शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2008

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक : वेनिला फ्लेवर


डॉ. महेश परिमल
हममें से शायद ही कोई होगा, जिसने कभी आइस्क्रीम का स्वाद न चखा हो। बहुत मोदार लगती है, यह आइस्क्रीम। इसमें सबसे अधिक सुलभ आइस्क्रीम है, वेनिला। अकसर पार्टियों में यही आइस्क्रीम परोसी जाती है। लोग मो से इसे खाते हैं। देखा जाए, तो वास्तव में जो वेनिला का स्वाद है, उसे तो लोग जानते ही नहीं। आज जो वेनिला के नाम से आइस्क्रीम बिक रही है, वह है वेनिलीन का एसेंस। बहुत ही खतरनाक है आइस्क्रीम का सच। इसे जान लेने के बाद मेरा विश्वास है कि अब कोई इसे खाने के पहले एक बार अवश्य सोचेगा। क्या है वेनिला आइस्क्रीम का सच, आइए जानते हैं:-
विश्व में सबसे अधिक लोकप्रिय फ्लेवर वेनिला ही है। यहाँ तक कि पूरे विश्व में जितनी भी आइस्क्रीम बनती है, उसमें से 40 प्रतिशत वेनिला फ्लेवर की ही होती है। वास्तव में वेनिला एक फल है, जो मेडागास्कर में अधिक मात्रा में होता है। अब इसे व्यावसायिक दृष्टि से दक्षिण भारत के तीन रायों में भी उगाया जा रहा है। वेनिला का उपयोग आइस्क्रीम के अलावा केक, कोल्ड ड्रिंक, परफ्यूम्स और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों में होता है। एक समय था, जब केरल में वेनिला की खेती करने वाले किसानों को एक किलो वेनिला के बीजों की कीमत 3,500 रुपए मिलती थी। आज यह कीमत घटकर मात्र 50 रुपए प्रति किलो हो गई है। इसका मुख्य कारण यही है कि इस बीच मोंसांटो नामक मल्टीनेशनल कंपनी ने भारत में सिंथेटिक वेनिला का आयात शुरू कर दिया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राकृतिक वेनिला एसेंस का मूल्य 4,000 रुपए प्रति लीटर है, जबकि अमेरिका से आयात किए गए कृत्रिम वेनिला एसेंस की कीमत मात्र 250 रुपए प्रति लीटर है। यही कारण है कि आइस्क्रीम, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक, सौंदर्य-प्रसाधन आदि बनाने वाली कंपनियों ने चुपचाप सिंथेटिक वेनिला का उपयोग शुरू कर दिया है। यह कृत्रिम वेनिला हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, किंतु इस बात की चिंता न करते हुए कंपनियाँ लगातार इसका उपयोग किए जा रही हैं।
भारत में आइस्क्रीम का उत्पादन हिंदुस्तान लीवर जैसी मल्टीनेशनल कंपनियाँ, वाड़ीलाल जैसी भारतीय कंपनियाँ और अमूल डेरी जैसी अन्य प्राइवेट कंपनियाँ भी करती हैं। क्वालिटी वॉल्श नाम से प्रसिद्ध आइस्क्रीम ब्रांड हिंदुस्तान लीवर का है, जो अब यूनीलीवर के नाम से जाना जाता है। पश्चिम भारत में जैसे अमूल प्रसिद्ध है, वैसे ही उत्तर भारत में मदर डेरी काफी जाना-पहचाना नाम है। इन कंपनियों में से अमूल को अलग कर दिया जाए, तो सभी कंपनियों के आइस्क्रीम में सिंथेटिक वेनिला का इस्तेमाल किया जाता है। अमूल डेरी ने तो अपनी तरफ से 'वेनिला रॉयल' नामक आइस्क्रीम तैयार किया है, जिसमें कुदरती वेनिला फ्लेवर का ही इस्तेमाल किया जाता है।
