रविवार, 8 मार्च 2009



स्लम डॉग
दुनिया की सबसे बड़ी झोपड़ पट्टी धारावी की गरीबी और जिल्लत भरी जिंदगी पर बनी फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर की झोली में सोमवार की सुबह जब एक के बाद एक 8 आस्कर अवार्ड गिरे, तो पूरा हिन्दुस्तान खुशी से झूम उठा, लेकिन इस खुशी को मनाते समय हर देशवासी का दिल दर्द से कराहा जरूर होगा। स्लम डॉग याने झुग्गियों के कुत्ते। हिन्दुस्तान के स्लम में रहने वाले लोगों के लिए इस शब्द के इस्तेमाल से यकीकन बहुतों का खून खौल उठा होगा।
यह फिल्म हमें कचोटती है, हमें आईना दिखाती है उस हिन्दुस्तान का, जिसकी दो तस्वीरें हैं। एक हिन्दुस्तान वह है, जहां हर हफ्ते अखबारों में दुनिया के सबसे अमीरों की लिस्ट में देश में बसने वाले मित्तल, अंबानी बंधुओं, टाटा, बिड़लाओं जैसे एक-दो प्रतिशत अरब-खरबपतियों का नाम छपता है। यह भी जिक्र होता है कि कैसे चांद पर मानव भेजने की तैयारी चल रही है, कैसे भारत चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में प्रसिध्दि पाता जा रहा है, कैसे यहां के आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों से निकलने वाले वैज्ञानिक, प्रबंधक दुनिया में अपनी प्रतिभा की धूम मचाए हुए हैं, कैसे हजारों लोग टाटा की नैनो को खरीदने लाइन लगाए खड़े हैं। इसी हिन्दुस्तान की दूसरी तस्वीर वह है , जहां वाकई में झुग्गी बस्तियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों और वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी में कोई खास फर्क नहीं होता। वह भी किसी के घर बर्तन मांजकर, इमारतों की तामीरी के काम में मजदूरी कर, हमारी आपकी फैलाई गंदगी को गटर, नालियों में घुसकर साफ करते हुए दिन भर कुत्ते की तरह गरियाए और लतियाए जाते हैं, तब कहीं दो वक्त की जुटा पाते हैं।
यह तस्वीर केवल मुंबई या दिल्ली जैसे महानगरों की नहीं, बल्कि हमारे शहर भोपाल की भी है। यहां भी 400 से यादा स्लम हैं, जिनमें लाखों लोग (डॉग्स) रहते हैं। यह भी उड़ना चाहते हैं, आसमान की दीवार पर कोई सुनहरी इबारत लिखना चाहते हैं, लेकिन सारे सपने दो जून की रोटी और जिंदगी को बचाने और उसे सहेजने की जद्दोजहद में दम तोड़ देते हैं। कभी कोई झुग्गियों को नासूर समझकर उखाड़ फेंकने के लिए आ खड़ा होता है, तो कोई इन्हीं झुग्गियों में छिपती, बचती अस्मत को अपने अश्लील इशारों से खरीदने की कोशिश करता है। किसी सुबह सड़क किनारे खड़े होकर इन्हीं झुग्गियों से निकलकर सरकारी स्कूल जाते मासूमों पर नजर डालें तो आपको पता चल जाएगा, कि कितने पैरों में आप आजादी के 61 साल बाद भी चप्पल नहीं पहना सके हैं। किसी सुबह आप शहर किसी चौराहे पर जाकर मजदूरों की नीलामी के लिए बोलियां लगते देखें, तो आपको पता लगेगा किसी गुलाम बनाने के लिए 2000 साल पहले के ग्रीक-रोमन काल और आज के अंदाज में कोई बहुत यादा फर्क नहीं आया है। अभी भी बड़ों की गंदगी को खुद गंदे होकर साफ करने वाले लोग इसी स्लम में रहते हैं।
आप इनकी गरीबी और बदहाली के लिए किस्मत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते, क्योंकि इस हाल के जिम्मेदार हम हैं, आप हैं, सरकार और उसके सिस्टम की है। इस शहर में गंदी बस्ती निर्मूलन मंडल बरसों से वजूद में रहा है, लेकिन गंदी बस्तियां कभी उजली बस्तियों में नहीं बदल पाईं। झुग्गी मुक्त आवास योजना भी झुग्गियों के लोगों को छत नहीं दे पाई। करोड़ों की रकम नेता-अफसरों और सिस्टम के पेट में चली गई। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के जमाने की 80 झुग्गी बस्तियां अब 400 से यादा हो गईं। लेकिन इन झुग्गियों से नेतागिरी चलाकर कई छुटभैये विधायक तक बन गए। ये वही नेता हैं, जिन्होंने बस्तियों में चिट फंड के नाम पर लाखों रुपए डकारे और बस्तियों को नशे के अड्डों में तब्दील किया। स्वास्थय और शिक्षा के लिए भी सरकारी योजनाओं की दवा, पुस्तकें और यहां तक की टाटपठ्टी तक इस काम से जुड़े लोग बेच खाते हैं।
शहर में यह स्लम डॉग्स भले ही अपना पेट न भर पाते हों ,लेकिन इनके पेट भरने और यहां की सेहत सुधारने, बच्चों की किस्मत संवारने के नाम पर तमाम स्वयं सेवी संस्थाएं देश-विदेश की संस्थाओं से करोड़ों रुपए जुगाड़कर हजम कर जाती है। हम यह नहीं कहते कि सभी संस्थाएं ऐसा करती हैं, लेकिन ऐसी संस्थाओं की बड़ी तादाद है, जिनका मकसद स्वयं की सेवा ही है।
डैनी बॉयल की यह फिल्म गरीबी की बदरंग तस्वीर दिखाकर हमें सरेआम नंगा कर देती हो, लेकिन यह उम्मीद भी जगाती है कि स्लम में रहने वाले लोगों की जिंदगी में ऊर्जा और प्रतिभा का अकूत भंडार होता है, जो वह प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ते हुए पैदा होती है, यही उर्जा उनकी जरूरत भी है और मजबूरी भी। अगर सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं बेहद नेक इरादे कर झुग्गियों की जिंदगी संवारने और उनकी प्रतिबाओं को तराशने के काम में काम में जुट जाएं, तो इतने मिलिनेयर निकलेंगे कि कामयाबी के आस्कर से हमारा आपका सिर गर्व से हमेशा ऊंचा रह सकेगा।

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