। दल चाहे छोटा हो या बड़ा, उसके भीतर की अकुलाहट बयानों के रूप मे ंबाहर आ रही हैं। भाजपा की हालत तो और भी खराब है। उस दल से विवाद बाहर आते ही रहते हैं। हाल ही में नरेंद्र और संजय जोशी का विवाद बाहर आया। इसके बाद मेनका गांधी ने बयान दिया कि भगवा दल में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी की हालत ऐसी हो गई है कि हम न चाहकर भ निर्दलीय पी.ए. संगमा को अपना समर्थन देने को विवश हैं। उनके मुकाबले यूपीए का पलड़ा भारी लग रहा है। पर इससे मिलते संकेतों से पता चलता है कि दोनों ही राष्ट्रीय दलों में नई विकलांगता आ गई है। पहले तो दोनों ने ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को धूमिल किया है, अब पार्टी के अनुशासन को भी दीमक लग गई है। यह भारतीय राजनीति के लिए अशुभ संकेत हैं।
टीवी पर संसद की कार्यवाही का प्रसारण देखने से पता चलता है कि क्षेत्रीय दल कहीं से भी इस बात के लिए चिंतित नहीं है कि अन्य देशों की सीमाओं से लगे राज्यों की हालत कैसी है? सीमावर्ती राज्यों की हालत पर किसी भी चिंता नहीं। अपनी इसी पीड़ा को एक राज्य के मुख्यमंत्री ने शब्द दिए, उनका मानना था कि मैं राष्ट्रीय दल का सदस्य हूं, इस राज्य का मुख्यमंत्री भी हूं, मेरे राज्य की सीमा पर चीन दखल दे रहा है। उसकी गतिविधियां संदिग्ध लग रही हैं। मैंने कई बार इसके लिए उच्च स्तर पर बात की, पर कोई लाभ नहीं हुआ। इसके बजाए यदि मैं किसी क्षेत्रीय दल का प्रतिनिधित्व करता होता, तो शायद मेरी शिकायत को ध्यान से सुना जाता। राष्ट्रीय दलों पर क्षेत्रीय दलों का दबाव आज कुछ इस तरह से सामने आ रहा है। ऐसी बात नहीं है कि सीमाओं की हालत खराब है। आतंकवाद के खिलाफ मुस्तैदी से लड़ने वाली देश में ऐसी कोई प्रभावशाली एजेंसी भी नहीं है। देश के कानून केंद्र और राज्यों के बीच घर्षण पैदा कर रहे हैं। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलते ही रहते हैं। एक तरफ देश के नेता अपनी संतानों को विदेश भेजकर संतुष्ट हो जाते हैं, दूसरी तरफ देश की संघीय संरचना को नकारते हैं। ऐसी हालत मुगल शासन के अंतिम समय पर थी। उन दिनों दिल्ली की ताकत घट रही थी और सूबेदार अपनी मनमानी पर उतर आए थे। क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत इसी ओर इशारा कर रही है। यदि ऐसा न होता, तो आज ममता बनर्जी केंद्र के सभी निर्णयों पर टांग न अड़ातीं। एनटी रामाराव ने जब तेलुगुदेशम पार्टी बनाई थी, तब यह सवाल खड़े हुए थे कि इस प्रकार से इन क्षेत्रीय दलों की सार्वभौमिकता आखिर क्या है? राष्ट्रीय दल इस तरह के सवालों पर विचार नहीं करते। पर उनके सहयोगी दल अब उनके लिए उतने अधिक मददगार साबित नहीं हो पा रहे हैं। आज क्षेत्रीय दलों की अड़ंगेबाजी के कारण राष्ट्रीय दल स्वयं को बुरी तरह से असहाय नजर पा रहे हैं।
1980 में कांग्रेस के पास 42.68 प्रतिशत मत थे, 2009 में उसमें 14 प्रतिशत की कटौती हो गई। यही हाल भाजपा की है। 1998 में भाजपा के पास 25.6 प्रतिशत वोट थे, 2009 में उसमें 7 प्रतिशत की कटौती हो गई। इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि इन राष्ट्रीय दलों ने अपने वोट क्षेत्रीय दलों को लुटा दिए। निकट भविष्य में होने वाले लोकसभा चुनाव में इनके वोटों में कमी आएगी, यह तय है। राष्ट्रीय दल आज जनता की नजरों में अच्छे नहीं रहे, इसीलिए क्षेत्रीय दल आगे आ रहे हैं। यदि राष्ट्रीय दल जिस तरह से वोट के लिए जद्दोजहद करते हैं, उसी तरह नागरिकों के हितों के लिए करें, तो कोई बात ही नहीं है कि वे जनता की नजरों में गिर जाएं। वोट लेते ही जिस तरह से आज राष्ट्रीय दल जनता से कोई वास्ता नहीं रखते, उसी का कारण है कि वे आज जनता की नजरों में लगातार गिर रहे हैं। क्षेत्रीय दलों पर बढ़ता विश्वास इसी का प्रतिफल है। भाजपा पंजाब में अकाली दल और बिहार में जनता दल यू की बदौलत सत्ता में आई थी। यही हालत पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की है। येद्दियुरप्पा आज हाईकमान को आंख दिखा रहे हैं। दिल्ली में बठे उनके नेता अपनी इज्जत बचाने की मशक्कत कर रहे हैं। आंध्र में जगन मोहन रेड्डी बगावत करते हैं, तो राष्ट्रीय दल के रूप में पहचान कायम करने वाली कांग्रेस डगमगाने लगती है। इसका असर राष्ट्रपति चुनाव में साफ दिखाई देगा, जब हम देखेंगे कि इसमें भी क्रास वोटिंग हुई है। जुलाई में ही इस तरह के कई तमाशे देखने को मिलेंगे। ये छोटी-छोटी पटकथा लोकसभा चुनाव के लिए ही लिखी जा रही है। सबसे बड़ी आशंका यह है कि यदि दोनों ही राष्ट्रीय दल मिलकर अपनी 75 सीटें गुमाती हैं और ये सीटें क्षेत्रीय दलों के पाले में आती हैं, तो उस राष्ट्रीय दल का स्वरूप कितना मजबूत होगा? सिद्धांतहीन, दृष्टिहीन और अदूरदर्शी लोग इर्न दिल्ली का प्रशासन संभालेंगे, तो हालत कैसी होगी, यह स्पष्ट है। हमारी घरेलू परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय समूह इसकी अनुमति नहीं देते।
देाश् में तीसरे मोर्चे के लिए एक कोशिश जयललिता और नवीन पटनायक ने मिलकर की थी, पर यह फलभूत नहीं हो पाई। उनके विचार लोगों को अच्छे नहीं लगे। अच्छा भी हुआ। केवल स्वार्थवश किए जाने वाले गठबंधन से देश का भला नहीं हो सकता। इन हालात में यही सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि राष्ट्रीय दल बार-बार अपने सिद्धांतों की तिलांजलि देकर क्षेत्रीय दलों के आगे झुकेंगे, तो वे इसका पूरा फायदा उठाने में नहीं चूकेंगे। यदि दोनों दल मिलकर यह तय कर लें कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपने पार्टी के सिद्धांतों से अलग किसी प्रकार का समझौता नहीं करेंगे। भले ही हमारे वोटों में कटौती हो जाए, फिर क्या मजाल क्षेत्रीय दल उन पर हावी हो सके। यदि दोनों ही राष्ट्रीय दल अपने सिद्धांतों के साथ उजले चेहरे लेकर जनता जनार्दन के सामने जाते हैं, तो निश्चित रूप से कुछ समय के लिए राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण पैदा हो जाएगा, पर देश को बचाने के लिए उसके हित के लिए यह कोई बड़ी बाधा नहीं है। राष्ट्रीय दल ही कमजोर साबित हो रहे हैं। इसलिए क्षेत्रीय दलों की बन आई है। राष्ट्रीय दल अपनी नीतियों पर भरोसा करें, और उजले चेहरे के साथ जनता से वोट मांगें, तो आवश्यकता नहीं है, ममता के नखरे की और न ही मुलामय की कृपा की। मजबूत दलों से ही मजबूत प्रजातंत्र का निर्माण होगा।

गुरुवार, 28 जून 2012

भटका मानसून तो बढ़ेगी महँगाई

 
दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख 



हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 22 जून 2012

इस बार भी खूब भिगोएगी ये बारिश






http://epaper.navabharat.org/

नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 21 जून 2012

किसे सुनाई देता है आषाढ़ का आर्तनाद



आज दैनिक भास्‍कर के सभी संस्‍करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
http://10.51.82.15/epapermain.aspx?edcode=120&eddate=6/21/2012%2012:00:00%20AM&querypage=8

मंगलवार, 19 जून 2012

राजनीति के गलियारों में एक ही चर्चा कौन बनेगा वित्तमंत्री?

