शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...चले गए मन्ना दा

डॉ. महेश परिमल
मन्ना दा नहीं रहे। यह हृदयविदारक समाचार था, उन संगीत प्रेमियों के लिए, जिनके कानों में मन्ना दा के गीतों ने पहली बार सुर के प्रति प्रेम और विश्वास जगाया। मन्ना दा, जिनके गीतों को बचपन से सुना, गुना और गाया। कठिन से कठिन और सहज से सहज गीत उनके ही कंठ से फूटे हैं। गीत कैसे भी हों, मन्ना दा के लिए कभी कठिन नहीं रहे। शास्त्रीय संगीत से लेकर रोमांटिक गीत तक का सफर बहुत लम्बा है। मन्ना दा की सबसे बड़ी यही विशेषता है कि वे इतने सहज होते थे कि पूछो ही मत। स्वयं को कभी बहुत महान गायक न मानने वाले मन्ना दा अपने आप में मस्त रहने वाले महान गायक थे। उनके जाने का मतलब है, संगीत के एक युग का दौर का खत्म होना। कम नहीं होती साढ़े 93 साल की उम्र। अभी एक मई को ही उन्होंने अपना 93 वां जन्म दिन मनाया। वे तो चले गए हैं, पर उनके गीत हम सबसे कभी जुदा नहीं होंगे। फिल्मों के लिए गाये जाने वाले गीतों की अपेक्षा उनके गैर फिल्मी गीत भी बहुत ही लोकप्रिय हुए। फिर चाहे वे गीत मयूरपंखी के हों, या फिर ताजमहल पर। आवाज में एक सोज, गंभीरता और महमूद जैसे कलाकारों के लिए अपनी आवाज में हास्य का पुट लाना मन्ना दा के ही बस की बात थी।
मन्ना दा कभी विवादास्पद नहीं रहे। न तो उन्होंने कभी ऐसा बयान दिया, न ही कभी किसी की आलोचना की, न कभी गुटबाजी की और न ही कभी कुछ ऐसा किया, जिस पर ऊंगली उठाई जाए।
मन्ना दा के बारे में बहुत से संस्मरण मिल जाएंगे, पर उन्होंने स्वयं के बारे में जो कहा, उनसे से एक यह है कि जब वे कॉलेज में पढ़ रहे थे, तब सभी संगीत की सभी स्पर्धाओं में भाग लेते थे, हर स्पर्धा में उन्हें पहला स्थान प्राप्त होता था। इससे अन्य प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को अवसर नहीं मिल पाता था, आखिर में एक ऐसा निर्णय लिया गया, जिससे वे बाद में कभी किसी स्पर्धा में हिस्सा न ले सकें। एक बार एक स्पर्धा में हिस्स लेने के बाद जब वे अव्वल आए, तो उन्हें एक सितार देकर यह कहा गया कि अब आप किसी स्पर्धा में भाग नहीं लेंगे। कॉलेज प्रबंधन के इस निर्णय को उन्होंने बड़ी सहजता से स्वीकार किया और फिर कभी किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। इतने सहज थे मन्ना दा। जब उन्हें एक दक्षिण भारतीय युवती सुलोचना से शादी करनी थी, तब वे बड़े पसोपेश में थे। घर में कैसे बताएं। घर के सभी बड़े परंपरावादी। अगर बुरा मान गए तो, इसलिए उन्होंने सुलोचना को सीधे अपने चाचा के सामने खड़ा कर दिया और कहा कि यह सुलोचना है, दक्षिण भारतीय, लेकिन रवींद्र संगीत जानती हैं, गाती भी हैं, मैं इससे शादी करना चाहता हूं। बस फिर क्या था, उन्हें शादी की अनुमति मिल गई।
एक बार शंकर साहब ने उन्हें  भीमसेन जोशी के साथ गाने के लिए कहा। गाने के साथ शर्त यह थी कि उन्हें जोशी जी को हराना भी था। उस समय संगीत की दुनिया में भीमसेन जोशी का बहुत नाम था। मन्ना दा स्वयं को बहुत ही छोटा गायक मानते थे। इसलिए अपना डर छिपाने के लिए उन्होंने पत्नी से कहा कि चलो कुछ दिन के लिए कहीं घूम आते हैं। पत्नी हैरान, आखिर इन्हें हो क्या गया? ऐसे तो कभी जाते नहीं हैं। आज अचानक ये क्या कह रहे हैं। तब पत्नी ने पूछा कि सच-सच बताओ, आखिर हुआ क्या है? तब मन्ना दा ने अपनी परेशानी बताई। पत्नी ने उनकी परेशानी को समझा और चलने के लिए राजी हो गई। वे करीब एक सप्ताह तक पूना में रहे। ताकि शंकर साहब किसी और से गवा लें। लेकिन नौशाद साहब भी कम न थे, उन्होंने सोच लिया सो सोच लिया। मन्ना दा जब पूना से लौटे, तो नौशाद साहब फिर हाजिर। आखिर उन्हें शंकर साहब का कहना मानना पड़ा। ये थी उनकी सहजता।
मन्ना दा के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना दा के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना दा की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा यह कौन गा रहा है। जब मन्ना दा को बुलाया गया तो उन्होंने अपने उस्ताद से कहा,0 बस ऐसे ही गा लेता हूं। लेकिन बादल खान ने मन्ना दा की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना दा 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। 1943 में फिल्म तमन्ना. में बतौर प्लेबैक सिंगर उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस के रुप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था।
मन्ना दा के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि मन्ना दा हर वह गीत गा सकते हैं, जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाये हों, लेकिन इनमें से कोई भी मन्ना दा के हर गीत को नहीं गा सकता है। इसी तरह आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने एक बार कहा था, आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना दा के गीतों को ही सुनता हूं। मन्ना दा केवल शब्दो को ही नहीं गाते थे, अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये मन्ना दा का चयन किया। साल 1961 मे संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में फिल्म काबुलीवाला की सफलता के बाद मन्ना दा शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। फिल्म काबुलीवाला में मन्ना दा की आवाज में प्रेम धवन रचित यह गीत, ए मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। प्राण के लिए उन्होंने फिल्म उपकार में कस्मे वादे प्यार वफा और जंजीर में यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म पड़ोसन मे हास्य अभिनेता महमूद के लिए एक चतुर नार बड़ी होशियार गीत गाया तो उन्हें महमूद की आवाज समझा जाने लगा।
उन्होने ऐ मेरे प्यारे वतन, ओ मेरी जोहरा जबीं, ये रात भीगी-भीगी, ना तो कारवां की तलाश है और ए भाई जरा देख के चलो जैसे गीत गाकर अपने आलोचको का मुंह बंद कर दिया।
प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन ने मन्ना दा के बारे में कहा था मन्ना दा हर रेंज में गीत गाने में सक्षम हैं। जब वह ऊंचा सुर लगाते हैं, तो ऐसा लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है। जब वह नीचा सुर लगाते हैं तो लगता है उसमे पाताल जितनी गहराई है। और अगर वह मध्यम सुर लगाते हैं तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है। मन्ना दा को फिल्मों मे उल्लेखनीय योगदान के लिए 1971 में पदमश्री पुरस्कार और 2005 में पदमभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वह 1969 में फिल्म मेरे हुजूर के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक, 1971 मे बंगला फिल्म निशि पदमा के लिये सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किए गए। मन्ना दा के संगीत के सुरीले सफर में एक नया अध्याय जुड़ गया जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए साल 2009 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
सभी संगीत प्रेमियों की ओर से उन्‍हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

फेलिन से जीते, मंदिरों से हारे

डॉ. महेश परिमल
हाल में देश में हुई दो त्रासद घटनाओं से प्रबंधन की बात सामने आई है। एक तरफ समुद्री तटों पर फेलिन आया, लेकिन कुशल प्रबंधन के कारण अधिक क्षति नहीं कर पाया, तो दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के दतिया के रतनगढ़ मंदिर के पास हुई भगदड़ 120 मौतें दे गई। एक तरफ कुशल प्रबंधन और दूसरी तरफ प्रबंधन के नाम पर शून्य। एक तरफ प्रकृति हार मान गई, तो दूसरी तरफ मानवसर्जित त्रासदी कई मौतें दे गई। इससे हमें प्रबंधन का सबक तो लिया ही जाना चाहिए। आखिर क्या कारण है कि लोग मंदिरों में इतनी बड़ी संख्या में आते हैं, पर कुशल प्रबंधन न होने के कारण भगदड़ का शिकार होते हैं। हमारे देश में ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है कि मंदिरों में होने वाली भगदड़ में लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं। सैंकड़ों मौतें देने वाली भगदड़ से सरकार ने अभी तक कोई सबक नहीं सीखा, इसलिए आवश्यक है कि मंदिरों के लिए भी विशेष टास्क फोर्स तैयार किया जाए, ताकि इस तरह से होने वाली जन हानि से बचा जा सके। कलेक्टर, एसपी को सस्पेंड करने से कुछ नहीं होने वाला। मूल कारण की ओर जाना होगा। होना तो यह चाहिए कि सरकार पर दोष मढ़ने के पहले मंदिरों के संचालकों पर कार्रवाई होनी चाहिए। इतने श्रद्धालुओं का आगमन होगा, यह जानने के बाद भी उनका कोई कुशल प्रबंधन दिखाई नहीं दिया। कई देशों से हज यात्री लाखों की संख्या में हज के लिए जाते हैं, पर वहां की व्यवस्था देखने लायक होती है। इससे भी हमें सबक लेना चाहिए। मंदिरों में होने वाली भगदड़ मानवसर्जित भूल है। लोगों की धार्मिक संवेदनाओं के साथ धोखा न हो, पर मंदिरों को भीड़ प्रबंधन का पाठ तो पढ़ाया ही जाना चाहिए।
फेलिन ने 220 किलामीटर की रफ्तार से अपनी आमद दी, पर वह मानव संहार करने में विफल रहा। क्योंकि मानवों को बचाने की प्रणाली सतर्क थी। अचल सम्पत्ति को तो हटाया नहीं जा सकता था, पर तूफान की चपेट में आने वाले लोगों को तेजी से हटाने में सरकार ने स्फूर्ति दिखाई। मानव संहार के लिए तैयार होकर आने वाला तूफान भले ही अरबों का नुकसान कर गया हो, पर अधिक मौतें देने में विफल रहा। केवल 23 मौतें ही दे गया। यह मौतें भी पेड़ों के गिरने से हुई। यदि सरकार ने समय रहते लोगों को दूसरे सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास नहीं किया गया होता, तो इससे अधिक जनहानि हुई होती। इस बार हमारा मौसम विभाग सही भविष्यवाणी करने और उसे समझने में कामयाब रहा। लोग हमेशा मौसम विभाग को उसकी भविष्यवाणी को लेकर मजाक उड़ाते रहे हैं, पर इस बार उसने यह बता दिया कि जिसे लोग हमेशा गलत मानते आए थे, वह अमेरिकी मौसम विभाग से भी चुस्त रहा। अमेरिकी मौसम विज्ञानियों ने इसे तो भीषण मानव संहारक बताया था। पर ऐसा नहीं हो पाया। हमारे वैज्ञानिकों ने फेलिन का व्यूहात्मक तरीके से सामना किया। दूसरी ओर मंदिरों में होने वाली धक्का-मुक्की के पीछे विभिन्न दर्शन जिम्मेदार हैं। गुजरात के सौराष्ट्र के धोराजी के एक मंदिर में छप्पनभोग के दर्शन के समय 9 महिलाएं कुचल गईं थी, इसी तरह यात्राधाम डाकोर की बात की जाए, तो वहां भीड़ प्रबंधन के प्रदर्शन हुआ था। वास्तव में मंदिरों में भीड़ इसलिए बढ़ जाती है कि मंदिरों में विभिन्न दर्शनों के लिए तैयारी की जाती है, उस दौरान मंदिर में भक्तों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। इधर तैयारी होते रहती है,उधर भीड़ बढ़ती रहती हे। मंदिरों में भगवान का श्रंगार, राजभोग आदि के लिए मंदिर के दर्शन बंद कर दिए जाते हैं। दर्शन के लिए जब मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, तब भक्ताों की भीड़ बढ़ जाती है। एक तो दर्शन के लिए की जा रही प्रतीक्षा, दूसरी बात है आतुरता, बस इसी कारण भीड़ बेकाबू हो जाती है।
अब दीवाली करीब है, इस दौरान धार्मिक यात्राओं और मेलों का आयोजन होगा। छप्पनभाग, मुकुट के दर्शन और श्रंगार के दर्शन, मंगला आरती के लिए भक्तों की धक्का-मुक्की हो सकती है, इसलिए अभी से इस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। होना तो यह चाहिए कि जिन मंदिरों में संचालकों की लापरवाही से भीड़ पर काबू नहीं पाया जा सकता है और कुछ अनहोनी होती है, तो संचालकों और ट्रस्टियों को सीखचों के पीछे धकेल देना चाहिए। यह तर्क इसलिए दिया जा रहा है कि जब आर्थिक मैनेजमेंट में विफल हो जाता है, तब को-ऑपरेटिव्ह बैंकों के डायरेक्टरों को जेल भेजा जाता है, तो फिर मंदिरों में भीड़ मैनेजमेंट में विफल होने वाले संचालकों और ट्रस्टियों को जेल क्यों नहीं भेजा जा सकता। ठंडे कमरों में बैठकर मंदिर के संचालक-ट्रस्टी भक्तों से मिली दक्षिणा या दान की राशि देखकर खुश होते हैं, पर अपने ही मंदिर में भीड़ का प्रबंधन न होने के कारण लोगों की जान जा रही है, इस पर वे शायद ही कभी ध्यान देते हैं। दूसरी ओर हमारी पुलिस के पास भीड़ से निपटने के लिए कोई खास मैनेजमेंट नहीं है। इसलिए वह यहां भी अपना डंडा राज चलाना चाहती है, रतनगढ़ में यही हुआ? पुलिस द्वारा लाठीचार्ज के बाद ही हालात बेकाबू हुए।
जिस तरह से फेलिन के लिए विशेष टास्क फोर्स तैयार की गई थी, ठीक उसी तरह मंदिरों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए। फेलिन के लिए जिस विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया था, उसके नीचे पुलिस तंत्र था। इसी तरह मंदिरों के लिए तैयार किए जाने वाले विशेष टास्क फोर्स में महिलाओं की भी भर्ती की जानी चाहिए। क्योंकि मंदिरों में महिलाओं में ही अधिक धक्का-मुक्की होती है। हर मंदिर में उत्सव तो तय होते हैं, उनका दिन भी तय होता है, इन दिनों के लिए तैयार किए जाने वाले विशेष टास्क फोर्स से काम लिया जाए, तो हालात कभी बेकाबू न हों। मंदिरों में होने वाली भीड़ और धक्का-मुक्की से कई लोग दूर रहते हैं। डाकोर जैसे प्रसिद्ध मंदिर में वृद्ध लोग नहीं जा पाते। मंदिरों की भीड़ में हमेशा निर्दोष जनता कुचली जाती है। यदि संचालक मंदिरों का मैनेजमेंट नहीं कर पाते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। मंदिरों में होने वाली भगदड़ से होने वाली मौतों को लोग ‘भगवान की इच्छा’ बताकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। इस धारणा को झुठलाने का समय आ गया है। फेलिन के खिलाफ मानव समुदाय ने जिस तरह से जाग्रत होकर उसका मुकाबला किया, उसी तरह धार्मिक स्थलों के लिए भी इस तरह की व्यवस्था की आवश्यकता है। हज यात्रा से भी हमें सबक लेना चाहिए, वहां भी लाखों लोग पहुंचते हैं, पर मजाल है किसी को किसी तरह की आंच भी आ जाए। बहुत ही कम ऐसा हुआ है।
इन भगदड़ों में यही बात नजर आई कि जब कहीं हजारों-लाखों लोग जमा होते हैं, तो वहाँ पर मोब साइकोलॉजी काम करती है। विवेक काम नहीं करता। अनुशासन किसी काम का नहीं रह जाता। इंसान अपने होश-हवाश खो बैठता है। दूसरों की चिंता बिलकुल ही नहीं करता। भीड़ निर्भय हो जाती है। प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में गरीब जिस तरह से भगदड़ के शिकार हुए, उसके पीछे का भाव लालच और भय था। हरिद्वार में जो कुछ हुआ, उसके पीछे स्वार्थ और आतुरता थी। दुनिया के धार्मिक स्थल परोपकार करने का आदेश देते हैं और दूसरों की चिंता करना सिखाते हैं। किंतु इंसान भीड़ का हिस्सा बनते ही सब कुछ भूल जाता है। धार्मिक स्थलों पर आकर यदि लोग अपने साथ-साथ दूसरों की भी चिंता करने लगे, तो ऐसी दुर्घटनाओं पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। भीड़ को काबू करना मुश्किल है। पर कोई एक आवाज तो ऐसी होनी चाहिए, जिसे सुनकर लोग होश में आ जाएँ। भीड़ को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, पर उसे बेकाबू करने के लिए एक छोटी सी अफवाह ही काफी है।
    डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

