शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
भाजपा का दामन कब तक थामेंगे नीतिश?
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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parimalmahesh@gmail.com
सोमवार, 24 जुलाई 2017
मायावती का इस्तीफा यानी अस्तित्व बचाने की कवायद
डॉ. महेश परिमल
खुद को दलितों का नेता बताने वाली मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। इस्तीफे का कारण उसने यह बताया है कि उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। भाषण के दौरान भाजपा नेताओं द्वारा खलल डालने का आरोप भी उन्होने लगाया है। वास्तव में ये तो साधारण बातें हैं। इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है। मायावती अब समझ गई हैं कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा, जिससे वह कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोर सके, ताकि नेतागिरी कुछ समय के लिए चल पड़े।
मायावती का कार्यकाल आगामी अप्रैल में पूर्ण हो रहा है। अब उनके पास केवल 8 महीने का समय ही बाकी है। इस समय उत्तरप्रदेश विधानसभा में बसपा के 19 विधायक ही हैं, लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। मायावती बहुजन समाज पार्टी की एक ऐसी अध्यक्ष हैं, जो अभी तीन महीने पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का पर्याय मानी जाती थीं। अपने आप को वह दलितों का मसीहा कहने से नहीं चूकती। एक समय ऐसा भी था, जब उनका नाम प्रधानमंत्री पद दावेदारों में था। आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि एक राजनीतिक बयान देने में भी उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है। यही उनके इस्तीफे का सही कारण है। वह अच्छी तरह से जानती हैं कि अब राज्यसभा के लिए वह चुनाव नहीं लड़ सकती, यह उनके जीवन का आखिरी कार्यकाल है। लोकसभा या विधानसभा के उपचुनाव में भी वह अपना बल नहीं दिखा पाएंगी। उसके दलित वोट इतने अधिक बिखर गए हैं कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। इसलिए इस्तीफा देना उनकी मजबूरी है। इससे वह अपने राजनीतिक भूतकाल के खिलाफ अपने वर्तमान की हास्यास्पद स्थिति को रेखांकित कर रहीं है।
जब भी भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तब मायावती का उदय एक चमत्कार के रूप में माना जाएगा। अत्यंत ही साधारण परिवार से आने वाली यह ‘दलित की बेटी’ ही है, परंतु सत्ता में आने के बाद अपने शाही ठाट-बाट, घमंड, अहंकार और अभिमान से भरे संवादों ने उन्हें ‘दौलत की बेटी’ बना दिया। 1993 में जब मायावती का उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश हुआ और वे मुख्यमंत्री बनीं, तब पी.वी.नरसिंह राव ने इसे ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ निरुपित किया। राजनीति में खुद को उस्ताद मानने वाली मायावती की पहचान अपने कड़वे बयानों के कारण अधिक है। दलितों को सामने रखकर उसने कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जिसे सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। अपने विचारों पर दृढ़ रहने के कारण उनके समर्थक उसे अपना आदर्श मानते हैं। दूसरी ओर अपनी जिद के कारण विरोधी उनसे दूर ही रहते हैं।
दलित वोट बैंक को मजबूत पहचान देने के मामले में कांशीराम और मायावती के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मुलायम के ओबीसी कार्ड के खिलाफ मायावती ने दलित मतों को अपनी ओर मिला लेने के सफल ध्रुवीकरण के चलते अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती और बसपा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दलित वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश में नाकामयाब होने के बाद मुलायम ने मुस्लिम-यादव का नया समीकरण तैयार किया और कामयाब रहे। मुलायम के इस दांव को खारिज करने के लिए मायावती ने दलित और ब्राह्मण को अपने पाले में लाने में सफलता प्राप्त की। जो वर्ग सामाजिक रूप से एक पंगत में बैठता भी नहीं था, मायावती ने उस वर्ग को एक साथ मिला दिया। तब मायावती के सफल, अनोखे और करिश्माई सोशल इंजीनियरिंग की चर्चा हुई थी।
उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में मुलायम के स्थापित वोट बैंक भाजपा की आंधी को रोकने के लिए उसने दलित-मुस्लिम वोटबैंक पर ध्यान केंद्रित किया। साधारण रूप से मुस्लिम वोट बैंक का झुकाव सपा की तरफ माना गया, पर यादव परिवार के बीच जो कलह सामने आया, तब मायावती ने मुस्लिम वोट बैंक पर घुसपैठ करनी शुरू कर दी। इसके लिए उसने 97 मुस्लिमों को टिकट दिया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उसने मुस्लिमों की तरफ अधिक ध्यान दिया। दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम को भी अपने पक्ष में कर लिया। मुस्लिमों को रिझाने के लिए उनकी सभाओं में अधिक से अधिक मुस्लिम श्रोताओं को लाने का प्रयास किया गया। मुख्तार अंसारी जैसे कुख्यात अपराधी को भी बिना किसी हिचकिचाहट के उसने पार्टी में ले लिया। उनकी इस तरह की कोशिशों से उनके दलित वोट बैंक उससे दूर जाने लगे। दलित अब मायावती को बेवफा कहने लगे।
बसपा की हालत ऐसी है कि अब मायावती के अलावा दूसरी पंक्ति में कोई नेता नजर ही नहीं आता। स्वामी प्रसाद मौर्य से कुछ आशा थी, पर जब उसने भी मायावती का साथ छोड़कर भाजपा का पल्लू थाम लिया, तो तुनकमिजाज मायावती उन्हें मना नहीं पाई। उल्टे उनके खिलाफ अनाप-शनाप बयान देने लगी। उत्तर प्रदेश की दलित प्रभुत्व वाली 67 सीटों में से 53 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया। इस दौरान बसपा की ऐसी फजीहत हुई कि 2012 में 80 सीटों के खिलाफ उस समय यह आंकड़ा केवल 19 तक ही सीमित हो गया। लोकसभा में भी 80 सीटों में से बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इससे उसकी राजनीतिक हैसियत ही खो गई। अब उनके खिलाफ दलितों की नई नेतागिरी उभरने लगी। सहारनपुर के दंगों के बाद चंद्रशेखर नाम के युवा की चर्चा जोरों पर है। उसकी आक्रामकता से लोग प्रभावित हैं। राज्य के दलितों पर वे अपना प्रभाव जमा रहे हैं। पहले मायावती ने एक नारा दिया था-तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। अब ऐसा ही कुछ चंद्रशेखर कर रहे हैं। सहारनपुर में दलितों की रक्षा करने में मायावती ने देर कर दी। ऐसा चंद्रशेखर बार-बार कह रहे हैं। इस तरह से वे स्वयं को दलितों के मसीहा के रूप में प्रतिस्थापित कर रहे हैं।
मायावती का इस्तीफा अलग बात है, आज तक मायावती ने कोई भी मौखिक भाषण नहीं दिया। जो भी कहा-लिखा हुआ पढ़ा। उनकी अनुपस्थिति से किसी प्रकार की कमी किसी को नहीं खलेगी। पर उत्तर प्रदेश की राजनीति से फिसले पैरों को वह किस तरह से दृढ़ करतीं है, यही देखना बाकी रह गया है।
डॉ. महेश परिमल
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अभिमत
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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parimalmahesh@gmail.com
गुरुवार, 13 जुलाई 2017
सीमा विवाद और भारत-चीन के रिश्ते
आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शनिवार, 8 जुलाई 2017
रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ देते हैं नीतिश कुमार
डॉ. महेश परिमल
राजनीति में रंग बदलना बहुत ही आसान है,
पर इतना आसान भी नहीं कि गिरगिट भी शरमा जाए। राजनीति में सफल होने के लिए नेता रंग
