गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

बाल कहानी – सापड़ सपड़ू

कहानी का अंश… सापड़ सपड़ू नाम का एक लड़का था। घर में एक वही था, जो पढ़ने जाता था। सापड़ सपड़ू और बच्चों के साथ रोज घर से स्कूल जाने के लिए निकलता पर बीच में खेलने के लिए रूक जाता। उसका खेल भी बड़ा मजेदार था। उसका खेल था – मिट्टी में लोटना, खुद पर मिट्टी डालना और उछालना। एक दिन सापड़ सपड़ू की माँ को बहुत तेज बुखार आया तो उसके पिता सापड़ सपड़ू को स्कूल से बुलाने गए। पर ये क्या? सापड़ सपड़ू तो बीच रास्ते में ही मिट्टी में लोटपोट करता मिल गया। उसके पिताजी बहुत गुस्सा हुए और उसे पकड़कर घर ले आए। उन्होंने कहा – कल से तेरा स्कूल जाना बंद। अब सापड़ सपड़ू का स्कूल जाना बंद हो गया। वह जानवर चराने के लिए जाने लगा। पर इससे उसका मिट्टी में खेलना बंद नहीं हुआ। वह अपनी खेल की जगह पहुँचकर जानवरों को छोड़ देता और खुद मिट्टी में लोटपोट करने लगता। एक दिन तेज बारिश आई। सापड़ सपड़ू जानवरो को लेकर घर आ गया लेकिन वह बारिश में पूरा भीग गया था। फिर वो दो-तीन दिन बाद जानवर चराने के लिए गया। जानवरों को छोड़कर वह खेलने की तैयारी करने लगा। लेकिन आज गाय, भैंस, बछड़ा-बछड़ी सभी उसके आसपास ही मँडराने लगे। ऐसा क्यों हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

बाल कविता – 2 - पढ़ोगे- लिखोगे बनोगे नवाब - भारती परिमल

कविता का अंश... रात रुनझुन ने देखा ख्वाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे नवाब, पढ़ोगे-लिखोगे होगे खराब। बस फिर क्या था, सुबह हुई वह मम्मी से बोली, मुझको स्कूल नहीं जाना है, पार्क में जाकर खूब मौज उड़ाना है। सुनकर रुनझुन की अनोखी बात मम्मी हो गई हैरान। बात ये कैसे तुम्हारे मन में आई, क्या बिना पढ़े किसी ने मंजिल पाई? रुनझुन बोली – सपने में मैंने सच-सच देखा है, पढ़-लिखकर खराब होने का मजा मैंने चखा है। अब नहीं मुझे पढ़ना है, मौज मस्ती में ही रहना है। खेल-कूद कर नवाब मैं बन जाऊँगी, फिर सात समंदर पार उड़ जाऊँगी। मम्मी ने लाख समझाया, पर रुनझुन की समझ में न आया। सपने को ही सच माना, कॉपी-किताब से दूर जाने का ठाना। आई परीक्षा पास में, रुनझुन बैठी हरी-हारी घास में। कोई सवाल हल न कर पाई, पेपर देख आई रुलाई। रिजल्ट जब सामने आया, फूट-फूट कर रोना आया। सारे फ्रेंड्स पहुँचे अगली क्लास में, रुनझुन रह गई पिछली ही क्लास में। तब उसकी समझ में आया, मैंने अपना समय गँवाया। सपने झूठे भी होते हैं, और अपने सच्चे ही होते हैं। मम्मी-पापा, टीचर का कहना जो माना होता, दोस्तों का साथ न छूटा होता। दुख न इतना ज्यादा होता। टुनटुन, मुनमुन, चुनचुन उसकी नई सहेली है, रुनझुन ने हल कर दी उनकी भी यही पहेली है। प्यार से वह कहती है – खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब। यही सच है, इससे पूरे होंगे सारे ख्वाब। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

बाल कविताएँ - 1 - भारती परिमल

कविता का अंश... ढोल बाजे ढम ढम ढम भालू, बंदर, हिरन, हाथी नाचे छम छम छम बंदरिया ने पहनी पायल पायल बाजे झन झन झन। सरकस का जोकर आया, साथ में अपने बाँसुरी लाया। धुन में उसकी कोयल गाए, चिड़िया चहक-चहक इतराए। गीत उनके सबके मन भाए। लगी थिरकने चूँ चूँ चूहिया, घूमे लहँगा जैसे पहिया। सारे जानवर झूमते जाए, दिन सुहाने उनके आए। तभी पहुँचा जंगल का राजा, आँखें लाल हुई सुनकर बाजा। देता हूँ मैं सबको सजा, छीन लिया सोने का मजा। दहाड़ सुनकर वनराजा की, सिटटी-पिट्टी हो गई सबकी गुम, सीधी हो गई लहराती दुम। तभी हुआ एक अनोखा काम, शेर ने की ढीली गुस्से की लगाम। सबको खुश देखकर वह भी, गुस्सा अपना भूल गया, ढोल की थाप पर, वो खुशी से झूम गया। खुद ही बजाए ढोल ढम ढम ढम, नाचे सभी छम छम छम। ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

बाल कहानी - घमंडी का बाग

कहानी का अंश.... एक व्यक्ति था, वह बड़ा घमंडी था। उसका एक बाग था। घमंडी कुछ दिन के लिए शहर के बाहर गया था। स्कूल से लौटकर सभी बच्चे घमंडी के बाग में खेलते थे। वह बाग नरम घासवाला था। बाग बड़ा सुंदर था। पेड़ की टहनियों पर चिड़ियाँ गाती तो बच्चे उन्हें सुनने के लिए खेलना बंद कर देते थे। बच्चे बहुत खुश थे। एक दिन घमंडी वापस आ गया। अपने बाग में बच्चों को खेलते देखकर वह उन पर बहुत चिल्लाया। डर के मारे बच्चे भाग गए। घमंडी चिल्लाता रहा - यह बाग मेरा है। सिर्फ मेरा है। तुम यहाँ नहीं आ सकते। फिर घमंडी ने बाग के चारों ओर ऊँची दीवार बनवा दी। बाहर एक बोर्ड भी लगा दिया - बाग के अंदर आना मना है। फिर आया वसंत का मौसम। बाग में छोटे-छोटे फूल खिले। नन्हीं चिडिया चहकने लगी। घमंडी अपने पलंग पर लेटा था। उसने छोटी चिड़िया का मधुर संगीत सुना तो वह बाहर अाया। खिड़की के पास बैठी छोटी चिडि़या का गाना सुनकर उसे बहुत अच्छा लगा। उसने देखा कि कुछ बच्चे बाग की दीवार में बने एक छेद में से अंदर आ गए हैं और पेड् पर चढ़ गए हैं। आगे क्या हुआ यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए..