डॉ. महेश परिमल
देश गंभीर आर्थिक स्थिति से गुजर रहा है। औद्योगिक विकास दर लगातार घट रही है। आर्थिक मंदी की ओर बढ़ते देश की हालत उबारने की सरकार की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। मानसून खिंचन लगा है। दूसरी ओर महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। देश की इससे बड़ी दुर्दशा क्या होगी कि जिससे महंगाई कुछ कम हो, उस पेट्रोल के दाम कम करने के लिए जिम्मेदार मंत्री और अफसरों के विदेश दौरे के कारण दाम कम नहीं हो पाए। क्रूड आइल के दाम कम हो गए, इसके मद्देनजर यदि पेट्रोल के दाम कम हो जाते, तो महँगाई बढ़ाने वाले कई कारकों का असर कम हो जाता। पर लालफीताशाही के कारण देश को बरबादी के कगार पर पहुंचाने वाले नेता अभी राष्ट्रपति चुनाव में उलझे हुए हैं। इन हालात में देश के कमजोर प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री का भी पद संभाल लिया और सख्त निर्णय नहीं ले पाए, तो देश की हालत बहुत ही खराब हो जाएगी।
नागरिकों ने अब प्रणब मुखर्जी को नए राष्ट्रपति के रूप में देखना शुरू कर दिया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि तो फिर कौन होगा देश का अगला वित्तमत्री? इस पद के लिए कई नाम सामने आ रहे हैं, पर कांग्रेस यह नहीं चाहती कि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए कोई ऐसा निर्णय लिया जाए, जिससे महँगाई बढ़े और सरकार की फजीहत हो। इसलिए ऐसे किसी व्यक्ति को वित्तमंत्री का पद देना खतरे से खाली नहीं है, जो इस पद के लिए कम अनुभवी हो। कांग्रेस के साथ मुश्किल यह है कि यह पद सीधे जनता जनार्दन से जुड़ा हुआ हे, इसलिए इस पद पर रहने वाला हमेशा नागरिकों एवं व्यापारियों के निशाने पर आकर आलोचनाओं का शिकार होता रहता है। जहां आर्थिक विकास की बात होती है, तो वित्त मंत्री की काबिलियत पर ऊंगलियां उठनी शुरू हो जाती है। प्रधानमंत्री के पास वैसे भी काम का बहुत ही दबाव है। पूर्व में जब उनके पास कोयला मंत्रालय था, तब उनकी जानकारी के बिना करोड़ों का घोटाला हो गया। कई निर्णय ऐसे लिए गए, जिसकी जानकारी प्रधानमंत्री को भी नहीं थी, इसलिए निजी कंपनियों के पौ-बारह हो गए। इसे देखते हुए वित्त पंत्री का प्रभार प्रधानमंत्री को देना खतरे से खाली नहीं है।
  वैश्विक बदहाली से भारत को बचाने में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को पूरी तरह से असफल माना जा रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री भी भी भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने संबंधी मुखर्जी के प्रयासों से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। पीएमओ सूत्रों की माने तो, वित्त मंत्री का पद खाली होने पर इस गद्दी को प्रधानमंत्री खुद अपने पास रखेंगे। वहीं पीएम के आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी. रंगराजन वित्त मंत्रालय चलाने में प्रधानमंत्री का सहयोग करेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री के पास रंगराजन को अगला वित्त मंत्री बनाने का भी विकल्प होगा, लेकिन यह आसान नहीं होगा। दरअसल, रंगराजन को वित्त मंत्रालय का प्रभार देने में सबसे बड़ा रोड़ा वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बन सकते हैं। वहीं पार्टी आलाकमान के दबाव में होने के चलते भी प्रधानमंत्री की इस ख्वाहिश को पूरा किया जाना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। दिलचस्प है कि यूपीए एक में भी एक बार प्रधानमंत्री की ऐसी ही उम्मीदों को पार्टी झटका दे चुकी है। उस समय भी सिंह ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह को वित्त मंत्री बनाने की सिफारिश की थी। हालांकि इस संबंध में प्रधानमंत्री के सारे प्रयास विफल साबित हुए। वित्त मंत्री बनने की सूचीं जो सबसे अहम नाम सामने आ रहा हैं वो खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का है। प्रधानमंत्री कुछ समय के लिए वित्त मंत्रालय अपने पास रख सकते है। एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन की साख अंतराष्ट्रीय स्तर की है। देश की अर्थव्यवस्था बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही है और अर्थशास्त्री मनमोहन से देश को संकट से वैसे ही उबारने की उम्मीद की जा रही है, जैसे उन्होनें 1991 की मंदी के दौरान कर के दिखाया था। दूसरा नाम है शहरी विकास मंत्री कमलनाथ का। कमलनाथ यूपीए की पहली पारी में वाणिज्य और उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। आर्थिक मामलों से जुड़े कई विभागों का भी अनुभव और गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। वित्त मंत्री की कुर्सी के लिए जो बातें कमलनाथ के खिलाफ जाती हैं उनमें सबसे पहली है, बड़े मंत्रालय संभालने का अनुभव नहीं होना। देश के मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए किसी नए आदमी को इसकी जिम्मेदारी देना मुश्किल होगा। कमलनाथ गांधी परिवार के करीबी भले ही माने जाते हों लेकिन मनमोहन की गुडलिस्ट में उनका नाम नहीं हैं। इसके अलावा नीरा राडिया टेप के मामले में उनका नाम काफी उछाला गया है। इसलिए उनके नाम पर विचार करने के पहले उन पर लगे दाग छुड़ाने होंगे। तीसरा नाम जयराम रमेश का चल रहा है। जयराम भी एक अर्थशास्त्री हैं। जयराम गांधी परिवार के काफी करीबी माने जाते हैं। लेकिन जयराम के साथ दिक्कत ये है कि उनकी छवि ज़मीन से जुड़े नेता की नहीं है और ना ही वो राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं। चौथा नाम मोंटेक सिंह अहलूवालिया का नाम भी चर्चा में है। अहलूवालिया योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रुप में देश की अर्थव्यवस्था को अच्छी तरह समझते हैं। अर्थशास्त्री हैं और उनके पास वर्ल्ड बैंक का भी अनुभव है। एक और बात मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर प्रधानमंत्री भरोसा करते हैं। मोंटेक सिंह का सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट ये है कि वो राजनीतिक शख्सियत नहीं है। लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी इस पद की जिम्मेदारी जनता से जुड़े हुए नेता को देना चाहेगी। लेकिन उनके साथ दिक्कत यह है कि उनके बयान कई बार सुर्खियों में आकार विवादास्पद हो चुके हैं। फिर चाहे दिन भर की कमाई 26 रुपए हो, तो वह यथेष्ट है। हाल ही में टायलेट पर 35 लाख रुपए खर्च करने का मामला भी सामने आया है। इसलिए उन्हें गंभीर नहीं माना जाता। पांचवां नाम सी. रंगराजनहै। उनके हक में सबसे पहली बात ये है कि वो प्रधानमंत्री की खास पसंद हैं। अर्थशास्त्र के जानकार हैं और रिजर्व बैंक के गर्वनर रह चुके हैं।
सी रंगराजन के खिलाफ जो बात आती है वो ये है कि अर्थशास्त्री रंगराजन राजनेता नहीं है और पार्टी अगले लोकसभा चुनाव को देखते हुए ही किसी राजनेता को इस अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी देना चाहेगी। सरप्राइज़ पैकेज के तौर पर आनंद शर्मा का नाम भी वित्त मंत्री की दौड़ में चल पड़ा है। कैबिनेट मंत्री के तौर पर आनंद शर्मा का काम अच्छा रहा है। लेकिन आनंद शर्मा ने इतनी बड़ी जि़म्मेदारी पहले कभी नहीं उठाई है और यही बात उनके खिलाफ जा रही है।सरकार में बहुत से लोग हैं. प्रणब लोकसभा में सत्ता पक्ष के नेता भी हैं।  कांग्रेस को उनके कद के मुताबिक ही किसी नेता का चुनाव करना होगा।
एक नाम सुशील कुमार शिन्दे का भी है।  कई बार चुनाव जीत चुके शिन्दे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रह चुके है।  उन्हें एक अनुभवी और मंझे हुए नेता के तौर पर देखा जाता है। क्या सोनिया गांधी आदर्श घोटाले में आरोपों के घेरे में आ चुके शिंदे को यह जिम्मेदारी देंगी?  लोकसभा के नेता के लिए चिदंबरम का नाम भी सुर्खियों में हैं। चिदंबरम गृहमंत्री हैं, बड़े कद के नेता भी हैं।  लेकिन हाल के दिनों में कई आरोपों से घिरे चिदंबरम विपक्ष के निशाने पर रहते हैं।  ऐसे में संसद में पार्टी की ढाल बनना शायद उनके लिए मुश्किल साबित हो।
कुल मिलाकर एक तरफ है रायसीना की राजनीति तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री की कुर्सी। दोनों का फैसला सोनिया गांधी की सहमति पर निर्भर है।  हालांकि खबर यह भी है कि पीएम वित्त मंत्रालय को खुद के पास रखने की इच्छा जता सकते हैं, क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले आखिरी बजट पेश किया जाना है ऐसे में अनुभव को तवज्जो दी सकती है। पर बात वहीं आकर अटक जाती है कि क्या डॉ. मनमोहन सिंह को यह जवाबदारी सौंपी जाए? जनता उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ही नहीं देखना चाहती, फिर क्या वित्त मंत्री के रूप में भी उन्हें ही देखे? कई बार ऐसे हालात सामने आए, जिस दौरान प्रधानमंत्री का एक कठोर निर्णय देश को आर्थिक मंदी से बचाने की दिशा में कारगर साबित हो सकता था,पर यह निण्रय अनिर्णय ही रहा? उनकी नाकामी के कारण देश को कई बार शर्मसार भी होना पड़ा है। देश के पिछड़ने का कारण भी कई बार उन्हें ही माना गया है। ऐसे में फिर वही सवाल राजनीति के गलियारे में गूंज रहा है कि कौन होगा अगला वित्त मंत्री?
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 16 जून 2012

मुगल गार्डन की रौनक पर बढ़ता खतरा?