बदलते ही रहते हैं। पर कब कहां किस तरह से गुलाटी मारनी है या रंग बदलना है, यह बहुत
ही महत्वपूर्ण है। इसमें जरा-सी भी चूक राजनीति से बाहर कर सकती है। पर बिहार की राजनीति
करते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने एक गुलाटी से कई निशाने साधे हैं। राष्ट्रपति
पद के लिए भाजपा ने जब रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा करते हुए नीतिश कुमार
ने एक पत्थर से कई निशाने साधे हैं। इससे विपक्ष जो अब तक मौन साधे हुए अपनी एकता की
शान बघार रहा था, अब बिखरता नजर आ रहा है। नीतिश ने कोविंद को समर्थन की घोषणा करते
हुए जो निशाने साधे हैं, उससे विपक्ष का समीकरण बिगड़ता दिखाई दे रहा है।
भाजपा के प्रत्याशी को समर्थन देने की
घोषणा कर नीतिश ने तीन संकेत दिए हैं। पहला संदेश लालू प्रसाद यादव को जाता है कि उसका
परिवार भ्रष्टाचार से बाज आए। इसी कारण से वे जब चाहें, उनसे नाता तोड़ सकते हैं। दूसरी
तरफ उन्होंने भाजपा की नेतागिरी का संकेत दिया है कि बिहार में वे भाजपा से गठबंधन
कर सरकार बना सकते हैं। तीसरी तरफ उन्होंने विपक्ष को यह संकेत दिया है कि यदि उन्हें
2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बताया, तो वे भाजपा का पल्लू पकड़
सकते हैं। अपनी 5 दशक की राजनीतिक यात्रा में नीतिश कुमार ने कई बार सोच-समझकर गुलाटी
मारी है। इससे उन्हें काफी राजनीतिक लाभ भी मिला है। विचारधारा की दृष्टि से वे समाजवादी
हैं। लालू यादव की तरह वे भी राम मनोहर लोहिया के शिष्य हैं। ‘70 के दशक में लोकनायक
जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के भ्रष्ट शासन के खिलाफ नवनिर्माण का आंदोलन शुरू
किया था, उसमें नीतिश कुमार और लालू यादव कंधे से कंधा मिलाकर साथ-साथ थे। 1989 में
वी.पी.सिंह के जनता दल ने राजीव गांधी को हराया, उसमें भी नीतिश कुमार की महत्वपूर्ण
भूमिका थी। जनता दल का विभाजन हुआ, तब वे लालू यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान के
साथ थे। उस समय नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य डांवाडोल हो रहा था। तब उन्होंने जार्ज
फर्नाण्डीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। 1998 में जब केंद्र में भाजपा के मोर्चे
की सरकार आई, तब उन्होंने वामपंथी विचारधारा को दरकिनार करते हुए एनडीए सरकार में शामिल
हो गए। पहले तो वे रेल मंत्री बने, फिर कृषि मंत्री बने, उसके बाद 2001 से लेकर
2004 तक वे एक बार फिर रेल मंत्री पद को सुशोभित करने लगे।
सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की
हार से नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य एक बार फिर हिचकोले खाने लगा। 2005 में बिहार
विधानसभा चुनाव होने वाले थे। उस समय लोग लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगलराज से त्रस्त
हो चुके थे। इस जंगलराज से मुक्ति दिलाने के नारे के साथ उन्होंने भाजपा से नाता जोड़
लिया। उनका ये पैंतरा काम आया, भाजपा से गठबंधन कर वे मुख्यमंत्री बन गए। अपने 5 साल
के कार्यकाल में नीतिश कुमार बिहार को विकास के रास्ते पर ले आए। भाजपा के साथ मिलकर
नीतिश ने बिहार को भ्रष्टाचारमुक्त प्रदेश दिया। इसी कारण वे 2005 का चुनाव जीत गए।
2002 में जब गुजरात में दंग हुए थे, तब
नीतिश कुमार केंद्र में भाजपा मोर्चे की सरकार के रेल मंत्री थे। उधर नरेंद्र मोदी
गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गुजरात दंगों के विरोध में होने के बाद भी नीतिश कुमार ने
रेल मंत्री का पद नहीं छोड़ा था। पर जब 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का
उम्मीदवार बनाया गया, तो वे उनके विरोध में उन्होंने बिहार में भाजपा से अपना गठबंधन
तोड़ लिया। नीतिश कुमार की इस गुलाटी से उनकी सरकार खतरे में पड़ गई। तब 2014 में हुए
लोकसभा चुनाव में बिहार में जेडी(यू) से उनके
मतभेद हो गए। इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा देकर एक बार फिर गुलाटी
मारी। नीतिश कुमार के इस्तीफे से जीतेन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
नीतिश कुमार यह अच्छी तरह से जानते थे
कि बिहार में वे अपने दम पर अकेले चुनाव नहीं जीत सकते। हालत यह थी कि भाजपा से गठबंधन
कर नहीं सकते थे। लालू से भी उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही थी। 2014 में जब बिहार में
विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा, तो उन्हें भाजपा को दूर रखने का बहाना मिल गया। न चाहते
हुए भी उन्होंने अपने कट्टर दुश्मन लालू यादव से हाथ मिला लिया। इन दिनों नीतिश कुमार
को अचानक ही याद आया कि वे और लालू यादव दोनों एक ही गुरु यानी राम मनोहर लोहिया के
शिष्य हैं। लालू के अलावा उन्होंने कांग्रेस के साथ भी सीटों का बंटवारा किया। भाजपा
के विरोध में एक कथित रूप से महागठबंधन बना। इससे नरेंद्र मोदी की आंधी के बाद भी बिहार
के विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गई। नीतिश कुमार एक बार फिर अपनी पैंतरेबाजी से जीत
गए।
बिहार में नीतिश कुमार का भाजपाविरोधी
महागठबंधन सफल रहा। इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव की बातें होने लगी, तो इस महागठबंधन
में प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम भी शामिल किया गया। इसके पीछे यही वजह मानी जाती
है कि इतनी गुलाटी मारने के बाद भी विपक्ष में उनकी छवि स्वच्छ मानी जाती है। इस दौरान
लालू यादव के परिवार का भ्रष्टाचार सामने आने लगा, तो नीतिश डर गए। अब यदि लालू यादव
के परिवार पर किसी तरह की कार्रवाई होती है, तो उसके छींटे उन पर भी पड़ेंगे ही। इसलिए
उन्होंने बड़ी चालाकी से भाजपा की तरफ सरकने की योजना बनाई। भाजपा के प्रत्याशी को
अपना समर्थन देकर वे एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं, पर वे शायद यह भूल रहे हैं कि
भाजपा में अभी प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली नहीं है।
डॉ. महेश परिमल
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आलेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
मुृम्बई महिला पुलिस की हैवानियत का एक और नमूना
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आज का सच
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सोमवार, 5 जून 2017
5 जून विश्व पर्यावरण दिवस - कविता - उदास नदी
5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर
स्व. अनुपम मिश्र जी की स्मृति में….
कविता - उदास नदी…
नदी उदास है
और खामोश भी।
उसका मसीहा उससे
बहुत दूर चला गया है।
इतनी दूर कि
लौटकर नहीं आ सकता
और इसीलिए
नदी उदास है।
दूर कहीं आसमान से,
मसीहा भी निहार रहा है
उदास नदी को…
पर वह विवश है,
नहीं छीन सकता उसकी उदासी,
नहीं तोड़ सकता उसकी खामोशी,
जीवन भर स्वयं को,
जल यज्ञ में होम करता रहा,
कि नदी खिलखलाती रहे,
इठलाती रहे, बलखाती रहे…
और एकाएक
शून्य में समा गया वो।
अपने सारे सपने
तट पर ही छोड़ गया वो।
रोज एकांत में खाली आँखों से
निहारता है नदी को
और नदी देखती है उसे
उन्हीं रिक्त लहरों से…
मगर एक दिन,
मसीहा को दिखे कुछ युवा
नदी के मुहाने पर
उसकी उम्मीद जाग उठी
वे युवा किसी गंभीर विषय पर
चर्चा कर रहे थे।
आज के समय में
प्रदूषण से बढ़कर
गंभीर विषय और क्या हो सकता है?
लेकिन उनकी चर्चा सुनकर
उम्मीद टूटती गई
क्योंकि केवल चर्चा करना
समय बिताने का साधन ही तो है!
क्या करेंगे ये? क्या कर पाएँगे ये?