आज बाजार में कृत्रिम वेनिला एसेंस मिलता है, जो वेनिलीन नाम से जाना जाता है। पूरे विश्व में कृत्रिम वेनिला का इस्तेमाल लगभग 30 हजार टन है, जबकि वेनिला का स्वाभाविक एसेंस मात्र 50 टन जितना ही इस्तेमाल किया जाता है। भारत मेें प्रतिवर्ष लगभग 200 मेट्रिक टन जितना वेनिलीन इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें से 130 मेट्रिक टन तो आइस्क्रीम उत्पादक ही खरीदते हैं। लोगों की आइस्क्रीम के प्रति रुचि देखते हुए पूरी संभावना है कि यह ऑंकडा इस वर्ष के अंत तक 300 मेट्रिक टन की संख्या पार कर जाएगा। इस समय भारत में प्राकृतिक वेनिला का इस्तेमान केवल 2 टन के आसपास ही है। वेनिला के 50 टन बीज में से मात्र एक टन जितना ही कुदरती एसेंस निकाला जा सकता है।
आइस्क्रीम और अन्य खाद्य पदार्थो में जो कृत्रिम वेनिला एसेंस उपयोग किया जाता है, वह किस तरह तैयार होता है, यह जानना जरूरी है। इस कृत्रिम वेनिला की खोज अचानक ही हुई थी। केनेडा की ओंटेरियो पेपर मिल में से जो कचरा निकलता था, उसे किस प्रकार खत्म किया जाए, या उसका इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए, यह मालिकों के लिए एक परेशानी का विषय था। इस कचरे में से वेनिला जैसी गंध आती थी। केमिस्टों ने इस कचरे में से वेनिलीन नामक केमिकल को अलग करने में सफलता प्राप्त की, जिसकी गंध बिलकुल वेनिला जैसी ही थी। इस वेनिलीन को प्राप्त करने के लिए लकड़ी को कास्टिक सोड़ा के साथ उबाला जाता है। इस प्रक्रिया में कागज की लुगदी और काले रंग का चिकना पदार्थ अलग हो जाता है। जिसे 'ब्लेक लीकर' कहा जाता है। इसी से कृत्रिम वेनिला तैयार किया जाता है।


कृत्रिम वेनिला तैयार करने के लिए डामर यानि कोलतार का भी उपयोग किया जाता है। डामर में ग्वाइकोल नामक पदार्थ होता है, जिस पर रासायनिक क्रिया द्वारा वेनिलीन प्राप्त किया जाता है। इसके अलावा गाय के गोबर में लिग्निन नामक चिकना पदार्थ होता है। जापान के वैज्ञानिकों ने इस पदार्थ का उपयोग करते हुए विनिलीन तैयार किया है। मेक्सिको में पाए जाने वाले टोंका नामक वृक्ष के फल में से कुमोरीन नामक पदार्थ बनाने में आता है। इस पदार्थ से भी कृत्रिम वेनिला का एसेंस तैयार किया जाता है। जिसका उपयोग आइस्क्रीम में होता है। यह पदार्थ केन्सरजन्य होने के कारण अमेरिका के फूड्स एंड ड्रग्स ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। वेनिला और वेनिलीन फ्लेवर में बहुत अधिक समानता है, किंतु स्वाद और सुगंध के मामले में दोनों में फर्क किया जा सकता है। वेनिला की तुलना में वेनिलीन फ्लेवर अत्यंत तीव्र होता है। यही कारण है कि जब खाद्य पदार्थो में इसका थोड़ा-सा भी अधिक उपयोग हो जाने से उसमें केमिकल की सुगंध आने लगती है।
वेनिला के प्राकृतिक एसेंस में लगभग 250 जितने फ्लेवर का मिश्रण होता है। वेनिलीन भी इसमें से एक है। प्राकृतिक वेनिला जब भोजन में लिया जाता है, तो उसमें से एक के बाद एक फ्लेवर बाहर आने लगते हैं, जिसका अनुभव बहुत अनूठा है। यही कारण है कि प्राकृतिक वेनिला को सुगंध का समुद्र कहा जाता है।