हारे हुए घोड़ों पर दांव लगाने वाले प्रेम वत्स

डॉ. महेश परिमल
कुछ लोगों की आदत होती है कि हारे हुए घोड़ों पर दाँव लगाया जाए। इसे यदि दूसरे शब्दों में इस तरह से कहा जा सकता है कि जो कंपनियां घाटे में चल रही हों, उसे मुनाफा देने वाली कंपनी किस तरह से बनाया जाए। कुछ इस तरह की प्रवृत्ति के मालिक हैं प्रेम वत्स। इन्हें कनाडा का वॉरेन बफेट कहा जाता है। हमें गर्व होना चाहिए कि वत्स मूल रूप से भारतीय हैं,उनका जन्म हैदराबाद में हुआ था। वह भी आम भारतीयों की तरह एक सामान्य रूप से किसी अधिकारी के पद पर ही पहुंच पाते, यदि ट्रेन में सफर करते हुए एक सहयात्री की सलाह न मानी होती।  तब उनकी उम्र 21 वर्ष थी। चेन्नई की आईआईटी से केमिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे हताश हो गए थे। जैसी नौकरी वे चाहते थे, वैसी मिल नहीं रही थी। एक बार जब वे ट्रेन में चेन्नई से हैदराबाद जा रहे थे, तब उनसे एक यात्री ने पूछा कि क्या आपने नेपोलियन की ‘थिंकएंड ग्रो रिच’ ढ़ी है, तब प्रेम ने जवाब दिया कि नहीं, उन्होंने इस किताब को नहीं पढ़ा है। तब यात्री ने उनसे इस किताब  को पढ़ने की सलाह दी। प्रेम वत्स कहते हैं कि इस एक किताब ने उनके जीवन मोड़ नया मोड़ ला दिया। किताब पढ़ने के बाद उन्हें सफलता का स्वाद चखना शुरू कर दिया। उन्हें खयाल आया कि उनकी दिलचस्पी बिजनेस एवं फाइनांस में है, पर वे बन गए हैं केमिकल इंजीनियर। तब उनके भाई कनाडा में थे। 1972 में वे भारत छोड़कर अपने भाई के पास कनाडा चले गए। कनाडा पहुंचकर उन्होंने जिस तरह से प्रगति की, उससे उन्हें वहां का वॉरने बफेट कहा जाने लगा। आखिर क्या है ऐसा प्रेम वत्स में, जो उन्हें भीड़ से अलग करता है।
ब्लेकबेरी जैसी डूबती कंपनी को खरीदने का निश्चय प्रेम वत्स ने किया है। यह पहली कंपनी नहीं है, जो डूब रही है और जिसे प्रेम वत्स ने खरीदा हो। इस तरह का पराक्रम वे पहले भी कर चुके हैं। ब्लेकबेरी उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे वे निश्चित रूप से स्वीकार तो कर ही चुके हैं, साथ ही वे इससे यह बताने कीे कोशिश करेंगे कि वे असंभव को संभव बनाने में विश्वास रखते हैं। कनाडा पहुंचकर उन्होंने वहां की वेस्टर्न ओंटेरियो यूनिवर्सिटी से एमबीए किया। 1974 में उन्होंने कांफेडरेशन लाइफ नामक एक बीमा कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन किया। इस नौकरी के लिए प्रेम वत्स के अलावा तीन और लोगों को भी बुलाया गया था। उन तीनों के न आने के कारण वह नौकरी उन्हें मिल गई। दस वर्ष तक वे कांफेडरेशन लाइफ कंपनी में पोर्टफोलियो मेनेजमेंट का कीमती अनुभव प्राप्त कर 1985 में उन्होंने हेम्बलिन वत्स इनवेस्टमेंट कौंसिल ’ नामक कंपनी शुरू की। इसके बाद उन्होंने अपने विचारों को अमलीजामा पहनाने का काम शुरू किया। यानी हारे हुए घोड़ो पर बाजी लगाने का काम। 1985 में उन्होंने मार्केल फाइनेंशियल नाम एक बीमार कंपनी को खरीद लिया। इस कंपनी पर नए सिरे से निवेश कर उसे पुनर्जीवित कर दिखाया। 1987 में इस कंपनी में कुछ बदलाव कर उसे नए नाम से स्थापित किया। उसका नाम रखा फेरफेक्स। आज की तारीख में यह कंपनी 31 अरब डॉलर की है। प्रेम वत्स के पास फेरफेक्स के दस प्रतिशत शेयर हैं। इनके शेयरों की कीमत पिछले दो दशकों से वार्षिक 21 प्रतिशत की वृद्धि देखने में आई है। प्रेम वत्स को कनाडा का वॉरेन बफेट इसीलि कहते हैं कि वे जिस कंपनी के शेयरों के भाव फंडामेंटल से कम होते, उसे वे खरीद लेते, ऐसा वॉरेन बफेट भी किया करते थे। बफेट की तरह इन्होंने भ अपनी कंपनी की बुनियाद इंश्योरेंस कंपनी के रूप में तैयार की। अब तक उन्होंने कई बीमार कंपनियों को खरीदकर उसे मुनाफा कमाने वाली कंपनी बना दिया है। 2008 तक फेरफेक्स कनाडा की सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाली कंपनी बना दिया था।
घाटे में चल रही ब्लेकबेरी कंपनी को खरीदकर उसे मुनाफा कमाने वाली कंपनी बनाना प्रेम वत्स के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है। 2010 में ब्लेकबेरी के शेयरों के भाव 50 डॉलर थे, तब फेरफेक्स ने उनके शेयरों को खरीदने की शुरुआत की। आज फेरफेक्स के पास ब्लेकबेरी के दस प्रतिशत शेयर हैं। फेरफेक्स ने ब्लेकबेरी के शेयरों को 9 डॉलर के भाव से खरीदने का ऑफर दिया है। फेरफेक्स ने अब तक कंपनियों के पोर्टफोलियो में ही दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन अब वह ब्लेकबेरी के संचालन की गहराई में उतरने की चाहत रखती है। आज ब्लेकबेरी भले ही घाटे में चल रही हो। किंतु उसका नाम है, उसकी ब्रांड वेल्यू जोरदार है। दुनिया में करीब 659 मोबाइल ऑपरेटर उसके लिए काम कर रहे हैं। उसकी सिक्योरिटी सिस्टम बेमिसाल है। उसके 7.6 करोड़ ग्राहक हैं। फाचरुन 500 कंपनियों के जो एक्जिक्यूटिव्स हैं, उसके 90 प्रतिशत ग्राहक ब्लेकबेरी का इस्तेमाल करते हैं। कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका की सरकार भी ब्लेकबेरी का ही इस्तेमाल करती है। उसके पास बेशुमार पेटेंट हें। इसमें नई ऑपरेटिंग सिस्टम का भी समावेश होता है। उसके पास 2.9 अरब डॉलर की राशि नकद है। इन सभी गणनाओं का गहराई से अध्ययन कर प्रेम वत्स ने इस कंपनी को खरीदने का निश्चय किया है।
इसके पहले प्रेम वत्स ने लाभ न कमाने वाली बीमा कंपनियों को ही खरीदते थे। अब उन्होंने मोबाइल कंपनियों के अलावा, गुड्स कंपनी, रेस्तरां चेन, वेडिंग गिफ्ट कंपनी और अखबार की कंपनियों को भी खरीदना शुरू कर दिया है हाल ही में उन्होंने भारत में फेरब्रिज केपिटल नामक कंपनी की स्थापना कर थॉमस फुड इंडिया का अधिकांश हिस्सा खरीद लिया है। अब उन्होंने मुश्किलभरे हालात में चल रही कंपनियों के शेयरों को भी खरीदना शुरू कर दिया है। ब्लेकबेरी जैसी डूबती कंपनी को 4.7 अरब डॉलर में खरीदने का साहस रखने वाले प्रेम वत्स को हारे हुए घोड़ों पर दांव लगाकर उसे जीताने का काफी शौक है। इस अच्छा खासा अनुभव भी रखते हैं वे। ब्लेकबेरी ने अभी एक पखवाड़े पहले ही यह घोषणा की थी कि उसे तीन महीने में एक अरब डॉलर का घाटा हुआ है। इससे उबरने के लिए उसे अपने 40 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी करनी होगी। ्र40 प्रतिशत यानी साढ़े चार हजार कर्मचारी। एक नामी कंपनी के इतने सारे कर्मचारी एक साथ बेरोजगार हो जाएं, तो इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा। प्रेम वत्स ने जो चुनौती स्वीकारी है, ऐसा बहुत कम लोग कर पाते हैं। हमें गर्व होना चाहिए कि वे भारतीय हैं। जिन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा विदेश में मनवाया। जिस कंपनी का मोबाइल अमेरिकी राष्ट्रपति भी इस्तेमाल करते हो, जिस कंपनी का मोबाइल रखकर लोग स्वयं को भीड़ से अलग मानते हों, वही कंपनी आज दिवालियेपन के कगार पर है, उसे उबारने में लगे हैं भारतीय प्रेम वत्स। ऐसे लोगों की सहायता हालात भी करते हैं, ऐसा कहा जा सकता है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

कांग्रेस के हाथ से फिसलता आंध्र

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
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कांग्रेस के हाथ से फिसलता आंध्र
डॉ. महेश परिमल
सीमांध्र में अंधेरा छाया हुआ है। चारों तरफ अराजकता का माहौल है। हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। गृहमंत्री भले ही कहें कि आंध्र में राष्ट्रपति शासन की कोई योजना नहीं है। पर सच यह है कि आंध्र में बहुत ही जल्द राष्ट्रपति शासन लग सकता है। हालात को बेकाबू बनाने में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और जगन रेड्डी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके उपवास ने स्थिति को बिगाड़ा। इसकी पूरी आशंका है कि आंदोलन अभी और जोर पकड़ेगा। कई नए विवादों से जूझने की अपेक्षा सही यही होगा कि राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए,यही एकमात्र विकल्प भी है। वजह साफ है कि यह आंदोलन हिंसक दिशा में जा रहा है। लोग अंधेरे से वैसे ही त्रस्त हैं, उस पर स्थानीय नेताओं के भाषण यही दर्शा रहे हैं कि इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए हर कोई तत्पर है। हर दल वहां हीरो बनने में लगा है। उधर कांग्रेस अभी तक यही जताती रही है कि वह निर्णय लेने में दृढ़ है, इसलिए उसने तेलंगाना पर सही समय पर सही निर्णय लिया है। दूसरी ओर मुलायम का राग बदलते ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की योजना बना रही है। वह मायावती के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश को विभाजित करना चाहती है ताकि उसका राजनैतिक लाभ उठाया जा सके।
इस संबंध में चंद्रबाबू नायडू दो नावों पर सवार होकर अपना खेल खेल रहे हैं। एक तरफ वे भाजपा से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ जगमोहन रेड्डी भी कांग्रेस की टीका करते हैं और नरेंद्र मोदी की प्रशंसा। इन दोनों की नजर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। कांग्रेस ने मामले को उलझा दिया है। यही आंध्र प्रदेश कभी कांग्रेस का गए़ था। आज वहां तेलुगु देशम, वायएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति और भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया है। शासन भले ही कांग्रेस का हो, मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी की भूमिका उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। वहां केंद्र के कांग्रेसी नेताओं का दबदबा है, जो इस स्थिति में भी अपनी रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह प्रदेश अब आंदोलनों का प्रदेश बन गया है। यहां के लोग आक्रामक हैं, इसलिए उन्होंने कांग्रेस की नींद हराम कर रखी है। तेलंगाना का मामला कांग्रेस के लिए बूमरेंग साबित हुआ है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति आ बैल मुझे मार, जैसी है। हम सारे निर्णय समय पर लेते हैं, इस तरह का संदेश देने वाली कांग्रेस भी तेलंगाना मामले पर सही समय पर सही निर्णय लिया गया है, यह बताना चाहती है। पर सभी जानते हैं कि कांग्रेस के निर्णय सदैव राजनीति से प्रेरित रहे हैं। आंध्र की समस्याओं के निराकरण में कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई है। यह स्पष्ट हो गया है। तेलंगाना के मुद्दे पर राजनैतिक रोटियां सेंकी जा रही है। इसकी गर्मी वहां की प्रजा महसूस कर रही है। अब यह मामला ऐसा भी नहीं रहा, जिसका दो चार दिनों में ही निकाल लिया जाए। एक तरफ केंद्र सरकार दृढ़ है, तो दूसरी तरफ आंदोलनकारी भी स्वयं को मजबूत बता रहे हैं। दोनों में से कोई हारना ही नहीं चाहता।
आंध्र में कांग्रेस के नेताओं का अहम काम कर रहा है, दूसरी ओर आंदोलन करने वाले प्रादेशिक नेताओं की नीयत खराब है। वाय एस आर कांग्रेस के जगमोहन रेड्डी और तेलुगुदेशम के चंद्रबाबू नायडू ने आमरण उपवास रखकर केंद्र सरकार को उलझन में डाल दिया है। ये दोनों ही अपने आप में कट्टर दुश्मन हैं, पर तेलंगाना के मुद्दे पर एक हो गए हैं। ऐसा लग रहा है। पर कांग्रेस की हालत बहुत ही खराब है। यह तय है। पहले यह माना जा रहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव के पहले तेलंगाना पर निर्णय लिया जाएगा। पर अब उत्तर प्रदेश के विभाजन की सुगबुगाहट है। कांग्रेस की नजर उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर है।वह मायावती के साथ मिलकर अधिक से अधिक सीटों पर कब्जा करना चाहती है। इससे कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि सरकार सही समय पर सही निर्णय लेना जानती है। इस समय आंध्र की सारी बिजली इकाइयां ठप्प पड़ी हुई हैं। उत्पादन न के बराबर है। सीमावर्ती क्षेत्र अंधेरे में डूबे हैं। दक्षिण की इस ग्रिड पर उत्पादन प्रभावित होने से तमिलनाड़ु, केरल और कर्नाटक की बिजली आपूर्ति प्रभावित होगी।
आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 सीटें हैं। तो उत्तर प्रदेश में 80। आंध्र को विभाजित करने के लिए विधेयक राज्य विधानसभा से कभी पारित नहीं हो पाया। पर उत्तर प्रदेश विधानसभा में सन् 2011 में मायावती के शासनकाल में सर्वसम्मति से पारित हो गया था। बाद में केंद्र को भी भेजा गया। इस समय कांग्रेस उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की जुगत में दिखाई दे रही है। राजनैतिक समीक्षक मानते हैं कि ऐसा करके कांग्रेस मायावती को अपने करीब लाना चाहती है। जब से मुलायम सिंह ने तीसरा मोर्चा पर बयान देना शुरू कर दिया है, तब से कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश के विभाजन की बात करने लगी है। कुछ भी हो पर सच तो यह है कि आंध्र का गुस्सा आसमान पर है। वहां के लोगों ने यह समझ लिया है कि हमें ठगा गया है। हमसे फरेब किया गया है। आंध्र समस्या का समाधान क्या होगा, यह सरकार का सोचने का काम है। पर हालात बता रहे हैं कि वहां राष्ट्रपति शासन ही अब एकमात्र विकल्प रह गया है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

