शनिवार, 17 दिसंबर 2016

नीति के दोहे - 2 - कवि रहीम

रहीम जी का हिंदी साहित्य जगत में योगदान अतुल्य है। समाज को आईना दिखाने वाली बातें, वे अपने दोहों में कह जाते थे। मानव जाति को रहीम के दोहों से सही एवं गलत में फर्क करने की सीख मिलती है। उन्होंने सदैव सरल भाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी वाणी और लोकप्रिय हुई। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके कुछ नीति के दोहे - 1 बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥21॥ 2 बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥18॥ 3 दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥3॥ 4 रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय| टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय|| 5 बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय| रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय|| 6 रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार| रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार|| 7 जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं| गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं|| 8 रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय| हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय|| 9 समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात| सदा रहे नहिं एक सी, का रहिम पछितात|| 10 एकहि साधै सब सधैए, सब साधे सब जाय| रहिमन मूलहि सींचबोए, फूलहि फलहि अघाय|| 11 माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि। फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥ इन दोहों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

नीति के दोहे -1 - कवि रहीम

रहीम जी का हिंदी साहित्य जगत में योगदान अतुल्य है। समाज को आईना दिखाने वाली बातें, वे अपने दोहों में कह जाते थे। मानव जाति को रहीम के दोहों से सही एवं गलत में फर्क करने की सीख मिलती है। उन्होंने सदैव सरल भाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी वाणी और लोकप्रिय हुई। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके कुछ नीति के दोहे - 1. जो रहीम उतम प्रकृति, का करी सकत कुसंग| चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग|| 2. रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून| पानी गये न ऊबरे मोती मानुष चून|| 3. रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिए डारि| जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि|| 4. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान| कहि रहीम पर काज हितए संपति सँचहि सुजान|| 5. जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग। कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥ 6. रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि। उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥ 7. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत। विपति कसौटी जे कसै, ते ही साँचे मीत।। 8. खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय| रहिमन करूए मुखन को, चाहिए यही सजाय|| 9. कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन। जैसी संगति बैठिए, तैसो ही होत दीन।। 10. दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं| जान परत है काक पिक, रितु बसंत के माहिं|| 11. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥ इन दोहों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

बाल कहानी - संगठन और सूझ

कहानी का अंश... एक लोमडी को कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला था। इसलिए वह शिकार की खोज में घूम रही थी। उसकी चलने-फिरने की शक्ति भी कम हो गई थी। एक बार वह पहाड़ की ढाल पर शिकार की खोज में थी कि एकाएक पैर के नीचे का पत्थर लुढक गया और कमजोर होने के कारण वह भी अपने आपको संभाल नहीं सकी और लुढकती चली गई। नीचे की तरफ मैदान था। जब वह वहाँ पर पहुँची तो उसने खरगोशों का झुंड देखा। खरगोशों को देखकर उसके मुंह में तो पानी आ गया। उसने सोचा कि यहाँ पर उसके लिए रोज एक-दो खरगोश खाने का इंतजाम तो हो ही जाएगा। वह रोज उस जगह पर आने लगी कि कभी मौका मिले तो वह खरगोश को खा ले। जब खरगोशों ने लोमड़ी को रोज वहाँ आते हुए देखा तो पहले तो वह डर गए कि यह उन्हें खा लेगी। फिर उन्हें लगा कि वह लोमड़ी तो अकेली है और हम सभी हैं। हम सभी मिलकर उस अकेली लोमड़ी का मुकाबला कर सकते हैं। यही सोचकर वे सभी बेफिक्र होकर आनंद से रहने लगे। एक दिन उस लोमड़ी ने खरगोश के दो बच्चों के पास आकर उनकी खूब तारीफ की और अपने घर दावत के लिए आने का न्यौता दिया। वे खरगोश डर के मारे जल्दी से वहाँ से चले गए। लेकिन उसके बाद उन खरगोशों ने अपने आपको असुरक्षित महसूस किया आैर उन्होंने अपनी एक सभा बुलाई और लोमड़ी से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचा। क्या था वह उपाय? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

बाल कहानी - वाकली का फूल

कहानी का अंश... एक राजा था। उसकी छह रानियाँ थीं। पर उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण वह हमेशा दुखी रहता था। किसी ज्योतिषी के कहने पर उसने अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा दिया कि उसके राज्य में रात दस बजे के बाद कोई भी दीपक न जलाए। राजा की इस आज्ञा के कारण पूरे राज्य में रात दस बजे के बाद एकदम अँधेरा हो जाता था। उसी राज्य में एक भिखारिन अपनी बेटी के साथ रहती थी। एक दिन उसकी बेटी ने रात को दीपक जलाया और खाना बनाने लगी। जब माँ ने यह देखा तो उसने बेटी को दीपक न जलाने के लिए कहा और राजा की आज्ञा तथा उसके नि:संतान होने की बात बताई। बेटी बोली कि माँ यदि राजा उससे शादी कर ले, तो उसकी सुनहरे बालों वाली दो संताने हो सकती है। संयोग की बात यह बात राजा के सिपाहियों ने सुन ली और राजमहल में जाकर पूरी बात राजा को बता दी। राजा उस भिखारिन की बेटी से विवाह करने के लिए तैयार हो गया। वह भिखारिन पहले तो अचकचाई लेकिन राजा की जिद के आगे वह भला क्या कर सकती थी। और फिर दोनों का विवाह हो गया। भिखारिन की बेटी राजमहल में आ गई। छहों रानियाँ उसे रानी के रूप में देखकर जलभुन गई। कुछ दिनों बाद सातवीं रानी गर्भवती हुई और समय आने पर उसने दो संतान के रूप में एक लडका और एक लडकी को जन्म दिया। राजा उस समय शिकार पर गया हुआ था। उसे यह बात मालूम नहीं थी। उधर छहों रानियों ने उन संतानों को पिटारे में बंद करके नदी में फिकवा दिया और उस रानी के पास बिल्ली के बच्चे रख दिए। जब राजा वापस आया तो बिल्ली के बच्चे देखकर बहुत नाराज हुआ और उसने सातवीं रानी को अँधेरी कोठरी में डलवा दिया। बेचारी रानी बहुत कहती रही लेकिन उसकी कोई बात नहीं सुनी। दूसरी तरफ उस पिटारे पर एक साधु की नजर पड़ी उसने उन बच्चों को पाल पोस कर बड़ा किया। कुछ साल बाद उस साधु की मृत्यु हो गई लेकिन मृत्यु के पूर्व उसने उन दोनों बच्चों के लिए रहने का अच्छा प्रबंध कर दिया। वे दोनों बच्चे अपने पिता के राज्य में आकर ही रहने लगे। छहों रानियों की नजर उन भाई-बहनों पर पड़ी तो उन्हें शक हुआ। अपना शक दूर करने के लिए एक रानी उनके घर गई और बहन से कहा कि तुम्हारा मकान तो बहुत सुंदर है लेकिन यहाँ पर वाकली के फूल की कमी है। उसके बिना सब सुंदरता अधूरी है। तब बहन ने भाई से वाकली का फूल लाने की जिद की। क्या भाई अपनी बहन की जिद पूरी कर पाया? उसे किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? सातवीं रानी क्या अंधेरी कोठरी में ही पड़ी रही? क्या राजा को सच्चाई पता चली? यह सारी बातें जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

कहानी - सौर - आशीष त्रिवेदी

सौर... कहानी का अंश... दिनेश को आज घर लौटने में देर हो गयी थी। जूते उतार कर वह पलंग पर लेट गया। वह बहुत थका हुआ था। आज का दिन अच्छा नहीं बीता था । काम भी और दिनों से कुछ अधिक था उस पर उसे बॉस की डांट भी खानी पड़ी। वह आँखें मूंदे लेटा था तभी उसकी पत्नी कुसुम ने उसके हाथ में एक कार्ड थमा दिया। उसने एक उचटती सी नज़र डालते हुए पूछा "क्या है।" "वो मेरी बरेली वाली मौसी हैं न उनकी छोटी बेटी की शादी है। इस महीने की 15 तारीख को। जाना पड़ेगा" " हूँ ....तो चली जाना।" कह कर दिनेश ने कार्ड एक तरफ रख दिया। " हाँ जाउंगी तो लेकिन कुछ देना भी तो पड़ेगा। मौसी हमें कितना मानती हैं। जब भी मिलाती हैं हाथ में कुछ न कुछ रख देती हैं।" " देख लो अगर तुम्हारे पास कुछ हो, कोई अच्छी साड़ी या और कुछ, तो दे दो।" " मेरे पास कहाँ कुछ है मैं कौन रोज़ रोज़ साडियाँ या गहने खरीदती हूँ।" " तो मैं भी क्या करूं मेरी हालत तुमसे छिपी है क्या। मेरे पास कुछ नहीं है।" दिनेश ने कुछ तल्ख़ अंदाज़ में कहा। दिनेश की माँ ने अपनी बहू की तरफदारी करते हुए कहा " उस पर क्यों चिल्ला रहा है। अब दुनियादारी तो निभानी ही पड़ती है।" अपनी सास का समर्थन पाकर कुसुम बोली " मैं कौन आपने लिए कुछ मांग रही हूँ। पर चार लोगों के बीच खाली हाथ जाउंगी तो बदनामी इनकी ही होगी।" कह कर वह सुबकने लगी। दिनेश का मन पहले ही खराब था। वह उबल पड़ा " दिन भर का थका हारा घर लौटा हूँ, एक गिलास पानी पूछना तो दूर फरमाइशों की लिस्ट लेकर सर पर सवार हो गयीं।" यह कह कर वह उठा और चप्पल पहन कर घर से बाहर निकल गया। कुसुम सन्न रह गयी। उसे पछतावा हो रहा था। उसे कुछ देर रुक जाना चाहिए था। समय देख कर ठंडे दिमाग से बात करनी चाहिए थी। दिनेश की परेशानी वह समझती है। जी तोड़ मेहनत करते हैं। फिर भी कमाई पूरी नहीं पड़ती। हर चीज़ के लिए मन मारना पड़ता है। दिनेश कहते कुछ नहीं पर अन्दर ही अन्दर इस बात को लेकर परेशान रहते हैं। वह मन ही मन स्वयं को कोसने लगी। उसे इस वक़्त यह बात नहीं करनी चाहिए थी। उसे परेशान देख कर उसकी सास ने समझाया " परेशान मत हो, थोड़ी देर में जब गुस्सा शांत होगा तो लौट आएगा।" कुसुम दिनेश के घर लौटने का इंतज़ार करने लगी। घर से निकल कर दिनेश यूँ ही सड़क पर चलने लगा। उसकी आमदनी की सौर इतनी छोटी थी की पाँव सिकोड़ते सिकोड़ते घुटने दुखने लगे थे। उसके मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा था। 'क्या ज़िन्दगी है दिन भर खटने के बाद भी छोटी छोटी चीज़ों के लिए तरसना पड़ता है।' वह क्या करे। अम्मा के ऑपरेशन के लिए क़र्ज़ लेना पड़ा। तनख्वाह का एक हिस्सा तो क़र्ज़ की अदायिगी में चला जाता है। जो बचता है उसमें बड़ी मुश्किल से घर चल पाता है। वह अपने ख्यालों में चलता हुआ घर से काफी दूर निकल आया था। यह इलाका शहर के पॉश इलाकों में से एक था। दोनों तरफ बने बड़े बड़े मकानों को दिनेश बड़ी हसरत से देख रहा था। चलते चलते वह थक गया था। सामने एक पार्क नज़र आया। वह पार्क में घुस गया। पार्क खाली था। अतः वह बेंच पर लेट गया। अब तक उसका गुस्सा शांत हो गया था। वह सोचने लगा ' बेकार ही कुसुम पर नाराज़ हुआ। सही तो है वो कहाँ कभी अपने लिए कुछ मांगती है। जो भी उसे देता हूँ उसी में संतुष्ट रहती है। इन आठ सालों में चार अच्छी साड़ियां भी नहीं दिलाई होंगी उसे।' यही सब सोचते सोचते उसे झपकी लग गयी। उसकी आँख खुली तो उसे अपने सीने पर कुछ हिलाता सा महसूस हुआ। उसका फ़ोन वाईब्रेट कर रहा था। जब तक फ़ोन उठाता काल मिस हो गयी। उसने देखा कुसुम की चार मिस कॉल थीं। ' घर में सब परेशान होंगे' वह उठा और तेज़ी से घर की तरफ चल दिया। उसके दस्तक देने से पहले ही दरवाज़ा खुल गया। कुसुम नज़रें झुकाए खड़ी थी। जब वह भीतर आया तो अम्मा ने डांटा " कहाँ चला गया था, बेचारी इतनी देर से भूखी बैठी है। जा अब खाना खा ले।" कुसुम ने धीरे से कहा " आप हाथ मुंह धो लीजिये मैं खाना लगाती हूँ।" जब वह हाथ मुंह धो कर आया तो कुसुम तौलिया लिए खड़ी थी " आप परेशान मत हों मैं मौसी से कोई बहाना बना दूँगी, मैं शादी में नहीं जाउंगी।" दिनेश हाथ पोंछने के बाद तौलिया उसे पकड़ाते हुए बोला " तुम फिक्र मत करो शादी में जाने की तैयारी करो, मैं दो तीन दिन में कुछ इंतज़ाम करता हूँ।" कुसुम ने खाना लगा दिया। दिनेश की पसंद के भरवां करेले की सब्जी थी। दिनेश ने एक ग्रास तोड़ा और कुसुम की तरफ बढ़ा दिया। कुसुम ने मुस्कुराते हुए वह कौर मुंह में रख लिया। उसके बाद दोनों पति पत्नी शांति से खाने लगे। इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक कथा - तीन पेड़