सोच ही रहा था वह मसीहा
कि वहीं पर
कुछ नन्हे मासूम खेलते नजर आए
वो उन्हें देख ही रहा था
कि एक मासूम
उन युवाओं के पास आया
एक युवा जब सिगरेट की राख
नदी में बार-बार डाल रहा था
कि मासूम ने कहा –
भैया, ऐसा न करो।
इससे पानी गंदा हो जाएगा।
और फिर उसने
अपनी नन्हीं हथेली में
वह राख तैरता पानी भर लिया
और उसे धरती पर उड़ेल दिया।
मुस्कराता हुआ फिर
दूसरे मासूमों से जा मिला।
जब मसीहा ने देखा
मासूम की इस हरकत को
उसकी उम्मीद
यकींन में बदल गई
कोई तो है
जो उसके अधूरे काम को पूरा करेगा
उसका स्वप्न साकार करेगा
सुकून की साँसे लेकर
करवट बदल ली उसने
और उसके चेहरे पर सुकून देखकर
कई दिनों से उदास नदी
हौले से मुस्करा दी।
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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गुरुवार, 25 मई 2017
कविता - यादों के जंगल में - अनन्त आलोक
कविता का अंश...
कल रात भर
मैं तन्हा ही भटकता रहा
यादों के बियाबान जंगल में
जंगल भरा पड़ा था
खट्टी मीठी और कड़वी
यादों के पेड़ पौधों से
जंगल के बीचोंबीच उग आए थे
कुछ मीठे अनुभवों के विशालकाय दरख़्त
जो लदे पड़े थे मधुर एहसासों के फूलों-फलों से
बीच-बीच में उग आई थी
कड़़वे प्रसंगों की तीखी काँटेदार झाड़ियाँ
जिनके पास से गुज़रने पर
आज भी ताज़ा हो जाती है वो चुभन
और उछल पड़ता है दिल
मेरे एकदम सामने बैठी
जुगनुओं जड़ी चादर ओढ़े
मनमोहक, साँवली-सलोनी निशा
नींद की बोतल से भर भर
नैन कटोरे
पिलाती रही मुझे
रात रस
लेकिन मैं बहका नहीं
बढ़ता ही गया आगे
और आगे ।
जंगल में एक साथ
कईं दरख़्तों का सहारा ले
झुलती नन्हीं समृतियों की बेलें
पाँव से उलझ पड़ी अचानक
और मैं गिरते गिरते बचा !
जंगल ने पीछा नहीं छोड़ा मेरा
मैं भागना चाहता था
मैंने कईं बार छुपाया स्वयं को
रजाई में मगर जंगल था कि
उसके भी भीतर आ गया
उसने क़ैद करके रखा मुझे
सुबह होने तक ।
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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कुछ कविताएँ - अश्वघोष
कविता का अंश..
सदियों से भूखी औरत
करती है सोलह शृंगार
पानी भरी थाली में देखती है
चन्द्रमा की परछाईं
छलनी में से झाँकती है पति का चेहरा
करती है कामना दीर्घ आयु की
सदियों से भूखी औरत
मन ही मन बनाती है रेत के घरौंदे
पति का करती है इन्तज़ार
बिछाती है पलकें
ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर
हर वक़्त गाती है गुणगान पति के
बच्चों में देखती है उसका अक्स
सदियों से भूखी औरत
अन्त तक नहीं जान पाती
उस तेन्दुए की प्रवृत्ति जो
करता रहा है शिकार
उन निरीह बकरियों का
आती रही हैं जो उसकी गिरफ़्त में
कहीं भी
किसी भी समय।
ऐसी ही अन्य प्रतिनिधि कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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सोमवार, 1 मई 2017
राधा का दर्द...
राधा का दर्द ....
कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए
विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा...
कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई
इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल💬 उठी-
"कैसे हो द्वारकाधीश ??"
जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया
फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया
और बोले राधा से ...
"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!
आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो
सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."
बोली राधा -
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते
इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे
प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?
कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?
कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?
एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी
कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?
कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं
कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता
आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो
पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?
सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है
आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?
क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे
आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे
आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है
मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं
गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है".
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दिव्य दृष्टि,
लेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
कविता - ईंधन - गुलजार
कविता का अंश...
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कुछ कविताएँ - गुलज़ार
कविता का अंश...
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
"तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है "
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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सोमवार, 13 मार्च 2017
बाल कविता - बैगन जी की होली - कृष्ण कुमार यादव
कविता का अंश...
टेढ़े-मेढ़े बैगन जी
होली पर ससुराल चले
बीच सड़क पर लुढ़क-लुढ़क
कैसी ढुलमुल चाल चले
पत्नी भिण्डी मैके में
बनी-ठनी तैयार मिलीं
हाथ पकड़ कर वह उनका
ड्राइंगरूम में साथ चलीं
मारे खुशी, ससुर कद्दू
देख बल्लियों उछल पड़े
लौकी सास रंग भीगी
बैगन जी भी फिसल पड़े
इतने में उनकी साली
मिर्ची जी भी टपक पड़ीं
रंग भरी पिचकारी ले
जीजाजी पर झपट पड़ीं
बैगन जी गीले-गीले
हुए बैगनी से पीले।
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बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कविता - अबकी शाखों पर बसंत तुम ! - जयकृष्ण राय तुषार
कविता का अंश...
अबकी शाखों पर
बसंत तुम !
फूल नहीं रोटियाँ खिलाना।
युगों-युगों से
प्यासे होठों को
अपना मकरंद पिलाना।
धूसर मिट्टी की
महिमा पर
कालजयी कविताएँ लिखना,
राजभवन
जाने से पहले
होरी के आँगन में दिखना,
सूखी टहनी
पीले पत्तों पर मत
अपना रोब जमाना।
जंगल-खेतों और
पठारों को
मोहक हरियाली देना,
बच्चों को अनकही कहानी
फूल-तितलियों वाली देना
चिनगारी लू
लपटों वाला मौसम
अपने साथ न लाना।
सुनो दिहाड़ी
मजदूरन को
फूलों के गुलदस्ते देना
बंद गली
फिर राह न रोके
खुली सड़क चौरस्ते देना,
साँझ ढले
स्लम की देहरी पर
उम्मीदों के दिए जलाना।
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दिव्य दृष्टि
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कविता - आम कुतरते हुए सुए से - जयकृष्ण राय तुषार
कविता का अंश...
आम कुतरते हुए सुए से
मैना कहे मुण्डेर की ।
अबकी होली में ले आना
भुजिया बीकानेर की ।
गोकुल, वृन्दावन की हो
या होली हो बरसाने की,
परदेसी की वही पुरानी
आदत है तरसाने की,
उसकी आँखों को भाती है
कठपुतली आमेर की ।
इस होली में हरे पेड़ की
शाख न कोई टूटे,
मिलें गले से गले, पकड़कर
हाथ न कोई छूटे,
हर घर-आँगन महके ख़ुशबू
गुड़हल और कनेर की ।
चौपालों पर ढोल-मजीरे
सुर गूँजे करताल के,
रूमालों से छूट न पाएँ
रंग गुलाबी गाल के,
फगुआ गाएँ या फिर बाँचेंगे
कविता शमशेर की ।
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दिव्य दृष्टि
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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017
कुछ कविताएँ - अर्चना सिंह 'जया'
कविता का अंश...
पाठशाला से जब घर जाते बच्चे...
मेघ देख शोर मचाते बच्चे,
पाठशाला से जब घर जाते बच्चे।
छप-छप पानी में कूद लगाते
कीचड़ में खुद को डुबोते
रिम-झिम बारिश की बॅूंदों में
झूम-झूम कर हॅंसते गाते।
पाठशाला से जब घर जाते बच्चे।
मोर पंख से रंग बिरंगे
सपने इनके बाहर निकलते
कपड़ों की न चिंता करते
दौड़ भाग कर धूम मचाते।
पाठशाला से जब घर जाते बच्चे।
पापा-मम्मी की एक न सुनते
हरदम अपने दिल की करते
तन मन अपना खुशियों से भरते।
पाठशाला से जब घर जाते बच्चे।
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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कुछ कविताएँ – जयकृष्ण राय तुषार
कविता का अंश…
फिर मौसम बाँहों में भरना….
आएँगे, फिर अच्छे दिन आएँगे। हम खेतों में धान रोपकर गाएँगे। कुछ दिन और प्रतीक्षा करना, फिर मौसम बाँहों में भरना, सुख के दिन राहों में फूल सजाएँगे। प्रकृति होंठ पर दही लगा आचमन करेगी, कहीं अजंता, कहीं एलोरा माँग भरेंगी, पीले बाँसों में करील अंखुआएँगे। हारिल तोते टहनी-टहनी डोलेंगे, हम भी उनकी ही भाषा में बोलेंगे, पपीहे पंचम दा के सुर में गाएँगे। आसमान के बादल होंगे झीलों में, स्वप्न हमारे होंगे कोसों मीलों में, हम हाथों में कोई हाथ दबाएँगे। आएँगे, फिर अच्छे मौसम आएँगे। ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017
बाल कविता – सूरज क्या सिखलाता है
कविता का अंश…
माँ, यह मुझे बता दो, सूरज नित्य कहाँ जाता है?
