मंगलवार, 19 मई 2009

नेताओं की भाषा करती है चरित्र उजागर


डॉ. महेश परिमल
यह हमारे लोकतांत्रिक देश के लिए कितनी शर्मनाक बात है कि चुनाव आयोग को यह कहना पड़ रहा है कि नेता अपनी जुबान पर लगाम रखें। एक तरफ जनसैलाब देखकर नेताओं के भीतर खुशी का सागर उमड़ता है, वहीं दूसरी तरफ इस खुशी के मारे उनकी जबान फिसलने लगती है। यही कारण है कि इन दिनों अखबारों और टीवी पर नेताओं की फिसलती जबान सुखर््िायाँ बनने लगी हैं। उधर चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के आचरण पर चुनाव आयोग ने खासी नाराजगी जताई है। आयोग ने सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय व प्रादेशिक दलों के प्रमुखों व महासचिवों को पत्र लिखकर आचार संहिता की याद दिलाते हुए इसका पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
आयोग की सर्वाधिक नाराजगी इस बात को लेकर है कि प्रमुख पार्टियों के बड़े नेता चुनावी सभाओं में विरोधियों पर कथित रूप से न केवल गैरजरूरी और अमर्यादित टिप्पणियां कर रहे हैं, बल्कि जाति व धर्म के आधार पर भड़काऊ भाषण भी दे रहे हैं। स्थानीय रिवाजों के नाम पर खुलेआम पैसे बाँटने पर भी उसे आपत्ति है। आयोग का मानना है कि राजनेताओं का यह आचरण धीरे-धीरे परंपरा बनता जा रहा है, जो कि भविष्य के लिए चिंताजनक है। पत्र में आयोग ने सभी राजनैतिक दलों को आचार संहिता के प्रावधानों की याद दिलाते हुए कहा है कि उसे रोजाना बड़े पैमाने पर इसके उल्लंघन की शिकायतें मिल रही हैं। चुनाव प्रचार के दौरान सामाजिक वैमनस्य फैलाने की कोशिशों पर चिंता जताते हुए आयोग ने सभी दलों को सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया है। आयोग ने उम्मीद जताई है कि निष्पक्ष एवं भयमुक्त चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में सभी राजनैतिक दल अपने प्रचार अभियान में उच्च मानदंड स्थापित करेंगे।
आजकल हमारे नेताओं की भाषा उनका असली चरित्र उजागर कर रही है। यह उनके भीतर की एक खीज है, जो शब्दों के रूप में बाहर आ रही है। कोई ऐसा मुद्दा तो है नहीं, जिससे वे आक्रामक हो सकें, इसलिए भाषा के माध्यम से वे अपने आप को महान बताने में तुले हुए हैं। उन्हें शायद नहीं मालूम कि इस तरह के संवाद केवल फिल्मों और नाटकों में ही अच्छे लगते हैं। जहाँ एक ओर फिल्म वाले राजनीति में जा रहे हैं, वहीं फिल्मों के संवाद राजनीति में आने लगे हैं। नेताओं का यह वाणी विलास उनके लिए किस तरह के खतरे पैदा कर सकता है, यह तो 16 मई को ही पता चलेगा। पहली इस तरह की भाषा केवल दूसरे या तीसरे स्तर के नेता ही प्रयुक्त करते थे, प्रथम दर्जे के नेताओं की वाणी पर नियंत्रण रहता था। वे धीर-गंभीर होकर अपनी बात कहते थे। पर अब तो प्रथम दर्जे के नेता भड़काऊ भाषण करने लगे हैं। एक तरफ विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री को कमजोर प्रधानमंत्री बताने पर तुले हुए हैं, तो वहीं मनमोहन सिंह की तरफ से भी तीखे कटाक्ष किए जा रहे हैं।
गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान कांगे्रसाध्यक्ष का केवल एक वाक्य 'नरेंद्र मोदी मौत के सौदागर हैंÓ उन्हें महँगा साबित हुआ। क्योंकि नरेंद्र मोदी ने केवल इसी एक वाक्य को बार-बार सभाओं में दोहराकर लोगों से यही पूछा कि क्या मैं आपको मौत का सौदागर दिखाई देता हूँ? बस यहीं कांगे्रस मात खा गई और उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस बार फिर नरेंद्र मोदी कांगे्रस को बूढ़ी बताकर चर्चाओं में हैं। इसके जवाब में प्रियंका गांधी ने उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान पत्रकारों से पूछा- क्या मैं आपको बूढ़ी दिखाई देती हूँ? इसके जवाब में नरेंद्र मोदी ने कांगे्रस को गुडिय़ा कहा है। अब प्रियंका ने कहा है कि भाजपा के बूढ़े नेताओं को अरब सागर में डूबा देना चाहिए। क्या ऐसे लोगों के हाथों पर हम देश की सत्ता सौंपने जा रहे हैं, जो इस तरह की ओछी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं?
