मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

कविता - बाबू जी - राज सक्सेना

बाबू जी... कविता का अंश... घर के बाहर ओसारे पर, अटके रहते बाबू जी सूनी आँखों रस्ता सबका, तकते रहते बाबू जी पाला जिनको खून पिलाकर, उन्हें छोड़कर जीते हैं, यही सोचकर मन ही मन में, कुढ़ते रहते बाबू जी कोई आकर बात करे कुछ उनसे इस चौबारे में, पोता-पोती की कुछ बातें, रटते रहते बाबू जी रानी जैसा रखा जिसे वह रहती अविचल सेवा में, देख-देखकर यह सब मन में,घुटते रहते बाबू जी रोज शाम को छ्तपर चढ़कर शून्य बनाती नजरों से, अस्ताञ्चल को जाता सूरज, तकते रहते बाबू जी बात बिगड़ जाये यदि कोई, नहीं सँवरती कभी-कभी, अपनी हिकमत से हल सबकुछ्,करते रहते बाबू जी खाँसी का दौरा पड़ता है कभी रात को जोरों से, डाल रजाई मुख पर अन्दर, घुटते रहते बाबू जी खानदान में 'राज' किसी की, उठती चादर थोड़ी सी, इज्जत न मैली हो जाए, ढकते रहते बाबू जी। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... सम्पर्क- raajsaksena@gmail.com

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