बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मधुशाला - भाग 1 - हरिवंशराय बच्चन

कविता का अंश... मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ - 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६। चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला! 'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला, हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे, किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७। मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला, हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला, ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का, और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८। मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला, अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला, बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे, रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९। सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला, सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला, बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है, चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०। जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला, वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला, डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है, मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११। मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला, अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला, पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले, इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२। हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला, अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला, बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले, पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३। लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला, फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला, दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं, पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४। जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला, जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला, ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है, जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५। बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला, देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला, 'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले' ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६। धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला, मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला, पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका, कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७। लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला, हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला, हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा, व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८। बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला, रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला' 'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे' मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९। बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला, बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला, लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें, रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

बाल कहानी – मेहनती रामदीन

कहानी का अंश… एक गाँव में एक किसान रहता था। खेती-बाड़ी कर वह अपना और अपने परिवार का गुजारा चलाता था। उसके घर में एक लड़का नौकरी करता था। उसका नाम था रामदीन। पिछले कुछ वर्षों में बारिश न होने के कारण गाँव में पानी की बहुत कमी थी। रामदीन बहुत लापरवाह था। वह पानी का मोल नहीं समझता था। पानी को बरबाद करता रहता था। किसान ने उसे कई बार समझाया कि पानी बहुत मूल्यवान है, इस तरह से उसे बरबाद मत करो लेकिन रामदीन को किसान की बातों का असर नहीं होता था। एक दिन गुस्से में आकर किसान ने उसे घर से निकाल दिया। रामदीन गाँव से निकलकर जंगल में भटकता रहा। भूख और प्यास से उसका बुरा हाल था। आखिर वह एक गाँव में पहुँचा। उसकी जान में जान आई। उसने सोचा – शायद गाँव में कुछ खाने को मिल जाए। जब वह गाँव में अंदर पहुँचा तो देखा कि एक कुँए के पास बहुत से लोग इकट्ठेक हैं। उसने पूछा – क्या बात है? एक गाँववाला बोला- कुछ दिन पहले तक इस कुँए में बहुत पानी था। ठंडा और मीठा पानी। लेकिन अब न जाने क्या हो गया, कुँए का पानी सूख गया है। ऐसा क्यों हुआ, कुछ समझ में नहीं आता है। हम सोच रहे हैं कि कोई इस कुँए में उतरे और इस रहस्य का पता लगाए लेकिन कोई तैयार ही नहीं है। रामदीन ने सोचा कि यदि मैं इस रहस्य का पता लगाउं तो इनाम भी मिल सकता है। उसने गाँव वालों से कहा कि वह इस कुँए में उतरने के लिए तैयार है। गाँववालों ने एक मजबूत रस्सी से एक बड़ी बाल्टी को बाँधा और उसमें रामदीन को बैठाया। फिर उसे कुँए में उतार दिया। कुँए की तली में पहुँचते ही रामदीन बड़ी जोर से चीखा। उसे अपनी पीठ पर कुछ भारी बोझ-सा महसूस हुआ। उसकी चीख सुनकर गाँववालों ने जल्दी से रस्सी को खींचकर उसे बाहर निकाला। देखा तो रामदीन की पीठ पर एक मगरमच्छ था। यह देखकर वे लोग डर गए और वहाँ से भाग गए। रामदीन भी लोगों की चीख-पुकार सुनकर भागने लगा। भागते-भागते वह एक निर्जन स्थान पर पहुँचा। अचानक उसे अपनी पीठ पर हल्कापन महसूस हुआ। उसने पीठ की ओर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था। अचानक सामने की ओर उसे एक सुंदर लड़की दिखाई दी। लड़की ने कहा –घबराओ नहीं, मैं ही तुम्हारी पीठ पर बैठी हुई थी। लेकिन मैं इस रूप में ज्यादा देर तक नहीं रह सकती। मैं चिडिया बन जाउँगी। तुम मुझे एक पिंजरे में बंद करके राजा के पास ले जाना। मैं उन्हें मधुर गीत सुनाउँगी। गीत सुनकर राजा मोहित हो जाएगा और वह तुमसे कहेगा कि यह चिडिया मुझे दे दो। वह तुम्हें इसके लिए मुँहमाँगी कीमत देने के लिए तैयार हो जाएगा। लेकिन तुम धन-दौलत की लालच में नहीं आना। तुम राजा से उसका बाजूबंद माँगना। उसे लेने के बाद ही मुझे राजा को सौंपना। कुछ ही क्षण में वह लड़की चिडिया बन गई। रामदीन उसे लेकर आगे बढ़ गया। कुछ दूर चलकर उसने चिडिया के लिए एक पिंजरा खरीदा और उसमें चिडिया को कैद कर दिया। वह राजमहल पहुँचा। महल पहुँचते ही चिडिया ने मधुर स्वर में गाना शुरू कर दिया। राजा ने जब उसका गीत सुना तो वह उस पर मोहित हो गया और रामदीन को बुलाकर उससे चिडिया की माँग की । रामदीन ने अपनी शर्त राजा के सामने रख दी। पहले तो राजा ने आनाकानी की पर बाद में वह अपना बाजूबंद देने के लिए तैयार हो गया। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

कविता - यह है भारत देश हमारा - सुब्रह्मण्यम भारती

कविता का अंश... चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है। जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है। नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा, बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा? सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है। गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा, आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा। यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर, यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर, यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे, यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे। यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन, यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन, है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा, है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा। विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे, अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे, क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे, पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे। मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है, कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है, आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा, कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कहानी - प्रायश्चित्त - देवी नागरानी

कहानी का अंश... वह अनपढ़ थी. पढ़ाई क्या होती है, इसका बीज शायद बचपन में उसके कोमल ज़हन में बोया ही नहीं गया, या परिस्थितियों ने इजाज़त ही न दी. छोटे से गांव की गूंगी गाय-सी यह अल्हड अनाड़ी-सी लड़की खेती-बाड़ी में काम करते हुए बड़ी हुई. रईसी क्या होती है, ऐशो-आराम क्या होता है उसे पता ही नहीं था. परिश्रम करना, पानी भरना, ढोरों को चारा डालना और दूध दही बाजार में जाकर बेच आना, यही काम उसके बस का था. जिसके लिए वह काम करती थी, वह उसका कौन लगता था इसका भी उसे पता न था. गांव की जवान युवतियों के मुंह से सुना था कि जब वह चार साल की थी तो उसके माता-पिता गांव में आई बाढ़ में डूब गए और वह खुद इस बंदे के पल्ले पड़ गई. वह था तो पिता की उम का, पर मटमैली नज़रों का धनी था. जैसे ही वह कुछ समझदार हुई तो उसे लगा कि उसकी छेदती निगाहें उसके जवान बदन को चीरकर आरपार आती जाती रही. वह जब 16 वर्ष की हुई तो उसे गाँव के मंदिर में ले जाकर पंडित को साक्षी बनाकर उसे अपनी पत्नी बनाकर घर ले आया. गाँव के लोगों से ‘गृहलक्ष्मी’ कह कर परिचय करवा दिया, परिचय क्या उसके पत्नी होने का ऐलान था. वह कुछ भी न थी, पर अब गृहलक्ष्मी से लक्ष्मी बन गई. संसार की रचना का आदि मूल सूत्र शायद इसी एक रिश्ते की बुनियाद पर खड़ा है. इंसान और पशु में एक ही फर्क रहा है. यह सुविधा अनुसार मर्यादा का पालन करता है और उसे धर्म का नाम दे देता है, बाकी कोई भी लक्ष्मण रेखा पार करने में वह किसी जानवर से कतई कम नहीं. ऐसे विचार लक्ष्मी के मन में अक्सर पैदा होते ‘वह’ उसके साथ हैवानों जैसा बर्ताव करता, उसके शरीर को मांस के लोथड़े की तरह रौंदता. यह भावना तब ज़ोर पकड़ने लगी जब वह माँ बनी. जब ‘मोना’ पैदा हुई तो वह और व्यस्त रहने लगी. तीन सालों के बाद मोहन पैदा हुआ. अब लक्ष्मी कुछ कुछ मान -अपमान की परिभाषा समझने लगी. मोना के सामने अपने पति के मुंह से तिरस्कृत शब्द सुनती तो अपमान की आग में झुलसने लगती. वह अपनी बेइज्ज़ती इतनी बार करा चुकी थी कि इज्ज़त क्या होती है यह अहसास भी उसके शब्दकोष से स्थगित हो चूका था. बस बयाँ होती थी स्थिति, जब वह ‘आदमी’ शराब पीकर, मदहोशी में झूमते हुए घर आता. और काली रात के ढल जाने पर दिन की रोशनी में सिर्फ़ लक्ष्मी के शरीर के नीले निशान ही सच को जाहिर करते. इसी तरह कुछ साल बीते और देखते देखते मोना दस साल की हो गई. चाहे वह बाप से डरती थी, पर माँ के लिए उसके मन में अभी भी एक सॉफ्ट कॉर्नर रही. गांव के स्कूल में पढ़ती थी कभी जो पढ़कर आती उसे माँ के सामने दोहराते हुए कहती- “माँ मास्टर ने बताया कि ज़ुल्म करनेवाला गुनहगार है, पर जुल्म को सहने वाला भी उससे बड़ा गुनहगार है, क्या यह सच है, या केवल किताबों में दर्ज है?” मोना मां से यह सवाल बार-बार पूछती-“माँ तुम क्यों कुछ नहीं कहती, क्यों चुपचाप सह लेती हो? “...........................” ‘माँ कुछ तो कहो.’ .....बस सवाल खुद को दोहराते ही रह जाते. लक्ष्मी जवाब दे तो क्या? वह रोकर सहे, या चिलाकर सहे, या ख़ामोश रहे या खुद को बांटे क्या फर्क पड़ता? ज़ुल्म तो ज़ुल्म है, एक करता जाए, दूसरा सहता जाए, शायद इस घर का यही नियम है. उसके पास और कोई विकल्प ही न रहा. अब तो वह दो बढ़ते बच्चों की माँ भी थी. चुप्पी में अपने ग़नीमत समझ कर चुप्पी साध लेती. 0 मोना और मोहन दोनों ने माँ की कोख से जन्म तो लिया पर कभी पालने में झूल न पाए थे. उन्होंने कभी मां की प्यार भरी लोरी नहीं सुनी. बस सुनी तो सिर्फ पिता की कड़कती हुई आवाज़ या उसके लोहे जैसे हाथों से माँ के नाजुक बदन पर कड़कती बिजलियों जैसी मार की आवाज़. वे छोटे थे, पर इतने भी छोटे नहीं कि वे यह भी न समझ पाए कि उनकी माँ पर जुल्म हो रहा है, वह बेबस और मजबूर है. वे जानते थे, हर रोज़ रात को जब उनके पिता घर में घुसते, तो किस तरह मां सहमी-सहमी सी अपना चेहरा सूत की चुनरी से ढांप कर खाट के कोने पर एक पोटली की तरह बैठ हुई होती, और उनके आते ही उठ खड़ी होती. 3 ‘अब इस तरह क्या खड़ी हो? जाओ पापड़ पानी ले आओ…’ और वे कपड़े बदलकर फ़क़त एक बनियान में और एक पुरानी सालों से इस्तेमाल की हुई लूंगी पहनकर उसी खाट पर लेट जाते. कभी तो घर में घुसते ही गालियों की बौछार शुरू कर देते-‘ न जाने कैसे मैं फंस गया हूँ इस जंजाल में?’ फ़कत मैं एक ही कमाने वाला, और तुम तीनों बैठ कर खाने वाले. तुम क्यों नहीं कुछ हाथ पैर चलाती हो? घर बैठे चार पैसे कमाओगी तो पता पड़ जाएगा कि काम करना क्या होता है? परिश्रम का पसीना बहाना क्या होता है? निकम्मों की तरह रोटी पका कर, रोटी खाकर, बिल्कुल बेसूद सी हो गई हो.’ लक्ष्मी ऐसे जहरीले शब्द सुनाने व् झेलने की आदी हो गई थी, आज नहीं, पिछले 10 सालों से. एक कहावत है ‘नई दुल्हन नौ दिन, ज्यादा से ज्यादा दस दिन!’ पर लक्ष्मी को तो दस दिन भी नयी नवेली होने का सुख नसीब न हुआ था, सुहागन के सारे अरमान धरे के धरे रह गए. मिला तो फ़क़त यह चूल्हा-चौका, यही झाडू-पोता उसे विरासत में मिला. कभी कभी मोना और मोहन आपस में आंखों की अनुच्चारित भाषा में बतियाते. एक दिन लक्ष्मी पर इतनी मार पड़ी कि उसे तेज़ बुखार चढ गया. उसके शक्तिहीन बदन से जैसे किसी ने प्राण खींच लिए. खटिया पर बिना हिले डुले कराहती पड़ी रही. मोना अब छोटी न रही, बारह साल की हो गई थी. वह क्षुब्ध नज़रों में माँ की ओर देखते हुए कहने लगी-’ भगवान करे ऐसा बाप न हो तो ही अच्छा है.’ इस बात को एक हफ्ता गुजर गया. हालत ने न सुधरने की ठान ली. घाव भरने का नाम ही न लेते. हक़ीम से दवा लाकर पिता ने मोना को देते हुए कहा ‘यह माँ के घाव पर लगा दो, घाव जल्दी ठीक हो जाएंगे, और दावा दूध के साथ पिला देना.’ मोना का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था. जुल्म सहने की भी हद होती है. पहली बार पिता के सामने ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज उठाते हुए कहा-’ ठीक हो 4 जाएगी, फिर क्या? फिर मार खाएगी, फिर गिरेगी, पड़ेगी, कराहती रहेगी और फिर मरहम लगाने पर उठ खड़ी होगी, फिर से मार खाने के लिए! इससे बेहतर यह है कि आप उसे एक ही बार इतना मारें कि वह मर जाये, और इस पीड़ा को मुक्ति पा ले. मुझे तो याद नहीं आता है कि मैंने कभी माँ मुस्कुराते हुए देखा है, या कभी इस घर में मान-सम्मान पाते हुए देखा है. इसके साथ तो हमेशा बदी का व्यवहार होता आया है, और करने वाल कोई और नहीं, आप ही हैं. जोरावर के आगे कमज़ोर का क्या बस चलेगा? उसे पड़ी रहने दो उसे पड़े पड़े मर जाने दो,..’ ऐसा कहकर वह रोने लग गई. मोहन छोटा था, पर था तो उसका भाई. अपनी दोनों बाहें बहन के गले में डाल कर उसे चुप कराने लगा. आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

