बुधवार, 10 जून 2009

जेल वरदान है उन सबके लिए


डॉ. महेश परिमल
जेल यानी अपने किए की सजाओं को भुगतने का स्थान। कोई किसी को बद्दुआ भी नहीं देना चाहेगा कि वह ऐसी किसी जेल में जाए, जहाँ उसे अपनी सजा को शारीरिक पीड़ाओं के साथ भुगतना पड़े। अक्सर सलाखों के पीछे जाने वाले साधारण कैदी भी अपनी सजा पूरी करने के बाद एक खूंखार अपराधी के रूप में बाहर आते हैं। जेल से निकलने के बाद उसे रोजगार की तलाश होती है, जो उसे नहीं मिलता। इसलिए वह उन लोगों का आर्थिक संरक्षण प्राप्त करता है, जो उससे आपराधिक कार्य करवाते हैं। इस तरह से जेल उसके लिए बड़े अपराधी बनने का प्रशिक्षण केंद्र से अधिक कुछ नहीं होती। लेकिन यहाँ जिस जेल की चर्चा की जा रही है, उस जेल में हर कोई आना चाहता है। इस जेल में आने के पहले अपराधी को यह सिद्ध करना पड़ता है कि वह पेशेवर अपराधी नहीं है। आवेश में उससे गुनाह हो गया और वह जेल चला गया। इस जेल में अपराधी अपने परिवार के साथ घर में रहता है। शहर जाकर काम करता है। उसकी अपनी गाड़ी भी होती है, जिससे वह कहीं भी जा सकता है। इस जेल की एक खासियत यह भी है कि यहाँ महिला कैदियों को भी पुरुष कैदियों के साथ रखा जाता है, फिर भी महिला कैदी अपने-आप को सुरक्षित महसूस करती हैं। इस जेल के कैदियों का जीवन देखकर सामान्य आदमी को ईष्र्या हो सकती है।
यह जेल है राजस्थान के जयपुर हवाई अड्डे के पास स्थित सांगनेर 'ओपन जेल। मनीष दीक्षित इसी जेल के एक कैदी हैं। उसके पास कार है। वह आधुनिक सेलफोन का इस्तेमाल करता है। वह एक अत्याधुनिक घर में रहता है। वह एक सिविल इंजीनियर है। उसका रहन-सहन देखकर लगता है कि वह एक सफल व्यावसायिक है। वास्तव में वह एक हत्या के अपराध में सजा काटने वाला गुनाहगार है। पर वह अपनी सजा के 6 वर्ष ऊँची-ऊँची दीवारों वाली जेल में काटकर ही इस जेल में आ पाए हैं। बड़ी जेल में वे अपने स्वभाव से यह बताने में सफल रहे कि वे पेशेवर अपराधी नहीं हैं। बस उनकी इसी खासियत उन्हें इस ओपन जेल में ले आई।
राजस्थान सरकार ने सन 1963 में प्रयोग के तौर पर इस तरह की जेल की शुरुआत की थी। कुछ समय बाद यह प्रयोग इतना सफल रहा कि तीन और जेलें शुरू की गईं। अपराध को छोड़कर नया जीवन प्रारंभ करने का अवसर देने वाली इस जेल में अभी 504 कैदी सजा भोग रहे हैं। कुछ समय बाद यहाँ दस और खुली जेल बनाने की योजना है। इस जेल की कुछ और खासियतें हैं, यहाँ ऊँची-ऊँची दीवारें नहीं हैं और न ही कैदियों पर हर समय नजर रखने वाले बंदूकधारी सिपाही। इस जेल में करीब 170 सजायाफ्ता कैदी अपने परिवार के साथ रहते हैं। घर का भोजन करते हैं। उनके घर में टीवी, फ्रिज जैसी आधुनिक सुविधाएँ हैं। कई घरों के आँगन में कार आदि चार पहिया वाहन भी खड़े हैं। इस प्रकार की खुली जेल का प्रयोग राजस्थान के राज्यपाल संपूर्णानंद ने शुरू किया था। उन्हें इस तरह की खुली जेल की प्रेरणा पश्चिमी देशों से मिली थी। किसी भी सजायाफ्ता कैदी को तुरंत ही इस खुली जेल में नहीं लाया जाता। गंभीर अपराधों में शामिल होकर लंबी सजा काटने वाले कैदियों के अच्छे व्यवहार को ध्यान में रखकर उनका स्थानांतरण इस खुली जेल में किया जाता है। यहाँ आने के पहले उसे पारंपरिक जेल में कम से कम 6 वर्ष बिताने होते हैं। इसके बाद उस कैदी की शिक्षा भी देखी जाती है। शिक्षित लोगों के साथ यह होता है कि वे आवेश में आकर अपराध तो कर बैठते हैं, पर उसका पछतावा उन्हें जीवनभर होता है। इसी प्रायश्चित भरे जीवन को सँवारने का एक छोटा-सा प्रयास है, यह खुली जेल।
इस खुली जेल में कम खतरनाक कैदी अपनी सजा का अंतिम भाग अपने परिवार के साथ बिताते हैं। वे करीब के शहर में जाकर काम कर अपनी रोजी-रोटी प्राप्त कर सकते हैं। जेल परिसर में अपना घर भी बना सकते हैं। यहाँ आने के बाद बाद वे अपने जीवन को सँवारते हुए महिला अपराधियों से शादी भी कर सकते हैं। पूरे भारत में ऐसी 27 जेलें हैं। केवल राजस्थान ही ऐसा राज्य है, जहाँ अभी इस तरह की 13 जेल है। अगले वर्ष दस और जेल तैयार हो जाएंगी। इसके सफल होने का सबसे बड़ा कारण यही है कि यह जेल शहर से करीब होने के कारण यहाँ के कैदी शहर जाकर अपनी रोजी-रोटी के लिए काम कर सकते हैं। कई जेल तो विश्वविद्यालय की तरह हैं। जहाँ कैदी विभिन्न तरह के काम कर सकते हैं। कोई अपनी अधूरी शिक्षा को पूर्ण करने लगता है, तो कोई लेबोटरी टेक्नीशियन के रूप में काम कर रहा है। यहाँ एक और कैदी सूरजमल है, जो अपने जीजाजी की हत्या करने के बाद सजा भोग रहा है। उसे जोधपुर के एग्रीकल्चर रिसर्च स्टेशन के केम्पस में रखा गया है। यहाँ वह अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रहता है। जब वह बड़ी जेल में था, उसने फिलोसफी और पॉलीटिकल साइंस में अनुस्नातक किया था। रिसर्च स्टेशन के फार्म में काम करके वह हर महीने ढाई हजार रुपए कमा लेता है। इसके बाद वह वेल्डिंग का काम करके भी कुछ और धन प्राप्त कर लेता है। उसका मानना है कि इस खुली जेल ने उसे कुशल व्यवसायी बना दिया है। सजा पूरी होने के बाद भी उसे अपने पाँव पर खड़े होने में कोई परेशानी नहीं होगी। राजस्थान के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस पी. के. तिवारी मानते हैं कि वे यहाँ के हर अपराधी के जीवन से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। एक-एक कैदी के जीवन की कहानी दिलचस्प है। इस पर तो शोध भी हो रहे हैं।
इस जेल की परिकल्पना आदर्श जेल की तरह है। कैदी यहाँ आकर अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने का ही काम करते हैं। इससे उनके पुनर्वसन की समस्या आड़े नहीं आती। इसके बाद भी इस जेल से जुड़े कुछ अपवाद भी हैं। सन 1989 से 1997 तक इस जेल से 7 कैदी भाग भी चुके हैं। 1998 से 2008 तक यह आँकड़ा 32 तक पहुँच गया। इसके बाद भी यहाँ आकर यदि किसी कैदी ने यहाँ के नियम-कायदों को अनदेखा किया, उसे वापस बड़ी जेल भी भेजा गया है। फिर भी अधिकांश कैदियों का मानना है कि यहाँ आकर जब उनकी शिक्षा और व्यवसाय दोनों ही सफलीभूत हो रहे हों, तो फिर इस जेल के नियमों को मानने में कोई बुराई नहीं है। फिर यहाँ का स्वच्छंद जीवन फिर भला कहाँ मिलेगा?
इस तरह के विचारों और कैदियों के समग्र विकास की अवधारणा को लेकर खोली गई ये खुली जेल आज कैदियों के लिए वरदान साबित हो रही है, इसमें कोई शक नहीं।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 9 जून 2009

दक्षिण भारत में बदल रहा है हिंदी के प्रति दृष्टिकोण


डॉ. महेश परिमल
पिछले माह गोवा जाना हुआ, उसके पहले एक बार चेन्नई जाने का अवसर मिला था। इन दोनों स्थानों पर जाकर ऐसा बिलकुल ही नहीं लगा कि मैं किसी अहिंदीभाषी क्षेत्र में हूँ। गोवा तो खैर पर्यटन के कारण हिंदी को महत्व दे रहा है। पर चेन्नई, वह तो हिंदी का घोर विरोधी रहा है। वह हिंदी के प्रति इतना नर्म क्यों होने लगा भला? एक तरफ देश और समाज में कंप्यूटर का प्रयोग बढ़ रहा है, जिसे सारे निर्देश अँगरेज़ी में ही देने होते हैं, तो दूसरी तरफ दक्षिण भारतीय फिल्मों में कहीं-कहीं हिंदी के संवाद सुनने को मिलने लगे हैं। अब तो चेन्नई में भी विभिन्न स्थानों पर बिहारी, भोजपुरी, गुजराती ढाबे दिखाई देने लगे हैं। चेन्नई के सावकार पेठ इलाके पर चले जाओ, तो पता ही नहीं चलेगा कि हम किसी अहिंदीभाषी क्षेत्र में हैं। इस स्थान पर मारवाडिय़ों एवं गुजरातियों की भरमार है।
हिंदी को लेकर अब कहीं-कहीं पूर्वग्रह के बादल छँट रहे हैं। तमिल फिल्मों में उत्तर-दक्षिण लोगों का रोमांस दिखाया जा रहा है। पहले चेन्नई पहुँचकर रिक्शेवाले से बात करना मुश्किल होता था, उसे तमिल के सिवाय कोई भाषा नहीं आती थी, पर वे भी समझने लगे हैं कि बिना हिंदी जाने और बोलने के सिवाया उनके पास कोई चारा नहीं है। इसलिए उन्होंने भी हिंदी को सहजता से लेना शुरू कर दिया है। बदलते सिनेरियो के बीच अब हिंदी के प्रति नजरिया बदलने लगा है। फिल्म 'दशावतारम्Ó में कमल हासन के दस पात्रों में एक पात्र अवतार सिंह का भी है, जो भांगड़ा करता सिख है। एक और तमिल फिल्म है 'अभियुन नानुमÓ (अभि और मैं) में एक पात्र प्रकाशराज अपनी पत्नी से कहता है 'राजम्मा कोटु दाÓ अर्थात् मुझे राजमा परोसो। इस फिल्म में प्रकाशराज एक ऐसे तमिल व्यक्ति की भूमिका कर रहे हैं, जिसकी पुत्री एक सिख युवक से शादी कर घर ले आती है। इससे घर का वातावरण बदल जाता है। हिंदी परिवार की मुख्य भाषा बन जाती है। कालांतर में उसकी पत्नी भी हिंदी बोलने लग जाती है। इतना ही नहीं डायनिंग टेबल पर अब सांभर या रसम के बजाए दाल मखानी और राजमा परोसा जाने लगता है। यह देखकर घर के मुखिया प्रकाशराज भीतर ही भीतर कुढऩे लगते हैं।
एक और उदाहरण:- चेन्नई के मध्यम वर्ग की बस्ती अन्नानगर में योग की क्लास चल रही है। एक विद्यार्थी क्लास में देर से पहुँचता है। इस पर शिक्षक उसे तमिल में डाँटते हुए कहते हैं कि कल से यदि तुम देर से आए, तो तुम्हें गुरु बनकर क्लास लेनी पड़ेगी। इस पर देर से आने वाले छात्र के मुँह से निकल पड़ता है 'अच्छा, यह तो बहुत ही मुश्किल होगा।Ó विद्यार्थी ने 'अच्छाÓ शब्द मुँह से निकाला, पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया, किसी की भवें नहीं तनीं। इसका मतलब यही कि अब इस प्रकार के शब्द उनकी भाषा में प्रचलित होते जा रहे हैं। उपरोक्त प्रसंगों से यह साफ हो जाता है कि राजनीति के क्षेत्र में दक्षिण भारत के लोग भले ही हिंदी को अनदेखा कर रहे हों और उसके विरोध में अपना परचम लहराना न भूलते हों, पर आम-आदमी में हिंदी का विरोध अब दिखाई नहीं देता। अब वहाँ भी हिंदी फिल्में जुबली मनाने लगी हैं।
दक्षिण भारत की फिल्मों की कहानी उत्तर भारतीय पात्र होने लगे हैं। अब यह पात्र तो अपनी बात हिंदी में ही करेगा। कुछ ऐसा ही हुआ फिल्म 'वारानाम आपीरामÓ नामक तमिल फिल्म का नायक आर्मी में मेजर है। एक सीन में मेजर डॉन के अड्डे पर एक अपहृत बच्चे को छुड़ाने जाता है, तब डॉन उससे पूछता 'क्या तू पुलिस हैÓ? जवाब में मेजर कहता है 'हाँ मैं पुलिस हूँ और थोड़ी देर में पुलिसवाले सरेंडर करेंगे।Ó इस संवाद को उचित ठहराते हुए फिल्म के डायरेक्टर गौतम वासुदेव मेनन कहते हैं कि हीरो दिल्ली का रहने वाला है और हिंदी में बात हो, ऐसी माँग स्क्रिप्ट में की गई थी। इसलिए मैंने अधिक सोच-विचार न करते हुए डायलॉग को हिंदी में ही रहने दिया।
अब आते हैं खान-पान पर। अध्ययन के लिए कई राज्यों के लोग अब चेन्नई जाने लगे हैं। वहाँ उन्हें भोजन के सिवाय अन्य कोई तकलीफ नहीं होती। ये विद्यार्थी जब भी अपने घर फोन पर बात करते हैं, तो भोजन की समस्या पर अवश्य बात करते हैं। जो मांसाहार ग्रहण करते हैं, उनके लिए कोई विशेष समस्या नहीं होती, पर शाकाहारियों के भोजन एक विकट समस्या है। इसलिए सन 2004 में गौरव कुमार नाम के एक विद्यार्थी ने 20 हजार रुपए की अपनी पूँजी और कुछ दोस्तों से लेकर एक ढाबा शुरू किया, इसके लिए उसने भागलपुर से एक कुक भी बुलवा लिया, आज उसका ढाबा चल निकला है, अब वहाँ ने केवल बिहार के, बल्कि अन्य राज्यों के विद्यार्थी एवं प्रोफेसर भोजन के लिए आने लगे हैं। आज उसके ढाबे में 5 अन्य लोग भी काम करने लगे हैं। महीने में 8 से 10 हजार रुपए वे आसानी से कमा लेते हैं। इसकी देखा-देखी में अब चेन्नई में करीब 20-25 ढाबे विभिन्न प्रांतों से आए विद्याथर््िायों ने खोल लिए हैं। अब वहाँ गुजराती होटल, मारवाड़ी बासा,विशुद्ध शाकाहारी भोजनालय आदि के बोर्ड आसानी से देखने को मिल जाते हैं। निश्चित यहाँ आने वाले लोग हिंदी में ही बातचीत करते होंगे। यदि यहाँ स्थानीय लोग भी आते हैं, तो उन्हें भी हिंदी में ही बोलना पड़ता है। तो इस तरह से हिंदी अनजाने में उनके भीतर शामिल हो रही है, जिसे वे अच्छी तरह से समझ रहे हैं।
अब आते हैं राजनीति पर, जब करुणानिधि ने राम सेतु पर अपना विवादास्पद बयान दिया, तो उसका काफी विरोध हुआ। इससे बचने के लिए दूसरे ही दिन उन्होंने अपना बयान बदल दिया और राम भगवान की प्रशंसा पर कई कसीदे गढ़े। यही नहीं उन्होंने हिंदी में लिखी कविता भी सुनाई। अब इसे क्या कहा जाए? राजनीति के बाहरी स्वरूप में हिंदी का विरोध करने वाले यह समझने लगे हैं कि हिंदी के बिना उनका गुजारा नहीं हो सकता। इसलिए हिंदी विरोधी होते हुए भी हिंदी का खुलकर विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। दूसरी ओर 2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान द्रमुक के एक प्रत्याशी ने अपने इलाके के 20 हजार हिंदीभाषियों को रिझाने के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की। बाद में विरोध के चलते पुस्तिका वापस ले ली गई। इसका आशय यही हुआ कि हिंदी का विरोध केवल वे बाहरी तौर पर करते हैं। दिल से नहीं।
कला विश्लेषक और लेखक सदानंद मेनन कहते हैं कि तमिल फिल्में अब समग्र भारत के दर्शकों के लिए बनाई जा रही है, इसलिए तमिल फिल्मों की हिंदी का प्रभाव अनिवार्य बन गया है। एक सिनेमाप्रेमी और कम्युनिकेशन कंसल्टंट राधारमन का कहना है कि लोग अब हिंदी विरोधी नहीं रहे। तमिलनाड़ु की आईटी कंपनियों में अनेक हिंदी शब्दों का प्रयोग होता है। इस कारण अब दक्षिण भारतीयों का सम्पर्क उत्तर भारतीयों से होने लगा है। उनमें अब भाषा का भेद गौण होने लगा है। इसलिए जब कमल हासन की पहली फिल्म 'एक दूजे के लिए आई थी, जिसमें एक दक्षिण भारतीय युवक का प्रेम उत्तर भारतीय लड़की से होता है, तो समाज इस संबंध को स्वीकार नहीं कर पाता। अंतत: उन दोनों को आत्महत्या करनी पड़ती है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं, अब हिंदी के प्रति उन्हें हृदय से घृणा नहीं है, यदि थोड़ी-बहुत है, तो उसका कारण राजनीति है। अब लोग बेखौफ होकर दक्षिण भारत जा सकते हैं, अब उन्हें न तो भाषा की दिक्कत झेलनी होगी और न ही भोजन की।
पूर्वोत्तर के होंठों पर हिंदी
मंत्रिमंडल की सबसे युवा सदस्य अगाथा संगमा को हिंदी में शपथ लेते देखना सुखद और विस्मयकारी था। केवल एक जगह 'अंत:करण पर वह थोड़ा अटकीं, लेकिन इसके अलावा उन्होंने बिल्कुल साफ धाराप्रवाह हिंदी में शपथ ली। 'संसूचितÓ जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्दों पर भी उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। इससे पहले टीवी चैनलों पर उन्हें अच्छी अंग्रेजी बोलते हुए सुन ही चुके हैं। यह बताता है कि युवा भारत बहुभाषीय है और व्यापक देश तक पहुँचना चाहता है। संगमा की यह पहल मुख्यधारा से लगभग कटे पूर्वोत्तर इलाके को बाकी देश से सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से जोडऩे में मददगार होगी।

डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 8 जून 2009

कुछ आस, जिस पर टिकी हैं नजरें


किशोर महबुबानी
इस वर्ष दुनिया पर निराशा और दुर्भाग्य के काले बादल मंडराते रहेंगे. अर्थव्यस्था धन के लिए मोहताज रहेगी, सरकारें गिरेंगी और कंपनियां असफ़ल होती जायेंगी. इन वैश्विक परेशानियों के अलावा, जो सबसे बड़ा खतरा वैश्विक समुदाय के सामने होगा, वह है निराशा की मानसिकता का घर कर जाना. इससे बचने का सिर्फ़ एक ही उपाय हो सकता है कि कुछ बड़ी मुश्किलों को सुलझाया जाये. दोहा में संपन्न हुए विश्व व्यापार वार्ता ने इसके लिए एक सुनहरा अवसर प्रदान किया, लेकिन इससे भी कारगर मौका हमें इस्रइल और फ़िलिस्तीन विवाद ने दिया है.दुनिया के अधिकतर लोग, खास कर पश्चिमी देशों के लोगों ने खुद से यह मान लिया है कि यह मसला सुलझाने लायक नहीं है. ओस्लो में संपन्न हुए 1993 के समझौते के बाद भी अरब-इस्राइल के संघर्ष को सुलझाने के लिएकाफ़ी प्रयास किये गये. लेकिन ये सारे प्रयास विफ़ल रहे. दुनिया के कुछ लोगों का मानना है कि इसके समाधान के लिए कुछ वैश्विक ताकतें आगे आयी हैं, जिससे इसके समाधान की आशा बंधती नजर आ रही है. ऐसे भू-राजनीतिक अवसर कम ही मिलते हैं. इसलिए, अगर इसे नहीं भुनाया गया तो दुर्भाग्य ही कहा जायेगा.शुरुआती दौर में इस मसले को सुलझाने के लिए एक विश्वव्यापी समझौते की जरूरत पड़ेगी. इसका समाधान 2001 में बिल क्िलंटन द्वारा तैयार ताबा समझौता हो सकता है. फ़िलिस्तीन के राजनयिकों ने इसे मानने पर हामी भी भरी है.इसके समाधान निकल आने की बात जितनी अहम है, उतनी ही अहम अरबों के मन में इस ख्याल का आना है कि अरब-इस्रइल समाधान उनके हित में है. मध्य-पूर्व के ज्यादातर देश, जिसमें मिस्र् और सऊदी अरब शामिल हैं, उनके क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव को लेकर सावधान हैं. इस्रइल के साथ इनका कोई भी समझौता ईरान को संभालने के लिए इन्हें मजबूत बनायेगा. इसके साथ ही ईरान के उस मंशा पर भी आघात लगेगा, जिसमें वह फ़िलिस्तीनियों को अरब देशों के खिलाफ़ भड़काता है. इससे जुड़ा बड़ा सवाल यह है कि क्या इजरायल इसके समाधान के लिए तैयार है? लेकिन इस्रइल के आंतरिक राजनीतिक स्थिति को देखते हुए वहां के अधिकतर संभ्रांत लोगों का मानना है कि अभी इस्रइल के लिए यह उपयुक्त समय नहीं होगा.इस्रइल के विदेश नीति की कमान अभी दो कट्टर लोग बेंजामिन नेतनयाहू और ऐवगडर लिबरमैन के हाथों में है. नेतनयाहू को अभी एक वैसे शांति समझौते की जरूरत है, जो पश्चिमी किनारे स्थित सभी तरह के सेटलमेंट को वापस कर ले. 1997 में जब मैं इस्राइल गया था, तब के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने मुङो बुलावा भेजा. हमारे बीच एक अच्छा रिश्ता था, क्योंकि हम दोनों एक ही साथ संयुक्त राष्ट्र में राजदूत रहे थे. उस वक्त नेतनयाहू ने जो बात मुझसे कही थी, वह मुङो अब तक याद है. उनका कहना था कि वे शांति के पूरी तरह से पैरोकार हैं. लिबरमैन और एहुद ओलमर्ट भी एक साझा गुट बना कर शांति को अंजाम दे सकते हैं.किसी भी शांति समझौते को अंजाम देने के लिए एक सशक्त मध्यस्थ की आवश्यकता होती है. सौभाग्यवश, इस काम के लिए अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्िलंटन तैयार हैं. हिलेरी के दोनों पूर्वाधिकारी कॉलिन पॉवेल और कोंडोलिजा राइस ने इस काम पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इन लोगों ने दोनों पक्षों का विश्वास नहीं जीता. लेकिन हिलेरी ने ऐसा किया है. यहूदी समुदाय को हिलेरी में बहुत ज्यादा विश्वास भी है और यह बात मध्य-पूर्व में मध्यस्थता के लिए काफ़ी मायने रखती है.वर्ष 2009 में हिलेरी ने इस क्षेत्र का दौरा कर अपने राजनयिक गुण- कौशल का परिचय भी दे दिया है. उन्होंने दौरे के दौरान इस्रइल के सुरक्षा का आश्वासन दिया था. गाजा के नागरिकों पर होने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर चिंता जतायी थी. मामले सुलझाने की उनके निपुणता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. उनके पति बिल क्िलंटन ने मध्य-पूर्व की समस्याओं के बारे में काफ़ी अध्ययन किया है. इसकी झलक उनके द्वारा पेश की गयी इस क्षेत्र से संबंधित समाधान उपायों में देखी जा सकती है. नि:संदेह, जिस काम को उनके पति ने शुरू किया, अगर वे समाप्त करें, तो इसे बहुत अच्छा माना जायेगा. इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि अगर हिलेरी अरब-इजरायल समस्या का समाधान दो देशों को बना कर करें, तो इस मध्यस्थता के लिए उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिलेगा. समाधान के इस तरीके को पूरी दुनिया में सराहा जायेगा.कुछ अमेरीकियों को यह पता है कि मुसलिम जगत में हो रही तेज भौगोलीक बदल ने दुनिया के सवा अरब मुसलमानों को एक साथ बांधा है. अरब-इस्रइल मतभेदों का नकारात्मक राजनीतिक प्रभाव इसलाम जगत के सभी देशों को प्रभावित किया है. बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनना और मुसलिम देशों में उनकी सकारात्मक छवि ने इस मसले को सुलझाये जाने की एक नयी राह बनायी है. वैश्विक ओर्थक मंदी के इस समय में अगर शांति का यह समाधान हो जाता है, तो दुनिया पर छाने वाले निराशा और दुर्भाग्य के बादल कम होते नजर आयेंगे. आशा पूरी होने की बात तभी सफ़ल हो पायेगी, जब दुनिया क्या चाहती है, इसे पूरा किया जाये.
किशोर महबुबानी
(लेखक नेशनल यूनिवर्सिटी, सिंगापुर में डीन हैं.)

शनिवार, 6 जून 2009

बीहड़ में कूदने के इत्ते सारे कारण...


अनुज खरे
मेरे पास इत्ते सारे रेडीमेड कारण हैं चंबल के बीहड़ में कूदने के । कारण नंबर एक तो यही है कि इस समय चंबल में डकैतों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। चूंकि अधिकांश शहरों में ही सैटल हो गए हैं सो मेरे लिए मैदान साफ है। शहरों में भी इनमें से कई तो बाल छोटे करवाकर पुलिस में भर्ती हो गए हैं। अब वे हर मौके पर इत्ते भयानक ढंग से डकै ती के चांस ढूंढते रहते हैं की उनसे बचकर कहां जाओगे। मान लो उनके शिकार हो ही गए तो शिकायत करने कहां जाओगे, क्योंकि ऊपर भी तो उन्हीं जैसे पुराने प्रमोशन पाकर जमे हुए हैं। अर्थात् जब कहीं कोई राहत नहीं मिलेगी तो आखिर में कूदोगे न बीहड़ों में। बंदूक-अंदूक का तो यार बाद में भी इंतजाम होता रहेगा। वैसे आदमी गैरतमंद होगा तो फालतू के पचड़े में पडऩे की जगह गुब्बारे फोडऩे वाली बंदूक तक लेकर चंबल में कूद सकता है। चूंकि महत्वपूर्ण साध्य की राह में साधनों का ज्यादा महत्व नहीं है। हालांकि साधनों के संबंध में भी डर आम लोगों से ही है। पुलिसवाले तो खैर असली-नकली में ज्यादा अंतर नहीं जानते, लोग जरूर पहचान सकते हैं। खैर इन सबकी अभी से चिंता करने की जरूरत ही क्या है। पहले कूदेंगे फिर देख लेंगे।
इसी तरह कारण नंबर दो भी है। सफेदपोश नेताओं के चंगुल से आप कैसे बचोगे। हालांकि ऐसा नहीं है कि नेता देश का कल्याण नहीं करते। करते हैं, देश का ही तो कल्याण करते हैं। इनकी कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत घर से ही होती है। पहले भाई का कल्याण, फिर भतीजे का कल्याण, फिर भांजे का, सगों से निपटने के बाद चचेरों का, उनके पश्चात दोस्तों का, फिर कुछ हमप्यालों का, फिर एकाध कल्याणकारी योजना -अपनी उनके- लिए भी खोल दी जाती है, फिर अपने भविष्य के दृष्टिगत कुछ महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं का तत्काल शिलान्यास कर दिया जाता है। हालांकि होता ये सब देश के नाम, जिम्मेदारी के तहत, कत्र्तव्यों के निर्वहन के अनुरूप ही है। अब आप ही सोचिए इन सबमें -हम- कहां हैं। इसी कारण हमारे जैसे लोग अंतिम विकल्प के रूप में बीहड़ों से निकलते समय चलती बस से छलांग लगाकर वहां कूद ही जाएंगे ना। ताकी समान पेशे में आकर आपस में विशुद्ध समरसता का निर्माण किया जा सके। फिर वो कहावत तो सुनी होगी आपने-चोर-चोर मौसेरे भाई। यानी जब हम उनके मौसेरे भाई हो जाएंगे तो कुछ कल्याणकारी योजनाएं हमारे लिए भी तो शुरू की जाएंगी ही...। और इस बारेे में आपकी कोई बात हम नहीं सुनेंगे भाई साब..नईं-नईं आप हमें मना मत करियो हम तो कूदेंगे ही...।
अब इसी तरह ऊपर की इतनी सौजन्यताभरी प्लानिंग के बाद आप हमारे कारण नंबर तीन पर आइए...
हमारी अफसरशाही के काटे किसने पानी मांगा है। एक बिलकुल निजी कहावत है। कहावत निजी इसलिए है कि इसकी जानकारी केवल भुगतभोगियों को ही है। तो कहावत है कि यदि आपको अफसरशाही से काम करवाना हो तो आपको ईश्वर का विशेष कृपापात्र होना चाहिए। क्योंकि तभी वो आपको दीर्घायु होने का आशीर्वाद प्रदान करेंगे, तभी आप निरंतर दशकों तक अपना अपना काम करवाने के लिए अफसरशाही के पीछे पड़ सकेंगे। क्योंकि छोटी सी उमर के बूते क्या तो आप फाइल चलवा सकोगे, क्या तो नोटिंग करवा सकोगे, क्या तो सही आदमी का पता लगा सकोगे, क्या तो सेटिंग बिठा सकोगे, क्या तो पइसे का इंतजाम कर सकोगे, क्या तो जूते-चप्पलों के घिस जाने पर नये खरीदने का खर्चा उठा सकोगे, यानी क्या-क्या के चक्कर में ही मैन उमर गुजर जाएगी। बुढ़ापे में कहां से तो ऑफिसों के चक्कर लगा पाओगे। हालांकि आप ये भी सवाल उठा सकते हैं कि ईश्वर के विशेष कृपापात्र होते तो आप भी अफसरशाही का हिस्सा होते, मंगतारों की भीड़ में क्यों खड़े होते। तो भाई साहब जब आदमी बीहड़ों में कूद ही जाएगा तो मंदी के दौरान बीच-बीच में ईश्वर की तपस्या आदि का काम भी कर लेगा। ईश्वर से इस विषयक अनुनय-विनय या पूछताछ भी कर ही लेगा, और नहीं तो क्या? नहीं तो आप क्या मानके चल रहे हो कि पूरे समय घोड़े पे लदे रहकर डकैती ही चलती रहती है क्या? नित्यकर्म और दीगर कर्म क्या ऑर्डर देकर करवाए जाते हैं...हालांकि तपस्या आदि मामले में भी ज्यादा ही गहराई भी आ गई तो इसमें ये चांस भी निहित है कि भगवान भले ही दीर्घायु होने का आशीर्वाद न दे लेकिन नेता बन जाने का आशीर्वाद तो दे ही सकता है। यानी बिना आपका पेशा बदले आपकी तपस्या से प्रसन्न होकर आपको लुटेरों को लूटने वाला डकैत हो जाने का वरदान दे सकते हैं।
इसी तरह आप कारण नंबर चार पर जाएं तो यहां आपको अपने यहां की स्वास्थ्य सेवाएं से प्रताडऩा के चलते चंबल में उतरने की बात मिलेगी। सरकारी अस्पतालों में जाओ तो आदमी के दिल से नरक का डर खत्म हो जाता है। धरती पर ही अस्पताल के बाहर के जीवन को स्वर्ग मान लेने के प्रति आश्वस्त हो जाता है। ऐसा इसलिए भी होता है कि अपने यहां डॉक्टरों से कहीं ज्यादा जानकारी कंपाउंडरों को होती है। कंपाउंडरों से ज्यादा जानकारी मेडिकल स्टोर वाले रखते हैं। मेडिकल स्टोर से ज्यादा जानकारी एम आर के पास होती है। उससे भी ज्यादा जानकारी आपको दादा-दादी, नाना-नानी फ्री फोकट में घर बैठे ही दे देते हैं। इतनी जानकारियों के आधार पर आदमी खुद ही जान जाता है कि बीमार पड़ो तो इलाज-विलाज के चक्कर में ना पड़ो। क्योंकि पड़े और वाया सरकारी अस्पताल प्राइवेट नर्सिंग होम में पहुंचे तो फिर बिल आने पर रकम के इंतजाम के लिए आपके पास बीहड़ में कूदने के अलावा कोई रास्ता है भला...।
तो एकाएक आपको भी मेरी बातों में भारी गहराई, कारणों में भारी तर्क दिखाई देने लगे होंगे। ज्यादा द्रवित होकर कहीं आप डकैती वाले सूट का ऑर्डर देने तो नहीं जाने वाले। अच्छा आपकी चिंता घोड़े को लेकर है। क्या? आप इस बात को लेकर परेशान है बीहड़ में मच्छर ज्यादा तो नहीं, गर्मियों में कूलर-एसी कहां फिट करेंगे। वहां लाइट-आइट की कटौती का ठीकठाक आइडिया नहीं है। आपको मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने का शौक है, कैसे देखेंगे वहां.... तो भाई साब आपके बस के नहीं हैं ये काम। हालांकि में भी अभी तक कारणों में ही अटका हूं। मेरी भी अभी तक प्लानिंग ही चल रही है। क्या करूं आम आदमी हूं ना प्लानिंग ही कर सकता हूं, एक भी देशवासी ने अपनी प्लानिंग को सही तरीके से क्रियांवित किया होता तो देश का ये हाल होता भला। खैर आपको एक बात बताऊं मैंने बचपन से सैकड़ों प्लानिंगें की हैं। कुछ तो वक्त से इतने आगे की हैं कि अभी उनके लिए वक्त ही नहीं आया है। हालांकि अपनी इतनी प्लानिंगों के बाद फिर मेरे दिमाग में एक और प्लानिंग आ रही है कि क्यों न में इन सारी प्लानिंगों पर एक किताब ही छपवा लूं, और छोटा-मोटा मैनेजमेंट गुुरु ही हो जाऊं। आखिर जनता को नए-नए आइडिए और राह दिखाने का काम किसी को तो करना ही है तो मैं क्यों नहीं? तो ऊपर वाले आइडिए की प्लानिंग कैंसिल करके इस आइडिए को कार्यरूप में परिणित करने में जुट जाऊं, क्या कहते हैं आप... क्या? आप ही मुझे मार के चंबल में कूद जाएंगे जो मैंने किसी को ऐसे आइडिए दिए तो... ।
इति।
अनुज खरे

शुक्रवार, 5 जून 2009

प्रकृति को निहारने के लिए बस कुछ इंतजार...