बहुत कुछ कहती है अनुभवी चेहरे की झुर्रियॉं




दैनिक दबंग दुनिया में आज प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 28 सितंबर 2013

हाशिए पर जाते झुर्रीदार चेहरे

आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 25 सितंबर 2013

सर उठा रहा है आतंकवाद

डॉ. महेश परिमल
आतंकवाद आज हर देश की बड़ी समस्या बन गया है। इस पर नियंत्रण के सारे प्रयास विफल सिद्ध हो रहे हैं। हाल ही में पेशावर और नैरोबी में हुई घटनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि आतंकवाद से मुकाबले के लिए अब सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। एक संयुक्त मुहिम के तहत ही इस पर काबू पाया जा सकता है। पेशावर और नैरोबी की घटना से पूरा विश्व चौंक उठा है। आतंकवाद के निशाने पर अब कौन सा देश है? सभी तरफ से यह सवाल दागा जा रहा है। नैरोबी की घटना से यह जाहिर होता है कि वहां गुजराती ही आतंकियों के निशाने पर हैं। क्योंकि वहां की 80 प्रतिशत आबादी गुजरातियों की ही है। सरकार इसका कितना भी खंडन करे, पर जिस तरह से चुन-चुनकर लोगों को मारा गया है, उससे यही सिद्ध होता है कि गुजराती ही आतंकियों के निशाने पर थे।
विश्व के सभी देश आतंकियों के खिलाफ अपनी तरफ से कार्रवाई कर रहे हैं। ये आतंकी कहीं तो सरकार के ढीलेपन, कहंी केवल दहशत फैलाने के लिए, तो कहीं सामाजिक कमजोरियों को देखते हुए अपनी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। नफरत के खेतों में उगे आतंकवाद की बेल को पोषित करने वाला पाकिस्तान आज भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। अमेरिका की दोहरी नीति के कारण ऐसे देश पल रहे हैं। आज अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है, इसलिए वह उसकी हरकतों को नजरअंदाज भी कर रहा है। आतंकवाद की घटनाएं अब किसी भी देश को झकझोरती नहीं। अब इन्हें उसकी आदत होने लगी है। अल कायदा का नेटवर्क इतना तगड़ा है कि कई देश उसके सामने लाचार हैं। आज आतंकियों के पास स्लीवर यूनिट की पूरी फौज है। उनका तंत्र बहुत ही शक्तिशाली है। नैरोबी से आने वाली खबरों में बताया गया है कि आतंकियों का निशाना केवल हिंदू लोग ही थे। जिन्हें उर्दू आती थी, उन्हें नहीं मारा गया, जिन्हें उर्दू नहीं आती थी, उनके चीथड़्रे उड़ा दिए गए। मां-बाप के सामने उनकी इकलौती संतान को मारने में भी आतंकियों के हाथ नहीं कांपे। यही नहीं उन्होंने गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। इस तरह से दहशत फैलाने के लिए आतंकी अब उन स्थानों को निशाना बनाने में लगे हैं, जहां आम आदमी की आमदरफ्त होते रहती है। नैरोबी में फंसे हुए एक भुक्तभोगी के अनुसार मॉल में जगह-जगह पर लाशें बिछी पड़ी हैं। इससे ही अंदाजा लग जाता हे कि आतंकियों के मंसूबे कितने खतरनाक थे। इन आतंकियों के खिलाफ अभी तक संयुक्त मुहिम शुरू नहीं हुई है। हर देश अपनी तरह से आतंकवाद का मुकाबला कर रहा है। अपनी दोहरी नीति के कारण अमेरिका पाकिस्तान का बाल भी बांका नहीं कर पा रहा है। सभी जानते हैं कि आतंकवादियों को पनाह देने में पाकिस्तान सबसे ऊपर है। फिर भी उस पर काईवाई नहीं हो पा रही है। मुश्किल तब आ रही है, जब आतंकवाद की इस अग्नि में बुद्धिजीवियों का दबदबा बढ़ने लगा है। ये कथित बुद्धिजीवी आतंकवाद को फैलाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे हैं।
आतंकवादियों के पास आज मानव बम की पूरी फौज है। ये मानव बम अपनी विचारधारा के कारण आतंकवाद से जुड़ जाते हैं। उनका इस तरह से ब्रेन वॉश किया जाता है कि किसी की हत्या करना उन्हें अब गुनाह नहीं लगता। मानव बम बनकर जो जितनी अधिक जानें लेता है, उसे संगठन में उतना अधिक सम्मान मिलता है। छोटी उमर के ये मानव बम ये नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं? बचपन से ही उन्हें इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि वे अपने धर्म को सबसे ऊपर समझते हैं। बाकी धर्म उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते। समृद्ध देश हमारा शोषण कर रहे हैं, यह कहकर वे उन देशों में हमला करने के लिए उन्हें मानसिक रूप् से तैयार कर रहे हैं। किसी भी जगह जब आतंक घटना हो जाती है, तब आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, इस नारे के साथ कई संगठन आगे आ जाते हैं। एक तरह से सूफियानी फौज सामने आ जाती है। पर ये संगठन भूल जाते हैं कि आतंकवाद को जहाँ पनाह मिल रही है, जहां आतंकवाद की बेल फल-फूल रही है, वह स्थान है पाकिस्तान और सोमालिया जेसे देश। अपनी दोहरी नीति के कारण अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने के लिए मजबूर है। आतंकवाद के खिलाफ अपनी सक्रियता दिखाते हुए पाकिस्तान भी कई बार कतिपय आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करता है, पर कुछ दिनों बाद वही आतंकी दूसरे नाम से अपना संगठन बना लेते हैं। आज आतंकवाद का यह धंधा खूब फल-फूल रहा है। आज उनके पास अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र हैं। वे बम बना सकते हैं, राकेट लांचर बना सकते हैं, आश्चर्य यह होता है कि आखिर इसका प्रशिक्षण उन्हें देता कौन है? दूसरी बात यह है कि आखिर इनके पास इतने अधिक अत्याधुनिक हथियार कैसे आते हैं। इन कामों के लिए आखिर इन्हें धन कहाँ से मिलता है। ऐस कई सवाल हैं, जिनका जवाब लोग नहीं जानते। कई सरकारें में नहीं जानतीं। आतंकवाद आखिर पनपता कैसे है? आखिर इसके लिए कौन है जिम्मेदार? एक अकेला आतंकी कभी कुछ नहीं कर सकता, ये जब संगठित होते हैं, तभी किसी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। नैरोबी की घटना एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम है। इसे सभी जानते-समझते हैं। आतंकवाद आज एक ऐसा रिसता घाव बन गया है, जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इस आतंकवाद को कुचलने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। सभी देश मिलकर यदि इस दिशा में समवेत प्रयास करें, तो सचमुच इस पर काबू पाया जा सकता है?
आखिर कौन है यह व्‍हाइट विंडो
बताया गया है कि इस हमले के पीछे व्हाइट विडो का हाथ था। व्हाइट विडो के मान से मशहूर ये आतंकी महिला उसी आत्मघाती हमलावर की बीवी है, जिसने 2005 में लंदन के ट्यूब में आतंकी धमाका किया था. बताया जा रहा है सामंथा ल्यूथवेट यानी व्हाइट विडो की अगुवाई में मॉल पर हमला हुआ। केन्‍या के अधिकारियों के मुताबिक नैरोबी के मॉल में आतंकी हमले की साजिश के पीछे व्हाइट विडो थी। वहीं नैरोबी हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन अल शबाब ने ट्वीट किया कि शेरफिया ल्यूथवेट एक बहादुर महिला है और हमें गर्व है कि वो हमारे साथ है.
व्‍हाइट विंडो यानी सामंथा ल्यूथवेट 7/7 के हमलावर जर्मेन लिंडसे की विधवा है. 7/7 हमले के कुछ ही दिनों बाद वो पूरे परिवार के साथ लंदन से गायब हो गई थी। बाद में वो सोमालिया के आतंकी संगठन अल शबाब से जुड़े गई और फिर वो व्हाइट विडो के नाम से मशहूर हो गई।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 21 सितंबर 2013

खो चुके हैं हम विदेशी निवेशकों का विश्वास

डॉ. महेश परिमल
यह सरकार भी अजीब है, चुनाव करीब आते ही उसे अल्पसंख्यकों की याद आई। अब उसके हित में सोचने भी लगी। कई योजनाओं को अमल में लाने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ तो अमल में ला भी दी गई हैं। सरकार ने इसे समझा, लेकिन यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि जब देश की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी, तो सरकार को यह क्यों समझ में नहीं आया कि इसके लिए भी कुछ करना चाहिए। खराब आर्थिक स्थिति का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए सरकार को शायद समझ में नहीं आया। क्या इसे सरकार की लापरवाही माना जाए, या फिर सरकार के आर्थिक सलाहकारों की विवशता। जब देश की आर्थिक स्थिति खराब है, तो विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए सरकार ने क्या किया? यह तय है कि जिस तेजी से डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा है, उतनी तेजी वह वह उठ नहीं सकता। इसलिए एफडीआई प्राप्त करने के लिए सरकार को ही कुछ करना पड़ेगा। अन्यथा हालात और भी भयावह हो सकते हैं।
रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम राजन कोई चमत्कार नहीं कर सकते। उनके आने से रुपए में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, पर इसे उनकी उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। उनकी असली परीक्षा उनके द्वारा तैयार की गई नीतियों की घोषणा के बाद ही होगी। वे तेजी के बैरामीटर नहीं हैं, जिसे देखकर रुपया संभलता ही जाए। इसमें सबसे बड़ी बात यही है कि सरकार विदेशी पूंजी निवेशकों को रोकने में पूरी तरह से विफल रही। इसके पीछे केवल दो लोगों को ही जिम्मेदार कहा जा सकता है। पहले हैं हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और दूसरे हैं वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम। जब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे, तब उन्होंने विदेशी निवेशकों को लुभाने की नाकाम कोशिश की थी। जब उन्हें मनाने की आवश्यकता थी, तब उन्होंने सख्त रवैया अपनाया। एक विदेशी मोबाइल कंपनी पर 1200 करेाड़ का टैक्स लाद दिया, यही नहीं उसका भुगतान उसे पिछले वर्ष से करने का आदेश दे दिया। यह कंपनी 8 दिसम्बर 2010 को सुप्रीम कोर्ट में केस हार गई। उसके बाद सरकार ने एक आदेश के तहत यह कहा कि यह वसूली पिछले वर्ष से के बकाया भी देने होंगे। उक्त विदेशी कंपनी पर कानूनी शस्त्र का इस्तेमाल किया गया, इससे दूसरी कंपनियां भड़क उठी। मामला बिगड़ गया, पर सरकार ने कुछ नहीं किया। एक के बाद एक विदेशी निवेशकों ने अपना धन वापस खींचने का काम शुरू कर दिया। वित्त मंत्री विदेश जाकर विदेशी को भारत में पूंजी लगाने के लिए रोड शो के माध्यम से उन्हें आकर्षित करते रहे, पर उनके शो में कोई नहीं आया। इस दिशा में की गई मीटिंग को कोई रिस्पांस नहीं मिला।
इन हालात को प्रधानमंत्री ने कुछ हद तक समझा और उनका बयान आया कि सचमुच देश अभी मुश्किल हालात से गुजर रहा है। पर यह स्थिति आखिर क्यों सामने आई, इसे समझने की कोशिश नहीं हुई। विदेशी निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। जब डन्हें मनाने की आवश्यकता थी, तब सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए। अब जब बाजी हाथ से निकल गई है, तो सर पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। अब सर पर हाथ रखने से कुछ नहीं होने वाला। शायद इसे भी सरकार समझने को तैयार नहीं है। देश को विदेशी निवेश के चालू वित्तीय वर्ष में 21 प्रतिशत का घाटा हुआ है। 2011-12 में एफडीआई 46.6 अरब डॉलर थी, जो 2012-13 में घटक 36.9 अरब डॉलर हो गई। इस आंकड़े से चीन की तुलना करें, तो 2012 में चीन में 111.6 अरब डॉलर की एफडीआई आई है। भारत के लिए यह चिंता की बात है कि पूरे विश्व के निवेशक यह जान गए हैं कि भारत में मंदी चल रही है और उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलने वाली।
भारत के लिए आघातजनक बात यह भी है कि वर्ल्ड इकॉनामी फोरम ने नवम्बर में भारत में आयोजित वार्षिक समिट स्थगित कर दिया है। पिछले 30 वर्षो में ऐसा पहली बार हुआ है। तीस वर्ष की परंपरा टूटी, इसका हमारे देश के आर्थिक सलाहकारों को मलाल नहीं। बाजार में जान फूंकने के लिए केबिनेट कमेटी ऑन इन्वेस्टमेंट ने 26 अगस्त को 36 प्रोजेक्ट में एक करोड़ 83 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट पारित किए हैं, इसमें पॉवर, आइल, गैस, रोड, रेल्वे आदि का समावेश किया गया है। इसका मूल आशय निवेशकों का चक्र पूरा होता है और नौकरी के अवसर बढ़ते हैं, परंतु उद्योग क्षेत्र का कहना है कि वित्तीय घाटा, करंट एकाउंट, डेफीसीट, जीडीपी की ग्रोथ रेट ओर इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रीय प्रोडक्शन (आईआईपी) काफी मुश्किल हालात से गुजर रहे हैं। उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि निवेशकों का विश्वास अब उठ गया है। कोई भी कंपनी कोई नया प्रोजेक्ट लाने को तैयार नहीं है। तो फिर रोजगार के अवसर कहां से तैयार होंगे? वित्त मंत्री चिदम्बरम कहते हैं कि धीरज रखो, पर कहां तक? विदेशी निवेशकों का विश्वास खोने के साथ-साथ सरकार भारतीय प्रजा का भी विश्वास अब खोने लगी है। ऐसे में विश्वासपूर्वक यह कैसे कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा।
   डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