रविवार, 18 दिसंबर 2016

कविता - शहीद की माँ - हरिवंशराय बच्चन

कविता का अंश... इसी घर से एक दिन शहीद का जनाज़ा निकला था, तिरंगे में लिपटा, हज़ारों की भीड़ में। काँधा देने की होड़ में सैकड़ो के कुर्ते फटे थे, पुट्ठे छिले थे। भारत माता की जय, इंकलाब ज़िन्दाबाद, अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद के नारों में शहीद की माँ का रोदन डूब गया था। उसके आँसुओ की लड़ी फूल, खील, बताशों की झडी में छिप गई थी, जनता चिल्लाई थी- तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा। गली किसी गर्व से दिप गई थी। इसी घर से तीस बरस बाद शहीद की माँ का जनाजा निकला है, तिरंगे में लिपटा नहीं, (क्योंकि वह ख़ास-ख़ास लोगों के लिये विहित है) केवल चार काँधों पर राम नाम सत्य है गोपाल नाम सत्य है के पुराने नारों पर; चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी, जीवन के कष्टों से मुक्त हुई, गली किसी राहत से छुई छुई। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविता - गीत मेरे - हरिवंशराय बच्‍चन

कविता का अंश... गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ, वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ, छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ, और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ, कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब, फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब, जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। जग विभामय न तो काली रात मेरी, मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी, यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविता - मेघदूत के प्रति - हरिवंशराय बच्चन

कविता का अंश... "मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! हो धरणि चाहे शरद की चाँदनी में स्नान करती, वायु ऋतु हेमंत की चाहे गगन में हो विचरती, हो शिशिर चाहे गिराता पीत-जर्जर पत्र तरू के, कोकिला चाहे वनों में, हो वसंती राग भरती, ग्रीष्म का मार्तण्ड चाहे, हो तपाता भूमि-तल को, दिन प्रथम आषाढ़ का में 'मेघ-चर' द्वारा बुलाता 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! भूल जाता अस्थि-मज्जा- मांसयुक्त शरीर हूँ मैं, भासता बस-धूम्र संयुत ज्योति-सलिल-समीर हूँ मैं, उठ रहा हूँ उच्च भवनों के, शिखर से और ऊपर, देखता संसार नीचे इंद्र का वर वीर हूँ मैं, मंद गति से जा रहा हूँ पा पवन अनुकूल अपने संग है वक-पंक्ति, चातक- दल मधुर स्वर गीत गाता 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! झोपडी़, ग्रह, भवन भारी, महल औ' प्रासाद सुंदर, कलश, गुंबद, स्तंभ, उन्नत धरहरे, मीनार द्धढ़तर, दुर्ग, देवल, पथ सुविस्त्तत, और क्रीडो़द्यान-सारे, मंत्रिता कवि-लेखनी के स्पर्श से होते अगोचर और सहसा रामगिरि पर्वत उठाता शीशा अपना, गोद जिसकी स्निग्ध छाया -वान कानन लहलहाता! 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! देखता इस शैल के ही अंक में बहु पूज्य पुष्कर, पुण्य जिनको किया था जनक-तनया ने नहाकर संग जब श्री राम के वे, थी यहाँ पे वास करती, देखता अंकित चरण उनके अनेक अचल-शिला पर, जान ये पद-चिन्ह वंदित विश्व से होते रहे हैं, देख इनको शीश में भी भक्ति-श्रध्दा से नवाता 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! देखता गिरि की शरण में एक सर के रम्य तट पर एक लघु आश्रम घिरा बन तरु-लताओं से सघनतर, इस जगह कर्तव्य से च्युत यक्ष को पाता अकेला, निज प्रिया के ध्यान में जो अश्रुमय उच्छवास भर-भर, क्षीणतन हो, दीनमन हो और महिमाहीन होकर वर्ष भर कांता-विरह के शाप के दुर्दिन बिताता 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! था दिया अभिशाप अलका- ध्यक्ष ने जिस यक्षवर को, वर्ष भर का दंड सहकर वह गया कबका स्वघर को, प्रयेसी को एक क्षण उर से लगा सब कष्ट भूला किन्तु शापित यक्ष महाकवि, जन्म-भरा को! रामगिरि पर चिर विधुर हो युग-युगांतर से पडा़ है, मिल ना पाएगा प्रलय तक हाय, उसका शाप-त्राता! 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! देख मुझको प्राणप्यारी दामिनी को अंक में भर घूमते उन्मुकत नभ में वायु के म्रदु-मंद रथ पर, अट्टहास-विलास से मुख- रित बनाते शून्य को भी जन सुखी भी क्षुब्ध होते भाग्य शुभ मेरा सिहाकर; प्रणयिनी भुज-पाश से जो है रहा चिरकाल वंचित, यक्ष मुझको देख कैसे फिर न दुख में डूब जाता? 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! देखता जब यक्ष मुझको शैल-श्रंगों पर विचरता, एकटक हो सोचता कुछ लोचनों में नीर भरता, यक्षिणी को निज कुशल- संवाद मुझसे भेजने की कामना से वह मुझे उठबार- बार प्रणाम करता कनक विलय-विहीन कर से फिर कुटज के फूल चुनकर प्रीति से स्वागत-वचन कह भेंट मेरे प्रति चढा़ता 'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! इस अधूरी कविता को पूरी सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कविता - यह लघु सरिता का बहता जल - गोपाल सिंह नेपाली

कविता का अंश... यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल, हिमगिरि के हिम से निकल निकल, यह निर्मल दूध सा हिम का जल, कर-कर निनाद कल-कल छल-छल, तन का चंचल मन का विह्वल, यह लघु सरिता का बहता जल। ऊँचे शिखरों से उतर-उतर, गिर-गिर, गिरि की चट्टानों पर, कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर, दिन भर, रजनी भर, जीवन भर, धोता वसुधा का अन्तस्तल, यह लघु सरिता का बहता जल। हिम के पत्थर वो पिघल पिघल, बन गए धरा का वारि विमल, सुख पाता जिससे पथिक विकल, पी-पी कर अंजलि भर मृदुजल, नित जलकर भी कितना शीतल, यह लघु सरिता का बहता जल। कितना कोमल, कितना वत्सल, रे जननी का वह अन्तस्तल, जिसका यह शीतल करुणा जल, बहता रहता युग-युग अविरल, गंगा, यमुना, सरयू निर्मल, यह लघु सरिता का बहता जल। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविता - हिमालय और हम - गोपाल सिंह नेपाली

