शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

घर की खिड़की पर आती नहीं चिडि़या



यह आलेख दैनिक भास्‍कर के संपादकीय पृष्‍ठ पर 19 जनवरी के अंक में 13 राज्‍यों के 53 संस्‍करणों में एक साथ प्रकाशित हुआ है।

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

आत्महत्या का प्रयास अपराध माना जाए?


डॉ. महेश परिमल
ऐसा कौन-सा अपराध है, जिसमें सफल होने पर कुछ नहीं होता, किंतु विफल होने पर सजा होती है? आपने सही सोचा, जी हाँ वह अपराध है ‘आत्महत्या’। क्या आत्महत्या को अपराध माना जाए? इसमें विफल होने वाले व्यक्ति के लिए जीवन एक अभिशाप बनकर रह जाता है। आप ही सोचें, एक गरीब व्यक्ति, जिसके पास जीने का कोई सहारा नहीं है, बीमार है, भोजन के लिए कहीं कुछ भी नहीं है, भीख माँगने पर उसका स्वाभिमान आड़े आता है, ऐसी दशा में वह आवेश में आकर आत्महत्या करना चाहे, तो क्या गलत है? इस पर वह यदि किसी कारण से अपने प्रयास में विफल रहता है, तो वह अपराधी कैसे हो गया? इसके बाद उसका जीवन जेल में कटता है। वहाँ जाकर फिर वही घिसटती जिंदगी! कहाँ तो सचमुच का अपराध करने वाले अपराधी समाज में ही बेखौफ घूमते हैं और कहाँ अपने जीवन को बरबाद करने के चक्कर में विफल होने वाला साधारण व्यक्ति जेल की हवा खा रहा है। क्या यह न्यायसंगत है?
अपने इस तर्क के माध्यम से मैं आत्महत्या के लिए लोगों को विवश नहीं करना चाहता। ऐसा अब पूरे देश में सोचा जाने लगा है। आत्महत्या एक अपराध है, जब यह कानून बनाया जा रहा था, तब परिस्थितियाँ दूसरी थीं। आज हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। जिस तरह से 50-75 साल पहले टीबी याने क्षय रोग को राजरोग कहा जाता था, उसके बाद कैंसर की बारी आई और आज एड्स का बोलबाला है। इस तरह से परिस्थितियों के बदलने के साथ-साथ उन दशाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता हो जाती है, जो उस समय नहीं थी। आत्महत्या के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने कई उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। अभी-अभी ही माँ-संतान को जोड़ने वाली गर्भनाल में रहने वाले अरबों जनकोष (स्टेम सेल) से हर तरह के रोगों का उपचार करने की जानकारी प्राप्त हुई है। फिर भी मानव मन भटकता रहता है। वह कब क्या करेगा, यह कहा नहीं जा सकता। आत्महत्या के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। 1995-96 में इंडियन पैनल कोड 309 की धारा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहाल रखा। वैसे तो कानूनविदो की 42 वीं वाषिर्क रिपोर्ट में आत्महत्या को कानूनन रूप देने की सिफारिश को स्वीकार कर सरकार ने राज्यसभा में भेजा गया था, पर लोकसभा में बहुमत न मिलने के कारण यह आवेदन काम नहीं आया। इस दलील को लेकर यह कहा जा रहा था कि इससे आत्महत्या के मामले बढ़ सकते हैं। यह दलील झूठ भी साबित हो सकती है, क्योंकि श्रीलंका में चार वर्ष पहले आत्महत्या को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया, तब से वहाँ आत्महत्या के मामलों में कमी आई है।
आत्महत्या के मामले में हमारे साधु-संत दोहरी बातें करते हैं। एक तरफ उनका मानना है कि आत्महत्या करने से हमें अपने जीवन में जो भोगना होता है, वह नहीं भोग पाते, इसलिए हमें फिर जन्म लेना पड़ता है। दूसरी तरफ वे कहते हैं कि मानव जीवन दुर्लभ है, 84 लाख योनियों से गुजरने के बाद मानव जीवन प्राप्त होता है, इसे व्यर्थ न किया जाए। इन दोनों विचारों में सच क्या है? वैसे देखा जाए, तो स्वामी रामकृष्ण परमहंस, रमण महषिर्, श्री रंग अवधूत आदि महानुभाव कैंसर की पीड़ा को हँसते-हँसते झेला। साधु-संतों और साधारण मानव की सहनशक्ति में अंतर होता है, इसलिए साधारण मनुष्य पीड़ाएँ नहीं झेल पाता। जस्टिज लक्ष्मण का कहना है कि असाध्य बीमारी या असाध्य पीड़ा से त्रस्त मनुष्य को जीने के लिए बाध्य करना अमानवीय और अनैतिक है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिस तरह से व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों पर निर्भर होना पड़ता है, उसी तरह अपनी जीवन लीला समाप्त करने का अधिकार भी व्यक्ति के पास होना चाहिए। कई देशों में अपने यहाँ मर्सिकिलिंग या यूथेनेसिया को कानूनी रूप दिया गया है। जो व्यक्ति पूरी तरह से किसी असाध्य रोग से पीड़ित है और उसके बचने की कोई संभावना नहीं है, उसे जीवित रखकर इंसान आखिर क्या हासिल करना चाहता है?
कानून विद् कहते हैं कि समाज के सभी वर्गाें को इस दिशा में आगे बढ़कर आत्महत्या को अपराध मानने के खिलाफ आंदोलन करना होगा,तभी बात बन सकती है। मौत की सजा को अमानवीय बताने वाले, उसे रद्द करने की माँग करने वाले मसिकिलिंग और यूथेनेसिया के मामले में खामोश क्यों रह जाते हैं। कोई व्यक्ति यदि घृणित अपराध करता है और उसे मौत की सजा होती है, तो लोग उसे मानवता का ध्वंस मानते हैं, ऐसे लोग असाध्य बीमारी से ग्रस्त लाचार और विवश व्यक्ति के प्रति सद्भाव क्यों नहीं रखते।
यह सच है कि आत्महत्या का विचार त्यागकर व्यक्ति नई ऊर्जा के साथ अपनी मंजिल को प्राप्त कर ले, ऐसे कम ही मिलेंगे। हर बार आत्महत्या का कारण वाजिब हो, यह भी जरूरी नहीं। सही समय पर व्यक्ति को यदि सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो व्यक्ति आत्महत्या का विचार त्याग भी सकता है। यदि विचार आ जाए और इसके लिए वह प्रयास भी करे, उसमें विफल हो जाए, तो उसे अपराधी माना जाए? इस संबंध में कानून विदों एवं न्यायाधीशों के विचारों को गंभीरता से लेना होगा।
Êारा सोचें, आत्महत्या का विचार करने वाला व्यक्ति किन हालात से गुजर रहा है? आत्महत्या करने के लिए वह कैसे-कैसे तरीके अपनाता है। कभी कहीं से कूदकर, कभी जहर खाकर, कभी शरीर की नस काटकर, कभी गले में फाँसी लगाकर, आखिर यह सब करते हुए उसे पीड़ा की एक लम्बी सुरंग तो पार करनी ही होती है। जब ये प्रयास विफल हो जाते हैं, तो क्या वह अपराधी हो गया? दूसरी ओर जिसने इत्मीनान के साथ किसी की हत्या की हो, उसके बाद उस तनाव को दूर करने के लिए शराब की शरण में जाकर अपने को हल्का कर रहा हो, वह भी अपराधी? आखिर इन दोनों के अपराध में जमीन-आसमान का अंतर तो है ही। एक ने अपना जीवन होम करने की सोची और दूसरे ने किसी और का जीवन बड़े आराम से खत्म कर दिया। दोनों की प्रवृत्तियों में अंतर है। फिर हत्या करने वाला तो आराम से कानून की नजर से छिप भी जाता है,पर आत्महत्या करने की कोशिश करने वाला समाज में घोषित हो जाता है। पीड़ादायक स्थिति को तो अधिक करीब से आत्महत्या करने की कोशिश करने वाला झेलता है, फिर वह अपराधी कैसे हुआ? मेरा यहाँ इतना ही कहना है कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की मानसिकता को समझते हुए उस पर रहम किया जाए। उसे अपराधी घोषित करने के पहले उसके अपराध को गंभीरता से लें, आखिर उसने यह कदम क्यों उठाया? इन प्रश्नों का जवाब ढ़ूँढा जाए, तो आत्महत्या की कोशिश में नाकाम होना एक अपराध नहीं होगा, बल्कि अपने जीवन के साथ खिलवाड़ करना माना जाएगा।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 24 जनवरी 2011

दो विरोधाभासी मुहावरों के बीच जीवन



डॉ. महेश परिमल
आज मेरे सामने दो मुहावरे हैं। एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है और एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। दोनों ही मुहावरों में विरोधाभास है। जब भी एक उदाहरण देता है, दूसरा तपाक से दहला मारते हुए दूसरा मुहावरा उछाल देता है। लोग हँसकर रह जाते हैं। आइए इन मुहावरों का विश्लेषण करें:- दोनों में मुख्य अंतर है, अच्छाई और बुराई का। मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि उसे बुराई जल्द आकर्षित और प्रभावित करती है। दूसरी ओर अच्छाई में चकाचौंध करने वाली कोई चीज नहीं होती, यह सदैव निलिर्प्त होती है। जब तक कमरे में उजाला है, तब तक हमें अंधेरे का भान ही नहीं होता। जैसे ही लाइट गई, अंधेरा पसरा कि हम फड़फड़ाने लगते हैं। तब हम उजाले का महत्व समझने लगते हैं।
विदेशों से हमने कई नकलें की हैं। फैशन, शिक्षा, रहन-सहन आदि की नकल करने में हम बहुत आगे हैं। पर समय की पाबंदी, निष्ठा, अनुशासन जैसे गुणों की ओर देखना भी मुनासिब नहीं समझा। विदेशों में जब एक मिनट के लिए किसी की ट्रेन छूट गई या फिर थोड़ी सी देर के लिए काफी नुकसान उठाना पड़ा हो, वही जान सकता है कि समय का कितना महत्व है। हम अपने देश में समय को बेकार जाते देखते भर रहते हैं।
एक सड़ी हुई मछली में संक्रामक कीटाणु होते हैं, जो तेजी से फैलते हैं। उनकी संख्या प्रतिक्षण बढ़ती है, इसलिए सारा तालाब कुछ ही देर में गंदा हो जाता है। दूसरी ओर चने का इकट्ठा होना, भाड़ तक पहुँचने तक उनका रूप सख्त है। गर्मी पाते ही चने का रूप बदल जाता है। वह कोमल हो जाता है। भाड़ की गर्मी से चने ने अपना रूप बदल दिया। भाड़ फोड़ना एक क्रांतिकारी विचार है। क्रांति ठोस इरादों से आती है। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना क्रांति का आगाज है। भाड़ चने पर कोई अत्याचार नहीं करता, बल्कि अपनी तपिश से उसे कोमल और स्वादिष्ट बनाया। चना भाड़ फोड़ने की सोच भी नहीं सकता, क्योंकि भाड़ के सामने जाते ही उसका रूप बदल जाता है। बिलकुल उस हैवान की तरह, जो गुस्से से देवी माँ के सामने आता है और अपना क्रोध भूलकर उसके चरणों में लोट जाता है। माँ का प्यार उस हैवान को पिघला देता है।

मछली तालाब को हमेशा के लिए गंदा नहीं कर सकती। बुराई केवल कुछ देर के लिए ही तालाब पर हावी होती है। कुछ समय बाद तालाब की अच्छाई सक्रिय हो जाती है। धीरे-धीरे बुराई का नाश होता है और तालाब स्वच्छ हो जाता है। बुराई के ऐसे ही रंग हमें अपने जीवन में देखने को मिलते हैं। जैसे ही हमारे जीवन में बुराईरूपी अंधेरे का आगमन होता है, विवेकरूपी दीया प्रस्थान कर जाता है। बुराई अपना खेल खेलती है, मानव को दानव तक बना देती है। बुराई में एक विशेषता होती है, जब वह कमजोर होने लगती है, तब वह अधिक आक्रामक हो जाती है। यही समय है, जब थोड़े धर्य के साथ उसका मुकाबला किया जाए। इस दौरान हमें उस सुहानी सुबह के बारे में सोचना चाहिए, जो उस अंधेरी बुराई के ठीक पीछे उजाले के रूप में होती है। बुराई हमेशा शक्तिशाली नहीं रह पाती, उसके कमजोर होते ही अच्छाई का आगमन है और उसी दानव को महात्मा तक बना देती है। मेरा मानना है कि अच्छाई को कोई दानव भी सच्चे हृदय से स्वीकार करे, तो उसे महात्मा बनने में देर नहीं लगेगी। आप क्या सोचते हैं?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

घर की खिड़की पर आती नहीं चिड़िया


डॉ महेश परिमल
चिड़िया का चहकना कितना भला लगता है। उसकी चहचहाहट में भी एक लय है। बचपन मानो चिड़िया की चहचहाहट की इस लय पर थिरक उठता है।
बचपन में चिड़ियों पर बहुत सी कहानियां पढ़ते थे। मां की कहानियों में भी कभी कभी चिड़िया चॅँ-चूँ बोल जाती थी। अपने दोनों पंजों से चिड़िया जब आगे बढ़ती है, तो उसे फुदकना कहते हैं, यह मां की कहानियों से ही जाना। चिड़िया से आज तककिसी को कोई नुकसान नहीं हुआ। सचमुच अपने सामने किसी चिड़िया का चहकना कितना भला लगता है। उसकी चहचहाहट में भी एक लय है। बचपन मानो उसकी लय पर थिरक उठता है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने चिड़ियों की चहचहाहट न सुनी हो। वह बचपन, बचपन ही नहीं, जिसमें चिड़ियों की चहचहाहट वाली कोई कहानी ही न हो। मेरा बच्च एक दिन कुछ कह रहा था। चिड़िया आती है, चिड़िया जाती है, चिड़िया दूर दूर चली जाती है। फिर आती है, दाना चुगकर चली जाती है..। बच्चों के कोमल मन पर भी चिड़िया अपना प्रभाव अवश्य छोड़ती है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक चिड़ियों का साथ होता है। एकमात्र यही ऐसा परिंदा है, जिसे कोई अपना दुश्मन नहीं मानता। लेकिन आज ये ही दोस्त हमारे बीच से गुम हो रहे हैं। अब सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं होती। उनकी राह देखनी पड़ती है। भाग्य अच्छा हो, तो वह दिख भी जाती है। कांक्रीट के जंगल में अब वह अपना घरौंदा नहीं बना पाती। पहले पेड़ों पर अपना घरौंदा वह बना भी लेती थी। पेड़ उसके घरौंदे को सुरक्षित रख भी लेते थे। आज कांक्रीट के इस जंगल में ऐसी कोई बिल्डिंग नहीं, जो उसके घरौंदे को महफूज रख सके। इन घरों में वह सब कुछ होता है, जिससे घर सँवरता है। ऐसे घरों में चिड़ियों का प्रवेश होता तो है, पर उस घर के लिए नुकसानदेह साबित होता है। कभी एक उंगली जितने सहारे पर टिकी कोई फ्रेम या शो पीस या फिर कोई कीमती सामान, इन चिड़ियों के कारण टूट फूट जाता है। ऐसे घरों के लोग चिड़ियों को दुत्कारने लगते हैं। वास्तव में चिड़ियाएं वहां प्यार का संदेशा देने जाती हैं। पर उनके संदेशों को कोई सुनना नही चाहता।

आखिर चिड़िया क्यों हमारे आँगन में नहीं फुदकती? क्या वह हमसे नाराज है? या फिर वह हमसे कुछ कहना चाहती है? दरअसल चिड़ियाएं कभी किसी से नाराज नहीं होतीं। नाराज होना तो उनके स्वभाव में ही नहीं है। वे तो यह समझ ही नहीं पा रही हैं कि अब घरों में उसके लिए जगह क्यों नहीं है? उसके लिए दाने पानी के कटोरे अब कहीं-कहीं ही देखने को मिलते हैं। ऐसा क्यों है, यह सोचना उसका काम नहीं। सोचना तो हमें है कि आखिर चिड़ियाएं अब घरों के अंदर बेखौफ होकर क्यों नहीं आतीं? बसेरे के लिए अब उतने घने दरख्त भी कहां बचे, जहां वह अपने बच्चों को सुरक्षित रखकर दाने पानी की तलाश में निकल सके। पेड़ और इंसान के दरो-दीवार उसके विश्वास और भरोसे के दायरे से धीर-ेधीरे अब दूर होने लगे हैं। अब सुनने को नहीं मिलती गोरैया की मीठी तान, न उस पर कोई कहानी। अब न नानी है, न कहानी। हम प्रतीक्षा करते हैं दाना पानी लेकर चिड़िया का। वह आएगी, दाना चुगेगी और चोंच में दबाकर चली जाएगी। बिल्कुल बच्चे की कविता की तरह। आप बताएंगे, क्या चिड़िया आएगी? क्या वह हमसे नाराज है? क्या वह हमसे कुछ कहना चाहती है? क्या हम उससे यह वादा नहीं कर सकते कि हमारी सुबह उसकी चहचहाहट से होगी? हम देंगे उसे दाना पानी। हम रखेंगे उसका खयाल। हम सिद्ध कर देंगे कि हम उस पर आश्रित हैं, वह हम पर नहीं।
डॉ महेश परिमल

