सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

बाल कहानी – सच्चा हीरा

कहानी का अंश… सूर्य अस्त होने को था। पक्षी चहचहाते हुए अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। गाँव की चार स्त्रियाँ एक कुएँ पर पानी भरने आई। अपने- अपने घड़ों में पानी भरकर वे इधर-उधर की बातें करने लगी। एक स्त्री बोली – भगवान सबको मेरे जैसा बेटा दे। वह लाखों में एक है। उसका कंठ बहुत सुरीला है। लोग उसके गीतों को सुनकर मुग्ध हो जाते हैं। सच कहूँ तो मेरा बेटा तो हीरा है। उसकी बात सुनकर दूसरी स्त्री से रहा नहीं गया। वह भी अपने बेटे की प्रशंसा करने लगी और बोली – बहन, मेरा बेटा बहुत शक्तिशाली और साहसी है। वह तो आज के युग का भीम है। दोनों स्त्रियों की बातें सुनकर तीसरी भला चुप कैसे रहती? वह भी बोल पड़ी – बहन, मेरा बेटा तो इतना बुद्धिमान है कि वह जो कुछ पढ़ता है, उसे एकदम कंठस्थ हो जाता है। उसके कंठ में तो माता सरस्वती का वास है। तीनों स्त्रियों की बातें सुनकर भी चौथी स्त्री चुपचाप बैठी रही। उसका भी एक बेटा था। पर उसने उसकी प्रशंसा में कुछ भी नहीं कहा। पहली स्त्री ने उसे टोकते हुए कहा – तुमने अपने बेटे के विषय में कुछ नहीं बताया। चौथी स्त्री बोली – मैं अपने बेटे की क्या प्रशंसा करूँ? न तो वह अच्छा गायक है और न ही भीम जैसा पहलवान। जब वे अपने –अपने घड़े सिर पर रखकर लौटने लगी, तभी उन्हें एक मधुर गीत सुनाई दिया। उसे सुनते ही पहली स्त्री बोल उठी – मेरा हीरा आ रहा है। तुमने सुना? उसका कंठ कितना मधुर है? वह लड़का गीत गाता हुआ, उसी रास्ते निकल गया। उसने अपनी माँ की ओर ध्यान तक नहीं दिया। थोड़ी देर बाद ही दूसरी स्त्री का बेटा भी उधर से आता दिखाई दिया। उसे देखकर दूसरी स्त्री बोली – देखो, वह मेरा लाडला बेटा आ रहा है। उसका बलिष्ठ शरीर तो देखो। वह बेटा भी माँ की ओर देखे बिना निकल गया। थोड़ी ही देर में तीसरी स्त्री का बेटा भी संस्कृत के श्लोक बोलता हुआ वहाँ से गुजरा। वह भी माँ की ओर देखे बिना ही चला गया। चारों स्त्रियाँ अभी थोड़ा ही आगे बढ़ी होगी कि चौथी स्त्री का बेटा भी उधर से आ निकला। आगे क्या हुआ? उस बेटे के मन में अपनी माँ के प्रति कैसे भाव थे? क्या वह भी अन्य बेटे के समान ही था? इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस अधूरी कहानी का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए….

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