कविता का अंश... गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है । (1) इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही । पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही ।। अंबर में सिर, पाताल चरण मन इसका गंगा का बचपन तन वरण-वरण मुख निरावरण इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है । ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (2) अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती । फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती ।। इन शिखरों की माया ऐसी जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी अमरों को फिर चिंता कैसी ? इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (3) हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है । हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है ।। इसकी छाया में रंग गहरा है देश हरा, प्रदेश हरा हर मौसम है, संदेश भरा इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (4) जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी । है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी ।। कोई क्‍या हमको ललकारे हम कभी न हिंसा से हारे दु:ख देकर हमको क्‍या मारे गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। (5) टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं । तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं । जब-जब जनता को विपदा दी तब-तब निकले लाखों गाँधी तलवारों-सी टूटी आँधी इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है। गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है । इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

प्रचार का नया तरीका

हरिभूमि में प्रकाशित आलेख

कबीरदास जी - जीवन परिचय

परिचय का कुछ अंश... कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व हैं। कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। कबीर के माता- पिता के विषय में एक राय निश्चित नहीं है कि कबीर "नीमा' और "नीरु' की वास्तविक संतान थे या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था। कहा जाता है कि नीरु जुलाहे को यह बच्चा लहरतारा ताल पर पड़ा पाया, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कबीर ने स्वयं को जुलाहे के रुप में प्रस्तुत किया है - "जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी।' कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। ऐसा भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म का ज्ञान हुआ। एक दिन कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े थे, रामानन्द ज उसी समय गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- `हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'। अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदु-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फक़ीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को आत्मसात कर लिया। जनश्रुति के अनुसार कबीर के एक पुत्र कमल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था। साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पंथ के अनुसार कामात्य उसका शिष्य था और कमाली तथा लोई उनकी शिष्या। लोई शब्द का प्रयोग कबीर ने एक जगह कंबल के रुप में भी किया है। वस्तुतः कबीर की पत्नी और संतान दोनों थे। एक जगह लोई को पुकार कर कबीर कहते हैं :- "कहत कबीर सुनहुं रे लोई। हरि बिन राखन हार न कोई।।' कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- `मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।' उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड ने `हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और सारवी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं। वे कभी कहते हैं- `हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, `हरि जननी मैं बालक तोरा' उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है। कबीर का पूरा जीवन काशी में ही गुजरा, लेकिन वह मरने के समय मगहर चले गए थे। वह न चाहकर भी, मगहर गए थे। वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। कबीर मगहर जाकर दु:खी थे: "अबकहु राम कवन गति मोरी। तजीले बनारस मति भई मोरी।।'' कहा जाता है कि कबीर के शत्रुओं ने उनको मगहर जाने के लिए मजबूर किया था। वे चाहते थे कि कबीर की मुक्ति न हो पाए, परंतु कबीर तो काशी मरन से नहीं, राम की भक्ति से मुक्ति पाना चाहते थे: "जौ काशी तन तजै कबीरा तो रामै कौन निहोटा।'' कबीरदास जी का पूर्ण परिचय प्राप्त करने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कबीरदास - कुछ लोकप्रिय दोहे अर्थ सहित

संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है। लोक कल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व - प्रेमी का अनुभव था। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी। समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। यहाँ हम उनके कुछ लोकप्रिय दोहे अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं - दोहा:- हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मरे, मरम न जाना कोई। अर्थ : कबीर दास जी कहते है कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों (तुर्क) को रहमान| इसी बात पर वे आपस में झगड़ते रहते है लेकिन सच्चाई को नहीं जान पाते | दोहा:- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब | अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो| जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्त हो गया तो क्या करोगे| दोहा:- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय| अर्थ: कबीर जी कहते है कि निंदा करने वाले व्यक्तियों को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्ति बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को स्वच्छ कर देते है| दोहा:- माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख| अर्थ: कबीरदास जी कहते कि माँगना मरने के समान है इसलिए कभी भी किसी से कुछ मत मांगो| दोहा:- साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय| अर्थ: कबीर दास जी कहते कि हे परमात्मा तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमे मेरे गुजरा चल जाये| मैं भी भूखा न रहूँ और अतिथि भी भूखे वापस न जाए| दोहा:- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय| अर्थ:- कबीर कहते कि सुख में भगवान को कोई याद नहीं करता लेकिन दुःख में सभी भगवान से प्रार्थना करते है| अगर सुख में भगवान को याद किया जाये तो दुःख क्यों होगा| दोहा:- तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैर में आने वाले तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकिं अगर वही तिनका आँख में चला जाए तो बहुत पीड़ा होगी| ऐसे ही अन्य दोहों का अर्थ सहित आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

नीति के दोहे - 2 - कवि रहीम

रहीम जी का हिंदी साहित्य जगत में योगदान अतुल्य है। समाज को आईना दिखाने वाली बातें, वे अपने दोहों में कह जाते थे। मानव जाति को रहीम के दोहों से सही एवं गलत में फर्क करने की सीख मिलती है। उन्होंने सदैव सरल भाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी वाणी और लोकप्रिय हुई। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके कुछ नीति के दोहे - 1 बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥21॥ 2 बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥18॥ 3 दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥3॥ 4 रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय| टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय|| 5 बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय| रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय|| 6 रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार| रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार|| 7 जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं| गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं|| 8 रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय| हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय|| 9 समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात| सदा रहे नहिं एक सी, का रहिम पछितात|| 10 एकहि साधै सब सधैए, सब साधे सब जाय| रहिमन मूलहि सींचबोए, फूलहि फलहि अघाय|| 11 माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि। फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥ इन दोहों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

नीति के दोहे -1 - कवि रहीम

रहीम जी का हिंदी साहित्य जगत में योगदान अतुल्य है। समाज को आईना दिखाने वाली बातें, वे अपने दोहों में कह जाते थे। मानव जाति को रहीम के दोहों से सही एवं गलत में फर्क करने की सीख मिलती है। उन्होंने सदैव सरल भाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी वाणी और लोकप्रिय हुई। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके कुछ नीति के दोहे - 1. जो रहीम उतम प्रकृति, का करी सकत कुसंग| चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग|| 2. रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून| पानी गये न ऊबरे मोती मानुष चून|| 3. रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिए डारि| जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि|| 4. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान| कहि रहीम पर काज हितए संपति सँचहि सुजान|| 5. जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग। कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥ 6. रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि। उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥ 7. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत। विपति कसौटी जे कसै, ते ही साँचे मीत।। 8. खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय| रहिमन करूए मुखन को, चाहिए यही सजाय|| 9. कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन। जैसी संगति बैठिए, तैसो ही होत दीन।। 10. दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं| जान परत है काक पिक, रितु बसंत के माहिं|| 11. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥ इन दोहों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

बाल कहानी - संगठन और सूझ

कहानी का अंश... एक लोमडी को कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला था। इसलिए वह शिकार की खोज में घूम रही थी। उसकी चलने-फिरने की शक्ति भी कम हो गई थी। एक बार वह पहाड़ की ढाल पर शिकार की खोज में थी कि एकाएक पैर के नीचे का पत्थर लुढक गया और कमजोर होने के कारण वह भी अपने आपको संभाल नहीं सकी और लुढकती चली गई। नीचे की तरफ मैदान था। जब वह वहाँ पर पहुँची तो उसने खरगोशों का झुंड देखा। खरगोशों को देखकर उसके मुंह में तो पानी आ गया। उसने सोचा कि यहाँ पर उसके लिए रोज एक-दो खरगोश खाने का इंतजाम तो हो ही जाएगा। वह रोज उस जगह पर आने लगी कि कभी मौका मिले तो वह खरगोश को खा ले। जब खरगोशों ने लोमड़ी को रोज वहाँ आते हुए देखा तो पहले तो वह डर गए कि यह उन्हें खा लेगी। फिर उन्हें लगा कि वह लोमड़ी तो अकेली है और हम सभी हैं। हम सभी मिलकर उस अकेली लोमड़ी का मुकाबला कर सकते हैं। यही सोचकर वे सभी बेफिक्र होकर आनंद से रहने लगे। एक दिन उस लोमड़ी ने खरगोश के दो बच्चों के पास आकर उनकी खूब तारीफ की और अपने घर दावत के लिए आने का न्यौता दिया। वे खरगोश डर के मारे जल्दी से वहाँ से चले गए। लेकिन उसके बाद उन खरगोशों ने अपने आपको असुरक्षित महसूस किया आैर उन्होंने अपनी एक सभा बुलाई और लोमड़ी से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचा। क्या था वह उपाय? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

बाल कहानी - वाकली का फूल

कहानी का अंश... एक राजा था। उसकी छह रानियाँ थीं। पर उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण वह हमेशा दुखी रहता था। किसी ज्योतिषी के कहने पर उसने अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा दिया कि उसके राज्य में रात दस बजे के बाद कोई भी दीपक न जलाए। राजा की इस आज्ञा के कारण पूरे राज्य में रात दस बजे के बाद एकदम अँधेरा हो जाता था। उसी राज्य में एक भिखारिन अपनी बेटी के साथ रहती थी। एक दिन उसकी बेटी ने रात को दीपक जलाया और खाना बनाने लगी। जब माँ ने यह देखा तो उसने बेटी को दीपक न जलाने के लिए कहा और राजा की आज्ञा तथा उसके नि:संतान होने की बात बताई। बेटी बोली कि माँ यदि राजा उससे शादी कर ले, तो उसकी सुनहरे बालों वाली दो संताने हो सकती है। संयोग की बात यह बात राजा के सिपाहियों ने सुन ली और राजमहल में जाकर पूरी बात राजा को बता दी। राजा उस भिखारिन की बेटी से विवाह करने के लिए तैयार हो गया। वह भिखारिन पहले तो अचकचाई लेकिन राजा की जिद के आगे वह भला क्या कर सकती थी। और फिर दोनों का विवाह हो गया। भिखारिन की बेटी राजमहल में आ गई। छहों रानियाँ उसे रानी के रूप में देखकर जलभुन गई। कुछ दिनों बाद सातवीं रानी गर्भवती हुई और समय आने पर उसने दो संतान के रूप में एक लडका और एक लडकी को जन्म दिया। राजा उस समय शिकार पर गया हुआ था। उसे यह बात मालूम नहीं थी। उधर छहों रानियों ने उन संतानों को पिटारे में बंद करके नदी में फिकवा दिया और उस रानी के पास बिल्ली के बच्चे रख दिए। जब राजा वापस आया तो बिल्ली के बच्चे देखकर बहुत नाराज हुआ और उसने सातवीं रानी को अँधेरी कोठरी में डलवा दिया। बेचारी रानी बहुत कहती रही लेकिन उसकी कोई बात नहीं सुनी। दूसरी तरफ उस पिटारे पर एक साधु की नजर पड़ी उसने उन बच्चों को पाल पोस कर बड़ा किया। कुछ साल बाद उस साधु की मृत्यु हो गई लेकिन मृत्यु के पूर्व उसने उन दोनों बच्चों के लिए रहने का अच्छा प्रबंध कर दिया। वे दोनों बच्चे अपने पिता के राज्य में आकर ही रहने लगे। छहों रानियों की नजर उन भाई-बहनों पर पड़ी तो उन्हें शक हुआ। अपना शक दूर करने के लिए एक रानी उनके घर गई और बहन से कहा कि तुम्हारा मकान तो बहुत सुंदर है लेकिन यहाँ पर वाकली के फूल की कमी है। उसके बिना सब सुंदरता अधूरी है। तब बहन ने भाई से वाकली का फूल लाने की जिद की। क्या भाई अपनी बहन की जिद पूरी कर पाया? उसे किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? सातवीं रानी क्या अंधेरी कोठरी में ही पड़ी रही? क्या राजा को सच्चाई पता चली? यह सारी बातें जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