संकट में हैं विघ्नहर्ता

डॉ. महेश परिमल
देश भर ही नहीं, अपितु सात समंदर पार भी गणोश जी विराज गए हैं। लोग भक्तिभाव में डूब गए हैं। हमारे देश में तो गणोश जी को लेकर विशेष आग्रह रहता है। आखिर इन्हें विघ्न विनाशक जो कहा जाता है। पर आजकल यह उत्सव पूरी तरह से व्यावसायिक रूप लेत जा रहा है। मुम्बई के पंडालों का भी अब करोड़ों में बीमा होने लगा है। जिस भावना के साथ इसे लोकमान्य तिलक ने इसे शुरू किया था, आज वह भावना कहीं दिखाई नहीं दे रही है। चंदे के बल पर मनाए जाने वाले इस उत्सव पर भी ऊंगलियां उठ रही है। शोर का पर्याय बन चुके इस उत्सव में भक्ति कम ही देखने को मिल रही है। भक्ति के नाम पर प्रतिस्पर्धा ही अधिक दिखाई दे रही है। भला उनके गणोश से हमारे गणोश जी छोटे क्यों? इस तरह की भावना ने आज इस उत्सव के स्वरूप को ही बिगाड़कर रख दिया है। मीडिया ने अपनी तरह से यह संदेश देने की कोशिश की है कि लोग माटी की ही मूर्ति को ही घर में जगह दें और उसे एक बरतन में विसर्जित कर दें, ताकि उसके पानी से घर में छिड़काव कर या फिर पौधों में डाल दिया जाए। इससे हमें लगेगा कि गणोश जी ने हमारे ही घर में शरण ली है। इसके बाद भी कई घरों एवं सार्वजनिक स्थानों पर प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों को स्थापना की गई है।
गणोश जी की बात करें, तो यह प्रथम आराध्य देवता हैं। इसके अलावा इन्हें तत्वज्ञान का देवता भी माना जाता है। उन्हें गणनायक भी कहा जाता है। महाराष्ट्र के कई शहरों में गणोश जी के दर्शन के लिए लम्बी कतारें लगी होती हैं। लोग घंटों तक प्रतीक्षा करते हैं दर्शन के लिए। कहा जाता है कि गणपति जी के एक-एक अंग का महत्व है। ये एक प्रामाणिक देवता हैं। रिद्धी-सिद्घी के दाता हैं। बॉलीवुड के कलाकारों में गणपति की स्थापना को लेकर विशेष रूप से दिलचस्पी होती है। सलमान खान के घर भी गणपति की स्थापना होती है। नाना पाटेकर अपना सारा काम छोड़कर इन दस दिनों में स्वयं को पूरी तरह से गणपति की भक्ति के लिए समर्पित कर देते हैं। उनके यहां बहुत सी हस्तियां गणपति दर्शन के लिए आती हैं। दन दिनों श्रद्धा-भक्ति बढ़ाने वाले कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कुछ लोग इसी जुगत में होते हैं कि किस तरह से प्रजा उनके गणपति दर्शन के लिए आएं। कई स्थानों पर प्रतियोगिताएं रखी जाती हैं। ताकि लोग उसमें शामिल होने के बहाने भीड़ बढ़ाएं।
गणोश जी के सभी अंगों का विशेष महत्व है। उनका मस्तक हाथी का है, अन्य किसी प्राणी का मस्तक उनके घड़ के साथ लगाया गया है। इसमें एक विशेषता यह है कि सभी प्राणियों में सबसे बुद्धिमान हाथी को माना गया है। बुद्धिहीन मानव यदि समाज का पथप्रदर्शक बनने की चेष्टा करता है, तो अव्यवस्थाएं फैलने लगती हैं। इसलिए लीडर को हमेशा बुद्धिमान और तेजस्वी होना चाहिए। हाथी के कान सूपे की तरह होते हैं। सूपे का काम है कि अनाज को कचरे से अलग करना। यही नहीं वह अनाज को अपने पास रखता है और कचरे को फेंक देता है। इसका आशय यही है सभी की बातों को सुनकर उसका सारांश ही ग्रहण किया जाए। बाकी बातों को कचरा समझकर उसे उड़ाकर फेंक दिया जाए। बड़ा कान प्रतीक है श्रवण शक्ति का। गणपति के हाथी जैसी छोटी आंखें मानव जीवन की सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती है। जमीन पर पड़ी छोटी से छोटी चीज भी देख सके और उसे उठा लेने की क्षमता हाथी में होती है। मानव को अपनी दृष्टि ऐसी ही सूक्ष्म रखनी चाहिए। इससे मावन कई दोषों से बचा रह सकता है। हाथी की बड़ी नाक दूर तक सूंघने की शक्ति रखती है। यह दूरदर्शी होने का प्रतीक है। लीडर को हमेशा दूरद्रष्टा होना चाहिए। प्रत्येक गतिविधि की गंध उसे मिलती रहे, ताकि वह सतर्क हो सके। गणोश जी के दो दांत में से एक पूरा है और एक आधा। पूरा दांत श्रद्धा का है और आधा दांत मेधा का है। जीवन में विकास के लिए श्रद्धा की आवश्यकता होती है, ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा। ईश्वर के प्रति आपका समर्पण कम होगा, तो चलेगा, पर श्रद्धा कम नहीं होनी चाहिए। बुद्धि और श्रद्धा एक साथ चलते हैं। श्रद्धा का सहारा लेकर मानव बौद्धिक निर्णय लेता है। आधा दांत बुद्धि की मर्यादा का सूचक है, तो दूसरा दांत अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
गणपति जी के चार हाथ हैं। एक हाथ में अंकुश, दूसरे में पाश, तीसरे में मोदक और चौधे हाथ आशीर्वाद से परिपूर्ण है। वासना एवं विकारों पर अंकुश आवश्यक है। पाश का काम इंद्रियों को शिक्षित करना है। मोदक आनंद का प्रतीक है, वह सात्विक आहार का सूचक है। चौथा हाथ श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने के लिए तत्पर है। गणोश जी को लंबोदर शायद इसीलिए कहा गया है कि वे सारी बातों सुनकर को अपने पेट में पचा लेते हैं। जो भी श्रद्धालु उनके पास जाता हे, अपनी दुखभरी कहानी सुनाता है। गणोश जी उनकी बातों को सुनकर अपने पेट में रख लेते हैं। भगवान के पाँव छोटे हैं। वे दौड़ नहीं सकते। उनका न दौड़ पाना यह दर्शाता है कि किसी भी कार्य को संपादित करने में जल्दबाजी न करें। ये छोटे पैर बुद्धिमत्ता के सूचक हैं। पृथ्वी की परिक्रमा की शर्त में अपने भाई कार्तिकेय को गणपति ने अपनी बुद्धि से हरा दिया। उनका वाहन चूहा है। विष्णु का वाहन गरुड़ और शंकर का वाहन नंदी है। विष्णु और शंकर के वाहन इतने बड़े हैं कि वे किसी के दरवाजे पर प्रवेश नहीं कर सकते। जबकि गणपति के वाहन किसी के भी घर आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। उनसे सीखने वाली बात यह है कि चूहा जब किसी को काटता है, तो वह फूंक मारता है। अर्थात पहले चेतावनी देता है। उसके काटने के पहले इस फूंक की जानकारी किसी को नहीं होती। अंतिम बात गणपति जी को दूर्वा बहुत प्रिय है। दूर्वा यानी दूब या घास। इसकी कोई कीमत नहीं होती। ये जहां ऊगती है, वहां कोई नहीं जाता। यानी इसे कोई भाव नहीं देता, जिसे कोई भाव नहीं देता, उसे गणपति भाव देते हैं। इसमें कोई सुगंध भी नहीं है। गणपति को गंधहीन चीज पसंद है।
गणोश जी की स्थापना कर उन्हें पूजने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। परंतु सार्वजनिक गणशोत्सव में गणपति की स्थापना के पीछे संगठन और एकता की भावना है। गणपति को दस दिन पूजने के बाद उनकी जो हालत होती है, यह देखने वाला आज कोई नहीं है। मूर्ति यदि माटी की होती है, तो वह पानी में घुल जाती है। पर यदि वह प्लास्टर ऑफ पेरिस की है, तो वह पानी में नहीं घुलती और उसे प्रदूषित करती है। दूसरी ओर नदी, नाले और समुद्र में विसर्जित की गई मूर्तियां कुछ दिनों बाद टुकड़ों-टुकड़ों में दिखाई देती है। कही सर, कहीं घड़, कहीं हाथ और कहीं पांव, विघ्नहर्ता की यह दशा देखकर कई बार रोना आता है। ये कैसी पूजा, हमारे आराध्य की यह हालत। इसके लिए आखिर दोषी कौन है। जिसे हम विघ्नहर्ता मान रहे हैं, आज उनका विघ्न हरने वाला कौन बचा है? कोई बता सकता है?
   डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 31 अगस्त 2013

हमारे प्रधानमंत्री की लाचारी

डॉ. महेश परिमल
जब पानी सर से गुजर गया, तब हमारे प्रधानमंत्री को ध्यान आया  कि हां देश की आर्थिक हालत खराब हो गई है। समझ में नहीं आता कि हमारे प्रधानमंत्री को यह सब इतनी देर से कैसे समझ में आया? क्या उन तक सूचनाएं नहीं पहुंच पाती? क्या उन्हें कोई खबर नहीं करता? क्या वे अखबार नहीं पढ़ते, क्या वे टीवी नहीं देखते? जो बात देश का बच्च-बच्च जानता है, जिसे वह समझ भी रहा है, उसे हमारे प्रधानमंत्री अब जाकर समझ पाए हैं। क्या उनका सूचना तंत्र इतना कमजोर है? वे देश के प्रधानमंत्री ही नहीं, इसके पहले वे सच्चे अर्थशास्त्री भी हैं, रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं, यही नहीं देश के वित्त मंत्री के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं। इसके अलावा हमें उन पर गर्व करना चाहिए कि वे विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं। लेकिन क्या यह सचमुच गर्व करने की बात है?
देश की अर्थ व्यवस्था सचमुच खराब है। इसके लिए उन्होने लाल किले की प्राचीर से यह आश्वासन भी दिया कि इसे मजबूत करने के लिए हम पुरजोर प्रयास करेंगे। उनके कहने की देर थी कि अर्थव्यवस्था पर मानों बिजली ही गर गई। डॉलर के मुकाबले हमारा रुपया कभी ऊंचा जाता है, कभी नीचे चला जाता है। यही हाल सोने का भी है। व्यापारी अब दोहरी चाल चल रहे हैं। आज सोने का जो भाव है, उस पर वे सोना नहीं खरीद रहे हैं। उस सोने को वे खरीदे गए भाव से ही खरीदने को तैयार हैं। सरकार के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे हैं। निवेशकों का विश्वास टूट रहा है। सरकार दिशाहीन है। सरकार की इसी स्थिति पर उद्योगपति रतन टाटा का कहना सही है कि हमारे पास ठोस नीतियों का अभाव है। उसके लिए काम नहीं हो पा रहा है। पर यह कैसे संभव है कि अमेरिका की आर्थिक हालत खराब होती है, तो हमारी हालत भी खराब होती है। पर जब वह मजबूत होता है, तो भी हमारी हालत खराब होती है। ऐसा कैसे हो जाता है? आज एक साधारण मतदाता यही समझना चाहता है। क्या हमारे अभूतपूर्व वित्तमंत्री बताएंगे? पूरे अर्थि तंत्र पर आज अविश्वास के बादल छाए हुए हैं। अच्छे-अच्छे जानकार भी हैरत में हैं कि आखिर ऐसा कैसे हो रहा है। एक दौर ऐसा भी था कि मंदी के दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत थी। फिर अभी ऐसा क्या हो गया कि सब कुछ बिखर रहा है? यह सच है कि आज पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। केवल रुपया ही नहीं, पूरे एशिया की मुद्राओं का यही हाल है। भारत की अर्थव्यवस्था इसी का एक अंग है। वह भला मंदी से किस तरह से अप्रभावित रह सकती है। पर इतना तो कोई भी सोच सकता है कि जब वास्तव में मंदी थी, तब हम मजबूत थे, पर आज हम मजबूत क्यों नहीं हो पा रहे हैं, जबकि हमारे पास एक कुशल अर्थशास्त्री हैं। अब तो हमारे वित्त मंत्री भी यही कह रहे हैं कि घबराने की आवश्यकता नहीं है, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। पर जब उनसे ही यह जवाब मांगा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की इस हालत के लिए आखिर कौन-कौन सी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, यह बताया जाए।
जब से देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई, तभी से हमारे प्रधानमंत्री यही कहते आए हैं कि इसे सुधारने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। अब वैसा ही राग वित्त मंत्री अलाप रहे हैं। वे भले ही यह दावा करें कि धबराने की आवश्यकता नहीं है, पर वास्तव में वे स्वयं ही घबरा रहे हैं। अच्छा होगा कि अब इसे गंभीरता से समझने की कोशिश की जाए। आश्वासनों से कुछ नही होने वाला। कुछ ठोस कदम अपरिहार्य हैं। इसके पहले जो कदम उठाए गए थे, उसका उल्टा ही असर हुआ है। जब सोना सस्ता था, तब यह कहा जा रहा था कि अभी न खरीदें, सोना और भी सस्ता हो सकता है। लोगों ने विश्वास कर लिया, आज वही सोना 22 हजार से बढ़कर 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम हो गया है। अभी भारतीय व्यापारियों में घबराहट नहीं फैली है। किंतु वे भय की ओर अग्रसर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वास भले ही टूट रहा हो, पर अब भारत में पूंजी निवेश करने के लिए विदेशी घबरा रहे हैं। यह सब राजनैतिक अस्थिरता के कारण हो रहा है,यह मानने के लिए शायद कोई तैयार नहीं है। सभी विश्व में छाई मंदी को दोष दे रहे हैं। हालात कोमा की तरह हो गए हैं। सरकार यही कह रही है कि यह वक्त वक्त की बात है। इसके लिए विश्व की अर्थव्यवस्था दोषी है। हम कतई नहीं। जब चिदम्बरम ने वित्त मंत्री का पद संभाला था, तब यह कहा जा रहा था कि अब रुपया मजबूत होगा। ऊर्जा का बिल घटाया जाएगा। औद्योगिक उत्पादन को नई ऊर्जा मिलेगी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मुद्रास्फीति की दर बढ़ गई। प्याज के दाम कहां से कहां पहुंच गए। सरकार की बहानेबाजी से गरीब वर्ग परेशान हो गया है। आज सब्जियों के दाम आम आदमी की पहुंच से दूर हो गए हैं। 2005 में उसी लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री में घोषणा की थी कि दस वर्ष बाद गरीबी खत्म हो जाएगी। इस बार उन्होंने यह स्वीकार किया कि गरीबी खत्म नहीं हुई है, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले पांच वर्ष की विफलता का साफ असर इस बार दिखाई दे रहा था।
यह कहा जा रहा है कि आज के हालात 1991 जैसे हैं। तब हमने विदेशी विनिमय के लए अपने सोने की राष्ट्रीय अनामत को लंदन भेज दिया था। यदि हम सावधान नहीं रहे, तो हालात 1963 जैसे हो सकते हैं। तब वित्त मंत्री मोरारजी देसाई थे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विदेशी विनिमय को बचाने के लिए सोने के आयात पर रोक लगा दी थी। इसके बाद भी वे लोगों में सोने की भूख को कम नहीं कर पाए। 1960 में सोने की तस्करी की जाने लगी। तभी हाजी मस्तान, दाऊद इब्राहीम, करीम लाला आदि का जन्म हुआ। भारत को इस आतंकवाद की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। आज देश का आत्मविश्वास घट रहा है, तो विदेशी इसका लाभ उठा रहे हैं। आतंरिक अस्थिरता के कारण समाज में भय का माहौल है। 1960 के बाद चीन और पाकिस्तान ने हमें सैन्य रूप से परखा। अब सीमा पर हलचल बढ़ गई है। पाकिस्तान हमारे जवानों को मार रहा है। चीन की हरकतें भी बढ़ गई हैं। ऐसे में भारत भले ही सैन्य दृष्टि से ताककवर बन गया हो, पर खतरा अभी भी मंडरा रहा है। आज सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनोती अब चुनाव न होकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। सभी कहते हैं कि किसी के पास जादुई छड़ी नहीं है, पर जादुई छड़ी का आशय वे योजनाएं हैं, जिससे अर्थव्यवस्था सुधर सकती है। कुछ तो ऐसा करना ही होगा, जिससे यह संदेश जाए कि हां कुछ तो हो रहा है। उसका असर भी दिखाई दे रहा है। व्यापारी भयमुक्त होकर व्यापार करें, लोग महंगाई से मुक्ति पाएं, यही कोशिश होनी चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला?

