बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

हे! ईश्वर, घर का सदस्य सुरक्षित आए, उसकी खबर नहीं



देश के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नीतिन गडकरी इन दिनों बहुत बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रहे हैं। उनकी बातों पर विश्वास करें, तो कुछ ही वर्षों में हम न जाने कहां होंगे। कुछ ही पलों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाएंगे। हमें किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी। हमारी सेहत ठीक होगी। हम लोगों से अच्छी तरह से मेल-मिलाप कर पाएंगे। सड़कों पर चलना और भी आसान हो जाएगा। राष्ट्रीय राजमार्गों पर चलना बहुत ही सरल और सहज होगा। ये सारी बातें इन दिनों दिवास्वप्न जैसी लगती हैं। क्योंकि घर से निकलते ही हमें रास्तों के गड्ढे ही बता देते हैं कि हमारा भविष्य कैसा होगा? हम जिस काम से निकले हैं, वह हो भी पाएगा या नहीं?  घर से निकला हमारे परिवार का सदस्य सही सलामत घर आ भी पाएगा या उसकी खबर आएगी, कहा नहीं जा सकता। एक आम इंसान यही सोचता है कि सुबह का घर से निकले उसके पिता, उसका बेटा, पत्नी या फिर वह स्वयं ही सुरक्षित लौट आए। उसे नहीं चाहिए चमचमाती और चकाचौंध करने वाली सड़कें। उसे चाहिए उबड़-खाबड़ सड़कों से मुक्ति, ताकि उसके घर आने वाले लोग तो आएं, पर उनकी खबर न आए। 

हम सबका जीवन विसंगतियों से भरा पड़ा है। चारों ओर परेशानियों के घने बादल छाए हुए हैं। इन हालात में इंसान जब घर से बाहर निकलता है, तो उसका सामना सबसे पहले रास्तों से ही पड़ता है। इन दिनों शहर ही नहीं, बल्कि गांव-गांव की सड़कों की हालत बहुत ही ज्यादा खराब है। कई स्थानों पर सड़कों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। इन रास्तों पर खुद को बचाते हुए चलना भी किसी करतब से कम नहीं। हर तरह के टैक्स देकर भी इन रास्तों से गुजरना इंसान की मजबूरी बन गई है। इन रास्तों को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी किसकी है, यह भी पता लगाना बहुत ही मुश्किल है। जिसकी जिम्मेदारी होती है, उसे तो पता ही नहीं होता कि यह सड़क उसकी निगरानी में है। सड़कों की हालत बद से बदतर होती जा रही है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। हर कोई दूसरे को इसके लिए जिम्मेदार मानता है। जिम्मेदारी तय कैसे की जाती है, यह भी एक मुश्किल काम है। जिसे समझना एक आम आदमी के बस की बात नहीं है। केवल कुछ अधिकारियों की लापरवाही और बदइंतजामी का खामियाजा एक आम आदमी भरे, यह कहां का इंसाफ है?

रास्तों पर गड्‌ढों से क्या-क्या होता है, यह जानना आसान नहीं है। शरीर के पूरे अंग टूट-टूट जाते हैं। अस्थिपंजर ढीला हो जाता है। कमर की हालत तो पूछो ही मत, वह तो रात में सोते समय अपना सही रूप दिखाती है। दूसरी ओर वाहन की हालत इंसानों से भी अधिक खराब। शॉकब और हेंडल की हालत रोज ही खराब होती जाती है। लाइट भी काम नहीं करती। पहिया पंचर हो जाता है, सो अलग। इन टूटे रास्तों पर कहीं-कहीं स्पीड ब्रेकर भी मिल जाते हैं, जो हमें यह बताते हैं कि हमें अपना वाहन धीरे चलाना है। इन स्पीडब्रेकर्स को पार करते हुए भी वाहन कई बार रो पड़ता है। इन रास्तों को लेकर सरकार यह दावा करती है कि इन गड्ढों के कारण ही शहर में दुर्घटनाओं की संख्या में कमी आई है। वह खुश होती है, दुर्घटनाओं के घटते आंकड़ों को देखकर। इधर हमारा रोना जारी रहता है।