कहानी - सौर - आशीष त्रिवेदी

सौर... कहानी का अंश... दिनेश को आज घर लौटने में देर हो गयी थी। जूते उतार कर वह पलंग पर लेट गया। वह बहुत थका हुआ था। आज का दिन अच्छा नहीं बीता था । काम भी और दिनों से कुछ अधिक था उस पर उसे बॉस की डांट भी खानी पड़ी। वह आँखें मूंदे लेटा था तभी उसकी पत्नी कुसुम ने उसके हाथ में एक कार्ड थमा दिया। उसने एक उचटती सी नज़र डालते हुए पूछा "क्या है।" "वो मेरी बरेली वाली मौसी हैं न उनकी छोटी बेटी की शादी है। इस महीने की 15 तारीख को। जाना पड़ेगा" " हूँ ....तो चली जाना।" कह कर दिनेश ने कार्ड एक तरफ रख दिया। " हाँ जाउंगी तो लेकिन कुछ देना भी तो पड़ेगा। मौसी हमें कितना मानती हैं। जब भी मिलाती हैं हाथ में कुछ न कुछ रख देती हैं।" " देख लो अगर तुम्हारे पास कुछ हो, कोई अच्छी साड़ी या और कुछ, तो दे दो।" " मेरे पास कहाँ कुछ है मैं कौन रोज़ रोज़ साडियाँ या गहने खरीदती हूँ।" " तो मैं भी क्या करूं मेरी हालत तुमसे छिपी है क्या। मेरे पास कुछ नहीं है।" दिनेश ने कुछ तल्ख़ अंदाज़ में कहा। दिनेश की माँ ने अपनी बहू की तरफदारी करते हुए कहा " उस पर क्यों चिल्ला रहा है। अब दुनियादारी तो निभानी ही पड़ती है।" अपनी सास का समर्थन पाकर कुसुम बोली " मैं कौन आपने लिए कुछ मांग रही हूँ। पर चार लोगों के बीच खाली हाथ जाउंगी तो बदनामी इनकी ही होगी।" कह कर वह सुबकने लगी। दिनेश का मन पहले ही खराब था। वह उबल पड़ा " दिन भर का थका हारा घर लौटा हूँ, एक गिलास पानी पूछना तो दूर फरमाइशों की लिस्ट लेकर सर पर सवार हो गयीं।" यह कह कर वह उठा और चप्पल पहन कर घर से बाहर निकल गया। कुसुम सन्न रह गयी। उसे पछतावा हो रहा था। उसे कुछ देर रुक जाना चाहिए था। समय देख कर ठंडे दिमाग से बात करनी चाहिए थी। दिनेश की परेशानी वह समझती है। जी तोड़ मेहनत करते हैं। फिर भी कमाई पूरी नहीं पड़ती। हर चीज़ के लिए मन मारना पड़ता है। दिनेश कहते कुछ नहीं पर अन्दर ही अन्दर इस बात को लेकर परेशान रहते हैं। वह मन ही मन स्वयं को कोसने लगी। उसे इस वक़्त यह बात नहीं करनी चाहिए थी। उसे परेशान देख कर उसकी सास ने समझाया " परेशान मत हो, थोड़ी देर में जब गुस्सा शांत होगा तो लौट आएगा।" कुसुम दिनेश के घर लौटने का इंतज़ार करने लगी। घर से निकल कर दिनेश यूँ ही सड़क पर चलने लगा। उसकी आमदनी की सौर इतनी छोटी थी की पाँव सिकोड़ते सिकोड़ते घुटने दुखने लगे थे। उसके मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा था। 'क्या ज़िन्दगी है दिन भर खटने के बाद भी छोटी छोटी चीज़ों के लिए तरसना पड़ता है।' वह क्या करे। अम्मा के ऑपरेशन के लिए क़र्ज़ लेना पड़ा। तनख्वाह का एक हिस्सा तो क़र्ज़ की अदायिगी में चला जाता है। जो बचता है उसमें बड़ी मुश्किल से घर चल पाता है। वह अपने ख्यालों में चलता हुआ घर से काफी दूर निकल आया था। यह इलाका शहर के पॉश इलाकों में से एक था। दोनों तरफ बने बड़े बड़े मकानों को दिनेश बड़ी हसरत से देख रहा था। चलते चलते वह थक गया था। सामने एक पार्क नज़र आया। वह पार्क में घुस गया। पार्क खाली था। अतः वह बेंच पर लेट गया। अब तक उसका गुस्सा शांत हो गया था। वह सोचने लगा ' बेकार ही कुसुम पर नाराज़ हुआ। सही तो है वो कहाँ कभी अपने लिए कुछ मांगती है। जो भी उसे देता हूँ उसी में संतुष्ट रहती है। इन आठ सालों में चार अच्छी साड़ियां भी नहीं दिलाई होंगी उसे।' यही सब सोचते सोचते उसे झपकी लग गयी। उसकी आँख खुली तो उसे अपने सीने पर कुछ हिलाता सा महसूस हुआ। उसका फ़ोन वाईब्रेट कर रहा था। जब तक फ़ोन उठाता काल मिस हो गयी। उसने देखा कुसुम की चार मिस कॉल थीं। ' घर में सब परेशान होंगे' वह उठा और तेज़ी से घर की तरफ चल दिया। उसके दस्तक देने से पहले ही दरवाज़ा खुल गया। कुसुम नज़रें झुकाए खड़ी थी। जब वह भीतर आया तो अम्मा ने डांटा " कहाँ चला गया था, बेचारी इतनी देर से भूखी बैठी है। जा अब खाना खा ले।" कुसुम ने धीरे से कहा " आप हाथ मुंह धो लीजिये मैं खाना लगाती हूँ।" जब वह हाथ मुंह धो कर आया तो कुसुम तौलिया लिए खड़ी थी " आप परेशान मत हों मैं मौसी से कोई बहाना बना दूँगी, मैं शादी में नहीं जाउंगी।" दिनेश हाथ पोंछने के बाद तौलिया उसे पकड़ाते हुए बोला " तुम फिक्र मत करो शादी में जाने की तैयारी करो, मैं दो तीन दिन में कुछ इंतज़ाम करता हूँ।" कुसुम ने खाना लगा दिया। दिनेश की पसंद के भरवां करेले की सब्जी थी। दिनेश ने एक ग्रास तोड़ा और कुसुम की तरफ बढ़ा दिया। कुसुम ने मुस्कुराते हुए वह कौर मुंह में रख लिया। उसके बाद दोनों पति पत्नी शांति से खाने लगे। इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक कथा - तीन पेड़

प्रेरक कथा का अंश... बहुत पुरानी बात है| किसी नगर के समीप एक जंगल तीन वृक्ष थे| वे तीनों अपने सुख-दुःख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे| एक दिन पहले वृक्ष ने कहा – “मैं खजाना रखने वाला बड़ा सा बक्सा बनना चाहता हूँ| मेरे भीतर हीरे-जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएँ. मुझे बड़े हुनर और परिश्रम से सजाया जाय, नक्काशीदार बेल-बूटे बनाए जाएँ, सारी दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है|” दूसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो एक विराट जलयान बनना चाहता हूँ| ताकि बड़े-बड़े राजा और रानी मुझपर सवार हों और दूर देश की यात्राएं करें, मैं अथाह समंदर की जलराशि में हिलोरें लूं, मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और सबका यकीन मेरी शक्ति में हो… मैं यही चाहता हूँ|” अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूँ| लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें, वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें, और मेरी शाखाएँ स्वर्ग तक पहुंचें… मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूँ|” ऐसे ही सपने देखते-देखते कुछ साल गुज़र गए. एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए| उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा – “ये जबरदस्त वृक्ष देखो! इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे.” और उसने पहले वृक्ष को काट दिया| वृक्ष तो खुश था, उसे यकीन था कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा बनाएगा| दूसरे वृक्ष के बारे में लकड़हारे ने कहा – “यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है| मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा”| दूसरा वृक्ष भी खुश था, उसका चाहा भी पूरा होने वाला था| लकड़हारे जब तीसरे वृक्ष के पास आए तो वह भयभीत हो गया|वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा एक लकड़हारा बोला – “इस वृक्ष से मुझे कोई खास चीज नहीं बनानी है इसलिए इसे मैं ले लेता हूं”| और उसने तीसरे वृक्ष को काट दिया| पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया और उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया|कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया| बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी| दूसरे वृक्ष को काटकर उससे मछली पकड़नेवाली छोटी नौका बना दी गई| भव्य जलयान बनकर राजा-महाराजाओं को लाने-लेजाने का उसका सपना भी चूर-चूर हो गया| तीसरे वृक्ष को लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लिया गया और टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए| एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया और स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया|वे बच्चे को चारा खिलानेवाले कठौते में सुलाने लगे। कठौता अब पालने के काम आने लगा| पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था| समय बीतता गया और सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकड़ने के लिए गए, उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा और नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा। एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था। उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया। वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा – “शांत हो जाओ”, और तूफान थम गया| यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है | तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आये और उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़कर एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया। ठोकर खाते, गिरते- पड़ते उस आदमी का सड़क पर तमाशा देखती भीड़ अपमान करती रही। वे जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उस आदमी के हाथों-पैरों में कीलें ठोंककर उसे पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया| दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को इसका बोध हुआ कि उस पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि ईसा मसीह को उसपर सूली पर चढ़ाया गया था। इस प्रेरक कथा का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - अपनी कीमत पहचानो