कविताएँ – शैलजा दुबे

कविता का अंश… वो हवा थी… हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। छूते ही उसके कुछ ऐसा हुआ असर, विस्मृत हुई पीडा, वेदना, दुख का मंज़र… हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। स्पर्ष उसका ऐसा लगा, मानो, माँ झुला रही हो झूला। सुला रही हो थपकी देकर। हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। उस हवा में थी रिश्तों की मिठास… अपनेपन का अहसास… किसी के आने की आस… हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। उस हवा में थी चाँदनी की शीतलतता, वसंत का आगमन, सावन के झूले, कोयल की कूक मनभावन। हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। पर, अचानक न जाने क्या हुआ, उस हवा में नहीं थी अब वो बात, वो थी क्षीण, असहाय, दुर्बल गात। लगी थी उसको किसी की नज़र… हाँ, वो हवा ही थी… जो पास से गई गुजर। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के साथ ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

कहानी - परछाइयों का जंगल - देवी नागरानी

कहानी का अंश... माँ को बड़ी मुश्किल से सहारा देकर बस में चढ़ाया और फिर मैं चढ़ी। बस धक्के के साथ आगे बढ़ी तो माँ गिरते-गिरते बच्ची। मैं भी उसे न संभाल पाई। एक दयावान वृद्ध ने अपने स्थान से उठकर उसे बैठने के लिए कहा और माँ एक आज्ञाकारी बालक की तरह सीट पर बैठ गई। मैंने टिकट ली और उसके साथ सटकर खड़ी हो गई। टैंकबंड बस स्टॉप पर उतरना था। कंडक्टर ने दो बार ज़ोर से पुकारा 'टैंकबंड, टैंकबंड' पर मैं अतीत की खलाओं में खो गई रही,जब इसी तरह सहारा देकर माँ ने मुझे पहले चढ़ाया था और बाद में खुद चढ़ी थी। बस चलने लगी पर फिर पाया कि कुछ छूट गया था,कुछ नहीं बहुत कुछ छूट गया था। पिताजी जो साथ साथ आए थे, पीछे रह गए थे। हड़बड़ी में वे चढ़ नहीं पाये या......! माँ का चेहरा ज़र्द, आंखें फटी फटी, गुमसुम आलम में वह बढ़बढ़ाते हुए अचानक चिल्लाने लगी-'अरे बस रोको, बस रोको,मुनिया के पिता पीछे रह गए हैं। अरे भाई रोको मुझे उतरने दो, वे पीछे रह गए हैं।' आवाज शोर में लुप्त सी हो गई और हवाओं से बातें करती बस टैंकबंड बस स्टॉप पर आकर ठहरी। माँ ने एक तरह से मुझे धक्का मारकर नीचे उतारा और खुद जैसे चलती बस से ही कूद पड़ी। पाँव जमीन पर टिक न पाए इसलिए वह औंधे मुंह ज़मीन पर गिर पड़ी, वहीं बस स्टॉप पर लोगों की भीड़ के बीच। जैसे कोई तमाशा हो मदारी का! लोग चलते चलते मुड़ मुड़ कर तिरछे नयनों से उसकी ओर घूरने लगे। सोचते होंगे यह कैसा पागलपन है कि बस अभी रुकी भी न थी कि वह कूद पड़ी। खैर ...तब मैं 8 साल की थी और आज 18 की हूँ, पहले से अधिक समझ सकती हूँ। याद है तब मैंने ज़मीन पर पड़ी माँ का हाथ थामा, और खींचते हुए उसे उठाने का लघु प्रयास किया। माँ सच में उठी और बस की विपरीत दिशा में लगभग दौड़ने लगी और उसका हाथ थामे हुए मैं उसी रफ्तार से साथ-साथ खिंची चली जा रही थी। इतना तो मैं समझ ही पाई कि माँ पीछे छूट गए मेरे पिता को खोजना चाहती थी। 'माँ रुको तो, मुझे दर्द हो रहा है।' मेरी रूआंसी सी आवाज़ फिर से शोर के कोलाहल में खो गई। 'अरी चल, जल्दी चल.... तेरे पिताजी न जाने कहाँ चले गए होंगे?' 'कहाँ जाएँगे माँ, कहीं नहीं जाएँगे, घर लौट जाएँगे।' 'अरी अब चुप भी कर, बस जल्दी चल। तू नहीं जानती.....!'इसके आगे माँ कुछ न कह सकी। आज उस चुपी का अर्थ मेरी समझ में आ रहा है। जो तब नहीं जानती थी अब जानने लगी हूँ। तब आठ आज 18 की हूँ। दस सालों में अपनों का दर्द,उनकी भावनाएं, उनकी खामोशी में चढ़ते -उतरते लावे के उफ़ान को खूब समझती हूँ,उनकी भावनाओं की हर आहट को दस्तक देते हुए महसूस करती हूँ। बड़ी होते-होते सच में बड़ी हो गई हूँ तभी तो माँ को एक बच्चे की तरह हाथ पकड़ कर पहले बस में चढ़ाया और फिर खुद चढ़ी। 'टैंकबंड, टैंकबंड,' कंडक्टर ने दो बार आवाज दी। मैं हड़बड़ाकर मां का हाथ पकड़कर उसे उतारने के पश्चात खुद उतरी, और उसका हाथ थामे हुए ही बस में चढ़ने और उतरने वाले लोगों की भीड़ से स्थगित हुई। हाथ छोड़ने का ख़तरा मैं नहीं ले सकती थी, बिलकुल भी नहीं। जिंदगी के उतार चढ़ाव भी ऊंट सी करवट बदलते,हिचकोले खाते हुए जीवन नौका को आगे तक धकेलते रहते हैं,ठीक उसी तरह जैसे 10 साल पहले माँ मुझे लगभग धकेलते हुए अपने साथ घसीटते हुए,एक पागलपन की हद तक पिताजी को खोज रही थी। यह सच है जब माँ ने कहा था 'तू नहीं जानती' सच मैं सचमुच नहीं जानती थी कि पिताजी घर न जाकर कहीं और चले जाएंगे। इंसान का ठिकाना तो उसका घर होता है। क्या भूला-भटका, थका-हारा, भूखा-प्यासा इंसान किसी राह पर गुमराह हो जाता है तो इस तरह भी खो जाता है जैसे मेरे पिताजी खो गए थे उस दिन? घर के पास आकर माँ ने कुंडी खोली, भीतर झाँका, पिताजी वहां नहीं थे। होते भी कैसे? कुंडी बाहर से बंद थी, मां ने खोली थी!' हे भगवान कहां गए होंगे? अब मैं कहां जाऊं किससे पूछूं? उन्हें तो अपनी खबर नहीं, होती तो घर न लौट आते।" और मां बिलख बिलख कर अपना माथा पीटने लगी। मेरी मासूमियत शायद इस दर्द को, उसके अर्थ को न जानते हुए खुद भी सुबक-सुबक कर रोने लगी। आज जानती हूँ माँ ने वह सफरकिस तरह अकेले काटा होगा, किस तरह तन्हा-तन्हा उस दर्द के आघात को सहा होगा, जिसने कतरा कतरा उसे रुलाया।मैंने बस साथ दिया। आज भी वह घर के किसी कोने में चुपचाप बैठे बैठे न जाने बेरहम जिंदगी के कई किस्सों का गणित करती रहती है। देखकर मेरा रोम रोम सिहर उठता है। क्या बेबस आदमी कुछ भी न कर पाने की स्थिति में ऐसा कुछ भी कर बैठता है या ऐसा हो जाता है अपने आप।बदन कांप गया... फ़क़त याद मात्र से। सिहरन तो तब भी हुई थी, जब मां ने मेरा हाथ झटक कर खुद को छुड़ाया और एक क्रंदन के साथ भीड़ को चीरती हुई पिताजी की लाश पर जा कर झुकी, झुकी क्या,उनपर गिर पड़ी। उनके पीछे-पीछे जाते मैंनेआंखों के सामने देखा वह नज़ारा,खून से सने हुए फर्श पर पड़े पिताजी को। तब नहीं जाना अब जानती हूँ। किसी मोटरकार ने उन्हें टक्कर मारी जिससे वे खुद को न संभाल पाये और गिर पड़े। बस क्षण भर में जिंदगी की हद पार करके मौत की हद में जा पहुंचे। कितनी महीन रेखा विभाजन करती है ज़िंदगी और मौत को! जो होना था वो हुआ। पर बाद में जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था। मां जब भी मुझे अपने सामने पाती,पिता की याद में तिल तिल जीते तिल तिल मरते, उनकी कही बातों को दोहराती जो दर्द बन कर उनके हृदय में समा गई थीं। पिताजी को मानसिक रोग ने ग्रस्त कर लिया था, और वे धीरे धीरे बहुत कुछ भूलते जा रहे थे...अपने होने की अवस्था को भी। तब मैं 2 साल की थी,ऐसा माँ ने बताया। और उस हालत में वह न मुझे अकेला छोड़ सकती थी न पिताजी को। सदा घर की कुंडी भीतर से बंद कर लेती ताकि वे कभी भूल से भी दरवाजा खोलकट बाहर न निकल जायें। कभी पिताजी को लेकर डॉक्टर के पास जाना होता तो मुझे भी साथ ले लेती,क्योंकि मैं छोटी थी। आफताब मेरा बड़ा भाई था, आज होता तो 22 साल का नौजवान होता। मुझे 4 साल बड़ा था। ‘वह होता तो यह सब कुछ न होता, खुदा की उसकी ज़्यादा ज़रूरत रही होगी, तभी तो......! आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