डॉ. महेश परिमल
भारत देश का राष्ट्रपति चुनाव का परिदृश्‍य अब साफ होता दिखाई दे रहा है। मुलायम के यू टर्न लेते ही कांग्रेस खुश हो गई। पर ममत का कहना है कि खेल अभी बाकी है। वह कुछ भी कर सकती हैं। इसके पहले भी उसने सरकार की नकेल कई बार खींची है। इसलिए अभी तक तो कुछ नहीं कहा जा सकता कि ऊँट किस करवट बैठेगा। पर इतना तो तय है कि अब सत्तारुढ दल को क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। मुलायम यादव से कई बार केंद्र सरकार ने सहायता ली, पर उनके अनुसार इसका रिस्पांस नहीं मिला। कई बार वे केंद्र के व्यवहार से आहत हुए। मुलायम के रुख में हुए परिवर्तन की वजह यही है।
पूरा देश इन दिनों कौन बनेगा राष्ट्रपति नामक धारावाहिक देख रहा है। इस गरिमामय पद के लिए पहली बार इतना घमासान देखने को मिल रहा है। हालांकि अभी नामांकन के लिए 15 दिनों का समय है, पर इन 15 दिनों में बहुत कुछ ऐसा होने वाला है, जिससे राजनीति के दांव-पेज देखने को मिलेंगे। अब तक ममता बनर्जी ने केंद्र की नकेल अपने हाथों पर रखी थी। कई बार उसने अपनी बात मनवाई भी है। पश्चिम बंगाल को विशेष पैकेज देने की मांग वह काफी समय से करती आ रही है, इसमें अब अखिलेश यादव भी शामिल हो जाएंगे। वे भी अब उत्तर प्रदेश के लिए विशेष पैकेज की माँग करेंगे, यह तय है। राष्ट्रपति चुनाव ने जिस तरह से मुलायम और ममता को करीब ला दिया है, उससे तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट से इंकार नहीं किया जा सकता। सपा और तृणमूल काफी समय से केंद्र के साथ जुड़े हुए हैं। समय-समय पर इन दलों ने केंद्र सरकार को गिरने से बचाया भी है। इसके बाद भी केंद्र सरकार ने इन दलों का उपयोग यूज एंड थ्रो की तरह किया। ममता ने तो कई बार अपने तेवर दिखाए भी, पर मुलायम सिंह यादव को अब मौका मिला है कि वे यह बता सकें कि राष्ट्रपति चुनाव में क्षेत्रीय दलों की महत्वपूर्ण सहभागिता को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।  मुलायम सिंह यादव ने ममता बनर्जी के साथ राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर तीन नाम सुझाए हैं।  मनमोहन सिंह  इससे उन्हें लगता है कि प्रणब मुखर्जी के पीएम बनने की राह खुल जाएगी।  एपीजे अब्दुल कलाम  इसके माध्यम से मुलायम की मंशा अल्पसंख्यक कार्ड का इस्तेमाल करने की है।  ताकि जरूरत पड़ने पर वे अपने पीछे वाममोर्चे को लामबंद कर सकें।
तीसरे मोर्चे की अगुवाई की मंशा
देश में आज जो राजनीतिक हालात हैं, उसमें तीसरे मोर्चे की अगुवाई करने में मुलायम सिंह यादव का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। मुलायम सिंह यादव के लिए अच्छी बात यह है कि तीसरे मोर्चे के दो कर्णधार नवीन पटनायक और जे. जयललिता केंद्र की राजनीति करने की इच्छुक नहीं हैं। ऐसे में अगर तीसरा मोर्चा बनता है तो वे उसके स्वाभाविक अगुवा होंगे। उत्तरप्रदेश में जब से समाजवादी पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई है, तभी से राजनीतिक गलियारों में उसके सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की अहमियत बढ़ गई है। मुलायम कितने अहम हो गए हैं, इसका अंदाजा तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन यूपीए सरकार के तीन साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित रात्रिभोज में वे शामिल हुए थे। अब राष्ट्रपति पद के लिए यूपीए का उम्मीदवार चुनने को लेकर उन्होंने जो दांव चला है, उससे उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है।
मुलायम सिंह यादव की इस रणनीति से इस बात की भी तस्दीक हो जाती है कि केंद्र की राजनीति करने को लेकर किस तरह से उनकी महत्वाकांक्षा कुलांचे भर रही है। राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के चयन को लेकर मुलायम जिस तरह से अपनी मनवाने पर जोर दे रहे हैं, उससे उनकी मंशा साफ है। वे चाहते हैं कि रायसीना हिल्स में ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में विराजमान हो, जिसे इस बात का अहसास हो कि वह मुलायम के कारण राष्ट्रपति भवन पहुंचे हैं। इसे लेकर उनका अपना गणित है। अगले लोकसभा चुनाव में त्रिशंकु सदन बनने की संभावना है, लेकिन मुलायम को उम्मीद है कि सपा के पास सांसदों की अच्छी खासी संख्या रहेगी। ऐसे में वे प्रधानमंत्री के कम्प्रोमाइज्ड उम्मीदवार के रूप में प्रबल दावेदार हो सकते हैं। मुलायम जानते हैं कि इतिहास में पहले भी ऐसा हो चुका है। देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल इसी तरह से पीएम की कुर्सी पर पहुंचे थे। यह अलग बात है कि उनका कार्यकाल कोई उल्लेखनीय नहीं रहा।
पद की गरिमा को बचाना दुष्कर
समय ऐसा आ गया है कि राष्ट्रपति पद की गरिमा को बचाए रखना लगातार दुष्कर होता जा रहा है। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जब नियुक्ति हुई, तब सभी ने उनकी विद्वता की सराहना की थी। उन्हें देश के सर्वोच्च पद के लिए स्वीकार भी किया था। लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान यह पद गौण हो गया। इसके बाद इसकी गरिमा पर भी आँच आने लगी। फखरुद्दीन अली अहमद तो इतने लाचार थे कि उन्हें आधी रात को जगाकर आपातकाल लगाने के लिए हस्ताक्षर लिए गए। जैलसिंह ने इंदिरा जी की स्तुति में जो बयान दिया था ,उस पर काफी विवाद हुआ था। इस तरह से वे भी राष्ट्रपति पद पर एक रबर स्टेम्प की तरह रहे। डॉ. शंकर दयाल शर्मा और डॉ अब्दुल कलाम ने अपनी विद्वता से इस पद की गरिमा को संजोने का प्रयास किया। पिछले पखवाड़े एक हिंदी पत्रिका में एक मजेदार काटरून प्रकाशित किया गया। काटरून में राष्ट्रपति भवन के एक विशाल खंभे पर एक पोस्टर लटका हुआ है, जिस पर लिखा है राष्ट्रपति की आवश्यकता है? आयु सीमा, 35 वर्ष (75 से अधिक उम्र के वृद्धों को वरीयता), काम का प्रकार- फांसी की सजा प्राप्त अपराधियों की माफी अर्जियों, इसके अलावा सरकार जिस कागज पर कहे,उस पर हस्ताक्षर करना, नक्शे में जो खोजने पर भी न मिले, उन देशों की सपरिवार यात्रा करना, वेतन अन्य सुविधाओं समेत डेढ़ लाख रुपए। काटरून भले ही व्यंग्य में बनाया गया हो, पर यह व्यंग्य नहीं, वास्तविकता है। यह हमारे देश के प्रजातंत्र की बलिहारी है कि ऐसे काटरून सामने आए, जिसे लोगों ने देखा और सराहा। देश के सर्वोच्च पद की गरिमा आजादी के पहले दो दशकों तक बनी रही। पहले राष्ट्रपति के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की नियुक्ति की गई, तब उन्होंने अपने पद को सर्वोच्चता प्रदान की। इसके बाद डॉ. राधाकृष्णन जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा वाले व्यक्ति ने इस पद को सुशोभित किया। डॉ. जाकिर हुसैन ने भी इस पद की गरिमा को बनाए रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इसके बाद जब इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला, तब से राष्ट्रपति का पद रबर स्टेम्प की तरह हो गया। उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति का पद भी राजनीति का अखाड़ा बन गया। अपनी ही पसंद के प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के बदले इंदिरा जी ने विपक्ष के प्रत्याशी वी.वी. गिरी को अपना समर्थन दिया, विपक्ष को मात देने के लिए अपने ही प्रत्याशी को हराने का उदाहरण पहले कभी नहीं देखा गया। इसके बाद जो भ राष्ट्रपति बना, उसने रबर स्टेम्प की ही तरह अपनी पहचान बनाई। फखरुद्दीन अली अहमद को आधी रात में जगाकर उनसे आपातकाल के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाए गए। इसके बाद के.आर. नारायण तक राष्ट्रपति की पहचान रबर स्टेम्प की तरह ही रही। इसके बाद डॉ. शंकर दयाल शर्मा और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे दो राष्ट्र्रपति देश को मिले, जिन्होंने पद की गरिमा को निस्पृह भाव से बनाए रखी। इसके बाद वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पर कई आक्षेप लगाए गए। पुत्र के व्यवसाय के लाभ के लिए मेक्सिको की यात्रा करना उन आक्षेप में शामिल है। यही नहीं सेवानिृत्ति के बाद पुणो में सस्ती दर पर जमीन और बंगला स्वीकारने के मामले ने भी तूल पकड़ा। जिसे बाद में उन्होंने अस्वीकार भी कर दिया। सभी राष्ट्रपतियों में से प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल ही ऐसा रहा, जिसमें उनकी कई विदेश यात्राएं हुई, पर इससे किसी भी राष्ट्र से भारत से संबंध पहले से मजबूत हुए, ऐसा नहीं लगता। उनका कार्यकाल निराशाजनक कहा जा सकता है।
अब समय आ गया है कि देश के इस सर्वोच्च पद की गरिमा को बचाए रखने के लिए राष्ट्रपति की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की जाए। उनकी छवि को रबर स्टेम्प के रूप में प्रचारित किया जाना उचित नहीं है। राष्ट्रपति को जहां दृढ़ता दिखाई जानी चाहिए, वहां वे पूरी तरह से दृढ़ दिखाई दें। विपरीत परिस्थितियों में देश को दिशा देने में राष्ट्रपति सक्षम हो। केवल सरकार की कठपुतली बनकर न रह जाएं राष्ट्रपति।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 15 जून 2012

फीकी पड़ गई अन्ना वाणी


डॉ. महेश परिमल
अपने साथियों के विवादास्पद बयानों के कारण और अपनी बेबसी के कारण अन्ना की आवाज में अब लोगों में जोश भरने का दम नहीं रहा। टीम के सदस्यों द्वारा समय-समय पर सीधे प्रधानमंत्री को निशाना बनाया जा रहा है। पहले प्रशांत भूषण ने प्रधानमंत्री को शिखंडी कहा, अब हाल ही में किरण बेदी ने प्रधानमंत्री को घृतराट्र कहा गया है। ऐसे ही बयानों से पूरी टीम की छवि धूमिल हो रही है। अधिक समय नहीं हुआ है,जब लोग अन्ना टोपी पहनकर गर्व महसूस करते थे। पर अब बार-बार बदलते बयान के कारण लोग अब उन्हें उतनी प्राथमिकता नहीं देते। इसके साथ ही अब उनके साथ बाबा रामदेव भी जुड़ गए हैं और पहले दिन से ही उनमें विवाद होना शुरू हो गया है। ऐसे में दोनों ही अपनी ढपली-अपना राग अलाप रहे हैं। दो अलग-अलग मुद्दों पर भला एक मंच से लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है? एक म्यान में भला दो तलवारें रह भी सकती हैं? बाबा रामदेव पहले भी अपने आंदोलन के लिए प्रभावशाली नहीं थे, अभी भी नहीं हैं। अन्ना के साथ जुड़कर उन्होंने अन्ना की साख को भी दांव पर लगा दिया है। प्रसिद्धि की चाह बाबा रामदेव को अन्ना के करीब ले आई है। पर वे यह भूल गए हैं कि उनकी योग वाली सोच में केवल दवाइयाँ और योगासन वाली क्रियाएं हैं। उनकी अपनी कोई ऐसी विचारधारा नहीं है, जिसके बल पर वे आगे बढ़ सकते हैं। वैसे भी पिछले साल जिस तरह से उन्होंने महिलाओं के कपड़े पहनकर अपने इज्जत बचाई थी, उससे यह सिद्ध हो जाता है कि समय आने पर वे पलटी मारने में नहीं हिचकेंगे।
स्वयं अन्ना हजारे भी कम विवादास्पद नहीं हैं। कभी वे अपने साथियों के बयानों का समर्थन करते हैं, तो कभी कहते हैं कि मैंने ऐसा नहीं कहा। प्रधानमंत्री पर जब टीम द्वारा कटाक्ष किया गया, तो पहले उन्होंने कुछ नहीं कहा, बात जब बिगड़ने लगी, तो उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बेदाग हैं। ऐसा लगता है कि आजकल प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ भी बोलना एक फैशन ही हो गया है। कोई भी कभी भी उन पर कटाक्ष करता रहता है। पर हमारे मौनी बाबा का मौन टूटता ही नहीं है। कुछ दिनों पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की तुलना निर्मल बाबा से कर दी। अब भाजपा से यह कैसे पूछा जाए कि आखिर संजय जोशी की क्या गलती थी कि उन्हें कार्यकारिणी से भी हटा दिया गया? भविष्य में मोदी चाहें तो किसी को भी हटा सकते हैं। ऐसा भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी के रवैए से लगता है। बाबा रामदेव को चरणस्पर्श प्रणाम करते भाजपाध्यक्ष को टीवी पर कई बार दिखाया गया। तय है कि भाजपा को बाबा का और बाबा को भाजपा का साथ चाहिए। आखिर बाबा भी तो केंद्र के निशाने पर हैं ही।
प्रधानमंत्री को शिखंडी कहने वाली अन्ना टीम को यह भी याद रखना होगा कि शिखंडी ने पांडव को लाभ दिलाया था। भीष्म को मारना सहज नहीं था, परंतु शिखंडी के सामने आने से उसने हथियार डाल दिया, अजरुन ने इस स्थिति का लाभ उठाया। वैसे देखा जाए, तो शिखंडी महाभारत का बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र था। उसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अन्ना यह भूल गए हैं कि उन्हें भी रातों-रात लोकप्रियता मिली थी। देखते ही देखते वे भी युवाओं के आदर्श बन गए थे। लोगों ने उनमें सत्य एवं निष्ठा जैसे किसी तत्व के दर्शन किए थे। तभी तो अन्ना केप पहनकर स्वयं को गौरवान्वित समझते भी थे। भ्रष्टाचार के खिलफ अन्ना ने जो मुहिम छेड़ी, उसका हिस्सा बनकर लोगों ने स्वयं को भीड़ से अलग माना। अन्ना के रूप में वे सब देश में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने वाली एक रोशनी के रूप में देख रहे थे। उनके सगत में किसी ने कोई कमी नहीं रखी। लोग तो शाम को मोमबत्ती जुलूस निकालकर स्वयं को अन्ना से जोड़ रहे थे। पर आज हालात बदल गए हैं। अब लोग अन्ना एवं उनकी टीम को शंका की दृष्टि से देख रहे हैं। टीम अन्ना में अब पहले जैसी गंभीरता भी दिखाई नहीं देती। छोटी-छोटी बातों पर उलझना, गलत बयानबाजी करना, देश की संसद पर हमला बोलना, प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करना, इन सबसे ऐसा लगा कि ये टीम अब भटक गई है। टीम पर भी कई आरोप लगे। उन आरोपों को गलत ठहराने के बजाए टीम अन्ना ने अपने तेवर और तीखे कर लिए। केंद्र सरकार के अलावा अब नागरिक भी जान गए कि अब अन्ना के आंदोलनों को कोई समर्थन नहीं देगा। इसलिए अब उनकी तमाम घोषणाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। जब वह अपने ही लोगों को शांत नहीं कर पा रही है, तो फिर देश के लोगों को किस तरह से शांत कर पाएगी?
टीम अन्ना ने एक ज्वलंत मुद्दे पर अपनी लड़ाई शुरू की थी। लोगों ने उनमें गांधी का चेहरा देखा, उन पर विश्वास किया। पर इस विश्वास का फल यह मिला कि आज अन्ना के किसी भी बयान पर अधिक समय तक विश्वास नहीं किया जा सकता। क्या पता दूसरे ही पल उसका खंडन आ जाए। जब तक टीम अन्ना दूसरों का सम्मान करना नहीं सीखेगी, तब तक उनका भी सम्मान नहीं होगा, यह तय है। काले धन की वापसी बाबा का मुद्दा हो सकता है, लोकपाल से उसका कोई वास्ता नहीं है। फिर दोनों का साथ-साथ होना किस बात का परिचायक है? अन्ना के पास अपनी विचारधारा है, पर बाबा के पास अपनी क्या विचारधारा है?  योग से रोग तो दूर हो सकते हैं, पर योग से राजनीति के रोग को दूर करना बहुत मुश्किल है। योग से अच्छे विचारों का प्रादुर्भाव हो सकता है, पर राजनीति की बजबजाती गंदगी को दूर करना योग के वश में नहीं है। बाबा योग की राजनीति को भले ही अच्छी तरह से समझते हों, पर राजनीति के योग को समझना उनके लिए मुश्किल है। टीम अन्ना से हाथ मिलाकर वे अपनी छवि को स्वच्छ नहीं कर सकते। टीम अन्ना को भी यह समझना होगा कि अपनी विचारधारा में बाबा की विचारधारा को शामिल न करे। टीम अन्ना के प्रमुख अन्ना हजारे ही हैं, उन्हें बिना विश्वास में लिए ऐसा बयान सामने न लाया जाए, जिससे उनकी छवि धूमिल हो। अन्ना के सहयोगी केवल सहयोगी हैं, यह सच है, पर वे जनप्रतिनिधि नहीं हैं। जनता का शुभ चिंतक होना और जनता का प्रतिनिधि होने में अंतर है। वे सुझाव दे सकते हैं, पर सुझाव को कानून के रूप में नहीं ला सकते। इस बात का अंदाजा अन्ना टीम को होना चाहिए।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 14 जून 2012