हमारी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हम वेनिला फ्लेवर का कोई भी पदार्थ खरीदते समय असली और नकली फ्लेवर के बीच का अंतर समझ न पाने के कारण पहचान नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि कृत्रिम वेनिला एसेंस से बने हुए पदार्थ धड़ाधड़ बिक रहे हैं और इस बात से अनजान बने हम इन पदार्थों को स्वाद ले-लेकर खा रहे हैं। हमारी इस स्वाद लोलुपता का ही फायदा कंपनियाँ उठा रही हैं। जबकि अमेरिका में तो ऐसा कानून है कि कोई भी खाद्य पदार्थ में यदि 'वेनिला' लिखा हुआ है, तो उसमें प्राकृतिक वेनिला का अर्क ही होना चाहिए। यदि इन खाद्य पदार्थो में सिंथेटिक फ्लेवर भी मिला हुआ है, तो उसका प्रमाण नेचुरल फ्लेवर की तुलना में कम ही होना चाहिए। जर्मनी में भी यह नियम है कि यदि किसी पदार्थ में वेनिला का इस्तेमाल हुआ है, तो उसके लेबल में यह लिखा हुआ होना चाहिए कि कृत्रिम वेनिला एसेंस का इस्तेमाल किया गया है कि नेचुरल वेनिला एसेंस का । भारत में इस तरह का कोई कानून न होने के कारण कृत्रिम वेनिला एसेंस का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है। दुकान या आइस्क्रीम पार्लर से आइस्क्रीम खरीदने वाले ग्राहकों को इस बात की जानकारी ही नहीं होती कि इसमें इस्तेमाल किया गया वेनिला या वेनिलीन वास्तव में किस पेपर मिल का कचरा है या डामर से बनाया गया तरल पदार्थ है।
आइस्क्रीम उत्पादकों द्वारा प्राकृतिक वेनिला के बदले वेनिलीन केमिकल इस्तेमाल करने के पीछे मुख्य कारण दोनों की कींमतों में पाया जाने वाला अंतर है। एक लीटर आइस्क्रीम में यदि कृत्रिम वेनिलीन के बदले प्राकृतिक वेनिला का उपयोग किया जाए, तो आइस्क्रीम की कीमत भी दो रुपए बढ़ जाती है। वेनिला के बड़े कप में 200 मिली लीटर आइस्क्रीम आती है, इसे देखते हुए एक कप के हिसाब से 40 पैसा अधिक खर्च आता है। आइस्क्रीम उत्पादक 30 से 40 प्रतिशत लाभ कमाते हैं। यदि वे अपने लाभ में थोड़ी कमी करते हुए ग्राहकों को असली वेनिला फ्लेवर दें, तो भी उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। बस आवश्यकता है सरकार इस दिशा में कोई कानून तैयार करे या फिर ग्राहक अपनी जागरूकता का परिचय दें।
तो देखा आपने हमारी स्वाद लोलुपता का फायदा किस तरह से ये कंपनियाँ उठा रही हैं और लाभ कमा रही है। हम अपनी जागरूकता का परिचय नहीं देते हैं और अपनी स्वादग्रंथियों को काबू में नहीं रख सकते, इसीलिए आज हम बार-बार बीमार पड़ रहे हैं या फिर डॉक्टरों के चक्कर लगा रहे हैं। कुछ तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा इनकी बनाई चीजें हम खाते रहें और ये कंपनियाँ हमें खाती रहें। नुकसान हमारा ही होना है, तो क्यों न आज से ही जागरूकता का बिगुल बजाया जाए और लोगों को सचेत किया जाए।
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपका कोटिशः आभार,इतनी महत जानकारी तथा हमें सचेत करने के लिए. अत्यन्त सार्थक लेख है आपका.
    अनजाने में कैसे हमें धीमा जहर खिलाया जा रहा है,बड़ा ही क्षोभ हुआ जानकर.

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  2. जानकारी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद....और हां.....आप सबों को दीपावलि की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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