लघुकथा - रिटायरमेंट - रमेश‘आचार्य’

कहानी का अंश... जीवन के साठ बसंत पूरा करने के बाद आज मिस्टर शर्मा स्वयं को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त मान रहे थे। आज वे पैंतीस साल नौकरी करने के बाद अपने ऑफिस को अलविदा कहने जा रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर अपने घर में एक पार्टी का आयोजन किया था। इस पार्टी में उनके ऑफिस के सहकर्मी, रिश्तेदार और पास-पड़ोस के सभी लोग शामिल थे। यह पार्टी किसी विवाह समारोह से कम न थी। सभी मिस्टर शर्मा और मिसेज शर्मा की खूब तारीफ कर रहे थे, साथ ही उनके तीनों बेटों-बहुओं के व्यवहार की भी प्रशंसा कर रहे थे। आज कई सालों के बाद मिस्टर शर्मा और मिसेज शर्मा आपस में खूब हँस-हँस कर बातें कर रहे थे, क्योंकि तीनों बच्चों के लालन-पालन में वे इतना व्यस्त हो गए थे कि एक घर में रहकर भी एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का वक्त न निकाल सकें। वे अपनी पत्नी से बोले - ‘‘हम अपने बच्चों के प्रति माँ-बाप का फर्ज अदा कर चुके हैं। आज से हम आजाद हैं और अब अपनी मर्जी से जिएँगे। तभी उनके बॉस आए और बोले - ‘‘मिस्टर शर्मा आप बहुत ईमानदार, मेहनती और संकल्पी हो, आप हम सब के लिए भी एक मिसाल हो। आपने अपने तीनों बच्चों को इतनी बढिय़ा तालीम दिलवाई कि वे आज ऊॅंचे पदों पर काम कर रहे हैं।’ वे बोले - ‘‘नहीं सर, यह प्रेरणा तो मुझे आप लोगों के साथ काम करके मिली है।’एक सप्ताह के बाद मिस्टर शर्मा की सबसे बड़ी बहू आई और बोली-‘‘पापा, मुझे आप से कुछ कहना है क्यों क पिंकी के पापा का आपसे कहने का साहस नहीं हो रहा है।’ उन्होने पूछा-‘‘ कहो बेटी, ऐसी क्या बात है?’’ पापा, आप तो जानते ही हो कि पिंकी भी अब दसवीं क्लास में पढ़ रही है और उसका बोर्ड एग्जाम है। इतने छोटे घर में उसकी स्टडी में प्रॉब्लम आएगी। पिंकी के पापा को ऑफिस की और से फलैट अलॉट हो चुका है, इसलिए हमने वहाँ जाने का मन बना लिया है।’ मिस्टर शर्मा बोले-‘‘इसमें घबराने की क्या बात है, हमें तो खुशी है कि तुम अपनी जिम्मेदारी समझने लगे हो।’ कुछ दिन बाद उनका मँझला बेटा आया और बोला - ‘‘ मम्मी-पापा आपके लिए एक गुड न्यूज है। मुझे अपने ऑफिस की ओर से दो साल के लिए अमेरिका जाने का ऑफर मिला है और मैं यह चांस खोना नहीं चाहता हूँ लेकिन आप जानते हैं कि मैं खाने-पीने के मामले में कितना लापरवाह हूँ। मैं सुमित्रा और बच्चों को भी साथ ले जाना चाहता हूँ। बस, आपकी परमीशन और आशीर्वाद चाहिए।’ मिस्टर शर्मा बोले- ‘‘ हमारा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है, जहाँ जाओ, खुश रहो।’ आगे क्या हुआ यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए… संपर्क -ईमेलः acharya214@yahoo.in मोबाइल-9560902794

कहानी - मंगला - अर्चना सिंह ‘जया’

कहानी का अंश... मंगल यानी जीवन में सब शुभ ही शुभ। फिर तो मंगला के जीवन में सब मंगल ही मंगल होना चाहिए, पर जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझती मंगला जीवन के एक ऐसे पड़ाव पर खड़ी थी जहाँ उसे अपने स्त्री होने पर गर्व की बजाए अफसोस हो रहा था। हो भी क्यों नहीं? समाज जैसे पुरुषों के ताने-बाने से ही बुना गया हो जहाँ स्त्री की भावनाओं का कोई महत्व ही नहीं था। यह बात स्कूल के दिनों की है, जब मैं चौथी कक्षा में थी। मेरी सहेली मंगला एक दिन गुमसुम अकेली बैठी थी तभी मैंने उसके करीब जाकर टिफिन की डिब्बी बढ़ाते हुए पूछा,‘‘क्यों आज तुम टिफिन नहीं लाई हो? उसने रुवासे स्वर में कहा - ‘नहीं । भाभी मुझसे नाराज हो गईं और टिफिन नहीं दिया।’ मेरे दिमाग में प्रश्न दौड़ने लगे और मैंने पूछा -‘ क्यों माँ….। अभी प्रश्न पूर्ण भी नहीं हुआ था कि मंगला रो पड़ी और कहा - ‘ माँ नहीं है।’ बस इतना सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन ही खिसक गई। मैं माँ के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। बस, स्कूल में एक मुलाकात और मित्रता का आरंभ हो गया। दोनों प्रतिदिन स्कूल में साथ-साथ ही समय व्यतीत किया करते। उसके चेहरे पर मासूमियत तो थी, पर माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट नज़र आतीं थीं। घर पर भाभी की डाँट-फटकार, पिता के पास धन का अभाव और छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी भी मंगला के हिस्से ही आ गई थी। छुट्टी के दिन भाभी के काम में हाथ बँटाना, भाईयों के कपड़े धोना आदि जैसे मंगला के समय सारणी में था। हमारे घर का माहौल मंगला के घर के बिल्कुल ही विपरीत था। हम तीन बहनें ही थीं। हमें शिक्षा प्राप्त करने में किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं थी, माँ का सहयोग बराबर ही मिलता रहा। माँ सदा से ही हमें शिक्षा के महत्त्व को समझाया करती थीं। स्वावलंबी बनने को प्रेरित किया करती थीं। पिताजी भी बदलते समय के साथ अपने विचारों में भी परिवर्त्तन लाते थे। मंगला की शादी बारहवीं पास होकर ही हो गई थी जबकि मेरी एम ए, बी एड के बाद हुई थी। शादी के बाद भी मैंने पी. एच-डी पूरी की। मेरी शादी एक सुशिक्षित परिवार में हुई। मंगला शादी के पश्चात कानपुर चली गई थी। उसका पति इंटर कॉलेज का मास्टर हुआ करता था। शादी के पाँच वर्ष में ही दो बेटे हो गए थे। मैंने उसे पत्र लिखकर बधाई भी दी,‘‘ अब तो बड़े मजे हो रहे होंगे, ईश्वर ने तुम्हें छोटा और सुखी परिवार दिया है।’ कई वर्ष बीत गए किन्तु पत्र का जवाब नहीं आया। धीरे-धीरे महीने, साल बीतते चले गए मैं भी अपने परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त होती चली गई। जीवन के उधेड़ बुन में वक्त का पता ही नहीं चला। मेरी बेटी भी बड़ी हो गई। उसने एम बी ए बैंगलोर के कॉलेज में दाखिला ले लिया था। मैं जिस स्कूल में पढ़ाती थी उसमें गर्मी की छुट्टियॉं आरंभ हो चुकी थीं तो मैंने मायके जाने का निर्णय लिया। जिस ट्रेन से मैं जमशेदपुर जा रही थी उसी में मंगला भी अपने बड़े बेटे के साथ सफर कर रही थी। एक दूसरे को देखकर हमारे खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। मंगला की आँखों से आँसू छलक पड़े। मैं समझ बैठी कि खुशी के आँसू हैं पर ये मेरी भूल थी। घंटों हम दोनों ने बातें की। आज मैं कई बातों को समझ पाने में असमर्थ थी। सच ईश्वर किसी की परीक्षा जीवन के अंतिम पड़ाव तक लेता रहता है। ईश्वर पर आस्था की डोर कमजोर पड़ रही थी। मंगला के जीवन पर जैसे शनीचर देवता का प्रभाव हो। पुरुष प्रधान समाज में तो मेरे विचार से पुरुषों का ही दायित्व होना चाहिए कि वह बहन, बेटी, बीवी व माँ की जिम्मेदारी उठाए। वह स्त्री के अस्तित्व का मान रखे। आखिर समाज की प्रथा क्या है? कई घरों में अगर स्त्री बेटी को जन्म देती है तो यातनाएँ सहती हैं। सुंदर, व्यवहार कुशल नहीं है तो शादी में मुश्किलें आतीं हैं। किन्तु मंगला तो शिक्षित, कुशल और दो बेटों की माँ थी फिर क्यों पति के प्यार से वंचित थी? अब स्टेशन पर उतर कर हम दोनों ऑटो में बैठ कर अपने अपने घर की ओर चल पड़े। मंगला को लेने उसके जेठ आये थे। मंगला के पति तीन भाई थे। ये तीसरे नम्बर पर थी। मंगला के बड़े बेटे को कुछ दिमागी समस्या थी वो उसे ही दिखाने रॉंची अक्सर आया करती थी। मैंने अपने घर पहुँचकर माँ को मंगला के विषय में बताया। माँ ने कहा - ‘बेचारी मंगला और उसका नसीब।’समय भी लाचार व बेबस होता है, उसे किसी के दुःख या सुख से कोई मतलब नहीं होता। उसे पल-पल गुजरना ही पड़ता है वो ठहरना तो जैसे जानता ही नहीं।’ माँ की बातें सुनकर मैंने कहा - ‘अच्छा ही है न माँ वरना दुःख के पल थम जाए तो क्या हो? ‘ पर बेटा, ये क्या? मंगला के जीवन से दुःख के पल क्यों नहीं गुजर जाते हैं? आखिर क्या हुआ होगा मंगला के साथ? क्यों उसका जीवन उदासी से भरपूर था? जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