क्यों होते ही प्रात: पुन: नभ पथ पर आ जाता है?
बेटा, दिन भर चलते-चलते जब दिनकर थक जाता है,
करता तब विश्राम, सवेरे आता वह सिखलाता –
करो शक्ति भर काम कि जब तक, मैं नभ में चलता हूँ।
सो जाओ चुपचाप रात में जैसा मैं करता हूँ,
किन्तु प्रात: होते ही जग जाओ, मत देर लगाओ।
नित्य क्रिया से निपट काम में अपने तुम लग जाओ।
माँ, दिनकर-सा ही जब डटकर मैं भी काम करूँगा,
क्या वैसा ही ऊपर उठकर मैं भी चमक सकूँगा?
बेटा, जब तुम काम करोगे, तन-मन, हृदय लगाकर,
अपने में विश्वास जमाकर,
भय, आलस्य भगाकर,
यश पाओगे, सुख पाओगे,
विजयी कहलाओगे।
चमक उठोगे तब तो तुम भी
निश्चय दिनकर-सा ही,
तुम्हें देखकर राह पाएँगे, भ
भूले-भटके राही।
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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दिव्य दृष्टि,
बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बाल कविता – सच्चा मित्र
कविता का अंश…
करो मित्र की मदद हमेशा, तन-मन, धन से खुश होकर,
उसको जो भी काम पड़े तो करो उसे पूरा हँसकर।
खाना हो जब पास तुम्हारे, उसे खिलाकर तुम खाओ,
फल मेवा हो या कि मिठाई, आपस में मिलकर खाओ।
बोझ उठाता हो जब साथी, तुम भी उसकी मदद करो,
पड़ जाए बीमार अगर वह, सेवा उसकी सदा करो।
साथी भी हर एक काम में, हँसकर हाथ बँटाएगा,
काम पड़ेगा कभी तुम्हें तो पूरा कर दिखलाएगा।
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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दिव्य दृष्टि,
बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
बाल कविता – चूहे की दिल्ली यात्रा- रामधारी सिंह ‘दिनकर’
कविता का अंश…
चूहे ने यह कहा कि चुहिया छाता और छड़ी दो,
लाया था जो बड़े सेठ के घर से वह पगड़ी दो।
मटर-मूँग जो कुछ घर में है वही सभी मिल खाना,
खबरदार तुम लोग कभी बिल के बाहर मत आ जाना।
बिल्ली एक बड़ी पाजी है रहती घात लगाए,
न जाने कब किसे दबोचे किसको चट कर जाए।
सो जाओ सब लोग लगाकर दरवाजे पर किल्ली,
आजादी का जश्न देखने मैं जा रहा हूँ दिल्ली।
दिल्ली में देखूँगा आजादी का नया जमाना,
लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना।
अब न रहे अँग्रेज़ देश पर काबू है अब अपना,
पहले जहाँ लाट साहब थे, राष्ट्रपित है अपना।
घूमूँगा दिन रात करूँगा बातें नहीं किसी से,
हाँ फुरसत जो मिली, मिलूँगा मैं प्रधानमंत्री से।
गांधी युग में कौन उड़ाए चूहों की अब खिल्ली,
आजादी का जश्न देखने मैं जा रहा हूँ दिल्ली।
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बाल कहानी – सच्चा हीरा
कहानी का अंश…
सूर्य अस्त होने को था। पक्षी चहचहाते हुए अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। गाँव की चार स्त्रियाँ एक कुएँ पर पानी भरने आई। अपने- अपने घड़ों में पानी भरकर वे इधर-उधर की बातें करने लगी। एक स्त्री बोली – भगवान सबको मेरे जैसा बेटा दे। वह लाखों में एक है। उसका कंठ बहुत सुरीला है। लोग उसके गीतों को सुनकर मुग्ध हो जाते हैं। सच कहूँ तो मेरा बेटा तो हीरा है। उसकी बात सुनकर दूसरी स्त्री से रहा नहीं गया। वह भी अपने बेटे की प्रशंसा करने लगी और बोली – बहन, मेरा बेटा बहुत शक्तिशाली और साहसी है। वह तो आज के युग का भीम है। दोनों स्त्रियों की बातें सुनकर तीसरी भला चुप कैसे रहती? वह भी बोल पड़ी – बहन, मेरा बेटा तो इतना बुद्धिमान है कि वह जो कुछ पढ़ता है, उसे एकदम कंठस्थ हो जाता है। उसके कंठ में तो माता सरस्वती का वास है। तीनों स्त्रियों की बातें सुनकर भी चौथी स्त्री चुपचाप बैठी रही। उसका भी एक बेटा था। पर उसने उसकी प्रशंसा में कुछ भी नहीं कहा। पहली स्त्री ने उसे टोकते हुए कहा – तुमने अपने बेटे के विषय में कुछ नहीं बताया। चौथी स्त्री बोली – मैं अपने बेटे की क्या प्रशंसा करूँ? न तो वह अच्छा गायक है और न ही भीम जैसा पहलवान। जब वे अपने –अपने घड़े सिर पर रखकर लौटने लगी, तभी उन्हें एक मधुर गीत सुनाई दिया। उसे सुनते ही पहली स्त्री बोल उठी – मेरा हीरा आ रहा है। तुमने सुना? उसका कंठ कितना मधुर है? वह लड़का गीत गाता हुआ, उसी रास्ते निकल गया। उसने अपनी माँ की ओर ध्यान तक नहीं दिया। थोड़ी देर बाद ही दूसरी स्त्री का बेटा भी उधर से आता दिखाई दिया। उसे देखकर दूसरी स्त्री बोली – देखो, वह मेरा लाडला बेटा आ रहा है। उसका बलिष्ठ शरीर तो देखो। वह बेटा भी माँ की ओर देखे बिना निकल गया। थोड़ी ही देर में तीसरी स्त्री का बेटा भी संस्कृत के श्लोक बोलता हुआ वहाँ से गुजरा। वह भी माँ की ओर देखे बिना ही चला गया। चारों स्त्रियाँ अभी थोड़ा ही आगे बढ़ी होगी कि चौथी स्त्री का बेटा भी उधर से आ निकला। आगे क्या हुआ? उस बेटे के मन में अपनी माँ के प्रति कैसे भाव थे? क्या वह भी अन्य बेटे के समान ही था? इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस अधूरी कहानी का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए….
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दिव्य दृष्टि,
बाल कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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parimalmahesh@gmail.com
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017
कहानी - दुष्यन्त पुत्र - राजा भरत
दुष्यन्त पुत्र भरत की ऐतिहासिक कहानी... कहानी का अंश...
हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए है. इन महापुरुषों ने अपने बचपन में ही ऐसे कार्य किये जिन्हें देखकर उनके महान बनने का आभास होने लगा था. ऐसे ही एक वीर, प्रतापी व साहसी बालक भरत थे.
भरत हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त के पुत्र थे. राजा दुष्यन्त एक बार शिकार खेलते हुए कण्व ऋषि के आश्रम पहुंचे, वहां शकुन्तला को देखकर वह उस पर मोहित हो गये और शकुन्तला से आश्रम में ही गंधर्व विवाह कर लिया. आश्रम में ऋषि कण्व के न होने के कारण राजा दुष्यन्त शकुन्तला को अपने साथ नहीं ले जा सके. उन्होंने शकुन्तला को एक अँगूठी दे दी जो उनके विवाह की निशानी थी.
एक दिन शकुन्तला अपनी सहेलियों के साथ बैठी दुष्यन्त के बारे में सोच रही थी. उसी समय दुर्वासा ऋषि आश्रम में आये. शकुन्तला दुष्यन्त की याद में इतना अधिक खोई हुई थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के आने का पता ही नहीं चला. शकुन्तला ने उनका आदर – सत्कार नहीं किया. जिससे क्रोधित होकर दुर्वासा ऋषि ने शकुन्तला को शाप दिया कि ‘ जिसकी याद में खोये रहने के कारण तूने मेरा सम्मान नहीं किया, वह तुझको भूल जायेगा’.