डॉ. महेश परिमल
ऐसा लगता है कि रेप के मामले में अब मुम्बई दिल्ली से स्पर्धा करने लगा है। वैसे देखा जाए, दुष्कृत्य देश के किसी भी कोने में हो, इससे लोगों को कोई बहुत अधिक फर्क पड़ता नहीं है। छोटे शहरों को तो और भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए यह तो आम अपराध की ही तरह है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस प्रकार की घटनाएं लगातार हो रही हैं, पर इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ताकि इस तरह के अपराधों में कमी आए। अपराधियों में किसी भी तरह से कानून का खौफ तो दिखाई ही नहीं दे रहा है। यदि समाज में एक भी दुष्कृत्य की घटना होती है, तो यह केवल पुलिस या नेताओं की चिंता का विषय नहीं है, यह मामला तो समाजशास्त्रियों के लिए एक चुनौती है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में नारियों की भूमिका में जो परिवर्तन आया है, उसका संबंध दुष्कृत्य की बढ़ती घटनाओं से है।
पहले ऐसा नहीं था। तब एक नारी, माँ, बहन, पत्नी और पुत्री की भूमिका में ही रहती थी। उसकी जवाबदारी संतानों के लालन-पालन और परिवार के पोषण तक ही सीमित थी। इस कर्तव्य के निर्वहन में यदि वह घर से बाहर निकलती थी, तो उनके साथ उनके परिवार का ही कोई विश्वस्त साथी हुआ करता था। किसी भी रूप में उन्हें अकेले घर से बाहर नहीं जाना पड़ता था। इन हालात में उनके साथ किसी प्रकार का र्दुव्‍यवहार नहीं होता था, ऐसी बात नहीं थी, पर जो कुछ भी उनके साथ होता था, वह मर्यादित होता था। व्यक्ति को समाज का भय रहता था। मुम्ब्ई और दिल्ली जैसे महानगरों में जो गेंगरेप की घटनाएं हुई हैं, उसमें अनजान लोगों की सहभागिता है। नारी के स्वतंत्र होने की इतनी बड़ी कीमत आज उसे चुकानी पड़ रही है। इसका मुख्य कारण है आज के प्रचार माध्यमों में नारी की जो छवि पेश की जा रही है,उसमें वह केवल एक भोग्या ही है। पुरुषों की वासना भड़क उठे, ऐसे विज्ञापन टीवी पर रोज ही दिखाई दे रहे हैं, फिल्में भी कुछ इसी तरह की बन रही हैं। इन सबमें नारी को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में उभारा जा रहा है। जब तक पुरुष प्रधान समाज में नारी को एक भोग्या के रूप में दिखाया जाता रहेगा, उसे भोग का साधन माना जा रहेगा, तब तक पुरुष की बीमार होती मानसिकता को सुधारा नहीं जा सकता। ऐसी ही घटनाएं समाज में होती रहेंगी।  आज की मांग यही है कि यदि नारी को स्वतंत्रता मिली है, तो उसका उपयोग भी उसे संभालकर करना होगा। पुरुषों की मानसिकता को बदलना इतना आसान नहीं है, उसके लिए कानून तो बहुत हैं, पर उसे अमल में लाने की नीयत किसी में नहीं है।
मुम्बई जिसे नारियों के लिए सुरक्षित माना जाता रहा है, वहां की महिलाएं देर रात लोकल ट्रेने में यात्रा कर सही सलामत अपने घर तक पहुंचने की गारंटी हुआ करती थी। अब वह गारंटी देने वाला कोई नहीं है। महालक्ष्मी उपनगर के कुछ असामाजिक तत्वों ने परेल की शक्ति मिल की तस्वीर लेने के लिए अपने साथी के साथ गई महिला फोटोग्राफर के साथ 5 नराधमों ने दुष्कृत्य किया। अब तक रेप की राजधानी दिल्ली थी, पर अब मुम्बई उससे स्पर्धा करने लगी है। इस दौड़ते-भागते महानगर में भी स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। छेड़छाड़ ही नहीं, बल्कि अब तो दुष्कर्म की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं। यहां की सुरक्षित नारियां अब स्वयं के असुरक्षित समझने लगी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए, तो 2011 और 2012 के बीच मुम्बई शहर नारियों को लेकर किए जा रहे अपराधों की संख्या में 11 प्रतिशत का इजाफा देखा गया है। 2011 में मुम्बई में नारी अत्याचार की 553 घटनाएं दर्ज की गई थीं। 2012 में यह आंकड़ा 614 ततक पहुंच गया। 2012 में मुम्बई में ही रेप की 234 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इसके मुकाबले दिल्ली में 585 घटनाएं दर्ज हुई। मुम्बई में रेप की जो 234 घटनाएं हुई, उसमें से 104 घटनाएं 14 से 18 वर्ष की उम्र के बीच की नारियों के साथ हुई थी। स्पष्ट है कि आजकल लोग महिलाओं पर कम किशोरी और युवतियों को ही अपना शिकार बनाते हैं।
मुम्बई में जब भी इस प्रकार की घटनाएं होती हैं, तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती हे, जो कुछ समय बाद भुला दी जाती हैं। कुछ समय तक लोग आंदोलित होते हैं, पर जैसे कि मुम्बई की तासीर है कि वह बड़ी से बड़ी घटनाओं को भी भुला देती है, उसी तरह रेप की कई घटनाएं मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दी हैं। 2011 की 20 अक्टूबर को मुम्बई के अंधेरी में एक पान की दुकान के पास कुछ युवक, युवतियों के साथ खड़े थे। ये सभी किसी की राह देख रहे थे, ताकि आगे जाया जा सके। इतने में वहां नशे में धुत्त चार युवक आए और उनसे अपशब्दों में बातचीत करने लगे। एक युवक तो एक युवती के ऊपर गिर ही पड़ा। इन युवतियों के साथ जो पुरुष थे, उन्होंने उन नशेड़ियों का विरोध किया। जमकर बहसबाजी हुई, तब वे सभी नशेड़ी चले गए। कुछ देर बाद वे अपने और साथियों के साथ हथियार लेकर वहां आए और युवतियों के पुरुष मित्रों पर छुरे से वार कर दिया। इस झूमा झटकी में दो पुरुष बुरी तरह जख्मी हो गए। बाद में दोनों की मौत हो गई। इस मामले ने पूरी मुम्बई को दहला दिया। नारी सुरक्षा को लेकर मुम्बई हाईकोर्ट ने भी इस पर चिंता व्यक्त की। बाद में इस मामले पर एक रिट पिटीशन दाखिल की गई, पर इसका कोई परिणाम आज तक सामने नहीं आया। अन्य बुरी घटनाओं की तरह मुम्बई ने इस घटना को भी भुला दिया।
पिछले वर्ष जुलाई में मुम्बई के करीब डोबिवली में छेड़छाड़ के मामले में एक युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि युवक की हत्या के आरोप में जिन 5 लोगों को गिरफ्तार किया, उसमें से चार नाबालिग थे, केवल एक की उम्र 19 वर्ष थी। बात ये थी कि संतोष विछीवोरा नामक युवक रात दस बजे अपनी दोस्त के साथ खड़ा था, इतने में वहां बस से 5 लोग उतरे, वे संतोष के साथ खड़ी युवती से छेड़छाड़ करने लगे। संतोष ने जब इसका विरोध किया, तो एक युवक ने छुरे से उस पर हमला कर दिया। बाकी के चार युवकों ने भी उसका साथ दिया। वे चारों भी संतोष पर टूट पड़े। जब नागरिकों ने संतोष को बचाने की कोशिश् की, तो उन पर भी हमला कर दिया गया। इधर घबराई युवती ने अपने अन्य साथियों को इसकी सूचना दी। संतोष को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पांचों आरोपियों में से केवल एक को जो 18 वर्ष का था, जेल भेज दिया गया, शेष चारों नाबालिगों को सुधार गृह में भेज दिया गया। बात आई-गई हो गई। इस घटना को भी मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दिया। मुम्बई की छाती में ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं दफ्न हैं, जो अब घाव का रूप ले चुके हैं, इन्हें कुरेदने की कोशिश न हो, तो ही अच्छा है।
आज हमारे देश में दुष्कृत्य की शिकार युवतियों एवं महिलाओं की हालत ऐसी है कि घटना के बाद जो स्थितियां सामने आती हैं, उन्हें जिस तरह से समाज देखता है, पुलिस जांच करती है, तरह-तरह के सवाल करती है,उससे ऐसा लगता है कि उनके साथ एक बार और दुष्कृत्य हो जाए, वह सहन हो जाएगा, पर यह सहन नहीं होता। दोष किसी का और सजा किसी को। जब तक इस प्रवृत्ति का अंत नहीं होगा, तब तक समाज में नारियों की इज्जत सरे आम लूटती रहेंगी और हमेशा की तरह कानून कुछ नहीं कर पाएगा। मुम्बई की घटना के बाद एक दु:खी आदमी के मुंह से निकल गया ‘हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला? ’
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 26 अगस्त 2013