एक आदमी ने भगवान बुद्ध से पूछा : जीवन का मूल्य क्या है?   बुद्ध ने उसे एक पत्थर दिया और कहा : जाओ और इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ, लेकिन ध्यान रखना इसे बेचना नही है।  वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला : इसकी कीमत क्या है? संतरे वाला चमकीले पत्थर को देख कर बोला- '12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे दो।'     आगे एक सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा- 'एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।'    वह आदमी आगे एक सोना बेचने वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला- 'मुझे 50 लाख में बेच दो।'    उसने मना कर दिया। फिर वह जौहरी के पास पहुँचा। जौहरी ने उस पत्थर को पहचान लिया। उसने उस रूबी पत्थर की परिक्रमा लगाई और कहा कि यह तो बेशकीमती रूबी है। सारी कायनात, सारी दुनिया देकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। यह सुनकर वह व्यक्ति बुद्ध के पास वापस आया और सारी घटना कह सुनाई। तब बुद्ध बोले - हमारा मानव जीवन भी ऐसा ही बेशकीमती हीरा है। सभी इसकी कीमत अपनी औकात, अपनी हैसियत के अनुसार लगाते हैं। तुम घबराओ मत। समय आने पर तुम्हें भी लोग पहचान जाएँगे। लेकिन मानव को स्वयं भी अपनी कीमत पहचाननी होगी। इस प्रेरक प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - लेखक की सीख

प्रेरक प्रसंग का अंश... जॉर्ज बर्नार्ड शॉ अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक थे। लेकिन उन्हें यह प्रसिद्धि आसानी से नहीं मिली थी। इसके लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा था। जैसे-जैसे उनकी रचनाओं को पाठकों की सराहना मिलती गई वैसे-वैसे वह सफलता की बुलंदियों को छूते गए। इसके बाद उन्हें आए दिन अनेक कार्यक्रमों में शामिल होने के निमंत्रण मिलने लगे। वे बड़े हंसमुख और मिलनसार थे। इसलिए उनके चाहने वालों की एक लंबी फेहरिस्त थी। एक दिन उन्हें एक कॉलेज के कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया गया। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने सहजता से आमंत्रण को स्वीकार कर लिया और कार्यक्रम के दिन वह तय समय पर कॉलेज पहुंच गए। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उनका ऑटोग्राफ लेने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गई। उसी भीड़ में एक नौजवान ने उनके पैर छुए और अपनी हस्ताक्षर पुस्तिका देते हुए बोला, ‘सर, मुझे साहित्य का बहुत शौक है और मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी हैं। आप मेरे प्रिय लेखक हैं। मैं अपने जीवन में अभी तक अपनी पहचान नहीं बना पाया हूं लेकिन बनाना चाहता हूं। इसके लिए आप मुझे कोई संदेश देकर अपने हस्ताक्षर करें तो बहुत मेहरबानी होगी।’ जॉर्ज, नौजवान की बात पर मुस्कुराए और हस्ताक्षर पुस्तिका पर एक संदेश लिख अपने हस्ताक्षर कर दिए। नौजवान ने देखा तो लिखा था, ‘अपना समय दूसरों के हस्ताक्षर इकट्ठा करने में नष्ट न करें, बल्कि खुद को इस योग्य बनाएं कि दूसरे आपका हस्ताक्षर प्राप्त करने को लालायित रहें। अपनी अलग पहचान बनाने के लिए मेहनत आवश्यक है।’ यह पढ़कर नौजवान ने उनके पैर छू लिए और बोला, ‘सर, मैं आपके इस संदेश को जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बनाकर दिखाऊंगा।’ इस पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने नवयुवक की पीठ थपथपाई और आगे बढ़ गए। इस प्रसंग का आनंद आॅडियो की मदद से लीजिए...