प्रेरक कथा का अंश... बहुत पुरानी बात है| किसी नगर के समीप एक जंगल तीन वृक्ष थे| वे तीनों अपने सुख-दुःख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे| एक दिन पहले वृक्ष ने कहा – “मैं खजाना रखने वाला बड़ा सा बक्सा बनना चाहता हूँ| मेरे भीतर हीरे-जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएँ. मुझे बड़े हुनर और परिश्रम से सजाया जाय, नक्काशीदार बेल-बूटे बनाए जाएँ, सारी दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है|” दूसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो एक विराट जलयान बनना चाहता हूँ| ताकि बड़े-बड़े राजा और रानी मुझपर सवार हों और दूर देश की यात्राएं करें, मैं अथाह समंदर की जलराशि में हिलोरें लूं, मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और सबका यकीन मेरी शक्ति में हो… मैं यही चाहता हूँ|” अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूँ| लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें, वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें, और मेरी शाखाएँ स्वर्ग तक पहुंचें… मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूँ|” ऐसे ही सपने देखते-देखते कुछ साल गुज़र गए. एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए| उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा – “ये जबरदस्त वृक्ष देखो! इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे.” और उसने पहले वृक्ष को काट दिया| वृक्ष तो खुश था, उसे यकीन था कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा बनाएगा| दूसरे वृक्ष के बारे में लकड़हारे ने कहा – “यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है| मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा”| दूसरा वृक्ष भी खुश था, उसका चाहा भी पूरा होने वाला था| लकड़हारे जब तीसरे वृक्ष के पास आए तो वह भयभीत हो गया|वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा एक लकड़हारा बोला – “इस वृक्ष से मुझे कोई खास चीज नहीं बनानी है इसलिए इसे मैं ले लेता हूं”| और उसने तीसरे वृक्ष को काट दिया| पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया और उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया|कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया| बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी| दूसरे वृक्ष को काटकर उससे मछली पकड़नेवाली छोटी नौका बना दी गई| भव्य जलयान बनकर राजा-महाराजाओं को लाने-लेजाने का उसका सपना भी चूर-चूर हो गया| तीसरे वृक्ष को लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लिया गया और टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए| एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया और स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया|वे बच्चे को चारा खिलानेवाले कठौते में सुलाने लगे। कठौता अब पालने के काम आने लगा| पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था| समय बीतता गया और सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकड़ने के लिए गए, उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा और नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा। एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था। उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया। वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा – “शांत हो जाओ”, और तूफान थम गया| यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है | तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आये और उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़कर एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया। ठोकर खाते, गिरते- पड़ते उस आदमी का सड़क पर तमाशा देखती भीड़ अपमान करती रही। वे जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उस आदमी के हाथों-पैरों में कीलें ठोंककर उसे पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया| दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को इसका बोध हुआ कि उस पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि ईसा मसीह को उसपर सूली पर चढ़ाया गया था। इस प्रेरक कथा का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - अपनी कीमत पहचानो

एक आदमी ने भगवान बुद्ध से पूछा : जीवन का मूल्य क्या है?   बुद्ध ने उसे एक पत्थर दिया और कहा : जाओ और इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ, लेकिन ध्यान रखना इसे बेचना नही है।  वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला : इसकी कीमत क्या है? संतरे वाला चमकीले पत्थर को देख कर बोला- '12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे दो।'     आगे एक सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा- 'एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।'    वह आदमी आगे एक सोना बेचने वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला- 'मुझे 50 लाख में बेच दो।'    उसने मना कर दिया। फिर वह जौहरी के पास पहुँचा। जौहरी ने उस पत्थर को पहचान लिया। उसने उस रूबी पत्थर की परिक्रमा लगाई और कहा कि यह तो बेशकीमती रूबी है। सारी कायनात, सारी दुनिया देकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। यह सुनकर वह व्यक्ति बुद्ध के पास वापस आया और सारी घटना कह सुनाई। तब बुद्ध बोले - हमारा मानव जीवन भी ऐसा ही बेशकीमती हीरा है। सभी इसकी कीमत अपनी औकात, अपनी हैसियत के अनुसार लगाते हैं। तुम घबराओ मत। समय आने पर तुम्हें भी लोग पहचान जाएँगे। लेकिन मानव को स्वयं भी अपनी कीमत पहचाननी होगी। इस प्रेरक प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - लेखक की सीख

प्रेरक प्रसंग का अंश... जॉर्ज बर्नार्ड शॉ अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक थे। लेकिन उन्हें यह प्रसिद्धि आसानी से नहीं मिली थी। इसके लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा था। जैसे-जैसे उनकी रचनाओं को पाठकों की सराहना मिलती गई वैसे-वैसे वह सफलता की बुलंदियों को छूते गए। इसके बाद उन्हें आए दिन अनेक कार्यक्रमों में शामिल होने के निमंत्रण मिलने लगे। वे बड़े हंसमुख और मिलनसार थे। इसलिए उनके चाहने वालों की एक लंबी फेहरिस्त थी। एक दिन उन्हें एक कॉलेज के कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया गया। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने सहजता से आमंत्रण को स्वीकार कर लिया और कार्यक्रम के दिन वह तय समय पर कॉलेज पहुंच गए। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उनका ऑटोग्राफ लेने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गई। उसी भीड़ में एक नौजवान ने उनके पैर छुए और अपनी हस्ताक्षर पुस्तिका देते हुए बोला, ‘सर, मुझे साहित्य का बहुत शौक है और मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी हैं। आप मेरे प्रिय लेखक हैं। मैं अपने जीवन में अभी तक अपनी पहचान नहीं बना पाया हूं लेकिन बनाना चाहता हूं। इसके लिए आप मुझे कोई संदेश देकर अपने हस्ताक्षर करें तो बहुत मेहरबानी होगी।’ जॉर्ज, नौजवान की बात पर मुस्कुराए और हस्ताक्षर पुस्तिका पर एक संदेश लिख अपने हस्ताक्षर कर दिए। नौजवान ने देखा तो लिखा था, ‘अपना समय दूसरों के हस्ताक्षर इकट्ठा करने में नष्ट न करें, बल्कि खुद को इस योग्य बनाएं कि दूसरे आपका हस्ताक्षर प्राप्त करने को लालायित रहें। अपनी अलग पहचान बनाने के लिए मेहनत आवश्यक है।’ यह पढ़कर नौजवान ने उनके पैर छू लिए और बोला, ‘सर, मैं आपके इस संदेश को जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बनाकर दिखाऊंगा।’ इस पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने नवयुवक की पीठ थपथपाई और आगे बढ़ गए। इस प्रसंग का आनंद आॅडियो की मदद से लीजिए...