नाकाम सरकार की नाकामियां

डॉ. महेश परिमल
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है। इसी के साथ ही गिर रही है संसद की गरिमा, नेताओं का चरित्र। अब तक कोई भी सरकार  इतनी लाचार कभी नजर नहीं आई कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल में लाएं। कहां तो यह तय होने वाला था कि अब दागी सांसद चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, और अब यह तय हो रहा है कि दोषी करार दिए गए सांसद चुनाव लड़ने के लिए अपात्र नहीं माने जाएंगे, यही नहीं वे जेल से भी चुनाव लड़ सकेंगे। क्या कोई सरकार स्वयं को बचाए रखने के लिए इतने आगे तक जा सकती है? इस तरह के मामले में सभी दल एक हो भी जाते हैं। बाकी मामलों में भले ही संसद न चल पाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
रुपए के मामले में इतना ही कहा जा सकता है कि हमारे नीति नियंताओं को यह सूझ ही नहीं रहा है कि रुपए को किस तरह से संभाला जाए। शायद वे इसके लिए तैयार ही नहीं थे। चिंता इस बात की है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं, बल्कि वे एक सिद्धहस्त अर्थशास्त्री भी हैं। वे रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं। पर इस समय वे इतने अधिक विवश हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि रुपया की कीमत लगातार गिर रही है, इसे रोकना आवश्यक है। यदि रुपए की ेगिरती कीमत पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो हालात बहुत ही खराब हो जाएंगे। विदेशी निवेशकों का विश्वास टूटता जा रहा है। निश्चित रूप से कुछ दिनों बाद ही पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी होगी। महंगाई बढ़ेगी, सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगेगा। इसका पूरा लाभ विपक्ष उठाएगा। यानी सरकार की सभी मोर्चो पर नाकामयाबी का ढिंढोरा पीटा जाएगा। नाकाम सरकार की नाकामयाबियों का जोरदार प्रचार-प्रसार होगा।
इस स्थिति से बचने के लिए सरकार यदि शीघ्र ही आम चुनाव की घोषणा कर दे, तो कुछ इज्जत बची रह सकती है। क्योंकि संसद का मानसून सत्र पूरा चल पाएगा, इसमें शक है। देश का समय और धन बेकार जाए, इससे अच्छा यही है कि चुनाव की घोषणा हो ही जाए। ताकि भविष्य की नाकामयाबियों से सरकार अपना पल्ला झाड़ सके। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर सरकार की खोटी नीयत सामने आ ही गई। यदि सरकार को गरीबों की इतनी ही चिंता है, तो पूरे 9 साल तक क्यों सोती रही, ठीक चुनाव के पहले इसे लागू कराने का मतलब साफ है कि यह वोट की राजनीति के कारण किया जा रहा है। इसके अलावा यह बात है कि अब तक सरकारी राशन दुकानों के माध्यम से गरीबों को जो अनाज बांटा जा रहा है, उस पर 90 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, इसके बाद भी पूरा राशन कालाबाजारी मे जा रहा है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। यदि विधेयक लागू हो जाता है, तो इस पर सवा लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। अब तक कुपोषण पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका, तो इसकी क्या गारंटी है कि 35 हजार करोड़ रुपए और खर्च करकेगरीबों को भोजन दिला पाने में यह सरकार सक्षम हो पाएगी? सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि सारी समस्याओं का समाधान खाद्य सुरक्षा विधेयक ही है। सरकार समझती है कि इससे ही देश की तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी, बल्कि इससे समस्याएं और अधिक विकराल हो जाएंगी, यह सरकार समझ नहीं पा रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि देश के हालात के बारे में आज जो एक साधारण मानव जानता है, एक आम आदमी जानता है, उतना हमारे प्रधानमंत्री नहीं जानते। उन्हें शायद कुछ भी नहीं पता। या फिर पता न होने का बहाना कर रहे हैं। संभव है वे देश पर आसन्न संकट को समझ चुके हों, पर न समझ पाने की विवशता उनके साथ हो।
हर दिन सामने आ रही रुपये की रिकार्ड तोड़ गिरावट और कई उपायों के बावजूद उसे संभालने में मिल रही नाकामी से यही स्पष्ट हो रहा है कि हमारे नीति-नियंताओं को कुछ सूझ नहीं रहा है। चिंता की बात यह है कि वे अन्य आर्थिक समस्याओं के समाधान में भी नाकाम दिख रहे हैं। इसके कहीं कोई आसार नहीं दिख रहे कि केंद्र सरकार निवेशकों का भरोसा जीत पाने में सफल होगी। जिस तरह विदेशी के साथ देशी निवेशक भी सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं उसे देखते हुए तो यही लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याएं और गंभीर रूप लेने वाली हैं। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार अपना और साथ ही देश का समय बर्बाद करने के बजाय शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में सोचे। शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में इसलिए भी विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि संसद के मोर्चे पर भी सरकार नाकामी का ही सामना कर रही है। संसद का मानसून सत्र जिस तरह आगे बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह लगभग तय है कि एक और सत्र अनुत्पादक साबित होने जा रहा है। अब इस सत्र में सरकार किसी तरह खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित कराने में सफल भी हो जाती है तो इससे देश के भले की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि यह शुद्ध चुनावी पहल है और यह किसी से छिपा नहीं कि मौजूदा स्थिति में खाद्य सुरक्षा कानून अर्थव्यवस्था की समस्याओं को और बढ़ाएगा ही। नाकामयाबियों के बोझ तले दबी सरकार कुछ नहीं कर सकती। उसकी विश्वसनीयता लगातार घट रही है। रोज नए घोटालों ने सरकार की कलई खोल दी है। अब कोयला आवंटन से संबंधित फाइलों का मामला सामने आ गया है। वे फाइलें कहां गई, किसने उसे पार कर दिया, किसी को नहीं मालूम। प्रधानमंत्री कार्यालय को भी नहीं, क्योंकि फाइलें वहीं से गुम हो गई हैं। इस पर प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी स्थिति स्पष्ट होगी, यह नहीं कहा जा सकता। सरकार लगातार अवश्विसनीय होते जा रही है। आम जनता के कई सवालों के जवाब उसके पास नहीं है। अब तो लोग प्रधानमंत्री को भी कई मामलों में दोषी मान रहे हैं। उनके ईमानदार होने के कितने भी दावे किए जाएं, पर लोगों को भरोसा ही नहीं हो पा रहा है कि वे पूर्णत: ईमानदार हैं।
इतनी विवश, लाचार और पंगु सरकार अब तक किसी ने देखी और न ही इस पर किसी ने सोचा। विशेषज्ञ कहते हैं कि महंगाई पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। हालात अभी और भी बेकाबू होंगे। ऐसे में सरकार यदि हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे, तो उस सरकार से क्या अपेक्षा की जाए? ऐसी सरकार का चले जाना ही बेहतर। अब सरकार के सामने आम चुनाव ही सबसे बेहतर विकल्प है। इसके सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं है। सरकार की इस नीयत को बनाए रखने में हमारे सांसद में किसी से कम नहीं हैं। संसद की गरिमा को ताक पर रखकर वे भले ही आचार संहिता की बात करते रहे, पर एक सांसद का कर्तव्य किसी को याद नहीं है। हां अधिकार के लिए हर कोई लड़ता नजर आ रहा है। ऐसे में किसी से भी कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती। आज आम आदमी के साथ साथ मध्यम वर्ग भी बेबस नजर आ रहा है। ऐसे में सरकार यदि अपने लिए वोट मांगे, तो वह किस मुंह से वोट मांगेगी, क्या उपलब्धि बताकर वोट मांगेगी। विपक्ष के पास सरकार की नाकामयाबियों का खुला चिट्ठा है। आखिर सरकार सच से कब तक भागेगी?
  डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 24 अगस्त 2013

अपने आसपास के टॉप 50 की सूची बनाएं

डॉ. महेश परिमल
अक्सर मीडिया में हम विश्व के टॉप धनिक लोगों की सूची सुनते-देखते रहते हैं। जब भी इसमें किसी भारतीय का नाम आता है, तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। कई ऐसे भी होते हैं, जिन्होंने अपने बल पर उक्त सूची में स्थान प्राप्त किया है। ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत होते हैं। ऐसे लोग समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं। कई बार हमें वे विदेशी भी आकर्षित करते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी दौलत कड़ी मेहनत से प्राप्त की होती है। इनकी सफलता की कहानी हमें मुंहजबानी याद रहती है। पर हम इनसे कभी प्रेरणा नहीं लेते। सभी यही कहते हैं कि धीरु भाई अंबानी कभी पेट्रोल पंप में काम करते थे, पर उन्होंने किस तरह से अनथक संघर्ष कर अपना अलग व्यापार शुरू किया और सफलता के कीर्तिमान रचे, इसे जानने की आवश्यकता हम नहीं समझते। यदि हम उनके संघर्षो को याद करें, तो हमें हमारे संघर्ष निश्चित रूप से छोटे लगेंगे।
यह तो हुई बड़े लोगों की बड़ी बातें। पर कभी आपने सोचा कि हमारे ही आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें हम टॉप 50 की सूची में शामिल कर सकते हैं। हमारे ही बीच कई लोग ऐसे होंगे, जिन्हें हम विभिन्न श्रेणियों में रख सकते हैं। कोई बहुत अधिक पढ़ा-लिखा होगा, कोई लेखक होगा, कोई पत्रकार होगा, कोई बहुत ही ज्यादा संवेदनशील होगा, कोई खडूस होगा, कोई धनवान होगा, तो कोई कंजूस होगा, कोई बहुत पकाने वाला होगा, कोई चिकना होगा, कोई गुस्सैल होगा आदि। क्या आपने कभी ऐसे लोगों की सूची बनाई हैे?
हमारी सोसायटी में ही कोई रुतबेदार होगा, तो कोई धनवान। धनवान हम उसे कह सकते हैं, जिनके पास सबसे अधिक वाहन हैं। या फिर जिनके घर में बहुत से ए.सी. हैं। किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में वे धन से अधिक से अधिक योगदान देता हो। ऐसों को हम अमीरों की श्रेणी में रख सकते हैं। ध्यान से देखा जाए, तो यह सब ऊपरी अवलोकन ही हैं। वैसे भी हमारे यहां आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही हमेशा चर्चा में होता है। कुछ लोग हमारे बीच के ऐसे होते हैं, जो दिखावा करते हैं, हमेशा स्वयं को व्यस्त बताते हुए किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में भले ही शामिल न हों, पर चंदा देने में सबसे आगे होते हैं। पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, तो हर तरह से उन्हें आप अपने साथ पाते हैं, ये दिखावा नहीं करते। अपने काम से कम रखते हैं। वास्त में ऐसे लोग ही समृद्धशाली होते हैं। इन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। धनवान होना और समृद्ध होना दोनों ही अलग-टलग बात है। कई धनपति ऐसे होते हैं, जो अपनी आवक का एक निश्चित भाग दान में देते हैं। कई लोग गुप्तदान में विश्वास रखते हैं। कई कंपनियाँ एक निश्चित राशि कुछ धर्माध संस्था हो हर महीने देती हैं। कई लोग इस तरह की सेवा के प्रतिफल की इच्छा रखते हैं। ताकि उनका नाम हो। धनपति बनने के लिए कई बार कई कड़वे संस्मरणों से गुजरना होता है। ऐसे लोग जीवन में कई तरह के समझौते करते हैं। कई लोग धनपति बनने के बाद अपने मूल पहचान को खो देते हैं, या कहें अपनी औकात ही भूल जाते हैं। ऐसे लोग हमेशा समस्याग्रस्त रहते हैं।
कई लोग अपने पिता-दादा की विरासत संभालते हैं। अपने धंधे को स्थापित करने के लिए उन्हें बहुत पसीना नहीं बहाना पड़ता। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्होंने अपने खून-पसीने से अपने धंधे को ऊंचाई तक पहुंचाया है। ऐसे लोगों को कदम-कदम पर सबक सीखने को मिलते हैं। इन सबक से वे तेजी से आगे बढ़ते हैं। ऐसे लोग दूसरों के लिए प्रेरणा होते हैं। फोब्र्स द्वारा हर वर्ष विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची जारी करती है। इस बार उनकी सूची में सोनिया गांधी का नाम है। लोगों को यह कुछ अस्वाभाविक लग सकता है। पर जो सच है, वह हमारे सामने है। तो फोब्र्स जो सूची तैयार करता है, उस पर हम अविश्वास करके यदि अपने आसपास के अच्छे लोगों की सूची तैयार कर उसे सार्वजनिक करें, देखो कितने सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। इससे हमें उन सभी को समझने का अवसर मिलेगा। आपकी सूची लोगों में चर्चा का विषय बन सकती है। कुछ लोगों में सुधार भी ला सकती है। दूसरी ओर निश्चित रूप से आपको आलोचना का भी शिकार होना पड़ेगा। पर इससे न घबरा कर आप केवल अपना काम करें, निश्चित रूप से आपके काम को सराहना मिलेगी।
ऐसी सूची सम्पत्ति के आधार पर ही बनती है। विश्व के टॉप 50 में चीन का एक भी अरबपति व्यापारी शामिल नहीं है। इस सूची में अमेरिका के 21 लोग शामिल हैं। टॉप 50 में एकमात्र भारतीय मुकेश अम्बानी का समावेश हुआ है। अपनी 22.9 अरब डॉलर की सम्पत्ति के साथ वे 28 नम्बर पर हैं। इस सूची में 6 महिलाएं भी हें। इस सूची में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो 90 वर्ष के हो चुके हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व के टॉप 100 अरबपतियों की कुल सम्पत्ति दो ट्रिलियन डॉलर है। डॉलर की कीमत में घटती-बढ़ती के कारण इस सम्पत्ति में भी उतार-चढ़ाव आता रहता है। केवल जुकरबर्ग ही ऐसे अरबपति हैं, जो 20 से 29 वर्ष की आयु के बीच हैं।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 21 अगस्त 2013

महँगाई के साये में त्‍योहार

 