ग़ज़ल – 2 – विमल कुमार शर्मा

ग़ज़ल का अंश… रेत के ये ढेर मुझसे आज कुछ कहने लगे, ये मरुस्थल आज क्यों अच्छा मुझे लगने लगा। सर्द हवा ने रेत पर तस्वीर तेरी खींच दी, देखकर चेहरा तेरा अच्छा मुझे लगने लगा। रोशनाइयों में क्यों अब मन मेरा लगता नहीं, अब अंधेरों का सिला अच्छा मुझे लगने लगा। सादगी इस शख्सियत में आ गई है इस कदर, जो भी हो जैसा भी हो अच्छा मुझे लगने लगा। इन अंधेरे रास्तों का अब सफर थमता नहीं, यादों का तेरी काफिला अच्छा मुझे लगने लगा। याद तेरी आ रही है एक खिलौने की तरह, मन मेरा क्यों आज फिर बच्चा मुझे लगने लगा। टूटे स्वप्न पीठ पर लादे चला था मैं कही, बातों का तेरी कारवाँ अच्छा मुझे लगने लगा। इस कदर मशगूल रहता हूँ मैं खुद में आज कल, अपना शक्लों मिजाज भी अच्छा मुझे लगने लगा। ऐसी ही कुछ चुनिंदा ग़ज़लों का मजा ऑडियो की मदद से लीजिए…

हास्य कविता - "एकतरफ़ा प्यार" - सूर्यकुमार पांडेय

कविता का अंश.. इक चाँदनी-सी लड़की, स्मार्ट दिख रही है, वह दूर देश से ख़त 'इन्बॉक्स' लिख रही है। उससे नहीं मिला मैं, मुझसे नहीं मिली वह, मैं जानता नहीं हूँ, किस बाग़ की लिली वह। ख़ुशबू हरेक अक्षर में गीत भर रही है, पर एक ख़त वो कइयों को टैग कर रही है । जिस-जिस को ख़त मिला, वह उन सबको अपनी लगती, आकांक्षा मिलन की हर हृदय में सुलगती। है शशिमुखी, सभी का तम दूर कर रही है, वह चाँदनी सभी के आँगन में भर रही है । यह मानता हूँ, चेहरा लाखों में एक उसका, यूँ भाव से है सच्ची, पर चित्र 'फेक'उसका । कुछ ग़लत लिख गया तो अब एंड कर ही देगी, यह भी पता है, मुझको 'अनफ़्रेन्ड' कर ही देगी। इक चाँदनी-सी चाहत से, हाय! डर रहा हूँ, वह 'फेक' है या 'रीयल', मैं प्यार कर रहा हूँ। इस कविता का अानंद ऑडियो की मदद से लीजिए....

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

कविताएँ - 2 - भारती पंडित

कविता का अंश... उम्र छोड़ती जाती है पदचिह्न चेहरे पर हमारे कदम दर कदम झुर्रियाँ , झाइयाँ ,धब्बे बनकर शायद ही छुपा पाते हैं प्रसाधन उन्हें उम्र छोड़ती जाती है पदचिह्न शरीर पर हमारे कदम दर कदम मोटापा, रक्तचाप,संधिवात बनकर शायद ही मिटा पाती है दवाएँ जिन्हें कुछ पदचिहन छोड़ती है उम्र समझ पर भी कदम दर कदम बड़प्पन और सुन्दर विचार बनकर नहीं पड़ती ज़रूरत छिपाने की जिन्हें क्योंकि जीवन सार्थक कहलाता है इनके ही होने पर। ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... सम्पर्क - bhartipandit@gmail.com

कविताएँ - 1 - भारती पंडित

कविता का अंश... जीवन उम्मीदों का प्यारा सा गाँव है कभी धूप ग़म की है, कभी सुख की छाँव है। खेता जा पतवारें, क्यों माँझी तू हारे कभी घिरती भँवर में, कभी तीरे नाव है। सोच-समझ चलता जा चालें शतरंज की कभी शह है हिस्से में, कभी उलट दाँव है। हर डगर हो आसान, ऐसा हुआ है कब कभी फूल राहों में, कभी शूल पाँव हैं। ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... सम्पर्क - bhartipandit@gmail.com

लघुकथा - आधुनिक श्रवण - रमेश ‘आचार्य’