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

परेशान करने वाले शब्‍द



डॉ महेश परिमल
कुछ शब्‍दों ने मुझे हमेशा परेशान किया है। कुछ शब्‍द आज भले ही हमें गलत अर्थ देते हों, पर सच तो यह है कि उन शब्‍दों का अर्थ पहले सकारात्‍मक होता रहा है, लेकिन समय के साथ कुछ लोगों की क्षुद्र मानसिकता के कारण उन शब्‍दों के अर्थ में बदलाव आ गया।
असुर शब्द ‘इशु’ (असु) से बना है, जिसका अर्थ है ‘ईश्वर’. ऋग्वेद में असुर इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ‘असु: प्राणो विद्यते यस्मिन् स असुर:’ अर्थात् जिसमें प्राण, बल अथवा सामर्थ्य हो, वह असुर है. ‘असुर’ सुर का विलोम शब्द है, जिसका अर्थ हुआ, ‘सुर-विरोधी’. कुछ विद्वानों के अनुसार ‘दानव’ का अर्थ ‘दानी’ और ‘दमनशील,’ ‘राक्षस’ का अर्थ ‘रक्षक’ और ‘पालक,’ ‘निशाचर’ का अर्थ ‘रात का पहरेदार,’ ‘रात में चोर-लुटेरों से समाज की रक्षा करने वाला’ तथा ‘असुर’ का अर्थ ‘अमछयी’ या ‘मदिरा न पीने’ वाला होता है. देव-असुर संघर्ष (देवासुर संग्राम अर्थात् आर्यों और मूलनिवासियों का प्रथम युद्ध) के बाद देवों ने असुर का अर्थ बदल दिया. भागवत पुराण में अनार्यों को यज्ञों में विध्न डालने वाला बताया गया है अर्थात् जो यज्ञों में विश्वास नहीं करते थे, उन्हें असुर कहा जाने लगा. वैदिक काल (1500-500 ई.पू) में असुरों को कर्म विरोधी, देवों के प्रति उदासीन, अद्भुत आदेशों के पालने वाले (अन्यव्रत) के रूप में कहा गया है. इस देश के मूलनिवासी धर्मात्मा और सत्यनिष्ठ राजाओं को आर्यों ने अपनी पुस्तकों में असुर, दैत्य, दानव व राक्षस आदि नामों से उल्लेख करके उन्हें अविचारी, अनाचारी, अधार्मिक और अत्याचारी सिद्ध करके उनके प्रति जनता में घृणा उत्पन्न की और अपने आर्य राजाओं की प्रंशसा कर उन्हें अवतार ही नहीं बल्कि परमेश्वर से भी अधिक महापुरुष सिद्ध करके जनता में उनकी भक्ति व भजन करने के लिए वेदों का प्रचार किया।

कुछ लोग समझते हैं कि ‘चमार’ शब्द चमड़े का काम करने वाली जातियों से जुड़ा है और चमड़े का काम करने के कारण ही इस नाम से इतनी घृणा पैदा हुई है. यह तर्क सही प्रतीत नहीं होता, क्योंकि पेशे को घृणित नहीं कहा जा सकता. आज बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में यह कार्य हो रहा है और सवर्ण लोग भी कर रहे हैं. इस तरह चमार जाति अपनी पृथक् पंचायत प्रणाली से बँधी थी और अपने प्रत्येक झगड़े-टंटे या किसी अन्य समस्या का फैसला अपने स्तर पर ही कर लेते थे
कुछ विद्वानों का मत है कि ‘चंवर’ से ‘चमार’ शब्द की उत्पत्ति हुई है. संभवत: ‘चंवर’ शब्द का विकास ‘चार्वाक’ से हुआ है. इसका तात्पर्य कि जो ‘चार्वाक धर्म’ को मानते हैं, वे ‘चंवर’ हैं. ‘चार्वाक धर्म’ नास्तिक धर्म है. यह वैष्णव धर्म में विश्वास नहीं करता. यह समानता का पाठ पढ़ाता है तथा झूठे आडम्बरों की पोल खोलता है. चंवर, चामुण्डराय, हिरण्यकश्यप, महाबलि, कपिलासुर, जालंधर, विषु, विदुवर्तन आदि भी ‘चार्वाक धर्म’ को मानने वाले शासक हुए हैं. चार्वाक शब्द ‘चारू (मीठा)’ एंव ‘वाक्’ (बोलने वाला)’ की संधि से बना है, जिसका अर्थ है –‘मीठा बोलने वाला’. लेकिन वैष्णव मतावलंबियों ने इस धर्म के अनुयायियों को ‘हमेशा चरने वाले’ अर्थात् ‘अधिक खाने वाले’ तथा ‘चबर-चबर’ करने वाले अर्थात् ‘अधिक बोलने वाले’ घोषित कर दिया. यह भी प्रचार किया गया है कि ‘चार्वाक धर्म’ का ध्येय केवल खाना-पीना और मौज उड़ाना है. कर्ज लेकर घी पीना है. अत: इसी धार्मिक विरोध के कारण ही ये घृणा उपजी थी और इस घृणा का आधार ‘चार्वाक धर्म’ ही था. वैष्णव मतावलंबियों ने ‘चार्वाक धर्म’ का साहित्य जला डाला. जहाँ भी ‘चार्वाक धर्म’ का व्यक्ति दिखाई दे, उसे मारने तक के आदेश दिए गए थे।
‘चमार’ जाति को अत्यंत अस्पृश्य व नीच बनाने का श्रेय शब्द-कोश कारों को भी जाता है. जातिवाचक शब्दों पर ‘हंस’ अगस्त 1998, पूर्णांक 144, वर्ष 13 अंक 1, में श्री भवदेय पाण्डेय का लेख ‘सवर्ण मानसिकता और पुरुषवादी कुण्ठा’ लेख छपा था. इस आलेख में कहा गया है, ‘इतिहास साक्षी है कि संस्कृत और हिन्दी के ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों की तरह हिन्दी शब्द-कोश कारों ने भी ‘चमार’ वाचक शब्दों के साथ भारी छल किया है. संस्कृत के शब्द-कोश ग्रथों में ‘चमार’ को नीच जाति नहीं कहा गया था. जातीय कुण्ठा की चरम अभिव्यक्ति हिन्दी शब्द-कोश ग्रंथों में हुई है।
डॉ महेश परिमल

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

पतंग से सीखो अनुशासन



डॉ महेश परिमलआकाश में तैरती रंग-बिरंगी पतंगें भला किसे अच्छी नहीं लगती? एक डोर से बँधी हवा में हिचकोले खाती हुई पतंग कई अर्थों में हमें अनुशासन सिखाती हैं, जरा उसकी हरकतों पर ध्यान तो दीजिए, फिर समझ जाएँगे कि मात्र एक डोर से वह किस तरह से हमें अनुशासन सिखाती है.
अनुशासन कई लोगों को एक बंधन लग सकता है. निश्चित ही एकबारगी यह सभी को बंधन ही लगता है, पर सच यह है कि यह अपने आप में एक मुक्त व्यवस्था है, जो जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए अतिआवश्यक है. आप याद करें, बरसों बाद जब माँ पुत्र से मिलती है, तब उसे वह कसकर अपनी बाहों में भींच लेती है. क्या थोड़े ही पलों का वह बंधन सचमुच बंधन है? क्या आप बार-बार इस बंधन में नहीं बँधना चाहेंगे? यहाँ यह कहा जा सकता है कि बंधन में भी सुख है. यही है अनुशासन.
अनुशासन को यदि दूसरे ढंग से समझना हो, तो हमारे सामने पतंग का उदाहरण है. पतंग काफी ऊपर होती है, उसे डोर ही होती है, जो संभालती है. बच्चा यदि पिता से कहे कि यह पतंग तो डोर से बंधी हुई है, तब यह कैसे मुक्त आकाश में विचर सकती है? तब यदि पिता उस डोर को ही काट दें, तो बच्चा कुछ देर बाद पतंग को जमीन पर पाता है. बच्चा जिस डोर को पतंग के लिए बंधन समझ रहा था, वह बंधन ही था, जो पतंग को ऊपर उड़ा रहा था. वही बंधन ही है अनुशासन. अनुशासन ही होते हैं, जिससे मानव आधार प्राप्त करता है.
कभी पतंग को आपने आकाश में मुक्त रूप से उड़ान भरते देखा है! क्या कभी सोचा है कि इससे जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है. गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उड़ाने की परंपरा है. इस दिन लोग पूरे दिन अपनी छत पर रहकर पतंग उड़ाते हैं. क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या महिलाएँ, क्या युवतियाँ सभी जोश में होते हैं, फिर युवाओं की बात ही क्या? पतंग का यह त्योहार अपनी संस्कृति की विशेषता ही नहीं, परंतु आदर्श व्यक्तित्व का संदेश भी देता है. आइए जानें पतंग से जीवन जीने की कला किस तरह सीखी जा सकती है-
पतंग का आशय है अपार संतुलन, नियमबध्द नियंत्रण, सफल होने का आक्रामक जोश और परिस्थितियों के अनुकूल होने का अद्भुत समन्वय. वास्तव में देखा जाए तो तीव्र स्पर्धा के इस युग में पतंग जैसा व्यक्तित्व उपयोगी बन सकता है. पतंग का ही दूसरा नाम है, मुक्त आकाश में विचरने की मानव की सुसुप्त इच्छाओं का प्रतीक. परंतु पतंग आक्रामक एवं जोशीले व्यक्तित्व की भी प्रतीक है. पतंग का कन्ना संतुलन की कला सिखाते हैं. कन्ना बाँधने में थोड़ी-सी भी लापरवाही होने पर पतंग यहाँ-वहाँ डोलती है. याने सही संतुलन नहीं रह पाता. इसी तरह हमारे व्यक्तित्व में भी संतुलन न होने पर जीवन गोते खाने लगता है. हमारे व्यक्तित्व में भी संतुलन होना आवश्यक है. आज के इस तेजी से बदलते आधुनिक परिवेश में प्रगति करनी हो, तो काम के प्रति समर्पण भावना आवश्यक है. इसके साथ ही परिवार के प्रति अपनी जवाबदारी भी निभाना भी अनिवार्य है. इन परिस्थितियों में नौकरी-व्यवसाय और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन रखना अतिआवश्यक हो जाता है, इसमें हुई थोड़ी-सी लापरवाही ंजिंदगी की पतंग को असंतुलित कर देती है.

पतंग से सीखने लायक दूसरा गुण है नियंत्रण. खुले आकाश में उड़ने वाली पतंग को देखकर लगता है कि वह अपने-आप ही उड़ रही है. लेकिन उसका नियंत्रण डोर के माध्यम से उड़ाने वाले के हाथ में होता है. डोर का नियंत्रण ही पतंग को भटकने से रोकता है. हमारे व्यक्तित्व के लिए भी एक ऐसी ही लगाम की आवश्यकता है. निश्चित लक्ष्य से दूर ले जाने वाले अनेक प्रलोभनरूपी व्यवधान हमारे सामने आते हैं. इस समय स्वेच्छिक नियंत्रण और अनुशासन ही हमारी पतंग को निरंकुश बनने से रोक सकता है. पतंग की उड़ान भी तभी सफल होती है, जब प्रतिस्पर्धा में दूसरी पतंग के साथ उसके पेंच लड़ाए जाते हैं. पतंग के पेंच में हार-जीत की जो भावना देखने में आती है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिले. पतंग किसी की भी कटे, खुशी दोनों को ही होती है. जिसकी पतंग कटती है, वह भी अपना ंगम भुलकर दूसरी पतंग का कन्ना बाँधने में लग जाता है. यही व्यावहारिकता जीवन में भी होनी चाहिए. अपना ंगम भुलकर दूसरों की खुशियों में शामिल होना और एक नए संकल्प के साथ जीवन की राहों पर चल निकलना ही इंसानियत है.
पतंग का आकार भी उसे एक अलग ही महत्व देता है. हवा को तिरछा काटने वाली पतंग हवा के रुख के अनुसार अपने आपको संभालती है. आकाश में अपनी उड़ान को कायम रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहने वाली पतंग हवा की गति के साथ मुड़ने में ंजरा भी देर नहीं करती. हवा की दिशा बदलते ही वह भी अपनी दिशा तुरंत बदल देती है. इसी तरह मनुष्य को परिस्थितियों के अनुसार ढलना आना चाहिए. जो अपने आप को हालात के अनुसार नहीं ढाल पाते, वे 'आऊट डेटेड' बन जाते हैं और हमेशा गतिशील रहने वाले 'एवरग्रीन' होते हैं. यह सीख हमें पतंग से ही मिलती है.
पतंग उड़ाने में सिध्दहस्त व्यक्ति यदि जीवन को भी उसी अंदाज में ले, तो वह भी जीवन की राहों में सदैव अग्रसर होता जाएगा. बस थोड़ा-सा सँभलने की बात है, जीवन की डोर यदि थोड़ी कमजोर हुई, तो जीवन ही जोखिम में पड़ जाता है. इसीलिए पतंग उड़ाने वाले हमेशा खराब माँजे को अलग कर देते हैं, जिसका उपयोग कन्ना बाँधने में किया जाता है. उस धागे से पेंच नहीं लड़ाया जा सकता. ठीक उसी तरह जीवन में भी उसी पर विश्वास किया जा सकता है, जो सबल हो, जिस पर जीवन के अनुभवों का माँजा लगा हो, वही व्यक्ति हमारे काम आ सकता है. धागों में कहीं भी अवरोध या गठान का होना भी पतंगबाजों को शोभा नहीं देता. क्योंकि यदि पेंच लड़ाते समय यदि प्रतिद्वंद्वी का धागा उस गठान के पास आकर अटक गया, तो समझो कट गई पतंग. क्योंकि पतंग का धागा वहीं रगड़ खाएगा और डोर का काट देगा. जीवन भी यही कहता है. जीवन में मोहरूपी अवरोध आते ही रहते हैं, परंतु सही इंसान इस मोह के पडाव पर नहीं ठहरता, वह सदैव मंजिल की ओर ही बढ़ता रहता है. 'चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी' यही मूलवाक्य होना चाहिए. 25 या 50 पैसे से शुरू होकर पतंग हजारों रुपयों में भी मिलती है. इसी तरह जीवन के अनुभव भी हमें कहीं भी किसी भी रूप में मिल सकते हैं. छोटे से बच्चे भी प्रेरणा के स्रोत बन सकते हैं, तो झुर्रीदार चेहरा भी हमें अनुभवों के मोती बाँटता मिलेगा. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह से अनुभवों की मोतियों को समेटते हैं.