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

कहानी - वानर राज बालि

कहानी का अंश... बालि और सुग्रीव को वानरश्रेष्ठ ऋक्ष राजा का पुत्र कहा जाता है। सुग्रीव को इन्द्र का पुत्र भी कहा गया है। बालि सुग्रीव का बड़ा भाई था। वह पिता और भाई का अत्यधिक प्रिय था। पिता की मृत्यु के बाद बालि ने राज्य सम्भाल लिया था। बालि का विवाह वैद्यराज सुषेण की पुत्री तारा के साथ सम्पन्न हुआ था। एक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान चौदह मणियों में से एक अप्सराएँ भी थीं। उन्हीं अप्सराओं में से एक तारा थी। बालि और सुषेण दोनों समुद्र मन्थन में देवतागण की मदद कर रहे थे। जब उन्होंने तारा को देखा तो दोनों में उसे पत्नी बनाने की होड़ लगी। बालि तारा के दाहिनी तरफ़ तथा सुषेण उसके बायीं तरफ़ खड़े हो गये। तब विष्णु ने फ़ैसला सुनाया कि विवाह के समय कन्या के दाहिनी तरफ़ उसका होने वाला पति तथा बायीं तरफ़ कन्यादान करने वाला पिता होता है। अतः बालि तारा का पति तथा सुषेण उसका पिता घोषित किये गये। पृथ्वी तल के समस्त वीर योद्धाओं को परास्त करता हुआ लंका का राजा रावण बालि से युद्ध करने के लिए आया था। उस समय बालि सन्ध्या के लिए गया हुआ था। वह प्रतिदिन समस्त समुद्रों के तट पर जाकर सन्ध्या करता था। बालि के मन्त्री तार के बहुत समझाने पर भी रावण बालि से युद्ध करने की इच्छा से ग्रस्त रहा। वह सन्ध्या में लीन बालि के पास जाकर अपने पुष्पक विमान से उतरा तथा पीछे से जाकर बालि को पकड़ने की इच्छा से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बालि ने उसे देख लिया था, किंतु उसने ऐसा नहीं जताया तथा सन्ध्या करता रहा। रावण की पदचाप से जब उसने जान लिया कि वह निकट है तो तुरंत उसने रावण को पकड़कर बगल में दबा लिया और आकाश में उड़ने लगा। बारी-बारी में उसने सब समुद्रों के किनारे सन्ध्या की। राक्षसों ने भी उसका पीछा किया। रावण ने स्थान-स्थान पर बालि को नोचा और काटा, किंतु बालि ने उसे नहीं छोड़ा। सन्ध्या समाप्त करके किष्किंधा के उपवन में उसने रावण को छोड़ा तथा उसके आने का प्रयोजन पूछा। रावण बहुत थक गया था, किंतु उसे उठाने वाला बालि तनिक भी शिथिल नहीं था। उससे प्रभावित होकर रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर उससे मित्रता की। स्त्री के कारण ही बालि का दुंदुभी के पुत्र मायावी से बैर हो गया। एक बार अर्धरात्रि में किष्किन्धा के द्वार पर आकर मायावी ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा। बालि तथा सुग्रीव उससे लड़ने के लिए गये। दोनों को आता देखकर मायावी वन की ओर भागा तथा एक बिल में छिप गया। बालि सुग्रीव को बिल के पास खड़ा करके स्वयं बिल में घुस गया। सुग्रीव ने एक वर्ष तक बालि के बाहर आने की प्रतीक्षा की। तदुपरांत बिल से आती हुई रक्त की धारा देखकर वह भाई को मरा जानकर बिल को पर्वत शिखर से ढककर अपने नगर में लौट आया। मन्त्रियों के आग्रह पर उसने राज्य संभाल लिया। उधर बालि ने मायावी को एक वर्ष में ढूंढ़ निकाला। उसने कुटुंब सहित मायावी का वध किया, और जब वह लौट कर आया तो बिल पर रखे पर्वत शिखर को देखकर उसने सुग्रीव को आवाज़ दी, किंतु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। बालि किसी प्रकार जैसे-तैसे शिखर को हटाकर अपनी नगरी में पहुँचा। वहाँ उसने अपने भाई सुग्रीव को राज्य करते देखा। उसे निश्चय हो गया कि सुग्रीव राज्य के लोभ से उसे बिल में बंद कर आया था। अत: उसने सुग्रीव को राज्य से निर्वासित कर दिया तथा उसकी पत्नी रूमा को अपने पास रख लिया। सीता हरण के पश्चात राम से मित्रता होने पर भी सुग्रीव को राम की शक्ति पर इतना विश्वास नहीं था कि वह शक्तिशाली वानरराज बालि को मार सकेंगे। अत: राम ने सुग्रीव के कहने पर अपने बल की परीक्षा दी। एक बाण से राम ने एक साथ ही सात साल वृक्षों को भेद दिया तथा अपने पाँव के अंगूठे की एक ठोकर से दुंदुभी के सूखे कंकाल को दस योजन दूर फेंक दिखाया। सुग्रीव बहुत प्रसन्न हुआ। राम ने सुग्रीव को बालि-वध का आश्वासन दिया और सब किष्किन्धा की ओर चल दिये। राम हाथ में धनुष लिये आगे-आगे चल रहे थे। किष्किन्धा में पहुँच कर राम एक सघन कुँज में ठहर गये और सुग्रीव को बालि से युद्ध करने के लिये भेजा और कहा- "तुम निर्भय हो कर युद्ध करो।" राम के वचनों से उत्साहित होकर सुग्रीव ने बालि को युद्ध करने के लिये ललकारा। सुग्रीव की इस ललकार को सुन कर बालि के क्रोध की सीमा न रही। वह क्रोध में भर कर बाहर आया और सुग्रीव पर टूट पड़ा। उन्मत्त हुये दोनों भाई एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। श्री रामचनद्र जी ने बालि को मारने कि लिये अपना धनुष सँभाला, परन्तु दोनों का आकार एवं आकृति एक समान होने के कारण वे सुग्रीव और बालि में भेद न कर सके। इसलिये बाण छोड़ने में संकोच करने लगे। उधर बालि की मार न सह सकने के कारण सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागा। राम, लक्ष्मण अन्य वानरों के साथ सुग्रीव के पास पहुँचे। राम को सम्मुख पाकर उसने उलाहना देते हुये कहा- "मल्ल युद्ध के लिये भेज कर आप खड़े-खड़े मेरे पिटने का तमाशा देखते रहे। क्या यही आपकी प्रतिज्ञा थी? यदि आपको मेरी सहायता नहीं करनी थी तो मुझसे पहले ही स्पष्ट कह देना चाहिये था। आपके भरोसे आज मैं मृत्यु के मुँह में फँस गया था। यदि मैं वहाँ से भाग न गया होता तो बालि मुझे मार ही डालता। सुग्रीव के क्रुद्ध शब्द सुन कर रामचन्द्र ने बड़ी नम्रता से कहा- "सुग्रीव! क्रोध छोड़ कर पहले तुम मेरी बात सुनो। तुम दोनों भाइयों का रंग-रूप, आकार, गति और आकृतियाँ इस प्रकार की थीं कि मैं तुम दोनों में अन्तर नहीं कर सका। इसीलिये मैंने बाण नहीं छोड़ा। सम्भव था कि वह बाण उसके स्थान पर तुम्हें लग जाता और फिर मैं जीवन भर किसी को मुख दिखाने लायक़ नहीं रहता। इस बार मैं तुम्हारे ऊपर कोई चिह्न लगा दूँगा।" राम लक्ष्मण से बोले- "हे वीर! उस पुष्पयुक्त लता को तोड़ कर सुग्रीव के गले में बाँध दो, जिससे इन्हें पहचानने में मुझसे कोई भूल न हो।" लक्ष्मण ने ऐसा ही किया और सुग्रीव एक बार फिर से बालि से युद्ध करने चला। इस बार सुग्रीव ने दूने उत्साह से गर्जना करते हुये बालि को ललकारा, जिसे सुन कर वह आँधी के वेग से बाहर की ओर दौड़ा। सुग्रीव की ललकार को सुनकर बालि की पत्नी तारा ने बालि को रोकते हुये कहा- "हे वीरश्रेष्ठ! अभी आप बाहर मत जाइये। सुग्रीव एक बार मार खा कर भाग जाने के पश्चात् फिर युद्ध करने के लिये लौटा है। इससे मेरे मन में संशय हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी के बल पर आपको ललकार रहा है। आज ही मुझे अंगद ने बताया था कि अयोध्या के अजेय राजकुमारों राम और लक्ष्मण के साथ उसकी मैत्री हो गई है। सम्भव है वे ही उसकी सहायता कर रहे हों। राम के पराक्रम के विषय में तो मैंने भी सुना है। वे शत्रुओं को देखते-देखते धराशायी कर देते हैं। यदि वे स्वयं सुग्रीव की सहायता कर रहे हैं तो उनसे लड़ कर आपका जीवित रहना कठिन है। इसलिये उचित है कि इस अवसर पर आप बैर छोड़ कर सुग्रीव से मित्रता कर लीजिये। उसे युवराज पद दे दीजिये। वह आपका छोटा भई है और इस संसार में भाई के समान हित कोई दूसरा नहीं होता। उससे इस समय मैत्री करने में ही आपका कल्याण है। तारा के इस प्रकार समझाने से चिढ़ कर बालि ने उसे झिड़क कर कहा- "यह अनर्गल प्रलाप बन्द करो। स्त्री जाति स्वभाव से ही कायर होती है। मैं सुग्रीव की ललकार को सुन कर कायरों की भाँति घर में छिप कर नहीं बैठ सकता और न ललकारने वाले से भयभीत होकर उसके सम्मुख मैत्री का हाथ ही बढ़ा सकता हूँ। रामचन्द्र जी को मैं जानता हूँ। वे धर्मात्मा हैं। मेरा उनसे कोई बैर भी नहीं है, फिर वे मुझ पर आक्रमण ही क्यों करेंगे? आज मैं अवश्य सुग्रीव का वध करूँगा।" यह कह कर बालि सुग्रीव के पास पहुँच कर उससे युद्ध करने लगा। दोनों एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। जब राम ने देखा कि सुग्रीव दुर्बल पड़ता जा रहा है, तभी उन्होंने एक विषैले बाण को धनुष पर चढ़ा कर बालि को लक्ष्य करके छोड़ दिया। बाण कड़कता हुआ बालि के वक्ष में जाकर लगा जिससे वह बेसुध हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। बालि को पृथ्वी पर गिरते देख राम और लक्ष्मण उसके पास जा कर खड़े हो गये। जब बालि की चेतना लौटी और उसने दोनों भाइयों को अपने सम्मुख खड़े देखा तो वह नम्रता के साथ कठोर शब्दों में बोला- "हे राघव! आपने छिपकर जो मुझ पर आक्रमण किया, उसमें कौन-सी वीरता थी? यद्यपि तारा ने सुग्रीव की और आपकी मैत्री के विषय में मुझे बताया था, परन्तु मैंने आपकी वीरता, शौर्य, पराक्रम, धर्मपरायणता, न्यायशीलता आदि गुणों को ध्यान में रखते हुये उसकी बात नहीं मानी और कहा था कि न्यायशील राम कभी अन्याय नहीं करेंगे। मेरा तो आपके साथ कोई बैर भी नहीं था। फिर आपने यह क्षत्रियों को लजाने वाला कार्य क्यों किया? आप नरेश हैं। राजा के गुण साम, दाम, दण्ड, भेद, दान, क्षमा, सत्य, धैर्य और विक्रम होते हैं। कोई राजा किसी निरपराध को दण्ड नहीं देता। फिर आपने मेरा वध क्यों किया है? जिसने आपकी स्त्री का हरण किया, उससे आपने कुछ नहीं कहा, किन्तु मुझ असावधान पर छिप कर वार किया। यदि मुझसे युद्ध करना ही था तो सामने आकर मुझसे युद्ध करते। आपके इस व्यवहार से मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।" बालि के इन कठोर वचनों को सुन कर राम ने उससे कहा- "हे बालि! मैंने तुम्हारा वध अकारण या व्यक्तिगत बैरभाव के कारण से नहीं किया है। सम्भवतः तुम यह नहीं जानते कि यह सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुओं की है। वे ही इसके एकमात्र स्वामी हैं और इसीलिये उन्हें समस्त पापियों को दण्ड देने का अधिकार है। इक्ष्वाकु कुल के धर्मात्मा नरेश भरत इस समय सारे देश पर शासन कर रहे हैं। उनकी आज्ञा से हम सारे देश का भ्रमण करते हुये साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का दमन कर रहे हैं। तुम कामवश कुमार्गगामी हो गये थे। धर्म-शास्त्र के अनुसार छोटा भाई, पुत्र और शिष्य तीनों पुत्र के समान होते हैं। तुमने इस धर्ममार्ग को छोड़ कर अपने छोटे भाई की स्त्री का हरण किया, जो धर्मानुसार तुम्हारी पुत्रवधू हुई। यह एक महापाप है। तुम्हें इसी महापाप का दण्ड दिया गया है। ऐसा करना मेरा कर्तव्य था। अपनी बहन और अनुज वधू को भोगने वाला व्यक्ति मार डालने योग्य होता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें तुम्हारे पिछले पापों का दण्ड दे कर आगे के लिये तुम्हें निष्पाप कर दिया है। अब तुम निष्पाप होकर स्वर्ग जाओगे। मैं तुम्हें इस विषय में एक घटना सुनाता हूँ। "मेरे पूर्व पुरुषों में मान्धाता नामक एक राजा थे। एक श्रमण ने इसी प्रकार का दुष्कर्म किया था जैसा तुमने किया है। राजा ने उसे भी कठोर दण्ड दिया था। अतएव तुम्हारा पश्चाताप करना ही व्यर्थ है। मैंने देश के राजा की आज्ञा का पालन किया है। मैं भी स्वतन्त्र नहीं हूँ। इसीलिये मैं तुम्हें दण्ड देने के लिये बाध्य था।" राम का तर्क सुन बालि ने हाथ जोड़कर कहा- "हे राघव! आपका कथन सत्य है। मुझे अपनी मृत्यु पर दुःख नहीं है। मुझे केवल अपने पुत्र अंगद की किशोरावस्था पर चिन्ता है। वह मेरी एकमात्र सन्तान है। बालि ने सुग्रीव और राम से यह वादा लेकर कि वह तारा तथा अंगद का ध्यान रखेंगे, सुखपूर्वक देह का त्याग किया।