कहानी का अंश... मिस्टर सक्सेना को इस अकेलेपन में रह-रह कर अपनी पत्नी सुनंदा की याद सता रही थी। साथ ही उन्हें अपनी पत्नी के वे शब्द भी याद आ रहे थे जो उन्होंने मरते समय उनसे कहे थे कि कभी भी अपनी पैतृक संपति को न बेचना। वक्त का कोई भरोसा नहीं है। आज वे पत्नी द्वारा कहे गए शब्दों को सच होते देख रहे थे। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों के पालन-पोषण और पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी न होने दी। अपने स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए सदा उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखा। लेकिन वे अपने दोनों पुत्रों की मीठी-मीठी बातों में आ गए और अपनी पैतृक संपति बेच दी ताकि उनके पुत्र अपना बिजनेस और आगे फैला सकें। वे सोचते थे कि उनके पुत्र बुढ़ापे में उनकी लाठी बनेंगे। लेकिन अब उनका भ्रम पूरी तरह दूर हो चुका था क्योंकि दोनों पुत्र अपने-अपने परिवार में मस्त थे। मिस्टर सक्सेना फुटबाल की भाँति कुछ-कुछ दिनों के अंतराल के बाद दोनों के घर शरण लेते थे। उन्हें लगता था कि मानो वे एक शरणार्थी है और वे जीने के लिए नहीं बल्कि मरने के लिए जी रहे हैं। फिर भी वे इसका दोष स्वयं को देते थे। अब तो वे केवल अपने पोते-पोतियों को देखकर अपने दुखी मन को किसी तरह बहला रहे थे अन्यथा उनके जीवन में एक रिक्तता के सिवाय कुछ न था। उस दिन वे अपने छोटे पोते के साथ खेल रहे थे कि न कहाँ से अचानक उनके दोनों पुत्र आ धमके। उन्होने अपने दोनों पुत्रों को महीनों के बाद देखा तो सकते मे आकार पूछा- "कहो क्या बात है?" तभी उनका बड़ा बेटा बोला- "पापा, आप तो देख ही रहे है कि हमार काम-काज कितना बढ़ गया है और हमें व्यापार के सिलसिले मे अक्सर बाहर आना-जाना पड़ता है। सो इस कारण हम आपकी सही तरीके से देखभाल भी नहीं कर पा रहे हैं। और आपको भी बार-बार हमारे पास आना-जाना पड़ता है। हम जानते हैं कि इससे आपको भी बहुत तकलीफ होती है।"... इस अधूरी कहानी को पूरा जानने के लिए आॅडियो की मदद लीजिए... सम्पर्क - acharya214@yahoo.in

बाल कहानी - अकलची बंदर - डॉ. रश्मि शील

कहानी का अंश... किसी गाँव में अहमद नाम का एक ग़रीब आदमी रहता था। वह अपने हाथ से रंग-बिरंगी टोपियाँ सिलता और फिर उन्हें टोकरी में सजाकर गाँव-गाँव फेरी लगाकर बेचा करता। उससे जो लाभ होता उससे अपना व अपने परिवार का पेट पालता। एक बार जब वह टोपियाँ बेचने गया तो उसकी बहुत सी टोपियाँ नहीं बिक पाईं। गर्मी के कारण उसकी हालत ख़राब हो रही थी। वह भूख-प्यास से व्याकुल था, उसका सारा शरीर पसीने से तर-बतर था। तभी उसे एक बाग़ नज़र आई। "कुछ समय यहीं आराम कर लूँ, उसके बाद अपनी बाक़ी बची टोपियाँ बेचूँगा।" यह सोचकर वह एक बड़े पेड़ की घनी छाया के नीचे बैठ गया और अपने पास बँधे गुड़-चने को खाकर, पानी पीकर उसी पेड़ के नीचे लेट गया। ठण्डी हवा लगते ही उसे नींद आ गई। बहुत देर तक सोते रहने के बाद उसकी आँख खुली तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसकी टोकरी में एक भी टोपी नहीं थी। वह सोचने लगा कि "इस बाग़ में उसकी टोपी कौन चुरा ले गया।" वह चारों तरफ अपनी टोपियाँ ढूँढने लगा। तभी उसे पेड़ के ऊपर से खो-खो की आवाज़ सुनाई दी। ऊपर देखा तो उस पेड़ पर बहुत से बंदर थे और वे बंदर उसकी टोपी अपने सिर पर लगाए बैठे थे। अहमद ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह बंदर उसकी टोपियाँ लौटा दें। मगर उसकी कोशिश बेकार हो रही थी। इसी समय उसका ध्यान इस ओर गया कि "वह जो भी कर रहा है, पेड़ पर बैठे बंदर भी वह काम कर रहे हैं।" फिर क्या? उसने एक तरक़ीब निकाली। उसने अपने सिर की टोपी को एक दो बार हवा में उछाला और फिर उसे ज़मीन पर पटक दिया। बंदरों ने भी अहमद की नक़ल करते हुए अपने सिरों की टोपियाँ ज़मीन पर फेंक दीं। अहमद ने ज़मीन पर पड़ी सारी टोपियाँ एकत्र कीं और उन्हें अपनी टोकरी में रखकर बेचने चला गया। समय बीतता गया। समय के साथ ही अहमद की आने वाली पीढ़ियाँ बदलती गईं। उन्होंने अपने ख़ानदानी टोपी बनाने के हुनर को आगे आने वाली पीढ़ी को सौंपा। अपने ख़ानदानी पेशे के साथ ही अपनी बुद्धिमानी का सबक भी उन्हें याद कराया। कई पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद उसी ख़ानदान का होनहार "वारिस" आदिल, जो अपने ख़ानदानी पेशे से जीवनयापन कर रहा था, इत्तिफ़ाक से उसी बाग़ से गुज़रा। वहाँ चलने वाली शीतल सुगन्धित वायु ने उसके मन को मोहित कर लिया। उसने वही पर खाना खाकर पल भर आराम करने का मन बनाया। खाना खाकर लेटते ही वह सो गया। जागने पर देखा कि "टोपियाँ ग़ायब हैं।" ऊपर देखा तो पाया कि "पेड़ पर बैठे बंदरों ने टोपियाँ अपने सिरों पर सजा रखी हैं।" उसे अपने पूर्वजों से सुनी गई अहमद की कहानी याद आई। सोचा, "बस, अभी अपनी टोपयाँ वापस लेता हूँ।" क्या बंदरों ने आदिल को टोपियाँ वापस दी? आदिल ने क्या उपाय किया? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए... सम्पर्क - rashmisheel.shukla@gmail.com

बाल कविताएँ - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता का अंश... अब मत चला कुल्हाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। देख रहा तू कुल्हाड़ी , इसी ने काटे कई पेड़। नहीं किसी को छोड़ा बंदे, बूढ़े युवा अधेड़। भूखी नदिया सूखे नाले, नंगी हुई पहाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। कहाँ मकोरे कहाँ करोंदे, झरबेरी की बाड़? लुच, लुच लाल गुमचियाँ ओझल, जंगल हुये उजाड़। घूम रहे जंगल में आरे, नहीं रुक रही गाड़ी ब‍ंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। बादल फटा जलजले जैसा, पानी ढेरम ढेर। एक दिवस में तीस इंच तक, हुआ गजब अंधेर। सूखा पसरा बाढ़ आ गई, धरती बहुत दहाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। दो पहिया, मोटर, कारों के, सड़कों पर अंबार। आसमान में ईंधन छोड़ें, विष से भरे गुबार। कान फोड़ते कोलाहल ने, भू की छाती फाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। पर्यावरण प्रदूषण की यूँ, होती घर घर बात। किंतु समस्या के निदान में, नहीं किसी का साथ। बना नहीं कोई भी पाया, सबने बात बिगाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। अभी समय है अब भी चेतो, दुनियाँ भर के देश। चीन अमरिका ने ओढ़े हैं, नकली झूठे वेश। पर्यावरण प्रदूषण के ये, सबसे बड़े खिलाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। ऐसी ही अन्य कविताओं को सुनने के लिए आॅडियो की मदद लीजिए...