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

कहानी - वानर राज बालि

कहानी का अंश... बालि और सुग्रीव को वानरश्रेष्ठ ऋक्ष राजा का पुत्र कहा जाता है। सुग्रीव को इन्द्र का पुत्र भी कहा गया है। बालि सुग्रीव का बड़ा भाई था। वह पिता और भाई का अत्यधिक प्रिय था। पिता की मृत्यु के बाद बालि ने राज्य सम्भाल लिया था। बालि का विवाह वैद्यराज सुषेण की पुत्री तारा के साथ सम्पन्न हुआ था। एक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान चौदह मणियों में से एक अप्सराएँ भी थीं। उन्हीं अप्सराओं में से एक तारा थी। बालि और सुषेण दोनों समुद्र मन्थन में देवतागण की मदद कर रहे थे। जब उन्होंने तारा को देखा तो दोनों में उसे पत्नी बनाने की होड़ लगी। बालि तारा के दाहिनी तरफ़ तथा सुषेण उसके बायीं तरफ़ खड़े हो गये। तब विष्णु ने फ़ैसला सुनाया कि विवाह के समय कन्या के दाहिनी तरफ़ उसका होने वाला पति तथा बायीं तरफ़ कन्यादान करने वाला पिता होता है। अतः बालि तारा का पति तथा सुषेण उसका पिता घोषित किये गये। पृथ्वी तल के समस्त वीर योद्धाओं को परास्त करता हुआ लंका का राजा रावण बालि से युद्ध करने के लिए आया था। उस समय बालि सन्ध्या के लिए गया हुआ था। वह प्रतिदिन समस्त समुद्रों के तट पर जाकर सन्ध्या करता था। बालि के मन्त्री तार के बहुत समझाने पर भी रावण बालि से युद्ध करने की इच्छा से ग्रस्त रहा। वह सन्ध्या में लीन बालि के पास जाकर अपने पुष्पक विमान से उतरा तथा पीछे से जाकर बालि को पकड़ने की इच्छा से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बालि ने उसे देख लिया था, किंतु उसने ऐसा नहीं जताया तथा सन्ध्या करता रहा। रावण की पदचाप से जब उसने जान लिया कि वह निकट है तो तुरंत उसने रावण को पकड़कर बगल में दबा लिया और आकाश में उड़ने लगा। बारी-बारी में उसने सब समुद्रों के किनारे सन्ध्या की। राक्षसों ने भी उसका पीछा किया। रावण ने स्थान-स्थान पर बालि को नोचा और काटा, किंतु बालि ने उसे नहीं छोड़ा। सन्ध्या समाप्त करके किष्किंधा के उपवन में उसने रावण को छोड़ा तथा उसके आने का प्रयोजन पूछा। रावण बहुत थक गया था, किंतु उसे उठाने वाला बालि तनिक भी शिथिल नहीं था। उससे प्रभावित होकर रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर उससे मित्रता की। स्त्री के कारण ही बालि का दुंदुभी के पुत्र मायावी से बैर हो गया। एक बार अर्धरात्रि में किष्किन्धा के द्वार पर आकर मायावी ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा। बालि तथा सुग्रीव उससे लड़ने के लिए गये। दोनों को आता देखकर मायावी वन की ओर भागा तथा एक बिल में छिप गया। बालि सुग्रीव को बिल के पास खड़ा करके स्वयं बिल में घुस गया। सुग्रीव ने एक वर्ष तक बालि के बाहर आने की प्रतीक्षा की। तदुपरांत बिल से आती हुई रक्त की धारा देखकर वह भाई को मरा जानकर बिल को पर्वत शिखर से ढककर अपने नगर में लौट आया। मन्त्रियों के आग्रह पर उसने राज्य संभाल लिया। उधर बालि ने मायावी को एक वर्ष में ढूंढ़ निकाला। उसने कुटुंब सहित मायावी का वध किया, और जब वह लौट कर आया तो बिल पर रखे पर्वत शिखर को देखकर उसने सुग्रीव को आवाज़ दी, किंतु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। बालि किसी प्रकार जैसे-तैसे शिखर को हटाकर अपनी नगरी में पहुँचा। वहाँ उसने अपने भाई सुग्रीव को राज्य करते देखा। उसे निश्चय हो गया कि सुग्रीव राज्य के लोभ से उसे बिल में बंद कर आया था। अत: उसने सुग्रीव को राज्य से निर्वासित कर दिया तथा उसकी पत्नी रूमा को अपने पास रख लिया। सीता हरण के पश्चात राम से मित्रता होने पर भी सुग्रीव को राम की शक्ति पर इतना विश्वास नहीं था कि वह शक्तिशाली वानरराज बालि को मार सकेंगे। अत: राम ने सुग्रीव के कहने पर अपने बल की परीक्षा दी। एक बाण से राम ने एक साथ ही सात साल वृक्षों को भेद दिया तथा अपने पाँव के अंगूठे की एक ठोकर से दुंदुभी के सूखे कंकाल को दस योजन दूर फेंक दिखाया। सुग्रीव बहुत प्रसन्न हुआ। राम ने सुग्रीव को बालि-वध का आश्वासन दिया और सब किष्किन्धा की ओर चल दिये। राम हाथ में धनुष लिये आगे-आगे चल रहे थे। किष्किन्धा में पहुँच कर राम एक सघन कुँज में ठहर गये और सुग्रीव को बालि से युद्ध करने के लिये भेजा और कहा- "तुम निर्भय हो कर युद्ध करो।" राम के वचनों से उत्साहित होकर सुग्रीव ने बालि को युद्ध करने के लिये ललकारा। सुग्रीव की इस ललकार को सुन कर बालि के क्रोध की सीमा न रही। वह क्रोध में भर कर बाहर आया और सुग्रीव पर टूट पड़ा। उन्मत्त हुये दोनों भाई एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। श्री रामचनद्र जी ने बालि को मारने कि लिये अपना धनुष सँभाला, परन्तु दोनों का आकार एवं आकृति एक समान होने के कारण वे सुग्रीव और बालि में भेद न कर सके। इसलिये बाण छोड़ने में संकोच करने लगे। उधर बालि की मार न सह सकने के कारण सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागा। राम, लक्ष्मण अन्य वानरों के साथ सुग्रीव के पास पहुँचे। राम को सम्मुख पाकर उसने उलाहना देते हुये कहा- "मल्ल युद्ध के लिये भेज कर आप खड़े-खड़े मेरे पिटने का तमाशा देखते रहे। क्या यही आपकी प्रतिज्ञा थी? यदि आपको मेरी सहायता नहीं करनी थी तो मुझसे पहले ही स्पष्ट कह देना चाहिये था। आपके भरोसे आज मैं मृत्यु के मुँह में फँस गया था। यदि मैं वहाँ से भाग न गया होता तो बालि मुझे मार ही डालता। सुग्रीव के क्रुद्ध शब्द सुन कर रामचन्द्र ने बड़ी नम्रता से कहा- "सुग्रीव! क्रोध छोड़ कर पहले तुम मेरी बात सुनो। तुम दोनों भाइयों का रंग-रूप, आकार, गति और आकृतियाँ इस प्रकार की थीं कि मैं तुम दोनों में अन्तर नहीं कर सका। इसीलिये मैंने बाण नहीं छोड़ा। सम्भव था कि वह बाण उसके स्थान पर तुम्हें लग जाता और फिर मैं जीवन भर किसी को मुख दिखाने लायक़ नहीं रहता। इस बार मैं तुम्हारे ऊपर कोई चिह्न लगा दूँगा।" राम लक्ष्मण से बोले- "हे वीर! उस पुष्पयुक्त लता को तोड़ कर सुग्रीव के गले में बाँध दो, जिससे इन्हें पहचानने में मुझसे कोई भूल न हो।" लक्ष्मण ने ऐसा ही किया और सुग्रीव एक बार फिर से बालि से युद्ध करने चला। इस बार सुग्रीव ने दूने उत्साह से गर्जना करते हुये बालि को ललकारा, जिसे सुन कर वह आँधी के वेग से बाहर की ओर दौड़ा। सुग्रीव की ललकार को सुनकर बालि की पत्नी तारा ने बालि को रोकते हुये कहा- "हे वीरश्रेष्ठ! अभी आप बाहर मत जाइये। सुग्रीव एक बार मार खा कर भाग जाने के पश्चात् फिर युद्ध करने के लिये लौटा है। इससे मेरे मन में संशय हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी के बल पर आपको ललकार रहा है। आज ही मुझे अंगद ने बताया था कि अयोध्या के अजेय राजकुमारों राम और लक्ष्मण के साथ उसकी मैत्री हो गई है। सम्भव है वे ही उसकी सहायता कर रहे हों। राम के पराक्रम के विषय में तो मैंने भी सुना है। वे शत्रुओं को देखते-देखते धराशायी कर देते हैं। यदि वे स्वयं सुग्रीव की सहायता कर रहे हैं तो उनसे लड़ कर आपका जीवित रहना कठिन है। इसलिये उचित है कि इस अवसर पर आप बैर छोड़ कर सुग्रीव से मित्रता कर लीजिये। उसे युवराज पद दे दीजिये। वह आपका छोटा भई है और इस संसार में भाई के समान हित कोई दूसरा नहीं होता। उससे इस समय मैत्री करने में ही आपका कल्याण है। तारा के इस प्रकार समझाने से चिढ़ कर बालि ने उसे झिड़क कर कहा- "यह अनर्गल प्रलाप बन्द करो। स्त्री जाति स्वभाव से ही कायर होती है। मैं सुग्रीव की ललकार को सुन कर कायरों की भाँति घर में छिप कर नहीं बैठ सकता और न ललकारने वाले से भयभीत होकर उसके सम्मुख मैत्री का हाथ ही बढ़ा सकता हूँ। रामचन्द्र जी को मैं जानता हूँ। वे धर्मात्मा हैं। मेरा उनसे कोई बैर भी नहीं है, फिर वे मुझ पर आक्रमण ही क्यों करेंगे? आज मैं अवश्य सुग्रीव का वध करूँगा।" यह कह कर बालि सुग्रीव के पास पहुँच कर उससे युद्ध करने लगा। दोनों एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। जब राम ने देखा कि सुग्रीव दुर्बल पड़ता जा रहा है, तभी उन्होंने एक विषैले बाण को धनुष पर चढ़ा कर बालि को लक्ष्य करके छोड़ दिया। बाण कड़कता हुआ बालि के वक्ष में जाकर लगा जिससे वह बेसुध हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। बालि को पृथ्वी पर गिरते देख राम और लक्ष्मण उसके पास जा कर खड़े हो गये। जब बालि की चेतना लौटी और उसने दोनों भाइयों को अपने सम्मुख खड़े देखा तो वह नम्रता के साथ कठोर शब्दों में बोला- "हे राघव! आपने छिपकर जो मुझ पर आक्रमण किया, उसमें कौन-सी वीरता थी? यद्यपि तारा ने सुग्रीव की और आपकी मैत्री के विषय में मुझे बताया था, परन्तु मैंने आपकी वीरता, शौर्य, पराक्रम, धर्मपरायणता, न्यायशीलता आदि गुणों को ध्यान में रखते हुये उसकी बात नहीं मानी और कहा था कि न्यायशील राम कभी अन्याय नहीं करेंगे। मेरा तो आपके साथ कोई बैर भी नहीं था। फिर आपने यह क्षत्रियों को लजाने वाला कार्य क्यों किया? आप नरेश हैं। राजा के गुण साम, दाम, दण्ड, भेद, दान, क्षमा, सत्य, धैर्य और विक्रम होते हैं। कोई राजा किसी निरपराध को दण्ड नहीं देता। फिर आपने मेरा वध क्यों किया है? जिसने आपकी स्त्री का हरण किया, उससे आपने कुछ नहीं कहा, किन्तु मुझ असावधान पर छिप कर वार किया। यदि मुझसे युद्ध करना ही था तो सामने आकर मुझसे युद्ध करते। आपके इस व्यवहार से मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।" बालि के इन कठोर वचनों को सुन कर राम ने उससे कहा- "हे बालि! मैंने तुम्हारा वध अकारण या व्यक्तिगत बैरभाव के कारण से नहीं किया है। सम्भवतः तुम यह नहीं जानते कि यह सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुओं की है। वे ही इसके एकमात्र स्वामी हैं और इसीलिये उन्हें समस्त पापियों को दण्ड देने का अधिकार है। इक्ष्वाकु कुल के धर्मात्मा नरेश भरत इस समय सारे देश पर शासन कर रहे हैं। उनकी आज्ञा से हम सारे देश का भ्रमण करते हुये साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का दमन कर रहे हैं। तुम कामवश कुमार्गगामी हो गये थे। धर्म-शास्त्र के अनुसार छोटा भाई, पुत्र और शिष्य तीनों पुत्र के समान होते हैं। तुमने इस धर्ममार्ग को छोड़ कर अपने छोटे भाई की स्त्री का हरण किया, जो धर्मानुसार तुम्हारी पुत्रवधू हुई। यह एक महापाप है। तुम्हें इसी महापाप का दण्ड दिया गया है। ऐसा करना मेरा कर्तव्य था। अपनी बहन और अनुज वधू को भोगने वाला व्यक्ति मार डालने योग्य होता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें तुम्हारे पिछले पापों का दण्ड दे कर आगे के लिये तुम्हें निष्पाप कर दिया है। अब तुम निष्पाप होकर स्वर्ग जाओगे। मैं तुम्हें इस विषय में एक घटना सुनाता हूँ। "मेरे पूर्व पुरुषों में मान्धाता नामक एक राजा थे। एक श्रमण ने इसी प्रकार का दुष्कर्म किया था जैसा तुमने किया है। राजा ने उसे भी कठोर दण्ड दिया था। अतएव तुम्हारा पश्चाताप करना ही व्यर्थ है। मैंने देश के राजा की आज्ञा का पालन किया है। मैं भी स्वतन्त्र नहीं हूँ। इसीलिये मैं तुम्हें दण्ड देने के लिये बाध्य था।" राम का तर्क सुन बालि ने हाथ जोड़कर कहा- "हे राघव! आपका कथन सत्य है। मुझे अपनी मृत्यु पर दुःख नहीं है। मुझे केवल अपने पुत्र अंगद की किशोरावस्था पर चिन्ता है। वह मेरी एकमात्र सन्तान है। बालि ने सुग्रीव और राम से यह वादा लेकर कि वह तारा तथा अंगद का ध्यान रखेंगे, सुखपूर्वक देह का त्याग किया।

राजस्थानी लोक-कथा - चोर और राजा

लोक कथा का अंश... किसी जमाने में एक चोर था। वह बड़ा ही चतुर था। लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उड़ा सकता था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जबतक वह राजधानी में नहीं जाएगा और अपना करतब नहीं दिखाएगी, तब तक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि कहां क्या कर सकता है। उसने तय कि राजा के महल से अपना काम शुरू करेगा। राजा ने रात दिन महल की रखवाली के लिए बहुतसे सिपाही तैनात कर रखे थे। बिना पकड़े गये परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बड़ी घड़ी लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी। चोर ने लोहे की कुछ कीलें इकट्ठी कीं ओर जब रात को घड़ी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एक-एक कील ठोकता गया। इस तरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीलें लगा दीं, फिर उन्हें पकड पकडकर वह ऊपर चढ़ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से हीरे चुरा लाया। अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो मंत्रियों ने राजा को इसकी खबर दी। राजा बडा हैरान और नाराज हुआ। उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि शहर की सड़कों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या दूनी कर दी जाये और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाये तो उसे चोर समझकर गिरफ्तार कर लिया जाये। जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था। उसे सारी योजना की एक बात का पता चल गया। उसे फौरन यह भी मालूम हो गया कि कौन से छब्बीस सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं। वह सफाई से घर गया और साधु का बाना धारण करके उन छब्बीसों सिपाहियों की बीवियों से जाकर मिला। उनमें से हरेक इस बात के लिए उत्सुक थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से इनाम ले। एक-एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बडी शुभ है। उसके पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा; लेकिन, देखो, चोर की अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबा लेगा। घर के सारे दरवाजे बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर जलता कोयला फेंकना। इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकड में आ जायेगा। सारी स्त्रियां रात को चोर के आगमन के लिए तैयार हो गईं। अपने पतियों को उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी। इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे चार बजे तक पहरा देते रहे। हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि उस रात को चोर नहीं आयेगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया। ज्योंही वे घर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई कार्रवाई शुरू कर दी। फल वह हुआ कि सिपाही जल गये ओर बडी मुश्किल से अपनी स्त्रियों को विश्वास दिला पाये कि वे ही उनके असली पति हैं और उनके लिए दरवाजा खोल दिया जाये। सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया। दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल सुनाया गया। सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े। उस रात कोतवाल ने तैयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया। जब वह एक गली में जा रहा रहा था, चोर ने उसे देख कर कहा, "मैं चोर हूं।″ कोतवाल समझा कि कोई मजाक कर रहा है। उसने कहा, ″मजाक छाड़ो ओर अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें काठ में डाल दूंगा।″ चोर बोला, ″ठीक है। इससे मेरा क्या बिगड़ेगा!″ और वह कोतवाल के साथ काठ डालने की जगह पर पहुंचा। वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काठ को आप इस्तेमाल कैसे किया करते हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए।″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओ तो ?″ चोर बोला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है। मैं भाग क्यों जाऊंगा?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि काठ कैसे डाला जाता है। ज्यों ही उसने अपने हाथ-पैर उसमें डाले कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया। जाड़े की रात थी। दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया। सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल काठ में फंसे पड़े हैं। उन्होंने उनको उसमें से निकाला और अस्पताल ले गये। अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया। राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया। चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था। रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया। राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा। तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है?″ साधु ने जवाब दिया कि "वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं। यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं।″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे। आपस में काफी बहस-मुबाहिसे और दो-तीन बार इनकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया ओर उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये। चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा और राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा। सवेरे के कोई चार बजने आये। राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया; लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है। उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया। राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी। दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया ओर मारे डर के थरथर कांपने लगा। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा। राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया। उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया। अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हताश था। उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थित हो जायेगा तो उसे माफ कर दिया जायेगा और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा। चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, "महाराज, मैं ही वह अपराधी हूं।″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी। राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा। इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा। इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कहानी - बुद्धि और भाग्य