आज जागरण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 19 अगस्त 2013

उद्योगपतियों के सामने नतमस्तक ममता

डॉ. महेश परिमल
कुछ सप्ताह पहले ममता बनर्जी मुम्बई में थीं, वहां उनकी आवाज कुछ बदली हुई सी थी। तेवर भी आक्रामक नहीं थे। ममता दीदी के इस रूप से सभी को आश्चर्य मे डाल दिया। आश्चर्य इसलिए कि उन्होंने वहां मिथुन चक्रवर्ती और भप्पी लहरी को साथ लेकर उद्योगपतियों को संबोधित किया। स्वयं तो सफेद साड़ी और स्लिपर में थीं, पर उद्योगपतियों को अपने राज्य में बुलाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दे रही थीं। उनके वादे सुनकर उद्योगपति हैरत में हैं कि ये वही ममता बनर्जी हैं, जिसने सिंगूर से टाटा का नेनो प्रोजेक्ट हटवाया था। वही प्रोजेक्ट गुजरात जाकर उसे समृद्ध कर गया। आज वही ममता उद्योगपतियों को इस बात का विश्वास दिला रही हैं कि उन्हें हर तरह की सुविधाएं दी जाएंगी। उद्योगपति इस आशा से उनकी बात सुन रहे थे कि क्या पता 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाए। इसलिए आज उनकी बात सुनना लाजिमी है।
ममता बनर्जी का यह रूप लोगों को भले ही न भाये, पर उद्योगपति हतप्रभ थे। वे ममता की इस छवि को एकदम से गले से उतारने के लिए भीतर से तैयार नहीं हैं। ममता भी यह अच्छी तरह से समझ गई हैं कि यदि राज्य का विकास करना है, तो राज्य में उद्योगों का होना आवश्यक है। सिंगूर के बाद वहां कोई उद्योगपति जाने को तैयार ही नहीं है। ऐसे में ममता अब इस कोशिश में है कि कैसे भी हो, उद्योगपतियों को अपने राज्य में बुलाना ही है। इसलिए आज  कापरेरेट लैग्वेज में बात कर रही हैं। अपनी आक्रामक छवि को चोला उन्होंने मुम्बई में उतार दिया है। गुस्सा तो उन्हें अब छू भी नहीं पा रहा है। उद्योगपतियों ने ममता बनर्जी को एक शांत और सौम्य मुख्यमंत्री के रूप में देखा। हिंदी औरा बंगला भाषा के मिश्रण से बोले गए उनके संवादों ने लोगों को रिझाया। अपनी जानी-पहचानी कार्यशैली में ममता ने कहा कि मेरी मित्रता अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के साथ है, लता मंगेशकर के साथ भी कभी-कभी बातचीत कर लेती हूं। मैं चाहती हूं कि बॉलीवुड और बंगला फिल्में मिलकर हॉलीवुड बनाएं।
सभी राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्य में उद्योग लगाने के लिए लाल जाजम बिछाते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्वभाव बहुत ही रफ-टफ हैं, स्वयं तो बहुत ही सादगी से रहती हैं, पर सूट-बूट वाले उद्योगपतियों के सामने उनकी छवि एकदम ही अलग थी। उद्योगपतियों ने ममता का जोरदार स्वागत किया। मुकेश अंबानी, आदी गोदरेज, देवेश्वर राव, गोयनका सहित करीब 24 कंपनियों के चेयरमेन ममता को सुनने के लिए आए थे। यही नहीं एनटीपीसी, स्टेट बैंक, सेल, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर भी उनसे मिलने आए थे। राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में उद्योगों की स्थापना हो या न हो, पर उद्योगपति ममता से अच्छे संबंध बनाए रखने के पक्ष में थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी संभवत: किंगमेकर के रूप में उभरकर आए, ऐसा माना जा रहा है। वैसे तो ममता ने अपने मुम्बई प्रवास को पूरी तरह से गैरराजनीतिक ही रखा था, पर पत्रकार कहां मानने वाले थे, वे अपने प्रश्नों से बार-बार राजनीतिक बयान उगलवाने के प्रयास में रहे। यह सभी जानते हैं कि ममता बनर्जी ने पहली बार पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़ फेंका, उसके बाद पंचायत चुनाव में भी अपना परचम फैलाया। अपनी इस सफलता के बाद वे यह समझा रही हैं कि भविष्य में लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका किंग मेकर की रहेगी। लोगों को न तो कांग्रेस रास आ रही है और न ही भाजपा, इसलिए एक तीसरा मोर्चा बनेगा और और वर्चस्व स्थापित करेगा। पत्रकारों से इतना कहने के बाद वे यह कहने लगी कि मुझसे राजनीति की बातें मत कीजिए, मैं तो उद्योगपतियों से मिलने के लिए आई हूं। राजनीति की बातें पूछकर मेरा ध्यान डायवर्ट न करें।
लोग अभी तक यह नहीं भूले हैं कि टाटा के नेनो प्रोजेक्ट के लिए ममता के नेतृत्व में सिंगूर में फैक्टरी बंद करवा दी थी। उस समय वे विपक्ष में थीं। इसलिए उन्होंने अपनी आक्रामक पहचान बना ली। टाटा का यही प्रोजेक्ट बाद में गुजरात चला गया, जहां उसने उसकी सूरत ही बदल दी। वही ममता बनर्जी उद्यागपतियो से यह कह रही थीं कि आप लोग मेरे राज्य में उद्योग लगाएं, आपको हर तरह की सुविधाएं दी जाएगी। मैं वादा करती हूं कि किसी भी उद्योगपति को कोई मुश्किल नहीं होगी। विपक्ष में रहकर एक पूरे कारखाने को हटा देना और सत्ता में रहकर उद्योगपतियों को राज्य में उद्योग लगाने के लिए लुभाना अलग बात है। यह बात ममता के व्यवहार से पता चली। इस सम्मेलन में ममता उद्योगपतियों से मिलने की पूरी तैयारी के साथ आई थीं। उन्होंने कई प्रलोभनों के पैकेज जारी किए। उन्होंने कहा कि किसी भी उद्योगपति को लैंड एक्जीविजन की आवश्यकता ही नही होगी, क्योंकि दस हजार एकड़ जमीन पर ‘लैंड हब’ बनाया गया है। उद्योगों को चाहे जितनी बिजली मिलेगी। उद्योगपतियों द्वारा पूछे गए सभी सवालों का जवाब भी ममता के पास था। हां राजनीति से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देने में वे कतरा रही थीं। अपने साथ वे दादा मिथुन चक्रवर्ती और गहनों की चलती-फिरती दुकान बप्पी लहरी को भी लेकर आई थीं। ताकि कुछ लोग इन्हीं से ही अपना मनोरंजन कर सकें।
जिस तरह से हमारे देश के वित्त मंत्री विदेशों में पूंजीनिवेशकों के लिए रोड शो का आयोजन करते हैं, उसी तरह देश के मुख्यमंत्री भी उद्योगपतियों के लिए लाल जाजम बिछाते हैं। कोई खुलेआम उद्योगपतियों को आमंत्रित करते हैं, तो कोई निजी तौर पर बैठकें आयोजित करते हैं। सभी जानते हैं कि उद्योग रोजी-रोटी खींचकर लाते हैं। एक तरफ यही मुख्यमंत्री सामान्य प्रजा के हितों की अनदेखी करते हैं, तो दूसरी तरफ उद्योगपतियों के आगे पूरी तरह से झुक जाते हैं। सामान्य रूप में उद्योगपति भरोसे और ट्रेंड पर चलते हैं। पश्चिम बंगाल से टाटा नेनो को हटा देने वाली ममता बनर्जी आज जिस तरह से उद्योगों को आमंत्रित करने के लिए प्रयासरत हैं, उससे सभी को आश्चर्य है। वे उद्योगपतियों पर किस तरह से विश्वास दिला पाएंगी, यह देखना है। लोग इसी ताक पर हैं कि वे ऐसा कैसे करेंगी, यह आज चर्चा का भी विषय है। इधर उद्योगपतियों ने भी अपनी पब्लिक रिलेशंस की टीम को मैदान में उतार दिया हे, ताकि पश्चिम बंगाल में सस्ती जमीन, सस्ता रॉ मटेरियल और अन्य सुविधाओं का पता लगाया जा सके। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राजनैतिक स्थिरता। यही स्थिति ही उद्योगों को लम्बे समय तक चलने की गारंटी देती है। उधर पश्चिम बंगाल के वामपंथी भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं, उन्हें भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसे उद्योगपति बखूबी समझते हैं। देखना यह है कि ममता इन उद्योगपतियों को कहां तक लुभा पाती हैं और कहां तक उन्हें सुविधाओं का आश्वासन देकर उन्हें अपने राज्य में उद्योग लगाने के लिए विवश कर सकती हैं।
    डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

हम गुलाम हमारा देश गुलाम

डॉ. महेश परिमल
स्वतंत्रता दिवस करीब है। देश में आजादी के तराने बजने लगे हैं। हमें यह बताया जाएगा कि हमें आजाद हुए 66 वर्ष हो गए हैं। इस आजादी को पाने के लिए हमारे देश के अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। बहूत ही मुश्किलों से हमें यह आजादी मिली है। इस तरह के तमाम नारों से हमें यह समझाने की कोशिश की जाएगी कि यह आजादी हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि हमें गुलाम बनाने के लिए अंग्रेजों ने जिस तरह के कानूनों का सहारा लिया था, वह आज भी कायम हैं। यानी 66 वषों में हमने उन कानूनों को बदलने की कोशिश भी नहीं की, जिसके आधार पर हमें गुलाम बनाया गया था। वास्तव में यही सबसे बड़ी गुलामी है कि हम आज तक वे कानून ही नहीं बना पाए, जिसने हमें गुलाम बनाया। इसे हम अपनी काहिली ही कहेंगे। अब तो यह साफ हो गया है कि हमारी वर्तमान सरकार पूरी तरह से पंगु हो गई है। वह अपनों को तो भ्रष्टाचार की पूरी छूट दे रही है, दूसरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात भी करती है। न तो वह स्वयं को भ्रष्टाचार से दूर रख पा रही है और न ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम ही उठा पा रही है।
इस बार स्वतंत्रता दिवस पर एक बार फिर लालकिले की प्राचीर से हमारे कर्मठ प्रधानमंत्री अपनी चिर-परिचित शैली में पाकिस्तान को चेताएंगे कि वह अपनी हरकतों से बाज आए, अन्यथा उसे इसके भयानक दुष्परिणाम भोगने होंगे। इसके अलावा वे देशवासियों को देश की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिेए भी कहेंगे। वे हमारी स्वतंत्रता का अर्थ समझाएंगे। अंत में अपनी शुभकामनाओं के साथ देशवासियों को इस दिन की बधाई देंगे। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद आप स्वयं एक बार यह सोचने की कोशिश करेंगे कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं। जब हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था, तब उसने प्रजा को कुचलने और शासक का विरोध करने वालों क अधिकार छीन लेने के लिए एक कानून बनाए थे। इन कानूनों में से एक कानून था प्रिवेंटिव डिटेंशन, इस कानून के अनुसार सरकार केवल शंका के आधार पर किसी भी नागरिक को गिरफ्तार कर सकती है। यदि सरकार को पता चल जाए कि इससे देश की शांति को खतरा है, तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसा पुलिस को अधिकार था। जब देश आजाद हुआ, तो इस कानून को बनाए रखने की कतई आवश्यकता नहेीं थी, लेकिन आज भी वह कानून बदस्तूर कायम है। आज भी सरकार को लगता है कि उसे अमुक व्यक्ति से देश की शांति को खतरा है, तो उसे गिरफ्तार कर सकती है। यह काननू नागरिकों की स्वतंत्रता पर किसी आघात से कम नहीं है। समाज सेवक अन्ना हजारे की गिरफ्तारी इसी कानून के तहत की गई थी।
देश जब गुलाम था, तब गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए इस कानून देश में कहीं भी यदि नमक तैयार किया जाता हो, तो सरकार को उसे टैक्स देना होगा। अन्यथा नमक तैयार करने वाले सजा होती थी। सरकार यह मानती थी कि जिस जमीन पर नमक तैयार किया जा रहा है, वह सरकारी है। आजादी के बाद इस कानून में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया, पर उपरोक्त कानून की तरह यह कानून आज भी कायम है। सरकार आज भी नमक पर कर ले रही है। अंग्रेजों ने मंदिरों एवं धर्म से जुड़ी संस्थाओं पर अंकुश रखने के लिए पब्लिक ट्रस्ट से जुड़े कानून बनाए थे। भारत आजाद हुआ, तब भारतीय दंड संहिता 25 और 26 के माध्यम से नागरिकों के धार्मिक स्वातं˜य को मूलभूत अधिकार के रूप में माना गया था। इसके बाद भी 1950 में सरकार ने बाम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट नामक कानून बनाकर नागरिकों से एक झटके में ही धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। इस कानून के खिलाफ अनेक ट्रस्ट सुप्रीमकोर्ट तक गए, पर देश की सर्वोच्च अदालत से उन्हें न्याय नहीं मिला। आज भी यह कानून अमल में लाया जा रहा है।  हमारी अदालतों ने प्रशासनिक मदद से प्रजा की स्वतंत्रता पर किस तरह से वार करती है, इसका उदाहरण यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश दिया कि देश की तमाम मोटर कार के कांच पर काले रंग की फिल्म निकाल ली जाए। इसके पहले आरटीओ की अनुमति लेकर यह फिल्म लगाई गई थी। किंतु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से वाहनों से यह फिल्म निकाली जाने लगी। अदालत ने यह आदेश भी दिया कि यदि इसमें ढिलाई बरती गई, तो उसके सामने अदालत के अपमान की कार्रवाई की जाएगी। जिस देश के नागरिक कड़ी धूप से बचने के लिए अपने वाहन पर फिल्म तक नहीं लगा सकते, उन्हें हम किस तरह से स्वतंत्र कह सकते हैं। आज आतंकवाद जोर पकड़ रहा है, इसे हमारे देश के नेताओं ने ही संरक्षण दिया है। लेकिन आज इसी आतंकवाद के नाम पर सरकार नागरिकों पर विभिन्न तरीके अत्याचार कर रही है। 
अंग्रेज यह मानते थे कि इस देश में जितनी जमीन है, उतने ही जंगल है और वे ही इनके मालिक हैं। इस कारण उन्होंने जंगल अधिनियम ओर जमीन अधिग्रहण धारा जैसे कानून बनाए, इस कानून से प्रजा की जमीन की मालिकी उनसे छीन ली गई। स्वतंत्र भारत की सरकार ने इस कानून को रद्द करने के बजाए इसे जारी रखा। इस कानून के मुताबिक आज भी गरीब किसानों की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। इसी तरह अंग्रेजों के शासन में 1894 में एक कानून बनाया गया था, जिसके अनुसार निजी जमीन छीनने के लिए जमीन संपादन की धारा तैयार की गई, जो आज भी अमल में लाई जाती है। इन कानूनों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि आज हम भले ही आजाद हो गए हैं, पर देखा जाए, तो हम पूरी तरह से गुलाम ही हैं। कई मामलों में हमें यह आजादी अखरती है। कई बार तो सरकार ने अंग्रेजों से अधिक अत्याचार किए हैं।
आज हम भले ही स्वयं को स्वतंत्र मानें, पर देखा जाए तो हमारी सरकार भी स्वतंत्र नहीं है। वह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों का खिलौना बनकर रह गई है। हमारी सरकार अमेरिका जैसी महासत्ता की गुलाम है। हमारे प्रधानमंत्री रिटेल में विदेशी कंपनियों को देश में घुसने न देने की घोषणा करें, तो अमेरिका हम पर यह दबाव बनाता है। उसके लिए अनुमति दिलवाता है। यदि हम आज ईरान के साथ व्यापार करना चाहें, तो नहीं कर सकते, क्योंकि ईरान अमेरिका का दुश्मन है, इसलिए अमेरिका हम पर यह दबाव बनाता है कि ईरान से किसी भी तरह का व्यापार समझौता न किया जाए। वर्ल्ड बैंक, वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन और यूनेस्को जैसी संस्थाएं ग्लोबोलाइजेशन के नाम पर  हमारी सरकार की स्वतंत्रता छीन रही है। यदि हम ऐसा सोचते हैं कि हमारी आजादी केवल वायवीय या आभासी है, तो हमें अपनी सच्ची आजादी के लिए फिर से लड़ाई शुरू करनी होगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

चिंतित सरकार की दुविधा: बिल कैसे पास हों?