ऋषि दुर्वासा शंकर के अंश से उत्पन्न अनुसूया और अत्रि के पुत्र थे. ये अत्यंत क्रोधी थे.
शकुन्तला की सखियों ने क्रोधित ऋषि से अनजाने में उससे हुए अपराध को क्षमा करने के लिए निवेदन किया. ऋषि ने कहा- ‘मेरा शाप का प्रभाव समाप्त तो नहीं हो सकता किन्तु दुष्यन्त द्वारा पहनाई गयी अँगूठी को दिखाने से उन्हें विवाह का स्मरण हो जायेगा’.
कण्व ऋषि जब आश्रम वापस आये तो उन्हें शकुन्तला के गंधर्व विवाह का समाचार मिला. उन्होंने एक गृहस्थ की भांति अपनी पुत्री को पति के पास जाने के लिए विदा किया. शकुन्तला के पास राजा द्वारा दी गयी अँगूठी नहीं थी. शाप के प्रभाव से दुष्यन्त अपने विवाह की घटना भूल चुके थे. वे शकुन्तला को पहचान नहीं सके. निराश शकुन्तला को उसकी माँ मेनका अप्सरा ने कश्यप ऋषि के आश्रम में रखा. उस समय वह गर्भवती थी. इसी आश्रम में दुष्यन्त के पुत्र भारत का जन्म हुआ.
भरत बचपन से ही वीर और साहसी था. वह वन के हिंसक पशुओ के साथ खेलता और सिंह के बच्चो को पकड़ कर उनके दांत गिनता था. उसके इन निर्भीक कार्यो से आश्रमवासी उसे सर्वदमन कह कर पुकारते थे.
समय का चक्र ऐसा चला कि राजा को वह अँगूठी मिल गयी जो उन्होंने शकुन्तला को विवाह के प्रतीक के रूप में दी थी. अँगूठी देखते ही उनको विवाह की याद ताजा हो गयी. शकुन्तला की खोज में भटकते हुए एक दिन वह कश्यप ऋषि के आश्रम में पहुंच गये जहाँ शकुन्तला रहती थी. उन्होंने बालक भरत को शेर के बच्चो के साथ खेलते देखा.
राजा दुष्यन्त ने ऐसे ही साहसी बालक को पहले कभी नहीं देखा था. बालक के चेहरे पर अद्भुत तेज था. दुष्यन्त ने बालक भरत से उसका परिचय पूछा. भरत ने अपना और अपनी माँ का नाम बता दिया. दुष्यन्त और भरत की बातचीत हो रही थी, उसी समय आकाशवाणी हुई की ‘ दुष्यन्त यह तुम्हारा ही पुत्र है’ इसका भरण पोषण करो’ क्योंकि आकाशवाणी ने भरण की बात कही थी इसलिए दुष्यन्त ने अपने पुत्र का नाम भरत रखा.
दुष्यन्त ने भरत का परिचय जानकर उसे गले से लगा लिया और शकुन्तला के पास गये. अपने पुत्र व पत्नी को लेकर वह हस्तिनापुर वापस लौट आये. हस्तिनापुर में भरत की शिक्षा – दीक्षा हुई. दुष्यन्त के बाद भरत राजा बने. उन्होंने अपने राज्य की सीमा का विस्तार सम्पूर्ण आर्यावर्त (उत्तरी, मध्य भारत ) में कर लिया. अश्वमेघ यज्ञ कर उन्होंने चक्रवती सम्राट की उपाधि प्राप्त की.
चक्रवती सम्राट भरत ने राज्य में सुदृढ़ न्याय व्यवस्था और सामाजिक एकता (सदभावना) स्थापित की. उन्होंने सुविधा के लिए अपने शासन को विभिन्न विभागों में बाँट कर प्रशासन में नियन्त्रण स्थापित किया. भरत की शासन प्रणाली से उनकी कीर्ति सारे संसार में फ़ैल गयी.
शेरो के साथ खेलने वाले इस ‘भरत’ के नाम पर ही हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा.
(पौराणिक ग्रंथ से साभार)
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कहानी - आज्ञाकारी बालक नचिकेता
कहानी का अंश...
नचिकेता की कहानी
बहुत पुरानी बात है जब हमारे यहाँ वेदों का पठन – पाठन होता था. ऋषि आश्रमों में रहकर शिष्यों को वेदों का ज्ञान देते थे. उन दिनों एक महर्षि थे वाजश्रवा. वे महान विद्वान और चरित्रवान थे. नचिकेता उनके पुत्र थे. एक बार महर्षि वाजश्रवा ने ‘विश्वजीत’ यज्ञ किया और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि इस यज्ञ में मैं अपनी सारी संपत्ति दान कर दूंगा.
कई दिनों तक यज्ञ चलता रहा. यज्ञ की समाप्ति पर महर्षि ने अपनी सारी गायों को यज्ञ करने वालो को दक्षिणा में दे दिया. दान देकर महर्षि बहुत संतुष्ट हुए.
बालक नचिकेता के मन में गायों को दान में देना अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे गायें बूढी और दुर्बल थी. ऐसी गायों को दान में देने से कोई लाभ नहीं होगा. उसने सोचा पिताजी जरुर भूल कर रहे है. पुत्र होने के नाते मुझे इस भूल के बारे में बताना चाहिए.
नचिकेता पिता के पास गया और बोला, पिताजी आपने जीन वृद्ध और दुर्बल गायों को दान में दिया है उनकी अवस्था ऐसी नहीं थी कि ये दूसरे को दी जाएँ.
महर्षि बोले, मैंने प्रतिज्ञा की थी कि, मैं अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दूँगा, गायें भी तो मेरी सम्पत्ति थी. अगर मैं दान न करता तो मेरा यज्ञ अधूरा रह जाता.
नचिकेता ने कहा, ” मेरे विचार से दान में वही वास्तु देनी चाहिए जो उपयोगी हो तथा दूसरो के काम आ सके फिर मैं तो आपका पुत्र हूँ बताइए आप मुझे किसे देंगे ?
महर्षि ने नचिकेता की बात का कोई उत्तर नहीं दिया परन्तु नचिकेता ने बार – बार वही प्रश्न दोहराया. महर्षि को क्रोध आ गया. वे झल्लाकर बोले, ” जा, मैं तुझे यमराज को देता हूँ.
नचिकेता आज्ञाकारी बालक था. उसने निश्चय किया कि मुझे यमराज के पास जाकर अपने पिता के वचन को सत्य करना है. अगर मैं ऐसा नहीं करूँगा तो भविष्य में मेरे पिता जी का सम्मान नहीं होगा.
नचिकेता ने अपने पिता से कहा, ” मैं यमराज के पास जा रहा हूँ. अनुमति दीजिये. महर्षि असमंजस में पड़ गये. काफी सोच – विचार के बाद उन्होंने ह्रदय को कठोर करके उसे यमराज के पास जाने की अनुमति दी.
नचिकेता यमलोक पहुँच गया परन्तु यमराज वहां नहीं थे. यमराज के दूतों ने देखा कि नचिकेता का जीवनकाल अभी पूरा नहीं हुआ है. इसलिए उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया. लेकिन नचिकेता तीनो दिन तक यमलोक के द्वार पर बैठा रहा.
चौथे दिन जब यमराज ने बालक नचिकेता को देखा तो उन्होंने उसका परिचय पूछा. नचिकेता ने निर्भीक होकर विनम्रता से अपना परिचय दिया और यह भी बताया कि वह अपने पिताजी की आज्ञा से वहां आया है |
यमराज ने सोचा कि यह पितृ भक्त बालक मेरे यहाँ अतिथि है. मैंने और मेरे दूतों ने घर आये हुए इस अतिथि का सत्कार नहीं किया. उन्होंने नचिकेता से कहा, ” हे ऋषिकुमार, तुम मेरे द्वार पर तीन दिनों तक भूखे – प्यासे पड़े रहे, मुझसे तीन वर मांग लो
नचिकेता ने यमराज को प्रणाम करके कहा, ” अगर आप मुझे वरदान देना चाहते है तो पहला वरदान दीजिये कि मेरे वापस जाने पर मेरे पिता मुझे पहचान ले और उनका क्रोध शांत हो जाए.