कहानी का अंश... एक बार बुद्धि और भाग्य में झगड़ा हुआ। बुद्धि ने कहा, मेरी शक्ति अधिक है। मैं जिसे चाहूँ सुखी कर दूँ। मेरे बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता।’’ भाग्य ने कहा, मेरी शक्ति अधिक है। मैं तेरे बिना काम कर सकता हूँ। तू मेरे बिना काम नहीं कर सकती।’’ इस तरह दोनों ने अपनी-अपनी तरफ की दलीलें जोर-शोर से दीं। जब झगड़ा दलीलों से समाप्त न हुआ तो बुद्धि ने भाग्य से कहा कि यदि तुम उस गड़रिए को जो जंगल में भेड़ें चरा रहा है, मेरी सहायता के बिना राजा बना दो तो समझूँ कि तुम बड़े हो। यह सुनकर भाग्य ने उसके राजा बनाने का यत्न करना आरंभ कर दिया। उसने एक बहुत कीमती खड़ाऊँ की जोड़ी, जिसमें लाखों रुपए के नग लगे थे, लाकर गड़रिए के सामने रख दी। गड़रिया उनको पहनकर चलने फिरने लगा। फिर भाग्य ने एक व्यापारी को वहाँ पहुँचा दिया। व्यापारी उन खड़ाउँओं को देखकर विस्मित हो गया। उसने गड़रिए से कहा। तुम ये खड़ाऊँ बेच दो।’’ गड़रिए ने कहा, ‘ले लीजिए।’’ व्यापारी ने उनका मूल्य पूछा। गड़रिए ने कहा, ‘‘क्या बतलाऊँ मुझे रोटी खाने रोज गाँव जाना पड़ता है। यदि तुम मुझे दो मन भुने चने दे दो तो मैं यहाँ बैठे-बैठे चने चबाकर भेड़ों का दूध पी लिया करूँगा। इस भाँति मैं गाँव जाने के कष्ट से बच जाऊँगा और आपको भी खड़ाऊँ मिल जाएँगी। सारांश यह कि उस बुद्धिमान गड़रिए ने वो अनमोल खड़ाऊँ, जिनमें एक-एक हीरा करोड़ों रुपए का था, दो मन चनों के बदले में बेच डालीं। यह देखकर भाग्य ने और प्रयत्न किया। अब उस व्यापारी ने वे खड़ाऊँ राजा को भेंट की तो राजा देखकर हैरान हो गया। उसने व्यापारी से पूछा, ‘‘तुमने ये खड़ाऊँ कहाँ से पाईं ? व्यापारी ने कहा ‘‘महाराज एक राजा मेरा मित्र है उसने ये मुझे दीं।’’ तब राजा ने पूछा, ‘‘क्या उस राजा के पास ऐसी और भी खड़ाऊँ हैं ?’’ व्यापारी ने कहा हाँ, है।’’ यह सुनकर राजा ने कहा, ‘‘अच्छा जाओ, मेरी लड़की की सगाई उसके लड़के से करा दो।’’ व्यापारी जब भाग्यदेव की प्रेरणा से सब बातें कह चुका, तब राजा की अंतिम बात सुनकर बहुत घबराया और सोचने लगा कि खड़ाऊँ तो उसने गड़रिए से ली हैं; न कोई राजा है, न कोई राजा का लड़का। किंतु इन झूठी बातों को कह चुकने के कारण व्यापारी ने सोचा कि यदि मैं इस कथन को अस्वीकार करता हूँ तो न मालूम राजा साहब मुझे क्या दंडे दें। यह सोचकर उसने तय कर लिया कि जैसे भी हो, इस राजा के नगर से निकल जाना चाहिए। अत उसने राजा से कहा, ‘‘ठीक है, तो अब मैं आपकी लड़की की सगाई पक्की करने जाता हूँ।’’ यह कहकर वह जिस ओर से आया था उसी ओर को चल दिया और जब उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ वह गड़रिए से मिला था, तो क्या देखता है कि गड़रिया उससे भी मूल्यवान खड़ाऊँ पहने है। व्यापारी यह देखकर हैरान हो गया और उसने सोचा कि हो न हो, यह कोई सिद्ध महात्मा है। तभी तो ऐसी वस्तुएँ उसे स्वयं मिल जाती हैं। उसने निश्चय किया कि यहाँ रहकर इसका पता लगाना चाहिए। सोचकर उसने वही डेरा लगा दिया और अपना बहुत सा ताँबा लदा हुआ सब सामान एक ओर पेड़ के नीचे रख दिया। जब दोपहर हुई तो गड़रिया धूप से व्याकुल हो उस पेड़ के नीचे आया, जहाँ ताँबे के ढेर पड़े हुए थे। वह ढेर के सहारे सिर रखकर सो गया। भाग्य ने उस ताँबें के ढेर को सोना कर दिया। जब व्यापारी ने यह देखा तो सोचा कि जिस व्यक्ति के छू जाने से ताँबा सोना हो जाता है, उसको राजा बनाना कोई बड़ी बात नहीं। यह सोचकर उस व्यापारी ने वहीं जमीन खरीदी और किला बनवाना आरंभ कर दिया। सेना भर्ती की जाने लगी और जब सब सामान तैयार हो गया तो व्यापारी गड़रिए को पकड़कर किले में ले गया। उसको अच्छे-अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहनवाए; मंत्री सेवक इत्यादि कर्मचारी नौकर रखे और फिर उस लड़की वाले राजा को पत्र लिखा कि हमारे राजा जी ने सगाई स्वीकार कर ली है। अतः जो तिथि विवाह की निश्चिय करो, लिखो; उसी दिन बारात आ जाएगी। पत्रोत्तर में राजा ने तिथि लिख दी। इसपर विवाह का प्रबंध होने लगा। एक दिन जब राजसभा हो रही थी, सब मंत्री मुसाहिब बैठे हुए थे और वह गड़रिया राजसिंहासन पर तकिया लगाए राजा बना बैठा था, तब गड़रिए ने व्यापारी से कहा, ‘‘भाई देखो, तुम मुझे छोड़ दो, मेरी भेड़ें किसी के खेत में न चली जाएँ, कहीं मैं मारा न जाऊँ।’’ यह सुनकर सब लोग हँस पड़े। व्यापारी भी बड़ी हैरान हुआ। उसने सोचा कि इसका क्या प्रबंध किया जाए ? कहीं इसने राजा के सामने भी ऐसा ही कह दिया तो मैं तो उसी समय मारा जाऊँगा। उसने गड़रिए से कहा, ‘‘यदि तुम फिर कभी ऐसी बात कहोगे तो मैं तुम्हें उसी समय तलवार से मार डालूँगा। जो कुछ कहना हो, चुपके से मेरे कान में कहा करो।’’ कुछ समय बाद विवाह की तिथि आ गई। व्यापारी बारात लेकर चल दिया। जब लड़की वाले राजा का नगर निकट आ गया और उधर से मंत्री, बहुत से नौकर चाकर सेना अस्त्र-शस्त्र हाथी-घोड़े इत्यादि राजा की अगवानी के लिए आए तो गड़रिए ने विचार किया कि कदाचित् मेरी भेड़ें इनके खेत में चली गई हैं और ये मेरे कपड़े-लत्ते छीनने आ रहे हैं। अतः उसने झट व्यापारी से कहा, ये सब मेरे कपड़े-लत्ते छीनने के लिए आ रहे हैं। चूँकि यह बात कान में कही गई थी, अतः उस व्यापारी के सिवा और किसी को मालूम नहीं हुई। लोगों ने व्यापारी से पूछा, ‘‘कुँवर जी क्या आज्ञा दे रहे हैं ? व्यापारी ने कहा, कुँवर जी कहते हैं कि जितने आदमी स्वागत में आए हैं, प्रत्येक को पाँच-पाँच लाख रुपया पुरस्कार में दिया जाए।’’ फिर क्या था, बात की बात में यह फैल गया कि किसी बड़े भारी सम्राट् के कुँवर की बारात आई है, जो एक एक आदमी को पाँच-पाँच लाख रुपया पुरस्कार में देता है। नगर निवासी ही नहीं, लड़की वाला राजा भी घबराया कि मैंने बड़े भारी राजा से नाता जोड़ने का यत्न किया है। अब तो ईश्वर ही लाज रखे। अंततः उसी दिन राजा की कन्या का विवाह उस गड़रिए से हो गया। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

प्रेरक प्रसंग - अनमोल सीख

प्रेरक प्रसंग का अंश... प्राचीन काल में एक संत थे। वह मानते थे कि इंसान को जिस चीज की जरूरत होती है, उसे ईश्वर दे ही देता है। वह अपने पास एक कमंडल और रस्सी के अलावा कुछ नहीं रखते थे। वह इधर से उधर घूमते रहते थे। एक बार वह कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें प्यास लगी पर कहीं पानी दिखाई नहीं दिया। लाचार होकर वह आगे बढ़े। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि सामने एक कुआं है, जो लबालब पानी से भरा हुआ है एक हिरन उसमें से पानी पी रहा था। उन्होंने सोचा कि इसमें तो पानी एकदम ऊपर है इसलिए वह कमंडल और रस्सी को छोड़कर कुएं के पास पहुंचे। लेकिन उनके पहुंचते ही कुएं का पानी एकदम नीचे चला गया। संत हैरान रह गए। उन्होंने इधर-उधर नजरें दौड़ाईं पर कहीं कुछ नहीं दिखा। वह सोचने लगे कि आखिर क्या हुआ? उनकी प्यास गायब हो गई। वह चुपचाप खड़े होकर देखने लगे कि माजरा क्या है। तभी कहीं से आवाज आई, 'तुम हैरान क्यों होते हो? हिरन के पास कमंडल और रस्सी नहीं थी, इसलिए हमने खुद पानी को उसके नजदीक कर दिया। लेकिन तुम्हारे पास तो कमंडल और रस्सी है, इसलिए पानी को नीचे कर दिया।' संत को इस पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने कमंडल और रस्सी को दूर फेंक दिया और पानी पिये बिना ही वहां से चलने को हुए। इतने में फिर से आवाज आई, 'अरे कहां जा रहे हो? हमने तो तुम्हारे सब्र की परीक्षा ली थी। जाओ और पानी पीयो। तुमने तो हमें भी झुका दिया। तुम्हारे पास एक कमंडल और रस्सी थी, तुमने उसका मोह भी छोड़ दिया। तुम किसी भी सहारे के बगैर जी सकते हो, यह यकीन ही तुम्हारी ताकत है। सबके पास यह ताकत नहीं होती और न ही ऐसी हिम्मत होती है।' संत समझ न सके कि यह सपना है या हकीकत लेकिन उनमें एक नया आत्मविश्वास भर चुका था। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - अहंकार से मुक्ति