राजस्थानी लोक-कथा - चोर और राजा

लोक कथा का अंश... किसी जमाने में एक चोर था। वह बड़ा ही चतुर था। लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उड़ा सकता था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जबतक वह राजधानी में नहीं जाएगा और अपना करतब नहीं दिखाएगी, तब तक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि कहां क्या कर सकता है। उसने तय कि राजा के महल से अपना काम शुरू करेगा। राजा ने रात दिन महल की रखवाली के लिए बहुतसे सिपाही तैनात कर रखे थे। बिना पकड़े गये परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बड़ी घड़ी लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी। चोर ने लोहे की कुछ कीलें इकट्ठी कीं ओर जब रात को घड़ी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एक-एक कील ठोकता गया। इस तरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीलें लगा दीं, फिर उन्हें पकड पकडकर वह ऊपर चढ़ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से हीरे चुरा लाया। अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो मंत्रियों ने राजा को इसकी खबर दी। राजा बडा हैरान और नाराज हुआ। उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि शहर की सड़कों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या दूनी कर दी जाये और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाये तो उसे चोर समझकर गिरफ्तार कर लिया जाये। जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था। उसे सारी योजना की एक बात का पता चल गया। उसे फौरन यह भी मालूम हो गया कि कौन से छब्बीस सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं। वह सफाई से घर गया और साधु का बाना धारण करके उन छब्बीसों सिपाहियों की बीवियों से जाकर मिला। उनमें से हरेक इस बात के लिए उत्सुक थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से इनाम ले। एक-एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बडी शुभ है। उसके पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा; लेकिन, देखो, चोर की अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबा लेगा। घर के सारे दरवाजे बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर जलता कोयला फेंकना। इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकड में आ जायेगा। सारी स्त्रियां रात को चोर के आगमन के लिए तैयार हो गईं। अपने पतियों को उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी। इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे चार बजे तक पहरा देते रहे। हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि उस रात को चोर नहीं आयेगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया। ज्योंही वे घर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई कार्रवाई शुरू कर दी। फल वह हुआ कि सिपाही जल गये ओर बडी मुश्किल से अपनी स्त्रियों को विश्वास दिला पाये कि वे ही उनके असली पति हैं और उनके लिए दरवाजा खोल दिया जाये। सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया। दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल सुनाया गया। सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े। उस रात कोतवाल ने तैयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया। जब वह एक गली में जा रहा रहा था, चोर ने उसे देख कर कहा, "मैं चोर हूं।″ कोतवाल समझा कि कोई मजाक कर रहा है। उसने कहा, ″मजाक छाड़ो ओर अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें काठ में डाल दूंगा।″ चोर बोला, ″ठीक है। इससे मेरा क्या बिगड़ेगा!″ और वह कोतवाल के साथ काठ डालने की जगह पर पहुंचा। वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काठ को आप इस्तेमाल कैसे किया करते हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए।″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओ तो ?″ चोर बोला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है। मैं भाग क्यों जाऊंगा?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि काठ कैसे डाला जाता है। ज्यों ही उसने अपने हाथ-पैर उसमें डाले कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया। जाड़े की रात थी। दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया। सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल काठ में फंसे पड़े हैं। उन्होंने उनको उसमें से निकाला और अस्पताल ले गये। अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया। राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया। चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था। रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया। राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा। तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है?″ साधु ने जवाब दिया कि "वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं। यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं।″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे। आपस में काफी बहस-मुबाहिसे और दो-तीन बार इनकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया ओर उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये। चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा और राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा। सवेरे के कोई चार बजने आये। राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया; लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है। उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया। राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी। दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया ओर मारे डर के थरथर कांपने लगा। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा। राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया। उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया। अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हताश था। उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थित हो जायेगा तो उसे माफ कर दिया जायेगा और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा। चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, "महाराज, मैं ही वह अपराधी हूं।″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी। राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा। इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा। इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कहानी - बुद्धि और भाग्य

कहानी का अंश... एक बार बुद्धि और भाग्य में झगड़ा हुआ। बुद्धि ने कहा, मेरी शक्ति अधिक है। मैं जिसे चाहूँ सुखी कर दूँ। मेरे बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता।’’ भाग्य ने कहा, मेरी शक्ति अधिक है। मैं तेरे बिना काम कर सकता हूँ। तू मेरे बिना काम नहीं कर सकती।’’ इस तरह दोनों ने अपनी-अपनी तरफ की दलीलें जोर-शोर से दीं। जब झगड़ा दलीलों से समाप्त न हुआ तो बुद्धि ने भाग्य से कहा कि यदि तुम उस गड़रिए को जो जंगल में भेड़ें चरा रहा है, मेरी सहायता के बिना राजा बना दो तो समझूँ कि तुम बड़े हो। यह सुनकर भाग्य ने उसके राजा बनाने का यत्न करना आरंभ कर दिया। उसने एक बहुत कीमती खड़ाऊँ की जोड़ी, जिसमें लाखों रुपए के नग लगे थे, लाकर गड़रिए के सामने रख दी। गड़रिया उनको पहनकर चलने फिरने लगा। फिर भाग्य ने एक व्यापारी को वहाँ पहुँचा दिया। व्यापारी उन खड़ाउँओं को देखकर विस्मित हो गया। उसने गड़रिए से कहा। तुम ये खड़ाऊँ बेच दो।’’ गड़रिए ने कहा, ‘ले लीजिए।’’ व्यापारी ने उनका मूल्य पूछा। गड़रिए ने कहा, ‘‘क्या बतलाऊँ मुझे रोटी खाने रोज गाँव जाना पड़ता है। यदि तुम मुझे दो मन भुने चने दे दो तो मैं यहाँ बैठे-बैठे चने चबाकर भेड़ों का दूध पी लिया करूँगा। इस भाँति मैं गाँव जाने के कष्ट से बच जाऊँगा और आपको भी खड़ाऊँ मिल जाएँगी। सारांश यह कि उस बुद्धिमान गड़रिए ने वो अनमोल खड़ाऊँ, जिनमें एक-एक हीरा करोड़ों रुपए का था, दो मन चनों के बदले में बेच डालीं। यह देखकर भाग्य ने और प्रयत्न किया। अब उस व्यापारी ने वे खड़ाऊँ राजा को भेंट की तो राजा देखकर हैरान हो गया। उसने व्यापारी से पूछा, ‘‘तुमने ये खड़ाऊँ कहाँ से पाईं ? व्यापारी ने कहा ‘‘महाराज एक राजा मेरा मित्र है उसने ये मुझे दीं।’’ तब राजा ने पूछा, ‘‘क्या उस राजा के पास ऐसी और भी खड़ाऊँ हैं ?’’ व्यापारी ने कहा हाँ, है।’’ यह सुनकर राजा ने कहा, ‘‘अच्छा जाओ, मेरी लड़की की सगाई उसके लड़के से करा दो।’’ व्यापारी जब भाग्यदेव की प्रेरणा से सब बातें कह चुका, तब राजा की अंतिम बात सुनकर बहुत घबराया और सोचने लगा कि खड़ाऊँ तो उसने गड़रिए से ली हैं; न कोई राजा है, न कोई राजा का लड़का। किंतु इन झूठी बातों को कह चुकने के कारण व्यापारी ने सोचा कि यदि मैं इस कथन को अस्वीकार करता हूँ तो न मालूम राजा साहब मुझे क्या दंडे दें। यह सोचकर उसने तय कर लिया कि जैसे भी हो, इस राजा के नगर से निकल जाना चाहिए। अत उसने राजा से कहा, ‘‘ठीक है, तो अब मैं आपकी लड़की की सगाई पक्की करने जाता हूँ।’’ यह कहकर वह जिस ओर से आया था उसी ओर को चल दिया और जब उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ वह गड़रिए से मिला था, तो क्या देखता है कि गड़रिया उससे भी मूल्यवान खड़ाऊँ पहने है। व्यापारी यह देखकर हैरान हो गया और उसने सोचा कि हो न हो, यह कोई सिद्ध महात्मा है। तभी तो ऐसी वस्तुएँ उसे स्वयं मिल जाती हैं। उसने निश्चय किया कि यहाँ रहकर इसका पता लगाना चाहिए। सोचकर उसने वही डेरा लगा दिया और अपना बहुत सा ताँबा लदा हुआ सब सामान एक ओर पेड़ के नीचे रख दिया। जब दोपहर हुई तो गड़रिया धूप से व्याकुल हो उस पेड़ के नीचे आया, जहाँ ताँबे के ढेर पड़े हुए थे। वह ढेर के सहारे सिर रखकर सो गया। भाग्य ने उस ताँबें के ढेर को सोना कर दिया। जब व्यापारी ने यह देखा तो सोचा कि जिस व्यक्ति के छू जाने से ताँबा सोना हो जाता है, उसको राजा बनाना कोई बड़ी बात नहीं। यह सोचकर उस व्यापारी ने वहीं जमीन खरीदी और किला बनवाना आरंभ कर दिया। सेना भर्ती की जाने लगी और जब सब सामान तैयार हो गया तो व्यापारी गड़रिए को पकड़कर किले में ले गया। उसको अच्छे-अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहनवाए; मंत्री सेवक इत्यादि कर्मचारी नौकर रखे और फिर उस लड़की वाले राजा को पत्र लिखा कि हमारे राजा जी ने सगाई स्वीकार कर ली है। अतः जो तिथि विवाह की निश्चिय करो, लिखो; उसी दिन बारात आ जाएगी। पत्रोत्तर में राजा ने तिथि लिख दी। इसपर विवाह का प्रबंध होने लगा। एक दिन जब राजसभा हो रही थी, सब मंत्री मुसाहिब बैठे हुए थे और वह गड़रिया राजसिंहासन पर तकिया लगाए राजा बना बैठा था, तब गड़रिए ने व्यापारी से कहा, ‘‘भाई देखो, तुम मुझे छोड़ दो, मेरी भेड़ें किसी के खेत में न चली जाएँ, कहीं मैं मारा न जाऊँ।’’ यह सुनकर सब लोग हँस पड़े। व्यापारी भी बड़ी हैरान हुआ। उसने सोचा कि इसका क्या प्रबंध किया जाए ? कहीं इसने राजा के सामने भी ऐसा ही कह दिया तो मैं तो उसी समय मारा जाऊँगा। उसने गड़रिए से कहा, ‘‘यदि तुम फिर कभी ऐसी बात कहोगे तो मैं तुम्हें उसी समय तलवार से मार डालूँगा। जो कुछ कहना हो, चुपके से मेरे कान में कहा करो।’’ कुछ समय बाद विवाह की तिथि आ गई। व्यापारी बारात लेकर चल दिया। जब लड़की वाले राजा का नगर निकट आ गया और उधर से मंत्री, बहुत से नौकर चाकर सेना अस्त्र-शस्त्र हाथी-घोड़े इत्यादि राजा की अगवानी के लिए आए तो गड़रिए ने विचार किया कि कदाचित् मेरी भेड़ें इनके खेत में चली गई हैं और ये मेरे कपड़े-लत्ते छीनने आ रहे हैं। अतः उसने झट व्यापारी से कहा, ये सब मेरे कपड़े-लत्ते छीनने के लिए आ रहे हैं। चूँकि यह बात कान में कही गई थी, अतः उस व्यापारी के सिवा और किसी को मालूम नहीं हुई। लोगों ने व्यापारी से पूछा, ‘‘कुँवर जी क्या आज्ञा दे रहे हैं ? व्यापारी ने कहा, कुँवर जी कहते हैं कि जितने आदमी स्वागत में आए हैं, प्रत्येक को पाँच-पाँच लाख रुपया पुरस्कार में दिया जाए।’’ फिर क्या था, बात की बात में यह फैल गया कि किसी बड़े भारी सम्राट् के कुँवर की बारात आई है, जो एक एक आदमी को पाँच-पाँच लाख रुपया पुरस्कार में देता है। नगर निवासी ही नहीं, लड़की वाला राजा भी घबराया कि मैंने बड़े भारी राजा से नाता जोड़ने का यत्न किया है। अब तो ईश्वर ही लाज रखे। अंततः उसी दिन राजा की कन्या का विवाह उस गड़रिए से हो गया। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