डॉ. महेश परिमल
सीमा पर पाक की नापाक हरकतें जारी हैं। ऐसे में हमारे रक्षा मंत्री ऐसा बयान दे रहे हैं, जिससे पाकिस्तान को शह मिलती है। जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है, तब पाकिस्तान ने हमारी तमाम कमजोरियों को जानते-समझते हुए हमें यह चुनौती दी है कि जो कुछ करना चाहो, कर लो। हम हैं कि केवल बयानबाजी ही कर रहे हैं। एक तरह से यह कोशिश भी की जा रही है कि पाकिस्तान के साथ सचिव स्तर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री स्तर की भी चर्चा होती रहनी चाहिए। अब हालात बदल गए हैं, जब से नवाज शरीफ ने सत्ता संभाली है, तब से सीमा पर गतिविधियां बढ़ गई है। सरकार की यही चिंता काफी नहीं है, मानसून सत्र 15 दिनों का है, 5 दिन गुजर चुके हैं, अब केवल दस दिन ही बचे हैं, ऐसे में बहुत से महत्वपूर्ण विधेयक हैं, जिन्हें पारित कराना है। पर यह हो नहीं पा रहा है। सरकार को इस बात की खुशी है कि सचिन तेंदुलकर ने पहली बार संसद की कार्यवाही में भाग लिया, पर इस बात की चिंता नहीं है कि देश की जनता के हित में जो महत्वपूर्ण बिल हैं, उसे किस तरह से पारित कराया जाए।
पाकिस्तान की हरकतों से एंटी इंकमबंसी में वृद्धि हुई है। यह सच है, पर यह भी सच है कि सरकार अब लोकसभा में अल्पसंख्यक हो गई है। सपा-बसपा की बैसाखी पर टिकी यह सरकार अब उसके ही निर्णयों पर ऊंगली उठा रही है। ये दोनों दल अब सरकार की नाक दबाने का ही काम कर रहे हैं। इन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार को समर्थन देने के कारण ये दोनों दल अपना ही उल्लू सीधा करने में लगे हैं। जनता के हितों से इनका कोई वास्ता नहीं रहा। मुलायम के जो कठोर तेवर इस बार देखने को मिले, उसके आगे सरकार झुकती ही नजर आ रही है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किस तरह से 114 बिल इस सत्र में पारित कराएं जाएं? इतने कम दिनों में इतने बिल किसी भी स्थिति में पारित नहीं कराए जा सकते। जब मानसून सत्र शुरू हुआ था, उसके पहले संसदीय मंत्री ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की थी। मामला यह था कि संसद के सत्र को चलने देने के लिए शालीनतापूर्वक काम किया जाए। अनावश्यक बाधाएं खड़ी न की जाए। कुल मिलाकर संसद की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश की जाए। पर विपक्ष द्वारा दागे गए कई सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं है। जैसे खाद्य सुरक्षा बिल पर जो विवाद है, उसे खत्म करने के लिए सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा था। अब सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दोनों स्वार्थी दलो में से एक उसका विरोध कर रहा है। उधर तेलंगाना नाम भी उसके गले में फंस गया है। सरकार इसे न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है। इस पर सरकार की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही है।
इस मानसून सत्र में सरकार कितने विधेयक पारित करवा सकती है, इस पर सबकी नजर है। इन विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष के समर्थन की आवश्यकता होगी। या फिर सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होना चाहिए। अभी तो सरकार इन दोनों से ही वंचित है। उसे  न तो विपक्ष का सहयोग मिल रहा है, न ही समर्थन देने वाले दल से उसके संबंध अच्छे हैं। 2012 में सरकार ने 32 बिल पास कराए थे। 2013 में अब तक केवल 13 बिल ही पास हो पाए हैं। इसके मुकाबले 2005 में 56 और 2006 में 64 किल पास हुए थे। यूपीए केंद्र सरकार महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल संसद में पास कराने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। लोकसभा में सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा-बसपा पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं। ये दल समर्थन की कीमत भी वसूलते हैं। सरकार को इस बात का डर हमेशा सताता है कि यदि किसी विधेयक पर मतदान की नौबत आ जाए, तो सबसे पहले सपा ही इस अवसर का पूरा लाभ उठाएगी। जो महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल हैं, उसमें से लैंड एक्जीविजनऔर रि-सेटलमेंट बिल का भी समावेश होता है। यदि यह बिल पारित हो जाता है, तो गांवों में किसानों को उनकी जमीन का अधिक मुआवजा मिलेगा। किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में लैड एक्जीविजन करने की बात आती है, तो किसानों को अधिक से अधिक मुआवजा मिले, ऐसी सुविधाएं देने वाला यह विधेयक है। पर सरकार इस बात का प्रचार नहीं कर पाई और न ही विपक्ष को यह समझा पाई कि इससे किसानों का ही भला होगा। पर विपक्ष भी यह बखूबी जानता है कि यह बिल अभी इसीलिए लाया गया है कि आगामी चुनावों में इसका लाभ उठाया जाए। यही हाल सरकार की महत्वाकांक्षी विधेयक खाद्य सुरक्षा बिल का है। सरकार की नीयत यही है कि इसका लाभ चुनावों में लिया जा सके। इस विधेयक पर विपक्ष को कई आपत्ति है, पर सरकार के पास उसका कोई जवाब नहीं है। इस विधेयक के पीछे यही उद्देश्य है कि देश के किसी भी भाग को अब कोई भी भूखा नहीं सोएगा। पर सरकार को इस बिल को अभी लाने की क्या आवश्यकता थी। यह तो सरकार बनते ही आ जाना था। पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए विपक्ष इसका भरपूर फायदा उठा रहा है।
इस समय आईएसआई दुर्गा शक्ति का मामला सुर्खियों में है। इसमें माइनिंग सिस्टम जवाबदार है। उत्तर प्रदेश सरकार  द्वारा दुर्गा शक्ति को सस्पेंड करने के पीछे रेत की हेराफेरी ही है। रेत माफिया के आगे अखिलेश सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। इसलिए दुर्गा शक्ेित को आगे करके उसे सस्पेंड कर दिया गया। माइंस एंड मिनरल्स बिल-2011 को सरकार पारित करवाना चाहती है। यदि यह बिल पारित हो गया, तो कोलगेट जैसे घोटाले भविष्य में नहीं होंगे, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। पेंशन फंड एंड रेग्युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथारिटी बिल पेंशन पाने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। नई पेंशन प्रणाली के लिए यह उपयोगी है। नेशनल कंपनी लो ट्रिब्यूनल खड़े करने के लिए दरवाजा खोल देने वाले बिल की कापरेरेट कंपनियां आतुरता से राह देख रही हैं। 1956 में लॉ बिल बना था, आज 6 लाख 50 हजार कंपनियां पंजीकृत हैं। इन कंपनियों के लिए ये बिल महत्वपूर्ण है। इसके अलावा व्हीसल ब्लोअर प्रोटेक्शन बिल की आज विशेष रूप से आवश्यकता है। लोग यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं,तो उनका संरक्षण होना चाहिए, यह बिल उन्हीं के संरक्षण के लिए है। भ्रष्टाचार का विरोध करने वाली सरकार और विपक्ष दोनों ही चाहते हैं कि यह बिल पारित हो जाए, पर यह पारित क्यों नहीं हो पा रहा है, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
मानसून सत्र के अब कुछ ही दिन शेष हैं। सरकार के सामने यह सारे विधेयक एक चुनौती के समान हैं। सरकार इस सत्र में सप्लीमेंट्री ग्रांट्स पास करवाएगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर जारी अध्यादेश पर सरकार मंजूरी प्राप्त कर लेगी, इसमें शक है। सरकार तो क्या, यह किसी के लिए भी संभव ही नहीं है। सरकार यदि यह समझ रही है कि सपा-बसपा उन्हें सही समय पर साथ देंगे, तो यह उसकी भूल है। उन्हें अपने समर्थन की कीमत वसूलना अच्छी तरह से आता है। इसलिए उन पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार के फ्लोर मैनेजर 116 में से 63 विधेयक पारित कराने के लिए कृतसंकल्प है। इससे यूपीए सरकार की छवि सुधरेगी, ऐसा माना जा रहा है, ताकि 2014 के चुनाव में अपनी छवि के अनुकूल वोट हासिल कर सके। सरकार यदि यह मानती है कि यह विधेयक वास्तव में जनहितकारी हैं, तो इन पर पहले ही चर्चा करवा लेनी थी, विपक्ष का विश्वास प्राप्त कर लेना था, पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए वह बार-बार विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पाती है और कमजोर साबित होती है। सरकार की इसी कमजोरी का लाभ सपा-बसपा और विपक्ष उठा रहा है। केंद्र की चिंतित सरकार के सामने आज सबसे बड़ी दुविधा यही है कि ये बिल कैसे पास हों?
    डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 24 जुलाई 2013

भ्रष्टाचार में उलझी मासूमों की अनुसनी चीखें

डॉ. महेश परिमल
सरकार ने मिड डे मील योजना एक अच्छी भावना के साथ शुरू की। पर अधिकारियों की लापरवाही के कारणक कक यह योजना घोटालों की भेंट चढ़ गई। इस योजना के बुरे हश्र के लिए जितनी दोषी केंद्र सरकार है, उतनी ही राज्य सरकारें भी। आज यह योजना मासूमों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली योजना बनकर रह गई है। भ्रष्ट सरकारी तंत्र ने इस योजना को रसातल में ले जाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। इस योजना से ही पता चल जाता है कि आज देश में भ्रष्टाचार कितना बढ़ गया है। दूसरी बड़ी बात यह है कि आज कोई भी घटना हो,्र उसका तुरंत ही राजनीतिकरण हो जाता है। नेताओं के बयान आने शुरू हो जाते हैं। जो आखिर में बंद, घेराव, अराजकता की स्थिति में आकर समाप्त होते हैं। अब भले ही इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारें कई नियम-कायदे बनाएं, पर सच तो यह है कि 23 मासूमों की मौत के बाद यदि ऐसा किया जा रहा है, तो यही समझा जाएगा कि सभी को शायद मौतों का इंतजार था। सच है कि कई नियम तो कई मौतों के बाद बनते हैं।
देश में स्कूल जाने वाले 12 करोड़ बच्चों को मध्याह्न भोजन देने की योजना पर अरबों रुपए खर्च हो रहे हैं। सभी राज्यों में इस योजना का कमोबेश यही हाल है। इस योजना का लाभ अधिकांश गरीब वर्ग के छात्र ही उठाते हैं, इसलिए वे ही सबसे पहले इसके शिकार होते हैं। जिस देश में भुखमरी और कुपोषण का दौर लगातार जारी हो, वहां टीवी पर विज्ञापन दिखाकर लोगों को जागरूक नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर मध्याह्न भोजन को अमल में लाने के लिए जिस सरकारी चुस्ती की आवश्यकता होती है, वह भ्रष्ट अधिकारियों के चलते दिखाई नहीं देती। इस योजना ने कई सरकारी अधिकारियों को मालामाल कर दिया है। कई जगह तो इस बात का विरोध भी हुआ है कि शाकाहारी बच्चों को अंडा खिलाया गया। इस योजना का उद्भव सन 1960 में तमिलनाड़ में हुआ था। शालाओं में अधिक से अधिक बच्चे आएं, इसलिए तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज ने इस योजना की शुरुआत की थी। 1982 में एम.जी. रामचंद्रन की सरकार ने इसे पूरे राज्य में शुरू की। इसके बाद गुजरात और केरल में इस योजना को लागू किया गया। 1990-91 तक इस योजना को 12 राज्य अमल में ला चुके थे। 97-98 तक यह योजना पूरे देश में लागू हो गई। कितनी ही विदेशी एजेंसियों ने इस योजना के लिए सहायता दी। 2001 में सुप्रीमकोर्ट ने एक फैसले में इस योजना को पूरे देश में लागू करने के लिए कहा। इसके बाद से शुरू हो गया, इस योजना में घोटाले होना। इस योजना में हुए भ्रष्टाचार की शिकायतें अमूमन सभी राज्यों से आने लगी। इसमें सबसे अहम शिकायत यही होती है कि जो भोजन बच्चों को दिया जाता है, उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। जो अच्छा अनाज इसके लिए आवंटित किया जाता है, उसे कालाबाजारी में बाजार में बेच दिया जाता है। उसके बदले में निम्न स्तर का घटिया अनाज बच्चों को पकाकर खिलाया जाता है।
कर्नाटक के 33 लाख बच्चों के लिए मिड डे मिल की आपूर्ति के लिए 5 साल का कांट्रेक्ट क्रिस्टी फ्राइडग्राम इंडस्ट्री नामक कंपनी को 500 करोड़ रुपए में दिया गया था। इस कंपनी ने अपनी ही रसोई में भोजन तैयार करने के बदले तमिलनाड़ु से हलकी गुणवत्ता का अनाज खरीदकर बच्चों को देना शुरू कर दिया। इस खुराक को बच्चे अपने घर ले जाते और जानवरों को खिला देते। कांट्रेक्ट लेने वाली कंपनी ने कर्नाटक राज्य के वीमेन्स एंड चाइल्ड डेवलपमेंट विभाग के डायरेक्टर से लेकर चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों को हफ्ता देना शुरू कर दिया। इसके अनुसार डायरेक्टर को हर महीने 20 लाख रुपए,डिफ्टी डायरेक्टर को 15 लाख रुपए मिलते थे।  जब कर्नाटक लोकायुक्त द्वारा पूरे मामले को सामने लाया, तो इस योजना का लाभ लेने वाले सभी 33 लाख बच्चों का डॉक्टरी परीक्षण किया गया, तो उसमे से 21 लाख बच्चो कुपोषण से पीड़ित मिले।
मध्याह्न भोजन योजना का एक उद्देश्य अंडे की खपत बढ़ाने और शाकाहारियों को मांसाहारी बनाने का प्रचार करना भी है। अंडे के उत्पादकों की नेशनल एग कोर्डिनेशन कमिटी नाम की संस्था सभी राज्यों के शिक्षा मंत्री से मिलती है और उन्हें मध्याह्न भोजन योजना मे बच्चों को उबले अंडे देना शुरू किया। शुरुआत में वे सप्ताह में दो अंडे देते थे, जिसे बाद में बढ़कार तीन कर दिया गया। आज की तारीख में भारत के 9 राज्यों में और दो केंद्र शासित प्रदेश में मध्याह्न भोजन योजना में अंडे परोसे जा रहे हैं। इस योजना के माध्यम से देश के करीब 2.18 करोड़ बच्चों को साल में 99 करोड़ के अंडे खिलाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने 2005 से बच्चों को अंडे देना शुरू किया है। दूसरी ओर गुजरात और मध्यप्रदेश में इसका विरोध हो रहा है। इनका तर्क है कि जो अंडा दिया जा रहा है, वह पोषक न होकर रोग बढ़ाने वाला है। सरकार की अन्य कई योजनाओं की तरह मिड डे मिल योजना के अमल की जवाबदारी सरकारी अधिकारियों पर है। इसलिए वे इसमें भी अपना लाभ देख रहे हैँ। 2005 में उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में फूड कापरेरेशन आफ इंडिया के गोदाम से आठ ट्रक चावल रवाना किए गए, जो दिल्ली के बाजार में बिकने के लिए आ गए। दिल्ली पुलिस ने छापा मारकर चावल जब्त किया था। 2009 में गुजरात के लिमड़ी तहसील में भी मध्याह्न भोजन योजना के अनाज में किया गया घोटाला सामने आया था। इस घोटाले में प्राथमिक शाला के तीन शिक्षकों ने विद्यार्थियों की अधिक उपस्थिति दर्ज कर 2.73 लाख रुपए कर घोटाला किया।
यदि पूरे देश में अनाज के नाम पर जितने भी भ्रष्टाचार के मामलों का सामने लाया जाए, तो इसमें मध्याह्न भोजन योजना के अनाज में की जा रही हेराफेरी का मामला सबसे आगे होगा। सरकार राशन के सस्ते अनाज बॉटने के बजाए उतनी राशि बैंक में सीधे जमा करने की योजना शुरू की है। इस तरह की योजना यदि मध्याह्न भोजन के लिए किया जाए, तो शायद इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। संभवत: भ्रष्टाचार पर भी लगाम कसी जा सके। मिड डे मिल योजना अधिकांश सरकारी स्कूलों में ही चल रही है। इसमें गरीब वर्ग के बच्चे ही होते हैं। इस योजना में सड़े हुए अनाज और बासी खाना परोसा जाता है, तो इसकी शिकायत यदि कोई गरीब करे, तो उसकी कोई सुनने वाला ही नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार इस योजना मे एक बच्चे के लिए तीन से सवा तीन रुपए दिए जाते हैं, इतनी कम राशि में पौष्टिक खुराक तो एक सपना ही है। इसी सपने को लेकर अधिकारी अपने स्वार्थ के सपने देखने लगते हैं। गरीब बच्चों का सपना भले ही पूरा न होता हो, पर सच तो यह है कि शिक्षा मंत्री से लेकर शिक्षा अधिकारियों का सपना अवश्य पूरा हो जाता है। यह देश के लिए एक विडम्बना ही है कि बच्चों में पढ़ाई का लालच देने के लिए उन्हें दोपहर का भोजन स्कूल में दिए जाने की योजना सरकार ने बनाई है। यदि सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर बेहतर हो, तो फिर बच्चे अन्य स्कूलों की तरफ देखें ही क्यों? इस बात को सरकार को समझने में न जाने कितने साल लगेंगे। अभी तो यही सच है कि मध्याह्न भोजन योजना से बच्चों को कोई लाभ हुआ हो या न हो, पर इससे कई अधिकारी पल गए, कई तर गए और कई तरने वाले हैं।
डॉ. महेश परिमल

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