गुरुवार, 27 मार्च 2008

लुप्त होते पक्षी, आबाद होते हम


डॉ. महेश परिमल
दॊ महीने बाद पर्यावरणा दिवस आएगा और चला भी जाएगा हम केवल उसे याद करके रह जाएँगे अधिक हुआ तॊ एक संकल्प ही ले लेंगे पेड़ॊं कॊ बचाने का बस इससे अधिक हम कुछ कर भी नहीं सकते हमें पता ही नहीं रहता कि हमें क्या करना चाहिए अच्छा सच सच बताना कि चिड़ियॊं की चहचहाट कैसी हॊती है कितने दिन हॊ गए उनकी आवाज कॊ सुने शायद याद नहीं आ रहा है ना ऎसा ही हॊता है हमारे सामने से प‌क्षियॊं की एक पीढ़ी ही लुप्त हॊ गई हमें पता ही नहीं चला आज हम भले ही आबाद हॊ रहे हॊं पर पक्षी हमारी आँखॊं के सामने बरबाद हॊ रहे है, हमें पता ही नहीं चला. पता चल भी नहीं सकता. क्योंकि हम हर रोज देख रहे हैं, दम तोड़ते पर्यावरण को. दरअसल हम पर्यावरण से अभी तक पूरी तरह से जुड़ नहीं पाए हैं, इसलिए दम तोड़ता पर्यावरण हमें उद्वेलित नहीं करता. बेशुमार पानी बहाना हम अपनी शान समझते हैं, खुशी हो या ंगम, हम शोर करने में पीछे नहीं रहते. हमें तो यह भी नहीं पता कि हम कितनी आवाज में बोलें कि सामने वाले को कोई परेशानी नहीं हो. किसी ट्रक का प्रेशर हार्न भी हमें विचलित नहीं करता. कभी जब अचानक बिजली गुल हो जाए, तब हमें कितनी शांति महसूस होती है, इसका अंदाजा लगाया कभी आपने? उस स्थिति को ध्यान में रखकर देखें, तो हमें पता चलेगा कि हम कितने शोर के आदि हो गए हैं.
खैर यह तो हुई उस शोर की बात, जो हमारी ही उपज है. पर क्या कभी किसी कांक्रीट के जंगल को ऊगते देखा है. हम किसी नई जगह जाकर घर बनाने की बात सोचते हैं, दलाल हमें उस स्थान पर ले जाकर बताता है कि यह जगह प्रकृति के एकदम करीब है, चारो ओर हरियाली है, यहाँ घर बनाकर आप महसूस करेंगे कि आप प्रकृति की गोद में बैठकर उसका स्नेह प्राप्त कर रहे हैं. आपने जमीन का एक टुकड़ा पसंद किया, यही है कांक्रीट के जंगल का बीज. ठीक है आपने उस स्थान पर घर बना लिया, कुछ वर्ष बाद वहाँ आप की तरह कई लोगों ने अपना घर बना लिया. पर उस जंगल के लोगों ने सोचा कि कितने घरों को उजाड़कर ये घर बन पाया है? मेरी बात आपको शायद ही समझ में आए. आओ इसे गंभीरता से सोचने की कोशिश करें.
चहचहाना शद्व से वाकिफ हैं आप? हाँ चिड़ियों के कलरव को चहचहाना कहते हैं. सच बताएँगे आप कितने दिन हो गए आपने चिड़ियों का चहचहाते नहीं सुना? अच्छा ये बताएँ कोयल की कू-कू सुनी है आपने इन दिनों? आपका उत्तर शायद ना में हो, या हो सकता है कि आपने कुछ दिन पहले ही परिवार के साथ आउटिंग पर निकले थे, तब बच्चों को बताया था कि सुनो ये जो आवाज आ रही है, वह कोयल की है और ये जो तुम सब चीं-चीं सुन रहे हो ना ये चिड़ियाएँ चहचहा रही हैं. तब शायद बच्चों को यह अनोखा लगा होगा. अब आपको तो याद होगा, पर निश्चित ही बच्चे उन ध्वनियों को भूल गए होंगे. वैसे अभी भी सुबह तो हमें चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देती है, पर उस वक्त इतनी व्यस्तता रहती है कि कुछ भी ध्यान नहीं रहता. हमसे अधिक तो बच्चे व्यस्त होते हैं. मैं आपको बताऊँ, क्यों नहीं सुन पाते हम सब पक्षियों का कलरव? क्योंकि उनके हिस्से की जमीन पर ही तो आपने अपना आशियाना बना लिया है. दूसरों का आशियाना उजाड़कर अपना आशियाना बनाना, ये तो जगत की रीत है. आपने कोई गलत काम नहीं किया. आपने तो बस वही किया जो एक आदमी करता है. एक इंसान जो करता है, उसकी अपेक्षा तो आपसे नहीं की जा सकती.
खैर अब आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि हमारे देखते ही देखते पूरे एक हजार ग्यारह जातियों के पक्षी लुप्त हो रहे हैं. धीरे-धीरे जो हैं, वे भी लुप्त हो जाएँगे, तब हम कैसे बताएँगे कि कैसा होता है पक्षियों का कलरव! दक्षिण अफ्रीका के डर्बन में बर्ड लाइफ इंटरनेशनल की परिषद् की बैठक हुई, जिसमें तीन सौ पक्षीविदों ने भाग लेकर विचार विमर्श किया और जो रिपोर्ट दी, वह चौंकाने वाली है. उनकी 70 पेज की रिपोर्ट में 'स्टेट ऑफ द वल्ड्र्स बड्र्स 2004' के शीर्षक से बताया है कि वर्त्तमान में पक्षियों की दस हजार जातियाँ हैं, इसमें से 1211 जातियाँ लुप्त होने वाली हैं.
पृथ्वी पर अब तक पाँच महाप्रलय हो चुके हैं. प्रलय की यह प्रक्रिया लाखों वर्षों तक चलती है. लेकिन अब छठा प्रलय शुरू हो चुका है. यह इंसान द्वारा उपज प्रलय होगा. इंसान ने अपने ही हाथों इस प्रलय को आमंत्रित किया है. ंजरा सोचें, एक भूखंड पर कितनों का आवास होता है. आप कहेंगे- बस दो-चार लोगों का. पर आप शायद भूल जाते हैं कि एक भूखंड पर दो-चार नहीं, बल्कि हजारों लोगों का वास होता है. एक भूखंड पर यदि दस पेड़ भी हों, तो उस पेड़ के पक्षी, उसकी छाँव पर पलने वाले हजारों बैक्टिरिया, कीड़े-मकोड़े ये सभी तो उसी पेड़ के आसरे होते हैं, इन्हें भूल गए आप! कितनी पीड़ा होती है, अपने बसेरे को छोड़कर जाने की, इसे समझना हो, तो गुजरात के उन भूकंप पीड़ितों से पूछो, जिन्हें रातो-रात अपना आवास छोड़कर ऐसे स्थान पर जाना पड़ा, जहाँ आबादी के नाम पर कुछ भी नहीं था. मात्र कुछ क्षणों में उनका बसेरा छूट गया. वे बसेरे से दूर होने की त्रासदायी पीड़ा झेलने लगे. हम भी अपने घर के लिए इन पक्षियों का बसेरा उजाड़ते हैं, उन बेजुबानों की पीड़ा समझने का प्रयास किया है किसी ने? अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं, हरसूद के लोगों से ही जानी जा सकती है घर छोड़ने की पीड़ा.