आज है पर्यावरण दिवस। प्रकृति ने अभी पूरे मानव जगत से रुठी हुई है। इसलिए वह अपना प्रकोप दिखा रही है। इस मानव जाति ने प्रकृति के साथ जो छेड़छाड़ की है, उसे वह कभी माफ नहीं करेगी। इसीलिए अभी वह अपना प्रकोप दिखा रही है। बस थोड़ा-सा इंतजार और कर लें। अभी प्रकृति उन दुष्टों के लिए व्यूह रचना तैयार कर रही है, जो उसे खिलौना समझते हैं। बहुत ही क्रूर है प्रकृति, वह नहीं छोड़ेगी, इन दुष्टों को। खूब दंड देगी, कड़ा दंड देगी। आज जो पानी बरबार कर रहे है, उन्हें वह ऐसे स्थानों पर भेजेगी, जहाँ कई दिनों तक पानी के दर्शन ही नहीं होते। संभव है, वह ऐसे हालात पैदा कर दे, जिससे पानी बरबाद करने वाला 5 किलोमीटर दूर से एक बाल्टी पानी लाने लगे। तरसा-तरसाकर दंड देगी उन्हें। आज जो पेड़ों को काट रहे हैं, संभव है उनके लिए कभी किसी काम के लिए लकड़ी नसीब न हो। इसलिए जिसने भी पर्यावरण को बरबाद करने में अपनी भूमिका निभाई है, वह तैयार रहे, अपने कर्मों का फल भुगतने के लिए। फिर... फिर देखना प्रकृति का राग वर्षा... किस तरह से संगीतमय सफर शुरू होगा, जब झमाझम बारिश होगी। प्रकृति खूब खुश होगी। बस थोड़ा सा इंतजार प्रकृति के इस मचलते रूप को देखने का...
शुरू होगा प्रकृति का राग मल्हार
धरती की इस पुकार ने मानसून को इतना बेचैन कर दिया कि जल्दबाजी में उसमें चक्रवात (आइला) उठने लगे। यदि ऐसा न होता तो संभवत: वो कुछ जल्दी ही बरस पड़ता। जून महीने की शुरुआत के साथ ही मेघों की जमघट, गड़गड़ाहट, बिजली की चमक और बूंदों की टपटपाहट शुरू हो जाती है।
इनकी ध्वनि किसी संगीत से कम नहीं है। प्रकृति भी सुर और लय में बंधकर मानो लाजवाब संगीत का अहसास कराती है। मेघों का यह संगीत अब भी कुछ फासलों पर है। मौसम विभाग का मानना है कि मानसून थोड़ा आगे बढ़ गया है। बंगाल की खाड़ी में चक्रवात की स्थिति बनने से बूंदों के संगीत के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।
मौसम की करवट बदलने के साथ ही प्रकृति के संगीत में झूमने के लिए लोग बेकरार है। मौसम विशेषज्ञों की माने तो केरल में जल्द मानसून आने के कारण यहां भी समय से पहले मानसून आने के कयास लगे थे लेकिन चक्रवात की गति तेज होने के कारण वह बांग्लादेश की तरफ मुड़ गया।
प्रकृति के रोम-रोम में बसा है संगीत-
शास्त्रीय गायक सुनील मसूरकर कहते हैं प्रकृति के रोम-रोम में संगीत बसा है। सृष्टि का निर्माण भी ओम नाद से हुआ है। बारिश में जब पक्षी चहचहाते हैं, बादल गरजते हैं और तेज आंधी-तूफान आता है तो प्रकृति के कण-कण में संगीत की सजीवता का आभास होता है।
बादलों की गर्जना सी होती है मल्हार की तान-
शुभदा मराठे कहती हैं बारिश में अकसर राग मल्हार गाया जाता है। मिया, गौड़, रामदासी, मेघ, मीरा व सरजू मल्हार में स्वरों के प्रभाव का पूरा उपयोग दिखता है। यदि साधक की साधना हो तो राग सुनकर बादल भी बरसने लगते है। मल्हार की तान भी ऐसी होती है जैसे बादलों की गर्जना। नदी का बहना हो या हवा का चलना सभी में लय तत्व दिखता है। कोयल की कूक में भी पंचम स्वर निकलते हैं। इन सभी में से उत्पन्न ध्वनि सात स्वर बनाती है।
पक्षियों के जीवन में नया राग -
नेचर वालेंटियर के भालू मोंढे कहते हैं बारिश से सभी जगह बदलाव नजर आएगा। जहां चारों तरफ हरियाली होगी, तालाब लबालब होंगे वहीं पक्षियों के जीवन में भी नया राग बज उठेगा। गर्मी में यह हाल है कि पक्षी चोंच खुली रखकर सांस ले रहे है लेकिन बारिश आते ही पंख फड़फड़ा उठेंगे। पत्तों की साइज भी डबल हो जाएगी। मुरझाए पेड़ो में फुटान आ जाएगी यहां तक की रंग भी बदल जाएंगे।
सूखे पत्थरों से निकलते हैं झरने -ट्रेकर्स राजीव किल्लेदार बताते हैं बारिश के मौसम में ट्रेकर्स में नई उर्जा व उत्साह देखने को मिलता है। महू व खंडवा रोड पर फैली हरियाली को देखने के लिए लोग वीकेंड पर निकल पड़ते है। चोरल के घाट की खूबसूरती देखने लायक होती है। सूखी नदियां लबालब हो जाती है और कई जगह नए झरने बहने लगते हैं।

गुरुवार, 4 जून 2009

करोड़पति बनने गई लखपतियों की संतानों की चिंता


डॉ. महेश परिमल
भारत के जिनकी संतानें ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रही हंै, उसके माथे पर ङ्क्षचता की लकीरें हैं। अपनी संतानों के हाल-चाल जानने के लिए वे आतुर हैं। भारतीय छात्रों पर लगातार हो रहे हमलों ने उन्हें व्यथित कर दिया है। उधर भले ऑस्टे्रलिया में भारतीयों की तनी हुई मुट्ठियाँ देखकर पूरे विश्व के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया हो, पर सच तो यह है कि इसका दूसरा पहलू भी है, जिसे कोई समझना ही नहीं चाहता। आज ऑस्ट्रेलिया में गरीब-अमीर के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। इस दिशा में किए जा रहे तमाम सरकारी प्रयास बौने सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे मेें गरीबों का गुस्सा भारतीय विद्यार्थियों पर निकल रहा है। इस पर इतना हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। हमारे देश में भी नस्ल को लेेकर हमले होते रहे हैं। इस पर तो कभी इतना विवाद नहीं हुआ। इतना जान लें कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर जो हमले हुए हैं, उसमें हमलावर गरीब है। जो अपनी खीज ही निकाल रहा है। किसी गरीब भारतीय छात्र पर हमले की कोई खबर पढऩे में आई।
जब मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी गई थी, तब देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। यहाँ यह सोचने की बात यह है कि आखिर उत्तर प्रदेश के लोग सुदूर महाराष्ट्र में इतनी अधिक संख्या में कैसे चले गए? सीधी सी बात है कि कई ऐसे काम जो उत्तर भारतीय आसानी से कर लेते हैं, वही काम महाराष्ट्र के लोग उतनी आसानी से नहीं कर पाए। धीरे-धीरे वे सभी उत्तर भारतीयों द्वारा किए जा रहे कामों के आदी हो गए। एक तरह से उत्तर भारतीय महाराष्ट्र की जरुरत बन गए। अब यदि उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाना है, तो फिर उनके सारे काम महाराष्ट्रीयनों को करना होगा, जो उनके बूते के बाहर की बात है। इस बात को महाराष्ट्र के नाम पर राजनीति करने वाले नहीं समझ रहे हैं। पहले स्वयं को सक्षम कर लो, फिर दूसरों पर ऊँगली उठाओ। ठीक वही स्थिति आज ऑस्ट्रेलिया में हैं, वहाँ भी जो गरीब हैं, उनमें असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। वे देख रहे हैं कि हमारे देश में उच्च शिक्षा की अच्छी सुविधा होने के बाद भी वे उन संस्थाओं में नहीं पढ़ पा रहे हैं और दूसरे देशों से आए लोग आसानी से प्रवेश पाकर पढ़ाई कर रहे हैं। ऑस्टे्रलिया के इस पहलू पर चर्चा कुछ रुककर। पहले यह सोचें कि आखिर भारतीय विद्याथर््िायों को पढ़ाई के लिए विदेश जाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? हमारे ही देश में नालंदा और तक्षशिला जैसे विद्या के प्रसिद्ध केंद्र रहे हैं, जहाँ विदेशों से लोगों ने आकर पढ़ाई की है। क्या आज भारत में शिक्षा का खजाना खाली हो गया? नहीं ऐसी बात कतई नहीं है। आज भारतीय शिक्षा में शिक्षा माफियाओं की जबर्दस्त घुसपैठ हो गई है। जिसके कारण शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है। क्या हमारे ही देश में विद्याॢथयों को ऑस्ट्रेलिया जैसी सुविधाएँ नहीं मिल सकती, ताकि वे विदेश न जाकर देश में ही अध्ययन करें। इससे लाखों डॉलर ऐसे ही बच जाएँगे।
आज गाँवों में चिकित्सकों की कमी है। कोई चिकित्सक गाँवों में जाना ही नहीं चाहता। उधर मेडिकल कॉलेजों में डोनेशन के कारण एक गरीब विद्यार्थी मेघावी होने के बाद भी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसा क्या कारण है कि हमारे शिक्षाविद् अपने तमाम प्रयासों के बाद भी ऐसी शिक्षा नीति तैयार नहीं कर पाए, जो गरीब से गरीब छात्र-छात्राओं को ऊँची शिक्षा दे सके। आखिर क्या कारण है कि एक कॉलेज खोलने के लिए आवेदन से लेकर सारी अनुमतियों को प्राप्त करने में कालेज के संस्थापक के पसीने छूट जाते हैं? अफसरशाही और बाबूगिरी में ही शिक्षा की तमाम फाइलें अटक जाती हैं। स्वतंत्रता के 62 वर्ष बाद भी यदि सही सोच की शिक्षा नीति तैयार करने में हम सफल नहीं हो पाए, तो फिर कैसे कहा जाए कि हमारा देश पूरी तरह से स्वतंत्र हो गया है?
देश में शिक्षा को लेकर किए जा रहे तमाम प्रयासों पर यदि एक नजर डाली जाए, तो स्पष्ट होगा कि इसका लाभ विद्याथर््िायों को शिक्षित बनाने के लिए कम अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अधिक किया गया है। ऐसी समग्र शिक्षा नीति अभी तक नहीं बन पाई, जिसमें सभी का लाभ हो। एक सर्वे के अनुसार अभी हमारे देश से 15 प्रतिशत युवा ऐसे हैं, जिन्हें उच्च शिक्षा की आवश्यकता है। इनके लिए 1500 नई यूनिवॢसटी की स्थापना हो, तो उनकी पढ़ाई हो सकती है। पर यूनिवर्सिटी की स्थापना कौन करेगा? आज देश में जितने भी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, उनमें अधिकांश में हमारे देश के नेताओं का संरक्षण प्राप्त है। कई कॉलेजों के तो मालिक भी वही हैं।
ऑस्ट्रेलिया में करोड़पति बनने गई लखपतियों की संतानों के लिए इतनी हाय-तौबा और देश के गरीब मेधावी छात्र-छात्राओं की कोई चिंता नहीं। क्या हम सचमुच प्रगति कर रहे हैं। इसेे किसी वाद का नाम न दें और मानवता की दृष्टि से देखें कि क्या यह हमारी कमजोरी नहीं है कि हमारी संतानें विदेश में पढऩे जा रही हैं। पहले हमारे देश में लोग पढऩे आते थे, आज उसी देश के लोग विदेश जा रहे हैं। कहाँ हो गए हम कमजोर, हमें इसका पता लगाना होगा। एक तरफ गाँवों में समुचित चिकित्सा व्यवस्था नहीं, दूसरी ओर मेडिकल कॉलेजों में स्थान की कमी। अब महत्व नहीं रहा तक्षशिला और नालंदा का।
कांगे्रस सरकार ने अपने सौ दिन के एजेंडे में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना काम करने की अनुमति देने का विधेयक पर चर्चा को महत्व दिया है। अब यदि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में आ जाएं, तो हमारे देश के विद्याथर््िायों को विदेशी शिक्षा मिलेगी, इससे हमारे देश की संस्कृति का क्या होगा? इस पर भी गौर किया जाना चाहिए। अंत में एक बात.. यदि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पढऩे वाले विद्यार्थी वापस आ जाएँ, तो क्या उनके लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था हमारे देश में है? तय है कि नहीं है, तो फिर उन्हें वहीं पढऩे दिया जाए, आखिर पढ़ाई पूरी करके उन्हें रहना भी तो वहीं है। भारत आकर वे सेवा करने से रहे। एक बार केवल एक बार एक थके-हारे, मजबूर, विवश और लाचार ऑस्ट्रेलियाई छात्र की दृष्टि से देखें कि क्या उनकी खीझ वाजिब नहीं है? ऐसा हमारे देश में होता, तो हम क्या करते? ऑस्टे्रलिया में इस तरह से हमले करने वालों को जेल की सजा होती है और भारी दंड भी भुगतना पड़ता है। जिन्होंने भारतीय छात्रों पर हमला किया है, उन पर कार्रवाई हो रही है। लेकिन उस तरह की खबरें नहीं आ रही हैं। आखिर विश्व की सर्वश्रेष्ठ यूनिवॢसटी में पढऩे का कुछ तो सहना ही पड़ेगा। वहाँ केवल भारतीय विद्याथर््िायों पर ही हमले नहीं हो रहे हैं, बल्कि 180 देशों के विद्याथर््िायों पर भी हमले हो रहे हैं। मीडिया इस मामले में खामोश है। हमले की निंदा की जानी चाहिए, पर इसके दूसरे पहलू पर गौर भी किया जाना चाहिए। हमले हो रहे हैं, इससे बड़ी बात यह है कि हमले क्यों हो रहे हैं? यह तय है कि कुछ समय बाद हमले रुक जाएंगे, क्योकि ऑस्ट्रेलिया सरकार यह कभी नहीं चाहेगी कि इस तरह की घटनाएँ लगातार होती रहे। आखिर वहाँ 180 देशों के लोग पढ़ते हैं, जिनसे उस देश को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा मिलती है। आखिर आती हुई लक्ष्मी को कौन भगाना चाहेगा।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 1 जून 2009