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

चुप क्यों हैं पाकिस्तानी कलाकार






 हरिभूमि में प्रकाशित आलेख

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सन स्टार में प्रकाशित आलेख

एक फूल खिलना चाहता है - गोविंद कुमार गुंजन

निबंध का अंश... हवा में कसमसाहट-सी महसूस होती है। भीतर कुछ कसकता है। एक कातरता, एक उद्वेग और क्लांति मन पर छाई हुई है। मैं खिड़की खोलकर देखता हूँ तो उस हवेली के पीछे का उजाड़ हिस्सा नज़रों में छा जाता है। वह हवेली पिछले कई सालों से बंद थी। उसके ऊपरी गुंबदों में कबूतरों ने घर बना लिया था। गाँव से दूर एकाकी इस हवेली के आसपास की खाली जगह में घास-पात ज़रूर उगा हुआ था, पर वक्त के साथ वह सब सूख चुका था। पिछले एक-दो सालों में तो ठीक से बारिश का पानी तक नहीं मिला था, इसलिए और भी अजीब-सी वीरानी छा चुकी थी। मैंने सुबह इस हवेली को खुलवाया था। एक मज़दूर सफ़ाई के लिए लगाया था। वह सफ़ाई में व्यस्त था, और मैं कुर्सी पर पड़े-पड़े कुछ पढ़ रहा था। सांसों में कुछ कसैली गंध आ रही थी। मन पढ़ने में नहीं लग रहा था। दोपहर का समय था। मैंने खिड़की खोली तो हवेली के पीछे का उज़ाड़ मैदान नज़र आया। दूर एक पहाड़ी दिखती थी। आसपास कुछ पेड़ थे जिनके पत्तों की चमक खो चुकी थी। मुझे कुछ अजीब-सा लग रहा था। वातावरण में एक अलग तरह की गंध फैली थी। अचानक मेरी दृष्टि मैदान के एक कोने में गई, वहाँ एक पौधा वातावरण से अनजान हरियाली चादर ओढ़कर मुस्करा रहा था। उसकी शाख पर एक अधखिली कली नींद से अलसाई हुई थी। लगता था यह कली अभी अपना पूरा मुँह खोलकर बगासी लेगी और अपनी आँखें खोल देगी। मैंने देखा उस पौधे की पत्तियाँ उस कली पर अपनी हरी चादर से छाया कर रही थीं। पौधे की शाखाओं में एक चौकस सजगता थी। वहाँ एक फूल का जन्म होने वाला था। एक अतिरिक्त देखभाल में पत्तियाँ सजगता से उस कली को सँभाल रही थीं। मुझे उन पत्तियों में एक तालबद्ध, नादपूर्ण और सराग कर्तव्य निष्ठता निनादित होती लगी। मैं चकित हुआ। मैंने देखा है किस प्रकार नए बच्चे के जन्म पर चिंतित एक गरीब परिवार में घबराहट व्याप्त रहती है। मैंने बिना स्वागत के जन्म लेते हुए मनुष्य के बच्चों को भी देखा है। कांसे की थाली बजाकर बच्चे के जन्म की खुशी मनाती हुई मानवी खुशी का और खोखली हाड़-मांस की पुतलियों की दुर्दशा होते हुए भी देखा है। ऐसे में बच्चे का जन्म किसी खुशी का नहीं, संताप की स्तब्धता का रूप ले लेता है। मुझे इतना झकझोरा हैं इस सच ने कि मनुष्य के जन्म तक को इतना अवांछित समझने वाली इस दुनिया में कई बार मनुष्य की गरिमा पर मुझे अपना भरोसा बनाए रखना तक कठिन जान पड़ा है। ऐसी दुनिया में एक फूल के जन्म को लेकर किसी पौधे की शाखाओं और पत्तियों में एक ऐसी धृतिमान और लालसाहीन ललक पाकर मैं मनुष्य होने की अनुभूति का सुखद पारितोषिक पा गया। मैं निहाल हो रहा था इस नज़ारे पर, सचमुच यह विलक्षण अनुभूति थी। मैं हवेली का दरवाज़ा खोलकर उस पौधे के पास जा पहुँचा। मैं उसके पास ज़मीन पर बैठ गया। मैं उस उष्मा को अपनी सांसों से छूना चाहता था। मैं सूरज की किरणों में उस कलिका के प्रसव हेतु आकाश मार्ग से उतरती हुई सावित्री रूपी ममतामयी धाय को आते देख रहा था। मैंने उस कलिका को धारण कर रही डाली की आभा को देखा उसका प्रभास ललाम था। उस हरित उज्ज्वल डाल ने ताज़े पत्तों से कलिका का बदन ढांप रखा था। वहाँ फूल खिलना चाह रहा था। यह चाहत बड़ी प्यारी थी। मैं उसके पास बैठकर स्वस्ति वाचन करने लगा। मैं उस फूल का स्वागत कर रहा था, जो अभी-अभी चटखेगा और इस विशाल ब्रह्माण्ड में अपनी नगण्य-सी उपस्थिति दर्ज कराएगा। उसकी नगण्यता उसकी अल्पता नहीं, ब्रह्माण्ड की विशालता का एक निर्मम नियम मात्र है, जिसमें नगण्य होते हुए भी उस एक फूल की महिमा कम नहीं होगी। उसका पराग उसका सौरभ उसकी गंध हवाओं की गोद में खेलेगी, और आकाश छू आएगी। उसे कोई नहीं जानेगा, पर वह अपनी अल्पज्ञता में ही अपनी पहचान स्वयं करेगी और अपने निर्वाण को प्राप्त होगी। उस फूल का खिलना व्यर्थ नहीं जाएगा इतना मुझे विश्वास है इसलिए मैं उसके जन्म के क्षणों का साक्षी होने और इस ब्रह्मांड में उसके आगमन का स्वागत करने हेतु तत्पर बैठा हूँ। इधर हवाओं में कसैली-सी गंध फैली हुई हैं। यह गंध बारूद की गंध है। धरती पर हर पल हर क्षण कहीं न कहीं कोई युद्ध चल रहा है। मिसाइलें दागी जा रही है। परमाणु परीक्षण हो रहे हैं। घातक बीमारियों के जीवाणुओं को भी हथियार बनाकर आदमी के भीतर बैठा राक्षस अट्टाहास कर रहा है। मासूमियत घबरा रही है। कोमलताएँ काँप रही हैं। सुंदरताएँ मुरझाए जा रही हैं। संवेदनाएँ मूर्छित है। कोई दैत्य अपने विशाल पैरों के नीचे चीटियों की तरह ज़िंदगियों को कुचलता हुआ चला जा रहा है, ऐसे में अपनी दुनिया से अनजान यह नन्हा-सा फूल खिलना चाह रहा है। आखिर क्यों? मैं उस फूल से पूछता हूँ। तुम यहाँ क्यों खिलना चाहते हो? क्या तुम्हें पता है कि जिस वीराने में तुम अपना सौंदर्य, रूप, रस और सुगंध लेकर पल भर के लिए खिलना चाहते हो, क्या वहाँ किसी के पास उस एक पल का मोल समझने का माद्दा भी है या नहीं? क्या तुम्हें पता है, हवाओं में उड़ती हुई यह राख किसी चूल्हे से नहीं किसी श्मशान से चली आ रही हैं। तुम्हारे जन्म से पहले अपनी श्मशानी-बारूदी राख के द्वारा तुम्हारा अभिषेक करने वाला यह मृत्यकामी संसार तुम्हारे जन्म के लिए ज़रा भी उत्सुक नहीं लगता फिर तुम क्यों यहाँ खिलना चाहते हो? क्या तुम्हें यहाँ खिलते हुए डर नहीं लगता? इस अधूरे निबंध को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कहानी - गुलाबी शॉल - सपना शिवाले सोलंकी