डॉ महेश परिमल


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बुधवार, 12 जनवरी 2011

सचिन भी बन गए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोहरा



डॉ. महेश परिमल

सचिन क्रिकेट के भगवान हैं, इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता। सचिन एक सुलझे हुए इंसान हैं, इससे भी कोई इंकार नहीं कर सकता। इसका उदाहरण उन्होने हाल ही में शराब के विज्ञापन के लिए अपनी सहमति न देकर दिया भी है। उन्हें भारत रत्न भले ही न मिला हो, पर वे सचमुच भारत रत्न हैं। हाल ही में उन्होंने कोकाकोला का ब्रांड एम्बेसेडर बनना स्वीकार किया, इससे उन पर ऊँगलियाँ उठ रहीं हैं। आखिर भगवान गलती कैसे कर सकता है। हमारे देश में जिस तरह से ठंडे पेय पदार्थ लगातार प्रदूषित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह तो कहा जा सकता है कि ये ठंडे पेय पदार्थ तो शरीर के लिए शराब से अधिक खतरनाक हैं। आखिर क्या सोचकर सचिन ने कोकाकोला का ब्रांड एम्बेसेडर बनना स्वीकार किया? इसके पहले भी वे पेप्सी का विज्ञापन कर ही चुके हैं। अपनी चमत्कारिक लोकप्रियता से वे युवाओं को एक तरह से जहर पीने के लिए ही प्रेरित कर रहे हैं।
आज से 8 वर्ष पहले दिल्ली की संस्था 'सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्नमेंटÓ की तरफ से कोकाकोला और पेप्सी में जंतुनाशकों की मिलावट के संबंध में आई जानकारी ने काफी सनसनी फैलाई थी। तब केंद्र में एनडीए की सरकार थी। यदि केंद्र सरकार की नीयत उस समय साफ होती, तो सरकार तमाम ठंडे पेय पदार्थों पर तत्काल प्रतिबंध लगा सकती थी, पर ऐसा हो नहीं पाया। कोकाकोला और पेप्सी की राजनीतिक ताकत के चलते इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सरकार की तरफ से तत्कालीन विपक्षी नेता शरद पवार की अध्यक्षता में संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट देती, तब तक सरकार की चला-चली की बेला आ गई। रिपोर्ट पूरी तरह से उक्त कंपनियों के खिलाफ जा रही थी। क्योंकि रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि इन तमाम पेय पदार्थों में कितनी मात्रा में जंतुनाशकों का प्रयोग किया गया है, इसकी जाँच के लिए सख्त कानून बनाया जाए। साथ ही इस कानून पर सख्ती से अमल में लाया भी जाए।
संयुक्त संसदीय समिति की इस रिपोर्ट को अमल में लाने की जिम्मेदारी अब यूपीए सरकार पर आ गई। इस समिति के अध्यक्ष शरद पवार भी मंत्री बन गए। शरद पवार पर भी यह जिम्मेदारी बनती थी कि वे सरकार पर दबाव डालते कि उनकी अध्यक्षता में जिस समिति का गठन किया गया, उस सिफारिशों को लागू किया जाए। इस बात को आज सात साल बीत जाने के बाद भी उक्त सिफारिशें अन्य सिफारिशों की तरह कहीं धूल खा रहीं हैं। आज भी ठंडे पेय पदार्थों पर बिना किसी सूचना के जंतुनाशकों की मिलावट की जा रही है। विज्ञापनों से प्रभावित होकर युवा उसे पी रहे हैं और अपनी जिंदगी को एक भयानक अँंधरे में ले जा रहे हैं। आखिर इसका जवाबदार कौन है? आखिर उन सिफारिशों को अटकाने का काम कौन कर रहा है? इसकी एक झलक को धारावाहिक रूप से मैगजीन डाउन टू अर्थÓ में प्रकाशित किया गया है। इसे पढ़कर पता चल जाता है कि आखिर किस तरह से केंद्र सरकार भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरफदारी कर रही है। संयुक्त संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि ठंडे पेय पदार्थों मे तमाम चीजें मिलाने के लिए भले ही विदेशों में सख्त कानून न हों, पर हमारे देश में तो इसके लिए सख्त कानून बनने ही चाहिए। जब तक इस दिशा में कानून सख्त नहीं होंगे, तब तक ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीयों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करती रहें्रगी। इनका यही कहना होगा कि हम किसी प्रकार से कानून का उल्लंधन नहीं कर रहे हैं। इस दौरान लाखों युवाओं ने इन ठंडे पदार्थों को पीकर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर चुके हैं, इसके बाद भी हमारी सरकार ने इस दिशा में एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे यह साफ हो कि वह युवाओं के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित है।
सात वर्ष बाद भी आखिर उन सिफारिशों को अनदेखा क्यों किया गया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। सभी जानते हैं कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों का खिलौना बन गई है। ये कंपनियाँ सरकार से जो चाहे करवा लेती हैं, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है। सरकार कोई भी हो, इनका काम कभी नहीं रुकता। साफ्ट ड्रिंक में कितने प्रतिशत जंतुनाशकों की उपस्थिति से किसी प्रकार का खतरा नहीं होता, इस तरह का कानून बनाने की पहली कोशिश स्वास्थ्य विभाग 2004 में की थी। यह कोशिश नाकाम साबित हुई। उधर इन ठंडे पेय पदार्थों के खिलाफ स्वैच्छिक संस्थाओं ने अपना अभियान जारी रखा। इस विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडडर्स नामक स्वायत्त संस्था यह काम सौंपा कि इसके लिए कानून बनाया जाए कि आखिर इन ठंडे पेज पदार्थों में कितने प्रतिशत जंतुनाशकों का होना आवश्यक है। इसके लिए इस संस्था ने 14 विशेषज्ञों की एक समिति तैयार की। इस समिति में कोला कंपनियों के प्रतिनिधि भी शामिल थे। समिति ने तीन वर्षों में 20 बैठकें कीं। इन बैठकों में कोला कंपनियों के प्रतिनिधियों ने हमेशा बखेड़ा ही खड़ा किया। उनका उद्देश्य यही था कि किसी भी तरह से ये इस तरह का कोई कानून न बना सकें, जिससे उन्हें भविष्य में परेशानियों का सामना करना पड़े। इसके बावजूद समिति के अन्य सदस्यों ने मिलकर यह तय कर लिया कि जिस तरह से पीने के पानी में यह तय कर लिया गया है कि इसमें किस सीमा तक जंतुनाशकों की उपस्थिति रहे, उसी तरह इन ठंडे पेज पदार्थों के लिए भी यही नियम लागू किया जाए। समिति का यह तर्क था कि साफ्ट डिं्रक के दो मुख्य घटक पानी और शक्कर ही हैं। सरकार की लेबोरेटरी की ही सिफारिश है कि भारत में जो शक्कर पैदा होती है, उसमें जंतुनाशकों की उपस्थिति नहीं के बराबर है। इससे स्पष्ट है कि जितने जंतुनाशक पीने के पानी में हैं, उससे अधिक तो इन पेय पदार्थों में होने ही नहीं चाहिए। हमारे देश में पेकेज्ड डिं्रकिंग वॉटर में 0.5 पाट्र्स पर बिलियन (यानी एक अरब अणुणुओं का आधा) जितने जंतुनाशकों को चलाया जा सकता है। इसके विपरीत आज बाजार में जो ठंडे पेय पदार्थ मिल रहे हैं, उनमें 15 पाट्र्स पर बिलियन जितने जंतुनाशक होते हैं। इससे ही स्पष्ट है कि ये पेय पदार्थों हमारे स्वास्थ्य के लिए कितने खतरनाक हैं।
स्वास्थ्य से खुलेआम होने वाले इस खेल में सरकार कहाँ तक शामिल है, इसका एक छोटा-सा उदाहरण यह है कि ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड की समिति की तरफ से जब अंतिम निर्णय लेना था, तब दिल्ली में एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में कोला कंपनी की सारी चाल नाकाम हो सकती थी, यह तय था। बैठक में कोला कंपनी के सदस्यों की संख्या भी कम थी। बैठक में एक निश्चित निर्णय पर सहमति बन भी गई थी। 29 मार्च की सुबह यह बैठक हुई, इसके पहले ही केंद्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सचिव का एक पत्र समिति को मिला, जिसमें यह आदेश था कि बैठक में कोई अंतिम निर्णय न लिया जाए। आश्चर्य इस बात का है कि पत्र में तारीख 29 मार्च की ही थी। यह पत्र समिति के अध्यक्ष को ही दिया गया था। सोचने वाली बात यह है कि जहाँ सरकारी कार्यालयों में एक फाइल को दूसरे स्थान पर पहुँचने में बरसों लग जाते हैं, वही स्वास्थ्य विभाग को यह पत्र कुछ ही मिनटों में सारी औपचारिकताएँ पार करते हुए समिति के अध्यक्ष तक कैसे पहुँच गया? इससे स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रयी कंपनियों की पहुँच कहाँ-कहाँ तक है, वे जब चाहें जैसा चाहें करवा सकती हैं। अंतिम समय में कोला कंपनी को बचाने के लिए आखिर किसने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, यह कोई बता सकता है।
कोल्ड ड्रिंक्स बनाने वाली कंपनियाँ भारत में हर वर्ष 5 हजार करोड़ रुपए का माल बेचती हें। इसमें उन्हें काफी मुनाफा होता है। इस पेय पदार्थ की कीमत मात्र डेढ़ रुपए होती है, किंतु इसे खुले आम दस से बारह रुपए में बेचा जाता है। लूट की इस रकम का एक हिस्सा ये कंपनियाँ फिल्मी स्टार्स, क्रिकेटरों एवं नेताओं को दिया जाता है, ताकि देश के युवा इन ठंडे पदार्थों को पीकर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते रहें। सचिन जो अब तक केस्ट्रॉल, तोशिबा, रीनोल्ड, बूस्ट, केनोन, जेपी सिमेंट, अवाईवा और आईटीसी जैसी कंपनियों के ब्रांड एम्बेसेडर बनकर वर्षों से करोड़ों रुपए कमा चुके हैं, तो एक कंपनी के ब्रांड एम्बेसेडर नहीं बनेंगे, तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इससे उनकी छबि और निखरेगी। ऐसा केवल सचिन को ही नहीं, बल्कि देश के अन्य लोगों को भी सोचना होगा। तभी आशा की एक नई किरण हम सबके सामने होगी।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 5 जनवरी 2011

प्रजा को परेशान करने की सुपारी


डॉ. महेश परिमल
लगता है मनमोहन सिंह सरकार ने प्रजा को परेशान करने की सुपारी ले ली है। अभी पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि की बात लोग भूले ही नहीं हैं कि अब रसोई गैस महँगा करने की घोषणा कर दी गई है। घर का बजट बुरी तरह से लड़खड़ा गया है। बढ़ती महँगाई के हिसाब से आय नहीं बढ़ पाई है। आवश्यक जिंसों के दामों में लगातार वृद्धि होती ही जा रही है। आम आदमी की जीना ही मुश्किल हो गया है। चुनाव के समय वोट लेने के लिए आम आदमी को सर्वोपरि मानने वाली सरकार सत्तारुढ़ होते ही आम आदमी से कोसों दूर हो जाती है। चुनाव के समय ही केंद्र में रहने वाला आम आदमी चुनाव के बाद हाशिए पर आ जाता है। प्याज के दाम जब सर चढ़कर बोलने लगे, तब सरकार को होश आया और निर्यात पर पाबंदी लगा दी। कितने शर्म की बात है कि जिस प्याज को हमने पाकिस्तान को सस्ते दामों में बेचा, उसी प्याज को अब महँगे दामों में उसी से फिर खरीद रहे हैं। क्या यही है सरकार की दूरदर्शिता।
इस बार रसोई गैस की कीमतों में 50 से 100 रुपए की वृद्धि की गई है। शायद सरकार की तरफ से यह आम आदमी को क्रिसमस और नए साल का तोहफा है। कुछ ही दिनों में डीजल के दाम भी बढ़ने ही हैं। जब से यूपीए सरकार आई है, महँगाई बेलगाम हुई है। कांग्रेस पर व्यापारियों की सरकार होने का आरोप हमेशा से लगाया जाता रहा है, यह तो इसी से पता चलता है कि वह महँगाई बढ़ाते समय केवल व्यापारियों को ही ध्यान में रखती है। बाकी आम आदमी की परेशानियों से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़ाते समय सरकार हमेशा यह दलील देती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड के भाव बढ़ रहे हैं। इसके अलावा आयल कंपनियों का घाटा कम करना भी उसी की जिम्मेदारी है। चाहे कुछ भी हो जाए, आयल कंपनियों का घाटा नहीं बढ़ना चाहिए। आज तक आयल कंपनियों के घाटे के संबंध में कोई पारदर्शी नीति तैयार नहीं की गई है। कितने सालों से यह खेल चल रहा है। जब भी पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़ते हैं, आयल कंपनियों का घाटा सामने आ जाता है। पर आयल कंपनियों का घाटा कैसे कम होता है और कैसे बढ़ता है, यह हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री भी नहीं समझा सकते। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाने के पहले यह नहीं सोचा जाता कि क्या इसका बोझ आम जनता सहन कर पाएगी? आयल कंपनियों के खर्च कम करने, पेट्रोलियम मंत्रालय के खर्च कम करने की दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया जाता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल के दामों मंे भले ही वृद्धि होती रहे, पर इसका मतलब यह तो नहीं हो जाता कि आम आदमी पर ही बोझ डाल दिया जाए।
केंद्रीय डच्यूटी कम करने की कभी ईमानदार कोशिश नहीं की गई। आम जनता को राहत मिले, ऐसी किसी योजना केंद्र सरकार चला रही है, यह कोई नहीं जानता। सरकार दाम बढ़ाकर हमेशा किसी ने किसी बहाने से छटक जाती है। हमेशा से यही होता रहा है। आखिर सरकार की भी तो कोई जवाबदारी है या नहीं? हर बार उसके पास कोई न कोई बहाना होता ही है। सरकार बहानों से नहीं कल्याणकारी कामों से चलती है।
भ्रष्ट नेता सरकार को अरबों रुपए का चूना लगा देते हैं। निर्माण कार्य के नाम पर भी करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। पर आम आदमी आज भी भूखे के कगार पर बैठा है। कर्ज से डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार को इसकी कोई चिंता ही नहीं है। उसे तो अपने दामन के दाग बचाने से ही फुरसत नहीं। आखिर बेईमानी के दाग इतनी जल्दी धुलने वाले नहीं। ये जिद्दी दाग है। सरकार अपने को साफ-शफ्फाक बताने की कितनी भी कोशिशें कर ले, पर स्वयं को व्यापारीपरस्त होने से इंकार नहीं कर सकती। भ्रष्टाचार के दलदल में फँसे इस देश को ईमानदारी ही बचा सकती है। ऐसी ईमानदारी यूपीए सरकार में दिखाई नहीं देती। स्वयं को औरों से ईमानदार बताकर उसने वोट तो बटोर लिए, इस वोट से सरकार भी बना ली, पर आम आदमी को परेशान कर आखिर कितने समय तक टिक पाएगी। जनता को जवाब देने के लिए कभी न कभी तो उसे सामने आना ही होगा। तब शायद सरकार के पास इसका कोई जवाब न हो।
साल-दर-साल सरकार के हिस्से कुछ न कुछ ऐसा आता है, जिससे उसकी फजीहत होती है। कभी भ्रष्टाचार को लेकर, कभी चुनावों में धांधली कर, कभी सांसदों की खरीद-फरोख्त को लेकर, कभी महँगाई बढ़ाकर, कभी आम नागरिकों के विरोध में बयान देकर। आखिर आम नागरिक कब तक सहन करेंगे, ऐसी सरकार को?
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

एक दिन तलाशे नहीं मिलेंगी प्रतिभाएं!