कुनबापरस्त करोड़पति सांसदों की संसद


डॉ. महेश परिमल
हमें गर्व होना चाहिए कि अब हमारी संसद करोड़पतियों की संसद हो गई है। वैसे भी सांसद बनने के बाद आम आदमी का यह प्रतिनिधि करोड़पति तो ही ही जाता है। पर अब तो घोषित रूप से ऐसे सांसद हमारी संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनकी कुल सम्पत्ति करोड़ों में है। ये सभी करोड़पति मिलकर देश के नागरिकों के भविष्य का फैसला करेंगे। इससे आसानी से समझा जा सकता है, भविष्य में हमारी संसद से किस तरह के विधेयक पारित होंगे। इसके अलावा इस बार संसद में कुनबापरस्ती खासतौर पर देखी जा रही है। इस तरह से परिवारवाद का सैलाब इसके पहले कभी देखा नहीं गया।
भारतीय लोकतंत्र एक महान परिवर्तन से गुजर रहा है। यही स्थिति रही,तो दो-तीन दशकों में इस देश में मात्र तीन-चार सौ परिवारों का ही आधिपत्य हो जाएगा। हाल ही में हुए चुनाव में चुने गए प्रत्याशियों में 130 ऐसे हैं, जिन्हें राजनीति का ककहरा विरासत में पढऩे को मिला है। सूची तो बहुत ही लंबी है, पर कुछ का तो जिक्र किया ही जा सकता है। राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट, उनके ससुर फारुख अब्दुल्ला, सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त, स्व. माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया, तमिलनाड़ु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के पुत्र एम.के. अजागिरी, पुत्री कानीमोजही, भतीजे दयानिधि मारन, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के पुत्र नीलेश राणे, पं. बंगाल के कांगे्रसी नेता स्व. गनीखान चौधरी के भतीजे मासूम नूर, लक्षद्वीप के स्वर्गीय सांसद पी.एम.सईद के पुत्र हमिदुल्ला सैयद, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मेनका गांधी, वरुण गांधी, शरद पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया सुले, मुलायम सिंह एवं उनके पुत्र, मुरली देवड़ा के साथ उनके पुत्र आदि। परिवार के एक सदस्य का दामन थामकर चलने वालों की पूरी फौज ही तैयार हो रही है। इसके बाद तो यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि यह लोकशाही है। इसे तो सामंतशाही कहना ही उचित होगा।
इस 15वीं लोकसभा में 300 करोड़पति सांसदों में कई ऐसे हैं, जिनकी सम्पत्ति 100 करोड़ से भी ऊपर है। उदाहरण के लिए आंध्रप्रदेश के नागेश्वरराव (टीडीपी) के पास 173 करोड़ की सम्पत्ति है। हरियाणा के कांगे्रसी सांसद नवीन जिंदल के पास 127 करोड़, आंध्र के कांगे्रसी सांसद राजगोपाल के पास 122 करोड़, शरद पवार की राकांपा के सांसद पदमसिंह पाटिल के पास 104 करोड़, प्रफुल्ल पटेल के पास 89 करोड़ की संपत्ति है। आश्चर्य इस बात का है कि जिन सांसदों ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी जीत दर्ज की थी, उन्हीं सांसदों की सम्पत्ति में बेशुमार इजाफा हुआ है। इस बार सबसे अधिक करोड़पति सांसद कांगे्रस के ही हैं, इनकी संख्या 137 है। भाजपा सांसदों की संख्या 58, समाजवादी पार्टी के 14, बसपा के 13 सांसद करोड़पति हैं। इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस व्यक्ति को वरुण गांधी ने हराया, वे ही वी.एम. सिंह, यदि ये चुनाव नहीं हारे होते, तो सांसदों में सबसे अधिक करोड़पति होते। इनकी कुल संपत्ति 632.15 करोड़ रुपए की है।
इस तरह से कुल 300 करोड़पति सांसद एक विकासशील देश के आम आदमी के भविष्य का फैसला करने के लिए एक इबारत लिखने जा रहे हैं। वैसे भी यह सच है कि इस लोकतंत्र में एक आम आदमी कभी चुनाव नहीं लड़ सकता। परचे भरे जाने से लेकर प्रचार-प्रसार, चाय-नाश्ते, मतदाताओं को रिझाने के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। आजकल के चुनाव तो बस दौलत बहाने का एक खेल ही है। जितनी तेजी से बहाओ, उतनी ही तेजी से बटोरो। क्या ये करोड़पति सांसद देश की गरीबी को दूर कर पाएँगे? जिन्हें इतिहास की थोड़ी सी भी समझ है, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि एक बार डॉ. राम मनोहर लोहिया ने सत्ता से प्राप्त संपत्ति का विरोध किया था। पर अब इसे सभी ने स्वीकार कर लिया है कि सत्ता द्वारा धन की प्राप्ति स्वाभाविक है। जिस देश का चुनाव आयोग ही बेबस हो, उस देश के बारे में आखिर क्या कहा जाए?
पहले संसद में हिस्ट्रीशीटर पहुँचते थे, अब धनिक वर्ग पहुँचने लगा है। पहले भी आम आदमी से बिलकुल अनजान थे, आज भी इनकी नजरों में आम आदमी हाशिए पर है। जिस देश में किसी पार्टी का टिकट लेने में ही धांधली होती हो, खुले आम टिकट बेची जा रही हो, उससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि चुनाव में किस तरह से काले धन का फन फैला हुआ है। कम से कम धन से चुनाव जीतना इस देश में एक सपना ही हो गया है। जो किसी गरीब को तो नहीं आ सकता। संसद पहुँचकर देश की सेवा करना अब किसी का लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य होता तो मलाईदार मंत्रालय की बात ही नहीं आती। जिस तरह से रेल्वे मंत्रालय ममता बनर्जी ने लिया, उसी से यह अंदाज लग जाना चाहिए कि आखिर ये मलाईदार मंत्रालय से उनका क्या लाभ है? यदि जनता की सेवा ही करनी है, तो वह किसी भी मंत्रालय में रहकर की जा सकती है।
सांसद बनने से कानून द्वारा भी इन्हें कई तरह की रियायत मिल जाती है। कई बार इन्हीं रियायतों का ये सांसद गलत उपयोग भी कर लेते हैं। करोड़पति सांसदों द्वारा निश्चित रूप से उनके व्यापार की प्रगति करने वाले विधेयकों को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके व्यापार बढ़ेंगे और आम आदमी और अधिक लाचार होता जाएगा। अगर इस दिशा में शुरू से ही अंकुश न रखा गया, तो संभव है देश में आँकड़ों की खेती शुरू हो जाए। महँगाई अभी भी बेकाबू है,उस पर कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा है कि वह अमीरों, व्यवसायियों की सरकार है। उसके राज में गरीब और अधिक गरीब होता है, तो इस बार जब मतदाताओं ने उन पर विश्वास किया है, तो विश्वास पर खरा उतरने की उसकी जिम्मेदारी बनती है। अप्रत्याशित रूप से मिली सत्ता करोड़पतियों के हाथों की कठपुतली न बन जाए, यही विश्वास किया जा सकता है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 30 मई 2009

मंदी में है क्या-क्या सस्ता !

ग्लोबल मंदी में हर कोई बुरी खबरों की बात कर रहा है। लेकिन इस ओर कम लोगों का ध्यान गया है कि इस दौरान कई चीजों के दाम घट गए हैं। अगर लोगों के पास पैसे कम हैं तो कई सारी चीजें उनकी पहुंच के अंदर भी आ गई हैं। यानी कंज्यूमर को लिए ये मिलीजुली खबरों का समय है। आइए जानते हैं कि मंदी में क्या सस्ता हो गया है।
चलो सैर सपाटे पर, होटल भी सस्ते
मंदी की वजह से एक और चीज जो सस्ती हो गई है वो है सैर सपाटा। अपने ट्रेवल एजेंट से चेक कीजिए। एक साल पहले की तुलना में ज्यादातर पैकेज इस समय सस्ते मिल रहे हैं। दिल्ली के फाइव स्टार होटलों में 12 हजार से 24 हजार के रूम इस समय 8 हजार से 18 हजार रुपए में मिल रहे हैं।
कंज्यूमर ड्यूरेबल खरीदने का समय है मंदी

कंज्यूमर ड्यूरेबल प्रोडक्ट्स भी हाल के दिनों में सस्ते हुए हैं। ज्यादातर कंपनियों ने एक्साइज ड्यूटी कट का फायदा कस्टमर्स को दिया है। मिसाल के तौर पर सैमसंग ने अपने एलसीडी टीवी और फ्रिज के दाम घटाएं हैं। कंपनी का 52 इंच का एलसीडी टीवी 10,000 रुपए सस्ता हो गया है। एलीजी ने भी अपने प्रोडक्ट्स की कीमत में 1.5 से 2 परसेंट की कटौती की है। सोनी भी कीमतें घटा सकती हैं।
होम लोन सस्ता हुआ

2004 के निचले लेवल के बाद होम लोन पर इंटरेस्ट रेट, इस साल दो गुना तक बढ़ चुका था। लेकिन अब होम लोन सस्ता होने लगा है। कम से कम नए कस्टमर्स को तो सस्ते होम लोन का फायदा मिलने भी लगा है। सरकारी बैंकों ने होम लोन रेट नए कस्टमर के लिए सस्ते कर दिए हैं। 5 लाख रुपए से कम का होम लोम अब 8.5 परसेंट पर मिल रहा है जबकि 5-20 लाख रुपए का होम लोन 9.25 परसेंट की रेट पर मिल रहा है।
अभी इस मामले में और अच्छी खबरें आ सकती हैं क्योंकि महंगाई दर अब सात परसेंट से भी नीचे आ चुकी हैं। साथ ही रियायती रेट की लिमिट भी 20 से बढ़ाकर 30 लाख की जा सकती हैं।
कार-बाइक चलाने का खर्च घटा
कच्चे तेल की कीमत इंटरनेशनल मार्कट में जमीन को छू रही है। जुलाई के 147 डॉलर प्रति बैरल से कीमतें एक तिहाई से भी नीचे हो चुकी हैं। ऐसे में सरकार ने पिछले दिनों पेट्रोल 5 रुपए प्रति लीटर और डीजल 2 रुपए प्रति लीटर सस्ता किया है। इस बात के पूरे आसार हैं कि चुनाव नजदीक होने की वजह से पेट्रोल-डीजल और सस्ता होगा। यानी गाड़ी के बाद अब गाड़ी चलाने का खर्च भी कम होगा।
प्रॉपर्टी की कीमतें जमीन पर
ये कहना मुश्किल है कि ये प्रॉपर्टी खरीदने का सही समय है या नहीं। लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पिछले एक साल में ज्यादातर जगहों पर प्रॉपर्टी के दाम कम हुए हैं। अब तो गिरावट और ठहराव उन जगहों पर आ रहा है, जो अब तक बचे थे। इंडस्ट्री में स्लोडाउन की वजह से कई बिल्डर स्कीमें लेकर आए हैं। रेट में कटौती हुई हैं और प्लाज्मा टीवी से लेकर एक फ्लैट पर एक फ्लैट फ्री तक के ऑफर दिए जा रहे हैं।
ड्रीम कार का सही समय