सरकार के लिए राष्‍ट्रपति की /महिला पायलटों ने निभाया कर्तव्‍य

http://epaper.haribhoomi.com/epapermain.aspx

हरिभूमि और नवभारत रायपुर बिलासपुरमें आज प्रकाशित दो विभिन्‍न आलेख

सोमवार, 11 जून 2012

निर्विरोध चुनाव के राजनीतिक निहितार्थ






दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-06-11&pageno=9#id=111742725232658658_49_2012-06-11http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-06-11&pageno=9#id=111742725232658658_49_2012-06-11

शनिवार, 9 जून 2012

नहीं बच सकते प्रधानमंत्री

हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक http://epaper.haribhoomi.com/epapermain.aspx

मंगलवार, 5 जून 2012

कब सुध लेंगे बिगड़ते पर्यावरण की





दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-06-05&pageno=9

सोमवार, 4 जून 2012

पूनम पांडे यानी अश्लीलता की सुनामी

डॉ. महेश परिमल
आज मीडिया किस तरह से रसातल में जा रहा है, इसका सच्च उदाहरण पूनम पांडे है। इसके बयान को लगातार मीडिया में महत्वपूर्ण स्थान मिलता रहा है। लोग उसे चटखारे लेकर पढ़ने भी लगे हैं। सोचो, एक युवती लगातार स्वयं के निर्वस्त्र होने की घोषणा करती रहे, लोग उसे सुनते रहे। आखिर उसने अपनी इच्छा की पूर्ति कर ली। इस बयान के साथ की ये तो केवल शुरुआत है। आगे तो अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। देश में जहाँ आम भारतीय छात्र-छात्राएँ दिन-रात परिश्रम कर अच्छे से अच्छे अंक ला रहे हैं, उनकी मेहनत अखबारों में चमक रही है। दूसरी ओर उसी पेज पर पूनम पांडे की वह अश्लील तस्वीर भी दिखाई दे रही है, जिसका उसने वादा किया था। उसने वादा निभाया। मीडिया ने भी उसका भरपूर साथ दिया।
कोई बता सकता है कि आखिर मिस पांडे का उद्देश्य क्या है? उसका उद्देश्य ऐसा तो कतई नहीं है, जिससे समाज का भला होता हो, समाज को एक नई दिशा मिलने वाली हो। वह निर्वस्त्र होकर आखिर अपनी किस खुशी का प्रदर्शन करना चाहती है? खैर जो भी हो, पर मीडिया का क्या यह कर्तव्य नहीं बनता कि ऐसे बयान देने वाली या फिर स्वयं को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र करने वाली को ज्यादा तरजीह न दी जाए। मिस पांडे न केवल निर्वस्त्र हुई, बल्कि अपनी तस्वीर को सोशल साइट्स में भी डालने की जुर्रत की। उस पर यह भी कह रही हैं कि 18 वर्ष से कम के लोग इसे न देखें। इसका आशय यही हुआ कि वह जानती है कि वह एक अपराध कर रही है। इंटरनेट पर ऐसी कोई बंदिश तो नहीं है कि अश्लील तस्वीरों पर प्रतिबंध लग सके। इस अनुरोध के पीछे उसकी यही भावना थी कि उनकी अश्लील तस्वीर को केवल 18 वर्ष के युवा होते किशोर ही देखें। उसकी तस्वीर को देखा भी गया। आखिर वह अपने घ्यानाकर्षक के उद्देश्य में सफल हो गई। उसे सफल बनाया मीडिया ने। मीडिया के पास ऐसी कानून की कोई किताब नहीं है, जिस पर यह लिखा हो कि पूनम पांडे जैसी युवतियों की हरकतों को स्थान न दिया जाए। बस मीडिया के पास यही आधार है, उसे हाइलाइट करने के लिए।
सवाल यह उठता है कि क्या अपनी खुशी को अभिव्यक्त करने के लिए कोई युवती स्वयं को सरेआम निर्वस्त्र कर सकती है? तो फिर समाज का क्या कर्तव्य है? उसे निर्वस्त्र होता देखता रहे। अरे! यह तो वही भारत की पावन भूमि है, जहाँ एक नारी कभी भी किसी भी रूप में खुले आम निर्वस्त्र नहीं देख सकता। कई बार ऐसे भी दृश्य इसी देश में देखने को मिले हैं, जब प्रसव पीड़ा से कराहती कोई नारी यदि सड़क पर ही बैठ जाए और उसकी प्रसूति वहीं हो जाए, तो कई महिलाएँ अपनी साड़ी की आड़ कर देती हैं, ताकि एक नारी की इज्जत सुरक्षित रहे। इस तरह की खबरें मीडिया के लिए भले ही महत्वपूर्ण न हो, पर समाज के लिए महत्वपूर्ण होती है। जो महिलाएं इस प्रसूति यज्ञ में शामिल होती हैं, वे समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाती हैं। इस तरह की खबर से कभी कहीं यौन इच्छाओं का विस्फोट होता नहीं देखा गया। तो फिर पूनम पांडे के मामले में मीडिया इतना अधिक संवेदनशील कैसे हो गया? आज पूनम पांडे ऐसा कर रही है, तो वह खबर बन रही है। पर जब यही पूनम पांडे किसी मीडिया शहंशाह की बेटी होती, या फिर किसी सभ्रांत घर की बहू होती, तो क्या उस समय भी मीडिया इतना अधिक संवेदनशील होता?
पूनम ने रातों-रात प्रसिद्ध होने के नुस्खे की बदौलत ऐसा किया। ऐसा करने के पहले वह बार-बार इसकी घोषणा भी करती रही। उसने कोई अप्रत्याशित कार्य नहीं किया, उसने जो कहा, उसे किया। पर उसकी घोषणा और उस पर अमल के पीछे कोई सामाजिक उद्देश्य कतई नहीं था। न तो वह किसी के अत्याचार के विरोध में ऐसा कर रही थी, न ही वह बेटी बचाओ आंदोलन का हिस्सा बन रही थी, न ही वन्य प्राणी संरक्षण का कोई अभियान चला रही थी, न ही पर्यावरण बचाव को लेकर वह किसी मुहिम का हिस्सा थी, तो फिर उसे इतनी प्राथमिकता क्यों दी गई? उसे तो निर्वस्त्र होना ही था, फिर चाहे कलकत्ता राइड्स जीतती या फिर चेन्नई सुपरकिंग। उसे चाहिए थी पब्लिसिटी, जो उसे मिल गई। वास्तव में पूनम पांडे के नाम पर मीडिया निर्वस्त्र हुआ है। ऐसी कई पूनम पांडे मैदान में आकर मीडिया को निर्वस्त्र करती रहेंगी, जब तक लोगों में रातों-रात प्रसिद्ध होने का खयाल आता रहेगा, तब तक मीडिया उसे अपना खुला समर्थन देकर ऐसे लोगों को हाइलाइट करता रहेगा।
देश में जब राम मंदिर पर फैसला आना था, तब जिस तरह से मीडिया ने पूरी सजगता रखी कि कहीं भी किसी भी प्रकार से आपसी कटुता न बढ़े, भाई-चारा बरकरार रहे, मीडिया के इस कार्य का असर भी हुआ। सब कुछ शांति के साथ निपट गया। मीडिया की प्रशंसा हुई। बिना किसी आचारसंहिता के मीडिया इतना अच्छा कार्य कर सकता है, तो फिर यही मीडिया अपनी अच्छी सोच को पूनम पांडे के मामले में इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाया?
यह सच है कि मीडिया में वह ताकत है कि वह किसी को भी अर्श से फर्श पर ला सकता है, इसका यह मतलब तो नहीं कि वह अपनी इस ताकत का इस्तेमाल अश्लीलता को बढ़ावा देकर करे। ताकत यदि सकारात्मक दिशा में लगाई जाए, तो वह सार्थक होती है। नारी के कपड़े उतारने वालों का साथ देकर भी ताकत बताई जा सकती है और कपड़े उतारने वालों की पिटाई करके भी ताकत दिखाई जा सकती है। हथौड़े की एक चोट से मशीन बिगड़ भी सकती है और उसी चोट से सुधर भी सकती है। महत्वपूर्ण यह है कि वार कहाँ किया जा रहा है? उस दिन यदि पूनम पांडे की अश्लील तस्वीर और खबर के बजाए उन परिश्रमी विद्यार्थियों की उपलब्धियों को और अधिक जगह मिलती, तो समाज में एक अच्छा संदेश ही जाता। पर मीडिया ने ऐसा नहीं किया। मीडिया कह सकता है कि पूनम पांडे की खबर उसके टीआरपी को बढ़ाती है, परिश्रमी विद्यार्थियों के साक्षात्कार टीआरपी नहीं बढ़ाते। ठीक है, पर टीआरपी बढ़ाने के लिए फूहड़ कार्यक्रमों को बताना किसने शुरू किया? अभिनेत्री हेमामालिनी की माँ जया चक्रवर्ती की एक कविता याद आ रही है:- वे कुत्ते आज मुझे ऐसे देखते हैं, जैसे वे मेरे शरीर का मांस नोंच-नोंचकर खा लेंगे, गलती मेरी ही है, मैंने ही उन्हें सिखाया है इंसानों का मांस खाना? मीडिया का दायित्व बनता है कि वह तय करे कि खबर की विषय-वस्तु नकारात्मक होनी चाहिए या समाज को दशा-दिशा देने वाली सकारात्मकता।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 2 जून 2012