सचिन राठौर

आज के हिंदुस्तान टाइम्स में खबर है कि दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी में एक नया ट्रेंड दिख रहा है. स्टूडेंट्स बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मोटे-मोटे प्लेसमेंट ठुकराकर अपनी रूचि के मुताबिक अपने खुद के व्यवसाय शुरू करने को प्राथमिकता दे रहे हैं. स्टूडेंट्स को लुभाने के लिए कम्पनियों की ओर से मोटी रकम का चुग्गा डाला जा रहा है, लेकिन तमाम स्टूडेंट्स ऐसे हैं जो इस चुग्गे को चुगने के लिए तैयार नहीं. वो अपने सपनों की दुनिया अपने हिसाब से बुनना चाहते हैं. वो किसी के सिस्टम में बंधकर खुद को बंधुआ नहीं बनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि वे नाकारा बनकर रहना चाहते हैं. लेकिन कॉर्पोरेट जगत में चल रही मोटे-मोटे पैकजों की दौड़ में वो शामिल नहीं होना चाहते. सपने उनकी आँखों में भी हैं लेकिन उन सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों का साथ चुना है जो उनको सबसे अच्छी तरह से समझते हैं, यानी उनके अपने दोस्त. दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी के ये नए और जवाँ इंजीनियर अपने दोस्तों संग खुद का बिजनेस शुरू करने की दिशा में कदम बढा रहे हैं. कुछ ऐसा नया काम जो परंपरागत काम से कहीं ज्यादा रोचक हो, क्रिएटिव हो और मन को सुकून देने वाला हो. जहाँ न टार्गेट का टंटा हो और न बॉस का डंडा. जिस काम को करने के बाद जीविकोपार्जन के साथ-साथ जीवन की सार्थकता भी नज़र आये.
व्यक्ति की जीविका का साधन भी कहीं न कहीं दो मौलिक सवालों से जुड़ा हुआ है कि- मैं कौन हूँ? और मैं इस धरा पर किसलिए आया हूँ? जब तक आपका काम आपके जीवन की सार्थकता सिद्ध नहीं करता तब तक वो काम आपको आनंद नहीं दे सकता. आप केवल मशीन की तरह उस काम को करते रहेंगे और नोटों की गड्डियां बनाते रहेंगे. जब किसी दिन थककर एकांत में बैठोगे तब अचानक कहीं से ये सवाल मन में कौंधेगा कि ये मैं कहाँ चला जा रहा हूँ? और आप इस सवाल का जवाब नहीं दे पाओगे? इस सवाल का जवाब बस यही है कि एक भीड़ चली जा रही थी और मैं भी बिना सोचे-समझे उस भीड़ में शामिल हो गया.
मैंने भी जब पत्रकारिता से जुड़ने का फैसला किया था तब कहीं न कहीं मन में यही भाव था कि पत्रकारिता आम जनमानस की बात कहने का सशक्त माध्यम है. यहाँ मैं उनकी बात उठाऊंगा जो अपनी बात कहीं नहीं उठा पाते. लेकिन पत्रकारिता के अन्दर आकर तो केवल ख़बरों की होड़ और पैसों की दौड़ दिखी. इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को फायदा पहुँचाना नहीं बल्कि अपने मालिक को फायदा पहुँचाना था. मालिक का फायदा करने में चाहे पब्लिक का फायदा हो या नुकसान उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. काम के एवज में दाम मिलने के साथ-साथ संतुष्टि मिलनी भी जरूरी होती है. दोनों में से एक भी न मिले तो मिलती है केवल फ्रस्ट्रेशन. आज के कॉर्पोरेट जगत में जिस तरह से खुद के ही तय किये हुए असंभव टार्गेट अचीव करने की होड़ मची है वो वहां के कर्मचारियों के लिए घातक सिद्ध हो रही है. बाजारू कॉम्पटीशन में आज नंबर एक बनने की होड़ है. इसके लिए चाहे सिद्धांतों से समझौता करना पड़े या अपने कर्मचारियों के हितों के साथ. ऐसे में खासतौर से युवा कर्मियों को घुटन महसूस होती है. जब तक वे ये सब समझ पाते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
किसी को भी सच्ची संतुष्टि तभी मिल सकती है जब उसके प्रयास सच्चाई के आस-पास हों, उसकी अंदरूनी प्रतिभा के आस-पास हो और परहित के आस-पास हो. जिस काम को करने से अपने लिए धन कमाने के साथ-साथ ये भाव भी हो कि मैं कुछ गलत नहीं कर रहा वो काम दीर्घकालिक संतुष्टि दे सकता है. "नौकरी = न-करी" : अगर कमाने के साथ-साथ समाज को भी कुछ देना चाहते हो तो कुछ अपना काम करो, अगर नितांत सच्चाई के मार्ग पर ही चलना चाहते हो तो अपना मार्ग अलग बनाओ. क्योंकि अभी सफलता के जितने भी मार्ग हैं वे सभी झूठ से होकर गुजरते हैं.
दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी में ये जो ट्रेंड दिख रहा है वो बेहद सराहनीय है. युवाओं को अब किसी की नौकरी की दरकार नहीं, वो अपना रास्ता खुद बनायेंगे, उनमें इतना दम है कि वे खुद नौकरियों का सृजन करेंगे. जिस तरह हर जगह प्रतिभा की अनदेखी करके चाटुकारों को प्राथमिकता दी जा रही है, उसका परिणाम यही होगा कि एक दिन प्रतिभाएं तलाशे नहीं मिलेंगी, वे सब अपने अलग रास्ते पर चल रही होंगी.
सचिन राठौर

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

प्रतिभाओं को नजरअंदाज करती मध्यप्रदेश सरकार



डॉ. महेश परिमल

उपेक्षा किसी की भी हो, अच्छी बात नहीं है। उपेक्षित इंसान कभी-कभी हताश होकर अपनी क्रियाशीलता को खत्म कर देता है। पर उसके मन में हमेशा यही भाव होता है कि यहाँ यदि मेरी कला के जौहरी नहीं मिलेंगे, तो निश्चित ही वह जौहरी कहीं और होगा। कई बार जौहरी काफी देर बाद मिलते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ मध्यप्रदेश शासन के साथ। जिन विभूतियों को सरकार ने नकार दिया, उसे ही केंद्र सरकार ने नवाजा। अपने अधिकारियों की लापरवाही के कारण अनजाने में मध्यप्रदेश सरकार को एक ऐसा तमाचा पड़ा है, जिससे वह चाहे तो सबक ले सकती है। अन्यथा हमेशा की तरह अपने काहिल अधिकारियों को कोसकर अपना पल्ला झाड़ सकती है।
मेरे सामने दो खबरें ऐसी हैं, जिसमें प्रदेश सरकार की लापरवाही साफ दिखाई देती है। इसमें प्रशासनिक रूप से अक्षम अधिकारियों का दोष सबसे अधिक है, जिनके कारण राज्य की प्रतिभाओं का सम्मान करना तो दूर उन्हें याद तक नहीं किया गया। एक तरफ जहॉं प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के काफिले के सामने आकर एक दुखियारी अपनी विकलांग बेटी के लिए शासन से गुहार करती है, तो मुख्यमंत्री तुरंत ही उन्हें सहायता प्रदान करते हैं, तो दूसरी तरफ देश के जाने माने फोटोग्राफर वामन ठाकरे की बेशकीमती कृतियों को अनदेखा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ किसी मासूम से किसी की जान बचाई, तो उसे पुरस्कृत करने के लिए भी उसके पिता को बार- बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उक्त दोनों उदाहरणों में जिन्हें राज्य सरकार ने ठुकराया, उन्हें ही केंद्र सरकार पुरस्कार से नवाजने जा रही है। यह सब अधिकारियों के ढुलमुल रवैए और लापरवाही के कारण हो रहा है। प्रतिभा कभी भी सम्मान की मोहताज नहीं होती।
पद्मश्री से सम्मानित 80 वर्षीय जाने-माने कैमरा आर्टिस्ट वामन ठाकरे की जिस कला को राज्य शासन ने ठुकरा दिया, उसी को अंतत: दिल्ली ने सम्मान दिया है। उनके द्वारा खींची गईं जो नायाब तस्वीरें भारत भवन और राज्य संग्रहालय की लाल फीताशाही में उलझकर स्थान पाने से वंचित रह गईं, अब उन्हीं को नई दिल्ली के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट एंड कल्चर ने स्वीकार कर लिया है। उनकी बहुमूल्य 145 तस्वीरों को पिछले सप्ताह ही सेंटर से आई टीम अपने साथ दिल्ली ले गई हैं। ये वे तस्वीरें हैं, जो श्री ठाकरे ने पिछले पांच-छह दशकों में खींची हंै। वामन ठाकरे देश के एकमात्र कैमरा आर्टिस्ट हैं, जिन्हें पद्मश्री 2007 में सम्मानित किया गया है। भोपाल के भारत भवन और राज्य संग्रहालय से निराश होकर अंतत: उन्हें देश के अन्य कला केंद्रों की ओर रुख करना पड़ा। 9 नवम्बर को ही सेंटर के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. अचल पंड्या और रिसर्च ऑफिसर एम विष्णु भोपाल आए और इन तस्वीरों को अपने साथ लेकर गए। इनमें ठाकरे द्वारा 1952 में खींचा गया पहला फोटो (शीर्षक :फीलोसॉफर) भी शामिल है। यह पहला ही फोटो पुरस्कृत हुआ था।
देश के दूसरे कैमरा आर्टिस्ट श्री ठाकरे देश के ऐसे दूसरे कैमरा आर्टिस्ट हैं, जिनकी तस्वीरों को यहां संग्रहित किया गया है। इससे पहले देश के फोटोग्राफी इतिहास के विख्यात फोटोग्राफर हैदराबाद निवासी लाला दीनदयाल द्वारा खींची गईं तस्वीरों और कांच के निगेटिव को करीब सौ साल पहले वहां संग्रहित किया गया था।
लापरवाही का दूसरा उदाहरण है, मासूम मुनीस। प्रदेश के अधिकारी बच्चों को पुरस्कृत करने के मामले में कितने लापरवाह हैं, इसका ताजा उदाहरण हैं मुनीस खान। राजधानी के अधिकारियों ने मुनीस को जिस काम के आधार पर राज्य स्तरीय महाराणा शौर्य पुरस्कार के लिए उपयुक्त नहीं माना था, उसी के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर का वीरता पुरस्कार दिया जाने वाला है। हैरानी तो इस बात की है कि जब इसकी जानकारी अधिकारियों को दी, तो भी उन्होंने अपनी गलती नहीं मानी और मुनीस को दोबारा आवेदन देने के लिए कह दिया। मुनीस ट्ठान ने अगस्त 2009 में पटरी पर बैठे एक शराबी को सामने से आ रही ट्रेन से कटने से बचाया था। इस बहादुरी के कारनामे को ऐशबाग थाने के पंचनामे और नजूल अधिकारी के परिपत्र में भी प्रमाणित किया गया। ये सारे दस्तावेज लेकर मुनीस के पिता मुश्ताक खान ने 24 अप्रैल 2010 को महाराणा प्रताप शौर्य पुरस्कार के लिए आवेदन दिया, लेकिन जिला प्रशासन ने इसे नकार दिया। इसके बाद उन्होंने कई बार जनसुनवाई में कलेक्टर को भी आवेदन दिया, लेकिन वहां से भी बस जांच के लिए कह दिया गया। वहीं दूसरी तरफ 24 अप्रैल को दिल्ली भेजा गया उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया है। नई दिल्ली स्थित भारतीय बाल कल्याण परिषद ने सारे दस्तावेज के आधार पर मुनीस का चयन उन 16 बच्चों में किया है, जिन्हें बापू गैधानी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सट्ठमानित किया जाएगा। मुनीस को यह सम्मान २६ जनवरी को मिलेगा। अब जब यह मामला सामने आया है, तो संबंधित हर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ रहा है। अब यदि मेनीस को सचमुच ही पुरस्कार प्राप्त करना है, तो उसे फिर से आवेदन करना होगा। जबकि इसके पहले उसके पिता ने आवेदन कर रखा है।
क्या है बापू गोधानी पुरस्कार: यह पुरस्कार भारत में 16 वर्ष या उससे कम उम्र के उन बहादुर बच्चों को दिया जाता है, जो सभी बाधाओं के खिलाफ बहादुरी और निस्वार्थ बलिदान की भावना से किए गए वीरतापूर्वक कार्य करते हैं। यह पुरस्कार राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार की श्रेणी में आता है।
इस तरह से उपेक्षा से आहत होकर प्रतिभाओं का पलायन होता है। दूसरे जिन्हें उनसे प्रेरणा लेनी होती है, वे भी आहत होते हैं। प्रतिभाओं के पलायन का यह भी एक कारण है। कई बार तो प्रतिभा का आकलन मोहल्ले वाले ही नहीं कर पाते हैं। वह तो अन्य संस्थाएँ जब उन्हें सम्मानित करती हैं, तब उन्हें खयाल आता है कि हमारे ही बीच एक ऐसी प्रतिभा थी, जिसकी हमने कद्र ही नहीं की। वैसे वामन ठाकरे ने जो कुछ भी किया, उसके पीछे उनका उद्देश्य यह कतई नहीं था कि उन्हें किसी प्रकार से सम्मानीत किया जाए। जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित कर दिया, तो फिर और कौन सा सम्मान बाकी रह जाता है? ऐसे लोग यदि प्रदेश में हैं, तो उनका सम्मान तो प्रदेश सरकार को भी करना चाहिए। लेकिन लालफीताशाही के चक्कर में कई बार कुछ ऐसा हो जाता है, जिसे नहीं होना चाहिए। यही बात मुनीस की है। जब उसने किसी की जान बचाई, तो उसका उद्देश्य यह नहीं था कि ऐसा करने से उसे पुरस्कार मिलेगा। उसने तो तत्क्षण ही यह निर्णय लिया कि इस व्यक्ति की जान बचानी चाहिए। उसकी जान बच गई, यही उसका उद्देश्य था, जो उसी समय पूरा हो गया। उसे पुरस्कार मिलना चाहिए, यह सोचना तो सामाजिक संस्थाओं और सरकार का है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

सरकार को न तेल दिखा, न तेल की धार



डॉ. महेश परिमल
विजय दिवस पर सरकार ने देश के नागरिकों को दिया महँगाई का तोहफा। किस तरह से मनाएँ हम विजय दिवस। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में भारी इजाफा कर ऐसा झटका दिया है, जिससे उबरने में काफी वक्त लगेगा। सरकार को कब समझ आएगी कि एकमात्र पेट्रोल के दाम बढ़ाने से पूरी अर्थव्यवस्था किस तरह से प्रभावित होती है। आवश्यक जिंसों के दामों में बढ़ोत्तरी होगी, किराए भी बढ़ेेंग, अनाज और सब्जियों की कीमतों पर कोई लगाम नहीं रहेगी। कहाँ तो गूहमंत्री यह कह रहे थे कि दिसम्बर तक महँगाई कम हो जाएगी, वहीं इन हालात में महँगाई कम होने से तो रही।
पेट्रोल के दाम बढ़ाकर सरकार ने एक बार फिर प्रजा को महँगाई की आग में झोंक दिया है। सरकार न तो तेल देख रही है और न ही तेल की धार। घोटालों में फँसी सकरार को हम ‘निर्दयी सरकार’ की उपमा दें, तो गलत नहीं होगा। इसे सरकार की निर्दयता ही कहा जाएगा कि छह महीनों में दो बार पेट्रोल की कीमतों में इजाफा किया गया है। सरकार ने जब से इसे नियंत्रण मुक्त बनाया है, तब से इसके भाव में लगातार बढ़ोत्तरी ही हो रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होती है, तो तुरंत ही हमारे यहाँ पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लग जाती है। आखिर सरकार कर क्या रही है? यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं है। सरकार ने यह भी नहीं सोचा कि इससे महँगाई बढ़ेगी ही, साथ ही लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा। जिस तेजी से पेट्रोल-डीजल के दाम बढें़ हैं, उस तेजी से लोगों की आय नहीं बढ़ पाई है। एक तरह से सरकार ने तेल कंपनियों को लूटने की खुली छूट दे दी है। जब भी पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें बढ़ीं है, राज्य सरकारों का मुनाफा भी बढ़ा है। फिर भी इसके दामों पर नियंत्रण नहीं किया गया है।
सरकार हमेशा इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से देखती है। जब कच्चे तेल की कीमत 28 डॉलर प्रति बैरेल हो गई थी, तब तो पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गई थी। अब जब दाम बढ़ रहे हैं, तो सरकार भी विवश हो जाती है। आखिर ऐसा क्या है इस समीकरण में, जिसमें दाम बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प होता है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अच्छे अर्थशास्त्री हैं, पर क्या वे भी यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इस तरह से महँगाई बढ़ेगी, तो फिर नागरिकों के पास क्या विकल्प रहेगा? सोचना उनके बस की बात नहीं है। तभी तो सरकार घोटाले में फँसी रह गई और उधर उनकी विदेश यात्रा भी हो गई। संसद का पूरा सत्र घोटाले की भेंट चढ़ गया। पर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही। विपक्ष पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर एक बार फिर भारत बंद का आह्वान करेगा, उसके बाद खामोश हो ेजाएगा। आखिर क्या होगा भारत बंद से? मजदूरों की एक दिन की रोजी-रोटी छिनी जाएगी, बस, इसके अलावा उनकी दृष्टि में कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।
एक जुलाई को 55 रुपए 30 पैसे के दाम में मिलने वाला पेट्रोल आज 60 रुपए लीटर मिलने लगा है। 6 महीने पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत 77 डॉलर थी, आज 90 डॉलर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तो कीमतें बढ़ती ही रहेंगी, तो क्या हम उसके हाथों में विवश रहें? क्या कोई ऐसा उपाय नहीं ढूँढा जा सकता, जिससे आम नागरिकों को राहत मिले। अक्टूबर में मुद्रास्फीति 8.58 प्रतिशत थी, जो नवम्बर में घटकर 7.48 प्रतिशत हो गई। इस हालत में सरकार तेल की कीमतों में वृद्धि कर एक तरह से आम नागरिकों को महँगाई की आग में झोंक दिया है। सरकार की यह व्यापारिक दृष्टि प्रजा को भिखारी ही बनाएगी।
एक उपाय है, यदि इस पर अमल किया जाए, तो पेट्रोल की कीमत दो रुपए कम हो सकती है। इसके लिए राज्य सरकारों को थोड़ा उदार बनना होगा। वैसे इस मूल्य वृद्धि से राज्य सरकारों के खजाने में काफी इजाफा होने वाला है। देश में डीजल-पेट्रोल पर संभवत: सबसे ज्यादा टैक्स लेने वाली मप्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि हम इस पर टैक्स क्यों घटाएँ? इसीलिए पेट्रोल-डीजल का कारोबार हमेशा से ही हर राज्य सरकार के खजाने के लिए मुफीद रहा है। मप्र सरकार ने इस पर 28.75 फीसदी प्रति लीटर टैक्स लगा रखा है। यानी मप्र सरकार को यहां बिकने वाले पेट्रोल से प्रति लीटर लगभग 17 रुपए मिलते हैं। लाखों लीटर रोज बिकने वाले पेट्रोल से आ रही इस ‘लक्ष्मी’ का मोह मप्र के भी सिर चढ़कर बोलता है। नई मूल्य वृद्धि से करोड़ों की अतिरिक्त आय हो सकती है। उत्पाद शुल्क का एक हिस्सा और राज्य सरकार द्वारा लगाए जा रहे सभी कर ‘एड वेलोरम’ लगाए जाते हैं यानी ये कर मात्रा पर नहीं बल्कि कीमत पर लगाए जाते हैं। अगर कीमत बढ़ेगी तो कर की दर भी बढ़ेगी। विशेषज्ञ बताते हैं कि मात्रा के आधार पर कर लगाने से दाम में करीब 2 रूपए तक की गिरावट हो सकती है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान ‘कौसर’