प्रेरक प्रसंग - अनमोल सीख

प्रेरक प्रसंग का अंश... प्राचीन काल में एक संत थे। वह मानते थे कि इंसान को जिस चीज की जरूरत होती है, उसे ईश्वर दे ही देता है। वह अपने पास एक कमंडल और रस्सी के अलावा कुछ नहीं रखते थे। वह इधर से उधर घूमते रहते थे। एक बार वह कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें प्यास लगी पर कहीं पानी दिखाई नहीं दिया। लाचार होकर वह आगे बढ़े। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि सामने एक कुआं है, जो लबालब पानी से भरा हुआ है एक हिरन उसमें से पानी पी रहा था। उन्होंने सोचा कि इसमें तो पानी एकदम ऊपर है इसलिए वह कमंडल और रस्सी को छोड़कर कुएं के पास पहुंचे। लेकिन उनके पहुंचते ही कुएं का पानी एकदम नीचे चला गया। संत हैरान रह गए। उन्होंने इधर-उधर नजरें दौड़ाईं पर कहीं कुछ नहीं दिखा। वह सोचने लगे कि आखिर क्या हुआ? उनकी प्यास गायब हो गई। वह चुपचाप खड़े होकर देखने लगे कि माजरा क्या है। तभी कहीं से आवाज आई, 'तुम हैरान क्यों होते हो? हिरन के पास कमंडल और रस्सी नहीं थी, इसलिए हमने खुद पानी को उसके नजदीक कर दिया। लेकिन तुम्हारे पास तो कमंडल और रस्सी है, इसलिए पानी को नीचे कर दिया।' संत को इस पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने कमंडल और रस्सी को दूर फेंक दिया और पानी पिये बिना ही वहां से चलने को हुए। इतने में फिर से आवाज आई, 'अरे कहां जा रहे हो? हमने तो तुम्हारे सब्र की परीक्षा ली थी। जाओ और पानी पीयो। तुमने तो हमें भी झुका दिया। तुम्हारे पास एक कमंडल और रस्सी थी, तुमने उसका मोह भी छोड़ दिया। तुम किसी भी सहारे के बगैर जी सकते हो, यह यकीन ही तुम्हारी ताकत है। सबके पास यह ताकत नहीं होती और न ही ऐसी हिम्मत होती है।' संत समझ न सके कि यह सपना है या हकीकत लेकिन उनमें एक नया आत्मविश्वास भर चुका था। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - अहंकार से मुक्ति

प्रेरक प्रसंग का अंश... अंगिरा ऋषि अपनी विद्वता और तेजस्विता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके मार्गदर्शन में अनेक शिष्य ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन सफल बनाते थे। उदयन उनका एक अत्यंत प्रतिभावान शिष्य था। ऋषि उसके प्रति अत्यंत स्नेह रखते थे। एक बार ऋषि ने महसूस किया कि उदयन के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। उसमें न सिर्फ अहंकार आने लगा था, बल्कि वह आलस्य का भी शिकार होता जा रहा था। ऋषि इससे दुखी थे वह उदयन को इनसे बाहर निकालना चाहते थे। उन्हें एक तरकीब सूझी। एक रात वह उदयन के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। तभी अचानक चर्चा रोककर उन्होंने उदयन से कहा, 'वत्स, सामने रखी अंगीठी में झांक कर देखो, कोयला दहकने के कारण कितना तेजस्वी लग रहा है। इसे निकालकर मेरे सामने रख दो जिससे मैं पास से इसे देख सकूं।' उदयन ने कोयले को अंगीठी से निकालकर उनके समीप रख दिया। कुछ ही क्षणों में दहकता हुआ कोयला अंगारे की जगह राख में परिवर्तित हो गया। दहकते हुए अंगारे को राख में परिवर्तित होते देख ऋषि उदयन से बोले, 'वत्स देखो, अंगीठी का सबसे चमकदार कोयला जिस प्रकार अग्नि के तेज से विमुख होते ही राख बन गया, उसी प्रकार सक्रिय और प्रतिभावान व्यक्ति भी अभ्यास, स्वाध्याय, विनम्रता, नेकी व सक्रियता से विमुख होते ही आलस्य तथा अहंकार का शिकार होकर निस्तेज व गुणविहीन हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस बात को अपने हृदय में बसा लेना चाहिए कि सफलता, अभ्यास, ज्ञान, सक्रियता व बुद्धिमत्ता ही किसी व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाती है। इन गुणों को अपनाकर ही उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है। अहंकार व आलस के व्यक्ति पर हावी होते ही वह इन गुणों से युक्त होते हुए भी गुणरहित होता है और ऐसे व्यक्ति की छवि धीरे-धीरे धूमिल होती जाती है।' उदयन अपने गुरु का आशय समझ गया। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - कर्म का फल

प्रेरक प्रसंग का अंश... एक गांव में जमींदार और उसके एक मजदूर की साथ ही मौत हुई। दोनों यमलोक पहुँचे। धर्मराज ने जमींदार से कहा, ‘आज से तुम मजदूर की सेवा करोगे।’ मजदूर से कहा, ‘अब तुम कोई काम नहीं करोगे, आराम से यहाँ रहोगे।’ जमींदार परेशान हो गया। पृथ्वी पर तो मजदूर जमींदार की सेवा करता था, पर अब उलटा होने वाला था। जमींदार ने कहा, ‘भगवन, आप ने मुझे यह सजा क्यों दी? मैं तो भगवान का परम भक्त हूँ। प्रतिदिन मंदिर जाता था। देसी घी से भगवान की आरती करता था और बहुमूल्य चीजें दान करता था। धर्म के अन्य आयोजन भी मैं करता ही रहता था।’ धर्मराज ने मजदूर से पूछा, ‘तुम क्या करते थे पृथ्वी पर?’ मजदूर ने कहा, ‘भगवन, मैं गरीब मजदूर था। दिन भर जमींदार के खेत में मेहनत मजदूरी करता था। मजदूरी में उनके यहाँ से जितना मिलता था, उसी में परिवार के साथ गुजारा करता था। मोह माया से दूर जब समय मिलता था तब भगवान को याद कर लेता था। भगवान से कभी कुछ मांगा नहीं। गरीबी के कारण प्रतिदिन मंदिर में आरती तो नहीं कर पाता था, लेकिन जब घर में तेल होता तब मंदिर में आरती करता था और आरती के बाद दीपक को अंधेरी गली में रख देता था ताकि अंधेरे में आने-जाने वाले लोगों को प्रकाश मिले।’ धर्मराज ने जमींदार से कहा, ‘आपने सुन ली न मजदूर की बात? भगवान धन-दौलत और अहंकार से खुश नहीं होते। भगवान मेहनत और ईमानदारी से कमाने वाले व्यक्ति से प्रसन्न रहते हैं। यह मजदूर तुम्हारे खेतों में काम करके खुश रहता था और सच्चे मन से भगवान की आराधना करता था। जबकि तुम आराधना ज्यादा धन पाने के लिए करते थे। तुम मजदूरों से ज्यादा काम लेकर कम मजदूरी देते थे। तुम्हारे इन्हीं कामों के कारण तुम्हें मजदूर का नौकर बनाया गया है ताकि तुम भी एक नौकर के दुख-दर्द को समझ सको।’ इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - कोयल और कौआ