कहानी का अंश… माँ की तबियत खराब होने की खबर सुनकर शशि का मन बेचैन हो उठा। उसने तुरंत सुधीर को फोन कर टिकट बुक करने के लिए कहा। सुधीर ने कुछ देर बाद बताया कि कन्फर्म टिकट नहीं मिल रहा है। जब मिल जाएगा, तब चली जाना। उन्होंने उसे बहुत समझाया लेकिन शशि नहीं मानी और आनन-फानन में अपना सूटकेस तैयार कर लिया। जाड़े के दिन थे, इसलिए सूटकेस में गरम कपड़े भी रखने जरूरी थे। शशि ने एक ओवरकोट पहना और ऊपर एक गुलाबी शॉल अपनी पसंद का डाल दिया। स्टेशन पहुँच कर जो डिब्बा पहले दिखाई दिया उसी में जाकर खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गई। कोई आएगा तो देखा जाएगा। यह सोचते हुए वह उस खाली सीट पर बैठ गई। तभी उसे खिड़की के बाहर एक तीन-चार साल का मासूम दिखाई दिया। ठंड के कारण वह ठिठुर रहा था। वह बड़ा मासूम था। शशि का मन उसे देखकर करूणा से भर गया। मन किया कि अपनी शॉल उसे ओढ़ा दे। उसने शॉल को अपने कंधे से उतारा और उसकी कशमीरी कढ़ाई को प्यार से सहलाया। अचानक उसे याद आया कि वह शॉल तो उसे सुधीर ने दी थी। जब वे लोग हनीमून के लिए गए थे, तो शिमला की मॉल रोड से सुधीर ने उसके लिए ये शॉल खरीदी थी और प्यार से उसके कंधे पर ओढ़ा दी थी। मधुर स्मृति में खोकर उसने वह शॉल उसे ओढ़ाने का अपना इरादा बदल दिया। ट्रेन चल पड़ी और वो प्लेटफार्म पर खड़े उस मासूम को देखती रही। धीरे-धीरे सब कुछ आँखों से ओझल हो गया। वह बच्चा भी। उसने अपने आप को समझाया। लेकिन उसे बार-बार उस बच्चे का खयाल आता रहा। आखिर शशि ने क्या किया? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

प्रेरक कहानियाँ…..

कहानी का अंश… एक बार युद्ध चल रहा था। कई सिपाही घायल हो गए थे। इसी दौरान एक सिपाही युद्ध क्षेत्र में अपने घायल साथी सिपाही के पास पहुँचने को उतावला हो रहा था। यह देख कप्तान बोला – जाने से पहले सोच लो, वहाँ जाना अपनी जान भी जोखिम में डालने जैसा है। वैसे भी जब तक तुम अपने साथी के पास पहुँचोगे, हो सकता है, तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी हो। इसके बावजूद सिपाही युद्ध क्षेत्र में गया और अपने साथी को वापस ले आया। साथी का शव सिपाही के कंधे पर देख कर कप्तान बोला, मैंने कहा था कि वहाँ जाना व्यर्थ ही होगा, देखो वह जीवित नहीं है। सिपाही की आँखों में आँसू थे। वह बोला – सर, मेरा वहाँ जाना सार्थक रहा, क्योंकि जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मेरे मित्र की साँसे चल रही थी। मुझे देखकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई और उसके आखरी शब्द थे – मैं जानता था मित्र कि तुम जरूर आओगे। यह होता है, मित्रता का भरोसा। ऐसी ही अन्य प्रेरक कहानियाँ ऑडियो की मदद से सुनिए….

प्रेरक कथा – हैलो ने बचाई जान

कहानी का अंश… एक व्यक्ति एक कोल्ड स्टोरेज में काम करता था। एक बार वह एक तकनीकी समस्या को सुलझाने में इतना व्यस्त हो गया कि उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। बहुत देर हो गई और फिर स्टोरेज बंद करने का समय भी हो गया। सारे सहकर्मी चले गए अैर संयंत्र के दरवाजे भी बंद कर दिए गए। तब कहीं जाकर उस व्यक्ति का ध्यान उस ओर गया। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसकी आवाज भी बंद दरवाजे से बाहर नहीं पहुँच सकती थी। वह जमाना मोबाइल फोन का जमाना भी नहीं था कि किसी को मोबाइल की सहायता से सूचना दी जाए। दूसरी तरफ वह व्यक्ति घर में अकेला ही था। इसलिए स्पष्ट था कि उसकी खोज-खबर लेने के लिए भी कोई नहीं आएगा। ऐसे में क्या किया जाए? वह व्यक्ति परेशान हो गया। धीरे-धीरे कोल्ड स्टोरेज की ठंड बढ़ने लगी। व्यक्ति की हालत खराब होने लगी। आखिर उसने मान ही लिया कि अगले दिन तक उसका बर्फ की तरह जमकर मर जाना तय है। तभी एक चमत्कार हुआ!!!! क्या था वह चमत्कार? यह जानने के लिए इस ऑडियो की मदद लीजिए…

प्रेरक कथा – ईश्वर से मुलाकात – भारती परिमल

कहानी का अंश… एक छोटा बच्चा था, मनु। मनु बहुत ही प्यारा बच्चा था। उसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी। घर में दादा-दादी, मम्मी-पापा सभी उसका कहना मानते थे, लेकिन मनु को लगता था कि वे सभी हमेशा उसे टोकते ही रहते हैं। मनु, होमवर्क किया कि नहीं? मनु बैग ठीक किया कि नहीं? मनु अपना खाना पूरा खाओ। देखो तुमने रोटी आधी छोड़ दी है। मनु अपनों की इस रोक-टोक से तंग आ गया था। उसने सोचा कि एक दिन ईश्वर से मुलाकात करूँगा और उनसे पूछूँगा कि उन्होंने ऐसी दुनिया क्यों बनाई। आखिर एक दिन वह ईश्वर की खोज में निकल ही पड़ा। क्या पता, कब ईश्वर से मुलाकात हो, शाम हो जाए!!!! यह सोचकर उसने अपने साथ बैग में कुछ नाश्ता और पानी की बॉटल भी रख ली। चलते-चलते वह थक गया और पहुँच गया एक पार्क में। रविवार होने के कारण पार्क में कुछ भीड़ भी थी। बच्चे खेल रहे थे। आखिर वह थककर एक बैंच पर बैठ गया और उन्हें खेलता हुआ देखने लगा। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से चिप्स का पैकेट निकाल कर खाने लगा। इतने में उसने देखा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति उसी बैंच पर किनारे की ओर आकर बैठ गए हैं। वे पसीने से भीगे हुए थे और काफी थके हुए लग रहे थे। मनु ने अपना चिप्स का पैकेट उनकी तरफ बढ़ा दिया। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए इस ऑडियो की मदद लीजिए…

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

कविताएँ - 2 - अशोक अंजुम

कविता का अंश... करे कोशिश अगर इन्सान तो क्या-क्या नहीं मिलता, वो उठकर चल के तो देखे जिसे रास्ता नहीं मिलता। भले ही धूप हो कांटे हों पर चलना ही पड़ता है, किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता। कमी कुछ चाल में होगी , कमी होगी इरादों में, जो कहते कामयाबी का हमें नक्शा नहीं मिलता। कहें क्या ऐसे लोगों से जो कहकर लड़खड़ाते हैं, कि हम आकाश छू लेते मगर मौक़ा नहीं मिलता । हम अपने आप पर यारो भरोसा करके तो देखें, कभी भी गिडगिडाने से कोई रुतबा नहीं मिलता। इस कविता के साथ-साथ अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविताएँ - 1 - अशोक अंजुम

कविता का अंश... पीड़ा का अनुवाद हैं आँसू, एक मौन संवाद हैं आँसू। दर्द, दर्द बस दर्द ही नहीं, कभी-कभी आह्लाद हैं आँसू। जबसे प्रेम धरा पर आया, तब से ही आबाद हैं आँसू। अब तक दिल में है हलचल-सी, मुझको उनके याद हैं आँसू। कभी परिंदे कटे-परों के, और कभी सैयाद हैं आँसू... इस अधूरी कविता के साथ अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविता - द्रौपदी - कुंती - रश्मि प्रभा