वीरेन्द्र बहादुर सिंह

दोस्तों की शादी में सेहरा लिखते-लिखते, मौलाना लोगों की तक़रीर में पैगम्बरे इस्लाम की शान में नात लिखकर पढ़ते-पढ़ते, मटका पाटी वालों को फिल्मी धुन में गीत लिख कर देते-देते ‘कौसर’ उर्दू के नामवर शायर बन गये। उन्हें सपने में भी ये गुमान नहीं था कि उनका शेरो-सुख़न का जुनून उन्हें ऐसे मान-सम्मान से विभूषित करेगा जो उनके प्रशंसकों और उनकी कर्मभूमि राजनांदगांव के लिए गौरव की बात होगी। मौजूदा समय में ‘कौसर’ एक शायर की हैसियत से उस मुक़ाम पर हैं जहां पहुंचना लोगों का सपना होता है।
पिछले लगभग तीन दशकों से राष्ट्रीय और अंतरराष्र्ट्रीय स्तर पर ऊदरू और हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अपनी ग़ज़लों और नÊमों के कारण चर्चा में आये शायर अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ ने अपने गुणवत्तामूलक लेखन से छत्तीसगढ़ के उर्दू अदब को राष्ट्रीय स्तर की ख्याति दिलाई है। छत्तीसगढ़ में उर्दू अदब के प्रति पर्याप्त माहौल नहीं होने के बावजूद ‘कौसर’ की ग़ज़लों और नज़्मों के लगातार प्रकाशित होने के कारण ही उर्दू के नक्शे पर छत्तीसगढ़ का नाम तेज़ी से उभर कर सामने आया है। ‘कौसर’ छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान बन चुके हैं। यही कारण है कि ग़ज़लों और नज़्मों के सृजनात्मक लेखन में उत्कृष्ठ उपलब्धियां प्राप्त करने एवं उर्दू साहित्य में गुणवत्तामूलक लेखन करते हुए छत्तीसगढ़ में उर्दू भाषा का अनुकरणीय माहौल तैयार करने के लगन को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने जनाब अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ को उर्दू भाषा की सेवा के लिए ‘हाजी हसन अली सम्मान’ से विभूषित किया है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर 01 नवम्बर 2010 को ‘कौसर’ को राजधानी रायपुर में हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली एवं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ‘कौसर’ को दो लाख रूपये का चेक, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया।
अपने समकालीन शायरों में अलग पहचान रखने वाले जनाब अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ का जन्म 09 जनवरी 1948 को रायपुर जिले के ग्राम खरोरा में हुआ। उनके पिता का नाम श्री सिद्दीक अहमद था। ‘कौसर’ के जन्म के बाद उनका परिवार संस्कारधानी राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) में आकर बस गया। ‘कौसर’ ने बी.एस-सी. एवं बी.टी.सी. तथा अदीबे-कामिल तक शिक्षा प्राप्त की है। सिर्फ़ पांचवीं तक उर्दू पढ़ने के पश्चात ‘कौसर’ ने उर्दू साहित्य का गहन अध्ययन किया। उर्दू शेरो-सुख़न और अदब का ‘कौसर’ ने इतना अध्ययन किया कि उन्हें हज़ारों शेर ज़ुबानी याद हैं।
दोस्तों की शादी में सेहरा लिखते-लिखते, मौलाना लोगों की तक़रीर में पैगम्बरे इस्लाम की शान में नात लिखकर पढ़ते-पढ़ते, मटका पार्टी वालों को फिल्मी धुन में गीत लिख कर देते-देते ‘कौसर’ उर्दू के नामवर शायर बन गये। उन्हें सपने में भी ये गुमान नहीं था कि उनका शेरो-सुख़न का जुनून उन्हें ऐसे मान-सम्मान से विभूषित करेगा जो उनके प्रशंसकों और उनकी कर्मभूमि राजनांदगांव के लिए गौरव की बात होगी। मौजूदा समय में ‘कौसर’ एक शायर की हैसियत से उस मुक़ाम पर हैं जहां पहुंचना लोगों का सपना होता है। दो करोड़ दस लाख की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के किसी भी शहर में जब शेरों-सुख़न की चर्चा होती है हो ‘कौसर’ का नाम अदब, एहतेराम से लिया जाता है।
शेरों-सुख़न के विद्वान समालोचक ‘हनीफ़ नज्मी’ (हमीरपुर) ने ‘कौसर’ को ‘छत्तीसगढ़ में उर्दू ग़ज़ल की आबरू’ कहा है। छत्तीसगढ़ के उस्ताद शायर एवं वरिष्ठ पत्रकार काविश हैदरी ने स्वीकार किया है कि ‘कौसर’ एकमात्र ऐसे शायर हैं जो प्रकाशन के मामले में छत्तीसगढ़ के शायरों में सबसे आगे हैं। उनकी रचनाएं अब तक 130 पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है।
‘कौसर’ को ग़ज़लों के अलावा नज़्म लिखने में भी महारत हासिल है। उर्दू सहाफ़त (पत्रकारिता) के क्षेत्र में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘शमा’ विश्वस्तर पर उर्दू साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मान ली गई थी। ‘शमा’ का क्रेज ऐसा था कि इसमें छपने की आस में कई लेखकों और शायरों की उम्र गुज़र जाती थी। ऐसी उत्कृष्ठ गौरवशाली पत्रिका में साठ-साठ, सत्तर-सत्तर मिसरों (पक्तियों) पर लिखी गयी नौ-नौ, दस-दस बंद की नज़्में क्रमश: लाटरी का तूफ़ान, मेरे हिन्दोस्तां, हवाले का शिकंजा, नया साल, कौन रहबर है तथा कंप्यूटर प्रकाशित होने से ‘कौसर’ राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शायरों की पंक्ति में आ गये।
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत पर ‘कौसर’ की नज़्म ‘गद्दार क मजहब’ शायरों के लिए चर्चा का विषय बन गयी थी। राजनीति के दांव पेंच को बड़ी साफ़गोई के साथ पेश करने वाली इस नज़्म की दो बंद देखें-

और कुछ लोग वफ़ादारी का परचम लेकर
मौत का जश्न सलीके से मनाने निकले
अपनी औक़ात ज़माने को दिखाने के लिए
आग नफ़रत की दुकानों में लगाने निकले


‘इंदिरा गांधी’ हो या ‘लूथर’ या कोई ‘कैनेडी’
पैदा होते हैं हर एक दौर में और मरते हैं,
क़त्ल करके इन्हें ‘कौसर’ नए अंदाज के साथ
हम सियासत का नया दौर शुरू करते हैं


बाबरी मजिस्द के विध्वंस पर उनका आक्रोश इस प्रकार फूट पड़ा-

ये मसअला नहीं है कि गद्दार कौन है
पहले ये तय करो कि वफ़ादार कौन है


शुरू से ही कुछ अच्छा कहने की ललक में ‘कौसर’ ने शेरों-सुख़न, उर्दू जबानों-अदब का डूब कर गहन अध्ययन किया है। संकीर्ण मानसिकता से उपर उठकर उन्होंने इस्लाम ही नहीं हिन्दू और ईसाई धर्म से संबंधित साहित्य, वेद पुराण, गीता, रामचरित मानस, पौराणिक कथाओं और मान्यताओं का विशद अध्ययन किया है।
लगभग चार दशक तक शिक्षकीय पद पर कार्य करते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी। इस दौरान गांव के परम्परागत त्यौहारों, सामाजिक मान्यताओं, लोकगीतों, लोकाचारों से उन्होंने अनुभूतिगम्य अनुभव प्राप्त किया है। व्यक्तिगत अनुभव की सूक्ष्म गहराई और गहन संवेदना ‘कौसर’ की शायरी में स्पष्ट दिखती है। सामान्य शब्द विन्यास के साथ दिल को छू लेने वाले शेर कहने से आम आदमी में भावनाओं की संप्रेषणीयता की वजह से आपका लोकप्रिय हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।
‘मेराज’ फै़जाबादी, ‘मंज़र’ भोपाली, ‘शायर’ जमाली, ‘जौहर’ कानपुरी जैसे शायरों के साथ कामठी (महाराष्ट्र) के आल इंडिया मुशायरे में जब ‘कौसर’ ने यह शेर पेश किया-

इधर रौनक़ मज़ारों पर उधर महलों में सन्नाटा
शहंशाहों की हालत पर फ़क़ीरी मुस्कराती है
तो इन्हें इस शेर पर बेहद दाद मिली। मुशायरे के बाद एक छात्रा को आटोग्राफ़ देते हुए जब कौसर ने उसकी डायरी पर ये शेर लिखा तो छात्रा ने सवाल करते हुए कहा-शायर साहब महलों में सन्नाटा क्यों रहता है? कभी इस पर गौर करें। ‘कौसर’ को यह बात याद रही और काफ़ी दिनों बाद उन्होंने दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में ये क़तआ कहा-

दासियों के क़हक़हे और इशरतों की महफिलें
इन नज़ारों में ही खोकर जिन्दगी काटा हूं मैं
चीख किसकी दब गयी और बद्दुआ किसकी लगी
याद सब कुछ है मुझे महलों का सन्नाटा हूं मैं


उर्दू शायरी की शोहरत रंगे-तग़़ज्जुल यानि श्रृंगार रस से शराबोर भावनाओं की अभिव्यक्तियों की वजह से है। मुहब्बत, नफरत, तिरस्कार, हुस्न और इश्क की नोंक-झोंक, मिलन-विरह की संवेदना, महबूब की मासूमियत आदि-आदि को शायरों ने जिस ख़ूबी से अपनी ग़ज़लों और शेरों में पिरोया है उनकी मिसाल अन्य भाषाओं की कविताओं में मिलना मुश्किल है। ‘कौसर’ की ग़ज़लों में भी नज़ाकत से भरपूर ऐसे कई शेर मिलते हैं। चंद मिसालें पेश हैं:-

कभी सपने में भी सोचा न था ये हादसा होगा
मैं तुमको भूल जाऊंगा ये मेरा फ़ैसला होगा

नजर मिलते ही वो शरमा के जब भी सर झुकाती है
मुझे उस वक्त नाज़ुक लाजवंती याद आती है

बचा-बचा के नजर आंख भर के देखते हैं
वो आईना जो कभी बन संवर के देखते हैं

नज़र बचा के गुज़रना हमें क़ुबूल मगर
निगाहें नाज़ तेरी बेरूखी पसंद नहीं


दोस्ती, मिलनसारिता, वफादारी और बेवफ़ाई पर भी उनकी क़लम चली है। दोस्ती पर उनका क़तआ और कुछ शेर देखें-
मुस्कराती आरज़ूओं का जहां समझा था मैं
ज़िन्दगी का ख़ूबसूरत कारवां समझा था मैं
दोस्ती निकली फ़क़त कांटों की ज़हरीली चुभन
दोस्ती को गुलसितां ही गुलसितां समझा था मैं

न दोस्ती न मुरौव्वत न प्यार चेहरों पर
दिखाई देती है नक़ली बहार चेहरों पर
वफ़ा की एक भी सूरत नज़र नहीं आई
निगाह उठती रही बार-बार चेहरों पर

सियासत, सामाजिक व्यवस्था, शिष्टाचार, अध्यात्म पर ‘कौसर’ की गहरी पकड़ हैं। उनकी ग़ज़लों में इस अंदाज़ के शेर बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में पेश हुए हैं। चंद मिसालें देखें -

चमन पे हक़ है तुम्हारा, मगर ये ख्याल रहे
मैं फूल हूं मुझे आवारगी पसंद नहीं

आस्तीनों में अगर सांप न पाले होते
अपनी क़िस्मत में उजाले ही उजाले होते
हम सियासत को तिजारत नहीं समझे वरना
अपने हाथों में भी सोने के निवाले होते


अध्यात्म पर ‘कौसर’ ने कई शेर और बेहतरीन शेर कहे हैं -

सुना है उसकी गली है निजात का रस्ता
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

चमन वालों ज़रा सोचो इबादत के लिए किसकी
हज़ारों साल से शबनम गुलों का मुंह धुलाती है
पतंगे, तितलियां, भंवरे ये सब किस धुन में रहते हैं
ये किसकी याद में कोयल विरह के गीत गाती है


मानसिक क्लेश, दर्द की गहन अनुभूति को ‘कौसर’ ने अपनी शायरी का ज़ेवर बनाया है। इस अंदाज़ के शेरों की संप्रेषणीयता में उनकी लेखनी का कमाल झलकता है।

न जाने कितने ज़ख्मों के दरीचे खोल देता है
टपकता है जो आंखों से लहू सब बोल देता है
जिन्हें रहना था महलों पे सरापा नाज़ की सूरत
मुक़द्दर चंद सिक्कों में उन्हें भी तोल देता है
सामाजिक विषमताओं ओर विद्रुपताओं पर भी उनके शेर दिल को छू जाते हैं।
हमारी मुफ़लिसी पर तंज़ करते हो थे मत भूलो
ख़ज़ानों की उठाकर फेंक दी है चाबियां हमने
ये दुनिया है यहां आसानियां यूं ही नहीं मिलती
बहुत दुश्वारियों से पाई हैं आसानियां हमने


उर्दू अदब में ‘कौसर’ की गहरी पकड़ है। सूफी-संतों, ऋषि-मुनियों की शालीनता ने उन्हें बेहद प्रभावित किया है। मीरा, रहीम, तुलसी और कबीर के दोहों से उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की। मूलत: गज़ल और नज़्म लिखने वाले ‘कौसर’ से इन पंक्तियों के लेखक ने जब एक बार हिन्दी में कविता लिखने का आग्रह किया तो वे मुस्कुरा कर बात को टाल गये, लेकिन कुछ दिनों के बाद जब उन्होंने हिन्दी में ‘अमृत मंथन’ शीर्षक से लंबी कविता लिखी और वह प्रकाशित हुई तो साहित्य बिरादरी चौंक गयी। ‘अमृत मंथन’ भारतीय संस्कृति का निचोड़ हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों और पौराणिक कथाओं के माध्यम से उन्होंने प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी। आध्यात्म पर गहरी रूचि रखने वाले ‘कौसर’ की कविता अमृत-मंथन भाग एक और दो उनके विशद अध्ययन और गहरी अनुभूति का अहसास कराती है। दो बंद गौरतलब है-

जब पंचतंत्र पढ़कर भी मन प्यासा रह जाए
जब कार्ल मार्क्‍स का दर्शन कुछ न कर पाए
जब संत कबीर की वाणी सुनकर भी समाज में
जब दंभ का दानव अट्टहास ही करता जाए
जब युवा वर्ग को चरित्र हीनता निगल रही हो
जब अनुशासन का स्वस्थ प्रशासन क्यों कर हो?


