गुरुवार, 20 मार्च 2008

हरीश परमार की बाल कविताएँ


होली 1
रंगरंगीली होली आई
रंगो की सौगात लाई
रंगों में ऐसे रंगे हैं बच्चे
कोई न पहचाना जाए
कौन राम है कौन रहीम
नजरें धोखा खा जाए
अपना फर्ज निभाने आई
सबका मेल कराने आई
रंगरंगीली होली आई
रंगो की सौगात लाई
बच्चोें की टोली निकली
हर मुहल्ले गली-गली
जाने-अनजाने हर चेहरे को
रंग देते हैं घड़ी-घड़ी
रंग अबीर-गुलाल से
मिट गई हर बुराई
रंगो की सौगात लाई।

होली 2
छोटी सी पिचकारी में
मैं रंग भरकर लाई हूँ
अभी रंगूँगी बारी-बारी
मैं यह बतलाने आई हूँ।
पहले पापा तुम्हें रंगूँगी
पीला हरा होली का रंग
तुम जितना करते हो प्यार
मैं डालूँगी उतना रंग।
नहीं डरूँगी मैं तो मम्मी
तेरी फटकार से
आज तुम्हें रंग दूँगी मैं
रंग अबीर गुलाल से।
छिप न जाना राजा भैया
जरा सामने आ जाना
होली के प्यारे रंगों का
तुम भी तोहफा लेते जाना।
बदले में फिर रंग देना
मम्मी, पापा, भैया मुझको
दे जाएगा खुशियां सारी
होली का त्यौहार हमको।

होली 3
रंगरंगीली होली आई
रंगो की सौगात लाई
रंगों में ऐसे रंगे हैं बच्चे
कोई न पहचाना जाए
कौन राम है कौन रहीम
नजरें धोखा खा जाए
अपना फर्ज निभाने आई
सबका मेल कराने आई
रंगरंगीली होली आई
रंगो की सौगात लाई
बच्चोें की टोली निकली
हर मुहल्ले गली-गली
जाने-अनजाने हर चेहरे को
रंग देते हैं घड़ी-घड़ी
रंग अबीर-गुलाल से
मिट गई हर बुराई
रंगो की सौगात लाई।


होली 4
तोता से मैना बोली-
तुम्हें मुबारक हो होली
कौन-सा रंग लगाऊँ बोलो
लाई हूँ रंगों की झोली॥
तोता बोले मैना से-
हरे रंग का हूँ जनम से
चोंच लाल है देखो मेरी
डालो ना कोई रंग कसम से॥
फिर कौए से मैना बोली-
तुम्हें मुबारक हो होली
कौआ बोला मैं हूँ काला
काला ही रहने दो मैना
रंग चढ़े ना मुझमें दूजा
होली खेलूँ मैं कभी ना॥
फिर मुर्गे से मैना बोली-
तुम्हें मुबारक हो होली
मुर्गा बोला मेरे पंख
रंग डाले हैं लोगों ने
कौन सा रंग लगाओगी
अब बोलो मेरे गालों में॥
फिर बगुले से मैना बोली-
तुम्हें मुबारक हो होली
बगुला बोला मैना रानी
खेलूँगा मैं भी होली
मेरे तन पर खाली कर दो
अपने रंगों की झोली॥
हरीश परमार

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