शुक्रवार, 29 मई 2009

व्यंग्य युधिष्ठिर का कुत्ता दिल्ली पहुंचा

डा. रामकुमार रामरिया
सरदारया दी दिल्ली
प्रिय भारत !
मैं बड़े मजे से दिल्ली पहुंच गया ।
लोग कहते हैं -दिल्ली बहुत दूर है ,दिल्ली दूर का ढोल है ,दिल्ली भारत की पोल हैं, नक़ली सियार का खोल है ,दिल्ली में नैतिकता गोल है ,दिल्ली में कौन अपना है ? दिल्ली तो सपना है , दिल्ली बकवास है , दिल्ली में प्रेतों का वास है ,दिल्ली की नाक के नीचे संविधान सोता है ,अपराध जागता है , गीदड़ की मौत आती है तो वह दिल्ली की ही तरफ भागता है ,आदि इत्यादि बातें दिल्ली के रास्ते में ट्रकवाले सरदारों ने मुझसे कहीं थीं। वे भी दिल्ली जा रहे थे और मुझे भी दिल्ली ले जा रहे थे। परन्तु आष्चर्य यह था कि न वे गीदड़ थे और न मैं। वे सरदार थे और मैं तो बस श्वान था। आज की भाषा में कहूं तो कुत्ता था। हम किसी किंवदन्ती या मुहावरे से मुक्त थे और दिल्ली जा सकते थे। उनके लिए दिल्ली क्या थी मुझे नहीं मालूम मगर मेरे लिए दिल्ली एक बादषाही मकसद थी। मैने दिल्ली की राजषाही को नज़दीक से देखा था। मैं कोई मामूली कुत्ता नहीं था। एक पौराणिक अभूतपूर्व कुत्ता था। एक सम्राट्वंषी कुत्ता,एक बादषाह कुत्ता।
तो दिल्ली पहुंचने में मुझे बादषाही सुविधा ही प्राप्त हुई औेर दिल्ली पहंुचकर प्रारंभिक दृष्टि से राजनयिक संतोष ही मिला। आषा है तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ रहे होगे। हो सकता है कि कुछ कन्फयूज़न भी तुम्हे हो। कन्फयूज़न दिल्ली के नाम को लेकर हो सकता है। वास्तव में शुरुआत में ही मुझसे गल्ती हुई। असल में मुझे पहले ही बताना था कि दिल्ली कोई नई जगह नहीं है। इसे तुम जानते हो। यहां तुम रह चुके हो। यहां राज्य कर चुके हो ।
प्रिय पुत्र !दिल्ली को हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का नया नाम समझ लो। मुग़लों ने बतौर दिल्लगी यह दिल्ली बसाई और इसके मुहल्लों ,रास्तों और गलियों को इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में तब्दील कर दिया। नये भारत की अंग्रेज जेनेरेषन इसे ’न्यू डेल्ही ’ कहती है। कुछ लोगों ने इसे देह’ से जोड़कर ’देहली’ बना लिया है। चूंकि इस नगरी से मेरे संबंध पुराने भी हैं और भावनात्मक भी, अतः मुझे दिल्ली को पहचानने में ज़रा भी देर नहीं लगी । जबकि सुनते हैं,नई पीढ़ी अब भी जे.एन.यू.में इस पर रिसर्च कर रही है। ये सारी बातें वास्तव में सरदारों ने ही नषे की हालत में रास्ते में मुझसे कहीं थी।
पुत्र ! मैं बार बार दिल्ली के मामले में सरदारों का जिक्र कर रहा हूं,, और तुम खामखां टेंषन में आ रहे होगे कि ये सरदार आखिर हैं कौन ? कौन्तेय ! ये बड़े ही मजेदार लोग हैं। इन्हें दिलदार ,मालदार,रौबदार,पायादार और असरदार भी कहा जाता है। इतने सारे ’दार’ लगे होने से ही ये सरदार कहाए। कुछ इन्हें यार या यारों के यार भी कहते हैं। इसकी वजह यह है कि इनके पास ’यार’ लगी हुई कुछ खूबियां भी है...ये कृपाण नामक धार्मिक हथियार रखते हैं , ये जां पर खेल जाने को तैयार रहते हैं ,अपना मयार ये हमेषा ऊंचा रखते हैं । ये होषियार भी हैं। इनकी होषियारी से जलकर कुछ लोगों ने इनपर हंसी उड़ानेवाले चुटकुल भी बनाए हैं । वे लोग भूल जाते हें कि ये बिगड़ जाएं तो खूंख्वार भी हैं ।
पार्थ! सेनानायक होने के नाते तुम जानते ही होगे कि सेना में सरदार नामक प्राणी भी होते हैं। सैनिकों की एक टुकड़ी के सरगना। पूरी टुकड़ी का संचालन उसी के जिम्मे होता है। षायद उन्हीं सरदारों के ये वंषज हैं। सरदारों के बेटे पहले सरदार हुए ,बाद में पूरी कौम सरदार हो गई। जो पान की दूकान चलाता है वह भी सरदार। जो ट्रक चलाता है वह भी सरदार । षराब बेचकर घर चलाने वाला भी सरदार है और गुरुदारा चलानेवाला भी। आजकल ऐसा होता है कि पटवारी का बेटा पटवारी होता है, वही उसकी जात होती है। पनवाड़ी ,पायलट,गोमास्ता ,मुंषी ,कानूनगो, बख्षी, राय, प्रधान षास्त्री आदि उपाधियां पुष्तदरपुष्त प्रवाहित होती चली जाती हैं। इसलिए पंडित का बेटा पंडित और सूत का बेटा सूत हो जाता है। जुलाहे का जुलाहा तो महासचिव का बेटा परंपरा से महासचिव हो जाता है। उसके लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी पहले से तैयार रहती है।
जो भी हो सरदार होते बहुत अच्छे हैं। बिलकुल सरदारों की तरह। सर की हिफाजत कोई उनसे सीखे। वे हमेषा पगड़ी से सर को असरदार बनाए रखते हैं । सर भले ही छोटा हो पगड़ी उनकी बड़ी होती है। उनका कौमी गीत है -’’पगड़ी सम्हाल जट्टा..’’ जट्टा भी सरदार को कहते हैं। जैसे दिलदार को दरियादिल भी कहते हैं। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि मैंेंने इनकी दरियादिली देखी है। इन्होंने मुझ रिष्तों की तरह प्यार और दुलार दिया। खाना और षराब दी। मेरी तरह थके हुए, भूखे ,प्यासे और कत्र्तव्य की भावना से भरे हुए कुत्ते से कौन ऐसे पेशआता है ? खींचकर लात मारता है और फेंककर पत्थर। इन्सान भी इन्सानों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता जैसा इन सरदारों ने मेरे साथ किया। मुझे तो लग रहा था जैसे स्वर्ग के लोग रूप बदलकर जमीन पर उतर आएं हैं और ट्रक चला रहे हैं ।
हुआ यह कि मैं धीरे धीरे इन्द्रप्रस्थ यानी दिल्ली के रास्ते पर पैदल ही बढ़ रहा था । पहाड़ी जंगली ,रास्ते पर बिल्कुल अकेला। न पट्टा ,न जंजीर ,न मालिक ,न मल्लिका । मुझे न शेरों का भय था ,न भालुआंे का डर। न सोनकुत्तों की परवाह ,न खरगोषों का लोभ। मैं अपने दिमाग से उन हाथियो को भी निकाल चुका था ,जिनके बारे में कहा जाता है कि वे जब बाज़ार जाते हैं ,तब हम कुत्ते उन पर भौंकते हैं। वैसे भी मैं इस समय बाज़ार के रास्ते पर नहीं था, कामनवेल्थ की पसंद-दिल्ली के रास्ते पर था। फिल्हाल मैं बिल्कुल अकेला था ओर मेरी स्थिति धोबी के उस कुत्ते की तरह थी ,जो घर का होता है ,न घाट का । मैं बुरी तरह थक चुका था और मेरे मन में इतना अवसाद था कि सच कहता हूं ,अपनी जाति की निष्ठागत परम्परा से जुड़ा न होता तो तुमको सैंकड़ों गालियां देता और किसी भी गांव में घुसकर अपना पेट पाल लेता। बहरहाल,में एक सच्चे और स्वाभिमानी कुत्ते की तरह तुम्हारे प्रति निष्ठा का पालन करते हुए ,किसी तरह दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था। जैसे पार्टी के निर्णय पर लगी लगाई नौकरी छोड़कर कोई षिक्षक चुनाव के मैदान में डमी प्रत्याषी बनकर दिल्ली के सपने देखने लगता है। मैं भी तुम्हारी इच्छापर तुम्हारे खोए हुए भाई और स्वनामधन्य पांचाली की खोज में दिल्ली के रास्ते पर फिसल रहा था। मेरे लिए यह जीवन मरण का प्रष्न था और प्रण भी ।
तभी अचानक तेज ऱतार से आता हुआ भारी वाहन बिल्कुल मेरे पास आया और किंकिंयाकर खड़ा हो गया। मैं डर गया और ज़ोर ज़ोर से भौंकने लगा जैसे हर डरा हुआ आदमी भौंकता है। जैसे कुत्ते हाथी और शेरों पर भौंकते हैं। तभी वाहन से एक आदमी लड़खड़ाता हुआ उतरा । वह बिल्कुल तुम्हारे सेनापतियों की तरह दढ़मुच्छ था और मुकुट की जगह पगड़ी पहने हुए था । वह मेरे भौंकने की परवाह किए बिना मेरी तरफ बढ़ते हुए बोला -’’ ओय शेर दे पुत्तर ...क्या बाडी साडी है तेरी ..साले हम तो डर गय थे। दूर से तू हमें शेर लग रहा था । अब तो तुझसे यारी करनी पड़ेगी ...हम भी शेर ,तू भी शेर ..’’
इसके पहले कि मैं कुछ सोच पाता उस शेर ने मुझे गोद में उठा लिया । मुझे बहुत अच्छा लगा । ईष्वर ने मेरी सुन ली थी और मेरी निष्ठा का प्रतिफल दे दिया था। एक शेरदिल आदमी ने मुझे ’शेर का पुत्तर’ कहा था । इसे ही कहते हैं -’ खग जाने खग ही की भाषा ’। वह शेरदिल आदमी मुझे लेकर वाहन में चढ़ गया। परली तरफ बैठे आदमी ने चिल्लाकर कहा: ’’ ओय सरदारया ! की कीत्ता ओय..ऐस कुत्ते दे पिल्ले नूं ट्राक बिच कित्थे ले आंदा तुसी..’’
मुझे थामे हुए सरदारया नाम के उस आदमीनुमा प्राणी ने ट्राक के अंदर मुझे लगभग फेंकते हुए कहा: ’दारजी ठंड राख तुसीं..असी तो ये कोई करामाती लंगदा से..वेखते रयां...’’ दूसरा आदमी दारजी था। मैं मन ही मन हर घटती हुई चीज़ को अपनी कौत्तिक बुद्धि से सूंघ रहा था। चैकन्नापन कुत्तों में अपने आप आता है।
पहले आदमी सरदारया ने मेरी खस्ता हालत देखी तो बोला:’’पानी पीवेंगा... थका लगता है तू....इस जंगल बिच...न गांव न शहर...तू कित्थे भटकदा फिरदा है यार ? ले दो घूंट अंगूर दी मार...’’ऐसा कहते हुए उसने मेरे मुंह में बाटली लगा दी। मैं हर अवसरवादी की तरह दो की जगह ़मज़े में चार घूंट पी गया। मुझे इस समय उसकी जरूरत थी। राजभवनों में रहते हुए ,खासकर अंतःपुर के इतने करीब होते हुए मैं अंगूर और बेषकीमती सोमरसों से परिचित था। उनके प्रभावों को जानता था। कई बार तो तुमने ही नषे में मेरे मुंह में प्याला ढठूंस दिया था, तुम्हें याद है?
अस्तु, उन चार घूंटों का तत्काल प्रभाव हुआ ..मेरे बेजान शरीर में जान आ गई। जिन्दगी की एक लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। आंखों में सितारे जगमगा उठे। यह क्या ...क्या मैं पलक झपकते ही स्वर्ग पहुंच गया..ऐसा मैंने सोचा....
कुन्तिपुत्र ! तुम्हें वह दिन याद होगा जब स्वर्ग से आए वाहन को तुमने केवल मेरे कारण ठुकरा दिया था। तुम्हारी परीक्षा के लिए कुछ देर के लिए वह वापिस भी चला गया। उतनी देर में तुमने तय भी कर लिया कि अपने प्रियजनों के बिना स्वर्ग जाना बेकार है...तुम धर्मपुत्र थे न.. इसलिए धर्मसंकट में पड़े हुए तुम मुझे लेकर एक देवदारु के नीचे सरक आए ताकि दोबारा अगर विमान आए तो भटक जाए और इतनी देर में तुम अपने भाइयों को साथ में स्वर्ग ले जाने पर विचार कर सको। हुआ भी वैसा ही। विमान भटक गया और हम दोनों देवदारु यानी देवताओं के वृक्श1 के नीचे खड़े खड़े ठिठुरने लगे। तभी तुमने यह भी सोच लिया कि राजरानी द्रोपदी और बंधुगण -भीम , अर्जुन , नकुल और सहदेव ,जो बीच रास्ते में ही ढेर हो गए थे ,वे हो न हो बदले हुए हालातों में अपने अस्तित्व या अपनी अस्मिता के पुनर्मूल्यांकन के लिए वापस भारत यानी हस्तिनापुर के इंद्रप्रस्थ लौट गए हैं। भाइयों का दिल ऐसा ही सोचता है। तुमने तुरंत तय भी कर लिया कि मैं लौटकर जाऊं और उन लोगों की जासूसी करूं। मैं निष्ठावान रिसर्च स्कालर की तरह लौट पड़ा। मेरे वफादार मन में एक पल के लिए भी यह संदेह नहीं हुआ कि मुझे धरती पर छोड़ देने का समझौता तुम कर लोगे और मुझे भटकाकर स्वर्ग चले जाओगे। मैंने यह भी कल्पना नहीं की थी कि कोई वाहन सुख तुम्हें छोड़ने के बाद मुझे मिलेगा। लेकिन वाहन पर सवार होकर इस तरह के भव्य ख्याल आने लगे..मै सोचने लगा कि मेरी परीक्षा के लिए तुम उस स्वर्गीय यान पर वापस आ गये हो ...सरदारों का रूप लेकर । मैं सोचने लगा कि तुम्हारे आदर्षों और धर्माचरण के साथ साथ मेरी निष्ठा का प्रतिफल यह भव्य वाहन है। मैं अंदर ही अंदर खुशहोने लगा कि ईमानदारी सचमुच पुरस्कृत होती है। परन्तु तत्काल मैं सम्हल गया ..नषे की हालत में भी लगा कि मुझे चढ़ रही है ।
तभी गड्डी ने हल्का सा टर्न लिया और लुड़कते हुए रुक गई। सरदारया ने मुझे थपककर कहा:’’ओय उट्ठ बड़वाग्या....ढाबा आ गया... पंजाबी दा ढाबा..पंजाब नंे क्या नहीं दिया इस मुल्क को ..खाने वास्ते ढाबे दिए...पीने वास्ते पटियाला पैग दिए..’’
अब तक मेरे नथुनों में अब तक रोटी ओर तरकारी की गंध घुंस चुकी थी..सूंघते ही मेरी आंतें मरोड़ खाने लगी। कान खड़े हो गए ,जीभ लपलपाने लगी और दुम डगमगाने लगी।
’’भुक्खा है शेरदा...चल तुझे परौंठे खिलाएं ,राजमें के साथ..’’ सरदारया ने कहा और वे मुझे कुदाकर कूद गए। मैं हवा में उड़ रहा था। ..हवाओं में संगीत बज रहा था... वातावरण अनेक गंधों से महक रहा था। सरदारया और दारजी खाली पड़ी खटियों की तरफ बढ़ गए और उन पर बैठ गए...मैं भी राजकुल की मर्सादा और आदत के मुताबिक बगल की खाट पर चढ़ गया। सरदारया खुशहोकर चिल्लाया,’’ ओय , खुश कर दित्ता मेरे यार ! किसी ऊंचे घर का मालूम पड़ता है तू ? श्षब्बास...’’
फिर ज़ोर से आवाज लगाई:’’लगा ओ छोकरे...दाल फ्राई, शाही राजमा ,चिकन तंदूरी और मक्खन दे परौंठे...आज हमारा शेर ऐश करेगा...’’
मगर दारजी ने डांटकर कहा:’’ होषकर ओय बंत्या ! तू कुत्ते को मक्खन के परौंठे खिलावेंगा ? पागल हो जाते हैं कुत्ते मक्खन और घी खक्के...’’
बंत्या तुरंत होश में आ गया। आश््चर्य से मंुह फाड़कर बोला:’’ ऐसा ? तो ठीक है ...छोकरे... दो तंदूरी रोटी देना अलग से.. कुत्ते नाल....’’
जिस गति से मैं कुत्ते से शेर हुआ था उसी गति से कुत्ता हो गया। ठीक सरदारया की तरह जो होश में आते ही बंत्या हो गया था। बहरहाल मक्खन के परौंठे के स्थान पर मुझे सूखी मगर गरम और कड़क नमकदार रोटियां मिलीं। बंत्या ने उस पर बोटियां रख दीं। मुझे ज़ोर की भूख लगी थी इसलिए मक्खन के परौठे ओर तंदूरी रोटियों में फर्क,तुलना या भेद करना मैंने मुनासिब नहीं समझा। वैसे भी दारजी ठीक ही कह रहे थे -विष्वासपात्र ,निष्ठावान और कत्र्तव्यपरायण कुत्तों को मक्खन और घी नहीं खाना चाहिए। इससे उनकी स्वामीभक्ति में फर्क आ जाता है। चिकनी चुपड़ी का चष्का तो कुत्तों को आदमी बना देता है। इन सब विचारों के साथ साथ रोटियां मेरे पेट में जा रहीं थीं। जैसे जैसे रोटियां पेट में जा रहीं थीं, नषा बढ़ रहा था। थोड़े बहुत नषें में मैंने सुना सरदारया कह रहा था:’’ कयों शेरू मजा आ रहा है न ....तू भी क्या याद रखेगा कि किसी सरदार से पाला पड़ा था...तू जंगल से दिल्ली आ गया है .. यह दिल्ली सरदारों की मिल्कियत है...तू ऐश करेगा यहां...’’ मै कुछ समझा ,कुछ नहीं समझा। नींद और नषे के बीच गहरी दोस्ती हो चुकी थी। मै शायद खाटपर ही लुढ़क चुका था।
सुबह होते ही दो घटनाएं एक साथ घटीं- होश आया और नींद खुली। आमतौर पर नींद खुलती है तब भी हम किसी न किसी नषे में होते हैं। होश आने पर भी हम किसी न किसी नींद में गाफिल होते हैं। किंतु मैं जब जागा तो होश में था। क्या देखता हूं कि सुबह हो गई है और चिड़ियां चहचहाने लगी हैं। सरदारया और दारजी गायब हैं। आसपास की खटियों पर लोग सो रहे हैं। केवल ढाबे का बोर्ड जाग रहा है जिस पर लिखा है-’ पंजाब दा ढाबा...दिल्ली’..यानी मैं दिल्ली में हॅंूं.... ।
मैं उठा ,अंगड़ाया और षरीर को झटकाकर ,दुम उठाकर दिल्ली की सड़कों पर निकल पड़ा ।
शेष फिर
तुम्हारा कुत्ता
-कुकुर मोती प्रताप सिंह ’स्वर्गवर्गीय’

डा. रामकुमार रामरिया

गुरुवार, 28 मई 2009

साबुन ने तय किया 110 साल का सफर


भारत में साबुन और डिटर्जेंट ने लंबा सफर तय किया है। ब्रिटिश शासन के दौरान लीवर ब्रदर्स इंग्लैंड ने भारत में पहली बार आधुनिक साबुन पेश करने
का जोखिम उठाया। कंपनी ने साबुन आयात किए और यहां उनकी मार्केटिंग की। हालांकि नॉर्थ वेस्ट सोप कंपनी पहली ऐसी कंपनी थी जिसने 1897 में यहां कारखाना लगाया।
उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में पहला साबुन कारखाना खड़ा हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान साबुन उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा था लेकिन इसके बाद देश भर में उद्योग खूब फला-फूला। साबुन की कामयाबी की एक अहम कड़ी में जमशेदजी टाटा ने 1918 में केरल के कोच्चि में ओके कोकोनट ऑयल मिल्स खरीदी और देश की पहली स्वदेशी साबुन निर्माण इकाई स्थापित की। इसका नाम बदलकर टाटा ऑयल मिल्स कंपनी कर दिया गया और उसके पहले ब्रांडेड साबुन बाजार में 1930 की शुरुआत में दिखने लगे।

1937 के करीब साबुन धनी वर्ग की जरूरत बन गया। साबुन को लेकर ग्राहकों की पसंद अलग-अलग रही है। इसे हम क्षेत्रवार वर्गीकरण के तहत समझ सकते हैं। उत्तर भारत में उपभोक्ता गुलाबी रंग के साबुन को तरजीह देते हैं जिसका प्रोफाइल फूल आधारित होता है। यहां साबुन की खुशबू को लेकर ज्यादा आधुनिक प्रोफाइल चुने जाते हैं जो उनकी जीवनशैली का अक्स दिखाएं। नींबू की महक के साथ आने वाले साबुन भी खासी लोकप्रियता रखते हैं क्योंकि उत्तर भारत में मौसम बेहद गर्म रहता है और नींबू के खुशबू रखने वाले साबुन को तरो-ताजा होने के लिए अहम माना जाता है। साबुन को लेकर पूर्वी भारत ज्यादा बड़ा बाजार नहीं है और यहां साबुन तथा डिटर्जेंट की खुशबू को लेकर ज्यादा संजीदगी नहीं दिखाई जाती। पश्चिमी भारत में गुलाब की महक रखने वाले साबुन पसंद किए जाते हैं।
देश के दक्षिणी हिस्से में हर्बल-आयुर्वेदिक और चंदन आधारित साबुन की मांग ज्यादा है। यहां का ग्राहक किसी ब्रांड विशेष को लेकर ज्यादा लॉयल नहीं होता और दूसरी कंपनी का साबुन इस्तेमाल करने को लेकर खुला रुख रखता है। साबुन की मार्केटिंग करते वक्त महिलाओं को खास तवज्जो दी जाती है, क्योंकि कौन सा साबुन खरीदना है, यह फैसला परिवार में काफी हद तक उन पर निर्भर करता है। इसके अलावा परिवारों को प्रभावित करने के लिए कीटाणु मारने वाले एंटी-बैक्टीरियल और शरीर की दुर्गंध दूर करने वाले साबुन पेश किए जाते हैं।