अब तक जो प्रलय हुए, उनमें ग्लोबलवार्मिंग, ग्लोबलकूलिंग, आकाश में से उल्कापिंडों के कारण, ज्वालामुखी के विस्फोटों या सुपरनोवा के नाम से जानी जाती तारों के टूटने की घटना से फैलती विकिरण ऊर्जा को बहुत बड़ा कारण माना जाता रहा है. किंतु वर्त्तमान में तो जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने, मानव प्रवृत्ति से प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ने, ओजोन की परत का लगातार क्षय होना, विश्व के बढ़ते तापमान से ग्रीन हाउस के असर के कारणों में लगातार वृद्धि, जंगलों की नाश होना, जमीन और पानी के हानिकारक प्रदूषण होना जैसे अनेक कारण जवाबदार हैं. इन सबके लिए इंसान खुद जिम्मेदार है.
पिछले चार वर्षों में पर्यावरण की हालत इतनी खराब हुई कि पक्षियों पर यह अपना प्रभाव डालने लगी है. इसलिए अब पक्षी भटकने लगे हैं. अब तक उनके दुश्मन उनसे शक्तिशाली जानवर या पक्षी थे, पर अब इंसान भी इसमें शामिल हो गया. अब वे कहाँ जाएँ. उनसे बलशाली पक्षी या जानवर भी उन्हीं हालात में जी रहे हैं, इंसान उनका भी दुश्मन हो गया, अतएव वे अपना जीवन बचाने के लिए अपने से कम बलशाली लोगों को मारने लगे. इस तरह से इंसान ने ही प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.
इस तरह से इंसानी भूख के कारण पक्षी ही नहीं, छोटे-छोटे जीव जंतु भी उसका ग्रास बनने लगे हैं. ऐसे में कहाँ हो उनका बसेरा? इसलिए पक्षियों की कई जातियाँ या तो लुप्त हो गईं हैं, या फिर विलुप्ति के कगार पर हैं. यही हाल रहा तो हम अब न तो हमिंग बर्ड की सुरीली तान सुन पाएँगे और न ही कोयल की कू-कू. आप कल्पना ही कर सकते हैं, कैसा होगा बिना पक्षियों का संसार? न चिड़ियों की चहचहाट, न कौवे की काँव-काँव. फिर किसे बुलाओगे अपने पितरों को याद करते हुए. क्योंकि तब आपकी मुंडेर पर नहीं बैठेंगे कागा....
(डॉ. महेश परिमल

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