शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
कविता - बचपन के दिन - रेखा राजवंशी
बचपन के दिन... कविता का अंश...
याद आते हैं बचपन के दिन,
तड़पाते हैं बचपन के दिन ।
वो दिन दादा के गाँव के,
वो दिन पीपल की छाँव के ,
शैतानी के साज़िश के दिन,
गर्मी के दिन बारिश के दिन।
परियों के भूतों के क़िस्से,
चोरी के आमों के हिस्से,
वो दिन नुक्कड़ के नाई के,
वो दिन कल्लू हलवाई के ।
याद आते हैं……
वो दिन चूरन के इमली के,
वो दिन फूलों के तितली के,
वो दिन सावन के झूलों के,
वो दिन अनजानी भूलों के ।
चंदा के दिन तारों के दिन,
खेलों के गुब्बारों के दिन ,
वो दिन अलमस्त नज़ारों के,
वो दिन तीजों त्यौहारों के।
याद आते हैं……
हैं याद दशहरे के मेले,
वो चाट पकौड़ी के ठेले,
वो रावण का पुतला जलना,
वो राम का सीता से मिलना ।
जगमग वो दिन दीवली के,
आतिशबाज़ी मतवाली के,
वो दिन जो खील बताशों के,
वो दिन जो खेल तमाशों के।
याद आते हैं……
वो दिन गुझिया के कॉंजी के,
वो दिन टेसू के झॉंझी के,
वो दिन कटटी के साझी के,
वो दिन ताशों की बाज़ी के ।
वो दिन होली के रंगों के,
वो आपस के हुड़दंगों के,
वो दिन मीठी ठंडाई के,
नमकीन के और मिठाई के।
याद आते हैं……
वो दिन अम्मा के खाने के,
बाबू के लाड़ लड़ाने के,
वो दिन गुडडे के गुड़िया के,
वो दिन सपनों की दुनिया के।
याद आते हैं...
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
संपर्क - rekha_rajvanshi@yahoo.com.au
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