गुरुवार, 11 सितंबर 2014

खाते खुल जाने से क्रांति नहीं हो सकती

डॉ. महेश परिमल
प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत एक ही दिन में डेढ़ करोड़ खाते खुल गए। इसे एक क्रांति का नाम दिया जा रहा है। पर क्या एक विकासशील देश के लिए यह शर्म की बात नहीं है कि उस देश में अभी तक साढ़े सात करोड़ लोगों के बैंक खाते ही नहीं हैं। वैसे यह सच है कि करोड़ों बैंक खाते खुल जाने से रातों-रात गरीबी दूर होने वाली नहीं है। कोई चमत्कार नहीं होने वाला। वैसे भी हमारे देश में बैंकों की कमी नहीं है, पर उनकी शाखाओं की अवश्य बेहद कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बैंकों की शाखाएं नहीं पहुंच पाई हैं। वैसे शहरों में जो भी बैंक हैं, उन्हें मालदार खाताधारी चाहिए। जिसके पास लाखों रुपए हो, जिसका पूरा लेन-देन बैंक के माध्यम से हो, वही ग्राहक बैंक के लिए लाभदायी हो। अब गरीब के खाते खुल भी गए, तो उससे जो लेन-देन होगा, वह बहुत ही कम राशि का होगा। इससे बैंक ही इस पर दिलचस्पी नहीं लेगी कि किसी गरीब का खाता खुले। प्रधानमंत्री की जन-धन योजना के तहत खाते तो खुल गए, पर अब उससे व्यवहार किस तरह होगा। खाता खुलने का आशय यही है कि उसमें राशि जमा हो और उसकी निकासी भी। गरीब के पास राशि ही नहीं होगी, तो खाते खुल जाने का क्या मतलब?
आज शहरी क्षेत्रों में बैंकों की कमी नहीं है, फिर भी एटीएम की कमी बरकरार है। कितनी ही सरकारी बैंके ऐसी हैं, जो आज भी संकुचित मानसिकता से ग्रस्त है। कोई गरीब बैंक में आए, ऐसा वह चाहती ही नहीं। कोई अमीर बैंक में पहुंचता है, तो बैंककर्मियों की लार टपकती है। गरीब यदि बैंक जाकर राशि निकालता भी चाहता है, तो कैशियर का व्यवहार ऐसा होता है, जैसे वह अपनी जेब से राशि दे रहा हो। इसके लिए पहले बैंकों की मानसिकता को बदलना आवश्यक है। आज एक विद्यार्थी का खाता बहुत ही जल्द खुल जाता है। क्योंकि उसके पास अपनी पहचान के कई साधन हैं। पर गाँव के किसी किसान को खाता खुलवाने में इसलिए परेशानी होती है कि उसके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं होता, जिससे वह अपनी पहचान बता सके। प्रधानमंत्री ने गरीबों की परेशानी को समझते हुए गरीबों का बैंक खाता खुलवाने की दिशा में एक कारगर कदम उठाया है। इसे क्रांति नहीं कहा जा सकता। क्योंकि खाते इसलिए नहीं खुले, क्योंकि गरीबों के पास गरीबी के अलावा कुछ है ही नहीं। पर खाता खुल जाने से उन सभी का बीमा भी हो गया, अब दुर्घटना होने पर खाताधारी को 30 हजार रुपए बीमे के मिलेंगे। अनजाने में ही सही, उनके परिवार को कुछ सहायता तो मिल ही जाएगी।
 कई लोगों के बैंक खाते नहीं हैं, उसके कई कारण हो सकते हैं। बैंकिंग व्यवहार के लिए जितनी राशि की आवश्यकता होती है, उतनी राशि ही लोगों के पास नहीं होती। कई लोग बैंक खाते खुलवाने की प्रक्रिया से ही अनजान हैं। इसके अलावा बैंकों को केवल उन्हीं खाताधारकों से लाभ होता है, जो बड़ी राशि का व्यवहार करते हैं। अब बैंकिंग के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा दिखने लगी है, इसलिए खाता खुलवाना आसान हो गया है। आज भी कई सहकारी बैंकों में खाता खुलवाना एक परेशानी से भरा काम है। क्योंकि ये बार-बार एक ही दस्तावेज की मांग करती हैं। कई बार तो बैंक में दिया गया दस्तावेज दूसरी बैंक स्वीकार ही नहीं करती। इससे उपभोक्ता को आश्चर्य होता है कि एक बैंक के लिए उनके दस्तावेज मान्य हैं, तो दूसरी बंक लिए वह अमान्य कैसे हो सकते हैं? सरकारी बैंकों के कर्मचारियों का व्यवहार भी कई बार ग्राहकों के लिए उचित नहीं होता। एक तरफ ग्रहकों की लंबी लाइन लगी होती है, दूसरी तरफ कर्मचारी कंप्यूटर पर गेम खेलता होता है। ऐसे दृश्य अक्सर दिखाई देते हैं। जैसे ही भीड़ बढ़ती है, वैसे ही कर्मचारी अपनी जगह से गायब हो जाता है। कई बैंकों के कर्मचारी कंप्यूटर पर भी इतने धीरे-धीरे काम करते हैं, मानों वे ग्राहक पर अहसान कर रहे हों। अक्सर बैंकों में ग्राहक-कर्मचारियों में विवाद हो जाता है। निजी क्षेत्र की बैंकों ने अभी तक ग्राहकों का विश्वास जीतने में कामयाब नहीं हो पाई हैं। फिर भी सरकारी बैंकों से सबक लेते हुए वे ग्राहकों को उचित सुविधाएं  देकर तुरंत काम करने की योजना पर काम कर रही हैं। बैंकों द्वारा लोन आदि दिए जाने पर उनके विज्ञापनों में कुछ और बात होती है, लेकिन जब लोन लेने जाओ, तो कई गुप्त शुल्क लिए जाते हैं, जिसकी जानकारी ग्राहकों को नहीं होती। ग्राहकों की सुरक्षा का लाभ देने की घोषणाएं करने वाली बैंकें अपनी सुरक्षा भी नहीं कर पा रही हैं। ग्राहकों द्वारा दिए गए नोट को मशीन से देखकर असली-नकली की पहचान करती हैं, पर उन्हीं के एटीएम से नकली नोट निकलने पर वे ग्राहकों की बात पर विश्वास नहीं करती। ऐसी स्थिति में ग्राहक का बैंक के प्रति विश्वास टूट जाता है। रिजर्व बैंक के बार-बार कड़े निर्देश से बैंके अब ग्राहकों को अधिक से अधिक सुविधाएं देने का वादा कर रही हैं। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की जन-धन योजना द्वारा बैंकिंग सेक्टर में लोगों के लिए सच्चे अर्थ में उपयोगी साबित होगी, ऐसा कहा जा सकता है। इसे एक छोटी किंतु अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है।
बैंक में खाताधारी होना सामान्य व्यक्ति के लिए गर्व की बात भी हो सकती है। कई बार पासबुक भी बड़े काम आती है। छोटी-छोटी बचत यदि बैंक में जमा होने लगे, तो बचत को प्रोत्साहन मिलता है। आजकल कर्मचारियों का वेतन सीधे बैंकों में ही जमा होने लगा है, इससे व्यक्ति उतनी ही राशि निकालता है, जितनी उसे आवश्यकता होती है। फालतू खचरे से एक तरह से लगाम ही कस जाती है। देश का अर्थतंत्र छोटी-छोटी बचत से सबल होता है। सन 2008 में जब वैश्विक मंदी दिखाई दी थी, तो भारत को इसलिए फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि देश का अधिकांश वर्ग बचत करना जानता है। अब बैंक खातों से बचत का क्षेत्र बढ़ेगा। इसमें कोई शक नहीं। अब खाताधारी को एक लाख का दुर्घटना बीमा और 30 हजार जीवन बीमा के अलावा 5 हजार के ओव्हरड्राफ्ट की भी सुविधा मिलेगी। इससे लोगों में आशा का संचार हुआ है। अब किसान भी खाताधारी बनकर बैंकों से व्यवहार कर सकेंगे। जन-धन योजना को लागू करते समय कई मुद्दों पर ध्यान दिया गया है। अब तो केवल एक ही पहचान पत्र से खाता खुल जाएगा। खाते में लघुतम राशि रखने की चिंता नहीं रहेगी। बैंक में खाता खुल जाने से देश में क्रांति नहीं होने वाली, पर यह भी सच है कि बैंक में खाता खुल जाने के बाद क्रांति को रोका नहीं जा सकता।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 6 सितंबर 2014

जहर परोसती पाठ्यपुस्तकें

डॉ. महेश परिमल
इन दिनों पाठ्य पुस्तकों में कुछ ऐसा लिखा जा रहा है, जिससे बच्चे दिग्भ्रमित हो रहे हैं। उन्हें पालकों ने अब तो जो भी बताया, पाठ्य पुस्तकें उसे गलत बता रही हैं। बालपन में इस तरह की दिग्भ्रमण की स्थिति उनके मानसिक विकास को प्रभावित करती है। सरकार बदलने के साथ ही पाठ्य पुस्तकों में भी बदलाव लाया जाता है। पुस्तकों में यह बताया जाता है कि किन विद्वानों ने इसे तैयार करने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोग प्रदान किया है। पर किताबें जब बाहर आती हैं, तब ऐसा नहीं लगता है कि ये किताबें विद्वानों की नजर से भी गुजरी हैं। किताबों का लेखन एक अलग ही विषय है, पर जब उसे बच्चों को पढ़ाया जाता है, तब उसमें निहित गलत जानकारी बच्चों के बालसुलभ मन में विकृतियां पैदा करती हैं। हाल ही में यह खबर आई है कि पश्चिम बंगाल में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि खुदीराम बोस आतंकवादी थे। बंगाल की पावन भूमि, जिसे रत्न प्रसविनी भी कहा जा सकता है, वहां के क्रांतिकारी को यदि आतंकवादी बताया जाए, तो यह पूरी बंगाल की विद्वता पर सवाल खड़े करता है। विद्वानों की भूमि से इस तरह का संदेश जा रहा है, यह देश के लिए खतरनाक है, साथ ही बच्चों के भविष्य के लिए उउसे भी अधिक खतरनाक है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे भारत में पाठ्यपुस्तकों की संरचना विदेशी एजेंसियों की गाइड लाइन के अनुसार तैयार होती है। अंग्रेज भारत से चले गए, पर हमारी शिक्षा आज भी उनकी गुलाम है। इसका उदाहरण यही है कि हमने आज तक ऐसी शिक्षा नीति ही तैयार नहीं की, जिससे युवा आत्मनिर्भर बनें। यही कारण है कि आज नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) नाम की सरकारी एजेंसी द्वारा पहली से बारहवीं कक्षा के लिए जो पाठ्य पुस्तकें तैयार की गई हैं, उसमें यह पढ़ाया जा रहा है:-
-भगवान महावीर 12 वर्ष तक जंगल में भटकते रहे, इस दौरान उन्होंने कभी स्नान भी नहीं किया और न ही अपने कपड़े बदले।
-सिखों के गुरु तेगबहादुर आतंकवादी थे और लूटपाट करते थे।
-श्रीराम और श्रीकृष्ण हिंदुओं की कथाओं के हीरो हैं, इनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।
-सिखों के गुरु गोविंद सिंह मुगलों के दरबार में मुजरा करते थे।
-औरंगजेब जिंदाबाबा (पीर) था।
-लोकमान्य तिलक, बिपीन चंद्र पॉल, वीर सावकरकर, लाला लाजपतराय और अरविंद घोष चरमपंथी नेता थे।
-मां दुर्गा तामसिक प्रवृत्ति की देवी थी, वे शराब के नशे में चूर रहती थी, इसलिए उनकी आंखें हमेशा रक्तरंजित रहती थीं।
-प्राचीन काल में भारत की स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था, वे धार्मिक क्रियाओं में भी शामिल नहीं हो सकती थीं।
- आर्य भारत के मूल निवासी नहीं, पर मुस्लिम और ईसाई भी बाहर से आए हैं।
ये सभी बातें कपोल-कल्पित हैं और वह जैन, सिख और वैदिक धर्म के बाद भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों के लिए भी अपमानजनक है। प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में आज की तारीख में भी विद्यार्थियों को जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसमें निम्नलिखित विकृत और कपोल-कल्पित बातों को भी पढ़ाया जाता है:-
-गांधीजी का धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का कोई मनोवैज्ञानिक आधार नहीं था। रामराज्य के रूप में स्वराज्य की उनकी व्याख्या भारत के मुस्लिमों को उत्साहित नहीं कर पाई।
-सरदार पटेल आरएसएस का साथ देकर सांप्रदायिकता को बढ़ाने में शर्मनाक भूमिका निभाई थी।
-हनुमान एक छोटा सा वानर था, वह कामुक व्यक्ति था, लंका के घरों का शयन कक्ष देखा करता था।
- ऋग्वेद में कहा गया है कि स्त्री का स्नान कुत्ते के समान है।
-स्त्रियों का एक वस्तु समझा जाता था, उसे खरीदा जा सकता था और बेचा भी जा सकता था।
इस प्रकार की विकृत मानसिकता को दर्शाने वाले तथ्य असावधानीवश पाठ्य पुस्तकों में शामिल नहीं किए गए हैं, इसे जानबूझकर पाठ्य पुस्तकों में शामिल गया है। ताकि देश का भविष्य हमारे क्रांतिकारी नेताओं, महापुरुषों आदि के बारे में अपने विचार हल्के रखें। इससे वे अपने धर्म-संस्कृति से विमुख होकर दूसरे धर्मो की तरफ आकर्षित हो। मेकाले का भी यही उद्देश्य था कि उनकी पद्धति के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने वाले हमेशा अंग्रेजों के गुलाम बनें रहें। वह सब कुछ इस तरह के विकृत तथ्यों वाली किताबों के माध्यम से ही हो सकता है। देश में जब अंग्रेजों का राज था, तब हमारी संस्कृति में सतियों की पूजा करना और बाल विवाह आम बात थी। इसके खिलाफ राजा राममोहन राय ने एक अभियान चलाया। उनके इसी अभियान के कारण ही लॉर्ड बेंटिक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। आज शालाओं में पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से जो कुछ पढ़ाया जा रहा है, उसमें राजा राममोहन राय की प्रशंसा की जा रही है, पर उन्होंने भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने की कोशिश् की थी, यह नहीं पढ़ाया जाता।
वेस्ट बंगाल में आठवीं कक्षा के बच्चे देश के लिए जान देने वाले नौजवानों को आतंकवादियों के रूप में देख रहे है। दरअसल आठवीं कक्षा की इतिहास की किताबों में खुदीराम बोस, प्रफुल्ला चाकी और जतींद्र मुखर्जी जैसे अमर शहीदों को रिवॉल्यूश्नरी टेररिज्म चैप्टर के अंदर जगह मिली है। अगर रिवॉल्यूश्नरी टेरेरिज्म पाठ को हिंदी में अनुवाद किया जाए तो यह क्रांतिकारी आतंकवाद कहलाता है. क्या कहना है इतिहासकारों का। पश्चिम बंगाल सरकार के इस कदम की देश के प्रमुख इतिहासकारों ने घोर भत्र्सना की है। इतिहासकारों के अनुसार यह तथ्य ब्रिटिश शासन के हिंदुस्तानी Rांतिकारियों के प्रति रवैए को मान्यता देता है. गौरतलब है कि ब्रिटिश शासन ने हिंदुस्तानी देशभक्तों को आतंकवादी कहा था. इसके साथ ही इतिहासकारों ने कहा है कि अगर खुदीराम बोस एक क्रांतिकारी आतंकवादी हैं तो राज्य सरकार सुभाषचंद्र बोस को सरकार किस शब्द से पुकारेंगे? इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को पाठ्यपुस्तकों में शब्दों का चुनाव काफी देख समझ कर करना चाहिए. यहां पर यह बात भी देखने लायक है कि ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के 10 महीने के अंदर ही हायर सेकेंडरी एजुकेशन के पाठ्य क्रम से कार्ल मार्क्‍स से संबंधित पाठ हटवा दिए थे। समझ में नहीं आता कि बात-बात पर ब्रेंकिंग न्यूज देने वाला मीडिया इस बात को क्यों नही उठाता? इन विकृत तथ्यों का विरोध होना चाहिए। जन आंदोलन होने चाहिए, तभी हमारी भावी पीढ़ी बच पाएगी। अभी गुजरात की 42 हजार शालाओं में दीनानाथ बत्रा की 7 पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। जब इन किताबों की खरीदी हुई, तो कई लोगों को झटका लगा। वे यह प्रचार करने लगे कि यदि विद्यार्थियों ने इन किताबों को पढ़ा, तो वे अंधश्रद्धा और वहम के कायल हो जाएंगे। वास्तविकता यह है कि दीनानाथ बत्रा की किताबें भारतीय संस्कृति कितनी भव्य और महान है, बच्चे इसे पढ़कर अपने जीवन में किस तरह का बोधपाठ ले सकते हैं, इसका वर्णन बहुत ही सरल भाषा में किया गया है।
1947 में जब देश आजाद हुआ, तब से लेकर अब तक शालाओं में अंग्रेजों और उनके चमचों द्वारा तैयार किया गया इतिहास ही पढ़ाया गया है। यह इतिहास अनेक विकृतियों से भरा पड़ा है। कई बार पाठ्य पुस्तकों के गलत और विकृत तथ्य हमारे सामने आते हैं, पर कुछ दिनों बाद सब कुछ भूला दिया जाता है। आखिर इस दिशा में मीडिया सचेत क्यों नहीं होता। यह भी एक तरह का अपराध ही है, जो बच्चों में देश के प्रति नफरत के बीज बो रहा है। यह सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। इस पर अंकुश आवश्यक है। अन्यथा संभव है बच्चों के मन में बचपन से ही देश के प्रति दुराग्रह फैल जाए और वह अपनी मातृभूमि को ही हर बात पर कोसने लगे?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