पानी की एक नन्‍ही सी बूंद का आत्‍मकथ्‍य


दैनिक भास्‍कर में आज प्रकाशित मेरा आलेख


हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख 



शुक्रवार, 1 जून 2012

यूपीए 2 की तीन सौगात: महँगाई, भ्रष्टाचार और घोटाले

डॉ. महेश परिमल
यूपीए सरकार ने तीन वर्ष पूरे कर लिए। इस बार सरकार सभी दलों के सदस्यों को डीनर पार्टी देने जा रही है। निश्चित रूप से यह साथी दलों को अपने वश में रखने की एक नाकाम कोशिश ही होगी। क्योंकि पिछले तीन वर्षो में सरकार ने तीन सौगातें देश को दी हैं, महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटाले। अभी दो वर्ष और बाकी हैं, तो दो और सौगातों के लिए देश के नागरिक तेयार रहें। वे सौगातें कौन सी होगी, यह भविष्य के गर्त में है। पर यह तय मानो कि बहुत ही जल्द हमें इस सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की सौगात मिलने वाली है। जो निश्चित रूप से महंगाई के बोझ से दबी जनता के लिए पीड़ादायी होगी। यदि इस बार भी पेट्रोल के दाम बढ़े,तो यह तय है कि ये सरकार अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। वेसे भी समय पूर्व चुनाव की सुगबुगाहट अभी से ही शुरू हो गई है। क्योंकि सहयोगी दलों पर सरकार की पकड़ ढीली पड़ गई है। ममता बनर्जी के नखरों के बाद सरकार की अपनी कमजोरी और उस पर घोटाले दर घोटाले से आम जनता बुरी तरह से त्रस्त हो चुकी है। यह त्रस्त जनता के पास अपना अधिकार बताने का दिन आ रहा है। इस बार ये जनता ऐसे चौंकाने वाला निर्णय देगी कि सभी हतप्रभ रह जाएंगे।
सरकार रोज ही नई-नई समस्याओं का सामना कर रही है। कालेधन पर श्वेत पत्र तो जारी कर दिया, पर सरकार को ही नहीं पता कि कितना काला धन है। हर कोई इसे अपनी तरह से परिभाषित और रेखांकित कर रहा है। कांग्रेस नेतृत्व यह सरकार अभी तक हो रहे घोटालों को रोक नहीं पाई है। सरकार द्वारा निर्णय लेने में आनाकानी हर मामले में देखनी पड़ी है। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई के मामले पर राज्यसभा में सरकार ने मुँह की खाई है। सहयोगी दलों से उसका मतभेद बराबर सामने आ रहा है। इस समय राजा की रिहाई से डीएमके भले ही कुछ शांत हो जाए, पर ममता बनर्जी का मनाना मुश्किल है। आश्चर्य की बात यह है कि यूपीए एक में सरकार के सामने वामपंथी दल परेशानी का सबब थे, अब ममता बनर्जी है। यानी दोनों में पश्चिम बंगाल। सरकार पर कई आरोप लगाए गए हैं, इस पर पहला मुख्य आरोप है कि वह न तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाई है और न ही भ्रष्टाचारियों पर। यही सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई है। सरकार की सबसे बड़ी दुविधा यह रही है कि कई केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। गृहमंत्री चिदम्बरम के पुत्र द्वारा किए गए एक टेलिकॉम सौदे में हुआ आक्षेप सबसे ताजा है। वैसे भी केंद्रीय मंत्रियों का बड़बोलापन, उत्तर प्रदेश चुनाव में करारी हार से सरकार त्रस्त है। सरकार ने कई निर्णय सहयोगी दलों को विश्वास में लिए बिना ही लिए गए, जिसके कारण उसे मुंह की खानी पड़ी। सरकार की कमजोरी कई बार सामने आई। ऐसा कई बार हुआ है, जब सरकार ने महत्वपूर्ण मामलों में कदम बढ़ाकर पीछे लेने पड़े हैं। सेना में व्याप्त असंतोष सामने आए, उसके पीछे स्वयं सरकार ही दोषी है। सरकार इसे यदि चुपचाप चर्चा करके सुलझा लेती, तो ठीक होता। पर ये मामले मीडिया के लिए चर्चा का विषय बन गए। सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया पत्र जब लीक होता है, तो प्रशासन चौंक जाता है। सेना की बगावत की जाँच रिपोर्ट पर भी रक्षा मंत्री संतुष्ट नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार के बाद सरकार में अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहा। सहयोगी दल कांग्रेस की कमजोरी जान-समझ गए हैं। पिछले वर्ष डीएमके ने यूपीए सरकार की नाक दबाई थी, इस वर्ष यह काम ममता बनर्जी ने किया। ममता पश्चिम बंगाल के लिए केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज माँग रहीं हैं। यदि सरकार इसे मान लेती है, तो उसके घाटा बढ़ जाएगा। ममता और जयललिता ने अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर लिया है, इन दोनों ने ही केंद्र सरकार को बुरी तरह से परेशान कर रखा है। अपनी तमाम हरकतों के कारण ममता बनर्जी राजनीति के क्षितिज में तेजी से उभर रही हैं, जबकि पार्टी अध्यक्ष होते हुए भी सोनिया गांधी लगातार पीछे होती जा रही हैं।
यूपीए सरकार अपने तीन वर्ष के कार्यकाल के पूरे होने पर एक पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है। मीडिया में जब इस पुस्तिका को टीवी पर दिखाया, तो इसका प्रदर्शन करते हुए पहले पृष्ठ पर प्रकाशित अपनी तस्वीर को सोनिया गांधी ने छिपा लिया, इसे टीवी पर कई बार दिखाया गया। इससे क्या संदेश जाता है, इस पर अभी कुछ कहना संभव नहीं है। वैसे लोकसभा चुनाव कब होंगे, यह इस वर्ष के अंत में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा। इस चुनाव में कांग्रेस की अग्निपरीक्षा होगी। हाल में सोनिया गांधी ने जिस तरह से पार्टी में जान फूंकने की कोशिश की है, उसका असर गुजरात चुनाव तक रह पाता है या नहीं, यह भी स्पष्ट हो जाएगा। गुजरात में कांग्रेस का मुकाबला केवल भाजपा से ही है। समय पूर्व चुनाव के विचार से ही कांग्रेस सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं। उसे अपनी कमजोरी याद आने लगती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार बार कहते हैं कि सरकार अब सख्ती दिखाएगी। अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी, पर इसका कोई असर न तो पार्टी में दिखाई देता है और न ही प्रशासनिक क्षेत्र में। सोनिया गांधी में भी अब पहले जैसा जोश नहीं है। अपनी शारीरिक अस्वस्थता को लेकर उनकी कमजोरी सामने आने लगी है। यदि सरकार को अपनी छवि सुधारनी है, तो पहले प्रजा को यह विश्वास दिला दे कि अगले तीन साल तक पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, तो जनता सरकार के प्रति नरम रवैया अपना सकती है। सरकार अपने जंगी खर्चो पर कटौती करना शुरू करे, मंत्रियों की फिजूल विदेश यात्राओं पर रोक लगाए, या फिर ऐसी जनहित घोषणाएँ करें, जिसका असर तुरंत दिखाई देता हो। पर सरकार ऐसा कुछ कर पाएगी, ऐसा लगता नहीं। डीनर पार्टी देकर वह सहयोगी दलों को करीब आने का निमंत्रण तो दे रही है, पर इससे क्या कभी कोई करीब आ पाया है? सरकार यह तय कर ले कि पेट्रोलियम कंपनी का घाटा बढ़ रहा है, तो उसकी आपूर्ति आम जनता पर पेट्रोल के दाम बढ़ाकर नहीं की जा सकती। उनके घाटे को पूरा करने के लिए कुछ और इंतजाम किए जा सकते हैं। पर यह तय मानो कि अब बहुत ही जल्द पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़ने वाले हैं। जो सरकार के ताबूत में आखिर कील साबित होगा।
  डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 29 मई 2012

बीमार डॉक्‍टरों का क्‍या है इलाज

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-05-29&pageno=9
दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संसकरण में प्रकाशित मेरा आलेख

उपहारों ने बिगाड़ दी डॉक्‍टरों की सेहत


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख
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शुक्रवार, 25 मई 2012