बुधवार, 27 मई 2009

क्यों महंगी होती हैं डीजल कारें


क्यों महंगी होती हैं डीजल कारें
डिजाइनिंग के पेशे से जुड़े प्रयास गुप्ता एक दिन अपने मुंबई ऑफिस में बैठे बड़े ध्यान से कार की प्राइस लिस्ट देख रहे थे। इसके ठीक एक दिन पहले उनकी पत्नी ने उन्हें याद दिलाया था कि उनकी कार छह साल पुरानी हो चुकी है और अब इसे बदलने की जरूरत है। अपनी कार की मौजूदा हालत को देखते हुए उन्होंने इस बार नई डीजल कार खरीदने की सोची, हालांकि डीजल कार खरीदने का फैसला करने के बाद वह ज्यादा संशय की स्थिति में पहुंच गए।
गुप्ता ने एक बार फिर कार की कीमतों की सूची देखी। इस सूची में स्विफ्ट वीएक्सआई (एबीएस) की कीमत 5,25,801 रुपए थी, वहीं इसके डीजल मॉडल स्विफ्ट वीडीआई (एबीएस) की कीमत 5,98,736 रुपए थी। इन दोनों कार मॉडलों के बीच 72,935 रुपए का बड़ा अंतर प्रयास गुप्ता को देखने को मिला। गुप्ता यह जानने को उत्सुक थे कि आखिर क्यों डीजल वर्जन की कीमत पेट्रोल वर्जन से इतनी ज्यादा है और अपनी इसी उत्सुकता को उन्होंने अपने रीटेलर के सामने रखा।
मारुति सुजुकी के इंजीनियरिंग डिवीजन के चीफ जीएम सी वी रमन के पास इसका जवाब है। उन्होंने बताया, 'जब डीजल और पेट्रोल वर्जन की बात आती है तो अधिकतर मामलों में एक ही मॉडल की कार की इंजन क्षमता में काफी अंतर होता है। आमतौर पर डीजल इंजन अधिक क्षमता वाला होता है।' अगर हम गौर करें तो पता चलता है कि हिंदुस्तान एबेंसडर में 1.8एल एमपीएफआई का पेट्रोल इंजन होता है, जबकि डीजल इंजन की क्षमता 2.0 एल होती है।
हालांकि, कार की नई कीमतें बताती हैं कि यह कोई जरूरी नहीं है कि अगर इंजन की क्षमता अधिक हो, तो उसकी कीमत भी अधिक होगी। रमन ने बताया कि आमतौर पर डीजल इंजन में पेट्रोल इंजन की तुलना में ज्यादा महंगे उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
रमन ने बताया, 'पेट्रोल की तुलना में डीजल ज्यादा गर्मी पैदा करता है। इसके अलावा डीजल इंजन में फ्यूल-एयर मिक्सचर चालू करने के लिए कोई स्पार्क प्लग नहीं होता है। डीजल इंजन में गाड़ी तभी स्टार्ट होती है, जब यह हवा लेता है और इसमें दबाव पैदा होता है। कम्प्रेस्ड हवा की गर्मी से डीजल इंजन चालू होता है।'
जानकारों का कहना है कि हाई ऑपरेटिंग टेम्परेचर इस बात को सुनिश्चित करता है कि डीजल इंजन का रिस्पांस बेहतर रहे। डीजल इंजन वाले कार मॉडल्स में महंगे उपकरणों के अलावा टर्बोचार्जर के साथ ऑयलबर्नर भी लगे होते हैं, जिससे इसकी कीमत बढ़ जाती है। टर्बोचार्जर एक ऐसा इंडक्शन सिस्टम है, जो वजन में ज्यादा बढ़ोतरी किए बगैर इंजन की क्षमता में इजाफा करता है। यह उस हवा पर तेजी से दबाव बनाता है, जो इंजन के अंदर बहती है।
इसका मतलब है कि सिलेंडर में अधिक हवा आ सकती है और ज्यादा हवा का मतलब है कि जब गाड़ी चलती है, तो इसे ज्यादा क्षमता हासिल होती है। इसके अलावा गुप्ता के रीटेलर ने उन्हें यह भी बताया कि ईंधन की क्षमता के लिहाज से भी स्विफ्ट का डीजल वर्जन ज्यादा बेहतर होगा। हालांकि, ईंधन क्षमता की बात आने पर खरीददार के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि ऐसा कैसे होगा?
हालांकि, इस सवाल का उत्तर पूरी तरह से डीजल की बेहतर गुणवत्ता पर निर्भर करता है। पेट्रोल की तुलना में डीजल ज्यादा ऑयली और भारी होता है। इसके अलावा डीजल से कार्बन परमाणु की लंबी श्रृंखला तैयार होती है, जो पेट्रोल की तुलना में इंजन को ज्यादा क्षमता मुहैया कराती है।
पर्यावरण के लिहाज से भी पेट्रोल की तुलना में डीजल बेहतर होता है, क्योंकि इससे काफी कम हाइड्रोकार्बन, कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड का उत्सर्जन होता है। ये सभी रासायनिक तत्व ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, डीजल की खामी यह है कि इसमें से अधिक मात्रा में नाइट्रोजन कम्पाउंड निकलते हैं। इन सब बातों पर गंभीरता से विचार करने के बाद गुप्ता ने आखिरकार स्विफ्ट वीडीआई खरीदने का फैसला लिया।

मंगलवार, 26 मई 2009

देश के दो महान नेता


ममता दी की सादगी
ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की उन गिनी-चुनी महिलाओं में हैं जिन्होंने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए अपना अलग मुकाम बनाया है। आज पूर्वी भारत की वह सबसे शक्तिशाली महिला राजनेता हैं। बनर्जी की राजनीति की तरह ही उनका व्यक्तित्व भी बेहद रोचक है। अपने रूखे स्वभाव के लिए मशहूर ममता के बारे में कम लोगों को पता है कि वह एक संवेदनशील चित्रकार और कवियित्री हैं। शास्त्रीय संगीत में भी उनका अ'छा दखल है।
मंत्रालय का चाय-बिस्कुट भी स्वीकार नहीं

ममता बनर्जी की सादगी एक मिसाल है। वह अब भी कोलकाता के कालीघाट इलाके की झु'गी वस्तियों में एक कमरे के मकान में रहती हैं। दिल्ली भी आती हैं तो जूनियर सांसदों के लिए बने छोटे फ्ïलैट में रहती हैं। एनडीए सरकार के दौरान रेल मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाली बनर्जी ने उस समय मंत्रालय के सभी कर्मचारियों को चकित कर दिया जब वह हर चाय के कप और बिस्कुट के पैसे का भुगतान अपनी जेब से करने लगीं। पार्टी में बनर्जी के सबसे करीबी सिपाही और उनका दाहिना हाथ समझे जाने वाले रतन मुखर्जी का कहना है कि ममता ने कभी एक कप चाय के पैसे का खर्च भी मंत्रालय पर नहीं डाला।
तुनुकमिजाज
उनके तुनुकमिजाजी के किस्से भी अनेक हैं। इसकी मिसालें भी कम नहीं हैं कि अपनी पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं को उभरने नहीं देतीं। इसकी बड़ी मिसाल वरिष्ठ नेता सुब्रत मुखर्जी खुद हैं।

दुर्गा के अनन्य भक्त हैं प्रणब दा

कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेता प्रणब मुखर्जी की विद्वता तो जगजाहिर है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वह देवी के अनन्य उपासक हैं। चाहे कड़ाके की सर्दी हो या दिल्ली की जानलेवा गर्मी, प्रणब दा हर रोज सुबह चंडी पाठ की स्तुति करके ही निकलते हैं। दुर्गा की स्तुति से जुड़े सभी श£ोक उन्हें कंठस्थ हैं। एक दिन इसकी बानगी संसद में भी देखने को मिली जब भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा दुर्गा पर छपी किसी विवादास्पद किताब का मुद्ïदा उठा रहे थे। प्रणब मुखर्जी ने मल्होत्रा को बीच में टोकते हुए दुर्गा शप्तशती का श£ोक सुनाया और यह जाहिर कर दिया कि धर्म ग्रंथों के बारे में उनकी जानकारी कितनी मजबूत है।
प्रणब दा के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू है उनका क्षण में गुस्सा आना। छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना उनका स्वभाव है, जिसके चलते उनके करीबी अक्सर डरते हैं। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि जिस तेजी से उन्हें गुस्सा आता है उतनी ही तेजी से उतर भी जाता है।

सोमवार, 25 मई 2009

शरीर के लिए खतरनाक है कोका-कोला का सेवन


लंदन।अति हर चीज की बुरी होती है। ऐसा ही कोला के अधिक सेवन के साथ भी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोका कोला और पेप्सी जैसे शीतल पेय के अत्यधिक सेवन से खून में पोटेशियम की मात्रा खतरनाक स्थिति तक कम हो जाती है। नतीजतन, मामूली शारीरिक कमजोरी से लेकर मांसपेशियों के लकवाग्रस्त होने तक का खतरा बढ़ जाता है।
'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लीनिकल प्रैक्टिसÓ में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में यह बात कही गई है। प्रमुख शोधकर्ता और ग्रीस की आयोनिना यूनिवर्सिटी के डॉ. मोजेस एलिसाफ ने बताया कि कोला आधारित शीतलपेय में आमतौर पर मौजूद तीन तत्वों-ग्लूकोज, फ्रक्टोज और कैफीन के अधिक मात्रा में शरीर में जाने के कारण हाइपोकैलेमिया (खून में पोटाशियम का स्तर कम होना) की शिकायत होती है।
कंपनियों का आक्रामक प्रचार :
अमेरिका के ओहियो में स्थित लुइस स्टोक्स क्लीवलैंड वीए मेडिकल सेंटर के डॉ. क्लीफोर्ड पैकर ने कहा, 'हमारे पास इस बात पर विश्वास करने के पूरे कारण हैं कि शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों की आक्रामक मार्केटिंग, लोगों में कैफीन की लत आदि के कारण विकसित देशों में लाखों लोग प्रतिदिन दो से तीन लीटर कोला का सेवन करते हैं।Ó
दो उदाहरण :
अध्ययन रिपोर्ट में दो लोगों के उदाहरण दिए गए हैं, जिन्हें कोला के अधिक सेवन के कारण स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याएं हुर्ईं।
पहला :
हर रोज 4 से 10 लीटर कोला पीने वाले आस्ट्रेलिया के एक व्यक्ति को फेफड़ों में लकवे की शिकायत हो गई। हालांकि इलाज के बाद वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गया और डाक्टरों ने उसे कोला कम पीने की हिदायत दी।
दूसरा :
21 वर्ष की एक गर्भवती युवती को कमजोरी, उलटी और भूख न लगने की शिकायत पर अस्पताल में भरती कराया गया। वह बीते छह साल से हर रोज करीब तीन लीटर कोला का सेवन कर रही थी। जांच में पता चला कि उसके दिल की धड़कनें भी अनियमित चल रही हैं।
जो पहले से पता है :
कोला के अधिक सेवन से मोटापा, डायबिटीज और दांतों व हड्डियों की समस्या होने की बात पहले से ही पता है।

शनिवार, 23 मई 2009

हिट हो गया जूजू, मिला पेटा अवॉर्ड



टेलीकॉम ऑपरेटर वोडाफोन के जूजू विज्ञापन को पेटा (पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट फॉर एनिमल्स) ने भारत का पहला ग्लिटर बॉक्स पुरस्कार दिया है।

लेकिन, क्यों मिला ये अवॉर्ड?

पेटा का कहना है कि यह पुरस्कार विज्ञापनों में वास्तविक जानवरों की जगह मानव विकल्पों का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को दिया जाता है। पेटा ने इससे पहले वोडाफोन के पुराने विज्ञापनों में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति जताई थी।
पेटा की चीफ फंक्शनरी अनुराधा साहनी का कहना है कि इस विज्ञापन की लोकप्रियता से यह साबित होता है कि जानवरों के इस्तेमाल के बिना भी संदेश को पहुंचाने के बहुत से अन्य रास्ते मौजूद हैं।


वोडाफोन के ऐड कैरेक्टर 'जूजू'


इन छोटे-छोटे सफेद चेहरे हैं 'जूजू', जो इन दिनों वोडाफोन के ऐड में नजर आ रहे हैं। वोडाफोन अपनी वैल्यू ऐडेड सर्विसेज के ऐड में इन्हें पेश कर रही है। ऐड फिल्म्स बनाने वाली कंपनी निर्वाण फिल्म्स ने जूजू कैरेक्टर्स के साथ ये ऐड बनाए हैं, जिन्हें दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं। इससे पहले वोडाफोन का कुत्ते (पग) वाला ऐड भी निर्वाण फिल्म्स ने ही बनाया था।

रीयल कैरेक्टर हैं जूजू

आपको यह देखकर लगता होगा कि ये एनिमेटेड कैरेक्टर्स हैं, जो मानवीय संवेदनाएं दिखाते हैं। पर ऐसा नहीं है। ये मुंबई के लोकल थिएटर से लिए गए स्लिम वुमन एक्टर्स हैं, जिन्हें सफेद कपड़े पहनाकर जूजू का रूप दिया गया है।

जूजू का क्रेज जबर्दस्त

जूजू का क्रेज इतना ज्यादा है कि वोडाफोन के ऐड यूट्यूब पर सबसे ज्यादा वॉच किए जाने वाले विडियो हैं। फेसबुक पर जूजू के 1 लाख 30 हजार से ज्यादा फैन्स हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

क्यों आए जूजू?

दरअसल वोडाफोन अपने कुत्ते वाले 6 साल पुराने विज्ञापन को बदलना चाहती थी और कुछ नया भी करना चाहती थी। इसके बाद वोडाफोन ने निर्वाण फिल्म्स को इस तरह का कोई ऐड बनाने को कहा और जूजू का कॉन्सेप्ट भी हिट कर गया।
क्या है वोडाफोन का प्लान?वोडाफोन आईपीएल सीरीज के दौरान 30 अलग-अलग तरह के जूजू ऐड पेश कराना चाहती है। हर ऐड कंपनी की किसी न किसी वैल्यू ऐडेड सर्विस को प्रमोट करने के लिए होगा।

शुक्रवार, 22 मई 2009

पाइरसी का मुफ्त इलाज



आशीष पांडे

म्यूजिक पाइरसी को रोकने के लिए नया फंडा सामने आ रहा है। जी हां, अगर चोरी नहीं रोक सकते तो मुफ्त में दीजिए, कुछ इसी फॉर्म्युले को अपना रही हैं कंपनियां। यानी आप डिवाइस खरीदिए और डाउनलोड का अधिकार फ्री में पाइए। मोबाइल फोन इंडस्ट्री की कुछ सबसे बड़ी कंपनियां (जिनमें नोकिया भी शामिल है) जल्द ही इस तरह के पैकिज का ऐलान करने वाली हैं, लेकिन भारत में इसकी धमाकेदार शुरुआत वर्जिन मोबाइल ने कर दी है। आप वर्जिन का हैंडसेट खरीदेंगे तो एक लाख गानों के ऑनलाइन स्टोर के दरवाजे आपके लिए खुल जाएंगे। एक साल तक आप यहां से देसी-विदेशी कोई भी गाना डाउनलोड कर सकते हैं, बिल्कुल मुफ्त। वी-बाइट्स (वर्जिन मोबाइल डेटा पोर्टल) से फुल लेंग्थ गाना डाउनलोड करने के लिए फोन पर एक हॉट-की दी गई है। करीब सवा चार हजार रुपये के फोन पर आपको एक जीबी का कार्ड मिलेगा यानी खूब गाने स्टोर कीजिए।
क्या है फंडा
आपको फ्री में पैकिज देने के लिए म्यूजिक कंपनियां पैकिज प्रवाइडर्स के साथ आगे भी इस तरह की डील करेंगी। ऐसा वे गानों की पाइरसि रोकने के लिए करेंगी। इस वजह से इस पैकिज में मिलनेवाले मुफ्त गाने डीएमआर (डिजिटल म्यूजिक राइट) प्रोटेक्टेट होंगे। यानी इन गानों को आप अपने हैंडसेट पर लोड तो कर सकते हैं लेकिन दोस्तों को आगे फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे। इसी तरह, कार्ड से गाने को अपने पीसी में भी नहीं डाल पाएंगे। यानी मुफ्त का माल सिर्फ आपके लिए, आगे बांटने के लिए नहीं।
किसके लिए फायदेमंद
म्यूजिक अब सीडी से निकलकर फाइल्स में आ गया है। मोबाइल फोन और डिजिटल प्लेयर ने इसे काफी हद तक बदला है। ऑनलाइन स्टोर या दूसरी जगहों से पूरा गाना डाउनलोड करने पर 30-40 रुपये तक देने पड़ते थे या फिर दूसरा रास्ता होता था मुफ्त में गाना देने वाली पाइरटेड साइट्स का। ऐसे में फ्री का यह फंडा आज के यूथ को गिल्ट-फ्री मजा दे सकता है। आनेवाले वक्त में अगर नोकिया जैसे बड़े प्लेयर इस रास्ते पर नजर आएंगे तो पाइरसि पर काफी हद तक लगाम कसी जा सकेगी।
टीवी में एलईडी की चमक
एलसीडी और प्लाज्मा अब गुजरे दौर की बात हुई। ड्रॉइंगरूम में रखा टीवी सेट अगर आपके लिए स्टेटस सिंबल है तो एलईडी टीवी खरीदें। भारत में सैमसंग ने सबसे पहले एलईडी टीवी सेट की रेंज उतारी है और माना जा रहा है। एलईडी एक तरह से अडवांस्ड एलसीडी टीवी है। अंतर बस इतना है कि एलसीडी टीवी में बैकलाइट के लिए फ्लोरसंट लैंप इस्तेमाल किया जाता है, जबकि एलईडी टीवी में लाइट एमिटिंग डायोड। टीवी में बैकलाइट की वजह से ही आपको तस्वीर दिखती है। इंडस्ट्री का अनुमान है कि 2012 तक एलईडी का मार्किट शेयर 12 फीसदी तक हो सकता है।
क्या है नया
एलईडी टेक्नॉलजी ज्यादा स्मार्ट और इको फ्रेंडली है। एलईडी से ज्यादा ब्राइट पिक्चर आती है। इसके अलावा टीवी सेट की मोटाई भी महज दो इंच तक समेटी जा सकती है। एलसीडी और प्लाज्मा टीवी के मुकाबले एलईडी में बिजली की खपत कम होती है और यह गर्म भी कम होता है। इनमें मरकरी का भी इस्तेमाल नहीं होता।
क्या है भविष्य
फिलहाल तो एलईडी टीवी बेहद महंगे हैं और हर किसी की पहुंच से बाहर हैं। सैमसंग की सीरीज ही 1.25 लाख से शुरू होती है। लेकिन इस फील्ड की एजंसी विट्सव्यू का अनुमान है कि आगे रेट कम होंगे। माना जा रहा है कि आनेवाले वक्त में छोटे साइज के एलईडी टीवी सेट भी आएंगे, जिनकी कीमत कम होगी।