प्रेरक प्रसंग का अंश... संस्कृत साहित्य की यह चर्चित कथा है। एक बार वसंत ऋतु में एक कोयल वृक्ष पर बैठी कूक रही थी। आते-जाते लोग उसकी कूक को सुनते और उसकी सुरीली आवाज का आनंद लेते हुए उसकी तारीफ के पुल बांधते। कुछ देर बाद कोयल के सामने एक कौआ तेज गति से आया। कोयल ने उससे पूछा, ‘इतनी तेज गति से कहाँ जा रहे हो? कुछ देर बैठो, बातें करते हैं।’ कौए ने उत्तर दिया कि वह जरा जल्दी में है और देश को छोड़कर परदेस जा रहा है। कोयल ने इसका कारण पूछा तो कौआ बोला, ‘यहाँ के लोग बहुत खराब हैं। सब तुम्हें ही चाहते हैं। सभी लोग सिर्फ तुम्हारा आदर करते हैं। वह यही चाहते हैं कि तुम हमेशा की तरह इसी प्रकार से उनके क्षेत्र में गाती रहो। वहीं जहाँ तक मेरी बात है तो मुझे कोई देखना तक नहीं चाहता। यहाँ तक कि मैं किसी की मुंडेर पर बैठता हूँ तो मुझे कंकड़ मारकर वहाँ से भगा दिया जाता है। मेरी आवाज भी कोई नहीं सुनना चाहता। जहाँ मेरा अपमान हो, मैं ऐसे स्थान पर एक क्षण भी नहीं रहना चाहता। ज्ञानियों ने भी हमें यही शिक्षा दी है कि अपमान की जगह पर नहीं रहना चाहिए।’ यह सुनकर कोयल बोली, ‘परदेस जाना चाहते हो तो बड़े शौक से जाओ। यह पूरी तरह से तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। लेकिन एक बात का सदैव ध्यान रखना कि वहाँ जाने से पहले अपनी आवाज को बदल लेना। अपनी वाणी को मधुर बना लेना। यदि तुम्हारी वाणी ठीक वैसी ही कठोर रही, जैसी यहाँ पर है तो परदेस में भी लोग तुम्हारे साथ वही व्यवहार करेंगे जो अभी हो रहा है। संसार जो है, जैसा भी है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन हम अपनी दृष्टि और वाणी को बदल सकते हैं। इन दोनों के बदलने से जीवन की दिशा और दशा, दोनों बदल जाती है और यहीं से संसार में आनंद और सुख की प्राप्ति शुरू होती है।’ इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - सच्ची स्वतंत्रता

प्रेरक प्रसंग का अंश.... भारतवर्ष में सम्राट समुद्रगुप्त प्रतापी सम्राट हुए थे। लेकिन जीवन क्षेत्र में सामने आने वाली विभिन्न प्रकार की चिंताओं से वह भी नहीं बच सके। एक समय ऐसा आया जब कि चिंताओं के कारण वह काफी परेशान से रहने लगे। चिंताओं का चिंतन करने के लिए एक दिन वह वन की ओर निकल पड़े। वह रथ पर थे, तभी उन्हें कहीं से बांसुरी की सुरीली तान सुनाई दी। इतनी मीठी आवाज सुनकर उन्होंने सारथी से रथ धीमा करने को कहा और जिस तरफ से बांसुरी के स्वर के आ रहे थे, उसी तरफ जाने का इशारा किया। कुछ दूर जाने पर समुद्रगुप्त ने देखा कि झरने और उनके पास मौजूद वृक्षों की आड़ में एक व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था। पास ही उसकी भेड़ें घास चर रही थीं। राजा ने कहा, आप तो इस तरह प्रसन्न होकर बांसुरी बजा रहे हैं, जैसे कि आपको किसी देश का साम्राज्य मिल गया हो। युवक बोला, श्रीमान आप दुआ करें कि भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दे। क्योंकि अभी इस वक्त मैं खुद को पूरी तरह से सम्राट महसूस करता हूं और सम्राट हूं भी। लेकिन साम्राज्य मिल जाने पर पर कोई सम्राट नहीं रह जाता, बल्कि वह तो सेवक बन जाता है। युवक की बात सुनकर राजा हैरान रह गए। तब युवक ने कहा सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। व्यक्ति संपत्ति से स्वतंत्र नहीं होता बल्कि भगवान का चिंतन करने से स्वतंत्र होता है। जब वह मन कर्म वचन के बारे में चिंतन करता है, तब उसे किसी भी तरह की सांसारिक चिंता नहीं होती है। ऐसे में मुझमें और सम्राट में बस मात्र संपत्ति का ही फासला होता है। बाकी सब कुछ तो मेरे पास भी है। युवक की बातें सुनकर राजा ने युवक को अपने सम्राट होने का परिचय दिया। युवक सम्राट समुद्रगुप्त का परिचय जानकर हैरान था, लेकिन जाने अनजाने ही सही, राजा की चिंता का समाधान उसने कर दिया था। इस प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

बुधवार, 30 नवंबर 2016

प्रेरक प्रसंग - पगडंडी

लेख का अंश... चौड़े रास्ते ने पास चलती पगडंडी से कहा - "अरी पगडंडी, मेरे रहते मुझे तुम्हारा अस्तित्व अनावश्यक-सा जान पड़ता है। व्यर्थ ही तुम मेरे आगे-पीछे, जाल-सा बिछाए चलती हो!" पगडंडी ने भोलेपन से कहा, "नहीं जानती, तुम्हारे रहते लोग मुझ पर क्यों चलते हैं। एक के बाद एक दूसरा चला। और फिर, तीसरा, इस तरह मेरा जन्म ही अनायास और अकारण हुआ है!" रास्ते ने दर्प के साथ कहा, "मुझे तो लोगों ने बड़े यत्न ने बनाया है, मैं अनेक शहरों-गावों को जोड़ता चला जाता हूँ!" पगडंडी आश्चर्य से सुन रही थी। "सच?" उसने कहा, "मैं तो बहुत छोटी हूँ!" तभी एक विशाल वाहन, घरघराकर रास्ते पर रुक गया। सामने पड़ी छोटी पुलिया के एक तरफ़ बोर्ड लगा था, "बड़े वाहन सावधान! पुलिया कमज़ोर है।" वाहन, एक भरी हुई यात्री-गाड़ी थी, जो पुलिया पर से नहीं जा सकती थी। पूरी गाड़ी खाली करवाई गई। लोग पगडंडी पर चल पड़े। पगडंडी, पुलिया वाले सूखे नाले से जाकर, फिर उसी रास्ते से मिलती थी। उस पार, फिर यात्रियों को बैठाकर गाड़ी चल दी। रास्ते ने एक गहरा नि:श्वास छोड़ा! "री, पगडंडी! आज मैं समझा छोटी से छोटी वस्तु, वक्त आने पर मूल्यवान बन जाती है।" इस प्रेरक प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

प्रेरक प्रसंग - दिन और रात - शैल अग्रवाल

लेख का अंश... बहुत समय पहले की बात है जब सृष्टि की शुरुआत ही हुई थी। दिन और रात नाम के दो प्रेमी थे। दोनों में खूब गहरी पटती पर दोनों का स्वभाव बिल्कुल ही अलग-अलग था। रात सौंदर्य-प्रिय और आराम-पसंद थी तो दिन कर्मठ और व्यावहारिक, रात को ज़्यादा काम करने से सख़्त नफ़रत थी और दिन काम करते न थकता था। रात आराम करना, सजना-सँवरना पसंद करती थी तो दिन हरदम दौड़ते भागते रहना। रात आराम से धीरे-धीरे बादलों की लटों को कभी मुँह पर से हटाती तो कभी वापस उन्हें फिर से अपने चेहरे पर डाल लेती। कभी आसमान के सारे तारों को पिरोकर अपनी पायल बना लेती तो कभी उन्हें वापस अपनी चूनर पर टाँक लेती। लेटी-लेटी घंटों बहती नदी में चुपचाप अपनी परछाई देखती रहती। कभी चंदा-सी पूरी खिल जाती तो कभी सिकुड़कर आधी हो जाती। दूसरी तरफ़ बौखलाया दिन लाल चेहरा लिए हाँफता पसीना बहाता, हर काम जल्दी-जल्दी निपटाने की फिक्र में लगा रहता। आमने-सामने पड़ते ही दिन और रात में हमेशा बहस शुरू हो जाती। दिन कहता काम ज़्यादा ज‍रूरी है और रात कहती आराम। दोनों अपनी-अपनी दलीलें रखते, समझने और समझाने की कोशिश करते पर किसी भी नतीजे पर न पहुँच पाते। जान नहीं पाते कि उन दोनों में आखिर कौन बड़ा है, गुणी है. . .सही है या ज़्यादा महत्वपूर्ण है। हारकर दोनों अपने रचयिता के पास पहुँचे। भगवान ने दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं और कहा कि मुझे तो तुम दोनों का महत्व बिल्कुल बराबर का लगता है तभी तो मैंने तुम दोनों को ही बनाया और अपनी सृष्टि में बराबर का आधा-आधा समय दिया। गुण-अवगुण कुछ नहीं, एक ही पहलू के दो दृष्टिकोण हैं। हर अवगुण में गुण बनने की क्षमता होती है। पर रात और दिन को उनकी बात समझ में न आई और वहीं पर फिर से उनमें वही तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। हारकर भगवान ने समझाने की बजाय, थोड़े समय के लिए रात को दिन के उजाले वाली चादर दे दी और दिन को रात की अँधेरे वाली, ताकि दोनों रात और दिन बनकर खुद ही फ़ैसला कर सकें। एक दूसरे के मन में जाकर दूसरे का स्वभाव और ज़रूरतें समझ सकें। तकलीफ़ और खुशियाँ महसूस कर पाएँ। और उस दिन से आजतक सुबह बनी रात जल्दी-जल्दी अपने सारे काम निपटाती है और रात बने दिन को आराम का महत्व समझ में आने लगा है। अब वह रात को निठल्ली और आलसी नहीं कहता बल्कि थकने पर खुद भी आराम करता है। सुनते हैं अब तो दोनों में कोई बहस भी नहीं होती। दोनों ही जान जो गए हैं कि अपनों में छोटा या बड़ा कुछ नहीं होता। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति कम या ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं। सबके अपने-अपने काम हैं, अपनी-अपनी योग्यता और ज़रूरतें हैं। जीवन सुचारु और शांतिमय हो इसके लिए काम और आराम, दोनों का ही होना ज़रूरी है। आराम के बिना काम थक जाएगा और काम के बिना आराम परेशान हो जाएगा। अब दिन खुश-खुश सूरज के संग आराम से कर्मठता का संदेश देता है। जीवन पथ को उजागर करता है और रात चंदा की चाँदनी लेकर घर-घर जाती है, थकी-हारी दुनिया को सुख-शांति की नींद सुलाती है। हर शाम-सुबह वे दोनों आज भी अपनी-अपनी चादर बदल लेते हैं. . .प्यार से गले मिलते हैं इसीलिए तो शायद दिन और रात के वह संधि-पल जिन्हें हम सुबह और शाम के नाम से जानते हैं आज भी सबसे ज़्यादा सुखद और सुहाने लगते हैं। कौन जाने यह विवेक का जादू है या संधि और सद्भाव का. . .या फिर उस संयम का जिसे हम प्यार से परिवार कहते हें। शायद सच में अच्छा बुरा कुछ नहीं होता प्यार और नफ़रत बस हमारी निजी ज़रूरतों का ही नाम है. . .बस हमारी अपनी परछाइयाँ हैं। पर अगर कोण बदल लो तो परछाइयाँ भी तो घट और बढ़ जाती हैं। तभी तो हम आप उनके बच्चे, जो यह मर्म समझ पाए, अपने पूर्वजों की बनाई राह पर आजतक खुश-खुश चलते हैं। इस प्रेरक प्रसंग का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - ई मेल - shailagrawal@hotmail.com