इनसे अपेक्षा ही बेकार

गुरुवार, 24 मई 2012

सच होने लगी है ‘फ्री इकॉनामी’ की अवधारणा


डॉ. महेश परिमल
भला कोई सोच सकता है कि बिना धन के जीवन संभव है? ‘फ्री इकानॉमी’ की अवधारणा आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है। इस अवधारणा को गलत सिद्ध करने की एक कोशिश हुई है। हम गर्व से कह सकते हैं कि इसके तार भारत से जुड़े हुए हैं। आयरलैंड के मार्क बोयल ने इस तरह का प्रयास कर अब तक 5 हजार लोगों को जोड़ लिया है।  बोयल को इसकी प्रेरणा रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ देखकर मिली। आज हम सब एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ धन का ही महत्व है। धन से ही रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था संभव है। बिना धन के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। विश्व में मुद्रा के रूप में सिक्के और नोट का चलन है। यही मुद्रा ही अमीर-गरीब के बीच की खाई को चौड़ा कर रही है। यदि विश्व में धन नहीं होता, तो कोई अमीर नहीं होता और न ही कोई गरीब। पूरे विश्व में इतनी प्राकृतिक संपदा है जिससे हर मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। इसके बाद भी एक तरफ लोग भूखे मर रहे हैं और दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं, जो ऐश्वर्यशाली जीवन जी रहे हैं। इसके मूल में है धन आधारित समाज है।
याद करें अपना बचपन, जब माँ को हम देखते कि वह कुछ वस्तुू देकर किसी से अपनी आवश्यकताओं की चीज ले लेती थीं। हमारे देश के गाँवों में आज भी वस्तु विनिमय की प्रथा प्रचलित है। किसान अपनी फसल का एक भाग देकर अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है। गाँव के हर तबके को वह अपनी फसल देता, बदले में वह उनकी सेवाएँ लेता। इसमें धन की कोई भूमिका नहीं है। सब कुछ अपनी योग्यता पर निर्भर है। आप सामने वाले के लिए क्या कर सकते हैं, ताकि वह आपकी सेवा कर सके। सेवा के बदले सेवा। यही मूल मंत्र है  फ्री इकॉनामी की अवधारणा का। यूरापे में करीब 5 हजार लोग आज इस तरह का जीवन जी रहे हैं। इनके जीवन में धन का कोई महत्व नहीं है। आयरलैंड में जन्मे मार्क बोयल एक डॉट कॉम कंपनी में काम करता था। वह धन के पीछे पागल था। वह मानता था कि जिसके पास धन है, वह दुनिया की सारी खुशियाँ खरीद सकता है। एक दिन उसने रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ देखी। इससे उनके विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला। उन्होंने सोचा कि एक फकीर की तरह जीवन जीने वाले गांधीजी ने किस तरह से अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बोयल ने गांधी जी का आर्थिक दर्शनशास्त्र और खादी को लेकर चलाए गए उनके अभियानों पर उनके कई आलेख पढ़े। इससे उन्होंने ठान लिया कि वे अब बिना धन के जीवन गुजारेंगे।
इस समय ब्रिटेन में ‘फ्री इकॉनामी’ नामक अभियान चल रहा है। इस अभियान में जुड़ने वाले अपने साथ किसी भी प्रकार का धन नहीं रखते। फिर भी वे अपने जीवन की सारी जरुरतों को पूरा कर रहे हैं। इससे जुड़े लोग खुद के पास जो चीजें हैं, उसकी सेवा देकर वे अन्य चीजें प्राप्त करते हैं। ये सब अपनी कला बेचते हैं। इसके बदले में वे जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करते हैं। इसके लिए वे किसी भी प्रकार का धन का लेन-देन नहीं करते। जैसे किसी किसान को अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए वह शिक्षक को अनाज देता है।  शिक्षक अपनी विद्या के बदले में अनाज प्राप्त करता है। इस तरह से वे सब आपसी विनिमय से अपनी सेवाएँ देकर दूसरे साथियों से सेवाएँ प्राप्त करते हैें। लंदन में रहने वाले मार्क बोयल को जीवन में धन के कारण होने वाले अपराधों के कारण धन से घृणा हो गई। इसके बाद वे ‘फ्री इकॉनामी’ में शामिल हो गए। इसके बाद उसने संकल्प किया कि वे ब्रिस्टल से पोरबंदर तक 9000 मील का सफर बिना धन खर्च किए करेंगे। 2008 में उसने अपने इस संकल्प को अमलीजामा भी पहना दिया। अपने सिद्धांत के अनुसार उसने अपनी जेब में एक पैसा भी नहीं रखा और निकल पड़े अपने सफर पर। उनके पास केवल कुछ कपड़े, बेंड एड, एक चाकू ही था। उनके पास कोई क्रेडिट कार्ड और न ही कोई पोस्ट ट्रावेल चेक था।  30 जनवरी  2008 को उसने अपनी यात्रा शुरू की। रास्ते में जो भी मिलता, तो उसका कोई न कोई काम कर देते। कभी किसी के खेत में, कभी बागीचे में वे लोगों के साथ काम करते,  इससे उन्हें भोजन मिल जाता। जहाँ जगह मिली, वहीं रात गुजार ली। इस तरह से वे इंगलैंड से फ्रांस तक पहुँच गए। यह सब दौलतमंदों को नहीं भाया। वे उन्हें तंग करने लगे। उन्होंने कुछ ऐसी व्यवस्था की कि मार्क को कई दिनों तक खाना-पीना नहीं मिला। उन्हें फुटपाथ पर रात गुजारने के लिए विवश होना पड़ा। हारकर वे इंगलैंड वापस आ गए और वहीं रहने लगे। उनका संकल्प कायम है।
मार्क का जन्म यदि भारत में हुआ होता, तो वह किसी गाँव में पूरा जीवन बिना धन के गुजार सकते थे। हमारे देश में आज भी न जाने कितने गाँव ऐसे हैं, जहाँ रहने के लिए धन की आवश्यकता कतई नहीं है। आपमें हुनर है, तो आप पूरी शिद्दत के साथ वहाँ रह सकते हैं। गाँव में आज भी एक ब्राह्मण चार घरों से आटा माँगकर रोटी बना लेता है। यजमानी करते हुए उसे दो जोड़ी कपड़े भी मिल जाते हैं, जो साल भर चलते हैं। जिस मकान में वह रहता है, वह भले ही किराए से हो, पर उसका किराया नहीं लिया जाता। यही नहीं जब कभी मकान की मरम्मत करनी हो, तो आस-पड़ोस के लोग उसकी सहायता के लिए आ जाते हैं। बढ़ई यदि किसी किसान का काम करता है, तो उसे अनाज मिल जाता है। इस तरह के गाँव आज भी हमारे देश में देखने को मिल ही जाएँगे। ‘फ्री इकानामी’ अभियान की शुरुआत अमेरिका में हुई थी। इस अभियान से जुड़ने वाले यह मानते हैं कि दुनिया में गरीबी, बेकारी, कुपोषण, भुखमरी, शोषण आदि जितनी भी समस्याएँ हैं, उसके मूल में केश, क्रेडिट और प्रोफिट है। इस अभियान से जुड़े लोग यह संकल्प करते हैं कि वे कभी भी अपने पास किसी तरह का धन नहीं रखेंगे। वे अपनी कला, जमीन, अथवा श्रम के बदले में विनिमय प्रणाली से जीवन की आवश्यक वस्तुएं प्राप्त करेंगे। धन के बिना समाज का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जिस व्यक्ति को जितनी आवश्यकता होती है, वह उतना ही प्राप्त करता है। बैंक में धन संग्रह की कोई सीमा नहीं होती, पर घर में अनाज और वस्त्र रखने की एक सीमा होती है। इसलिए चीजों का सही आवंटन होता है और लोगों को अपनी आवश्यकताओं की चीज मिलती रहती है। ‘फ्री इकानामी’ से जुड़े लोग अपनी वेबसाइट भी चलाते हैं। इस वेबसाइट में अभी कुल 5085 सदस्य हैं। इनके पास 1035 कलाएँ हैं। साथ ही 22289 उपकरण हैं। इसकी सेवा देने के लिए वे सभी तत्पर हैं। इनका एक नियम है कि किसी भी काम को करने पर धन की माँग न करना। पर काम के बदले काम या माल की अदला-बदली कर देना, यही उनका मुख्य उद्देश्य है। अपनी वेबसाइट पर वे किसी प्रकार की तस्वीर नहीं डालते। उनका मानना है कि इंसान की सही पहचान उसके दिखावे से नहीं, बल्कि उसकी कला से होती है। इस वेबसाइट पर कोई भी व्यक्ति एक व्यक्ति को तीन बार से अधिक ई मेल नहीं कर सकता। मेल के बाद सभी सदस्य जीवन में परस्पर मिलते हैं और अपने संबंध मजबूत करते हैं। इसके संचालक मानते हैं कि इसीलिए हमने वेबसाइट पर चेट रूम की सुविधा नहीं देते। लोग इंटरनेट पर नहीं, बल्कि बगीचे में काम करते हुए एक-दूसरे के साथ मिलते-जुलते हैं। इससे उनके संबंध मजबूत और धनिष्ठ होते हैं।
अमेरिका और इंगलैंड में एक डॉलर भी खर्च किए बिना जीवन व्यतीत करना आसान नहीं है। ‘फ्री इकानामी’ के सदस्य जब किसी आवश्यक वस्तु को प्राप्त करने के लिए अपनी सेवा देने को तैयार होते हैं, तो कई बार उन्हें भिखारी भी मान लिया जाता है। जो समाज केवल धन पर ही आधारित है, उस समाज में बिना धन के जीवन बिताने वालों पर कोई आसानी से विश्वास भी नहीं करता। कोई सदस्य अपने पड़ोसी की छत पर बगीचा बनाने का प्रस्ताव देता है, तो पड़ोसी को विश्वास नहीं होता, उसे डर लगता है। कहीं यह मेरी छत पर अपना कब्जा तो नहीं कर लेगा? आज हम धन देकर अपना काम करवाने के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि कोई बिना धन के उनका काम कर देगा, तो उस पर विश्वास नहीं करते। बदले में वह धन तो लेगा नहीं, तो हमसे क्या अपेक्षा रखेगा? यही डर उन्हें खा जाता है। हमारे देश में हजारों वर्षो से साधू-संन्यासी की परंपरा चली आ रही है। ये संन्यासी देश के किसी भी भाग में जाते रहते हैं। न तो इन्हें अपने भोजन की ¨चता होती है और न ही आवास की। हम रास्ते में कई बार जैन साधू-साध्वियों को देखते हैं। वे भी अपने पास किसी तरह का धन नहीं रखते। फिर भी वे अपने समाज में सम्मान प्राप्त करते हैं। उन्हें भोजन भी मिल जाता है और आवास की सुविधा भी प्राप्त हो जाती है। उनकी सेवा करके लोग स्वयं को धन्य मानते हैं। यह भी एक प्रकार का विनिमय ही है। साधू-संतों से समाज में सदाचार और सद्विचार का प्रसार होता है। यह भी समाज की एक बड़ी सेवा ही है। दस सेवा के बदले समाज उनके जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। मार्क को जो समस्याएं फ्रांस में आई, वह निश्चित रूप से भारत में नहीं आती। हमारे देश अतिथियों के स्वागत के लिए हमेशा आतुर रहता है। ‘फ्री इकानामी’ का अर्थ यही है कि बिना किसी परिग्रह का समाज। जिस दिन हमारे देश के अमीर अपना परिग्रह छोड़ देंगे, उस दिन से पूरी दुनिया में कोई गरीब नहीं रहेगा।
  डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 23 मई 2012

यूपीए से उम्‍मीदें बाकी, हर मोर्चे पर मिली मात




http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-05-23&pageno=9
आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण और हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 22 मई 2012