भारत-जापान, दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है

डॉ. महेश परिमल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जापान दौरे से कई आशाएं जागी हैं। भारत-जापान केवल व्यापार के ही क्षेत्र में आगे आएं, ऐसा कोई नहीं चाहता, दोनों देश कई क्षेत्रों में आकर साझा करें, ऐसी इच्छा सबकी है। दोनों ही देश को एक-दूसरे की आवश्यकता है। विश्व राजनीति के पटल पर दोनों देश अपना प्रभुत्व खड़ा करना चाहते हैं। भारत-जापान के बीच कई समझौते हुए। इसमें सबसे बड़ा समझौता बुलेट ट्रेन को लेकर है। भारत में बुलेट ट्रेन के लिए जापान मदद करेगा। इसके अलावा जापान अगले 5 वर्षो में भारत में 2.10 लाख करोड़ का निवेश करेगा। इसके अलावा जापानी तकनीक का उपयोग भारत में अधिक से अधिक कर उसे रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में भी समझौता हुआ है। इस समय भारत का दुश्मन नम्बर वन पाकिस्तान एक तरह से गृहयुद्ध को झेल रहा है। वहां राजनीतिक स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने जापान की यात्रा कर पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। वैश्विक अर्थतंत्र में इस समय दो मुद्दों की चर्चा है। एक है एबीनोमिक्स और दूसरा है मोदीनोमिक्स। एबीनोमिक्स जापान को मंदी से बाहर लाने की इच्छा रखते हैं, वहीं मोदीनोमिक्स 50 मिलीयन नौकरियों के अवसर को पाना चाहते हैं। इससे भारत का अर्थतंत्र मजबूत होगा। मोदी जापान की स्मार्ट सिटी से काफी प्रभावित दिखे, वे भारत में भी 100 स्मार्ट सिटी तैयार करना चाहते हैं।
जापान में 2000 मंदिरों वाले शहर क्योटो शहर की तुलना भारत के काशी से केवल मंदिरों की संख्या के आधार पर ही की जा सकती है। परंतु स्वच्छता की दृष्टि से दोनों शहरों की तुलना करना मूर्खता ही होगी। हमारे लिए गंगा अवश्य एक पवित्र पावन नदी हो सकती है। पर उसे प्रदूषित करने में हम ही सबसे आगे हैं। हमारे देश में नदियों की भले ही पूजा होती हो, पर उसमें गंदगी डालने में भी हम सबसे आगे हैं। क्योटो के लिए यह बात एकदम अलग है। वहां के निवासी नदियों की पूजा भले ही न करें, पर नदियों को स्वच्छ रखना वे अपना कर्तव्य समझते हैं। क्योटो शहर समुद्र के किनारे है। वहां समुद्र के किनारे की स्वच्छता देखकर ही हमें यह आभास हो जाता है कि पर्यावरण के संरक्षण में वे कितने आगे हैं। वहां मंदिर हैं, इसलिए वह शकर पवित्र है, ऐसी बात नहीं है, पवित्रता जापानियों की मूल संस्कृति में है। वे देश के प्रति निष्ठावान हैं। चूंकि वे सफाईपसंद हैं, इसलिए क्योटो शहर साफ-सुथरा है। यही मानसिकता यदि काशी के लोगों में भी आ जाए, तो काशी को साफ-सुथरा होने में समय नहीं लगेगा। आज जापान में दोनों प्रधानमंत्रियों की दोस्ती की ही चर्चा है।
नरेंद्र मोदी ने जब जापानी प्रधानमंत्री को पहले जापानी भाषा में ट्वीट किया, तो इसका जवाब जापानी प्रधानमंत्री ने तुरंत दिया। सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हुई। जापान के प्रधानमंत्री को ट्वीटर पर लाखों लोग फालो करते हैं, पर वे स्वयं नरेंद्र मोदी को फालो करते हैं। नरेंद्र मोदी का मूलमंत्र भारत को आर्थिक रूप से सक्षम और समृद्ध बनाना है। जापान से वह टेक्नालॉजी लेकर भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करने और अधिक बिजली उत्पन्न करने के प्लान में मोदी व्यस्त हैं। मोदी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी विजय के साथ विदेश नीति का कोई सरोकार नहीं है, परंतु उन्होंने भारतीयों से जो अच्छे दिनों का वादा किया है,उसे वे निभाना चाहते हैं। जापान के प्रधानमंत्री भी मोदी की मुलाकाता का मर्म समझते हैं। परंतु चीनअमेरिका के लिए भारत-जापान के बढ़ते संबंध चिंता का विषय हैं। भारत में सबसे अधिक निवेश करने वालों में जापान चौथे नम्बर पर है। ¨कतु यह निवेश पिछले कुछ वर्षो में घटा है। जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल को-ऑपरेशन ने ऐसे संकेत दिए हैं कि जापानी निवेशकों को भारत में दिलचस्पी है। इधर रिजर्व बैंक की 2012-13 की रिपोर्ट बताती है कि जापान का भारत में निवेश पहले दो अरब डॉलर था, जो घटकर 1.3 डॉलर रह गया है। मोदी इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट के लिए निवेश चाहते हैं, जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी के प्रमुख अकीहीको तनाका के अनुसार जापान भारत को चीन की तरह विकसित करने में मदद कर सकता है। गुजरात के द्वार जिस तरह से निवेशकों के लिए खुला रखा था, उसी तरह भारत के द्वार भी वे निवेशकों के लिए खुला रखना चाहते हैं।
नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब पहली बार 2007 में जापान की यात्रा पर गए थे। तब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो ऐब ही थे। तब मोदी अपने बिजनेस मिशन पर थे। वहां उन्होंने लोगों को खूब प्रभावित किया। इसके बाद जब वे 2012 में जापान गए, तब वहां सत्ता पलट चुकी थी। इसके बाद भी उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री एब से भेंट की थी, ऐब ने भी उनका जोशीला स्वागत किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री योशीहीको नोडा ने भी मोदी का जोश पूर्ण स्वागत किया था। गुजरात के विकास से जापानी प्रधानमंत्री भी काफी प्रभावित हुए थे। दिसम्बर 2012 में ऐब फिर सत्ता में आ गए, तो सबसे पहले उन्हें नरेंद्र मोदी का ही अभिनंदन मिला। ऐब ने भी इसका तुरंत प्रत्युत्तर दिया था। मोदी जब प्रधानमंत्री नहीं थे, तब भी वे संबंधों को बनाए रखने में विश्वास रखते थे, अभी भी वे ऐसा ही करते हैं। अभी जब वे जापान में बसे भारतीयों से मिले, तब उसमें से कई गुजराती ऐस थे, जिन्हें वे नाम से जानते थे और उन्होंने उन्हें उनके नाम से पुकारा, तो सभी को अच्छा लगा। दोनों ही प्रधानमंत्रियों में एक समानता है कि दोनों ही स्पष्ट बहुमत से अपनी सरकार बनाई है। जापान अब बदल रहा है। लोग अंग्रेजी बोलने लगे हैं। एयरपोर्ट में भी अंग्रेजी में एनाउंसमेंट होने लगा है। अब उनके मुंह से ‘हेलो’ भी निकल जाता है। भारत-जापान के बीच व्यापारिक संबंधों में अब तक जो सुस्ती थी, अब उसमें नई ऊर्जा आएगी, यह प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से स्पष्ट हो गया है।
जापान के बाद नरेंद्र मोदी की नजर अमेरिका पर है। मोदी को मित्र बनाने की कला से देश को काफी लाभ हो सकता है। काशी को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए क्योटो के साथ हुए एमओयू ने भी देश का ध्यान खींचा है। एक तरफ गंगा के शुद्धिकरण की योजना चल रही है, तो दूसरी तरफ काशी के विकास को नया आयाम जापान से मिलेगा। एमओयू के अमलीकरण में काफी समय लगता है, परंतु उस दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं, यह प्रशंसनीय है। यह भेंट यह दर्शाती है कि अब तक अमेरिका भारत की नाक दबाता रहा है, लेकिन वह भी सचेत हो जाएगा। दो विकासशील देश किस तरह से विकसित देशों को टक्कर दे सकते हैं, यह दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात के बाद स्पष्ट हो गया है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 3 सितंबर 2014

विरोध, विरोधियों को भी अच्छा लगना चाहिए

डॉ. महेश परिमल
भारतीय राजनीति अब नई करवट ले रही है। अभी तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि प्रधानमंत्री के सामने ही प्रदेश के मुख्यमंत्री की हूटिंग हुई हो। यह बात समझने की है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं कसी गई, तो स्थिति भयावह हो सकती है। ऐसा हो रहा है, यह कांग्रेस-भाजपा दोनों के लिए शोचनीय है। कांग्रेस यदि इसे अपना अपमान मान रही है, तो उसे सचेत हो जाना चाहिए कि ऐसा होना नागरिकों के आक्रोश का ही एक भाग है। कांग्रेस को इससे अधिक यह सोचने की आवश्यता है कि उसकी पराजय के कारण क्या हैं? यदि वह ऐसा नहीं सोचती, तो यह उसकी भूल होगी। भाजपा के लिए भी यह एक खतरे की घंटी है कि विशाल बहुमत पाकर वह मदमस्त हो गई है। यही अहंकार उसे रसातल में भी ले जा सकता है। आश्चर्य की बात यह है कि आखिर यह सब उन्हीं राज्यों में ही क्यों हो रहा है, जहां निकट भविष्य में आम चुनाव हैं। शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कई नेताओं को रास नहीं आ रही है। कई नेता ईष्र्या की आग में तप रहे हैं। इस कारण भाजपा की छवि बिगड़ रही है। राजनीति में शुद्धि लाने के लिए इस तरह की हरकतें बंद होनी चाहिए।
भारतीय राजनीति में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं का बहिष्कार करने का संकल्प गैरभाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किया है। इसके पीछे उनके कारण भी ठोस हैं। एक नहीं, पर चार गैरभाजपाशासित राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में बुलाया गया था। पर श्रोता उन्हें सुनने के बजाए नरेंद्र मोदी को सुनना चाहते थे। इससे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लगा कि भाजपा कार्यकर्ता उनका अपमान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की बढ़ती लोकप्रियता से केवले कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा नेताओं को भी ईष्र्या होने लगी है। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह घातक है। अमूमन ऐसा होता है कि देश के प्रधानमंत्री जब भी घोषित रूप से सरकारी समारोह में शामिल होते हैं, तो राज्य के मुख्यमंत्री को भी आमंत्रित किया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री एवं राज्य के मुख्यमंत्री को भी बोलने का मौका दिया जाता है। इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी समारोह में प्रधानमंत्री हों और मुख्यमंत्री की हूटिंग की गई हो। यह सब प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के बढ़ने के कारण हो रहा है।
यह तय है कि जिस कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी हों, उस कार्यक्रम में लोग किसी अन्य नेता को सुनना ही पसंद नहीं करते। इसका उदाहरण भोपाल में देखने को मिला था। जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया, इसके तुरंत बाद ही 25 सितम्बर 2013 को उनकी एक विशाल आमसभा भोपाल में आयोजित की गई थी। इस समारोह में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी उपस्थित थे। लेकिन जनता केवल नरेंद्र मोदी को ही सुनना चाहती थी। जनता के आक्रोश को देखते हुए अन्य नेताओं ने अपना भाषण छोटा कर दिया था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को एक बार नहीं, बल्कि तीन बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ समारोह में उपस्थित रहे। पहली बार जब प्रधानमंत्री ने वैष्णो देवी के लिए रेल्वे लाइन के उद्घाटन के अवसर पर वे साथ-साथ थे। उस दौरान उमर अब्दुला को लोगों ने पूरा सुना। अपने भाषण के दौरान उन्होंने इस रेल्वे लाइन का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को देते हुए नरेंद्र मोदी को एक तरह से उत्तेजित करने की कोशिश की। इसके बाद कारगिल के जिस समारोह में नरेंद्र मोदी और उमर अब्दुल्ला एक मंच पर उपस्थित थे। इस दौरान लोगों ने उमर अब्दुल्ला की हूटिंग की, वे नरेंद्र मोदी को सुनना चाहते थे।
हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में सत्तारुढ़ कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। चुनाव के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पद से हटाने की माँग ने जोर पकड़ा था। पर वे दोनों ही बच गए। अगले विधानसभा चुनावों में इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की हार तय मानी जा रही है। इस समय दोनों ही मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता का ग्राफ काफी नीचे है। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पूरे उफान पर है। इस कारण कांग्रेस के नेताओं को मोदी की लोकप्रियता से ईष्र्या होना लाजिमी है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री के सामने ही यदि मुख्यमंत्रियों के खिलाफ हूटिंग होती है, तो इससे मुख्यमंत्रियों की पीड़ा को समझा जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा से 166 किलोमीटर दूर कैथल से राजस्थान की सीमा तक जाते हुए नेशनल हाइवे का शिलान्यास के लिए पहुंचे थे। इसमें भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी उपस्थित थे। आयोजकों ने नरेंद्र मोदी के भाषण के पहले हुड्डा का भाषण रखा था। पर जनसैलाब तो केवल नरेंद्र मोदी को ही सुनने आया था। इसलिए हुड्डा के खिलाफ नारेबाजी हो गई। हरियाणा के मुख्यमंत्री की तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को भी 16 अगस्त को प्रधानमंत्री की रायगढ़ और सोलापुर में आयोजित सभाओं में अपमानित होने का कड़वा घूंट पीना पड़ा था। इसलिए नागपुर में 21 अगस्त को आयोजित कार्यक्रम में वे शामिल नहीं हुए। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो कह चुके हैं कि
मैं प्रधानमंत्री के साथ बैठा था, किसी बीजेपी नेता के साथ नहीं। सरकारी कार्यक्रम राजनीितक ताकत दिखाने की जगह नहीं है। आपको ताकत ही दिखाना है, तो चुनावी मैदान में आइए, हम तैयार हैं। देश में एक गलत परंपरा शुरू हो रही है। ये खतरनाक संकेत हैं। यह भी सच है कि जब सोरेन के खिलाफ नारेबाजी हो रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को शांत रहने का इशारा भी किया था। जनसमूह को संयम रखने के लिए भी कहा, पर इसका किसी पर कोई असर नहीं हुआ। इस घटना से मोदी प्रशंसक भले ही खुश हो जाएं, पर उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अपने राजनीतिक विरोधियों को मात देने का यह कोई बेहतर तरीका नहीं है। इस कारण भाजपा और मोदी दोनों की ही छवि  बिगड़ती है। एक तरफ प्रधानमंत्री राजनीति के गलियारों से गंदगी दूर करने का संकल्प लेते हैं, तो दूसरी तरफ उनके ही सामने इस तरह की नारेबाजी हो रही है। विरोधियों का अपमान करना भी एक तरह की राजनीतिक गंदगी ही है। राजनीति में यदि शुद्धि लानी है, तो ऐसी हरकतों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। इससे एकबारगी प्रशंसक खुश हो जाएं, पर यह खुशी अधिक समय तक नहीं रह सकती। क्योंकि इस खुशी में कहीं न कहीं विरोधियों का लताड़ने का भाव है। विरोध तो ऐसा होना चाहिए कि विरोधियों को भी अच्छा लगे।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 1 सितंबर 2014

क्‍या जन-धन योजना को एक क्रांति कहें



 
आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 25 अगस्त 2014

पर्यावरण विनाश की ओर बढ़ते सरकार के कदम !