कविता - नैपथ्य - गौरव भारती

कविता का अंश... 'नेपथ्य' नेपथ्य का कवि हूँ मैं, अपने अल्फ़ाज़, बुन रहा हूँ, घोसलें की माफ़िक। रोज हर रोज, लड़ते हुए, अनगिनत चरित्रों से। इस छटपटाहट में कि, निकल कर रूबरू होऊं, अपने किरदार के साथ, अपने अंदाज़ के साथ। हो एक लंबा संवाद, मेरे और तुम्हारे साथ। सुनो मुझे देखो मुझे, यह मैं नहीं एक जमात है, जिसकी एक ही कहानी , मेरे पास है, खोल रख रहा हूँ, समक्ष तुम्हारे। मानो उधेड़ रहा हूँ, बुनी हुयी स्वेटर। एक छोर पकड़कर, ज्यों उधेरती है स्त्री, समझने के लिए डिजाइन। अंत में एक अनुभव, तुम्हारे पास होगा। एक जमात तुम्हारे साथ होगी। मैं शायद नेपथ्य से निकलकर, मंच पर आ जाऊंगा। एक नयी कविता, नए भावबोध, नयी तलाश, नए प्रतिमान, नयी ऊर्जा के साथ, तुम्हारी ही कहानी, अपने अंदाज मे, कह सुनाऊंगा । इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

सोमवार, 28 नवंबर 2016

26/11 का जवाब क्यों नहीं दे पाया भारत?




27 नवम्बर 2016 को सन स्टार में प्रकाशित आलेख

शनिवार, 26 नवंबर 2016

आखिर किसके कारण भारत 26/11 का जवाब नहीं दे पाया?

डॉ. महेश परिमल
आज 26/11 यानी पूरी मायानगरी 3 दिनों तक आतंकियों के हवाले रहने की तारीख। इसी के साथ उन शहीदों की याद भी, जिन्होंने देश के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। उसके बाद तो कसाब को कबाब देने से लेकर उसकी फांसी तक चली लम्बी राजनीति। हाल ही में देश पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन की किताब आई है, जिसमें इस रहस्य से परदा उठाने की कोशिश की है कि आखिर भारत ने पाकिस्तान से 26/11 का बदला क्यों नहीं लिया? किताब में यह तो साफ नहीं है कि जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी चाहते थे कि इसका पाकिस्तान को करारा जवाब दिया जाना चाहिए, तो भी हम जवाब क्यों नहीं दे पाए? हाल ही में जब उड़ी में पाकिस्तानी आतंकियों ने हमारे देश के 18 जवानों की हत्या कर दी थी, तब उसका जवाब सर्जिकल स्ट्राइक से दिया गया था। इसके बाद कांग्रेसियों का यह बयान आया कि इसके पहले भारत ने कई बार सर्जिकल स्ट्राइक किया था, पर उसका प्रचार-प्रसार नहीं किया था। प्रधानमंत्री द्वारा की गई कार्रवाई की आलोचना करते हुए विपक्षी नेताओं ने यहां तक कह दिया था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक फर्जी था। पर उन्हीं कांग्रेसियों से यह पूछा जाए कि तो फिर भरत ने 26/11 का जवाब क्यों नहीं दिया, तो सभी खामोश हो जाते हैं। इस पर कोई भी कांग्रेसी कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है।
26/11 के समय पूरा देश पाकिस्तान के खिलाफ उबल रहा था। चारों तरफ केवल गुस्सा ही गुस्सा दिखाई दे रहा था। दस आतंकियों ने पूरे देश को तीन दिनों तक खामोश कर दिया था। मायानगरी के तो हाल ही बुरे थे। तीन दिनों तक वह आतंकियों की बंधक रही। उस समय सभी को यही लग रहा था कि यही समय है, जब पाकिस्तान को करारा जवाब दे दिया जाए। राजनीतिक गलियारों में भी इस दिशा में गंभीरता से सोचा जा रहा था। पर क्या हो रहा था, इसकी अधिकृत जानकारी आज तक किसी को नहीं मिली। शिवशंकर मेनन ने इससे परदा उठाने की एक छोटी सी कोशिश जरूर की है। पर बात पूरी तरह से साफ नहीं की है। पर जो कुछ बताया है, उससे यह तो बिलकुल ही साफ हो जाता है कि आखिर किसके कहने से पाकिस्तान को करारा जवाब नहीं दे पाए?
मुम्बई पर जब आतंकी हमला हुआ, उस समय विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ही थे। अपनी किताब बिटवीन लाइंसमें वे लिखते हैं कि26/11 के बाद पूरे विश्व में भारत की यह छवि उभरी कि भारतीय सैनिक कायर हैं। इसका मुख्य कारण यह था कि मुम्बई जब तक बंधक रही, तो उसका लाइव प्रसारण टीवी के माध्यम से पूरी दुनिया देख रही थी। इस वजह से भारतीय सैनिकों का भी खून खौल रहा था। वे तैयार थे, एक इशारे के लिए, ताकि पूरी शिद्दत के साथ पाकिस्तान पर टूट पड़ें। पर उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो पाई। भारत को सक्षम होते हुए कायर मान लिया गया। मेनन कहते हैं कि हमले के बाद वे निजी तौर पर पाकिस्तान पर हमले के पक्षधर थे। उनके मत के अनुसार मुर्दिक में अथ्यावा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित लश्करे तोयबा के प्रशिक्षण शिविर पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का था। आगे वे कहते हैं कि 26/11 के बाद भारत को शर्मसार हालात से बाहर लाने की कोशिश की जानी थी। पूरी योजना थी कि पाकिस्तान पर सीधे न सही, पर कुछ अलग ही तरीके से प्रहार किया जाए। उस दौरान सुरक्षा सलाहकार एम.के.नारायण ने देश की तीनों सेनाध्यक्षों के साथ मिलकर बैठक भी की थी। इसमें कुछ बड़े नेता भी शामिल थे। मेनन ने उस दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह समझाने का प्रयास किया था कि यदि विश्व में अपनी साख बचानी है, तो हमें पाकिस्तान को करारा जवाब देना ही होगा। इससे लोगों में जो गुस्सा उबल रहा है, उसे शांत किया जा सकता है। उनका कहना था कि मेरे विचार से पाकिस्तान ने अब अपनी मर्यादा की सीमा तोड़ दी है। इसलिए उसे करारा जवाब दिया जाना बहुत जरूरी है। यही वक्त का तकाजा है।
अपनी किताब में मेनन लिखते हैं कि तत्कालीन विदेश मंत्री और इस समय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी पाकिस्तान पर हमले के पक्षधर थे। प्रणब मुखर्जी ने यहां तक कह दिया था कि भारत के सभी विकल्प खुले हुए हैं। निजी बैठक में उन्होंने कहा था कि यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो उसके बाद जो हालात बनेंगे, उससे किस तरह से निपटा जाए। यहां तक सोच लिया गया था कि यदि जवाब में पाकिस्तान भी भारत पर हमला करता है, तो उस समय क्या करना है? इस दौरान सभी कुछ ठीक था, पाकिस्तान को करारा जवाब दे ही दिया जाए, जोश के इस माहौल पर अचानक ही किसी ने ठंडा पानी डाल दिया। यह काम किसने किया, इसे तो मेनन ने किताब में नहीं बताया है, उन्होंने इस संबंध में केवल इतना ही कहा है कि आखिर में यह तय हुआ कि पाकिस्तान पर आक्रमण करने के बदले आतंकवादी हमले का राजनीतिक तरीके से जवाब दिया जाए। मेनन की किताब बिटवीन लाइंस अभी तक पढ़ने में नहीं आई है। पूरी पढ़ने के बाद ही समझा जा सकता है कि लोगों के उत्साह को कम करने का काम आखिर किसने किया? पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध न करने का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का था, जिनका रिमोट कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथ में था। मेनन ने ही लिखा है कि आखिर भारत ने पाकिस्तान पर हमला क्यों नहीं किया? इसका सीधा सा जवाब है कि सरकार के सर्वोच्च स्थान पर बैठे लोग ने ही यह तय किया था कि पाकिस्तान पर हमला करने से कितना फायदा है, उससे अधिक फायदा तो हमला न करने से है। आखिर यह सर्वोच्च किसका हो सकता है, कौन उस पर बैठा है, इसे उस समय के हालात से समझा ही जा सकता है।
लश्करे तोएबा ने जब 13 दिसम्बर 2001 को देश की संसद पर हमला किया था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान पर हमला करने के लिए तैयार हो गए थे। पर अमेरिकी दबाव के कारण उन्होंने अपना विचार बदल दिया था। आज नरेंद्र मोदी के रूप में देश का ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जो पाकिस्तान के परमाणु बम से नहीं डरता, न ही अमेरिका के सामने झुकता है। यही कारण है कि आज पाकिस्तान को नरेंद्र मोदी आंख की किरकिरी लग रहा है। पर सीधे हमले न कर छद्म हमले कर रहा है। आज वह चारों तरफ से घिर गया है, ऐसे में अब उसका विरोध उसी के देश में हो रहा है। विरोध का यह स्वर लगातार मुखर हो रहा है। पर 26/11 के वक्त ही पाकिस्तान को करारा जवाब दे दिया जाता, तो आज हालात यह न होते।

डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

कविताएँ - 2 - सरिता शर्मा

कुछ पलों के लिए... कविता का अंश... कुछ पलों के लिए, आओ मिल जाएँ हम, खुशबुओं की तरह, बादलों की तरह। भूल जाएँ चलो मान अभिमान को, सूफियों की तरह, पागलों की तरह! चल पड़ें आज कोलाहलों से परे, रिक्त कर लें हृदय हलचलों से भरे, धड़कनों में बुनें राग अनुराग का, नृत्य करती हुई पायलों की तरह! वर्जना के जगत में सहज भूल सा, प्यार खिलता रहा जंगली फूल सा, धमनियों में घुला चाहतों का ज़हर, हम महकने लगे संदलों की तरह! ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क ईमेल- geetsarita@yahoo.co.in

