शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रेरक प्रसंग – स्वेद कणों का प्रभाव

प्रेरक प्रसंग का अंश... भगवान राम जब शबरी से मिलने के लिए गए तो उन्होंने देखा कि वहाँ के सारे फूल खिले हुए हैं, कुम्हलाए नहीं हैं तथा प्रत्येक फूल से मधुर भीनी-भीनी सुगंध निकल रही है। उन्होंने जिज्ञासावश शबरी से इसका कारण पूछा। शबरी बोली – भगवन, इसके पीछे एक घटना है। यहाँ बहुत समय पूर्व ऋषि मातंग का आश्रम था। जहाँ बहुत से ऋषि-मुनि और विद्यार्थी रहा करते थे। एक बार चातुर्मास के समय आश्रम में ईंधन समाप्त प्राय था। वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व ईंधन लाना जरूरी था। प्रमादवश विद्यार्थी लकड़ी लाने नहीं जा रहे थे। तब एक दिन स्वयं वृद्ध ऋषि मातंग अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर लकड़ियाँ लाने चल दिए। गुरु को जाता देखकर विद्यार्थी भी उनके पीछे चले। सूखी-सूखी लकड़ियाँ काटी गईं तथा उन्हें बाँधकर वे लोग आश्रम की ओर लौटने लगे। हे राम, वृद्ध ऋषि के शरीर से श्रम बिंदु निकलने लगे। विद्यार्थी भी पसीने से तर-बतर हो गए। तब जहाँ-जहाँ श्रमबिंदु गिरे थे, वहाँ-वहाँ सुंदर फूल खिल उठे। जो बढ़ते-बढ़ते आज सारे वन में फैल गए हैं। यह उनका पुण्य प्रभाव ही है कि वे ज्यों के त्यों बने हुए हैं, कुम्हला नहीं रहे हैं। तात्पर्य यह है कि भली प्रकार से किए गए कार्य मधुर सुगंध देते हैं और मिट्टी पर ही खिलते हैँ। श्रम जीवी के शरीर से निकलनेवाला पसीना ही संसार का पोषण करता है और जीवन जीने की अनुकूल स्थिति पैदा करता है। इस प्रेरक प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

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