नजरअंदाज कैसे करे, इस पहली बगावत को

डॉ. महेश परिमल
 लद्दाख में चीन सीमा के करीब फायरिंग रेंज में सेना के अधिकारियों और जवानों के बीच संघर्ष से रक्षामंत्री ए. के. एंटनी नाखुश हैं। उन्होंने सेना से इस सिलसिले में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने को कहा है। इस घटना पर शुरुआती जांच रिपोर्ट को लेकर रक्षामंत्री ने नाराजगी जताई है। यह रिपोर्ट शुRवार शाम रक्षा मंत्रालय को दी गई। सेना ने पूरे घटनाRम को अधिकारियों और जवानों के बीच की छोटी सी झड़प बताया। मगर, इस बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं दी। इस रिपोर्ट से नाखुश रक्षामंत्री ने मामले की विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है। सेना के अधिकारियों को यह छोटी सी झड़प लग सकती है, पर इसकी गहराई में जाएं, तो कई सुराख नजर आएंगे। वैसे इन दिनों रक्षा सौदों में लगातार हुए भ्रष्टाचार की खबरों के कारण सेना पर राजनीति की पकड़ ढीली पड़ गई है। इस कारण सेना में अनुशासनहीनता लगातार बढ़ रही है। जिसे अभी चिंगारी माना जा रहा है, भविष्य में वही चिंगारी भड़क सकती है।
दस मई को सेना के अधिकारियों एवं जवानों के बीच मुठभेड़ हुई। जो सेना में लगातार हो रही लापरवाही का ही एक नतीजा है। आज से ठीक 155 वर्ष पहले भी दस मई 1957 को अंग्रेजों के खिलाफ पहली बगावत हुई थी। इसे पहले स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। इसके बाद आंदोलन का जो सिलसिला शुरू हुआ, जिससे भारत में स्थापित इस्ट इंडिया कंपनी के राज का खात्मा हो गया। इसके बाद 10 मई 2012 को एक बार फिर भारतीय सैनिकों में बगावत के स्वर सुनाई पड़े। स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना में हुई इस बगावत को पहली बगावत कहा जा सकता है। यह बगावत सरकार के खिलाफ या देश के खिलाफ नहीं थी, यह बगावत थी सेना के उच्च अधिकारियों के खिलाफ जवानों की। इस बगावत ने पूरी दिल्ली को हिलाकर रख दिया। इस बगावत पर भले ही काबू पा लिया गया हो, पर इसकी गहराई में जाने की आवश्यकता है। रक्षा सौदों में हुए भ्रष्टाचार के कारण सेना के जवानों में वैसे भी मनोबल की कमी आ गई है। ऐसे में सेना के उच्च अधिकारियों द्वारा अनुशासनहीनता दिखाई गई, जिससे जवान भड़क उठे। भारतीय प्रजातंत्र के लिए इसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। वैसे भी भारतीय सैन्य दल हमेशा झूठे कारणों से सुर्खियों में आ जाता है। पहले भारत के सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह की उम्र को लेकर विवाद हुआ, इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने परदा डाल दिया। इसके बाद सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया पत्र लीक हो गया। जिसमें भारतीय सेना के पास दुश्मनों का मुकाबला करने के लिए आवश्यक शस्त्र सामग्री का अभाव बताया गया। इसी के चलते यह बात भी सामने आई कि हरियाणा की सेना की बटालियन बिना पूर्व सूचना के दिल्ली की तरफ कूच कर गई थी। इस कारण भी रक्षा मंत्रालय में हड़कम्प मच गया था। बाद में यह स्पष्टीकरण दिया गया कि ये रुटीन परेड का एक हिस्सा था। भले ही इसकी सूचना रक्षा मंत्रालय को भी देना मुनासिब नहीं समझा गया। इसके बाद सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह ने यह रहस्योद्घाटन किया कि सेना द्वारा टेट्रा ट्रक की खरीदी के लिए उन्हें 14 करोड़ रुपए रिश्वत देने का ऑफर था। इस मामले की जाँच सीबीआई कर रही है। इन परिस्थितियों में सेना भले ही छोटी-छोटी बगावत करे, पर इससे सेना में जारी अनुशासनहीनता की एक झलक मिल ही जाती है।
लद्दाख की फायरिंग रेंज में तैनात किए गए 226 फील्ड रेजीमेंट के करीब 500 जवानों ने पिछले दिनों अपने ही अधिकारियों के खिलाफ बगावत की थी। इसके पहले सेना के जवानों द्वारा इस तरह से बगावत की हो, इसके प्रमाण नहीं मिलते। 226 फील्ड रेजीमेंट के जवान-अधिकारी फायरिंग प्रेक्टिस के लिए लद्दाख के काबरुक क्षेत्र के भीतरी इलाकों में गए थे। उनके रहने के लिए तम्बुओं की व्यवस्था की गई थी। सेना का यह नियम है कि सेना की इस तरह की कोई गतिविधि यदि जारी हो, तो अधिकारी अपनी पत्नियों को नहीं ले जा सकते। पर इस मामले में वहाँ सेना के 5 अफसरों की पत्नियां भी गई हुई थीं। इन महिलाओं को भी तम्बुओं में ही रखा गया था। यह एक गंभीर अनुशासनहीनता है। इससे यह स्पष्ट है कि ऐसा काफी समय से होता आ रहा था। दस मई को एक ओर जब फायरिंग की प्रेक्टिस चल रही थी, तो दूसरी तरफ एक मेजर की पत्नी तम्बू में कपड़े बदल रही थी, तभी सेना में ही काम करने वाला एक नाई सुमन घोष वहाँ पहुँच गया। कहा जाता है कि उसने मेजर की पत्नी से छेड़छाड़ करने की कोशिश की। मेजर की पत्नी द्वारा शोर करने से यह नाई भाग गया था। जब मेजर को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने किसी तरह से उक्त नाई को खोज निकाला। उसके बाद उसकी खूब पिटाई की गई। मेजर के इस काम में दूसरे अन्य अधिकारी भी शामिल हो गए। सेना के जवानों ने उक्त नाई को बचाने की कोशिश की गई, तो अधिकारियों ने इसका विरोध किया। बुरी तरह से घायल नाई को अधिकारियों ने  सेना के अस्पताल ले जाने भी नहीं दिया गया। अंतत: कमांडिंग आफिसर कदम के हस्तक्षेप के बाद नाई को गंभीर हालत में सेना के अस्पताल में भर्ती किया गया। यहाँ भी अनुशासनहीनता दिखाई देती है। सेना का कोई जवान यदि इस तरह की हरकत करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनहीनता का आरोप लगता है और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है। पर जवान से मारपीट करने की छूट किसी भी हालत में नहीं दी जाती।
मेजर की पत्नी से कथित रूप से छेड़छाड़ करने वाले नाई की पिटाई और उसके बाद उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराने की खबर जब रेजीमेंट में फैेल गई, तब जवानों में उत्तेजना फैल गई। फिर यह अफवाह भी उड़ गई कि इलाज के दौरान सुमन घोष की मौत हो गई, तो जवानों के धर्य की सीमा टूट गई और उन्होंने अधिकारियों की मैस में जाकर पहले तो वहाँ तोड़फोड की, फिर अधिकारियों की पिटाई कर दी। इसकी जानकारी जब रेजीमेंट के कर्नल कदम को हुई, तो उन्होंने तुरंत ही मेस में जाकर जवानों को समझाने की कोशिश की। अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि एक पत्थर कर्नल कदम के माथे पर लगा। बस फिर क्या था, अधिकारियों और जवानों के बीच हाथापाई शुरू हो गई। इस दौरान मेस में आग लगा दी गई। जवान चूंकि संख्या में अधिक थे, इसलिए अधिकारियों ने भाग कर पास के तम्बुओं में शरण ली। जो अधिकारी भाग नहीं पाए, वे आवेश में आकर जवानों की हत्या के लिए तैयार हो गए। कई अधिकारियों ने अपनी पत्नी की ओट में आकर अपनी जान बचाई। जवानों ने अधिकारियों की पत्नियों से भी मारपीट की। इस बीच यह भी अफवाह उड़ी कि सेना के जवानों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया है। दूसरे दिन तक स्थिति नियंत्रण में आ गई।  सेना के वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर पहुँच गए थे। सेना की इस छोटी सी बगावत से चौंक उठे सेना के उच्च अधिकारी और रक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों में विचार-विमर्श का दौर शुरू हो गया है। अब क्या किया जाए? इधर आत्ममंथन का दौर जारी है, उधर 226 फील्ड रेजीमेट को इसके पहले संभालने वाले कर्नल योगी शेरोन को इस कैम्प में भेजा गया है। उनके बारे में यह कहा जाता है कि उनका व्यवहार सैनिकों के प्रति सकारात्मक रहा है। सैनिकों में इस तरह की अनुशासनहीनता आखिर कैसे आई, इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। इस मामले में जो अधिकारी दोषी पाए जाएंगे, उनका कोर्ट मार्शल होने की भी पूरी संभावना है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि 226 फील्ड रेजीमेंट के खिलाफ इसके पहले भी अनुशासनहीनता की शिकायत की जा चुकी है। इस शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया था। इस बगावत का यह भी एक कारण हो सकता है।
शांतिप्रिय और अनुशासित माने जाने वाले भारतीय सेना में हाल ही में अनेक विवाद और घोटाले सामने आए हैं। महाराष्ट्र के आदर्श घोटाले में सेना के कई भूतपूर्व अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जाँच चल रही है। सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह का जिस तरह से अपमान किया गया, उससे भी जवानों में नेताओं के प्रति रोष फैल गया है। यही नहीं समय-समय पर नेताओं द्वारा सेना पर कटाक्ष किए जाते रहे हैं। खास बात यह है कि सेना की अच्छाइयों की उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी उनके विवादों की। इसलिए जवानों का मनोबल टूटना लाजिमी है। केंद्र सरकार द्वारा भी ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है, जिससे जवानों का हौसला बढ़े। आखिर घर-परिवार से दूर होकर ये ेजवान देश की सेवा ही तो कर रहे हैं। इनके बलिदानों का लेखा-जोखा आखिर कौन रखेगा?
    डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 21 मई 2012

शाहरुख कानून से ऊपर तो नहीं....