कविताएँ - सरिता शर्मा

मैं पिघलती दर्द की चट्टान हूँ... कविता का अंश... मैं पिघलती दर्द की चट्टान हूँ। उड़ रही है रेत जलती, मन मरुस्थल की धरा है। पास आकर छू न लेना, आग से अन्तर भरा है। मैं अषाढ़ी मेघ की, बरसात से अन्जान हूँ। दायरा छोटा रहा, अकुला उठीं साँसें घुटन में। क्या कहूँ इस पीर ने, इतने पसारे पांव मन में। मैं व्यथा का आसरा हूँ, पीर का ईमान हूँ। जूझता जीवन रहा है, मैं विरोधों में पली हूँ। दूर करने को अँधेरे, उम्र भर मैं तो जली हूँ। रात का अन्तिम प्रहर हूँ, भोर पर कुर्बान हूँ। थी कभी सपना किसी के , झील से गहरे नयन का। टूट कर गिर जाऊंगी, जैसे कोई तारा गगन का । मैं किसी की ज़िन्दगी का, आख़िरी अरमान हूँ। ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - ई-मेल - geetsarita@yahoo.co.in

बुधवार, 23 नवंबर 2016

कविताएँ - डाँ. मधु प्रधान

आओ बैठें नदी किनारे... कविता का अंश... आओ बैठें नदी किनारे, गीत पुराने फिर दोहराएँ। कैसे किरनों ने पर खोले, कैसे सूरज तपा गगन में, कैसे बादल ने छाया दी, कैसे सपने जगे नयन में, सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की, मन के सोये तार जगाएँ। जल में झुके सूर्य की आभा, और सलोने चाँद का खिलना, सिन्दूरी बादल के रथ का, लहरों पर इठला कर चलना, बिम्ब पकड़ने दौड़ें लहरें, खुद में उलझ उलझ रह जाएँ । श्वेत पांखियों की कतार ने, नभ में वन्दनवार सजाये, प्रकृति नटी के इन्द्रजाल में, ये मन ठगा-ठगा रह जाये, धीरे-धीरे संध्या उतरी, लेकर अनगिन परी कथाएँ। आओ बैठे नदी किनारे... ऐसी ही अन्य कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - ईमेल- madhu.pradhan.kanpur@gmail.com

कविताएँ - आभा सक्सेना

आसमान में अंकित सूरज... कविता का अंश... आसमान में अंकित सूरज, मेरा तुमको आमंत्रण है। राज करो आकर धरती पर, बदली में कैसा विचरण है? हुए कई दिन पास न आए, ऐसी भी है क्या मजबूरी? ठिठुर रहे हैं बच्चे-बूढ़े, प्रश्न यहाँ पर, जन्म-मरन है। देखो कितनी किरनें फूटीं, कितनी ही आशायें रूठीं, आ जाओ अब मेरे प्यारे, कितने मैंने किए जतन हैं। रूठ गये हैं अलाव यहाँ पर, ठंडी पड़ गयी चिंगारी भी। हुए बहुत मायूस ये पंछी, लौट चले वह अपने,, वतन हैं। आसमान में अंकित सूरज, मेरा तुमको आमंत्रण है। राज करो आकर धरती पर, बदली में कैसा विचरण है? ऐसी ही अन्य प्रकृति से जुड़ी कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - ई मेलः abhasaxena08@yahoo.com

कविताएँ - डाँ. सरस्वती माथुर

गुलाबी, अल्हड़ बचपन... कविता का अंश... मैंने बचपन के सामान को, अपनी स्मृति के कोटर में डाल दिया है। ताला लगा कर समय का, चाबी को सँभाल लिया है । बचपन के घर आँगन की, हवाओं में बिखरी किलकारियों, गुलाबी रिश्तों की बिखरी बातों, दीवारों पर टँगी, बुज़ुर्गों की, तस्वीरों को , सतरंगी बीते दिनों को, बिखरी यादों के मौसम को, बचपन की धुरी के चारों ओर, चक्कर काटते माँ बाबूजी, भाई भावज और उपहार से मिले, अल्हड मीठे दिनों को, अमूल्य पुस्तक-सा सहेज लिया है। और संचित कर जीवन कोश में, इंद्रधनुषी सतरंगी चूनर में, बाँध दिया है। अब यह पोटली मेरी धरोहर है, जिसे मैं किसी से बाँट नही सकती। कभी भी बचपन की चीज़ों को, कबाड़ की चीज़ों की तरह, छाँट नहीं सकती, क्योंकि यह पूँजी है, मैरे विश्वास की, कृति है श्रम की, जहाँ सें मैं, आरंभ कर सकती हूँ, यात्रा मन की, गुलाबी बचपन की। एेसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविताएँ - कृष्णकुमार तिवारी किशन

कविता का अंश... बूढी माँ का मन अनमन है । उमर घटी है, समय नटी है, अब करतब दिखलाए। दो बेटों के बीच ठनी है, वो किसको समझाए ? आज स्वयं से ही, अनबन है । व्याकुल चित्त हुआ बूढी माँ का, घडी-घडी घबराए। दोनों ही अपनी ऊँगली है, कितना किसे दबाए ? हृदय में बढती, धड़कन है। शांत हो गयी लहरें बँटकर, माँ मझधार पड़ी। अपने ही घर के कोने में सहमी- सी रही खड़ी। पल पल तड़पन ही तड़पन है । खांसी आती ताने लेकर, आफत नई -नई। आज बड़े कल छोटे का दिन, माँ है बँटी हुई। टुकड़ों पर पलता जीवन है। ऐसी ही अन्य मर्मस्पर्शी कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - kktiwari.70@rediffmail.com

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

कविता - अंतरमन का अवलोकन- निसर्ग भट्ट

कविता का अंश... उन खोखले वादों की कटारों से, हम हर रोज़ कटते रहते हैं, उन भयंकर भ्रम जालों से, बहार निकल नहीं पाते हैं । उस अदृश्य आशा की तलाश में, हर रोज़ भटकते रहते हैं, हर शाम खुद से ही हार कर, फिर मायूस हो जाते हैं । उन अविरत आडंबरों से, हम इतने कायर बन चुके हैं, अपनी ही सच्चाई के सुरों को, हम सुन नहीं पाते हैं । अपने ही झूठ के जंगलों में, अक्सर हम खों जाते है, अपमानों के आँसुओं को, घूँट घूँट कर हम पी जाते हैं । कभी दोस्ती के दलदल में, तो कभी प्रेम के मृगजाल में, हर बार हम फँस जाते हैं, लाख कोशिशों के बाद भी, उस दर्द ए दरिया में, हर बार हम डूब जाते हैं । आकर्षणों की आँधी में, हर बार हम बह जाते हैं, औकात से आगे सोचने की गलती, अक्सर हम कर जाते हैं । घनघोर निराशा की नाव में, हम अक्सर हिंचकोले खाते हैं, उन अनगिनत ठोकरों के बाद, अब दर्द को भी महसूस नहीं कर पाते हैं । हर दिन पैसे की अंधी प्यास में, खुद को ही बेचते रहते हैं, अब तो खुद ही बोली लगाकर, खुद को ही खरीदते रहते हैं। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... E-mail - nisarg1356@gmail.com दूरभाष - 8460284736

रविवार, 20 नवंबर 2016

जेल में होंगे बेनाम सम्पत्ति वाले





 18 नवम्बर को सन स्टार दिल्ली में प्रकाशित आलेख
http://www.dailysunstar.com/hin/epaper/index.php?city=Delhi&date=18/11/16&page=10


शनिवार, 19 नवंबर 2016

कविता - 3 - उपकार - कुमार अंबुज

कविता का अंश... मुसकराकर मिलता है एक अजनबी, हवा चलती है उमस की छाती चीरती हुई, एक रुपये में जूते चमका जाता है एक छोटा सा बच्चा, रिक्शेवाला चढ़ाई पर भी नहीं उतरने देता रिक्शे से, एक स्त्री अपनी गोद में रखने देती है उदास और थका हुआ सिर, फकीर गाता है सुबह का राग और भिक्षा नहीं देने पर भी गाता रहता है। अकेली भीगी कपास की तरह की रात में, एक अदृश्य पतवार डूबने नहीं देती जवानी में ही जर्जर हो गए हृदय को, देर रात तक मेरे साथ जागता रहता है एक अनजान पक्षी, बीमार सा देखकर अपनी बर्थ पर सुला लेता है सहयात्री, भूखा जानकर कोई खिला देता है अपने हिस्से का खाना, और कहता है वह खा चुका है। जब धमका रहा होता है चैराहे पर पुलिसवाला, एक न जाने कौन आदमी आता है कहता है, इन्हें कुछ न कहें ये ठीक आदमी हैं, बहुत तेजी से आ रही कार से बचाते हुए, एक तरफ खींच लेता है कोई राहगीर, जिससे कभी बहुत नाराज हुआ था वह मित्र, यकायक चला आता है घर, सड़क पर फिसलने के बाद सब हँसते हैं नहीं हँसती एक बच्ची। जब सूख रहा होता है निर्जर झरना, सारे समुद्रों, नदियों, तालाबों, झीलों और जलप्रपातों के, जल को छूता हुआ आता है कोई कहता है मुझे छुओ, बुखार के अँधेरे दर्रे में मोमबत्ती जलाये मिलती है बचपन की दोस्त। एक खटका होता है और जगा देता है ठीक उसी वक्त, जब दबोच रहा होता है नींद में कोई अपना ही, रुलाई जब कंठ से फूटने को ही होती है, अंतर के सुदूर कोने से आती है ढाढ़स देती हुई एक आवाज, और सोख लेती है कातर कर देनेवाली भर्राहट, इस जीवन में जीवन की ओर वापस लौटने के, इतने दृश्य हैं चमकदार, कि उनकी स्मृति भी देती है एक नया जीवन। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

कविता - 2 - क्रूरता - कुमार अंबुज

कविता का अंश... धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा, प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी, झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा, क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा, एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग, पराजित न होने के लिए नहीं, अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे, तब आएगी क्रूरता। पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी, फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में, फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में, फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी, निरर्थक हो जाएगा विलाप, दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू, पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा, तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को, फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी, लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी, सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे, सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता, और सभी में गौरव भाव होगा, वह संस्कृति की तरह आएगी, उसका कोई विरोधी न होगा, कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य, और अधिक ऐतिहासिक हो, वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी, और सोख लेगी हमारी सारी करुणा, हमारा सारा श्रृंगार, यही ज्यादा संभव है कि वह आए, और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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