एक और बंद दृष्टब्य है -

कुरूक्षेत्र में एक ही चेहरा सामने आये
विस्मित हृदय गोरखधंधा समझ न पाये
बर्बरीक ये विंध्याचल से देख रहा है
कृष्ण ही मारे और कृष्ण ही मरता जाए
जब विध्वंस-निर्माण ब्रम्ह की लीला ठहरी
तब बुद्घि और बोधि में अनबन क्यों कर हो


हिन्दी साहित्य में संस्कारधानी राजनांदगांव का नाम राष्ट्रीय ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्घ है। मानस मर्मज्ञ डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र, साहित्य वाचस्पति डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी रचनाधर्मिता से राजनांदगांव का नाम रोशन किया है। प्रकारांतर में क्रांतिकारी कवि कुंजबिहारी चौबे और डॉ. नंदूलाल चोटिया ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। हिन्दी साहित्य के साथ ही अब उर्दू साहित्य में भी निरंतर सृजनात्मक लेखन कर तथा हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित होकर अब्दुस्सलाम कौसर ने राजनांदगांव ही नहीं समूचे छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की गज़ल सराई के साथ चलने वाले ‘कौसर’ का शुमार छत्तीसगढ़ के अग्रिम पंक्ति के शायरों में होता है।

वीरेन्द्र बहादुर सिंह़

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

घोटालों की भेंट चढ़ा संसद का शीतकालीन सत्र



डॉ. महेश परिमल
यह हमें अभी तक शायद पता नहीं है कि संसद की एक दिन की कार्यवाही में आम जनता का कितना खर्च होता है। हमें पता भी हो, तो शायद हम इसे गंभीरता से नहीं लेते। आखिर इस देश में इतने बड़े-बड़े कांड हो रहे हैं, उसमें जनता की मेहनत की कमाई कुछ स्वार्थी तत्वों की जेब में जा रही है। उसके अनुपात में संसद में होने वाला खर्च तो मामूली है। पर यही मामूली खर्च की राशि बताई जाए, तो 146 करोड़ रुपए होती है। यानी संसद की कार्यवाही ठप्प होने के दौरान आम जनता की जेब से 146 करोड़ रुपए ऐसे ही निकल गए। आम जनता के हाथ क्या आया? कुछ नहीं। इस राशि को यदि घोटाले की राशि में जोड़ दिया जाए, तो? कई विधेयक पारित होने से रह गए, केवल दोनों दलों की जिद के कारण। उस जिद ने कितना बड़ा नुकसान आम आदमी का किया है, इसे समझने की जरुरत किसी को नहीं है।
संसद की कार्यवाही ठप्प पड़ गई। पूरा शीतकालीन सत्र जिद की भेंट चढ़ गया। मानो इस देश में स्पेक्ट्रम घोटाल के सामने चर्चा का कोई विषय ही नहीं है। हमारे रणबाँकुरे सांसदों की एक ही रट है कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच केवल जेपीसी से ही कराई जाए। यहाँ जाँच महत्वपूर्ण न होकर जेपीसी महत्वपूर्ण हो गई है। सांसद यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जेपीसी की माँग सरकार कभी नहीं मानेगी। इसलिए जिसे वह नहीं मान रही है, उसी के लिए जिद की जाए। ताकि मामला इसी तरह से आगे बढ़ता रहे। हमारे सांसद यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जनता की मेहनत की कमाई को किस तरह से अपव्यय होने से रोका जाए। जेपीसी से सच्चई सामने आ ही जाएगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। उधर रतन टाटा के बयान से भाजपा को मानो साँप सूँघ गया। भाजपाई खेमा सकते में आ गया है। ऐसे में उन्हें संसद की कार्यवाही ठप्प होने पर ही फायदा है। ताकि अपनी कमजोरी को छिपाने का अवसर मिल जाए।
क्या संसद में चर्चा के लिए अन्य कोई मुद्दा ही नहीं है? कई ऐसे मुद्दे हैं,जिन पर विचार किया जाना है। पर जब संसद की कार्यवाही ही ठप्प हो, तो फिर मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। हाशिए पर गए हुए मुद्दों की फिर चर्चा ही क्योंे की जाए? महँगाई लगातार बढ़ रही है, इस पर किस तरह से लगाम कसी जाए, यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन सांसद अपनी जिद में आकर महँगाई को बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं। वैसे भी उनहें महँगाई की चिंता नहीं है। उन्हें इतना कुछ मिल रहा है कि महँगाई उनके सामने नतमस्तक है। संसद की कार्यवाही ठप्प रहे, इस पर कांग्रेस का भी फायदा है। इसलिए वह भी नहीं चाहती कि संसद में आकर भाजपा उसकी और फजीहत करे। इसलिए दोनों मुख्य दल मिलकर जनता की मेहनत की कमाई को गवाँ रहे हैं। जब दोनों ही दल की सोच ऐसी हो, तो फिर आम-आदमी की पीड़ा किसी कोने में सिसकती ही रह जाती है।
राजनीति की लीला अपरम्पार है। इसे कोई नहीं समझ पाता। आम जनता के प्रतिनिधि ही आम जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं। पाँच वर्ष में एक बार भिखारी बनकर वोट माँग लेते हैं, फिर तो वे राजा हो जाते हैं। हमारी संसद में इतने सुलझे लोग राजनीतिज्ञ हैं। फिर भी कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा है, जिससे हमारे सांसद की सोच को बदला जा सके। आखिर जनता के प्रति उनकी भी जवाबदेही है? राजनीति की गहरी सोच के पीछे आम आदमी की पीड़ा सामने होनी चाहिए। जो अब दिखाई नही देती।
संसद में इतने लम्बे गतिरोध के लिए आखिर दोषी किसे माना जाए? इसके लिए विपक्ष जितना दोषी है, तो फिर सत्तारुढ़ दल भी कम दोषी नहीं है। यह तो साफ दिख रहा है कि सत्तारुढ़ दल ने स्पेक्ट्रम घोटाले को छिपाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके लिए विपक्ष की कमजोरी भी सामने आई। इससे विपक्ष भी इंकार नहीं कर सकता। संसद की गरिमा उसके चलते रहने में ही है और सांसद की गरिमा उसे चलाए रखने में है। पर जब सांसद ही उसे चलाए नहीं रखना चाहते, तो फिर कैसे चल पाएगी संसद? गरिमा तार-तार हो चुकी है। कब, कौन देख पाएगा इस हारी हुई संसद को? शायद कोई नहीं!
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जहाँ शरीर के अंगों का मुफ्त ट्रांसप्लांट होता है



डॉ. महेश परिमल

बहुत दु:ख होता है, जब कोई बेहद अपना हमारी आँखों के सामने ही दम तोड़ देता है। उसका जाना इस बात के लिए भी अधिक अखरता है कि उसके इलाज के लिए लाखों खर्च करने के बाद हम और भी खर्च करने को तैयार थे, फिर भी हमारा अपना जिंदगी के सामने हार गया। हम उसकी हार देखते रहे। गरीबों के लिए तो यह और भी त्रासदायी है। वे खर्च करने के लिए भी सक्षम नहीं होते। हाँ अपना अंग देने के लिए अवश्य तैयार हो जाते हैं, फिर भी वे अपने को बचा नहीं पाते। ऐसे ही गरीबों के लिए एक खुशखबरी है, तमिलनाडु में ऐसे अस्पताल हैं, जहाँ लीवर और हार्ट ट्रांसप्लांट बिलकुल मुफ्त किए जाते हैं। गरीबों को तो यहाँ किसी प्रकार का धन नहीं देना पड़ता। आश्चर्य इस बात का है कि ऐसे अस्पतालों को सरकार का संरक्षण प्राप्त है।
बात शुरू से शुरू करते हैं। देश के तमाम महानगरों की तरह इन दिनों चेन्नई में भी बिल्डिंग निर्माण का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। इन परिस्थिातियों में एक बिल्डिंग के निर्माण के दौरान एक 23 वर्षीय युवक एक ऊँचे स्थान से गिर गया। उसे पास के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया। वहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वैसे डॉक्टरों की दृष्टि में वह ब्रेनडेड था। इसलिए वह मानव समाज के लिए उपयोगी था। पर अब किया क्या जाए? यह युवक आंध्रप्रदेश से रोजी-रोटी के लिए आया था। ठेकेदार से जब उक्त मजदूर के बारे में जानने की कोशिश की गई, तो पूरी जानकारी नहीं मिल पाई। आखिर किसी तरह उस युवक के परिवार के बारे में जानकारी मिल गई। जब युवक के माता-पिता ने अपने बेटे की लाश देखी, तो वे फूट-फूटकर रोने लगे। अभी उस युवक की शादी को एक साल ही हो पाया था। डॉक्टरों ने उस परिवार को समझाया कि आपका बेटा मरकर भी जिंदा रह सकता है। यदि आप उसके अंगों को दान करने की घोषणा कर दें तो। यह सुनकर निरक्षर माता-पिता हैरान रह गए। आखिर उन्होंने तय किया कि वे अपने बेटे के सारे अंगों को दान में देंगे। उनकी स्वीकारोक्ति के बाद डॉक्टरों के एक दल ने उक्त युवक की दो आँखें, दो किडनी, हार्ट और लीवर निकाल लिए और जरूरतमंदों को दे दिए। चिकित्सकीय भाषा में इसे केडेवर ऑर्गन ट्रांसप्लांट कहते हैं।


आप माने या न मानें, पर यह सच है कि देश में सबसे अधिक मरणोपरांत अंगदान तमिलनाडु में होता है। इसके पीछे का कारण भी जानने लायक है। वंशवाद के आरोपों से घिरी करुणानिधि सरकार इस मामले में बहुत ही उदार है। अंगदान के नियम इस राज्य में अन्य राज्यों की अपेक्षा नरम हैं। अंगदान की नीतियों को इस राज्य ने खूब ही सहज बनाया है। इतना ही नहीं, इन अंगों को जरूरतमंद गरीबों को बिना एक पैसा लिए ट्रांसप्लांट की सुविधा भी इस राज्य में है। इतना ही नहीं, ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को इम्युनोसपेसंट मेडिकेशन के रूप में पहचाने जाने वाली दवाई भी राज्य सरकार द्वारा मुफ्त में दी जाती है। पूरे राज्य मेंएक नही दो नहीं, पूरे 27 ऐसे अस्पताल हैं, जहाँ अंग ट्रांसप्लांट किए जाते हैं। इन अस्पतालों में दिन-रात इस तरह के सेवाभावी कार्य किए जा रहे हैं।
हमारे देश में सड़क दुर्घटना में रोज ही सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। ऐसे मामले में यदि तुरंत निर्णय लिए जाएँ, तो कई जिंदगियाँ बचाई जा सकती हेँ। ब्रेन डेड हाने के कुछ घंटों बाद ही इनके अंग निकालकर सुरक्षित रखे जा सकते हैँ। इस दिशा में जितना संवेदनशील तमिलनाडु है, उतना कोई अन्य राज्य नहीं। इसके अलाव इतने सुविधा सम्पन्न अस्पताल भी किसी राज्य में नहीं हैं, जहाँ अंगों का ट्रांसप्लांट मुफ्त में किया जाता हो। यही कारण है कि पिछले दो वर्षो में 110 से अधिक लोगों पर लीवर का ट्रांसप्लांट किया गया है। पूरे देश की बात करें, तो पिछले दो वर्षो में इसका आधा भी नहीं हुआ है। इसी तरह इस राज्य में 240 किडनी, 25 हार्ट का ट्रांसप्लांट किया गया है। यह एक रिकॉर्ड है।
करुणानिधि सरकार ने अक्टूबर 2008 में अंगदान का यह कार्यक्रम शुरू किया था। देश के अन्य राज्यों में तो इलाज के लिए अस्पताल पहुँचे गरीब लोगों की किडनी ही निकाले जाने की घटनाएँ होती रही हैं। तमिलनाडु भी इससे अछूता नहीं था। इसीलिए करुणानिधि सरकार ने इस दिशा में सख्त कदम उठाते हुए अंगदान की प्रक्रिया को सरल बनाया। इसके परिणामस्वरूप आज यहाँ आकर हजारों लोग जीवनदान प्राप्त कर रहे हैँ।

यहाँ की अस्पतालों का काम भी काफी रोमांचकारी है। अब तो मोबाइल और इंटरनेट के कारण कुछ ही समय में डॉक्टर विडियो कांफ्रेंस कर निर्णय ले लेते हैं। रोज वेटिंग लिस्ट अपडेट करते हैं। यही नहीं किस मरीज की ट्रांसप्लांट करने की अधिक आवश्यकता है। इसकी पूरी तैयारी की जाती है। यहाँ की सारी जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध की जाती है। इस शुभ कार्य में एनजीओ का भी भरपूर सहयोग प्राप्त हो रहा है। यही नहीं, यातायात पुलिस भी इस दिशा में अपना अमूल्य योगदान करती है। जैसे ही कोई दुर्घटना होती है, तो तुरंत ही पास के अस्पताल में इसकी सूचना दी जाती है। डॉक्टरों का दल तुरंत उनके संबंधियों से सम्पर्क करता है और मृत व्यक्ति के महत्वपूर्ण अंगों को निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है।
यह एक शुभ कार्य है। जिसमें केवल मृत व्यक्ति के स्वजनों के माध्यम से यह संभव हो पाता है। इसके बाद उन अंगों को उन गरीब लोगों में ट्रांसप्लांट किया जाता, जो धन खर्च करने में सक्षम नहीं होते। अन्य राज्य भी इस दिशा में सक्रिय होकर कुछ ऐसा ही करें, तो संभव है गरीबों को जीवनदान मिल जाए। साथ ही मृत परिवार के लोग भी आश्वस्त रहें कि उनका स्वजन मरकर भी अमर है। इस अहसास के साथ जीना भी एक सुकून देता है।
इसके बारे में अधिक जानकारी इस वेबसाइट से जानी जा सकती है। वेबसाइट का पता है www.dmrhs.org पता और फोन नम्बर इस प्रकार है:-
Cadaver Transplant Program,
165 A, Tower Block I, 6th Floor, [Next to Bone Bank],
Government General Hospital
Chennai – 600 003
E-Mail :
organstransplant@gmail.com
Phone :
(91)44 25305638
Fax :
(91)44 25363141

डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

देवास की गूँज दिल्ली तक सुनी जानी चाहिए


डॉ. महेश परिमल
कुछ समय से छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर छापे पड़े, जिसमें साधारण से सरकारी कर्मचारी के यहाँ से करोड़ों रुपए मिले। दूसरी ओर कई ऐसे स्थानों पर भी छापे के दौरान अकूत सम्पत्ति का पता चला। सरकारी धन का अपने स्वार्थ के लिए मनमाना उपयोग करने वाले ऐसे अधिकारियों के लिए देवास की अदालत का एक फैसला मिसाल पैदा कर सकता है, जिसमें एक लोक निर्माण विभाग के उपयंत्री के यहाँ छापे में 50 लाख रुपए से भी अधिक सम्पत्ति मिली। अदालत ने उस पर 5 करोड़ रुपए जुर्माना लगाया है और तीन साल की कैद की सजा सुनाई है।
भ्रष्टाचार आज हमारे देश के लिए एक ऐसा नासूर बन गया है, जो लगातार हमारी जड़ों को खाए जा रहा है। ऐसे में अदालत के फैसले ही इस अंधेरे में रोशनी की किरण बन सकते हैं। अदालत के फैसले का आज भी सम्मान होता है। भले ही आज कानून कुछ लोगों की गिरफ्त में आ गया हो, पर आम आदमी आज भी कानून पर भरोसा रखता है। ऐसे में यदि किसी भ्रष्टाचारी को दंड देना हो, तो देवास की अदालत का फैसला एक नजीर बन सकता है। आय से अधिक सम्पत्ति रखने के आरोप में पकड़े गए उपयंत्री पर 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाते हुए अदालत ने जो कुछ कहा वह भी महत्वपूर्ण है। अदालत का कहना था कि भ्रष्ट लोकसेवक व व्यवसायी अपनी अनुपातहीन संपत्ति इतनी चतुराई से रखते हैं कि उन्हें पकड़ पाना लगभग असंभव हो चुका है। उनके मन में यह धारणा पक्की हो चुकी है कि उनकी अनैतिक गतिविधियों को पकड़ा नहीं जाएगा और वे चतुराई से जनता की मेहनत से कमाई संपत्ति को हड़पते रहेंगे। उन्हें ऐसा दंड दिया जाना चाहिए, जिससे उनके मन में भय पैदा हो कि जिस दिन वे पकड़े जाएंगे, उस दिन भ्रष्ट साधनों से अर्जित संपत्ति दंडित किए जाने की तारीख से मूल्य सहित उनके पास से वापस चली जाएगी।
करीब 30 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी ‘दुश्मन’। इस फिल्म में ट्रक ड्राइवर नायक से उसकी गाड़ी के नीचे आने से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है, जज उसे मृतक के परिवार को पालने की सजा देते हैं। पहले तो नायक को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, बाद में स्थिति सामान्य हो जाती है। फिल्म के अंत में नायक जज के पाँवों पर गिरकर अपनी सज़ा बढ़ाने की गुहार करता है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय था। सजा ऐसी होनी चाहिए, जिससे सजा भुगतने वाले को ऐसा लगे कि वास्तव में मैंने अपनाध किया है। यह उसी की सजा है। प्रायश्चित के इस भाव के साथ भुगती जाने वाली सजा अपना असर दिखाती है। सजा भीतर के इंसान को जगाने वाली होनी चाहिए। जो सजा हैवान को जगाए, उसे सजा नहीं कहा जा सकता। अदालतों ने कई बार जरा हटकर सजा सुनाने की कोशिश की है। एक बार एक विधायक को अदालत ने गांधी साहित्य पढऩे की सजा दी थी। एक सेलिब्रिटी को झोपड़पट्टी इलाके में एक सप्ताह बिताने की सजा दी थी। इस तरह से यदि लीक से हटकर सजा सुनाई जाए, तो उससे सजा भुगतने वाले को यह अहसास होगा कि सचमुच यह तो बहुत ही बड़ी जटिल सजा है। एक लखपति अपराधी को यदि हजार रुपए का जुर्माना कर भी दिया गया, तो उसे क्या फर्क पड़ता है। पर उसे रिक्शा चलाकर एक निश्चित आमदनी रोज अदालत में जमा करने को कहा जाए, तो यह प्रायश्चित वाली सजा होगी।
सजा पाने वाला हमेशा अपराधी नहीं होता, यह हम सब जानते हैं। पर जो जानबूझकर अपराध करते हैं, उनके लिए सजा ऐसी होनी चाहिए कि दूसरे भी उसे एक चेतावनी के रूप में लें। सोचों, वह दृश्य कितना सुखद होगा, जब हम देखेंगे कि एक नेता पूरे एक हफ्ते तक झोपड़पट्टियों में रहकर वहाँ रहने वालों की समस्याओं को समझ रहा है। एक मंत्री ट्रेन के साधारण दर्जे में यात्रा कर यात्रियों की समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहा है और एक साहूकार खेतों में हल चलाकर एक किसान की लाचारगी को समझने की कोशिश कर रहा है। यातायात का नियम तोडऩे वाला शहर के भीड़-भरे रास्तों पर साइकिल चला रहा है। वातानुकूलित कमरे में बैठने वाला अधिकारी कड़ी धूप में खेतों पर खड़े होकर किसान को काम करता हुआ देख रहा है। बड़े-बड़े उद्योगपतियों की पत्नियाँ झोपड़पट्टियों में जाकर गरीबों से जीीवन जीने की कला सीख रही हैं। यह दृश्य कभी आम नहीं हो सकता। बरसों लग सकते हैं, इस प्रकार के दृश्य आँखों के सामने आने में। पर यह संभव है। यदि हमारे देश के न्यायाधीश अपने परंपरागत निर्णयों से हटकर कुछ नई तरह की सज़ा देने की कोशिश करें। ज़ेल और जुर्माना, यदि तो परंपरागत सज़ा हुई, इससे हटकर भी सजाएँ हो सकती हैं।
मनुष्य की प्रवृत्ति होती है, बहाव के साथ चलना। जो बहाव के साथ चलते हैं, उनसे किसी प्रकार के नए कार्य की आशा नहीं की जा सकती है। किंतु जो बहाव के खिलाफ चलते हैं, उनसे ही एक नई दिशा की आशा की जा सकती है। कुछ ऐसा ही प्रयास पूर्व में कुछ हटकर निर्णय देते समय जजों ने किया है। अगर ये जज हिम्मत दिखाएँ, तो कई ऐसे फैसले दे सकते हैं, जिससे समाज को एक नई दिशा मिल सकती है। आज सारा समाज उन पर एक उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है। आज भले ही न्यायतंत्र में ऊँगलियाँ उठ रही हों, जज रिश्वत लेने लगे हों, बेनाम सम्पत्ति जमा कर रहे हों, ऐसे में इन जजों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए, जब वे भी एक साधारण आरोपी की तरह अदालतों में पेशी के लिए पहुँचेंगे, तब उन्हें भी समझ में आ जाएगा कि न्याय के खिलाफ जाना कितना मुश्किल होता है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा


-मनोज कुमार
शीर्षक पढ़ कर आपको शायद अच्छा न लगे किन्तु सच यही है। जो लोग जिम्मेदार हैं और जिन लोगों से प्रेरणा पाकर समाज उनका अनुसरण करता है वही लोग इस तरह के कर्म करेंगे तो कहना ही होगा कि मत रखियों अपनी बिटिया का नाम
नीरा। आइए इस बहाने ही सही एक बार नामकरण पर थोड़ी चर्चा हो ही जाए।भारतीय मानस हमेशा से चर्चित और प्रेरणा देने वालों के नाम पर अपने बच्चों का नामकरण करता आया है। भारतीय समाज में साक्षरता का प्रतिशत भले ही कम हो किन्तु समाज हमेशा से विवेकवान रहा है। जिस समय हर मंच पर नीरा राडिया और नीरा यादव की चर्चा हो रही है। अखबार के पन्नों और टेलीविजन के पर्दे पर उनकी बात कही और सुनी जा रही है तब संभव है कि कुछ माता-पिता इन नामों पर फिदा हो जाएं और जैसे होता आया है हर चर्चित नाम अपने बच्चों के कर दिये जाएं।
राम एक सर्वकालिक चरित्र हैं। चरित्रवान बच्चे की तमन्ना के साथ राम का नाम सदियों से लोग रखते आये हैं और लक्ष्मण को आज्ञाकारी भाई के रूप में देख कर उसका नाम भी स्नेहपूर्वक रखा गया है। भरत को भी समाज ने अनदेखा
नहीं किया और अनेक परिवारों में ऐसे नाम रखे गये। समय समय पर इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले व्यक्तियों के नाम भी अनेक परिवारों में दर्ज हो गये। भारतीय समाज विवेकवान है इसलिये उसे राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, पार्वती, राधा, कृष्ण नाम रखने में कभी संकोच नहीं हुआ किन्तु उसने कभी अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखा। ऐतिहासिक तथ्य है कि अपने भाई से विद्रोह कर राम की मदद करने वाले विभीषण को लोग याद करते हैं किन्तु यह नहीं भूलते कि जो अपने परिवार का नहीं हुआ, अपने भाई का नहीं हुआ वह भला हमारा कैसे हो सकता है? ऐसे में उनका नाम किसी ने अपने बच्चे का नाम नहीं बनाया। आधुनिक समाज में भी गांधी और नेहरू के नाम पर हजारों बच्चे मिल जाएंगे, इंदिरा नाम की बच्चियों की तादात भी कम नहीं होगी लेकिन कानून की परिधि से बाहर जाकर काम करने वाले फूलनदेवी, मलखानसिंह और दाउद के नाम
वाले शायद ढूंढ़ने से भी न मिले। खिलाड़ियों और फिल्मस्टार के नाम पर तो लगभग हर परिवार में एक चिराग मिल जाए।
इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के एक परिवार की घटना का उल्लेख करना सामयिक होगा। यहां एक पिता ने सानिया मिर्जा के नाम पर अपनी लाडली का नाम रख दिया। सोचा सानिया ने जैसे देश का नाम किया है वैसा ही
उसकी बेटी भविष्य में करेगी लेकिन उसे निराशा अपनी बेटी से नहीं सानिया से हुई। सानिया ने पाकिस्तानी से ब्याह का ऐलान किया। सानिया के इस फैसले से दुखी पिता ने तत्काल अपनी बेटी का नाम बदल कर सोनिया कर दिया। पिता को
इस बात का भय रहा होगा कि उसकी बेटी एक दिन अपने देश का नाम खराब न कर दें। इसे सहज और स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानी जानी चाहिए और उस व्यक्ति के देशप्रेम को सलाम किया जाना चाहिए।
हमारे देश में इन दिनों नीरा नाम पर ग्रहण लगा हुआ है। नीरा राडिया का नाम खबर की सुर्खियों से धुंधला पड़ा ही नहीं था कि एक और नीरा के कारनामे सुर्खियों में आ गये। ये दूसरी हैं नीरा यादव। नीरा यादव उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यसचिव हैं और उन्हें जमीन घोटाले के मामले में चार साल की कैद सुनायी गयी है। समाज का मूलभूत नियम तो यह कहता है कि एक शक्तिशाली एक निरीह और जरूरतमंद को अपनी तरह शक्तिशाली बनाये किन्तु अनुभव ठीक इसके विपरीत है। नीरा राडिया और नीरा यादव सशक्त स्त्रियों के रूप में सामने आयी हैं किन्तु इन दोनों महिलाओं ने स्त्रियों की दशा सुधारने में कोई प्रयास नहीं किया। समय बतायेगा कि नीरा राडिया और नीरा यादव कितनी सही और गलत थीं लेकिन आज तो यह बात साफ है कि इनकी कमाई के एजेंडे में, लाभ देने ले लोगों की सूची में पांच गरीब और असहाय महिलाएं भी होती तो समय न सही, समाज का एक वर्ग तो इन्हें माफ कर देता। इस मामले में सच तो यही है कि सशक्त और बलशाली लोगों की कौम एक अलग होती है और निशक्त: और निर्बल लोगों की एक अलग कौम। हम उम्मीद कर सकते हैं कि बार बार नीरा का नाम आ
रहा है किन्तु जिस तरह समाज ने विभीषण जैसे नामों से परहेज किया वैसा ही कुछ भाव भी इन नामों के साथ होगा।
-मनोज कुमार

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

जेपीसी से डरना आखिर जरूरी क्यों है?


डॉ. महेश परिमल
पिछले पखवाड़े से संसद ठप्प है। कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्ष अपनी जिद पर अड़ा है। सरकार अपनी ढुलमुल नीति अपनाए हुए है। सरकार को अच्छी तरह से पता है कि किसी भी हालत में विपक्ष की माँग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। विपक्ष चाहता है कि टेलिकॉम घोटाले की जाँच संयुक्त संसदीय समिति द्वारा की जाए। पर सरकार जेपीसी से डर रही है। जेपीसी का इतिहास देखा जाए, तो यही पता चलता है कि जिसने भी जेपीसी से जाँच कराई, वह गया काम से। वह सरकार बच नहीं पाई है। फिर चाहे वे राजीव गांधी हों, या फिर नरसिम्हा राव। यही कारण है कि इस बार सरकार फूँक-फूँककर कदम रख रही है। विपक्ष है कि मानता नहीं। सरकार है कि मानना ही नहीं चाहती। संसद में रोज के हिसाब से जो करोड़ो रुपए खर्च हो रहे हैं, उसकी चिंता भी किसी को नहीं है। आखिर क्या होगा इसका अंजाम?
राजीव गांधी ने बोफोर्स मामले पर जेपीसी से जाँच कराना स्वीकार किया था। उस समय भी विपक्ष को कुछ ऐसा ही संघर्ष करना पड़ा था। उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की हार हुई थी। इसके बाद स्टाक मार्केट कांड में नरसिम्हा राव ने भी जेपीसी की माँग स्वीकार की थी, उसके बाद वे भी चुनाव हार गए। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह जेपीसी के अध्यक्ष थे। इसीलिए वे अच्छी तरह से जानते हैं कि जेपीसी से सरकार को क्या नुकसान हो सकता है। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जेपीसी के बाद चुनाव हार गए थे।
आखिर जेपीसी में ऐसा क्या है, जिसका सामना करने में हर कोई घबराता है। वास्तविकता यह है कि जेपीसी के पास अथाह सत्ता होती है। आवश्यकता पड़ने पर वह प्रधानमंत्री से भी पूछताछ कर सकती है। जेपीसी के सभी सदस्यों की संख्या सीटों के आधार पर तय होती है। पूरी तरह से राजनीति का केंद्र बिंदु होने के कारण इनकी सारी गतिविधियों की जानकारी मीडिया में आते रहती है, इससे सरकार की छवि खराब होती है। प्रधानमंत्री यह जानते हैं, इसलिए वे जेपीसी के अलावा अन्य कोई भी एजेंसी से जाँच कराने को तैयार हैं। पर विपक्ष मानने को तैयार ही नहीं है। विपक्ष को मनाने की प्रणव मुखर्जी की सारी कोशिशें भी नाकाम हो गई हैं। विपक्ष अपनी जिद छोड़ दे, उनके इस बयान को भी तरजीह नहीं दी जा सकती। क्योंकि स्पेक्ट्रम टू जी घोटाले में अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है।
अब बात यहाँ पर आकर अटक गई है कि यदि डॉ. मनमोहन सिंह यह मानते हैं कि उनकी सरकार पूरी तरह से निर्दोष है, तो उन्हें जेपीसी से डरना नहीं चाहिए। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में क्या-क्या हुआ, यह भी प्रधानमंत्री अच्छी तरह से जानते हैं। इस घोटाले में वे भले ही प्रत्यक्ष रूप से न जुड़े हो, पर सच तो यह है कि कॉमनवेल्थ गेम के बाद हुए स्पेक्ट्रम घोटाले और आदर्श घोटाले में फँसने के बाद कांग्रेस ने विजिलेंस कमिoAर थॉमस की बलि देना स्वीकार कर लिया है, पर सच तो यह है कि इस छोैटी सी बलि से आखिर क्या होगा? इससे विवाद का यह दावानल शांत तो नहीं हो सकता।
सरकार को आखिर जवाब तो देना ही होगा। घोटाला कोई छोटा-मोटा नहीं है। अरबों के इस घोटाले के पीछे की विवशता भी सामने आनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले पर सख्त नाराज है। उसकी सख्ती के आगे सरकार कुछ न कर पाने के लिए पूरी तरह से विवश है। पर लोग तो जानना चाहते हैं कि आखिर इतना बड़ा घोैटाला हो कैसे गया? आखिर वह धन तो जनता का ही है। जनता जवाब माँगे या न माँगे, पर भाजपा को तो यह एक मुद्दा ही मिल गया। जनता की पार्टी होने का लाभ लेते हुए वह भी अब अड़ गई है। उसे मालूम है कि जेपीसी के बाद सत्ता उसके हाथ में आनी ही है। ये मौका चूक गए, तो फिर भविष्य में ऐसा मौका शायद ही मिले, जिसमें सरकार को आड़े हाथों लिया जा सके।
डा. मनमोहन सिंह ने इस देश के प्रधानमंत्री है कोई कुटिया में बैठे भागवत भजन करने वाले साधु नही कि हर बात को हरि -इच्छा पर छोड़ कर देश की सरकार चलाते रहे और अपने ईमानदार होने का सबूत देते रहे। यह किसी ईमानदारी है जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक अफसर को देश का मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने के लिए मजबूर करती है ? या कैसी ईमानदारी है जो अपने ही मंत्रीमंडल के एक मंत्री यह नही कह पाती कि 2-जी स्पेक्ट्रम के लाइंसेस तो बांटो मगर ज़रा यह भी ध्यान कर लो कि इसमें देश को कोई नुकसान ना हो । यह कैसी ईमानदारी है जो परमाणु दायित्व विधेयक को झटके में संसद में पारित कराने की कोशिश करती है और जब इस पर विवाद उठता है तो इस विधेयक में संशोधन कर दिया जाता है ? इस विधेयक को पारित कराते समय संसद को विश्वास दिलाया जाता है कि परमाणु हादसे होने पर मुआवजे के निपटारे के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय संधि से जुड़ने की कोई जल्दी नही है मगर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के भारत आने से पहले ही विएना में इस संधि पर भारत हस्ताक्षर कर देता है ? क्या ईमानदारी यह होती है कि राष्ट्र मंडल खेल आयोजन के नाम पर रोज नए-नए घोटाले उजागर होते रहे और प्रधानमंत्री इनके खत्म होने के बाद एक जांच समिति का गठन कर दे ? क्या ईमानदारी यह होती है कि Rिकेट के नाम पर आईपीएल की कोच्ची टीम को खरीदने के लिए उसके ही मंत्रीमंडल का का सदस्य बीच रास्ते में ही पकड़ लिया जाए ? क्या ईमानदारी इसे कहते है कि भारी संसद में जब उसके ही मंत्रिमंडल का सदस्य 2-जी लाईसेंस घोटाले पर विपक्षी सांसदों से यह कहे कि मुझे क्यों पकड़ते हो, मैंने तो सारा काम अपने सरपरस्त प्रधानमंत्री की जानकारी में ला कर ही किया है और प्रधानमंत्री चुपचाप बैठा रहे ? हकीकत ये है कि डा.मनमोहन सिंह के रूप में कांग्रेस पार्टी के खानदानी राज को एक ऐसा मोहरा मिल गया है जो उसका उपयोग मनचाही जगह पर जैसे चाहे वैसे कर सकता है। पर जवाब तो देना ही होगा? फिर चाहे वह चुनाव हारकर ही क्यों न देना पड़े।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

मन के परेशान न होने का मंत्र~




गिरीश बख्‍शी की सामयिक मुस्‍कान

खूब खिन्न होकर
बानी बोले गजाधर
क्या घर और क्या बाहर
मेरे मन का
कही होता ही नही है
तो मन परेशान हो जाता है
यह सही है
घर मै wife से कहता हु
आज भिन्डी बनाना
तो वह परवल बना देती है
मेरे मन को भी वह
seriously नही लेती
कहो तो तमक कर
हो जाती है नाराज
अब बाहर का किस्सा सुनो
क्या हुआ आज
मेरा मन दूर तक
घूमने जाने का था
पर मिल चौक पर मिल गया रामलाल
वह मुझे घसीट कर ले गया
पिक्चर हॉल