यमराज ने कहा- तथास्तु, अब दूसरा वर माँगो.
नचिकेता ने सोचा पृथ्वी पर बहुत से दुःख है, दुःख दूर करने का उपाय क्या हो सकता है ? इसलिए नचिकेता ने यमराज से दूसरा वरदान माँगा-
स्वर्ग मिले किस रीति से, मुझको दो यह ज्ञान |
मानव के सुख के लिए, माँगू यह वरदान ||
यमराज ने बड़े परिश्रम से वह विद्या नचिकेता को सिखाई. पृथ्वी पर दुःख दूर करने के लिए विस्तार में नचिकेता ने ज्ञान प्राप्त किया. बुद्धिमान बालक नचिकेता ने थोड़े ही समय में सब बातें सीख ली. नचिकेता की एकाग्रता और सिद्धि देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने नचिकेता से तीसरा वरदान माँगने को कहा |
नचिकेता ने कहा, ” मृत्यु क्यों होती है ? मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या होता है ? वह कहाँ जाता है ?
यह प्रश्न सुनते ही यमराज चौंक पड़े. उन्होंने कहा, ” संसार की जो चाहो वस्तु माँग लो परन्तु यह प्रश्न मत पूछो किन्तु नचिकेता ने कहा, ” आपने वरदान देने के लिए कहा, अतः आप मुझे इस रहस्य को अवश्य बतायें |
नचिकेता की दृढ़ता और लगन को देखकर यमराज को झुकना पड़ा.
उन्होंने नचिकेता को बताया की मृत्यु क्या है ? उसका असली रूप क्या है ? यह विषय कठिन है इसलिए यहाँ पर समझाया नहीं जा सकता है किन्तु कहा जा सकता है कि जिसने पाप नहीं किया, दूसरो को पीड़ा नहीं पहुँचाई, जो सच्चाई के राह पर चला उसे मृत्यु की पीड़ा नही होती. कोई कष्ट नहीं होता है.
इस प्रकार नचिकेता ने छोटी उम्र में ही अपनी पितृभक्ति, दृढ़ता और सच्चाई के बल पर ऐसे ज्ञान को प्राप्त कर लिया जो आज तक बड़े – बड़े पंडित, ज्ञानी और विद्वान् भी न जान सके | (पौराणिक ग्रंथों से साभार)
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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
कुछ ग़ज़लें - 2 - विनोद कुमार दवे
ग़ज़ल का अंश....
तुम्हें न भूल पाते है
हम खामोश है मगर तुम्हें भूल न पाते हैं
दिल से सदा देकर तुम्हीं को तो बुलाते हैं।
और तो क्या करें दुनिया के रिवाजों का,
आओ मेरे यार इनकी होली जलाते है।
इन दीवारों को कभी तो गिरना है ही,
हम दोनों मिलकर ये दूरी मिटाते है।
नफ़रत के आगोश में जी लिए जिन्हें जीना था,
हम तो खुशबु-ए- इश्क़ की हवा चलाते है।
मत रहो उदास इन हसीन लम्हों के दरमियान
थोड़ा तुम मुस्करा दो थोड़ा हम मुस्कराते है।
ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
ई-मेल - davevinod14@gmail.com
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ग़ज़ल,
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कुछ ग़ज़लें -1 - विनोद कुमार दवे
परिचय -
साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित।
अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।
ग़ज़ल का अंश...
• दिल में अश्कों का दरिया है....
इतनी कोशिशों के बाद भी तुम्हें कहाँ भूल पाते हैं,
दीवारों से बचते हैं तो दरवाजे टकराते हैं।
कौन रुलाए कौन हँसाए मुझको इस तन्हाई में,
ख़ुद के आंसू हाथों में ले ख़ुद को रोज हंसाते है।
जाने क्या लिख डाला है हाथों की तहरीरों में
अपनी किस्मत की रेखाएं उलझाते है, सुलझाते है।
तुझको किन ख़्वाबों में खोजूँ जागी-जागी रातों में
ख़ुद से इतनी दूरी है कि ख़ुद को ढूंढ़ न पाते है।
तेरी यादें दिल में इस हद तक गहरी बैठ गई है
तेरी यादों के दलदल में ख़ुद को भूल जाते है।
तुमने सोचा होगा बिन तेरे हम खुश कैसे है
दिल में अश्कों का दरिया है, बाहर हम मुस्काते है।
ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
ईमेल = davevinod14@gmail.com
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कहानी – इश्क के रंग हजार – रीता गुप्ता
कहानी का अंश… कितने सालों से अकेलेपन का दंश झेलती सौम्या के जीवन में एक ठहराव आ चुका था। अपनी नौकरी और जिंदगी को एकरसता से जीते-जीते वह मशीन बन चुकी थी। जीवन के सब रंग उसके लिए एक हो गए थे। फिर इधर कुछ दिनों से वह गौर करने लगी कि सामने के फ्ले ट में रहनेवाला एक व्यक्ति उसे बहुत ध्यान से देखने लगा है। पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया, पर हर दिन सौम्या जब चाय और पेपर लेकर बालकनी में आती, तो देखती वह उसे ही ताक रहा है। फिर एक दिन उसने सिर हिलाते हुए मुस्करा दिया। सौम्या ने दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे की बालकनी की तरफ झाँका, कहीं कोई भी नहीं था। चार लेन पर बालकनी में खड़ा वह अनाम व्यक्ति उसे ही देखकर मुस्कराया था। यह सोचकर एक झुरझुरी-सी दौड़ गई सौम्या की नसों में। हाय! कोई तो है, जो उसकी सुबह को अपनी मुस्कराहटों से खुशनुमा बना रहा है। अब उसने सुबह उठ पहले चेहरा साफ कर, सही कपड़े पहन, चाय पीने का सिलसिला शुरू किया। बीच-बीच में दरवाजे की ओट से झाँक लेती कि कहीं वह अंदर तो नहीं चला गया। हल्की मुस्कराहटों का आदान-प्रदान उसका दिन खुशनुमा बनाने लगा। उस दिन चाय पर देखा-देखी नहीं हो पाई थी। दफतर जाते वक्त बालकनी में झाँका तो वह मिल गया। सौम्या को संकोच हुआ कि वह कैसी फीके रंग की साड़ी पहने हुए है। उतनी दूर से उसने भाँप तो नहीं लिया कि वह एक बेतरतीब और नीरस महिला है। इसी ऊहापोह में दिन गुजरा, रात को चेहरे की मालिश की और कोई घरेलू फेस पैक लगाया। दूसरे दिन से सौम्या सुबह की चाय हो या दफ्तर जाना हो, अच्छी तरह से तैयार होकर ही बालकनी में आती। वह भी शौकीन मिजाज निकला। बड़े-बड़े काले गॉगल्स लगाता, कानों में हेडफोन लगा जब वह सौम्या को देख सिर हिलाता, तो वर्षों से बंजर पड़े मन पर मानों हल्की रस फुहार हो जाती। सौम्या का मन होता कभी वह दूरबीन लगाकर देखे कि वह गाहे-बगाहे झुककर क्या करता है। उसने मन ही मन अनुमान लगा लिया कि वह शायद कोई लेखक है। आगे क्या हुआ? क्या सौम्या और वह अजनबी एक-दूसरे से मिल पाए? क्या सौम्या उसे अपने मन की बात कह पाईँ? यदि कहा भी तो अजनबी ने उसे क्या जवाब दिया? इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस अधूरी कहानी का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए….
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संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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parimalmahesh@gmail.com
कविता – मेरी कोई जायदाद नहीं – अमरनाथ
कविता का अंश…
तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में,
चिडिया बना रही थी घोंसला रोशनदान में।
पल भर में आती पल भर में जाती थी वो,
छोटे-छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो।
बना रही थी वो अपना एक घर न्यारा,
कोई तिनका था ईंट उसकी, कोई गारा।
कड़ी मेहनत से घर जब उसका बन गया,
आए खुशी के आँसू और सीना तन गया।
कुछ दिन बाद मौसम बदला और हवा के झौंके आए,
नन्हे से प्यारे-प्यारे दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे।
पाल-पोसकर कर रही थी चिडिया बड़ा उन्हें,
पंख निकल रहे थे दोनों के, पैरों पर करती थी खड़ा उन्हें।
इच्छुक है हर इंसान कोई जमीन कोई आसमान के लिए,
कोशिश थी जारी उन दोनों की एक उँची उड़ान के लिए।
इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…
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कविता,
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शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
कहानी - बेबस लाठी - अर्चना सिंह 'जया'
बेबस लाठी... कहानी का अंश...