डॉ. महेश परिमल
नई सरकार को रातों-रात काम करने वाली सरकार बनना है, शायद वह यह सोच रही है कि जल्दबाजी में ऐसे काम किए जाएं, जिससे लोग महंगाई को भूल जाएं। वह अपनी छवि सुधारना चाहती है। इसमें कोई बुरा नहीं है। इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि जल्दबाजी में कुछ ऐसा हो जाए, जिससे जनता का ध्यान बंट जाए। हाल ही में सरकार ने नई पर्यावरण नीति की घोषणा की है। पर्यावरण और विकास दोनों ही साथ रहें, ऐसी सोच अब तक किसी सरकार में नहीं देखी गई। आमतौर पर सरकार ऐसी नीतियां बनाती हैं, जिससे पर्यावरण का संरक्षण तो कम पर विनाश अधिक होता है। कहा यह जाता है कि इन नीतियोंसे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ विकास होगा, पर ऐसा होता नहीं है, बल्कि विकास के नाम पर विनाश ही अधिक होता है। विकास के नाम पर मोदी सरकार ने पर्यावरण के कारण अटके प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाना चाहती है। इसलिए पहले इसकी समयसीमा 105 दिन थी, उसे घटाकर 60 दिन कर दिया गया है। सरकार की यह जल्दबाजी पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए हानिकारक है। देश की पर्यावरण नीति गलत दिशा में जा रही है। इसके लक्षण अभी से दिखाई दे रहे हैं।
कितने ही प्रोजेक्ट्स ऐसे होते हैं, जिन्हें पर्यावरणीय अनुमति की आवश्यकता होती है। अनुमति प्राप्त होने में कई बार देर हो जाती है। किसी प्रोजेक्ट से पर्यावरण को किस तरह से हानि हो सकती है, इसकी जानकारी रातों-रात पता नहीं चलती। उसके लिए पर्यावरणविदों की एक टीम अध्ययन करती है, शोध करती है, ताकि पता चल सके कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को किस तरह से हानि होगी। कई प्रोजेक्ट के खिलाफ पर्यावरणविद लामबंद भी होते हैं। इस पर सरकार उन पर यह आरोप लगाती है कि वे लोग विकास का विरोध कर रहे हैं। सरकार इन विरोधों को गंभीरता से नहीं लेती। कुछ ऐसा ही मोदी सरकार कर रही है। वह प्रोजेक्ट्स को धड़ाधड़ अनुमति देकर विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ना चाहती है।
पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पद संभालते ही यह संकेत दे दिया कि अब पर्यावरण संबंधित प्रोजेक्ट की अनुमति में विलम्ब नहीं होगा। अभी सरकार के पास एन्वायरमेंट क्लिरियंस के लिए आने वाले 358 प्रोजेक्ट विचाराधीन हैं। ये प्रोजेक्ट इसलिए विचाराधीन हैं, क्योंकि इस पर विचार-मंथन चल रहा है। मान लो किसी प्रोजेक्ट में प्राणी अभयारण्य आ रहा हो, तो प्रोजेक्ट स्थापित किए जाने के बाद वह वहां के प्राणी अभयारण्य को किस तरह से नुकसान पहुंचाएगा? वहां के प्राणियों का संरक्षण किस तरह से किया जाएगा?  प्राणी संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट किस तरह का कार्य करेगा आदि तथ्यों पर विचार किया जाता है। अधिकांश मामलों में यही होता है कि पूरा अध्ययन के बाद यह बात सामने आती है कि प्रोजेक्ट के स्थापित होने से पर्यावरण को नुकसान अधिक होगा, इसलिए उन प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल पाती। लेकिन अब सरकार जल्दबाजी में कई प्रोजेक्ट को मंजूरी देने वाली है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होगा, यह तय है। नई सरकार की इस तरह की पहल भविष्य में पर्यावरणीय नुकसान के लिए दोषी होगी। सरकार ने अब नीति बनाई है, जिसमें प्रोजेक्ट स्थापित करने के इच्छुक कंपनी ही यह तय करेगी कि उनके प्रोजेक्ट के असर का पर्यावरणीय अध्ययन कौन करेगा? यानी यदि ए नाम की कोई कंपनी जंगल के पास या पर्यावरण को हानि पहुंचाए, इस तरह से वह प्रोजेक्ट स्थापित करती है, तो उसे ही यह तय करना होगा कि वे कौन सी कंपनियां होंगी, जो यह इस बात की जांच करेंगी कि कंपनी द्वारा स्थापित प्रोजेक्ट से पर्यावरण को हानि पहुंचेगी या नहीं। यह तो वही बात हुई कि अपराधी से कहा जाए कि तुम निर्दोष हो, इसके लिए चार ऐसे इंसानों को सामने लाओ, जो तुम्हें निर्दोष बताए। तय है कि इसमें भ्रष्टाचार होगा ही। कंपनी उन्हीं संस्थाओं को जांच के लिए सामने लाएगी, जो उसके समर्थन में रिपोर्ट देंगी। इससे कंपनी भी स्थापित हो जाएगी और पर्यावरण को नुकसान होगा, सो अलग। पिछली सरकार प्रोजेक्ट की फाइल आने के बाद 105 दिनों के अंदर उसे पर्यावरणीय मंजूरी देनी है या नहीं, यह तय करने का नियम रखा था। यानी प्रोजेक्ट प्रस्तुत करने वाली कंपनी को कम से कम 105 दिन तक तो इंतजार करना ही होता था। इसके बाद भी यह इंतजार काफी लंबा हो जाता था, इसलिए प्रोजेक्ट ताक पर रख दिए जाते थे। यूपीए सरकार के समय आखिर-आखिर में जयंती नटराजन जब पर्यावरण मंत्री थीं, तब उन्होंने ऐसे बहाने बनाकर कई प्रोजेक्ट को दबा कर रख दिया था। परिणामस्वरूप काफी आलोचना हुइ। उन्हें मंत्रीपद छोड़ना पड़ा था।
नई सरकार ने 105 दिन की इस समय सीमा को 60 दिन कर दिया है। ये 60 दिन पूरी तरह से सख्त होकर अमल करने का है, यदि अमल में नहीं लाया जाता, तो संबंधित विभाग-अधिकारी को दंड दिया जाएगा, ऐसा प्रावधान भी किया गया है। यह काम सरलता से हो, इसके लिए कितने ही काम ऑनलाइन हो जाएं, इसकी सुविधा भी दी जाएगी। परंतु हकीकत यह है कि पर्यावरण के तमाम प्रोजेक्ट्स का अध्ययन 60 दिनों में संभव ही नहीं है। मान लो किसी पक्षी अभयारण्य के आसपास कोई प्रोजेक्ट स्थापित किया जाना है। कंपनी इसके लिए सरकार को ग्रीष्म ऋतु में फाइल देती है। इसके बाद 60 दिनों के नियम के अनुसार उस प्रोजेक्ट के लिए हां या ना कह दिया जाता है। किंतु पक्षी अभयारण्य में कितने ही अप्रवासी पक्षी केवल शीत ऋतु में ही आते हैं। इसे सरकार समझ नहीं पाएगी। शीत ऋतु में जब यायावर पक्षी वहां पहुंचेंगे, तब तो उन्हें पता चलेगा कि जहां उन्हें अंडे देने हैं, वहां तो फैक्टरी बन रही है। इस तरह से जल्दबाजी में यदि निर्णय ले लेती है, तो पक्षी अभयारण्य का क्या होगा? भूतकाल में नर्मदा बांध, कुंदनकुलम परमाणु संयंत्र, निरमा प्रोजेक्ट, नियमागिरी में पॉस्को स्टील कारखाना आदि का काफी विरोध हुआ। कितने ही विरोध सही होने के कारण प्रोजेक्ट बंद भी कर दिए गए। पर कई स्थानों पर गलत इरादे के कारण विरोध भी होता आया है। सरकार ने इस मुद्दे को भी ध्यान में रखा है। नए नियम के अनुसार प्रोजेक्ट की घोषणा होने के दो महीने बाद यदि किसी संगठन या व्यक्ति द्वारा विरोध नहीं किया जाता, तो यह मान लिया जाएगा कि इस प्रोजेक्ट से किसी को भी किसी तरह का नुकसान नहीं हो रहा है। पर्यावरणविद सरकार के कितने ही फैसलों को चुनौती दी है। जैसा कि प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए समयसीमा तय होनी चाहिए। मंजूरी के लिए प्रक्रिया ऑनलाइन भी होनी चाहिए। प्रोजेक्ट में किसी प्रकार का विलंब न हो, यह सरकार की मंशा है, इससे कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं नाराज भी हैं।
सरकार इतने पर भी खामोश नहीं है। भूतकाल में न जाने कितने रद्द हुए प्रोजेक्ट्स को सरकार पर्यावरणीय मंजूरी देना चाह रही है। यह भी पर्यावरण की दिशा में एक नुकसानदेह कदम साबित होगा। क्योंकि पर्यावरण का नुकसान हो रहा है, इसीलिए पॉस्को की योजना धराशायी हो गई, यदि इसे मंजूरी मिल गई होती, तो उड़ीसा में स्थापित होने वाला यह सबसे बड़ा स्टील प्लांट होता। गोवा में खनन कार्य बंद हो गया है। नई सरकार ये सब फिर से शुरू करना चाहती है। यदि यह सब होता रहा, तो किस तरह से पर्यावरण का संरक्षण हो पाएगा। वैसे भी भाजपा सरकार पर यह आरोप है कि वह उद्योगपतियों को संरक्षण देती है। ऐसे में वह अपनी दलगत नीति से अलग तो नहीं हो सकती। तब तो फिर पर्यावरण के संरक्षण की बात करना ही बेमानी है। इस समय सरकार के पास पर्यावरणीय मंजूरी के लिए जो पेंडिंग प्रोजेक्ट हैं, उसकी संख्या 358 है। इसमें औद्योगिक137, इंफ्रास्टक्चर 69, अन्य खानें 63, कोयले की खान 36, रीवर वेली 21,  नए निर्माण 17 और थर्मल प्रोजेक्ट के 14 प्रोजेक्ट पेंडिंग हैं।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 23 अगस्त 2014

ईश्वर! मेरे देश को ‘इबोला’ से बचाना

डॉ. महेश परिमल
इस समय पूरे विश्व में खतरनाक बीमारी ‘इबोला’ की चर्चा है। इस बीमारी ने अब तक हजारों लोगों की जान ले ली है। डॉक्टर पसोपेश में हैं, उनके पास इसका कोई इलाज ही नहीं है। कई देश इस बीमारी से इतने अधिक आक्रांत हैं कि इस बीमारी से ग्रस्त देशों से आने वाले लोगों को अपने देश में घुसने ही नहीं दे रहे हैं। यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि केवल 15-20 दिनों में ही इंसान मर जाता है। ‘इबोला’ एक ऐसा वाइरस है, जो तेजी से फैलता है। इंसान जब तक कुछ समझे, तब तक बहुत ही देर हो जाती है। इससे वह बच ही नहीं सकता। अब तो पूरे विश्व में करीब एक हजार लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे हैं। यदि शीघ्र ही इस पर काबू न पाया जा सका, तो यह एक महामारी के रूप में पूरे विश्व में फैल सकता है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉनसन सरलीफ ने महामारी का रूप ले चुके एबोला विषाणु के संRमण से लड़ने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है।
पश्चिम अफ्रीकी देशों में एबोला के वाइरस ने काफी उत्पात मचाया है। लाईबेरिया, गुयाना, सिएरा लियोन में लोग इस बीमारी से ग्रस्त है। केवल गिनी में ही 200 से अधिक लोगों की मौत इससे हुई है। यह वाइरस इसलिए इतना खतरनाक है, क्योंकि यह संक्रामक है। जो कोई इस बीमारी के मरीज के सम्पर्क में आता है, वह भी इससे ग्रस्त हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरे विश्व को इससे सतर्क रहने की चेतावनी दी है। जहां इस वाइरस के होने की पुष्टि हुई है, वहां लोगों से न जाने की अपील की गई है। यदि उस देश से कोई आता भी है, तो उसकी पूरी जांच के आदेश दिए गए हैं। हाल ही में अहमदाबाद के एयरपोर्ट में अफ्रीका से आए लोगों की स्क्रिनिंग की गई। अब तो बात वीसा न देने की भी होने लगी है। ब्रिटेन में इस वाइरस को लेकर जबर्दस्त छटपटाहट है। इसका कारण यह है कि अफ्रीकी देश के कुछ लोग ब्रिटेन आए हुए हें। ब्रिटेन के विदेश सचिव फिलीप हमांडे ने लोगों को सावधान रहने की सलाह दी है। इस बीमारी से ग्रस्त 100 में से केवल 19 व्यक्ति को ही बचाया जा सका है। वह भी उस स्थिति में, जब ‘इबोला’  के प्रारंभिक लक्षण दिखाई दें। यदि इलाज में 4-5 दिन की देर हो जाए, तो मरीज का बचना मुश्किल है। इस बीमारी को एक देश से दूसरे देश पहुंचने में उतना ही वक्त लगता है, जितना एक विमान को दूसरे देश पहुंचने में लगता है। एक बार यदि यह वाइरस हमारे देश में घुस गया, तो उसे रोकना बहुत ही मुश्किल होगा। जब तक हम समझेंगे, तब तक हजारों जानें चली जाएंगी।,
इस वाइरस से फैलने वाली बीमारी के सिम्पटम्स ‘सर्दी’ की तरह हैं। हमें यह लगता है कि यह तो सामान्य सर्दी है, कुछ दिन में ठीक हो जाएगी। ऐसा ही ‘इबोला’  में भी होता है। गले में थोड़ी सी खराश हो, चमड़ी पर कुछ जलन जैसा महसूस हो रहा हो, हाथ-पांव में दर्द, दो दिनों में ही बुखार जोरदार बढ़ जाए, बुखार नियंत्रण में न रहे, इसके साथ ही उल्टी की शिकायत शुरू हो जाए, फिर डायरिया का डर पैदा हो जाए। तो यह सब ‘इबोला’  के लक्षण हैं। इन लक्षणों के साथ शरीर के सभी अंग इससे प्रभावित होने लगते हैं। सारे अंग निष्क्रिय हो जाते हैं, तो मरीज की मौत हो जाती है। लोगों को बर्ड फ्लू याद होगा। इस वाइरस ने कितनी दहशत फैलाई थी। लोग मुंह पर कपड़ा बांधकर घर से बाहर निकलते थे। अस्पतालों में उसके लिए विशेष वार्ड की व्यवस्था की गई थी। इस बीमारी से जिस व्यक्ति की मौत हो जाती थी, उस व्यक्ति की लाश घर ले जाने के लिए मना कर दिया जाता था। उसकी अंत्येष्टि में भी काफी परेशानी होती थी। ‘इबोला’  वाइरस बर्ल्ड फ्लू से भी अधिक खतरनाक है। इसलिए यदि इसका मरीज कहीं दिखाई दे गया, उस कल्पना से ही लोग कांपने लगते हैं। अभी तक यह वाइरस हमारे देश में नहीं आया है। पर कई भारतीय अफ्रीकी देशों में हैं, यदि वे स्वदेश लौटते हैं, तब काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार यदि सचेत होकर इस दिशा में सख्त कार्रवाई करे, तो संभव है इसके वाइरस को देश में प्रवेश पर रोका जा सकता है। वाइरस को कोई सीमा बांध नहीं सकती, पर सावधानी आवश्यक है। अब लाइबेरिया की ही बात ले लो, इस देश ने ‘इबोला’  से बचने के लिए देश में ही आयोजित फुटबॉल टूर्नामेंट ही स्थगित कर दिया। ऐसे स्थानों पर विशेष नजर रखी जा रही है, जहां कई लोग रोज ही इकट्ठे होते हों। सरकार ने यह ताकीद कर दी है कि यदि किसी को ‘इबोला’ के लक्षण दिखाई देते हैं और वह डर के कारण कहीं छिपा है, तो उसे तुरंत ही करीब के अस्पताल से सम्पर्क करना चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि यह वाइरस पशुओं से मानव में आया है। अभी तक तो यह वाइरस अफ्रीकी देशों तक ही सीमित है। पर एक मामला फिलीपींस में भी देखने में आया है। ब्रिटेन ने भी अपना डर व्यक्त किया है। इसके बाद यूरोप में भी काफी डर फैला हुआ है। ‘इबोला’ ने अफ्रीकी देशों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इस वाइरस के बारे में यह जानकारी है कि यह अफ्रीकी देशों से आगे बढ़कर एशिया तक पहुंच गया है। केन्या से हांगकांग आई एक महिला में ‘इबोला’ के वाइरस पाए जाने की पुष्टि हुई है। हांगकांग की एलिजाबेथ अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा है कि हम हालात पर नजर रखे हुए हैं। ब्रिटेन के बर्किंघम में भी एक व्यक्ति में ‘इबोला’ के लक्षण दिखाई दिए हैं। यह व्यक्ति नाइजीरिया से पेरिस, फ्रांस होते हुए ब्रिटेन आया था। ‘इबोला’ का पहला मरीज फरवरी में देखने को मिला था। गिनी के सुदूर गांवों में यह रोग शुरू हुआ था। उसके बाद गिनी से लाइबेरिया, सिएरा लियोन तक फैल गया है। धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में फैल जाएगा, ऐसी दहशत है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉनसन सरलीफ ने महामारी का रूप ले चुके एबोला विषाणु के संRमण से लड़ने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है। यहां एबोला के खतरनाक वायरस ने तांडव मचाना शुरू कर दिया है। लाइबेरिया के सूचना मंत्री लेविस ब्राउन ने पुष्टि की है कि इस वायरस से पीड़ित लोगों को उनके परिजन घरों से घसीटते हुए लाकर सड़कों पर फेंक रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों को लगता है कि इबोला के इलाज के लिए बनाए गए स्पेशल वार्ड से आधे से ज्यादा लोग जिंदा वापस नहीं आते हैं और इसीलिए उनके परिजन रोगियों को सड़कों पर फेंक रहे हैं। हालांकि सरकारी अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि रोगियों को घरों में ही रखें, सरकार खुद रोगियों को घरों से ले जाएगी। यह रोग पसीने और लार से फैलता है। संक्रमित खून और मल के सीधे संपर्क में आने से भी यह फैलता है। इसके अतिरिक्त, यौन संबंध और एबोला से संक्रमित शव को ठीक तरह से व्यवस्थित न करने से भी यह रोग हो सकता है। यह संक्रामक रोग है। ये वायरस संक्रमित जानवर विशेष तौर में बंदर, चमगादड़ या उड़ने वाली लोमड़ी और सूअरों के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलता है। अब तक इस बीमारी का कोई विशेष उपचार नहीं है। फिर भी इससे ग्रस्त लोगों की मदद के लिए उन्हें ओरल रिहाईड्रेशन थैरेपी, जिसमें रोगी को मीठा और नमकीन पानी पीने के लिए दिया जाता है या नसों में तरल पदार्थ दे सकते हैं। इस रोग में मृत्यु दर काफी ऊंची है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति ने विषाणु के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए देश के स्कूलों को बंद करने और अधिकतर सरकारी कर्मचारियों को घर में रहने के आदेश दिए हैं।
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