गुरुवार, 21 मई 2009

नेताओं की सम्पत्ति में 9 हजार प्रतिशत बढ़ोत्तरी

डॉ. महेश परिमल
अभी कुछ दिनों पहले ही हम सबने अपने घर के सामने या आमसभा के मंच से अपने प्रतिनिधियों को वोट की भीख माँगते देखा था। आपने जिसे अपना कीमती वोटै दिया, क्या जीता हुआ आपका वह प्रतिनिधि इसके लिए धन्यवाद देने के लिए आपके द्वार आया? नहीं ना! आप देखते रहें, वह तो फुर्र हो गया है पूरे 5 साल के लिए। अब तो वह नहीं आने वाला। हाँ इसके बजाए, आपके पास वह हारा हुआ प्रत्याशी बार-बार आएगा और आपको उलाहने देगा। वह यही कहेगा, देख लिया अपना कीमती वोट उसे देने का नजीता। संभव है जिस पार्टी पर आपने विश्वास किया हो, उसी के प्रतिनिधि को आपने वोट दिया, पर वही आज सरकार बनाने के लिए अपना दल बदल देगा, यह तो आपने नहीं सोचा था।
यह है आज के नेताओं की वह हकीकत, जिसे हम सब जानते हैं और हर बार 5 वर्ष के लिए मूर्ख बन जाते हैं, पर क्या आपको पता है कि यही नेता आजकल इतना अधिक कमाने लगे हैं कि उनकी संपत्ति में बेशुमार वृद्धि हो रही है। जनता की सेवा से इतना अधिक लाभ! भला हो भारतीय जनता का। जो अपने साधारण से जनप्रतिनिधि को एकदम से ऊपर उठाकर इतने ऊँचे पर बिठा देती है कि वह 5 साल तक नीचे उतरता ही नहीं। आपको शायद मालूम नहीं होगा कि नेताओं की संपत्ति के बारे में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पता चला है कि इनकी संपत्ति में 9 हजार प्रतिशत तक वृदधि पाई गई है। सियासत के रास्ते लक्ष्मी दर्शन का यह एक अनोखा ही वाकया है, जो केवल भारत में ही देखा जा सकता है।
भारतीय लोकतंत्र में राजनीति से बेहतर कमाई का कोई और धंधा नहीं हो सकता। यह बात उजागर हुई है पिछले पाँच सालों के दौरान सांसद रहे उन 229 नेताओं की संपत्ति के विश्लेषण से जिन्होंने इस बार दोबारा चुनाव लड़ा। नेशनल इलेक्शन वॉच के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आए हैं। इन नेताओं ने यह ब्योरा अपने नामांकन के साथ दिए हलफनामों में दिया है। यह निष्कर्ष उनके पिछले हलफनामों का विश्लेषण करके निकाला गया है। संपत्ति में सर्वाधिक वृद्घि उत्तर प्रदेश के मोहम्मद ताहिर की रही, जो पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 9137 फीसदी ज्यादा है। पश्चिम बंगाल की सुष्मिता बाउरी की संपत्ति में 3151.52 फीसदी, महाराष्ट्र के सुरेश गणपतराव वाघमारे की संपत्ति में 2159.64 फीसदी, उ.प्र के ही अक्षय प्रताप सिंह गोयल की संपत्ति में 1841 फीसदी और राजस्थान के सचिन पायलट की संपत्ति में 1746 फीसदी की वृद्घि केवल पिछले पाँच सालों में हुई है। फिर से चुनाव लडऩे वाले सांसदों की औसत व्यक्तिगत संपत्ति में 298 फीसदी या 2.67 करोड़ रुपए की बढ़त है।
संपत्ति में वृद्घि के मामले में पहला स्थान कर्नाटक के सांसदों का है, जो पाँच साल के भीतर पिछली बार की तुलना में औसतन 693 फीसदी अमीर हुए हैं। उ.प्र के सांसद पांच सालों में 559 फीसदी, छत्तीसगढ़ के 433, असम के 411, पं. बंगाल के 386, मणिपुर के 352, दादरा व नगर हवेली एवं झारखंड़ के 254, राजस्थान के 253, उड़ीसा के 236, मध्यप्रदेश के 221, महाराष्ट्र के 211, गुजरात के 198, आंध्र प्रदेश के 194, एनसीटी दिल्ली के 185, त्रिपुरा के 178, केरल के 144, अरूणाचल के 131, गोआ के 118, बिहार के 108, लक्षद्वीप के 37, हरियाणा के 24 और जम्मू कश्मीर के औसत सांसदों की संपत्ति में पिछले पांच सालों में औसतन 11 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई है। कुछ सांसदों ने अपनी संपत्ति को बिना मूल्य के घोषित किया है जिसे अध्ययन में शून्य माना गया है।
आईआईएम बंगलौर के डीन प्रो. त्रिलोचन शास्त्री का कहना है कि राजनीति देश में पैसा बनाने का सबसे बड़ा जरिया बन गई है। वे कहते हैं कि यहाँ कमाई की कोई सीमा नहीं है और ये नेता किसी के प्रति उत्तरदायी भी नहीं है। राजनीति ही एकमात्र ऐसा व्यवसाय है जिस पर मंदी की कोई मार नहीं है। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व निदेशक प्रो. जगदीश छोक्कर की टिप्पणी और ज्यादा कड़ी है। वे कहते हैैं कि इन आंकड़ों से साफ है कि ये नेता आम लोगों की सेवा के बजाए अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में लगे हैं। इन निर्वाचित प्रतिनिधियों की संपत्ति में हो रही बेतहाशा वृद्घि क्यों और कैसे हो रही है वे इसमें पारदर्शिता लाने की वकालत करते हैं। नेशनल इलैकशन वॉच के राष्ट्रीय समन्वयक अनिल कहते हैं कि जब देश की आर्थिक स्थिति निरंतर कमजोर हो रही हो तो नेताओं की संपत्तियों का आकाश छूना चिंता का विषय है। नेताओं को इस बारे में जनता को जवाब देना चाहिए।
ऐसा नहीं है कि नेताओं की संपत्ति बढ़ती ही जा रही है। हर बात का दूसरा पहलू भी होता है। मजे की बात यह है कि जहाँ अधिकांश सांसदों की आय में जोरदार बढ़त दर्ज की गई है वहीं कुछ ऐसे भी सांसद हैं जो पाँच साल के कार्यकाल के बाद गरीब हो गए हैं। इनमें अधिकतम कमी कर्नाटक के एस बंगारप्पा की रही जिनकी संपत्ति में पिछले पांच साल में 79 फीसदी की कमी आई है। जम्मू कश्मीर के लाल सिंह की संपत्ति में 67.44 फीसदी और उड़ीसा के प्रसन्ना कुमार पटसनी की संपत्ति में 66.74 फीसदी की कमी आई है।
तो देखा आपने हमारे धन बटोरु नेताओं का चमत्कार। मंदी की मार से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। आखिर वे ऐसा क्या करते हैं कि सम्पत्ति में लगातार इजाफा ही होता रहता है। क्या सचमुच जनता की सेवा करने से इतना अधिक लाभ होता है। शायद इसीलिए लोग राजनीति में आना चाहते हैं। तभी तो उन्हें वोट माँगने में भी शर्म नहीं आती, उसके बाद अपने वादों से मुकर जाना भी उन्हें अच्छी तरह से आता है। हमारे मतदाता अभी भी नहीं जागे, तो निश्चित रूप से हमारे द्वारा ही चुने गए हमारे प्रतिनिधि इस देश को रसातल में ले जाएँगे। आज दुष्यंत कुमार की पंक्ति बरबस ही याद आ रही है
हो गई है पीर पर्वत से पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।

डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 20 मई 2009

इन 10 देशों में ब्लॉगिंग 'खतरनाक'

इन 10 देशों में ब्लॉगिंग 'खतरनाक'

एएनआई
न्यू यॉर्क की एक समिति ने ब्लॉगिंग और ऑनलाइन गतिविधियों पर पाबंदी के लिहाज से 10 सबसे खराब देशों की लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट में बर्मा यानी म्यांमार को पहले नंबर पर रखा गया है।

आइए बाकी कौन-से 9 देश शामिल हैं इस लिस्ट में...
ईरान में एक यंग ब्लॉगर की पिछले महीने जेल में मौत हो गई। ब्लॉगिंग के लिहाज से इस देश को दूसरा सबसे खराब देश बताया गया है।
सीरिया
यहां इंटरनेट कैफे मालिकों को ग्राहकों को रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया है।
क्यूबा
इस देश में 21 ब्लॉगर्स जेल में है।
सउदीअरब
इस देश में करीब 4000 साइट्स पर सरकारी पाबंदी लगी है।
वियतनाम
में ऑनलाइन गतिविधियों पर व्यापक सरकारी सख्ती है।

ट्यूनिशिया
ट्यूनिशिया में ऑनलाइन गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण है।

चीन
चीन में भी ऑनलाइन गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण है।
तुर्कमेनिस्तान

मंगलवार, 19 मई 2009

नेताओं की भाषा करती है चरित्र उजागर


डॉ. महेश परिमल
यह हमारे लोकतांत्रिक देश के लिए कितनी शर्मनाक बात है कि चुनाव आयोग को यह कहना पड़ रहा है कि नेता अपनी जुबान पर लगाम रखें। एक तरफ जनसैलाब देखकर नेताओं के भीतर खुशी का सागर उमड़ता है, वहीं दूसरी तरफ इस खुशी के मारे उनकी जबान फिसलने लगती है। यही कारण है कि इन दिनों अखबारों और टीवी पर नेताओं की फिसलती जबान सुखर््िायाँ बनने लगी हैं। उधर चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के आचरण पर चुनाव आयोग ने खासी नाराजगी जताई है। आयोग ने सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय व प्रादेशिक दलों के प्रमुखों व महासचिवों को पत्र लिखकर आचार संहिता की याद दिलाते हुए इसका पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
आयोग की सर्वाधिक नाराजगी इस बात को लेकर है कि प्रमुख पार्टियों के बड़े नेता चुनावी सभाओं में विरोधियों पर कथित रूप से न केवल गैरजरूरी और अमर्यादित टिप्पणियां कर रहे हैं, बल्कि जाति व धर्म के आधार पर भड़काऊ भाषण भी दे रहे हैं। स्थानीय रिवाजों के नाम पर खुलेआम पैसे बाँटने पर भी उसे आपत्ति है। आयोग का मानना है कि राजनेताओं का यह आचरण धीरे-धीरे परंपरा बनता जा रहा है, जो कि भविष्य के लिए चिंताजनक है। पत्र में आयोग ने सभी राजनैतिक दलों को आचार संहिता के प्रावधानों की याद दिलाते हुए कहा है कि उसे रोजाना बड़े पैमाने पर इसके उल्लंघन की शिकायतें मिल रही हैं। चुनाव प्रचार के दौरान सामाजिक वैमनस्य फैलाने की कोशिशों पर चिंता जताते हुए आयोग ने सभी दलों को सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया है। आयोग ने उम्मीद जताई है कि निष्पक्ष एवं भयमुक्त चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में सभी राजनैतिक दल अपने प्रचार अभियान में उच्च मानदंड स्थापित करेंगे।
आजकल हमारे नेताओं की भाषा उनका असली चरित्र उजागर कर रही है। यह उनके भीतर की एक खीज है, जो शब्दों के रूप में बाहर आ रही है। कोई ऐसा मुद्दा तो है नहीं, जिससे वे आक्रामक हो सकें, इसलिए भाषा के माध्यम से वे अपने आप को महान बताने में तुले हुए हैं। उन्हें शायद नहीं मालूम कि इस तरह के संवाद केवल फिल्मों और नाटकों में ही अच्छे लगते हैं। जहाँ एक ओर फिल्म वाले राजनीति में जा रहे हैं, वहीं फिल्मों के संवाद राजनीति में आने लगे हैं। नेताओं का यह वाणी विलास उनके लिए किस तरह के खतरे पैदा कर सकता है, यह तो 16 मई को ही पता चलेगा। पहली इस तरह की भाषा केवल दूसरे या तीसरे स्तर के नेता ही प्रयुक्त करते थे, प्रथम दर्जे के नेताओं की वाणी पर नियंत्रण रहता था। वे धीर-गंभीर होकर अपनी बात कहते थे। पर अब तो प्रथम दर्जे के नेता भड़काऊ भाषण करने लगे हैं। एक तरफ विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री को कमजोर प्रधानमंत्री बताने पर तुले हुए हैं, तो वहीं मनमोहन सिंह की तरफ से भी तीखे कटाक्ष किए जा रहे हैं।
गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान कांगे्रसाध्यक्ष का केवल एक वाक्य 'नरेंद्र मोदी मौत के सौदागर हैंÓ उन्हें महँगा साबित हुआ। क्योंकि नरेंद्र मोदी ने केवल इसी एक वाक्य को बार-बार सभाओं में दोहराकर लोगों से यही पूछा कि क्या मैं आपको मौत का सौदागर दिखाई देता हूँ? बस यहीं कांगे्रस मात खा गई और उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस बार फिर नरेंद्र मोदी कांगे्रस को बूढ़ी बताकर चर्चाओं में हैं। इसके जवाब में प्रियंका गांधी ने उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान पत्रकारों से पूछा- क्या मैं आपको बूढ़ी दिखाई देती हूँ? इसके जवाब में नरेंद्र मोदी ने कांगे्रस को गुडिय़ा कहा है। अब प्रियंका ने कहा है कि भाजपा के बूढ़े नेताओं को अरब सागर में डूबा देना चाहिए। क्या ऐसे लोगों के हाथों पर हम देश की सत्ता सौंपने जा रहे हैं, जो इस तरह की ओछी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं?
इस बार चुनावों में पहले से ही कांगे्रस की तरफ से सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का नाम सुनने को मिल रहा था, अचानक मेनका गांधी के पुत्र वरुण गांधी का नाम सामने आया, जब उन्होंने एक सभा में कहा-'' इन लोगों के नाम भी खूब डरावने होते हैं, यदि आप इनके नामों को रात के समय सुनो, तो घबरा ही जाओगे। यदि कोई हिंदुओं के सामने ऊँगली उठाए या सोचे कि हिंदू कमजोर हैं, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं वह हाथ ही काट डालूँगा।ÓÓ माफिया वाले भी इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करते, जो आजकल राजनेता कर रहे हैं। वरुण गांधी के भाषण की प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा कि ''यदि मैं गृहमंत्री होता, तो परिणामों की ङ्क्षचता किए बिना मुसलमानों के खिलाफ भाषण करने वाले वरुण गांधी को रोलर के नीचे कुचल डालता।ÓÓ इस बयान के खिलाफ जब पुलिस में रिपोर्ट की गई, तब लालू ने यू टर्न मारते हुए कहा था कि मेरा आशय कानून का रोलर था। इसके जवाब में राम विलास पासवान ने कहा कि 'यदि मैं रेल मंत्री होता, तो लालू प्रसाद के ऊपर टे्रन का इंजन चला देता।Ó भाजपा के इस नेता का बिहार में भले ही महत्व हो, पर राष्ट्रीय राजनीति में उनका महत्व थोड़ा कम है, इसलिए उनके इस बयान पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। सत्ता की कुर्सी पर बैठकर प्रजा की समस्याओं का समाधान करने वाले हमारे नेता अब डायलागबाजी से लोगों को भरमाकर वोट बटोरने का काम करने लगे हैं।
सभी नेता सोच-समझकर भाषण नहीं करते। कभी आवेश में आकर तो कभी हताशा के कारण उनके मुँह से कसैले शब्द फिसलने लगते हैं। उधर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कह दिया कि ''ये नीतिश कुमार कौन हैं? नीतिश कुमार (डाकू) लल्लन सिंह का साला है।ÓÓ हमेशा संयत वाणी का प्रयोग करने वाली सुषमा स्वराज भी कभी-कभी असंयत हो जाती हैं। एक बार संसद में ही उन्होंने शरद पवार को ललिता पवार कहा था। अब उन्होंने लालू यादव पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है ''लालू प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं, वे बिहार जेल के जल्लाद बन गए हैं, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।ÓÓ इसके जवाब में लालू यादव ने अपने इतिहास ज्ञान को बघारते हुए कहा ''यदि सुषमा स्वराज मुझे जल्लाद कहती हैं, तो वे पूतना मौसी हैं।ÓÓ हमारे नेता इस प्रकार की बयानबाजी से ही चुनाव जीतने की आशा रखते हैं।
हमारे नेता यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आज की जनता अब गंभीर बातों पर दिलचस्पी नहीं लेती, उन्हें मजाकिया भरे शब्दों वाली भाषा अच्छी लगती है, इसलिए वे इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। देश की आर्थिक नीतियों या सामाजिक सुधारों पर उनके विचारों को सुनने वाला कोई नहीं है। आज भी भारतीय मतदाताओं के लिए चुनाव एक तमाशा है। जो मतदाताओं का सबसे अधिक मनोरंजन कर सके, उन्हें ही अधिक वोट मिलते हैं। शायद इसीलिए मायावती ने मेनका गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा ''मेनका ने वरुण तंदुरुस्त लालन-पालन किया होता, तो उसे जेल में न जाना होता।ÓÓ इसका जवाब भी मेनका ने उसी तेवर के साथ कुछ इस तरह से दिए ''मायावती माँ होती, तो माँ की वेदना समझ सकती।ÓÓ
वास्तव में हमारे नेता चुनाव को एक लोकशाही प्रक्रिया न समझते हुए इसे एक युद्ध मानते हैं। जिस तरह से युद्ध और प्रेम में 'सब चलता हैÓ की तर्ज पर किसी भी तरह से जीत हासिल करना चाहते हैं। अब उनके शब्दकोश से विचारधारा और शालीनता जैसे शब्द ही गायब हो गए हैं। उधर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे कभी कहते हैं ''मराठी माणुस को भी प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। दूसरी ओर वे फिर कहते हैं कि किसी भी मराठी माणुस में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत ही नहीं है।ÓÓ आखिर ये क्या है? हमारे नेता यह न भूलें कि जो प्रबुद्ध हैं, उन्होंने तो चार दिन की छुट्टी के मजे लेने के लिए घूमने जाने का मन बना लिया है। अब तो केवल दलित, गरीब, लाचार, बेबस, हरिजन और आदिवासी मतदाता ही घर पर रहेंगे, वे ही वोट डालने जाएँगे। इन हालात में किसी प्रबुद्ध और ईमानदार प्रत्याशी के चुने जाने की संभावना बहुत ही कम है। जैसे मतदाता वैसे नेता, शायद यही है भारतीय मतदाताओं की नियति।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 18 मई 2009