समाज एक व्यक्ति से नहीं बनता बल्कि परिवार, दोस्त व समुदाय से मिलते हुए समाज का निर्माण होता है। समाज में रिश्तों का रुप भी बदलता रहता है। आज के परिवेश में रिश्तों के बीच साॅंसें घुॅंटती नजर आ रही हैं। हमारे ताऊ जी जो कभी बोकारो के स्टेट बैंक में हुआ करते थे, उन्हीं के मित्र मिश्रा जी थे। दोनों में धनिष्ठ मित्रता थी, एक ही शहर ,मुहल्ले में रहा करते थे। किसी समय दोनों ही सरकारी नौकरी में कार्यरत थे, मिश्रा जी सरकारी स्कूल में थे इस कारण कभी कभार उनका तबादला भी हुआ करता था। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए,उन्होंने परिवार एक जगह रखने का निर्णय लिया। इस तरह बच्चों की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीें आई।
ताऊ जी ने जिस सोसाइटी में थोड़े सस्ते में घर लिया था उसी में मिश्रा जी ने भी लेने के विषय में सोचा, ताकि दोनों मित्र एक साथ बुढ़ापे की जिंदगी साथ में बिता सके। उन दिनों घर की कीमत एक दो लाख की थी किंतु अभी उन पर कई जिम्मेदारियों का दायित्व था। मिश्रा जी तीन भाई थे, माता-पिता इलाहाबाद के एक गाॅंव में रहते थे। माता जी का स्वर्गवास हुए आठ साल हो रहे थे, पिता जी अब मिश्रा जी के साथ ही रहते थे। मिश्रा जी के दो भाई गाॅव पर ही रहकर खेतीबाड़ी संभाला करते थे। सबसे बड़े भाई जरा अस्वस्थ रहते थे, उन्होंने शादी नहीं की थी। मिश्रा जी के बडे़ भाई समय-असमय अनाज व सरसों तेल उन्हें भेजवा दिया करते थे । इस तरह मिश्रा जी को मदद मिल जाया करती थी। यहाॅं संस्कार का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता था, भाइयों का आपसी तालमेल सही था। आज की पीढ़ी मदद करने से पूर्व सोचती है कि मैं ही क्यूॅं ?
मिश्रा जी की दो बेटियाॅं और एक बेटा था, तीनों की पढ़ाई, बाबू जी की दवादारु व पत्नी की जरुरतों का ध्यान रखते हुए जीवकोपार्जन हो रहा था। तनख्वाह ठीक-ठीक थी किन्तु मिश्रा जी बेटियों की शिक्षा में किसी भी प्रकार से कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। उनकी दृष्टि में बेटियों को शिक्षित करना यानि एक अच्छे परिवार व स्वस्थ समाज का निर्माण करना था, वहीं उनकी स्वयं की पत्नी आठवीं पढ़ी हुई थी । मिश्रा जी जिस जमाने के थे उस जमाने में बेटा पिता की बातों को नकार नहीं सकता था, विवाह की इच्छा उसकी है या नहीें, उसकी सोच क्या है? ये सारी बातें कोई मायने नहीं रखती थीं। इस प्रकार मिश्रा जी की शादी ,बस हो गई।
मुझे बुजुर्गों को आदर देने का ये तरीका आज तक समझ नहीं आया। क्यों हम अपने ही माता-पिता से मन की बात नहीं कर सकते, उनसे नहीं कहेंगे तो क्या पड़ोसी से दिल की बात करेंगे ? विवाह जैसे बंधन के लिए बच्चों से राय लेना व उनकी सहमति होनी जरुरी क्यों नहीं समझते थे ? मिश्रा जी पूरी जिंदगी आर्थिक जोड़ तोड़ में ही लगे रहे। पिताजी बीमार चल रहे थे, अचानक ही वे बहुत बीमार हो गए। लीवर कार्य करना बंद कर दिया और ब्लड प्रेशर अत्यधिक कम हो गया। अस्पताल में आई सी यू में भर्ती भी हुए किन्तु वे अगली सुबह भी नहीं देख पाए।
बाबू जी के देहांत के पश्चात् वे स्वयं को कमजोर महसूस करने लगे। कई कार्यों में उनसे सलाह भी लिया करते थे। बड़ी बिटिया की शादी की बात जो चल रही थी । एक वर्ष के पश्चात् बड़ी बेटी की शादी कर दी। दामाद कलकत्ता में ही, बैंक में कार्य करता था और परिवार भी शिक्षित व छोटा था। एक बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी, बस बुजुर्ग माता पिता ही थे जो साथ में रहते थे। मिश्रा जी को अच्छी शादी मिल गई थी। उनकी छोटी बेटी भी शादी योग्य हो ही रही थी किंतु बच्चों की पढ़ाई व घर खर्च चलाना एक चुनौती पूर्ण जिम्मेदारी थी।
मिश्रा जी का बेटा, सिर्फ बेटा न कहो, लाडला बेटा तो ज्यादा सही होगा। दो बेटियों के बाद का जो था। बहनों ने भी सिर चढ़ा रखा था। माॅं भी बेटा बेटा करते नहीें थकती थी। समाज में बेटे को बुढ़ापे की लाठी जो माना जाता है। मिश्रा जी तो अपने माता-पिता के लिए अंधे की लाठी साबित हुए, इसी के लिए हम रिश्तों के पौधें को सींचते रहते हैं ताकि एक दिन फल रुपी सुख व छाॅंव रुपी सहारा प्राप्त हो। बेटा अखिलेश अभी पढ़ ही रहा था पर उसकी रुचि पढ़ने में नहीं थी। मिश्रा जी सोचा करते थे कि अगर बेटे का ग्रेजुएट हो जाए तो सिफारिश करके किसी भी तरह नौकरी लगवा देंगे। अंततः बेटे ने ग्रेजुएशन कर ही लिया और नौकरी भी आरंभ कर दी। मिश्रा जी कुछ प्रसन्न रहने लगे कि बेटे ने भी कमाना आरंभ कर ही दियां। इसी बीच छोटी बिटिया की शादी की भी बात की शुरुआत हो गई। तीन महीने के बाद का दिन निर्धारित हुआ। छोटी बिटिया की शादी के दौरान बेटे अखिलेश की शादी की भी बातचीत का सिलसिला आरंभ हो गया किंतु मिश्रा जी ने एक-डेढ़ साल का समय मांगा और इस तरह उन्हें भी साॅंस लेने की फुर्सत मिली। इसी के साथ बेटे को डिस्टेंट लर्निंग के कोर्स में दाखिला करवा दिया।
अब घर कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था। पत्नी की भी तबीयत कुछ गड़बड़ रहने लगी थी। एक माॅं से बेटियों का खालीपन सहा नहीं जा रहा था, जैसे घर की रौनक ही चली गई थी। सूनापन काटने को आ रहा था। मिश्रा जी के रीटायरमेंट का समय नजदीक आता जा रहा था तभी उन्होंने घर खरीदने का निर्णय ले ही डाला। ताऊ जी से कह कर तीन कमरे का मकान ले लिया। ताऊ जी के एक मित्र का मकान था उसे पैसे की जरुरत आ पड़ी तो उसने चालू भाव में ही मिश्रा जी को घर बेच डाला। अब वो पल आ ही गया जब मिश्रा जी को अपनी नौकरी को हमेशा के लिए बाय कहना था। समय जरा दुःखद था पर ये तो सभी के जीवन में आता है। इज्जत के साथ अपने कार्य से मुक्त हुए ये तो गर्व की बात है-ऐसा कह पत्नी ने हौसला बढ़ाया, साथ ही अब मुझे ज्यादा समय भी दे पायेंगे। इस प्रकार मिश्रा जी अपनी पत्नी व बेटे के साथ अपने मकान में रहने लगे। कुछ ही सालों के पश्चात् बेटे ने अपनी नौकरी भी बदल ली और वह राँची चला गया। ताऊ जी और मिश्रा जी एक साथ समय व्यतीत करने लगे। इसके आगे की कहानी जानिए, ऑडियो की मदद से...