मेरी तीसरी किताब आ गई


मेरी तीसरी किताब छपकर आ गई है। पुस्‍तक प्रकाशन, शाहदरा दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस किताब की प्रस्‍तावना प्रसिद्ध आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह और फ्लैप प्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार गिरीश पंकज ने लिखी है।कवर पेज कुँवर रवींद्र ने तैयार किया है। छत्‍तीसगढ़ की माटी से कभी उऋण नहीं हो सकता, इसलिए इस बार बिलासपुर में अरपा के किनारे डेढ़ वर्ष तक रहने पर रात में अरपा की सिसकियॉं सुनी, उसी पर आधारित एक ललित निबंध को शीर्षक दिया है। इनमें से कई ललित निबंध भास्‍कर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हो चुके हैं। जिस-जिस ने इस किताब के प्रकाशन में मेरा सहयोग किया, उनका आभार।

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

इबोला के खौफ के साये में दुनिया



आज जागरण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

सोशल नेटवर्किंग के सहारे सेलिब्रिटी


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

http://epaper.haribhoomi.com/epapermain.aspx
हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख 

आज वर्ल्ड एम्ब्रियोलॉजी डे
याद आते हैं डॉ. सुभाष
डॉ. महेश परिमल
विश्व की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी ने 25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में जन्म लिया था। उसका नाम  मेरी लुइस ब्राउन था। भारत में पहली टेस्ट ट्यूब बेबी 3 अक्टूबर 1978 को हुई थी। उसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल है। जब इन दोनों टेस्ट ट्यूब बेबी इस संसार में आई, तब इस शोध को मान्यता नहीं मिली थी। इस शोध को मान्यता मिलने के बाद भारत में पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म मुम्बई में 6 अगस्त 1986 को डॉ. इंदिरा आहूजा के हाथों हुआ, उसका नाम था हर्षा चावड़ा। हर्षा आज 25 वर्ष की हो गई है। भारत में पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ, तब विज्ञान के इस चमत्कार का सहजता के साथ स्वीकारने के बजाए देश के नेताओं ने राजनीतिक रंग दे दिया। इसलिए हर्षा का जन्मोत्सव नहीं हो पाया। टेस्ट ट्यृब बेबी को जन्म देने वाले डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनके सहयोगी सुनीत मुखर्जी और एस.के.भट्टाचार्य का अपमान किया गया। यह सिद्धि पश्चिम बंगाल की थी। इस सिद्धि की प्रशंसा तो नहीं हो पाई, पर इसके जन्मदाता डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय को इंटरनेशनल कॉफ्रेंस में जाने से भी रोक दिया गया। भारत को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी देने वाले डॉ. मुखोपाध्याय 19 जून 1981 को अपने निवास स्थान में आत्महत्या कर ली थी। भारत में पहली व्रिटो-फर्टीलाइजन से सिद्धि प्राप्त करने वाले इस डॉक्टर के महत्व को 2005 में समझा गया। बाद में इनका मरणोपरांत सम्मान भी किया गया। इस घटना पर तपन सिन्हा ने एक फिल्म भी बनाई थी, जिसका नाम था ‘एक डॉक्टर की मौत’, इस फिल्म में प्रमुख भूमिका पंकज कपूर और शबाना आजमी ने निभाई थी।
ये सब कुछ इसलिए याद करना पड़ रहा है, क्योंकि कल शुक्रवार यानी 25 जुलाई को ‘वर्ल्ड एम्ब्रीयोलॉजी डे’ है। इस शोध के कारण विश्वभर में 50 लाख से अधिक टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हो चुका है। एम्ब्रीयोलॉजिस्ट का काम स्पर्म और एग के कलेक्शन के बाद फर्टाइल करने का होता है। फिर एम्ब्रीयो के डेवलपमेंट पर नजर रखी जाती है। हर्षा 25 वर्ष की उम्र को पार कर चुकी है। उसकी मां का नाम मणि चावड़ा है। उसकी 25 वर्षगांठ पर वह मुम्बई के सिद्धि विनायक मंदिर गई थी। क्योंकि बर्थ डे केक के लिए उसके पास धन नहीं था। हर्षा कहती है कि मुझमें और अन्य युवतियों में कोई फर्क नहीं है। मैं सभी से नि:संकोच कहती हूं कि मैं टेस्ट ट्यूब बेबी हूं। पहली मैं एक प्राइवेट जॉब कर रही थी, पर बीच में बीमार होने के कारण जॉब छोड़ना पड़ा। इस समय उसके पास कोई जॉब नहीं है। वह पूरी तरह से स्वस्थ है। उसकी मम्मी मणि चावड़ा गर्व के साथ बताती है कि मुझे गर्व है कि आईवीएफ (इन व्रिटो फर्टीलाइजेशन) द्वारा मेरी पुत्री का जन्म हुआ है। हर्षा का जब जन्म हुआ, तब उनकी मम्मी की उम्र 35 वर्ष थी।
विश्व में हर्षा को पहचान देने वाली डॉ. इंदिरा आहूजा थी। भारतीय पद्धति के अनुसार भारतीय डॉक्टरों की सहायता से डॉ. इंदिरा ने यह उपलब्धि हासिल की थी। हर्षा के जन्म ने अनेक ऐसे दम्पति के जीवन में एक रोशनी के रूप में हुआ, जो नि:संतान थे। हर्षा आशा की एक किरण के रूप में इन दम्पतियों के सामने आई। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च से पता चला कि देश के 10 प्रतिशत युगल इंफर्टीलिटी का सामना कर रहे हैं। इसके बाद स्पर्म काउंट, इंफेक्शन, पुरुषों में इरेक्टाइल डिस्फेक्शन, फेलोपीयन ट्यूब में नुकसान आदि समस्याओं का समावेश होता है। इन व्रिटो फर्टीलाइजेशन थोड़ी पेचीदा प्रक्रिया है।  इस विधि के माध्यम से पुरुष के शुRाणु व महिला के अंडाणु को अलग-अलग ट़यूब में एकत्र कर टेस्ट ट्यूब चिकित्सा प्रणाली से महिला के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। इससे शिशु का प्रजनन संभव होता है। प्रजनन Rिया की सफलता के लिए गर्भवती महिलाओं को समय-सयम पर चिकित्सकों का परामर्श लेते रहना भी आवश्यक होता है। यह पद्धति इतनी अधिक कारगर हुई है कि आज की तारीख में देश में 400 आईवीएफ क्लिनिक हैं। विदेश में भी यही पद्धति लागू है। इस पद्धति का लाभ लेने के लिए भारत आते हैं, क्योंकि विदेश में यह पद्धति काफी महंगी है।
दुर्गा यानी कनुप्रिया अग्रवाल के जन्म के 8 वर्ष बाद हर्षा चावड़ा का जन्म हुआ था। दुर्गा के जन्म के समय विवाद नहीं हुआ था, क्योंकि उस समय केवल पश्चिम बंगाल सरकार ही इस तकनीक के विरोध में थी। कई संप्रदाय इसे भगवान के खिलाफ जाना बताते थे। उनका मानना था कि अगर भगवान न चाहे, तो किसी दम्पति को संतान नहीं हो सकती। पर आईवीएफ तकनीक ने एक इतिहास ही बना दिया। इस इतिहास को बनाने वाले डॉ.सुभाष मुखोपाध्याय को पश्चिम बंगाल सरकार ने काफी परेशान किया। अंतत: उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी। 27 वर्ष बाद उनके काम को सराहना मिली। उनके दावे को मान्यता मिली। हमारे देश में अक्सर ऐसा ही होता है। पहले उसकी कद्र नहीं की जाती, पर जब उसके काम की कद्र विदेशों में होती है, तो उसे अपने देश में भी हाथो-हाथ लिया जाता है। प्रतिभा पलायन का एक कारण यह भी है। डॉ. मुखोपाध्याय की आत्महत्या का दु:ख इसलिए अधिक है, क्योंकि उनके काम को सराहना उस राज्य से नहीं मिली, जो राज्य स्वयं को बौद्धिक कहते नहीं अघाता। उस समय वहां कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था। डॉ. मुखोपाध्याय की मौत के बाद उनके काम को सराहना मिली। आज वे सभी दम्पति उन्हें अपनी शुभकामनाएँ दे रहे होंगे, जिनके जीवन में टेस्ट ट्यूब के माध्यम से संतान की प्राप्ति हुई।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

इसरो की टीम अवार्ड की हकदार

डॉ. महेश परिमल
इस देश में जब भी किसी को कोई विशिष्ट उपलब्धि प्राप्त होती है, लोग उसे हाथो-हाथ लेते हैं। कई कंपनियां उसके हित में आगे आती हैं। उसे विशेष पुरस्कार से नवाजा जाता है। कई स्वयं सेवी संस्थाएं भी उनका सम्मान करने के लिए आगे आ जाती है। क्रिकेट में भी जब भी धोनी की टीम ने कोई विशेष उपलब्धि हासिल की है, सरकार ने आगे बढ़कर सभी खिलाड़ियों को करोड़ों रुपए ऐसे ही दे दिए हैं। उन पर धनवर्षा होती है। आईपीएल के लिए भी क्रिकेटरों की बोली लगती है। ओलम्पिक में भी कोई भारतीय खिलाड़ी विशिष्ट योग्यता प्राप्त करता है, तो उसे भी सरकार की ओर से सम्मान एवं पुरस्कार दिए जाते हैं। पर अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महान उपलब्धि प्राप्त कर विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाले इसरो के वज्ञानिकों को ऐसा कोई अवार्ड नहीं मिला, जिससे वे प्रोत्साहित हों। इसरो के वैज्ञानिकों की उपलब्धि को शायद सरकार समझ नहीं पाई। सरकार को समझना चाहिए कि भारत की स्पेस सिद्धि वर्ल्ड कप और ओलम्पिक गोल्डमेडल से भी काफी बड़ी है। सरकार क्रिकेट खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने में पीछे नहीं रहती, पर वैज्ञानिकों की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। आखिर इनकी मेहनत को क्यों अनदेखा किया जाता है?
आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवनर स्पेस सेंटर से क्कस्रुङ्क ने सुबह 9 बजे एक धमाके के साथ उड़ान शुरू की थी। इस दौरान पूरे देश को ऐसा लग रहा था, मानो कोई मैच देखा जा रहा हो। बीस मिनट तक लोग हैरत में ही रहे। इसके बाद चार चरणों में क्कस्रुङ्क ष्ट २३ अपनी यात्रा पूरी की। पहले चरण में फ्रांस का उपग्रह और उसके बाद अन्य चार उपग्रहों को छोड़ा गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। उन्होंने एक-एक वैज्ञानिक से मुलाकात की। पर उनके लिए किसी तरह के अवार्ड की घोषणा नहीं की। वह तो ठीक है, पर देश की इतनी सारी कापरेरेट कंपनियां हैं, किसी ने भी आगे बढ़कर इसरो के वैज्ञानिकों को इनाम आदि देने के लिए आगे नहीं आई। भारत की यह स्पेस सिद्धि वर्ल्ड कप या ओलम्पिक से भी बढ़कर है। क्योंकि इसरो के इस प्रयास को विश्वस्तर पर सराहा गया है।
दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारत ने अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा था, तब वैज्ञानिकों के पास कुछ सीमित उपकरण ही थे। तब तो हालात ऐसे थे कि रॉकेट के कुछ भाग साइकिल पर लादकर लाया जाता था। यह सुनकर आज भले ही हमें आश्चर्य हो, पर तब हालाता ऐसे ही थे। आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने का निश्चय किया। उस समय डॉ. होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई को नहीं भूलना चाहिए। जिनके अथक प्रयासों से आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं। इसके बाद डॉ. सतीश धवन ने भी उपलब्धियों के झंडे गाड़े। समझ में नहीं आता कि ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले को सरकार 3 करोड़ रुपए देती है, वर्ल्ड कप जीतने पर धोनी के टीम के सभी सदस्यों को एक-एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं, इसके बाद प्रायोजकों वाला राशिव अलग। पर इसरो के वज्ञानिकों की इतनी बड़ी उपलब्धियों को प्राप्त करने के नाम पर कुछ नहीं दिया गया। हमारे देश में बॉलीवुड और क्रिकेट इस कदर हावी है कि देशवासियों को उसके सिवाय कुछ दिखता ही नहीं। ऐसे में यदि देश से प्रतिभाओं का पलायन होता है, तो लोग अफसोस करते हैं। जब हम ही हमारे देश की प्रतिभा को संभालकर नहीं रख पाएंगे, तो प्रतिभाओं को दूसरे देश जाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना ही होगा।
1975 में हमने सोवियत वैज्ञानिकों की मदद से उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा था, इसमें भारत की कोई तकनीक नहीं थी। 1972 में रुस से हुए समझौते के अनुसार आर्यभट्ट को छोड़ा गया था। हाल ही में क्कस्रुङ्क ष्ट २३ की सफलता के पीछे पूरी तरह से भारतीय तकनीक थी। स्पेस साइंस के साथ कई संस्करण जुड़े हुए हैं। पहले हालत यह थी कि एक साधन भी विदेश से नहीं मिलता था, तो पूरा प्रोजेक्ट ही अटक जाता था। स्पेस टेक्नालॉजी पूरी तरह से विदेश पर निर्भर थी।क्कस्रुङ्क ष्ट २३ पूरी तरह से देश में निर्मित तकनीक पर आधारित है। अब हम इस दिशा में इतने अधिक आत्मनिर्भर हो चुके हैं कि विदेशों के उपग्रह भी छोड़ने की क्षमता रखते हैं। इसे भी हमारे वैज्ञानिकों ने सिद्ध करके दिखा दिया है। पिछली सरकार के समय स्पेस-देवास घोटाला सामने आया था। यदि यह घोटाला सफल हो गया होता, तो लाखों-करोड़ों का घोटाला होता। स्पेस साइंस के महत्व को हमने देर से समझा है। विश्व की अपेक्षा हमने कम कीमत पर प्रोजेक्ट बनाए हैं। अब जब सार्क देशों को एक उपग्रह भेंट देने के प्रयास हो रहे हैं, तब भारत बिग ब्रदर की भूमिका करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसरो की टीम का राष्ट्रपति ने अभिनंदन किया है, परंतु कोई भी कापरेरेट कंपनी इसरो के वैज्ञानिकों का सम्मान करने के लिए आगे नहीं आई। जिससे वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ता। आज की मांग यही है कि सरकार एवं देश की कापरेरेट कंपनियों को ऐसे प्रयास करना चाहिए जिससे हमारे वैज्ञानिको का उत्साहवर्धन हो। इन्होंने क्रिकेट टीम या ओलम्पिक में गोल्ड मेडल प्राप्त करने वालों से भी बड़ा काम किया है। यही नहीं उनके प्रयासों से देश का नाम भी ऊंचा हुआ है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में देश को बहुत बड़ी उपलब्धि दिलाने वाले इसरो के वैज्ञानिकों को ठीक उसी तरह से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिस तरह से क्रिकेटरों को किया जाता है।
इसरो के वैज्ञानिकों के लिए यदि सरकार ने कुछ नहीं किया, तो यह काम और कौन करेगा? इस दिशा में सरकार को ही पहल करनी होगी। यदि सरकार ऐसा नहीं कर पाती, तो यही वैज्ञानिक कल नासा में काम करते हुए दिखाई दें, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। देश की प्रतिभाओं का पलायन रोकने के लिए हमें कुछ ऐसा करना ही होगा, जिससे देश के लिए काम करने का उनका हौसला बुलंद हो। ताकि भावी पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सके।
 डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बुलेट से पहले



 आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 7 जुलाई 2014

बुलेट ट्रेन से उद‌्धार संभव हो पाएगा?

डॉ. महेश परिमल
दिल्ली से आगरा के बीच देश की सबसे तेज ट्रेन चली। अब हम गर्व कर सकते हैं कि विकास के पथ में हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। देश को एक तरफ बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया जा रहा है और दूसरी तरफ कुछ ट्रेनें अभी भी छुक-छुक कर चल रही हैं। 8 जुलाई को सरकार रेल बजट संसद में पेश करेगी। रेल किराया तो उसने पहले ही 14.2 प्रतिशत बढ़ा दिया है। इससे नाराज लोगों को वह बजट से लुभाने की कोशिश करेगी। लोग यह समझ रहे हैं कि चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से लोगों से अच्छे दिन का वादा किया था, उसे पूरा करने के लिए इस बार रेल बजट में बुलेट ट्रेन की घोषणा कर लोगों की नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। दिल्ली से आगरा के बीच तेज गति की जो ट्रेन चलाई गई, यह उसी घोषणा का छोटा-सा रूप है। वैसे देखा जाए, तो दिल्ली में बनने वाली योजनाओं की गति भी इतनी होनी ही चाहिए, ताकि उसका लाभ सुदूर अंचलों में रहने वालों को जल्दी मिल सके।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बुलेट ट्रेन की व्याख्या कैसे की जाए। उसकी गति कितनी होनी चाहिए? इस संबंध में सरकार जो कह रही थी, वह कर नहीं कर पाई। ट्रायल रूप में चलाई गई तेज गति की ट्रेन ही 10 मिनट देर से आगरा पहुंच पाई। गणना यह की गई थी कि यह ट्रेन 194 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। तब यह 90 मिनट में दिल्ली से आगरा पहुंच पाएगी। पर ऐसा हो नहीं पाया। पर इसके लिए पटरियों पर करीब 15 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह तो तय है कि भारतीय रेल अभी तो 200 की स्पीड पर नहीं चल पाएंगी। जापान ने अभी कुछ समय पहले ही अपनी सबसे तेज गति से चलने वाली ट्रेन का ट्रायल किया। आप जानना चाहेंगे कि इसकी स्पीड कितनी थी? एक घंटे में 580 किलोमीटर! मेंगलेव के रूप में पहचानी जाने वाली यह ट्रेन मैग्नेटिक ट्रेक पर दौड़ती है। हमारे देश में जो पटरियां बिछी हैं, उसकी क्षमता इतनी नहीं है कि द्रुत गति से कोई ट्रेन उस पर दौड़ सके। जापान से पचास साल पहले 1964 में बुलेट ट्रेन शुरू कर दी थी। वहां 300-350 की गति तो सामान्य है। जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी के बीच तेज गति की ट्रेन चलाने की प्रतिस्पर्धा चलते ही रहती है। हमारे लिए उस स्तर तक पहुंचना अभी संभव नहीं है। इसकी वजह यही है कि हाईस्पीड ट्रेन से अधिक आवश्यकता है कि उसके लिए तरोताजा नेटवर्क तैयार करना। अभी तो जो ट्रेनें चल रही हैं, उसे ही व्यवस्थित तरीके से चलाना ही किसी चुनौती से कम नहीं है।
हमारे देश का रेल्वे नेटवर्क विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है। हमारे यहां 64 हजार किलोमीटर में पटरियां फैली हुई हैं। अब इन पटरियों पर 150-170 की स्पीड से ट्रेनें दौड़ेंगी। हमारे यहां रेल्वे ट्रेक दोनों तरफ से खुले होते हैं। इसलिए पशु जब चाहे तब पटरियों पर आ जाते हैं और मौत का शिकार होते हैं। गुजरात के सासण और गिर जंगलों में रेल्वे ट्रेक पर ही वनराजा बैठ जाते हैं और मौत का शिकार होते हैं। इसके अलावा कईरेल्वे फाटक ऐसे हैं, जहांरेल्वे का कोई कर्मचारी नहीं है। फास्ट ट्रेन दौउ़ाने के पहले इन हालात पर गौर करना आवश्यक है। सरकार फास्ट ट्रेन चलाने के लिए निजी कंपनियों की सहायता लेगी। पर इन ट्रेनों से कितने आम आदमियों को फायदा होगा? जिनके लिए फास्ट ट्रेनें चलाई जा रही हैं, वे तो विमान से भी जा सकते हैं। ट्रेनों की बेहतर सेवाएं देनी हैं, तो ऐसे लोगों को दी जाए, तो सुदूर अंचलों में रहते हैं। जिनके लिए ट्रेन का समय पर आना ही बहुत बड़ी बात है। आज भी लोग ट्रेन में यात्रा करने के लिए डेढ़-दो महीने पहले से आरक्षण करवाते हैं, तो उन्हें आरक्षण नहीं मिल रहा है। दलाल लाबी पूरे रेल्वे तंत्र पर हावी है। कितनी कोशिशों के बाद भी रेल्वे दलालों से मुक्त नहीं हो पाया। आम आदमी को किस तरह से आरक्षण आसानी से मिले, यह एक बड़ी समस्या है। पहले इसे हल किया जाना आवश्यक है।
हमारे यहां की मेट्रो ट्रेनें कितनी भव्य होती हैं। इसका उदाहरण अभी मुम्बई में हुई मूसलधार बारिश के दौरान मेट्रो ट्रेनों के भीतर पानी घुस आया। मुम्बई में अभी तो मेट्रो ट्रेन केवल वर्सोवा से घाटकोपर के बीच ही चल रही है। इन दोनों उपनगरों के बीच की दूरी मात्र 11.4 किलोमीटर है। अभी इसकी स्पीड 80 किलोमीटर ही है। अब यदि यही हाल रहे, तो निजी कंपनियों की मदद से चलने वाली ट्रेनों का क्या हश्र होगा? यह सभी जानते हैं। मेट्रो और बुलेट ट्रेनों की बात छोड़ो, पहले यह देखा जाए कि अभी जा ेट्रेनें दौड़ रही हैं, उनकी हालत क्या है? हर सप्ताह एक ट्रेन दुर्घटना होती है, जिसमें कुछ लोग मरते हैं और बहुत से लोग घायल होते हैं। इस बार बजट में ऐसे लोगों के लिए शायद बड़ी राहत का प्रावधान है। कुछ और बातें भी हैं, जिसमें प्रमुख हैं कि राजधानी और शताब्दी ट्रेनों के दरवाजे मेट्रो की तरह होने वाले हैं। अभी सरकार का ध्यान केवल उच्च वर्ग को रिझाने पर ही है। आम आदमी के लिए कुछ सोचा जा रहा है, ऐसा नहीं दिखता। आज ट्रेनों पर चढ़ने के लिए बुजुर्गो की हालत खराब हो जाती है, वे आसानी से ट्रेनों पर नहीं चढ़ पाते हैं। बिना सहारे के कूपे के अंदर पहुंचना भी उनके लिए मुश्किल होता है। रेल्वे की बुकिंग भले ही ऑनलाइन हो गई हा, पर आज भी वहां दलालों का ही कब्जा है। आम आदमी किसी भी हालत में अपने बल पर आरक्षण करवा ही नहीं सकता।  इतनी घोषणाओं के बाद भी आज तक दलालों पर किसी तरह की कार्रवाई हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। टीटीई आज भी रिश्वत लेकर सीट देने में कोताही नहीं करते। वेटिंग लिस्ट वाले पूरी राशि देने के बाद भी लाचार होकर यात्रा करते हैं। दूसरी ओर ट्रेनों के टायलेट इतने अधिक गंदे होते हैं कि स्टेशन पर दरुगध के बीच खड़े रहना भी मुश्किल होता है। आज भी ट्रेन जब स्टेशन पर खड़े रहती है, तब भी लोग टायलेट का इस्तेमाल करते हैं। इससे सारी गंदगी पटरियों के बीच आ जाती है। ऐसा नहीं हो सकता क्या कि जब ट्रेन स्टेशन पर खड़ी हो, तो टायलेट का दरवाजा खुले ही नहीं। वैसे हमारे देश के रेल्वे स्टेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही हालत ट्रेनों में मिलने वाले खाद्य पदार्थो की है। इस खाद्य पदार्थ को एक बार देश के मंत्रियों को अवश्य खिलाना चाहिए। यात्री मजबूरी में ही यह खाना खाते हैं। देश के अधिकांश लोग गरीब और मध्यमवर्गीय हैं। ट्रेनों की स्पीड थोड़ी कम हो, तो चलेगा, पर यात्री आराम से एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकें, ऐसी व्यवस्था पहले की जानी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि बुलेट ट्रेन होनी चाहिए, पर इससे देश का उद्धार नहीं होगा, उद्धार होगा तो केवल उच्च वर्ग का। अभी भी देश में गाड़ी छुक-छुक करके चल रही है, इस ओर भी ध्यान दिया जाए, तो कम से कम गरीब और मध्यम वर्ग का भला हो। जनरल कोच की हालत कैसी होती है, यह हमारे देश के किसी नेता या मंत्री को नहीं पता। एक बार वे भी आम आदमी बनकर बिना आरक्षण के जनरल कोच में यात्रा करके देख लें, पता चल जाएगा कि इस देश के आम आदमी की हालत कैसी है? गरीब रथ के नाम से चलने वाली ट्रेनों का किराया बहुत ही महंगा है। उसे तो अमीर रथ का नाम दिया जाना चाहिए। यात्रा की पूरी राशि देकर भी धक्के खाकर यात्रा करने वाले बेबस यात्रियों के बारे में भी कुछ सोचा जाना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

देश में भी घूम रहा है कालाधन

दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख 
http://epaper.jagran.com/epaper/01-jul-2014-262-National-Page-1.html#