इस बार चुनावों में पहले से ही कांगे्रस की तरफ से सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का नाम सुनने को मिल रहा था, अचानक मेनका गांधी के पुत्र वरुण गांधी का नाम सामने आया, जब उन्होंने एक सभा में कहा-'' इन लोगों के नाम भी खूब डरावने होते हैं, यदि आप इनके नामों को रात के समय सुनो, तो घबरा ही जाओगे। यदि कोई हिंदुओं के सामने ऊँगली उठाए या सोचे कि हिंदू कमजोर हैं, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं वह हाथ ही काट डालूँगा।ÓÓ माफिया वाले भी इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करते, जो आजकल राजनेता कर रहे हैं। वरुण गांधी के भाषण की प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा कि ''यदि मैं गृहमंत्री होता, तो परिणामों की ङ्क्षचता किए बिना मुसलमानों के खिलाफ भाषण करने वाले वरुण गांधी को रोलर के नीचे कुचल डालता।ÓÓ इस बयान के खिलाफ जब पुलिस में रिपोर्ट की गई, तब लालू ने यू टर्न मारते हुए कहा था कि मेरा आशय कानून का रोलर था। इसके जवाब में राम विलास पासवान ने कहा कि 'यदि मैं रेल मंत्री होता, तो लालू प्रसाद के ऊपर टे्रन का इंजन चला देता।Ó भाजपा के इस नेता का बिहार में भले ही महत्व हो, पर राष्ट्रीय राजनीति में उनका महत्व थोड़ा कम है, इसलिए उनके इस बयान पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। सत्ता की कुर्सी पर बैठकर प्रजा की समस्याओं का समाधान करने वाले हमारे नेता अब डायलागबाजी से लोगों को भरमाकर वोट बटोरने का काम करने लगे हैं।
सभी नेता सोच-समझकर भाषण नहीं करते। कभी आवेश में आकर तो कभी हताशा के कारण उनके मुँह से कसैले शब्द फिसलने लगते हैं। उधर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कह दिया कि ''ये नीतिश कुमार कौन हैं? नीतिश कुमार (डाकू) लल्लन सिंह का साला है।ÓÓ हमेशा संयत वाणी का प्रयोग करने वाली सुषमा स्वराज भी कभी-कभी असंयत हो जाती हैं। एक बार संसद में ही उन्होंने शरद पवार को ललिता पवार कहा था। अब उन्होंने लालू यादव पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है ''लालू प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं, वे बिहार जेल के जल्लाद बन गए हैं, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।ÓÓ इसके जवाब में लालू यादव ने अपने इतिहास ज्ञान को बघारते हुए कहा ''यदि सुषमा स्वराज मुझे जल्लाद कहती हैं, तो वे पूतना मौसी हैं।ÓÓ हमारे नेता इस प्रकार की बयानबाजी से ही चुनाव जीतने की आशा रखते हैं।
हमारे नेता यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आज की जनता अब गंभीर बातों पर दिलचस्पी नहीं लेती, उन्हें मजाकिया भरे शब्दों वाली भाषा अच्छी लगती है, इसलिए वे इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। देश की आर्थिक नीतियों या सामाजिक सुधारों पर उनके विचारों को सुनने वाला कोई नहीं है। आज भी भारतीय मतदाताओं के लिए चुनाव एक तमाशा है। जो मतदाताओं का सबसे अधिक मनोरंजन कर सके, उन्हें ही अधिक वोट मिलते हैं। शायद इसीलिए मायावती ने मेनका गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा ''मेनका ने वरुण तंदुरुस्त लालन-पालन किया होता, तो उसे जेल में न जाना होता।ÓÓ इसका जवाब भी मेनका ने उसी तेवर के साथ कुछ इस तरह से दिए ''मायावती माँ होती, तो माँ की वेदना समझ सकती।ÓÓ
वास्तव में हमारे नेता चुनाव को एक लोकशाही प्रक्रिया न समझते हुए इसे एक युद्ध मानते हैं। जिस तरह से युद्ध और प्रेम में 'सब चलता हैÓ की तर्ज पर किसी भी तरह से जीत हासिल करना चाहते हैं। अब उनके शब्दकोश से विचारधारा और शालीनता जैसे शब्द ही गायब हो गए हैं। उधर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे कभी कहते हैं ''मराठी माणुस को भी प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। दूसरी ओर वे फिर कहते हैं कि किसी भी मराठी माणुस में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत ही नहीं है।ÓÓ आखिर ये क्या है? हमारे नेता यह न भूलें कि जो प्रबुद्ध हैं, उन्होंने तो चार दिन की छुट्टी के मजे लेने के लिए घूमने जाने का मन बना लिया है। अब तो केवल दलित, गरीब, लाचार, बेबस, हरिजन और आदिवासी मतदाता ही घर पर रहेंगे, वे ही वोट डालने जाएँगे। इन हालात में किसी प्रबुद्ध और ईमानदार प्रत्याशी के चुने जाने की संभावना बहुत ही कम है। जैसे मतदाता वैसे नेता, शायद यही है भारतीय मतदाताओं की नियति।
डॉ. महेश परिमल

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