 डॉ. महेश परिमल
इन दिनों अभिनेता शाहरुख चर्चा में हैं। जब से आईपीएल शुरू हुआ है, तब से न जाने क्यों वे स्वयं को कानून से ऊपर मानने लगे हैं। एक ओर यही शाहरुख अमेरिका में इमिग्रेशन विभाग द्वारा किए गए अपमान को आसानी से पचा जाते हैं, वही दूसरी ओर वे देश के कानून को तोड़ने में भी संकोच नहीं करते। आखिर इसका कारण क्या है? जब हमारे देश का संविधान तैयार किया गया, तब सभी को कानून की दृष्टि से समान माना गया है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है। आज भी कई लोगों के लिए कानून हाथ का खिलौना मात्र है, तो कई लोगों को पूरी जिंदगी घुट-घुटकर जीने के लिए विवश करता है। राज्य सभा में अब तक न जाने कितने लोगों ने शपथ ली गई होगी, पर रेखा ने जब शपथ ली, तब कैमरा पूरे समय तक उन्हीं पर फोकस रहा। इसके पहले इस तरह से किसी भी सदस्य को तरजीह नहीं मिली। शाहरुख खान ने दो दशक तक फिल्मी दुनिया में बेताज बादशाह के रूप में राज किया है। अब नए सितारे आगे आने लगे हैं। इस कारण बालीवुड का यह बादशाह उलझन में है। वह असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो गए हैं। इस कारण उसे बार-बार गुस्सा आ रहा है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे 24/7 लाइव टीवी के जमाने में जी रहे हैं। उनकी छोटी-सी भी हरकत या भूल मीडिया के लिए कई घंटों की खुराक बन सकता है। जिस मीडिया ने शाहरुख को बनाया है, वही उसे खत्म भी कर सकता है। अतएव उन्हें 24/7 से सावधान रहना चहिए और अपने व्यवहार को नियंत्रण में करना होगा।
आजकल विवाद शाहरुख का पीछा नहीं कर रहा है, बल्कि शाहरुख ही विवादों को आमंत्रण दे रहे हैं। बुधवार की रात को वानखेड़े स्टेडियम में जो कुछ हुआ, वह उनके द्वारा परिश्रम से तैयार की गई इमेज के बिलकुल ही अलग था। देखा जाए तो शाहरुख खान के दो रूप हैं। एक है परफेक्ट एंटरटेइटर, परफेक्ट हसबेंड, परफेक्ट पेरेंट और परफेक्ट देशभक्त है। जो देश के कानून का पूरी गंभीरता के साथ पालन करता है। उनका दूसरा रूप है एक घमंडी, असुरक्षा की भावना से ग्रस्त, धूम्रपान के शौकीन इंसान हैं। वे इंसान की सभी कमजोरियों से भरे हुए हैं। शाहरुख खान के करोड़ों प्रशंसक उनके पहले रूप से परिचित हैं, इसलिए उन्हें पूजते हैं। पर जब उन्हें असली शाहरुख खान के दर्शन हो जाते हैं, तो वे हताश हो जाते हैं। शाहरुख खान अपनी सेलिब्रिटी स्टेटस के आवेश में देश के कानून की परवाह नहीं करते। इसका उदाहरण जयपुर में ही पिछले महीने आयोजित आईपीएल के मैच के दौरान ही मिल गया था। राजस्थान में सन् 2000 से ही यह कानून लागू है कि वहाँ सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर पाबंदी है। इस नियम को जानते हुए भी उन्होंने मैच के दौरान स्टेडियम में बिंदास होकर धूम्रपान किया। उन्हें ऐसा करते हुए उनके करोड़ों प्रशंसकों ने देखा भी। उन्हें मालूम था कि वे टीवी के कैमरे में कैद हो सकते हैं, परंतु उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। उनकी इस हरकत को देखकर नाराज हुए वकील नेमसिंह ने जयपुर की अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस आधार पर शाहरुख खान को अदालत में हाजिर होने का समंस भेजा गया। कुछ समय पहले ही शाहरुख अमेरिका के प्रवास पर थे। वहाँ उन्हें येल विश्वविद्यालय में भाषण करना था। उन्हें विश्वविद्यालय ने ही बुलाया था। अमेरिका पहुंचकर हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें पूछताछ के नाम पर दो घंटे तक रोके रखा। उस समय उन्होंने थोड़ा सा भी विरोध नहीं किया। अधिकािरयों के सारे नखरों को वे सहन करते रहे। उसके बाद वे येल विश्वविद्यालय पहुंचे। वहाँ उन्होंने अपने भाषण में इमिग्रेशन अधिकािरयों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब भी मेरे भीतर घमंड भर जाता है, तो मैं अमेरिका चला आता हूं, क्योंकि यहां आकर मेरा घमंड इमिग्रेशन के अधिकारी उतार देते हैं। यहां शाहरुख अमेरिका के कड़े कानून का आदर करते हैं, पर भारत के कानून की परवाह नहीं करते। यह हमें वानखेड़ेक में हुई घटना से समझ में आ जाता है।
शाहरुख खन की तरह अधिकांश फिल्मी सितारे स्वयं को कानून से ऊपर ही मानते हैं। सलमान खान ‘हम साथ-साथ हैं’की शूटिंग करने राजस्थान गए थे, वहाँ केवल मौज-मस्ती की खातिर उन्होंने काले हिरण का शिकार किया। राजस्थान में वन्य प्राणियों के लिए अपनी जान दाँव पर लगाने वाले विश्नोई समुदाय के लोगों ने उस पर मुकदमा ठोंक दिया। जो अभी तक चल रहा है। इसी तरह एक बार बांदरा की सड़क पर लापरवाही पूर्ण तरीके से कार चलाते हुए फुटपाथ पर सोए कई लोगों को कुचल दिया था। ये मामला भी अभी चल रहा है। सैफ अली खान द्वारा होटल में किए गए अभद्र व्यवहार का मामला भी अभी ताजा ही है। जब वे करीना और कई मित्रों के साथ एक आलीशान होटल गए थे। वहाँ वे जोर-शोर से बातचीत कर रहे थे। इससे वहाँ भोजन करने आए कई लोगों को बुरा लगा। उनकी शांति में खलल पड़ने लगा। इस दौरान होटल के मैनेजर ने उन्हें शांत कराया। कुछ समय बाद फिर वही शोर-गुल शुरू हो गया। ऐसे में एक व्यक्ति ने अपनी जगह बदलने की गुजारिश मैनेजर से की। सैफ को यह नागवार गुजरा। उन्होंने उक्त ग्राहक के वृद्ध पिता की पिटाई कर दी। मामला पुलिस स्टेशन पहुँच गया। तब घबराए हुए सैफ ने माफी मांगकर समाधान किया। सैफ ही नहीं, सभी सितारे यह मानते हैंकि वे सार्वजनिक स्थलों पर लोग उनकी सभी हरकतों को झेल लेंगे। शाहरुख और फराह खान के बची अनेक वर्षो से गाढ़ी मित्रता थी। फराह खान के पति शिरीष कुंदर को यह पसंद नहीं था। इस कारण फराह ने शाहरुख से अपनी दोस्ती छोड़ दी। ऐसा शाहरुख सोचते थे। इसलिए शिरीष कुंदर के प्रति वे कटुता रखते थे। यह कटुता खुन्नस में उस वक्त बदल गई, जब एक पार्टी में वे शराब पीकर कुंदर से भिड़ गए। शाहरुख ने कुंदर की खूब पिटाई कर दी। उस समय वहाँ पत्रकार भी थे, इसलिए मामले ने तूल पकड़ लिया। दूसरे दिन अखबारों और टीवी में इस घटना को हाईलाइट किया गया, तब शाहरुख को लगा कि उनसे गलती हो गई है। बस फिर क्या था, उन्होंने कुंदर से माफी मांग ली। जब भी शाहरुख अपने असली स्वभाव में आ जाते हैं, तब वे विवादों में उलझ जाते हैं और मारपीट करने लगते हैं। पर जैसे ही उन्हें यह खयाल आता है कि वे एक सेलिब्रिटी भी हें, तो वे माफी मांग लेते हैं। उनके माफी माँगने के पीछे का कारण यह है कि यदि मीडिया में उनकी छवि को थोड़ा सा भी नुकसान होता है, तो करोड़ों का नुकसान हो सकता है। शाहरुख इमामी, हुंडई और डीश टीवी जैसे ब्रांडो के एम्बेसेडर हैं। इन कंपनियों से उन्हें हर वर्ष सा से आठ करोड़ रुपए मिलते हैं। इस सभी ब्रांड में शाहरुख खान एक संवेदनशील, इंटेलिजेंट और भारतीय संविधान का सम्मान करने वाला बताया गया है। यदि उनके सार्वजनिक जीवन में इस तरह की घटनाएं होती हैं, तो उनकी इमेज बिगड़ सकती है। अब यह लोगों को समझ में आने लगा है कि शाहरुख का स्वभाव लगातार चिड़चिड़ा होता जा रहा है। वे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होने लगे हैं। वे अपने आप को कानून से ऊपर मानने लगे हैं। सभा-समारोहों में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए, ये उन्हें शायद नहीं पता। यदि शाहरुख इसी तरह अपनी इमेज बिगाड़ते रहें, तो ब्रांड एम्बेसेडर की कमाई से वंचित हो सकते हैं।
 भारत के युवा किसका सम्मान सबसे अधिक करते हैं, इस पर ब्रांड इक्विटी नामक मैगजीन ने एक सर्वे किया। जिससे पता चलता है कि यूथ आइकोन के रूप में सचिन तेंदुलकर और सलमान खान के बाद शाहरुख खान को पसंद करते हैं। हाल ही में एक सर्वेक्षण से यह पता चलता है कि सचिन, सहवाग और धोनी को आईपीएल में बेशुमार काला धन मिला है। सलमान खान अपने क्रुद्ध व्यवहार, लापरवाही पूर्ण तरीके से वाहन चालन और कानून को तोड़ने की आदत के कारण खबरों की सुर्खियां बनते रहे हैं। एक समय ऐसा भी था, जब लोग सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह और खुदीराम बोस को अपना आदर्श मानते थे। अब लोग सलमान और शाहरुख की पूजा करने लगे हैं। इसका कारण यह है कि आज के युवा फिल्मी सितारों की रील लाइफ से इतने अधिक प्रभावित होने लगे हैं कि उनकी रियल लाइफ की सच्चई को स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं। शाहरुख खान के प्रशंसक यह दलील कर सकते हैं कि देश में लाखों लोग सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीते हैं, सिगरेट पीते हैं, तो उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। मीडिया वाले उसी के पीछे क्यों पड़े रहते हैं? इसका कारण यही है कि हमारे देश में फिल्मी कलाकार एक अलग ही स्थान रखते हैं। करोड़ो युवा उनकी नकल कर स्वयं को गौरवशाली समझते हैं। उनकी लाइफ स्टाइल से करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हो सकता है। इस कारण उन्हें यह विशेषाधिकार मिल जाता है, इससे उनकी जवाबदारी भी बढ़ जाती है। यदि उनका व्यवहार अभद्र हुआ, तो युवा उनकी इस आदत को भी अपने जीवन में शुमार कर लेंगे। इसलिए सेलिब्रिटी का असभ्य व्यवहार कई लोगों को इसके लिए प्रेरित करता है। शाहरुख के इसी व्यवहार के कारण यदि वानखेड़े स्टेडियम में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो इसकी प्रशंसा ही करनी होगी। सेलिब्रिटी यह समझ लें कि उनका जीवन केवल उन्हीं का जीवन नहीं है। वे प्रेरणा होते हैं, वे देश की शान होते हैं, उनका व्यवहार बच्चों को संस्कार देने के काम आता है। इसलिए वे निजी जीवन में भी शालीनता बरतें, तो उनके बच्चों ही नहीं देश के मासूमों में भी एक नई ऊर्जा का संचार करने में सहायक सिद्ध होगा।
   डॉ. महेश परिमल

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