 
कालाधन:हवाला पर सख्ती जरुरी
डॉ. महेश परिमल
सरकार को आखिर कौन रोक रहा है, विदेशी बैंकों से देश का कालाधन लाने के लिए। उसके पहले यदि देश में ही जो कालाधन है, पहले उसे बाहर लाने की कोशिश होनी चाहिए। बेवजह शोर करने का कोई अर्थ नहीं। हम ऐसा करेंगे, हम वैसा करेंगे, कहने से बेहतर है कि हमने ऐसा किया, हमने वैसा किया। यह सच है कि दवा का कड़वा घूंट पीने के लिए इंसान को हमेशा तैयार रहना चाहिए। नीम का पत्ता कड़वा अवश्य होता है, पर खून साफ करता है। ठीक इसी तरह रेल किराया और मालभाड़े में वृद्धि कर सरकार ने जनता को दवा का कड़वा डोज दिया है। अब शकर और पेट्रोल की बारी है। धीरे-धीरे महंगाई अपना असर दिखाने लगी है। जनता ने यही सोचकर अपना कीमती वोट दिया था कि अब उन्हें महंगाई से राहत मिलेगी। पर एक महीने में ही पता चल गया कि हालात कितने बेकाबू होने वाले हैं। विदेशों से कालाधन जब आएगा, तब आएगा। पर यदि ऐसी कोशिशें हो कि देश का ही कालाधन बाहर आ जाए। यदि इस दिशा में अभी से काम शुरू हो, तो निश्चित ही इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे।
भारत में कालाधन या दो नम्बर का धन पूरी तरह से सुरक्षित रखने के लिए स्विस बैंक विख्यात है। इस बंक में देश के नेताओं, कापरेरेटरों, दलालों, मैच फिक्सिंग में फंसे क्रिकेट खिलाड़ियों एवं भ्रष्टाचारियों का धन सुरक्षित है। स्वीस बैंक इन लोगों का खाता आसानी से खोल लेता है। आश्चर्य इस बात का है कि कालाधन सुरक्षित रखने के लिए वह मोटी रकम भी वसूलता है। लोग इस धन को बचाए रखने के लिए यह मोटी रकम भी देने को तैयार हैं। देश में ही छिपाए गए कालेधन पर सरकार बजट में अपना रुख साफ करेगी। कहा गया है कि इस बार इस दिशा में सरकार सख्त होगी। यदि ऐसा हो, तो बेहतर होगा। पर आखिर कालेधन को विदेशी बैंकों में जमा करने की स्थिति आती ही क्यों है? इस दिशा पर सरकार का ध्यान जाना आवश्यक है। विदेशी बैंकों में भारतीयों का जमा धन आखिर देश के मध्यम वर्ग का ही है। इस काले धन को जमा करने वाले समृद्ध और रसूखदार वर्ग है। इसमें नेता, सेलिब्रिटी, मैच फिक्सिंग से जुड़े खिलाड़ी आदि का समावेश होता है। सभी बड़ी कंपनियां जाने-अनजाने कालाधन तैयार करते हैं। उसके बाद विभिन्न तरीकों से उसे व्हाइट में बदलने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे सफल भी होते हैं और आयकर छिपाने में भी कामयाब हो जाते हैं।
वैसे तो स्विटजरलैंड में 283 बंक है, पर जानकारी के अनुसार स्विस बैंक में भारतीय अपना कालाधन जमा करते हैं। इस धन का तृतीयांश भारतीय यूपीएस और क्रेडिट सुइसी में धन निवेश करना पसंद करते हैं। जानकारी के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों के 2.02 अरब स्विस फ्रेंक जमा हैं। इसे यदि भारतीय मुद्रा में बदला जाए, तो यह राशि 14000 करोड़ रुपए होती है। किपछले वर्ष इस राशि में 43 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। यह सुनकर सरकार चौंक उठी। तब कालाधन प्राप्त करने के लिए सरकार ने नए सिरे से कोशिशें शुरू की। चुनाव के पहले भाजपा ने विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए ‘सीट’ की रचना करने की भी घोषणा की थी। चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने यह कहा था कि यदि विदेशी बंकों से कालाधन वापस लाया गया, तो इस धन को मध्यम वर्ग में बांट दिया जाएगा, आखिर यह धन मध्यम वर्गसे ही लूटा गया धन ही है। स्विस की यूबीएस और क्रेडिट सुईए में जो धन है, उसमें 68 प्रतिशत भारतीयों का ही है। स्विस बैंकों में 11 हजार करोड़ की राशि अन्य देशों की है। भारतीयों के अलावा स्विस बैंक ने अन्य बैंकों में जमा की गई कुल राशि 850 करोड़ है।
स्विस की दो बैंकों में भारतीयों के 43 प्रतिशत राशि बढ़ने के पीछे का कारण यह है कि भारत में कर प्रणाली को यह निवेशक आसानी से धोखा दे जाने में कामयाब हैं। भारत के कानून भी हवाला रेकेट को रोक नहीं सकते। इसलिए हवाला के माध्यम से स्विस बैंक में राशि पहुंच जाती है। हवाला के खिलाफ ठोस कार्रवाई करते हुए यदि सरकार कड़ा कानून बनाती है, तो स्विस बैंकों में धन जमा कराने वाले बेहाल हो सकते हैं। पर किसी सरकार ने अभी तक इस दिशा में गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है। यदि इस दिशा में कानून बना भी दिया जाए, तो उसका अमलीकरण बहुत मुश्किल है। प्रत्येक देशवासी इस समय रोज ही भ्रष्टाचार से दो-चार हो रहा है। वह अपना आयकर बचाने के लिए काफी जद्दोजहद करता है। सरकार भी विदेशी बैंकों में पहुंचने वाले धन को रोक नहीं पा रही है। वह इसका भी प्रयास नहीं कर पा रही है कि कोई भारतीय विदेशी बैंकों में अपना खाता ही न खोल पाए। यदि खाता खुलवाना आवश्यक ही है, तो उसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मंजूरी लेना आवश्यक होनी चाहिए। यदि किसी का विदेशी बैंक में खाता है, तो उसे एक महीने के अंदर आरबीआई को जानकारी देनी होगी। यदि ऐसा होता है, तो सरकार उसकी राशि के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती है। जो लोग आरबीआई की जानकारी के बिना विदेशी बैंकों में अपना खाता खोलते हैं, तो उन्हें 25 से 50 साल की सजा होनी चाहिए। सरकार काफी समय से इस दिशा में कार्रवाई की बात कर रही है, इसलिए कई लोगों ने विदेशी बैंकों में अपना खाता बंद कर कहीं और खुलवा लिया है। वैसे अभी भी लोगों का स्विस बैंकों से मोहभंग नहीं हुआ है। यदि स्विस बैंक भारतीय खातेदारों का नाम और राशि बताती है, तो देश में एक तरह से भूचाल ही आ जाएगा। कई नेताओं और कई अधिकारियों के नाम सामने आएंगे। यदि स्विस बैंक से राशि मिल भी जाती है, तो इस राशि का किया क्या जाए, यह भी एक गंभीर प्रश्न है। इस राशि को मध्यम वर्ग के बीच बांट दी जाए, तो प्रधानमंत्री को अपना यह वचन पूरा करना ही होगा।
विख्यात अर्थशास्त्री स्वामीनारायण अय्यर का कहना है कि स्विस बैंकों में मात्र एक प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जाता है। इस बैंकों में केवल बेवकूफ लोग ही अपना धन जमा कर अपनी मूर्खता जाहिर करते हैं। स्विस बैंकों का उपयोग लोग कामचलाऊ स्तर पर कालाधन स्वीकारने और संभालने के लिए करते हैं। फिर ये कालाधन भारत लाकर उसे शेयरों एवं रियल एस्टेट में निवेश कर दिया जाता है। कालाधन की सबसे अच्छी वापसी केवल भारत में ही होती है। सन् 2000 में न्यूयार्क का डाऊ-जोंस इंडेक्स जितना था, लगभग उतना ही आज भी है, जबकि भारत का सेंसेक्स में 6 गुना वृद्धि हो चुकी है। दस दौरान रियल एस्टेट के भावों में करीब 500 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। अमेरिकी सरकार अपने बांड पर 3 प्रतिशत ब्याज देती है, उसके मुकाबले भारत सरकार 8 प्रतिशत ब्याज देती है। इस दौरान भारत में सोने-चांदी के भावों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। एक अंदाज के मुताबिक भारत के बाजारों में 25 लाख करोड़ का कालाधन घूम रहा है। इस धन को मुख्य प्रवाह में लाना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 28 जून 2014

आपकी की नजरों ने समझा

आपकी की नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे
हिन्दी फिल्मों के मशहूर संगीतकार मदनमोहन के एक गीत ‘आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’ दिल की ए धड़कन ठहर जा मिल गई मंजिल मुझे’ से संगीत सम्राट नौशाद इस कदर प्रभावित हुए थे कि उन्होंने मदन मोहन से इस धुन के बदले अपने संगीत का पूरा खजाना लुटा देने की इच्छा जाहिर कर दी थी। मदन मोहन कोहली का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद में हुआ। उनके पिता राय बहादुर चुन्नी लाल फिल्म व्यवसाय से जुड़े हुए थे और बाम्बे टाकीज और फिल्मीस्तान जैसे बड़े फिल्म स्टूडियो में साझीदार थे। घर में फिल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फिल्मों में काम करके बड़ा नाम करना चाहते थे, लेकिन अपने पिता के कहने पर उन्होंने सेना मे भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में नौकरी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली हो गया। लेकिन कुछ समय के बाद उनका मन सेना की नौकरी से ऊब गया और वह नौकरी छोड़कर लखनऊ आ गए और आकाशवाणी के लिए काम करने लगे। आकाशवाणी में उनकी मुलाकात संगीत जगत से जुड़े उस्ताद फैयाज खान उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसी जानी मानी हस्तियों से हुई, जिनसे वे काफी प्रभावित हुए और उनका रूझान संगीत की ओर हो गया। अपने सपनों को नया रूप देने के लिए मदन मोहन लखनऊ से मुंबई आ गए।
मुंबई आने के बाद मदन मोहन की मुलाकात एस डी बर्मन. श्याम सुंदर और सी.रामचंद्र जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों से हुई और वह उनके सहायक के तौर पर काम करने लगे। संगीतकार के रुप में 1950 में प्रदíशत फिल्म ‘आंखें’ के जरिए वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने मे सफल हुए। इस फिल्म के बाद लता मंगेशकर मदन मोहन की चहेती पाश्र्वगायिका बन गई और वह अपनी हर फिल्म के लिए लता मंगेशकर से ही गाने की गुजारिश किया करते थे। लता मंगेशकर भी मदनमोहन के संगीत निर्देशन से काफी प्रभावित थीं और उन्हें ‘गजलों का शहजादा’ कहकर संबोधित किया करती थीं। संगीतकार ओ पी नैयर अक्सर कहा करते थे ‘मैं नहीं समझता कि लता मंगेशकर, मदन मोहन के लिए बनी हुई है या मदन मोहन, लता मंगेश्कर के लिए, लेकिन अब तक न तो मदन मोहन जैसा संगीतकार हुआ और न लता जैसी पाश्र्वगायिका।’  मदनमोहन के संगीत निर्देशन में आशा भोसले ने फिल्म मेरा साया के लिए ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में ’ गाना गाया जिसे सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते है। उनसे आशा भोसले को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि ‘वह अपनी हर फिल्म के लिए लता दीदी को हीं क्यो लिया करते है ’ इस पर मदनमोहन कहा करते ‘जब तक लता जिंदा है उनकी फिल्मों के गाने वही गाएंगी।’
मदन मोहन केवल महिला पाश्र्वगायिका के लिए ही संगीत दे सकते है.ं वह भी विशेषकर लता मंगेशकर के लिए. यह चर्चा फिल्म इंडस्ट्री में पचास के दशक में जोरों पर थी, लेकिन 1957 में प्रदíशत फिल्म ‘देख कबीरा रोया ’ में पाश्र्व गायक मन्नाडे के लिए ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे ’ जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर उन्होंने अपने बारे में प्रचलित धारणा पर विराम लगा दिया। वर्ष 1965 मे प्रदíशत फिल्म ‘हकीकत ’ में मोहम्मद रफी की आवाज में मदन मोहन के संगीत से सजा गीत ‘कर चले हम फिदा जानों तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ’ आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बे को बुलंद कर देता है। आंखों को नम कर देने वाला ऐसा संगीत मदन मोहन ही दे सकते थे। वर्ष 1970 मे प्रदíशत फिल्म ‘दस्तक ’ के लिए मदन मोहन सर्वŸोष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए गए। उन्होंने अपने ढाई दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 100 फिल्मों के लिए संगीत दिया। अपनी मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओं के दिल में खास जगह बना लेने वाला यह सुरीला संगीतकर 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया से अलहविदा कह गया। मदन मोहन के निधन के बाद 1975 में ही उनकी ’ मौसम’ और लैला मजनूं जैसी फिल्में प्रदíशत हुई. जिनके संगीत का जादू आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता है। मदन मोहन के पुत्र संजीव कोहली ने अपने पिता की बिना इस्तेमाल की हुई 30 धुनें यश चोपडा को सुनाई, जिनमें आठ का इस्तेमाल उन्होंने अपनी फिल्म ‘वीर जारा’ के लिये किया. ये गीत भी श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए.

शुक्रवार, 27 जून 2014

शुरू हो गई मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा

डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने रेल्वे का किराया बढ़ाकर अच्छे दिन की शुरुआत कर दी है। इसका चारों तरफ से विरोध हो रहा है। चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने पिछली सरकार की नाकामियों पर खुलकर प्रहार करते थे। उन्होंने महंगाई को लेकर कांग्रेस गठबंधन सरकार की खूब आलोचना की। लेकिन अब उसी महंगाई की लगाम थामने में उनके पसीने छूट रहे हैं। महंगाई बढ़ाने वाले कारक भी तेजी से सक्रिय हो गए हैं। एक तरफ ईराक युद्ध, दूसरी तरफ कमजोर मानसून और तीसरी तरफ जमाखोरी, इस सबसे निपटने में सरकार की हालत खराब हो जाएगी, यह तय है। प्रधानमं9ी नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से कड़वे घूंट की बात की थी, उससे यही लगता था कि केवल महंगाई को छोड़कर अन्य कड़वे  घूंट मंजूर है। पर सरकार बनने के कुछ दिन बाद ही डीजल की कीमतों में वृद्धि कर सरकार ने अपनी मंशा जाहिर कर दी। अब रेल किराए में वृद्धि कर एकबारगी आम जनता की कमर ही तोड़ दी। ऐसा भी नहीं है कि किराया बढ़ जाने से यात्री सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हो जाएगी। आज भी लोगों को रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है। ट्रेनों में भीड़ बेकाबू होने लगी है। साधारण दर्जे की हालत बहुत ही खराब है। दुर्घनाएँ और ट्रेनों की लेट-लतीफी तो आम बात है। इन सबको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सरकार ने वादों की जो झड़ी चुनाव पूर्व लगाई थी, उसे पूरा कर पाने में वह पूरी तरह से विफल साबित हुई है।
इस समय प्याज सबसे बड़ी खलनायक साबित हो रही है। सरकार जमाखोरों पर कार्रवाई नहीं कर पा रही है। केवल सख्त कदम उठाने की चेतावनी ही दे रही है। सरकार बदल गई, पर जमाखोर नहीं बदल पाए। इसी प्याज ने कई बार पूरे देश को रुलाया है। इस बार भी वह रुलाने की तैयारी में है। बाजार ने यह आशंका प्रकट की है कि इस बार प्याज के दाम सौ रुपए किलो तक पहुंच जाएंगे। इस आशंका के तहत जमाखोर सक्रिय हो गए। गोदामों में अगले अगले आठ महीनों तक का स्टाक जमा कर लिया गया है। देख जाए तो कांग्रेस के हारने में यही महंगाई की सबसे बड़ा काकरण रही है। अब यही कारण मोदी सरकार के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। भोजन में प्याज का उपयोग हर तरह से होता है। इस गर्मी में सलाद के रूप में प्याज का होना अतिआवश्यक है। देश में जिन स्थानों में प्याज का उत्पादन होता है, वहां इस बार बारिश की देरी ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जो किसान प्याज बोना चाहते हैं, वे इसलिए परेशान है कि इस बार प्याज के बीज की कीमतें चार गुना बढ़ गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि देश में प्याज का उत्पादन कम होता है। बम्फर उत्पादन के कारण कई बार प्याज सड़कों पर फेंक दी गई हैं। सरकार भी बहुत बड़ी जमाखोर है। उसने भी प्याज का बहुत बड़ा स्टॉक जमा कर रखा है। एक समय इसी प्याज का दाम दो से तीन रुपए किलो था, पर अब यह बीस रुपए किलो मिल रही है। सरकार यदि सख्ती दिखाते हुए कोल्ड स्टोरेज पर छापा मारे, तो काफी मात्रा में प्याज का स्टॉक बाजार में आ जाएगा। पर सरकार ऐसा क्यों नहीं कर पा रही है, यह आश्चर्य का विषय है। इसके पहले की सरकारें भी प्याज के दामों में अंकुश रखने में नाकाम साबित हुई हैं।
यदि आलू की बात करें, तो इसका स्टॉक अपेक्षाकृत कम है। फरवरी में हुई बारिश उसके उत्पादन को प्रभावित किया है। व्यापारियों का मानना है कि यदि आलू का निर्यात रोक दिया जाए, तो भी इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। आलू भी प्याज की तरह ही बार-बार इस्तेमाल में लाई जाने वाली सब्जी ही है। मध्यम वर्ग और श्रमजीवी वर्ग के लिए आलू-प्याज बहुत ही आवश्यक वस्तु है। अब धीरे-धीरे ये दोनों ही चीजें थाली से अदृश्य हो रही हैं, इसी के साथ मोदी सरकार की अगिAपरीक्षा शुरू हो गई है।
आजकल अंतरराष्ट्रीय मामलों के कारण आवश्यक जिंसों के दाम बढ़ने लगे हैं। ईराक युद्ध के कारण पेट्रोल केी कीमतें बढ़ेंगी, इससे अन्य कई चीजों के दाम बढ़ना लाजिमी है। किसी भी तरह से महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। अब देखना यह है कि सरकार आखिर क्या करती है, जिससे महंगाई पर काबू पाया जा सके। भारत में बढ़ती महंगाई का संबंध आधुनिक पद्धति के विकास के साथ है। अर्थतंत्र का विकास होता है, तब नागरिकों के हाथ में पहले से अधिक धनराशि होती है। इस धनराशि से वह आवश्यक जिंसों और ऐश्वर्यशाली चीजों की खरीदी करता है। जिस तेजी से लोगों की आवक में तेजी से इजाफा होता है, उस तेजी से उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाती। इसलिए कीमतें बढ़ती हैं। इस प्रक्रिया में मुश्किल यह है कि समाज का जो शक्तिशाली वर्ग होता है, उसके हाथ में अधिक धन आता है। यह वर्ग अपना खर्च बढ़ा देता है। महंगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है। इसलिए कमजोर वर्ग को महंगाई बढ़ने का अधिक असर होता है। मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी करती है। इससे बाजार में निवेश का प्रवाह कम होता है। इस वजह से विकास की दर धीमी हो ेजाती है। फिर जब विकास दर धीमी हो जाती है, तो रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाती है। इन दोनों कारणों से बाजार में अधिक निवेश होता है और महंगाई बढ़ जाती है। यदि विकास दर और महंगाई के बीच संतुलन रखने में ही सरकार की कसौटी मानी जाती है।
उद्योगपति रिजर्व बैंक के सामने यह मांग रखते हैं कि ब्याज दरों में कमी की जाती रहे, तो कम ब्याज से कर्ज लेकर वे अपने धंधे को बढ़ा सकें। इससे उनके उद्योग का विकास होगा। मध्यम वर्ग यह मांग करता है कि ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी की जाती रहे, ताकि उन्हें उनके फिक्स्ड डिपॉजिट पर अधिक ब्याज मिले। जब ब्याज दर बढ़ती है, तब मुद्रास्फीति में कमी आती है और महंगाई भी कम होती है। इससे आम आदमी राहत अनुभव करता है। पर इससे उद्योगपतियों को नुकसान ही होता है।
अब यदि सरकार अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए आम जीवन से जुड़ी तमाम वस्तुओं के भाव को नियंत्रित करना चाहती है, तो उसे वायदा बाजार पर तुरंत प्रतिबंध होगा। यदि आवश्यक वस्तुओं से कोल्ड स्टोरेज भर गए हैं, तो वहां की बिजली काट देनी चाहिए, ताकि माल बाहर आ सके। यदि कठोर होना है, तो जमाखोरों पर होना होगा। कहा गया है कि अगले आठ महीनों तक प्याज की आपूर्ति हो सके, इतनी प्याज कोल्ड स्टोरेज में जमा है, यदि यह प्याज बाहर आ जाती है, तो उसकी खपत होने तक प्याज की नई फसल आ जाएगी और प्याज के दाम नियंत्रित हो जाएंगे, इसके लिए सरकार को सख्त होना होगा। अब सरकार बजट की तैयारी कर रही है। बजट में भी कई चीजों के दाम बढ़ेंगे ही, इसके लिए भी उसे जनता को तैयार करना होगा। डीजल, रेल्वे और माल भाड़े में वृद्धि के बाद यदि बजट से राहत मिलती है, तो यह दुख कम हो सकता है। इसके लिए सरकार के पास अभी थोड़ा सा समय है, इसके रहते यदि वह जनता को कुछ राहत दे सकती है, तो लोगों को यह विश्वास करना आसान होगा कि भाजपा को वोट देकर उनसे गलती नहीं हुई। अब गेंद सरकार के पाले पर है, देखना है कि वह क्या करती है, जिससे जनता को राहत मिले।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 23 जून 2014