गजाधर मुस्कराये बोले
बानी
अपने मन को यु परेशान
मत कीजिये
महानायक अमिताभ बच्चन की
बात पर आप मन से ध्यान दीजिये
उनके बाबूजी
उनसे कहा करते थे कि
"मन का हुआ तो अच्छा
और न हो तो
और भी अच्छा"

]गिरीश बक्शी
राजनांदगॉंव

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

जो जीता वहीं सिकंदर यानी अब नीतिश और सिर्फ नीतिश



मनोज कुमार

यह माना हुआ सच है कि जो जीता वही सिकंदर और इस अर्थ में इस समय नीतिश-कुमार सिकंदर बन गये हैं। बिहार में उन्होंने जो तूफानी जीत हासिल की है-उसने उन्हें भारतीय राजनीति का सिरमौर बना दिया है। भारतीय राजनीति,-खासतौर पर क्षेत्रीय दलों के लिये वे नये रोल मॉडल के रूप में उभरे हैं।-बिहार चुनाव जीतने में उन्होंने किस तरह की रणनीति अपनायी और वे उसमें-सफल रहे, इस बात की मीमांसा की जा रही है। यह तो तय है कि ऐसी जीत बिहार-में नीतिश कुमार को नहीं मिली होती तो आज उनका कोई नामलेवा नहीं होता और-लालूप्रसाद यादव सिरमौर होते। कभी यही हाल लालू प्रसाद का हुआ करता था और-उनकी लोकलुभावन शैली प्रादेशिक राजनीति की दिशा बदल दिया करती थी।---भारतीय राजनीति में, खासतौर पर प्रादेशिक राजनीति में पिछले दो दशकों में-काफी परिवर्तन देखने को मिला है। एक समय था जब समूचे दलों के लिये-प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गुजरात के नरेन्द्र मोदी रोल मॉडल बन गये
थे। उनके हिन्दुत्व का एजेंडा सबको लुभा रहा था। सत्ता के लिये हिन्दुत्व-का कार्ड सहज और सरल रास्ता था। गुजरात के बाद उत्तरप्रदेश और बिहार में-जाति का कार्ड खेला गया। नीतिश कुमार इसी रास्ते से सत्ता में आये थे और-मायावती इसी रास्ते से सत्तासीन हैं।
मोदी जिस हालात में लगातार गुजरात की सत्ता में बने रहे तो राजनीति में-उनकी अलग पहचान बन गयी किन्तु मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जब भारतीय जनता-पार्टी ने दुबारा सत्ता सम्हाली तो हिन्दुत्व और जातिवाद से परे होकर-विकास का मुद्दा सामने आया। इस बार छत्तीसगढ़ के डाक्टर रमनसिंह और-मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान विकास के रोल मॉडल बन गये।-प्रादेशिक राजनीति के ये नये ब्रांड एम्बेसडर बन गये। छत्तीसगढ़ नया राज्य-है और इस लिहाज से यह माना गया कि कांग्रेस के विकास के प्रति उपेक्षा ने-उन्हें सत्ता में आने नहीं दिया किन्तु मध्यप्रदेश में भाजपा के लिये ऐसा-कोई कारण नहीं था। दस बरस के कांग्रेस के कार्यकाल में दिग्विजयसिंह के-राज में विकास को पीछे धकलने का आरोप लगा और वे सत्ता से बाहर हो गये-किन्तु भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और आरंभ के दो बरस में दो-मुख्यमंत्री बदल दिये गये। विकास का मुद्दा तब भी हाशिये पर था और-शिवराजसिंह तीसरे मुख्यमंत्री बने। पहली बार भाजपा और मध्यप्रदेश में-गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह को लगातार तीन वर्ष काम करने का अवसर मिला। इस तीन वर्ष में शिवराजसिंह ने महिलाओं, आदिवासियों-और किसानों के लिये कुछ काम करने की कोशिश की। राज्य में पूर्व की तरह-बिजली, पानी, सड़क आदि की समस्या का कोई बड़ा हल नहीं निकला था किन्तु-शिवराजसिंह ने अपनी जीत दर्ज करा दी। लगभग यही स्थिति छत्तीसगढ़ में थी।-बावजूद के दोनों राज्यों में भाजपा को मिली जीत को विकास की जीत कहा गया।---बिहार में जो जीत नीतिश कुमार को मिली है वह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का-दुहराव है। कल तक विश्लेषक बिहार की स्थिति को बहुत संतोषजनक नहीं बता-रहे थे और नीतिश की वापसी पर भी एकराय नहीं थे किन्तु स्थितियां बदली और-नीतिश कुमार के पक्ष में हवा बहने लगी। लालू यादव किनारे कर दिये गये।-बिहार में नीतिश कुमार की सरकार लौट आयी और एक बार फिर विश्लेषकों ने इसे-विकास की जीत कहा। वैसा ही जैसा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की-वापसी पर कहा गया था।---यह हो सकता है कि यह जीत विकास की हो किन्तु मेरा मानना है कि यह जीत-विकास की न होकर बल्कि विकास को परखने की जीत है। एक नजर से देखें तो अब-मतदाता इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि पांच बरस में सरकार बदल दें और-आने वाली नयी सरकार फिर से प्रदेश को प्रयोगशाला बना दें। पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं को तो थोड़ा बदला जाता है किन्तु उन योजनाओं के नाम-बदलने पर करोड़ों रुपये और वक्त जाया करते हैं। शायद इस दृष्टि से अब-मतदाता ने मन बना लिया है कि कम से कम दो कार्यकाल तो एक सरकार को मिले-ताकि उनके द्वारा पहले पांच वर्ष में आरंभ किये गये कार्याें को एक मुकाम-तो मिल सके। इन योजनाओं का परिणाम आमजनता देख सके और वह फिर तय करें कि-इस सरकार को तीसरा मौका दिया जाना चाहिए या नहीं।---इस बात को इस तर्क के साथ देखा जा सकता है कि दिल्ली की कांग्रेस सरकार-को क्यों मौका मिला? अनेक किस्म की शिकायतें और गुस्सा होने के बावजूद-कांग्रेस की जीत का यही एक कारण हो सकता है। पश्चिम बंगाल में तीन तीन-बार सरकार का चुना जाना आम आदमी के मन में सरकार के प्रति वि•ाास का होना-ही है। आगामी दो हजार तेरह में जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और इनके-साथ जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है वहां सरकार की परीक्षा होगी।-विकास कार्याें को आम आदमी जांचेगा और तय है कि खरा नहीं उतरने पर-सरकारें बदल दी जाएंगी। मीडिया ने आम आदमी को शिक्षित कर दिया है। कंबल-और नोट बांटकर सरकारें बनाने के दिन अब लदते दिख रहे हैं। बदलाव की यह-सूरत एकाएक नहीं है। चौंसठ वर्ष की आजादी के बाद यह सूरत देखने को मिली-है। सूरत तो बदल रही है किन्तु एकाएक किसी राज्य में सरकार की जीत को रोल-मॉडल मान कर उसे दोहराने की कोशिश राजनीति दलों को भारी पड़ सकती है।
स्थितियों और परिस्थितियों पर राजनीति दलों की हार-जीत तय होती है न कि-एक राज्य की जीत पर दूसरे राज्य की जीत। बहरहाल, अभी तो जयकारा हो रही है-बिहार की और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की।
मनोज कुमार

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

सरकार को समर्थन देने की कीमत 1,76,000 करोड़ रुपए



ए जी, ओ जी, टू जी यानी करुणानिधि और ए. राजा

डॉ. महेश परिमल

अपने आप को भ्रष्टाचार से दूर रखने का दंभ भरने वाली कांग्रेस जितना इस दलदल से निकलने की कोशिश कर रही है, वह उतनी ही अधिक घँसती जा रही है। कॉमनवेल्थ गेम में 80,000 करोड़, आदर्श सोसायटी घोटाले में 800 करोड़ और इन आँकड़ों को पार करता हुआ 1,76,000 करोड़ का 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, इन सारे रुपयों से देश के दो करोड़ गरीबों के लिए पक्के मकान बनाए जा सकते थे।

कांग्रेस भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए जितने भी हाथ-पैर मार रही है, वह उतना ही अधिक उसमें उलझती जा रही है। आदर्श हाऊसिंग सोसायटी के मामले में तो उसने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह राज्य का मामला है। कॉमनवेल्थ गेम की तैयारी के दौरान हुए निर्माण कार्यो में हुई लापरवाही और उससे जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में सुरेश कलमाड़ी का विकेट झटककर उसने यह बताने की कोशिश अवश्य की कि वह भ्रष्टाचार को लेकर सचेत है और उसे कदापि बर्दाश्त नहीं करेगी। इस क्रम में आखिर संचार मंत्री ए. राजा की विदाई हो ही गई। किंतु उनके इस्तीफे मात्र से सरकार यह न समझे कि उसका कर्तव्य पूरा हो गया, तो यह गलत है। पूरे देश में स्पेक्ट्रम घोटाले की गूँज सुनाई दे रही है। लगातार तीन वर्ष तक यह घोटाला चलता रहा, प्रधानमंत्री की विवशता का पूरा फायदा करुणानिधि ने उठाया। डॉ. मनमोहन की अपनी सदाशयता के कारण कुछ नहीं कर पाए। उन्हें भी डर था कि इस मामले को अधिक छेड़ा गया, तो सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी। वैसे भी सरकार पर कम दबाव नहीं थे। जयललिता ने भी अपने होने का अहसास केंद्र सरकार को करा ही दिया। जयललिता की गुगली ने ही केंद्र सरकार को सक्रिय किया। कांग्रेस ने अपनी बॉल करुणानिधि के पाले में डालकर यह समझ रही है कि उसने अपने कर्तव्य पूरा किया। करुणानिधि को मनाने के लिए कांग्रेस को खासी मशक्कत करनी पड़ी। सत्ता को बचाए रखने के लिए आखिर क्या-क्या करना पड़ता है, यह इस मामले में साफ देखा जा सकता है। ए. राजा ने जो कुछ किया, उससे कांग्रेस किसी भी रूप में अलग नहीं हो सकती। राजा ने जिस तरह से बेखौफ होकर पूरा घोटाला किया, उसके लिए कांग्रेस को आज नहीं तो कल जवाब देना ही होगा।
सवाल यह उठता है कि पिछले साल जब संसद में पूरे सुबूत के साथ ए. राजा के खिलाफ आरोप लगाए गए थे, तब भी सरकार सचेत नहीं हुई। आखिर इसका क्या कारण है? फिर अब सरकार कह रही है कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच का सवाल ही नहीं उठता। आखिर सराकर कर क्या रही है? एक के बाद एक घोटाले होते रहे, सरकार का धन रसूखदारों की जेब में जाता रहे, समर्थन के नाम पर जो चाहें कर लें, ऐसा केवल भारतीय राजनीति में ही हो सकता है। इस पूरे मामले में सरकार की नीयत साफ दिखाई नहीं दे रही है। अगर वह सचमुच भ्रष्टाचार को दूर करना चाहती है, तो उसे स्वयं से पहल करनी होगी। पूरे स्पेक्ट्रम आवंटन को ही रद्द कर दिया जाना चाहिए। फिर से निविदा बुलाई जानी चाहिए। इससे सरकार की छवि साफ ही होगी।
आखिर ए. राजा को करुणानिधि इतना अधिक प्रेम क्यों करते हैं? 1,76,000 करोड़ का घोटाला कोई छोटी-सी बात नहीं है। टेलीकॉम घोटाले में ए. राजा की मिलीभगत के मामले में जब ‘केग’ की रिपोर्ट आई,उसके पहले सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में ढिलाई बरतने के कारण सीबीआई को लताड़ा था। उधर कांग्रेस ने आदर्श सोसायटी के मामले में बिना किसी जाँच रिपोर्ट की प्रतीक्षा किए बिना उससे इस्तीफा ले लिया, पर इस मामले में कांग्रेस ने इतना विलम्ब क्यों किया? यह एक शोध का विषय हो सकता है। ए. राजा के बारे में यह कहा जाता है कि वे तमिलनाड़ में डीएमके के दलित चेहरे हैं। अगले साल तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने हैं। उसमें राजा के कारण काफी वोट मिल सकते हैं। ऐसे में उनसे इस्तीफा ले लेने से करुणानिधि को एक झटका ही लगा है। उधर जयललिता और करुणानिधि की दुश्मनी जगजाहिर है। दोनों ही परस्पर नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। इस बार जयललिता ने स्पष्ट कह दिया कि यदि करुणानिधि केंद्र से अपना समर्थन वापस ले लेते हैं, तो वे अपना समर्थन देने को तैयार है। ज्ञातव्य है कि दोनों के पास ही 18-18 सांसद हैं।
ए. राजा ने जिस तरह से एक मंत्री के नाते अरबों रुपए का घोटाला किया, उससे स्पष्ट है कि यह राशि उन्होंने अकेले नहीं डकारी। इसे सभी स्वीकारते हैं। तमिलनाडु में तो करुणानिधि के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता, तो फिर यह राजा अकेले इतनी बड़ी राशि हजम कर ही नहीं सकते। पहली बार जब यूपीए ने दिल्ली में सरकार बनाई, तब दूरसंचार विभाग दयानिधि मारन को दिया गया था। बाद में दयानिधि की करुणानिधि में नहीं बनी, इसलिए यह पद ए. राजा को दिया गया। इसके बाद ए. राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी धांधली करते हुए एक चालाकी यह की कि इससे संबंधित कुछ फाइलंे प्रधानमंत्री के पास भेज दीं। यही फाइलें ही कांग्रेस की चिंता का कारण हंै।
जब यह टेलीफोन कांड हुआ, तब केंद्र में यूपीए 1 की सरकार थी। इसमें ए. राजा दूरसंचार मंत्री थे। इसके बाद पिछले वर्ष ही चुनाव हुए और यूपीए 2 की सरकार बनी। इस समय यह चर्चा थी कि ए. राजा को दूरसंचार मंत्री का पद नहीं दिया जाएगा। किंतु करुणानिधि ने जिद की कि राजा को ही दूरसंचार मंत्रालय दिया जाए। प्रधानमंत्री ने सरकार को बनाए रखने के लिए आखिर करुणानिधि की जिद पूरी कर दी। इस पूरे घोटाले पर अंतिम कील ठोकने का काम किया, केग की रिपोर्ट ने। रिपोर्ट में कुल सात मामलों में ए. राजा को दोषी ठहराया गया। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि सन् 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में जो भाव तय किए गए, वे सन् 2001 में प्रवर्तमान भावों के आधार पर किए गए। इस कारण सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह राशि दिल्ली और तमिलनाडु के रसूखदारों में बँट गई। केग के अनुसार 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में वित्त मंत्रालय और कानून मंत्रालय द्वारा ए. राजा को जो सलाह दी, उसकी पूरी तरह से अवहेलना की गई। यही नहीं दूसरसंचार विभाग ने इस संबंध में जो अपने नियम-कायदे बनाए थे, उसे भी भंग किया गया। 2 जी स्पेक्ट्रम के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख दूरसंचार विभाग द्वारा तय की गई थी। इस तारीख में कुछ विशेष लोगों को लाभ दिलाने के लिए फेरफार किया गया। इस संबंध में जो आवेदन पहले प्राप्त हुआ है, उसे पहले आवंटन करने के नियम को भी भंग किया गया है। इस कारण बाद में जिन्होंने आवेदन किए, उन्हें काफी फायदा हुआ। इस आवंटन में पारदर्शिता का पूरी तरह से अभाव था। साथ ही इसके लिए केबिनेट की मंजूरी लेना भी आवश्यक नहीं समझा गया।
एक नजर ए. राजा के व्यक्तित्व की एक झलक
48 वर्ष के ए. राजा कुछ समय पहले तक तमिलनाडु के एक गाँव में वकालत करते थे। दलित होना उनके लिए फायदेमंद रहा। धीरे-धीरे वे आगे बढ़ते रहे। पहले राज्य की राजनीति में सक्रिय हुए। फिर केंद्र की राजनीति में आए। इस दौरान उनकी छवि भ्रष्ट राजनीतिज्ञ की हो गई। कुछ समय पहले ही उन्होंने चेन्नई में हाईकोर्ट जज को फोन करके यह आदेश दिया कि एक मामले में उनके परिचित के पक्ष में फैसला दिया जाए।
डॉ. महेश परिमल

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