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
बुधवार, 8 फ़रवरी 2017
रामभक्त शबरी की कथा...
कथा का अंश...
शबरी का उल्लेख रामायण में भगवान श्री राम के वन-गमन के समय मिलता है। शबरी को श्री राम के प्रमुख भक्तों में गिना जाता है। अपनी वृद्धावस्था में शबरी हमेशा श्री राम के आने की प्रतीक्षा करती रहती थी। राम उसकी कुटिया में आयेंगे, इसी बात को ध्यान में रखते हुए वह अपनी कुटिया को सदैव साफ-सुथरा रखा करती थी। 'प्रभु आयेंगे', ये वाणी सदा ही उसके कानों में गूँजा करती थी। सीता की खोज करते हुए जब राम और लक्ष्मण शबरी की कुटिया में आये, तब शबरी ने बेर खिलाकर उनका आदर-सत्कार किया। यह सोचकर कि बेर खट्टे और कड़वे तो नहीं हैं, इसीलिए पहले वह स्वयं बेर चखकर देखती और फिर राम और लक्ष्मण को खाने को देती। शबरी की इस सच्ची भक्ती, निष्टा और सह्रदयता से राम ने उसे स्वर्ग प्राप्ति का वरदान दिया। स्वयं को योगाग्नि में भस्म करके शबरी सदा के लिये श्री राम के चरणों में लीन हो गयी।
शबरी का वास्तविक नाम 'श्रमणा' था और वह भील समुदाय की 'शबरी' जाति से संबंध रखती थी। शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का किया। विवाह के दिन निकट आये। सैकडों बकरे-भैंसे बलिदान के लिये इकट्ठे किये गये। इस पर शबरी ने अपने पिता से पूछा- 'ये सब जानवर क्यों इकट्ठे किये गये हैं?' पिता ने कहा- 'तुम्हारे विवाह के उपलक्ष में इन सब की बलि दी जायेगी।' यह सुनकर बालिका शबरी का सिर चकराने लगा कि यह किस प्रकार का विवाह है, जिसमें इतने प्राणियों का वध होगा। इससे तो विवाह न करना ही अच्छा है। ऐसा सोचकर वह रात्रि में उठकर जंगल में भाग गई। दंडकारण्य में हज़ारों ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। शबरी हीन जाति की और अशिक्षित बालिका थी। उसमें संसार की दृष्टि में भजन करने योग्य कोई गुण नहीं था, किन्तु उसके हृदय में प्रभु के लिये सच्ची चाह थी, जिसके होने से सभी गुण स्वत: ही आ जाते हैं। वह रात्रि में जल्दी उठकर, जिधर से ऋषि निकलते, उस रास्ते को नदी तक साफ़ करती। कँकरीली ज़मीन में बालू बिछा आती। जंगल में जाकर लकड़ी काटकर डाल आती। इन सब कामों को वह इतनी तत्परता से छिपकर करती कि कोई ऋषि देख न ले। यह कार्य वह कई वर्षों तक करती रही। अन्त में मतंग ऋषि ने उस पर कृपा की। महर्षि मतंग ने सामाजिक बहिष्कार स्वीकार किया, किन्तु शरणागता शबरी का त्याग नहीं किया। महर्षि का अन्त निकट था। उनके वियोग की कल्पना मात्र से ही शबरी व्याकुल हो गयी। महर्षि ने उसे निकट बुलाकर समझाया- 'बेटी! धैर्य से कष्ट सहन करती हुई साधना में लगी रहनां। प्रभु राम एक दिन तेरी कुटिया में अवश्य आयेंगे। प्रभु की दृष्टि में कोई दीन-हीन और अस्पृश्य नहीं है। वे तो भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं।' शबरी का मन अप्रत्याशित आनन्द से भर गया और महर्षि की जीवन-लीला समाप्त हो गयी। इसके आगे की कहानी जानिए ऑडियो की मदद से...
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कविता - मुठ्ठी भर मिट्टी - हंसराज सिंह वर्मा 'कल्पहंस'
मुठ्ठी भर मिट्टी... कविता का अंश...
मुठ्ठी भर मिट्टी स्वदेश की,
संग मैं अपने ले जाऊँगा।
उस अंजाने पराए देश में,
कुछ अपना, कुछ पहचाना ले जाऊँगा।
उस दूर देश में मां की गोद न सही,
उसके आंचल का चीर तो होगा।
मल लूंगा माथे पर आएगी जब यादे–वतन,
तन उद्विग्न, चित्त अशांत अधीर होगा।
अपने मकान के कोने में उसे सजाऊँगा,
निहारूंगा नित्य तब सुकून कितना मैं पाऊँगा।
सौंधी–सौधी सुगंध से महकेगा आंगन सारा,
बरसेगी असीम शांति, मिलेगा अक्षुण्ण सहारा।
पर मैं वह मिट्टी लूं कहाँ से?
रचा-बसा जिसमें मेरा भारत हो।
कण–कण में हो विविधता,
छलक–छलक उठे सौंदर्य,
रोम–रोम से झरती चाहत हो।
चलूं उठा लूं एक मुठ्ठी संसद के गलियारों से,
सुना संसद लघु भारत है।
बनता भारत उसके विचारों से,
मूढ़! कौन तुझे वहाँ जाने देगा?
मुठ्ठी भर मिट्टी तो दूर,
रत्ती भर हवा न लाने देगा।
ऐसा जकड़ा–जकड़ा मेरा भारत नहीं हो सकता।
हवा भी जहाँ पहरे में हो,
वहाँ प्रेम–बंधुत्व नहीं रह सकता।
क्यों न भर लूं एक मुठ्ठी, मंदिर के प्रांगण से!
नित्य पावन यह होती भागवत कथा के वाचन से।
शीतलता यह बहुत क्षीणकाय, पलती बडे़ नाज़ों से।
दहक उठती गिरजे की घंटी या अजान की आवाज़ों से।
इतना एकरंगी संवेदनाहीन,
मेरा भरत–पुरुष नहीं हो सकता।
लाख झंझावातों के भंवर में,
उसका इंद्रधनुष नहीं खो सकता।
बहुत सुहासित कण–कण शोभित, राजघाट की यह फुलवारी
भर लूं अंजुली क्या यहाँ से, सोया जहाँ प्रेम–पुजारी।
बापू नहीं, यहाँ हमने उनके सपनों को दफ़नाया है।
राख छुपाकर संगमरमर में आदर्शो का बाजार लगाया है।
विस्तृत फलक को संकुचित कर, देखा तनिक उजियारे में
वांछित मिट्टी को पाया मंैने, अपनी मैया के चौबारे में।
यह चूल्हा, जिसमें उनका सर्वस्व समाया,
झोंका अपना वजूद दीवारों को घर बनाया।
ममत्व का गूंथा आटा, अंकुर को वृक्ष बनाया।
त्याग की डाली खाद, फल को स्वादिष्ट बनाया।
यह चूल्हा जिसकी मिट्टी लाईं थीं वे उन खलिहानों से,
जिन्हें उर्वरा है बनाया, पुरखों ने अपने बलिदानों से।
खुरचन तनिक–सी इस चूल्हे की संग मैं अपने ले जाऊँगा,
अपने आराध्य को हो समर्पित स्वयं न्यौछावर मैं हो जाऊँगा।
इस कविता का आनंद आॅडियो की मदद से लीजिए...
संपर्क - ई–मेल : hamarahans@hotmail.com
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कविता,
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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कुछ कविताएँ - विनोद दवे
कविता का अंश...टेसू...
टेसू
पलाश के पुष्प ने,
अपने रंग से,
विपिन के ओर छोर पर,
आग लिख दी है।
फाग जब गाये जाएँगे,
होली के उत्तेजक गीतों में,
सुमन ये टेसू के,
अपना मादक रंग घोल देंगे।
भाँग पीये भंगेड़ी सा,
ये मौसम,
कहीं इन दहकते पुष्पों में,
गंध न घोल दे!
इसी चिंता में वृक्ष ने,
अपनी भुजाएँ फैला दी हैं।
इस रंग पंचमी को,
प्रिया के होंठों से सुर्ख इस सुमन को,
ढ़लते हुए सूरज की लाली सा,
कोई नाम तो दे दो।
टेसू तो विचित्र सा प्रतीत होता है
है न!
ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए....
davevinod14@gmail.com
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