पिघल गई 26/11 की संवेदनाएँ


डॉ. महेश परिमल
हम सभी को याद होगा कि मुम्बई पर हुए हमले के बाद बुद्धिजीवियों में देश के नेताओं के खिलाफ काफी आक्रोश देखा गया था। लोगों ने कई तरह की रैली निकाली थी। कहीं मौन रैली, तो कहीं मोमबत्ती रैली। इस रैली में बुद्धिजीवियों ने संकल्प किया था कि देश की इज्जत को दाँव पर लगाने वाले नेताओं को सबक सिखाया जाएगा। इस माध्यम से बुद्धिजीवियों ने अपना एक स्वस्थ स्वरूप को दर्शाने की कोशिश की थी। उनके इस मौन आंदोलनों को कई लोगों ने सराहा था। तब ऐसा लग रहा था कि इस बार का चुनाव देश की दशा निर्धारित करेगा। निश्चित रूप से यह चुनाव एक मोड़ साबित होगा। पर केवल 5 महीनों में ही वह आक्रोश और सारी संवेदनाएँ मोम की तरह पिघल गई। इस बार भी चुनाव आम चुनाव की तरह रहा। धन का खुलेआम खुल्ला खेल खेला गया। आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ी, चुनाव आयोग ने इसे स्वीकारा भी और अपनी लाचारगी भी व्यक्त की। जहाँ चुनाव आयोग ही लाचार हो, तो फिर उस देश में स्वस्थ चुनाव की कल्पना ही कैसे की जा सकती है?
इस बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने कुछ ईमानदार कहे जाने वाले लोगों ने भी अपनी किस्मत आजमाई थी। लोगों के सामने एक अवसर आया था कि लीक से हटकर चलने वालों को वोट दिया जाए और संसद में भेजा जाए। ताकि संसद और सांसद की गरिमा बनी रहे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस बार दक्षिण मुंबई से एक महिला प्रत्याशी लोगों के सामने आईं, यह हैं मीरा सान्याल। बैंकिंग के क्षेत्र में एक उच्च अधिकारी का पद सँभालने वाली मीरा सान्याल में एक सांसद बनने की पूरी योग्यता है। मायानगरी में जीने वाले लोगों को एक अवसर मिला था कि वे इतिहास रच सकें। पर शायद नेताओं के आश्वासन उन्हें इतने अधिक भाते हैं कि उनकी आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बँध जाती है। मुझे या किसी को नहीं लगता है कि मीरा सान्याल जीत पाएँगी। पर मतदाता चाहते तो यह संभव हो सकता था। यही बुद्धिजीवी मतदाता, जिसने संकल्प लिया था कि देश की आबरु को नीलाम करने वाले नेताओं को इस बार सबक सिखाया जाएगा। इन्हीं उदासीन मतदाताओं के कारण ही ऐसे नेता संसद पहुँच जाते हंै, जो संसद की गरिमा को नहीं जानते। इसीलिए वे नागरिकों की अपेक्षा पर भी खरे नहीं उतर पाते। यही होता है कुछ लोग यह मानते हैं कि जो प्रत्याशी हमारे सामने हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जो हमारी अपेक्षाओं को पूरा कर सके। उनकी इसी विचारधारा के कारण वे वोट नहीं देते और ऐसे लोग संसद में पहुँच जाते हैं, जिन्हें वे नहीं चाहते।
मतदान का एक छोटा सा गणित यदि आपको समझ में आ जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसा कैसे होता है कि जिसे हम हराना चाहते हैं, वह जीत क्यों जाता है? वास्तव में कुछ लोग मतदाताओं की उदासीनता का ही लाभ उठाकर संसद तक पहुँच जाते हैं। मान लो, किसी मतदान क्षेत्र में 50 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें कोई प्रत्याशी 40 प्रतिशत मत पाकर जीत जाता है, तो इसका आशय यही हुआ कि उस क्षेत्र के 80 प्रतिशत लोग उस जीते हुए प्रत्याशी को नहीं चाहते। फिर भी वह जीत गया। इसे मतदाताओं की उदासीनता ही कहा जाएगा कि जिसे वे नहीं चाहते, वह जीत जाता है। ये लोकतंत्र है, जिसमें जिसे 80 प्रतिशत लोग नहीं चाहते, फिर भी वह जीत की खुशियाँ मनाता है।
अक्सर होता यह है कि चुनाव के ठीक एक दिन पहले सभी दलों के कार्यकर्ता शराब की नदियाँ बहा देते हैं, इसके साथ ही नोटों की गड्डियाँ भी बाँटी जाती है। इसका मतलब यह कतई नहीं होता है, जिसने उपरोक्त दोनों सुविधाएँ प्राप्त की हैं, वह उसे उपकृत करने वाले को वोट देगा। ऐसा नहीं है, इसके पीछे का गणित यही है कि सभी दल के लोग यही चाहते हैं कि इस क्षेत्र के लोग निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धी को वोट देंगे, तो उन्हें इतनी शराब पिलाई जाए कि दूसरे दिन वह वोट देने जाने की भी स्थिति में न हो। जितना कम मतदान, उतना ही अधिक फायदा। हर दल अपने चुनावी भाषण में यही कहता है कि अधिक से अधिक संख्या में मतदान करें। जिस दिन मतदान का आँकड़ा शत-प्रतिशत होगा, उस दिन तो निश्चित रूप से प्रलय ही आ जाएगा, क्योंकि वे सभी प्रत्याशी जो अब तक लोगों का खून चूसने का काम करते आए हैं, उनका नामो-निशान ही मिट जाएगा।
मतदान न करके लोग अपनी नाराजगी का ही इजहार करते हैं। पर यह गुस्सा जायज नहीं है। यदि सचमुच प्रत्याशियों से नाराजगी है, तो उसे वोट न देकर अपने गुस्से को बाहर निकाला जाए। हमारे लोकतंत्र में ही कहीं खामी है, जिसके तहत हमें सही प्रत्याशी चुनने का अवसर नहीं मिलता। अभी हमारे पास बेहतर विकल्प नहीं हैं। इसके लिए यही हो सकता है कि मतपत्र में एक कॉलम ऐसा भी होना चाहिए कि इसमें से कोई भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जिस पर हम विश्वास कर सकें। यदि उस पर अधिक लोगों ने अपनी मुहर लगाई है, तो उस क्षेत्र के प्रत्याशी बदले जाएँ, ताकि ईमानदार लोग सामने आ सकें। अब चुनाव जीतना बलशाली लोगों का काम हो गया है। आम आदमी चुनाव में खड़ा भी नहीं हो सकता। धन और बाहुबल से चुनाव जीता जा सकता है, यह इस चुनाव से सिद्ध भी हो गया है। यही बुद्धिजीवी वर्ग है, जो सजग है, इसीलिए वह वोट नहीं देता, पर जब अच्छे अवसर सामने आते हैं, तब वह सजग नहीं हो पाता। अकसर बुद्धिजीवी क्षेत्र में ही कम मतदान क्यों होता है, यह जानने की कोशिश की कभी किसी ने? आज भले ही वे वोट न डालकर अपने को बुद्धिजीवी कहलवा लें, लेकिन भविष्य में यदि मुगालता उन्हें कहीं का नहीं रखेगा, यह तय है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 15 मई 2009

सबसे अधिक जूते लालू पर पड़े हैं........



डॉ. महेश परिमल
शीर्षक निश्चित रूप से आपको चौंका सकता है। पर सच यही है कि आज जिस तरह से लालू प्रसाद यादव बेलगाम होते जा रहे हैं, उनका व्यवहार उनकी वाणी में झलकने लगा है, उससे उनकी छवि लगातार धूमिल होती जा रही है। वैसे ये महाशय सदैव अपनी वाकपटुता के लिए जाने जाते रहे हैं। उनकी शैली ही आज उनकी दुश्मन बन गई है। लोग उन्हें सामने तो कुछ नहीं कहते, पर पीठ पीछे उनको उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वैसे चुनाव प्रचार के दौरान हर तरह के नेताओं पर जूते फेंके गए हैं, मानो जूता पहनने की वस्तु न होकर अपने आक्रोश को निकालने की वस्तु हो। यदि किसी के कहा जाए कि उसे कुछ देर के लिए यह वरदान मिल जाए कि एक निश्चित समय तक वह लोगों की ऑंखों से अदृश्य हो जाएगा, वह जो कुछ भी करेगा, किसी को दिखाई नहीं देगा, तो निश्चित रूप से वह व्यक्ति अपने दुश्मन की पिटाई करना चाहेगा। गरीब होगा, तो वह किसी बैंक में जाकर काफी धन ले आएगा। लेकिन अधिकांश लोग यही चाहेंगे कि वह अपने दुश्मन की पिटाई करे और कोई देखे भी नहीं। लोग डब्ल्यूडब्ल्यूएफ शायद इसीलिए देखते हैं कि उसमें जो पिटता है, उसे देखने वाला अपने दुश्मन को देखता है और जो पीटता है, उसमें वह अपनी छबि देखता है।
मनुष्य की इसी भावना को ध्यान में रखकर एक भलेमानुस ने एक वेबसाइट तैयार की है, जिसमें कई नेताओं की तस्वीरों पर आप जूते मार सकते हैं। इस वेबसाइट को शुरू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं और यह लगातार लोकप्रिय होते जा रही है। जानते हैं अब तक किसे सबसे अधिक जूते मारे गए हैं। जी हाँ शीर्षक तो यही बताता है। वह हैं हमारे बड़बोले लालू प्रसाद यादव। तो फिर जान लो, इस वेबसाइट का नाम। इसका नाम है (www.joote maro. com) यानी डब्ल्यूडब्ल्यू. जूते मारो डॉट कॉम। इसमें एक सुविधा यह भी है कि व्यक्ति किसी भी नेता को कितने भी जूते मार सकता है। अभी तक यह सुविधा किसी के पास नहीं थी कि जिस नेता को हम धिक्कारते हैं, उन्हें हम खुलेआम जूते मार सकते हों। वेबसाइट के माध्यम से लोगों को यह सुविधा मिल गई है। इस वेबसाइट को शुरू करने वाले से पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इसे केवल निर्दोष मनोरंजन के लिए ही शुरू किया गया है। इसका संबंध किसी राजनीतिक दल से नहीं है, इसलिए इसमें सभी दलों के नेताओं की तस्वीरें हैं। आप जिसे चाहें, जूते मार सकते हैं और अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
जूते मारो डॉट कॉम पर नेताओं का बँटवारा तीन चरणों पर किया गया है। पहले चरण में सबसे अधिक जूते खाने वाले दस नेताओं की तस्वीरों को रखा गया है। उन्हें उनके स्कोर के मुताबिक घटते क्रम में रखा गया है। दूसरे चरण में उन दस नेताओें को रखा गया है, जिन्होंने उपरोक्त दस नेताओं से कम जूते खाए हैं। तीसरे चरण में उन नेताओं को शामिल किया गया है, जो अभी-अभी राजनीति में आए हैं। इसी में पहले चरण्ा में 11 हजार 7 सौ 32 हिट्स के साथ रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव सबसे आगे हैं। दूसरे नम्बर पर 10,655 हिट्स के साथ मनसेना के राज ठाकरे हैं। राज ठाकरे की पार्टी के प्रत्याशियों में से किेतने जीत पाएँगे, यह तो किसी को पता नहीं, पर इस जूते स्कोर में उन्होंने एक लंबा हाथ मार लिया है। जूते बटोरने में तीसरा नम्बर कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी का नम्बर आता है। इनके लिए कुल 7536 हिट्स किए गए। इसके बाद 7053 हिट्स के साथ लाल कृष्ण्ा आडवाणी, नरेंद्र मोदी 6226 हिट्स, मायावती 2770 हिट्स के साथ छठे क्रम पर आती हैं। आपको आश्चर्य होगा कि इसमें हमारे सीधे-सादे प्रधानमंत्री का कहीं कोई नाम क्यों नहीं है? सचमुच हमारे मनमोहन सिंह मन को इतना मोहते हैं कि उन्हें अधिक हिट्स नहीं मिले। उनके खाते में 2101 हिट्स ही आए हैं। इसके बाद मुलायम सिंह, करुणानिधि और सुषमा स्वराज का नम्बर आता है।
जिन दस नेताओं पर सबसे कम जूते मारे गए हैं, वे हैं भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी(341), दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित (277)। इस सूची में कई अन्य नेताओं के भी नाम हैं, इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का समावेश होता है। जूते मारो डॉट कॉम एक खेल है, इसमें आप माउस क्लिक करके किसी भी नेता को जूते मार सकते हैं। आप जितने जूते कथित नेता को मारेंगे, उसके स्कोर में वृद्धि होती जाएगी। चुनाव के दौरान होने वाले शोर से मतदाता यदि बुरी तरह से बोर हो गए हों, उनके लिए यह साइट एक स्वस्थ मनोरंजन देगी, ऐसा कहा जा सकता है। इसे दृष्टिगत रखते हुए इंटरनेट पर आजकल राजनीति से संबध्द कुछ वेबसाइट शुरू की गई है। कई इंटरएक्टिव गेम भी शुरू किए गए हैं। इनकी संख्या करीब एक दर्जन है। इतने सारे गेम हों और उसमें हमारे लालू प्रसाद यादव न हों, ऐसा कभी हो सकता है? यह गेम खूब खेला जा रहा है। इस गेम में लालू यादव को रेलवे स्टेशन पर दिखाया गया है, जो रात की आखिरी टे्रन का इंतजार कर रहे हैं। ट्रेन आती है और छूट भी जाती है, पर लालू टे्रन पर नहीं चढ़ पाते हैं। टे्रन जा रही है, लालू दौड़ रहे हैं। टे्रने तेज होती जाती है, तो लालू की मशक्कत बढ़ जाती है। वे हिम्मत नहीं हारते। वे भी टे्रन को पकड़ने की जी-तोड़ मेहनत करते हैं। कई बाधाएँ आती हैं, लालू उनका सामना करते हैं, आखिरकार उन्हें टे्रन नहीं मिल पाती। वे चूक जाते हैं। इस गेम से यह बताने की कोशिश की गई है कि आज लालू की पार्टी की जो हालत है, उससे उससे वे प्रधानमंत्री तो नहीं बन पाएँगे, बल्कि उनसे रेल मंत्री का पद भी चूक जाएगा।
इंडिया वोटिंग डॉट कॉम नाम की एक वेबसाइट पर एक नेता गली में वोट माँगने के लिए निकलता है। वह एक मकान के पास आता है और वोट की भीख माँगता है। सभी नागरिक एक के बाद एक घर का दरवाजा खोलकर बाहर निकलते हैं और नेता की पेटी पर अपने वोट को फेंकते हैं। इससे कुछ वोट ही उसकी पेटी पर गिरते हैं। बाकी वोट पास की कचरापेटी पर गिरते हैं। कई नागरिक वोट देने के बजाए नेता को जूते मारते हैं। आखिर में नेता को भीख में मिले वोटों की गिनती होती हैं, जिसके आधार पर उन्हें पराजित माना जाता है। लोग खुशियाँ मनाते हैं। एक अन्य गेम में नेता मंच से आश्वासनों की झड़ी लगा देता है। लोग उसके आश्वासनों के आधार पर फूलमालाएँ लाकर उसे पहनाते हैं। अच्छा और ईमानदारीपूर्ण भाषण करने वाला नेता जीत जाता है।
आजकल लोग मतदान नहीं करना चाहते। मतदान का प्रतिशत लगातार गिर रहा है। इसका आशय यही हुआ कि लोग नेताओं की इात नहीं करते। सभी प्रत्याशियों के प्रति उनकी नाराजगी दिखाई देती है। इसी नाराजगी को देखते हुए इस तरह की वेबसाइट बनने लगी है, ताकि लोग अपना गुस्सा किसी तरह बाहर निकाल पाएँ। आज के नेता इसे भले ही मजाक के रूप में लें, पर इसमें लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है, इससे यह सिध्द हो जाता है कि अभी तो यह नाराजगी वेबसाइट पर माउस के माध्यम से निकल रही है, पर नेताओं ने यदि अपना चरित्र नहीं बदला, तो संभव है कि हर हाथ में जूता होगा और ऑंखों में होंगे अंगारे। अगर इससे बचना है तो नेताओं को अपने बारे में न सोचकर केवल देश के बारे में सोचना होगा।
डॉ. महेश परिमल

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