कविता का अंश... कुंती वाकई तुम माँ' कहलाने योग्य नहीं थी !!! अरे जब तुमने समाज के नाम पर, अपने मान के लिए, कर्ण को प्रवाहित कर दिया, पुत्रो की बिना सुने मुझे विभाजित कर दिया, तो तुम क्या मेरी रक्षा करती ?! मन्त्रों का प्रयोग करनेवाली तुम, तुम्हें क्या फर्क पड़ता था, अगर तुम्हारे पुत्र मुझे हार गए और दुःशासन मुझे घसीट लाया .... दम्भ की गर्जना करता कौरव वंश और दूसरी तरफ … स्थिर धर्मराज के आगे स्थिर अर्जुन भीम,नकुल-सहदेव … भीष्म प्रतिज्ञा करनेवाले पितामह, परम ज्ञानी विदुर .... !!! धृतराष्ट की चर्चा तो व्यर्थ ही है, वह तो सम्पूर्णतः अँधा था, पर जिनके पास आँखें थीं, उन्होंने भी क्या किया ? पलायन, सिर्फ पलायन .... आज तक मेरी समझ में नहीं आया, कि सबके सब असमर्थ कैसे थे ? क्या मेरी इज़्ज़त से अधिक, वचन और प्रतिज्ञा का अर्थ था ? मैं मानती हूँ, कि मैंने दुर्योधन से गलत मज़ाक किया, अमर्यादित कदम थे मेरे, पर उसकी यह सजा ?!!! … आह !!! मैं यह प्रलाप तुम्हारे समक्ष कर ही क्यूँ रही हूँ ! कुंती, तुम्हारा स्वार्थ तो बहुत प्रबल था, अन्यथा - तुम कर्ण की बजाय, अपने पाँच पुत्रों को कर्ण का परिचय देती, रोक लेती युद्ध से ! तुम ही बताओ, कहाँ ? किस ओर सत्य खड़ा था ? यदि कर्ण को उसका अधिकार नहीं मिला, तो दुर्योधन को भी उसका अधिकार नहीं मिला। कर्ण ने तुम्हारी भूल का परिणाम पाया, तो दुर्योधन ने अंधे पिता के पुत्र होने का परिणाम पाया। .... कुंती इसमें मैं कहाँ थी ? मुझे जीती जागती कुल वधु से, एक वस्तु कैसे बना दिया तुम्हारे पराक्रमी पुत्रों ने ? निरुत्तर खड़ी हो, निरुत्तर ही खड़ी रहना। तुम अहिल्या नहीं, जिसके लिए कोई राम आएँगे, और उद्धार होगा ! और मैं द्रौपदी, तीनों लोक, दसों दिशाओं को साक्षी मानकर कहती हूँ - कि भले ही महाभारत खत्म हो गया हो, कौरवों का नाश हो गया हो, लेकिन मैंने तुम्हें, तुम्हारे पुत्रों को माफ़ नहीं किया है, ना ही करुँगी। जब भी कोई चीरहरण होगा, कुंती, ये द्रौपदी तुमसे सवाल करेगी.... इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कविता - वो जो रामसजीवन था - यश मालवीय

कविता का अंश... वो जो रामसजीवन था, खुशियों वाला ऑंगन था। फूलों सा उसका मन था, सबका जिया जुड़ावन था। जेठ दुपहरी सावन था, सचमुच ही मनभावन था। उस पर इक दिन कहर हुआ, शाम हुआ, दोपहर हुआ। खून का प्यासा देखो तो, उसका अपना शहर हुआ। पास फटा इक हथगोला, धरती आसमान डोला। चिथड़ों में तब्दील हुआ, उगता सा सूरज भोला। उसका बेटा ढेर हुआ, क्रूर समय का फेर हुआ। लाश हो गई घर वाली, अब क्या होली दीवाली। राम रहीम जूझ बैठे, खांर से अकड़े-ऐंठे। ख्वाब हो गए नूर मियाँ, हुए जिगर से दूर मियाँ। सुख में दुख में साथी थे, अब हैं चकनाचूर मियाँ। रामसजीवन बदल गया, करने लगे फितूर मियाँ। भरी जवानी टूट गया, प्याले जैसा फूट गया। किससे बात करे दिल की, अपने से ही रूठ गया। अब तो बहुत अकेला है, पड़ा सड़क पर ढेला है। वर्तमान की छाती पर, बस यादों का मेला है। अब जो रामसजीवन है, खाली खाली बर्तन है। टूटा टूटा दरपन है, मातम वाला आँगन है। पानी के बाहर जैसे, मछली वाली तड़पन है। रामसजीवन पहले का, मिले कभी जो तुम्हें कहीं, उसको घर पहुंचा देना, मेरी खोज खबर देना। तुमको जो लिखता आया, कहना तुमको ढूंढ रहा, कभी यहां तो कभी वहां, सारे जहां से अच्छा था, कहां गया वो हिंदोस्ताँ? रामसजीवन लौटो तो , एक बार फिर कविता में, अपनी खोई दुनिया में। कवि को नींद न आती है, बस तबियत घबराती है। रामसजीवन, नूरमियाँ इस रस्ते उस रस्ते से, आ जाओ चौरस्ते पर, लौटो चाय-नमस्ते पर। चौराहे पर देश खड़ा, गली गली अजगर लहरे, ज़ख्म दे रहा है गहरे। उसका फन मिलकर कुचलो, फिर से सूरज सा उछलो। अपनी सुबह निकल आए, काली रात दहल जाए। बंदूकें सब सो जाएं, हाथ न आएं, खो जाएं। मन से मन का तार जुड़े, तबला और सितार जुड़े। चेहरों से आतंक धुले, कोई खुशबू नई घुले। रामसजीवन पहले सा, फूलों जैसा खिले खुले। फिर से आएं नूर मियाँ, कितना अच्छा लगता था, बजते थे संतूर मियाँ.... इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कुछ कविताएँ - यश मालवीय

कविता का अंश... जाती हुई धूप संध्या की, सेंक रही है माँ। अपना अप्रासंगिक होना, देख रही है माँ। भरा हुआ घर है, नाती पोतों से, बच्चों से। अन बोला बहुओं के बोले, बंद खिड़कियों से। दिन भर पकी उम्र के घुटने, टेक रही है माँ। फूली सरसों नही रही, अब खेतों में मन के। पिता नहीं हैं अब नस नस, क्या कंगन सी खनके। रस्ता थकी हुई यादों का, छेक रही है माँ। बुझी बुझी आँखों ने, पर्वत से दिन काटे हैं। कपड़े नहीं, अलगनी पर फैले सन्नाटे हैं। इधर उधर उड़ती सी नजरें, फेक रही है माँ। इस कविता के साथ ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए..

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

परमाणु युद्ध हुआ, तो साफ हो जाएगा पाक



http://www.dailysunstar.com/hin/epaper/index.php?city=Delhi&date=03/10/16&page=10
दिल्ली से प्रकाशित सन स्टार के संपादकीय पेज पर आलेख

कुछ कविताएँ – 2 – शैलजा दुबे

कविता का अंश… देश की आन बान शान, सीमा पर तैनात ये जवान... आँखों में अंगारे हैं, हौसला है, हिम्मत है, दुश्मन को कर देगें तबाह, ली ये शपथ है .... उठो जाबाज़ों! दिखा दो दुश्मनों को, हम कायर नही, हमको कम न आँको... मैदां में हम उतरेंगे, तुमको धूल चटाएँगे, शेर हैं हम गीदड़ नही, जो तुमसे डर जाएँगे... छाती चौड़ी करके, सीने पर वार सहेंगे, जब तक हैं सांसे, सरहद पर डटे रहेंगे..... अंत तुम्हारा निश्चित है, बहुत हुई आँख मिचौली, साहस है तो आ जाओ, खेलेंगे खून की होली। ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

कुछ कविताएँ – 1 – शैलजा दुबे

कविता का अंश… स्वच्छ, निर्मल, श्वेत धारा, स्निग्ध, शांत, क्लांत धारा..... असंख्य बाधाओं को करके पार, समंदर में मिलने को अधीर धारा...... बचपन में माता पिता घर पली, संग सखियों के की अठखेली, डोली में बैठ पिया घर चली, समुंदर में मिलने को अधीर धारा...... देखे हैं जीवन के अनेक रूप, शीतल छाँव, तपती धूप, फिर भी नहीं लेती विश्राम, बहती रहती निरंतर, अविरल, अविराम, समंदर में मिलने को अधीर धारा.... स्वच्छ, निर्मल, श्वेत धारा… ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

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