राज्यपाल और राजनीति

डॉ. महेश परिमल
हमारे देश में राजभवन को यदि उपकृत भवन कहा जाए, तो गलत न होगा। बरसों से हम सभी देख रहे हैं कि राज्यपाल एक गरिमामय पद होने के बाद भी केवल राज्य के मुख्यमंत्री से विवाद के बाद ही चर्चा में आता है। इसके पहले उनका नाम केवल उद्घाटन समारोहों में मुख्य अतिथि के रूप में ही सामने आता है। कई बार राजभवन राजनीति का केंद्र बन जाते हैं। विशेषकर उस समय जब केंद्र में विपक्ष की सरकार हो। इसलिए यह परंपरा चली आ रही है कि केंद्र सरकार के पदारूढ़ होते ही राज्यों के राज्यपालों को बदल दिया जाता है। उनके स्थान पर पहुंच जाते हैं, ऐसे बुजुर्ग किंतु निष्ठावान कार्यकर्ता, जिन्हें कोई पद नहीं मिल पाया। इस तरह से सरकार उन्हें उपकृत ही करती है। वैसे देखा जाए, तो कानूनी रूप से सक्षम होने के बाद भी राज्यपाल की देश या राज्य के विकास में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं होती। अब कई राज्यपाल विलासिता की जिंदगी से दूर होकर तीन बेडरूम के फ्लेट में पहुंच जाएंगे।
किसी ने कहा है कि यदि आपकी वकालत नहीं चल रही हो, तो अपने कौम के लीडर बन जाओ। ऐसे ही राजनीति में जब किसी नेता की स्थिति सेवानिवृत्ति की हो, तो उसे राज्यपाल बनने के लिए लाबिंग करनी पड़ती है। राज्य के मुख्यमंत्री के पास कई काम होते हैं, पर राज्यपाल के पास उद्घाटन के अलावा और कोई काम नहीं होता। विधानसभा के पहले दिन उनका अभिभाषण अवश्य होता है, पर उसे कोई भी विधायक या मंत्री गंभीरता से नहीं लेता। जिस किसी को राज्यपाल बनाया जाता है, उसे वह पद एक उपकृत योजना के तहत प्राप्त होता है। अधिकांश राज्यपाल वृद्ध या सीनियर कार्यकर्ता होते हैं। यह पद उन्हें एक अवार्ड की तरह दिया जाता है। इस समय देश में राज्यपालों का विकेट एक के बाद एक गिरते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल. जोशी और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने इस्तीफा दे दिया है, इसके बाद यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपाल समझ गए कि आज नहीं तो कल हमें भी इस्तीफा देना ही होगा। होना तो यह चाहिए था कि जिस दिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, उसी दिन से राज्यपालों को इस्तीफा दे देना था। पर विलासिता जीवन को मोह इतनी जल्दी नहीं छूटता, इसलिए इतने दिन निकल गए। कानून के अनुसार राज्यपालों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। पर केंद्र सरकार बदलते ही राज्यपालों को हटाने और नई नियुक्ति का सिलसिला जारी हो जाता है।
कई राज्यपाल, खासकर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपालों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भेंट की है। इन्होंने अपना पद छोड़ने की मंशा जाहिर की है। इसके सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पूर्व सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों की चिंता यह है कि अब उन्हें वे उन शासकीय सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे, जो अब तक मिल रही थी। नौकर-चाकरों से भरे राजभवन के बाद अब उन्हें तीन बेडरुम वाले घर में रहना होगा। इसे केंद्र सरकार बदलने का साइड इफेक्ट कहा जा सकता है। वास्तव में राज्यपाल का पद केंद्र की नजर रखने के लिए तैयार किया गया था। पिछले 30 वर्षो में गठबंधन की सरकार इस देश में थी, ऐसे में अन्य राज्यों में क्या हो रहा है, इसके लिए राज्यपालों को नियुक्त किया जाता था, ताकि समय रहते केंद्र सरकार राज्य पर कार्रवाई कर सके। कई राज्यपालों ने तो अल्पमत राज्य सरकार को पलटाने की साजिश भी की, कुछ सफल भी रहे। इसलिए कई बार राजभवनों को केंद्र सरकार का राजनीतिक अड्डा कहा जाता है। गुजरात में भाजपा सरकार ने कांग्रेस के खिलाफ ऐसे आरोप लगाए भी हैं। कई बार ऐसे आरोपों में तथ्य भी होते हैं। राज्यपाल पक्के राजनीतिज्ञ होते हैं, बिना राजनीति के वे रह भी नहीं सकते। इसलिए अक्सर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच शीतयुद्ध की खबरें आती ही रहती हैं। राज्य सरकार को परेशान करना राज्यपाल का मुख्य काम होता है। राजभवन में कई फाइलें केवल इसीलिए अटकी पड़ी रहती हैं, क्योंकि उसमें केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ काम करने का अनुरोध होता है।
राज्यपाल का काम ठाठ वाला है। उनकी कोई जवाबदारी न होने के बाद भी वे राज्य सरकार के कामों में अड़ंगा लगाते रहते हैं। पूर्व में भाजपा शासित राज्यों में कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने अनेक फाइलें अटका रखी थीं और कांग्रेस शासित राज्यों को अधिक प्राथमिकता दी जाती। इस समय राज्यपालों को बदलने की जो बात चल रही है, उस पर कांग्रेस कुछ कह नहीं सकती। क्योंकि 2004 में जब यूपीए सरकार सत्ता पर आई, तब उसने पहले की एनडीए सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को हटा दिया था। कुल मिलाकर आज राज्यपालों की नियुक्ति पूरी तरह से राजनीति हावी हो गई है। कोई राज्यपाल स्वैच्छिक रूप से अपना पद छोड़ना नहीं चाहता। राज्यपाल का पद एक सम्मानित पद है, इसे हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। किंतु हमारे संविधान में राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण होते हुए भी अप्रभावी पद माना गया है। राज्य सरकार उन्हें सम्मान तो देती है, पर उनके प्रभाव में नहीं आती। राज्यपाल और राज्य सरकार एक ही पार्टी के हों, तो संबंध सौहार्दपूर्ण होते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाएं लगातार हो रहीं थी, राज्य सरकार की आलोचना हो रही थी, राष्ट्रपति शासन की मांग हो रही थी, फिर भी राज्यपाल जोशी की तरफ किसी ने ऊंगली नहीं उठाई। उनकी तरफ से किसी प्रकार का सुझाव केंद्र सरकार को नहीं दिया गया। यह इसलिए कि जब उत्तर प्रदेश में सपा ने सरकार बनाई, तब वह केंद्र की गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। इसलिए राज्यपाल जोशी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे उल्लेखित किया जाए। उन्होंने मौन रहकर अपनी भूमिका निभाई, अंत में अपनी आत्मा की आवाज सुनकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
राज्यपालों की भूमिका:- भारत में राज्यपालों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है और केंद्र में राष्ट्रपति की तरह राज्यों में कार्यपालिका की शक्ति उसके अंदर निहित होती है। राज्यपाल सांकेतिक तौर पर राज्य का प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक शक्तियां मुख्यमंत्री के पास होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य की सारी कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल के पास होती है और सभी कार्य उन्हीं के नाम से होता है। वास्तव में, राज्यपाल विभिन्न कार्यकारी कार्यों के लिए मात्र अपनी सहमति देता है। भारतीय संविधान के अनुसार, राज्यपाल स्वतंत्र तौर पर कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले सकते हैं। राज्य की कार्यकारी शक्तियां मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के अधीन होती हैं।
राज्यपाल की शक्तियां:-भारत के राष्ट्रपति की तरह, राज्य के राज्यपालों के पास कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियां निहित होती हैं। राज्यपालों के पास विवेकाधीन और आपातकालीन अधिकार हैं। राष्ट्र्रपति और राज्यपालों के पास अधिकारों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि राज्यपाल के पास राजनयिक और सैन्य शक्ति संबंधी कोई अधिकार नहीं है। राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री सहित, मंत्रिपरिषद, एडवोकेट जनरल और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार है। मंत्रिपरिषद और एडवोकेट जनरल राज्यपाल की इच्छा पर अपने पद पर बने रह सकते हैं। हालांकि, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को राज्यपाल के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। राष्ट्र्रपति के पास राज्य लोक सेवा के सदस्यों को हटाने का अधिकार है। राज्यपाल हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्र्रपति को सलाह देते हैं। राज्यपाल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जजों की नियुक्ति करते हैं। अगर राज्यपाल को ऐसा लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व विधान सभा में नहीं है तो वे विधान सभा में उनके एक प्रतिनिधि की नॉमिनेट कर सकते हैं। जिस राज्य में विधान सभा और विधान परिषद है वहां राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वे साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और सामाजिक कार्यों से संबंधित लोगों को विधान परिषद में नॉमिनेट करें।
राज्यपालों की विधायिका शक्तियां:- राज्यपाल को राज्य विधानमंडल का हिस्सा माना जाता है। वह राज्य विधानसभा को संबोधित करने के साथ-साथ विधान सभा को संदेश देता है। केंद्र में राष्ट्र्रपति की तरह राज्य में राज्यपाल के पास विधान सभा की बैठक बुलाने और उसे भंग या स्थगित करने का अधिकार है। हालांकि, ये सारी शक्तियां औपचारिक हैं और किसी भी निर्णय लेने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद के द्वारा सलाह दी जाती है। राज्यपाल विधान सभा का उद्घाटन करते हैं और प्रत्येक वर्ष विधान सभा को संबोधित करते हैं। राज्यपाल अपने संबोधन में सत्ताधारी पार्टी की प्रशासनिक नीतियों को रखते हैं। राज्यपाल विधान सभा में वार्षिक लेखानुदान और मनी बिल (धन विधेयक) के लिए अनुमोदन करते हैं। राज्यपाल स्टेट फाइनेंस कमीशन का गठन करता है। उसके पास आपातकालीन स्थितियों में राज्य की आकस्मिक निधि से पैसे के निष्कासन का अधिकार होता है। राज्य विधान सभा के द्वारा पास सभी कानून राज्यपाल की अनुमति के बाद ही कानून का रूप लेते हैं। धन विधेयक न होने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह विधान सभा के पास दोबारा से बिल भेजें, लेकिन अगर राज्य विधान सभा के द्वारा बिल वापस राज्यपाल के पास फिर से भेज दिया जाता है तो राज्यपाल को उस पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। विधानसभा के स्थगन होने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वे अध्यादेश को पारित करें और तत्काल प्रभाव से कानून लागू हो जाता है। हालांकि, अध्यादेश को विधान सभा के अगले सत्र में पेश किया जाता है और यह अगले छह सप्ताह तक प्रभावशाली रहता है जब तक कि विधानसभा द्वारा पारित न हो जाए।
 न्यायिक शक्तियां:-राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह किसी अपराधी की सजा को माफ या कम कर सकता है। वह कानून द्वारा सजा पाए किसी अपराधी की सजा को निलंबित कर सकता है। साथ ही हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में राष्ट्र्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल से सलाह-मशविरा करते हैं। आपातकालीन शक्तियां: विधान सभा में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति में अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करे।  राज्यपाल विशेष परिस्थितियों में राष्ट्र्रपति को राज्य की स्थिति के बारे में रिपोर्ट करते हैं और राष्ट्र्रपति को राज्य में राष्ट्र्रपति शासन का अनुमोदन करते हैं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल के पास सारी शक्तियां होती हैं और वे राज्य के कार्यों के लिए निर्देश जारी करते हैं।
राज्यपाल का वेतन:- गवर्नर्स एक्ट 1982 (वेतन, भत्ते व विशेषाधिकार) के अनुसार राज्यपाल को प्रति महीने 1 लाख 10 हजार रुपए का वेतन मिलता है। इसके अलावा, राज्यपाल को कई सुविधाएं भी मिलती हैं, जो उनके कार्यकाल पूर्ण होने तक जारी रहती हैं। राज्यपाल को मिलने वाली सुविधाएं मासिक वेतन के अलावा राज्यपाल को कई अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं, जैसे चिकित्सा सुविधा, आवासीय सुविधा, यात्रा सुविधा, फोन और बिजली बिल की प्रतिपूर्ति इत्यादि। राज्यपाल और उनके परिवार को जीवन भर मुफ्त चिकित्सा सुविधा भी मिलती है। देश भर में यात्रा के लिए राज्यपाल को एक नियत यात्रा भत्ता मिलता है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 18 जून 2014

