सोमवार, 18 मई 2009

पिघल गई 26/11 की संवेदनाएँ


डॉ. महेश परिमल
हम सभी को याद होगा कि मुम्बई पर हुए हमले के बाद बुद्धिजीवियों में देश के नेताओं के खिलाफ काफी आक्रोश देखा गया था। लोगों ने कई तरह की रैली निकाली थी। कहीं मौन रैली, तो कहीं मोमबत्ती रैली। इस रैली में बुद्धिजीवियों ने संकल्प किया था कि देश की इज्जत को दाँव पर लगाने वाले नेताओं को सबक सिखाया जाएगा। इस माध्यम से बुद्धिजीवियों ने अपना एक स्वस्थ स्वरूप को दर्शाने की कोशिश की थी। उनके इस मौन आंदोलनों को कई लोगों ने सराहा था। तब ऐसा लग रहा था कि इस बार का चुनाव देश की दशा निर्धारित करेगा। निश्चित रूप से यह चुनाव एक मोड़ साबित होगा। पर केवल 5 महीनों में ही वह आक्रोश और सारी संवेदनाएँ मोम की तरह पिघल गई। इस बार भी चुनाव आम चुनाव की तरह रहा। धन का खुलेआम खुल्ला खेल खेला गया। आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ी, चुनाव आयोग ने इसे स्वीकारा भी और अपनी लाचारगी भी व्यक्त की। जहाँ चुनाव आयोग ही लाचार हो, तो फिर उस देश में स्वस्थ चुनाव की कल्पना ही कैसे की जा सकती है?
इस बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने कुछ ईमानदार कहे जाने वाले लोगों ने भी अपनी किस्मत आजमाई थी। लोगों के सामने एक अवसर आया था कि लीक से हटकर चलने वालों को वोट दिया जाए और संसद में भेजा जाए। ताकि संसद और सांसद की गरिमा बनी रहे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस बार दक्षिण मुंबई से एक महिला प्रत्याशी लोगों के सामने आईं, यह हैं मीरा सान्याल। बैंकिंग के क्षेत्र में एक उच्च अधिकारी का पद सँभालने वाली मीरा सान्याल में एक सांसद बनने की पूरी योग्यता है। मायानगरी में जीने वाले लोगों को एक अवसर मिला था कि वे इतिहास रच सकें। पर शायद नेताओं के आश्वासन उन्हें इतने अधिक भाते हैं कि उनकी आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बँध जाती है। मुझे या किसी को नहीं लगता है कि मीरा सान्याल जीत पाएँगी। पर मतदाता चाहते तो यह संभव हो सकता था। यही बुद्धिजीवी मतदाता, जिसने संकल्प लिया था कि देश की आबरु को नीलाम करने वाले नेताओं को इस बार सबक सिखाया जाएगा। इन्हीं उदासीन मतदाताओं के कारण ही ऐसे नेता संसद पहुँच जाते हंै, जो संसद की गरिमा को नहीं जानते। इसीलिए वे नागरिकों की अपेक्षा पर भी खरे नहीं उतर पाते। यही होता है कुछ लोग यह मानते हैं कि जो प्रत्याशी हमारे सामने हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जो हमारी अपेक्षाओं को पूरा कर सके। उनकी इसी विचारधारा के कारण वे वोट नहीं देते और ऐसे लोग संसद में पहुँच जाते हैं, जिन्हें वे नहीं चाहते।
मतदान का एक छोटा सा गणित यदि आपको समझ में आ जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसा कैसे होता है कि जिसे हम हराना चाहते हैं, वह जीत क्यों जाता है? वास्तव में कुछ लोग मतदाताओं की उदासीनता का ही लाभ उठाकर संसद तक पहुँच जाते हैं। मान लो, किसी मतदान क्षेत्र में 50 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें कोई प्रत्याशी 40 प्रतिशत मत पाकर जीत जाता है, तो इसका आशय यही हुआ कि उस क्षेत्र के 80 प्रतिशत लोग उस जीते हुए प्रत्याशी को नहीं चाहते। फिर भी वह जीत गया। इसे मतदाताओं की उदासीनता ही कहा जाएगा कि जिसे वे नहीं चाहते, वह जीत जाता है। ये लोकतंत्र है, जिसमें जिसे 80 प्रतिशत लोग नहीं चाहते, फिर भी वह जीत की खुशियाँ मनाता है।
अक्सर होता यह है कि चुनाव के ठीक एक दिन पहले सभी दलों के कार्यकर्ता शराब की नदियाँ बहा देते हैं, इसके साथ ही नोटों की गड्डियाँ भी बाँटी जाती है। इसका मतलब यह कतई नहीं होता है, जिसने उपरोक्त दोनों सुविधाएँ प्राप्त की हैं, वह उसे उपकृत करने वाले को वोट देगा। ऐसा नहीं है, इसके पीछे का गणित यही है कि सभी दल के लोग यही चाहते हैं कि इस क्षेत्र के लोग निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धी को वोट देंगे, तो उन्हें इतनी शराब पिलाई जाए कि दूसरे दिन वह वोट देने जाने की भी स्थिति में न हो। जितना कम मतदान, उतना ही अधिक फायदा। हर दल अपने चुनावी भाषण में यही कहता है कि अधिक से अधिक संख्या में मतदान करें। जिस दिन मतदान का आँकड़ा शत-प्रतिशत होगा, उस दिन तो निश्चित रूप से प्रलय ही आ जाएगा, क्योंकि वे सभी प्रत्याशी जो अब तक लोगों का खून चूसने का काम करते आए हैं, उनका नामो-निशान ही मिट जाएगा।
मतदान न करके लोग अपनी नाराजगी का ही इजहार करते हैं। पर यह गुस्सा जायज नहीं है। यदि सचमुच प्रत्याशियों से नाराजगी है, तो उसे वोट न देकर अपने गुस्से को बाहर निकाला जाए। हमारे लोकतंत्र में ही कहीं खामी है, जिसके तहत हमें सही प्रत्याशी चुनने का अवसर नहीं मिलता। अभी हमारे पास बेहतर विकल्प नहीं हैं। इसके लिए यही हो सकता है कि मतपत्र में एक कॉलम ऐसा भी होना चाहिए कि इसमें से कोई भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जिस पर हम विश्वास कर सकें। यदि उस पर अधिक लोगों ने अपनी मुहर लगाई है, तो उस क्षेत्र के प्रत्याशी बदले जाएँ, ताकि ईमानदार लोग सामने आ सकें। अब चुनाव जीतना बलशाली लोगों का काम हो गया है। आम आदमी चुनाव में खड़ा भी नहीं हो सकता। धन और बाहुबल से चुनाव जीता जा सकता है, यह इस चुनाव से सिद्ध भी हो गया है। यही बुद्धिजीवी वर्ग है, जो सजग है, इसीलिए वह वोट नहीं देता, पर जब अच्छे अवसर सामने आते हैं, तब वह सजग नहीं हो पाता। अकसर बुद्धिजीवी क्षेत्र में ही कम मतदान क्यों होता है, यह जानने की कोशिश की कभी किसी ने? आज भले ही वे वोट न डालकर अपने को बुद्धिजीवी कहलवा लें, लेकिन भविष्य में यदि मुगालता उन्हें कहीं का नहीं रखेगा, यह तय है।
डॉ. महेश परिमल

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