प्रेरक प्रसंग का अंश... अंगिरा ऋषि अपनी विद्वता और तेजस्विता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके मार्गदर्शन में अनेक शिष्य ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन सफल बनाते थे। उदयन उनका एक अत्यंत प्रतिभावान शिष्य था। ऋषि उसके प्रति अत्यंत स्नेह रखते थे। एक बार ऋषि ने महसूस किया कि उदयन के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। उसमें न सिर्फ अहंकार आने लगा था, बल्कि वह आलस्य का भी शिकार होता जा रहा था। ऋषि इससे दुखी थे वह उदयन को इनसे बाहर निकालना चाहते थे। उन्हें एक तरकीब सूझी। एक रात वह उदयन के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। तभी अचानक चर्चा रोककर उन्होंने उदयन से कहा, 'वत्स, सामने रखी अंगीठी में झांक कर देखो, कोयला दहकने के कारण कितना तेजस्वी लग रहा है। इसे निकालकर मेरे सामने रख दो जिससे मैं पास से इसे देख सकूं।' उदयन ने कोयले को अंगीठी से निकालकर उनके समीप रख दिया। कुछ ही क्षणों में दहकता हुआ कोयला अंगारे की जगह राख में परिवर्तित हो गया। दहकते हुए अंगारे को राख में परिवर्तित होते देख ऋषि उदयन से बोले, 'वत्स देखो, अंगीठी का सबसे चमकदार कोयला जिस प्रकार अग्नि के तेज से विमुख होते ही राख बन गया, उसी प्रकार सक्रिय और प्रतिभावान व्यक्ति भी अभ्यास, स्वाध्याय, विनम्रता, नेकी व सक्रियता से विमुख होते ही आलस्य तथा अहंकार का शिकार होकर निस्तेज व गुणविहीन हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस बात को अपने हृदय में बसा लेना चाहिए कि सफलता, अभ्यास, ज्ञान, सक्रियता व बुद्धिमत्ता ही किसी व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाती है। इन गुणों को अपनाकर ही उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है। अहंकार व आलस के व्यक्ति पर हावी होते ही वह इन गुणों से युक्त होते हुए भी गुणरहित होता है और ऐसे व्यक्ति की छवि धीरे-धीरे धूमिल होती जाती है।' उदयन अपने गुरु का आशय समझ गया। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - कर्म का फल

प्रेरक प्रसंग का अंश... एक गांव में जमींदार और उसके एक मजदूर की साथ ही मौत हुई। दोनों यमलोक पहुँचे। धर्मराज ने जमींदार से कहा, ‘आज से तुम मजदूर की सेवा करोगे।’ मजदूर से कहा, ‘अब तुम कोई काम नहीं करोगे, आराम से यहाँ रहोगे।’ जमींदार परेशान हो गया। पृथ्वी पर तो मजदूर जमींदार की सेवा करता था, पर अब उलटा होने वाला था। जमींदार ने कहा, ‘भगवन, आप ने मुझे यह सजा क्यों दी? मैं तो भगवान का परम भक्त हूँ। प्रतिदिन मंदिर जाता था। देसी घी से भगवान की आरती करता था और बहुमूल्य चीजें दान करता था। धर्म के अन्य आयोजन भी मैं करता ही रहता था।’ धर्मराज ने मजदूर से पूछा, ‘तुम क्या करते थे पृथ्वी पर?’ मजदूर ने कहा, ‘भगवन, मैं गरीब मजदूर था। दिन भर जमींदार के खेत में मेहनत मजदूरी करता था। मजदूरी में उनके यहाँ से जितना मिलता था, उसी में परिवार के साथ गुजारा करता था। मोह माया से दूर जब समय मिलता था तब भगवान को याद कर लेता था। भगवान से कभी कुछ मांगा नहीं। गरीबी के कारण प्रतिदिन मंदिर में आरती तो नहीं कर पाता था, लेकिन जब घर में तेल होता तब मंदिर में आरती करता था और आरती के बाद दीपक को अंधेरी गली में रख देता था ताकि अंधेरे में आने-जाने वाले लोगों को प्रकाश मिले।’ धर्मराज ने जमींदार से कहा, ‘आपने सुन ली न मजदूर की बात? भगवान धन-दौलत और अहंकार से खुश नहीं होते। भगवान मेहनत और ईमानदारी से कमाने वाले व्यक्ति से प्रसन्न रहते हैं। यह मजदूर तुम्हारे खेतों में काम करके खुश रहता था और सच्चे मन से भगवान की आराधना करता था। जबकि तुम आराधना ज्यादा धन पाने के लिए करते थे। तुम मजदूरों से ज्यादा काम लेकर कम मजदूरी देते थे। तुम्हारे इन्हीं कामों के कारण तुम्हें मजदूर का नौकर बनाया गया है ताकि तुम भी एक नौकर के दुख-दर्द को समझ सको।’ इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - कोयल और कौआ

प्रेरक प्रसंग का अंश... संस्कृत साहित्य की यह चर्चित कथा है। एक बार वसंत ऋतु में एक कोयल वृक्ष पर बैठी कूक रही थी। आते-जाते लोग उसकी कूक को सुनते और उसकी सुरीली आवाज का आनंद लेते हुए उसकी तारीफ के पुल बांधते। कुछ देर बाद कोयल के सामने एक कौआ तेज गति से आया। कोयल ने उससे पूछा, ‘इतनी तेज गति से कहाँ जा रहे हो? कुछ देर बैठो, बातें करते हैं।’ कौए ने उत्तर दिया कि वह जरा जल्दी में है और देश को छोड़कर परदेस जा रहा है। कोयल ने इसका कारण पूछा तो कौआ बोला, ‘यहाँ के लोग बहुत खराब हैं। सब तुम्हें ही चाहते हैं। सभी लोग सिर्फ तुम्हारा आदर करते हैं। वह यही चाहते हैं कि तुम हमेशा की तरह इसी प्रकार से उनके क्षेत्र में गाती रहो। वहीं जहाँ तक मेरी बात है तो मुझे कोई देखना तक नहीं चाहता। यहाँ तक कि मैं किसी की मुंडेर पर बैठता हूँ तो मुझे कंकड़ मारकर वहाँ से भगा दिया जाता है। मेरी आवाज भी कोई नहीं सुनना चाहता। जहाँ मेरा अपमान हो, मैं ऐसे स्थान पर एक क्षण भी नहीं रहना चाहता। ज्ञानियों ने भी हमें यही शिक्षा दी है कि अपमान की जगह पर नहीं रहना चाहिए।’ यह सुनकर कोयल बोली, ‘परदेस जाना चाहते हो तो बड़े शौक से जाओ। यह पूरी तरह से तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। लेकिन एक बात का सदैव ध्यान रखना कि वहाँ जाने से पहले अपनी आवाज को बदल लेना। अपनी वाणी को मधुर बना लेना। यदि तुम्हारी वाणी ठीक वैसी ही कठोर रही, जैसी यहाँ पर है तो परदेस में भी लोग तुम्हारे साथ वही व्यवहार करेंगे जो अभी हो रहा है। संसार जो है, जैसा भी है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन हम अपनी दृष्टि और वाणी को बदल सकते हैं। इन दोनों के बदलने से जीवन की दिशा और दशा, दोनों बदल जाती है और यहीं से संसार में आनंद और सुख की प्राप्ति शुरू होती है।’ इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - सच्ची स्वतंत्रता

प्रेरक प्रसंग का अंश.... भारतवर्ष में सम्राट समुद्रगुप्त प्रतापी सम्राट हुए थे। लेकिन जीवन क्षेत्र में सामने आने वाली विभिन्न प्रकार की चिंताओं से वह भी नहीं बच सके। एक समय ऐसा आया जब कि चिंताओं के कारण वह काफी परेशान से रहने लगे। चिंताओं का चिंतन करने के लिए एक दिन वह वन की ओर निकल पड़े। वह रथ पर थे, तभी उन्हें कहीं से बांसुरी की सुरीली तान सुनाई दी। इतनी मीठी आवाज सुनकर उन्होंने सारथी से रथ धीमा करने को कहा और जिस तरफ से बांसुरी के स्वर के आ रहे थे, उसी तरफ जाने का इशारा किया। कुछ दूर जाने पर समुद्रगुप्त ने देखा कि झरने और उनके पास मौजूद वृक्षों की आड़ में एक व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था। पास ही उसकी भेड़ें घास चर रही थीं। राजा ने कहा, आप तो इस तरह प्रसन्न होकर बांसुरी बजा रहे हैं, जैसे कि आपको किसी देश का साम्राज्य मिल गया हो। युवक बोला, श्रीमान आप दुआ करें कि भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दे। क्योंकि अभी इस वक्त मैं खुद को पूरी तरह से सम्राट महसूस करता हूं और सम्राट हूं भी। लेकिन साम्राज्य मिल जाने पर पर कोई सम्राट नहीं रह जाता, बल्कि वह तो सेवक बन जाता है। युवक की बात सुनकर राजा हैरान रह गए। तब युवक ने कहा सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। व्यक्ति संपत्ति से स्वतंत्र नहीं होता बल्कि भगवान का चिंतन करने से स्वतंत्र होता है। जब वह मन कर्म वचन के बारे में चिंतन करता है, तब उसे किसी भी तरह की सांसारिक चिंता नहीं होती है। ऐसे में मुझमें और सम्राट में बस मात्र संपत्ति का ही फासला होता है। बाकी सब कुछ तो मेरे पास भी है। युवक की बातें सुनकर राजा ने युवक को अपने सम्राट होने का परिचय दिया। युवक सम्राट समुद्रगुप्त का परिचय जानकर हैरान था, लेकिन जाने अनजाने ही सही, राजा की चिंता का समाधान उसने कर दिया था। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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