शहरी प्रदूषण ही है अस्थमा का कारण

डॉ. महेश परिमल
अभी कुछ दिनों पहले ही हमारे बहुत करीब से अस्थमा दिवस गुजरा। उस दिन बहुत से आयोजन हुए, जिसमें अस्थमा होने के कारण और उससे बचाव पर चर्चा की गई। यह एक परंपरा है, जिसे हम केवल ‘दिवस’ मनाकर निभाते हैं। इस बीमारी के बारे में हम यह भूल जाते हैं कि अस्थमा को यदि किसी ने विकराल रूप में हमारे सामने खड़ा किया है, तो वह है स्वयं मानव। अस्थमा होने का मुख्य कारण प्रदूषण है। आज प्रदूषण को मानव ने कितना प्रदूषित किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। यदि ध्यान दिया जाए, तो अस्थमा का इलाज हमारे आयुर्वेद में है, इससे यह पूरी तरह से मिट सकता है, पर हमें तो विदेशों में पढ़-लिखतर आए डॉक्टरों पर ही भरोसा है। इसीलिए यह रोग देश में तेजी से फैल रहा है। जितना ध्यान हम इस रोग को थामने में लगा रहे हैं, उससे थोड़ा सा भी कम ध्यान यदि प्रदूषण की ओर दिया जाए, तो इस रोग के देश से नेस्तनाबूद होने में जरा भी वक्त नहीं लगेगा। विश्व अस्थमा दिवस पर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को पूरे पेज का एक रंगीन विज्ञापन देकर यह दावा किया कि हम तीस बरस से इस रोग के खिलाफ लड़ रहे हैं। इस मामले में हम अनथक परिश्रम कर इस पर अनुसंधान कर रहे हैं। विश्व के 78 देशों में हम अस्थमा के खिलाफ लड़ने के लिए लोगों को सचेत कर रहे हैं, हम उन्हें सूंघने के साधन उपलब्ध करा रहे हैं। यदि यह कंपनी वास्तव में अस्थमा के मरीजों की सेवा करने का दावा करती है, तो उसे इस विज्ञापन के लिए लाखों रुपए खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती। जो कंपनी एक विज्ञापन के लिए लाखों रुपए खर्च कर सकती है, तो मुनाफे का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है।
हमारे देश में अस्थमा के मरीजों की संख्या करीब 3 करोड़ है। केवल मुम्बई शहर में ही इस बीमारी के दस लाख मरीज हैं। दूसरे दस लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें अस्थमा हो सकता है। मल्टिनेशनल ड्रग कंपनियां कभी भी अस्थमा के कारणों की खोज एवं उस पर शोध के लिए परिश्रम नहीं करते। उनकी योजना यही होती है कि अस्थमा के लिए बनाई गई उनकी दवाएं भारतीय बाजारों में बिकती रहें। स्वास्थ्य के विशेषज्ञ हमें हमेशा चेतावनी देते हैं कि 2020 तक हमारे देश में विश्व में अस्थमा की राजधानी बन जाएगा। वैसे तो यह रोग एजर्ली से होता है। देखा जाए, तो यह कोई रोग ही नहीं है और न ही कोई संक्रमण रोग है। अस्थमा किसी बैक्टिरिया या वाइरस से भी फैलने वाला रोग नहीं है। एलोपेथी के डॉक्टरों के पास तो केवल उन्हीं बीमारियों का इलाज होता है, जो विषाणुओं से फैलते हैं। इसलिए यह सोचना कि अस्थमा हमारे एलोपेथी डॉक्टर के इलाज से दूर हो जाएगा, गलत है। इस कारण वे ऐसा प्रचार करते हैं कि अस्थमा का कोई इलाज ही नहीं है। दूसरी ओर हमारे आयुर्वेद और प्राकृतिक विज्ञान में अस्थमा का असरकारक इलाज है। आखिर अस्थमा क्यों होता है? वास्तव में यह आज की शहरीकरण की देन है। शहर में वायु प्रदूषण, मागों पर पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण उसके धुएं भी बढ़ रहे हैं। इन धुओं में कार्बन डायऑक्साइड के कण शामिल होते हैँ। जो सांस नली में चले जाते हैं, वहां जाकर सूजन पैदा करते हैं। इससे अस्थमा का अटैक आता है। आज शहर के किसी भी रास्ते पर चलना बहुत ही खतरनाक है। भारत के शहरों में बढ़ते प्रदूषण के कारण अस्थमा के रोगियों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है। भवन निर्माण के दौरान सीमेंट और सीसे से बनते रंगों के कारण हवा में सल्फर डायऑक्साइड, लेड ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड के जहरीले कण वायुमंडल में फैल जाते हैं। इन्हीं खतरनाक अणुओं से होते हैं अस्थमा के हमले।
हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं, जिनका श्वसनतंत्र कमजोर होता है। यह विरासत में मिलता है। उनके शरीर के भीतर जरा सा भी प्रदूषणयुक्त हवा जाती है, तो उससे उनकी सांस नली फूल जाती है और फेफड़े संकुचित हो जाते हैं। इस कारण उन्हें श्वांस लेने में तकलीफ होती है। खून को मिलने वाली ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इन परिस्थितियों में कहा जाता है कि अस्थमा के मरीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। इसलिए कहीं भी थोड़ी सी धूल उड़ी नहीं कि ऐसे लोग बुरी तरह से हलाकान हो जाते हैं। डॉक्टर कहते हैं कि एस्पीरिन जैसी एलोपेथी दवा लने से भी अस्थमा हो सकता है। कितने ही लोगों को सिगरेट के धुएं से और हवा में नमी आने से भी अस्थमा हो सकता है। यदि घर में किसी सीलन भरे स्थान पर सोना हो, तो भी अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है। घर के कार्पेट, खिड़कियों के परदे के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले रंग भी अस्थमा का कारण हो सकते हैं। धूल और फूल के परागकणों से भी अस्थमा हो सकता है। आज अस्थमा के जितने भी कारण दिखने को मिलते हैं, उसमें 99 प्रतिशत मानव ने ही और खासकर मशीनों के कारण ही होते हैं। बमुश्किल एक प्रतिशत कारण प्राकृतिक है। इसमें आकाश में गहराते बादलों या फूलों की सुगंध का समावेश होता है। विश्व भर में जिन देशों का विकास आधुनिक पद्धति से हो रहा है, वहां अस्थमा तेजी से फैल रहा है। इससे यह कहा जा सकता है कि विकास का फल सबसे पहले शहरी नागरिक ही चख पाते हैं।
अस्थमा की बीमारी में समाजवाद के दर्शन होते हैं। यह रोग किसी को भी हो सकता है। इसकी नजर में कोई गरीब नहीं, कोई अमीर नहीं। इंसान को यदि अस्थमा से बचना हो, तो सबसे सरल उपाय यही है कि वह शहर के प्रदूषित वातावरण को छोड़कर गाँव जाकर बस जाए। जो ऐसा नहीं कर पा रहे हों, उनके लिए योगासन और प्राकृतिक उपचार ही एकमात्र उपाय है। इससे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। किसी भी सूरत में एलोपेथी की दवाएं नहीं लेनी चाहिए। डॉक्टरों के पास अस्थमा का कोई इलाज ही नहीं है, इसलिए वे कामचलाऊ उपाय के रूप में इन्हेलर्स के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। इस पम्प में आल्बुटेरोल या साल्बुटामोल जैसी दवाएं होती हैं, जो फौवारे की तरह श्वास नली को खोलने का काम करता है। परंतु ये दवाएं फेफड़े और हृदय को कमजोर बनाती हैं। इसलिए इन्हेलस का इस्तेमाल केवल आपात स्थिति में ही करना चाहिए। ऐसी सलाह डॉक्टर  देते हैं। के.ई. अस्पताल के फिजियालॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. मनु कोठारी के पास कोई भी मरीज अस्थमा की शिकायत करने पहुंचता है, तो वे उसे यही सलाह देते हैं कि वह शुद्ध घी और चावल का हलुवा खाए। इसके अलावा गुड़ और तैलीय बीजों से बनने वाली चिकी के इस्तेमाल से चमत्कारिक असर होता है। इस प्रयोग को अस्थमा के हजारों मरीजों ने आजमाया, इससे उन्हें फायदा भी हुआ। ये चीजें शरीर के प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं।
इस तरह से देखा जाए, तो अस्थमा की दवाएं बेचने वाली कंपनियां केवल अपने लाभ के लिए ही यह प्रचार करती हैं कि वह इस दिशा में शोध कर रही है। इसके पहले अमुक दवाओं से अस्थमा पर काबू पाया जा सकता है। दवा कंपनियों के इस झूठे प्रचार में कोई न उलझे, इसके लिए देश में किसी तरह का कोई जागरूकता का काम नहीं किया जा रहा है। पर कुछ लोगों को इस दिशा में आगे आना ही होगा। तभी इन दवा कंपनियों की असलियत सामने आएगी। अपने आसपास का वातावरण शुद्ध रखें, यही है अस्थमा का इलाज।
   डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 7 जून 2014

नहीं भूलती वह भीगी आंखें!

डॉ. महेश परिमल
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा, जिसने संसद पर पांव रखने के पहले उसकी सीढ़ियों पर माथा टेका होगा। इस तस्वीर से यह संदेश जाता है कि संसद जिसमें देश भर के चुने हुए जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं और देश की समस्याओं पर चर्चा कर उसका समाधान ढृंढते हैं, वह संसद एक मंदिर की तरह है। संसद में बैठने वाला सांसद उस मंदिर का पुजारी है। वैसे भी यह परंपरा है कि जब कोई अपनी दुकान पर पहुंचता है, तो वह उसकी दहलीज को प्रणाम कर ही अंदर जाता है। संसद यदि मंदिर है, तो उसकी सीढ़ियों पर माथा टेकना भारतीय परंपरा है, जिसका निर्वाह देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसके बाद संसद को संबोधित करते हुए लोगों ने उन्हें पहली बार इतना भावुक होते हुए देखा। देश के प्रधानमंत्री पर अच्छा लगता है, ऐसे संबोधनों ने उन्होंने अपने मित्रों के लिए किया।  इसके पहले संसद को इतना गरिमामय आज की पीढ़ी ने नहीं देखा होगा। अब तक संसद में न जाने क्या-क्या होता रहा। लोगों ने अपशब्द कहे, कुर्सियां फेंकी, परस्पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया, संसद मानों एक अखाड़ा हो गई हो। पर अब संसद को गरिमा देने का काम शुरू हो गया है। देश को एक संवेदनशील प्रधानमंत्री मिला है। ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने गरीबी देखी है, गरीबी झेली है और गरीबी में अपना गुजारा किया है। जमीन से जुड़ा एक ऐसा नेता, जिस पर पूरे देश को नाज हो सकता है। आज उनके सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं, पर उन्हें विश्वास है कि वह अपने साथियों के साथ उन सारी चुनौतियों का सामना कर लेंगे और जो वादे उन्होंने चुनावी रैलियों में किए हैं, उसे पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे।
न जाने क्यों, देश के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद का ताज पहनने की दिशा में जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे अतिभावुक होते जा रहे हैं। पहले दिल्ली में संबोधन करते हुए करीब-करीब रो ही दिए, तो उसके दूसरे ही दिन गुजरात विधानसभा में उनका गला भर आया था। अब तब अपनी चुनावी रैलियों में वे गरजते थे, पर अब लगातार सौम्य होने लगे हैं। गुजरात के मणिनगर में सभा को भी अपनी गरिमा को देखते हुए प्रधानमंत्री पद के अनुरूप ही संबोधित किया। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद पर जमीन-आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री राज्य का प्रधान होता है और प्रधानमंत्री देश का प्रधान होता है। हाल ही में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए जब नरेंद्र मोदी ने 36 इंच की छाती शब्द का प्रयोग किया था, तब काफी बहस हुई थी। लोगों का कहना है कि क्या क36 इंच की छाती की बात करने वाले इंसान की आंखों में कभी आंसू आ सकते हैं? किसी के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने में आंसू स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं और गला भर आता है। वैसे भी इंसान जब अपने अतीत में झांकता है, तो उस समय की भूली-बिसरी यादें ही उसकी आंखें भिगो देती है। उस क्षण उन्हें याद आया होगा, मां का दुलार, भाई-बहनों की ठिठोली और उसके बाद संघ के प्रचारक के रूप में गांव-गांव पैदल घूमना। यह सब याद कर वे अपने आप को रोक नहीं पाए। आंसुओं ने भी अपनी सीमाएं तोड़ दी और गीली कर गए आंखें। संवेदनशील लोगों को उनकी ये तस्वीरें हमेशा अपनेपन के साथ याद आएंगी। क्योंकि यहां पर वे एक नए रूप में दिखाई दिए। अब तक उन्हें रोबीली आवाज वाले और गुस्से से भरे चेहरे वाले के रूप में जाना जाता था। पर अब अश्रुपूरित आंखों वाले मोदी के रूप में देखना एक अलग ही अनुभव था। यह देखकर किसी ने यह टिप्पणी कर दी कि यह विजय समारोह है या विदाई समारोह। मोदी तो कुछ देर बाद पूर्ववत हो गए, पर सांसद काफी देर तक उस संवेदना भरे वातावरण से नहीं निकल पाए। देश का एक बड़ा नेता जब रोने के करीब हो, तो अच्छे-अच्छे लोग भी अपने आप को रोक नहीं पाते। जिन्होंने भी टीवी पर यह लाइव शो देखा, वह भी अपने आंसू रोक नहीं पाया। इसे कहते हैं संवेदना की लहर।
आंसुओं को दबाया नहीं जा सकता। आंसू हर्ष पर भी आते हैं और शोक पर भी। विश्वभर के नेता भी अपने आंसुओं को रोक पाने में विफल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तो कई बार इन हालात से गुजरे हैं। कई बार उनका गला भर आया है। सख्त माने जाने वाले रुसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की बात करें, तो मार्च 2012 में चुनाव जीतने के बाद खुशी के मारे वे रो पड़े। वे इतना रोए कि आंसू उनके गाल तक आ गए। एक तरफ वे हंसते जाते, तो दूसरी तरफ उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ओबामा भी चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं की प्रशंसा करते हुए रो पड़े थे। अमेरिकी नेताओं में अब यह बात सामान्य हो गई है कि अमुक नेता की आंखें भर आई, या फिर उनका गला भर आया। सन् 2007 में हिलेरी क्लिंटन अपने चुनाव प्रचार के दौरान सवालों के जवाब देते-देते रो पड़ीं थीं। जार्ज डब्ल्यू बुश भी एक सैनिक को मरणोपरांत मेडल देते हुए रो पड़े थे। क्लिंटन या बुश तो कोई एथलेटिक चेम्पियन या बॉडी बिल्डर नहीं थे, पर पुतिन तो जूउो चेम्पियन अपने शरीर का विशेष ध्यान रखने वाले माने जाते हैं, इसके बाद भी वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। जिन्हें हम आयरन लेडी के नाम से जानते हैं, वही मार्गरेट थ्रेचर भी जब 10 डाउनिंग स्ट्रीट से विदा हो रही थीं, तब भी वे रो पड़ीं थीं। 1072 में डेमोकेटिक पार्टी के एडमंड मस्की जीतेंगे, यह तय था, परंतु उसकी पत्नी के खिलाफ किसी अखबार में प्रकाशित किसी खबर को पढ़ते हुए रो पड़े, मतदाताओं पर इसका असर उल्टा हुआ और वे चुनाव हार गए। रिपब्लिकन जॉन बोहनर स्पीकर ऑफ द हाउस थे। अमेरिकी सरकार में इस पद को बहुत बड़ा माना जाता है। बोहनर के साथ यह होता कि वे बात-बात पर रो पड़ते, इसलिए लोग उन्हें ‘वीपर आफ द हाउस’ कहा करते। उनकी छबि रोने वाले नेता की हो गई। आखिरकार उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा।
अपनी चुनावी सभाओं को संबोधित करते समय नरेंद्र मोदी के चेहरे पर कभी संवेदनाएं नहीं झलकीं। तब उनके चेहरे पर कीलर इंस्टींकट का भाव छलकता। पर जैसे-जैसे वे प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंचने लगे, वैसे-वैसे भावुक बनते गए। फिल्मों में मीना कुमारी की छवि रोने वाली अभिनेत्री की रही है। अधिक रोने वाली नायिकाएं तो फिल्मों में चल जाएंगे, पर अधिक रोने वाले अभिनेता अधिक नहीं चल पाते। इसलिए नरेंद्र मोदी को अधिक भावुक होना नहीं चाहिए। क्योंकि जिसे लोगों ने एक दम-खम वाले इंसान के रूप में देखा है, उसे इतने अधिक भावुक रूप में देखना बार-बार अच्छा नहीं लगता। इसलिए उन्हें अपनी इस छवि से दूर रहकर एक सख्त एवं दूरंदेशी व्यक्ति के रूप में छवि बनानी होगी।
डॉ. महेश परिमल

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