शहर में सड़़कों की मरम्मत का काम एक विभाग का नहीं है। इसे अलग-अलग विभागों में बांटा गया है। यही कारण है कि सड़कों को दुरुस्त करने के लिए ये विभाग एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं। ये सारे विभाग वीआईपी रोड की ही मरम्मत में लगे रहते हैं। इन्हें उसी मार्ग में गड्‌ढे दिखाई देते हैं। बाकी रास्तों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता। मरम्मत की जवाबदारी कई विभागों में बंटी होने के कारण ही सड़कें दुरुस्त नहीं हो पाती। किसी एक विभाग की जिम्मेदारी तय कर दी जाए, तो बीमार सड़कों की हालत में सुधार आए।

इसका एक समाधान यह हो सकता है कि शहर या गांव में जब भी कोई सड़क बने, तो सड़क के किनारे एक बोर्ड पर ठेकेदार का नाम और मोबाइल नम्बर दे दिया जाए, तो सड़क के खराब होने पर लोग फोन करके उसे इसकी सूचना दें, तो स्थिति में काफी सुधार आ सकता है। इसके बाद भी यदि सड़क ठीक नहीं होती, तो ठेकेदार से यह पूछा जा सकता है कि इस सड़क की जो लागत आई है, उसमें किस अधिकारी या नेता को कितना हिस्सा दिया गया है, इसे सार्वजनिक किया जाए। इससे हिस्सा लेने वालों पर यह डर बना रहेगा, तो वे भी अपने बचाव में हिस्सा लेने से कतराएंगे। एक उपाय यह भी हो सकता है कि जिस रास्ते पर बड़ा गड्‌ढा हो, वहां पर एक नाव बनाकर उस पर कोई बैठ जाए, जब तक रास्ता ठीक न हो जाए, उसका धरना जारी रहे। इससे वहां मीडिया का जमावड़ा हो जाएगा, लोगों का ध्यान उस रास्ते की ओर जाएगा। शोर-शराबा होगा, तब संभव है, जिम्मेदार नींद से जागें। यह गांधीवादी रास्ता होगा, लोगों को जगाने के लिए। आम इंसान की गांधीगिरी भी कह सकते हैं इसे।

अंत में मंत्री जी से यही कहना है कि देश की सड़कों को बेहतर बनाने का सपना दिखाने से अच्छा है कि पहले शहर-कस्बों एवं गांवों की सड़कों को बेहतर बना दें। कम से कम उस पर इंसान को चलने में शर्म न आए, इतनी अच्छी तो की ही जा सकती है। नहीं चाहिए, हमें बड़े-बड़े हाइवे, हम तो चाहते हैं कि जब हम घर से बाहर निकलें, तो हम ही लौटें, हमारी खबर न आए। इन गड्‌ढों से न जाने कितनी जानें रोज जा रही हें, लोग लाचार होकर उन रास्तों से होकर गुजर रहे हैं। इतने सारे वीआईपी क्या कभी आम इंसान बनकर इन रास्तों का अचानक मुआइना नहीं कर सकते? आखिर वीआईपी होने के पहले वे आप इंसान ही तो थे। सो कुछ देर के लिए ही सही, आम इंसान ही बन जाएं। सारी सड़कों के गड्ढे एक साथ भरे जा सकते हैं, या सड़कें दुरुस्त की जा सकती है, यदि उस सड़क से वीआईपी गुजरें। यदि सच्चाई देखनी है, तो आम इंसान बनना ही होगा। बस यही अनुरोध सभी वीआईपी से कि कुछ देर के लिए आम इंसान बन जाएं, सड़कें ही नहीं, देश भी सुधर जाएगा।

डॉ. महेश परिमल


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